जो
दूसरों को इज्जत देते हैं, असल में वे खुद
इज्जतदार होते हैं।
क्योंकि
इंसान
दूसरों को वही देता है जो उसके पास होता है।
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बिना मोल का अनमोल रत्न
जी हाँ, एक ऐसा अनमोल रत्न जिसका कोई मोल नहीं है। इसका कोई मूल्य नहीं चुकाना पड़ता है, आपको कोई मेहनत भी नहीं करनी पड़ती, आप जैसे हैं
वैसे ही सहजता से रहते हैं। आपकी सहजता, आपका अपनापन, आपकी ईमानदारी, आपके स्वभाव से ही, यह रत्न स्वयं आपकी झोली में आ जाता है। एक बार यह रत्न आपके हाथ लग जाए
तो इसे बड़ी सावधानी से रखना पड़ता है। नहीं-नहीं कोई पहरेदार,
ताला चाबी, लॉकर में नहीं रखा जाता। हर समय आपके साथ ही रहता
है। एक बार खो जाए, टूट जाए तो फिर वापस नहीं मिलता, नहीं जुड़ता। और सब से आश्चर्य की
बात यह है कि आपको खुद पता नहीं चलता कि यह आपको कब, कैसे और
क्यूँ मिला और कब, कैसे और क्यों खो गया, बस अटकलें लगा सकते हैं। एक बात और यह होता किसी और का है लेकिन रहता
आपके पास है।
स्वामी मंथर गति से अपने घर की ओर लौट
रहे थे। आज मठ से लौटते उन्हें देर हो गई थी। उस छोटे से कस्बे में सड़कें सुनसान
हो चली थीं। स्वामी निश्चिंत चले जा रहे थे कि अचानक उनकी नजर एक व्यक्ति पर पड़ी।
उसके रंग-ढंग से उन्हें लगा कि वह थोड़ा घबड़ाया हुआ और परेशान है। उन्होंने अंदाज
लगाया कि शायद परदेशी है। स्वामी को देख, वह
उनके पास आया और किसी धर्मशाला का पता पूछा। स्वामीजी ने उसे पास की एक धर्मशाला
का पता दिया, लेकिन इस पर उसने पूछा, "क्या मैं वहाँ बिना बिस्तर के रह सकूँगा?"
"क्या मतलब?" स्वामी
जी को प्रश्न बड़ा अटपटा सा लगा।
"बात यह है," उस
व्यक्ति ने बताया, "धर्मशाला वाले उसी को ठहरने देते
हैं, जिसके पास बिस्तर या सन्दूक होता है, परंतु मेरे पास बस यही एक थैला है ।"
"क्यों? ऐसे क्यों?"
"वे कहते हैं कि जिनके पास बिस्तर नहीं है,
वे या तो चोर हैं या बम-पार्टी वाले क्रांतिकारी।"
यह सुनकर स्वामीजी को हँसी आ गई। पर उन भाई की समस्या काफी उलझी
हुई थी। तब क्या करें? वे इसी असमंजस में थे कि स्वामीजी ने उनसे कहा,
"आइए! मेरे साथ, मेरी कुटिया में, यहाँ पास में ही मेरी कुटिया है। मेरे पास ठहरने में तुम्हें कोई दिक्कत
नहीं होगी।"
वह व्यक्ति पहले तो कुछ समझा नहीं और जब
समझा तो हिचकिचाया लेकिन उसके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था। अतः उन्हीं के पास
उनकी कुटिया में ही कुछ दिनों के लिए ठहर गया। कुटिया साफ सुथरी और बड़ी थी।
अगले दिन अचानक स्वामी को एक तार मिला, लिखा था-"माँ सख्त बीमार है, एकदम आओ।"
उन्होंने जल्दी-जल्दी सामान बटोरा। गाड़ी जाने में केवल एक घंटा शेष था। उन्होंने
उसी गाड़ी से जाने का निश्चय किया, पर वह अतिथि उस समय घर पर
नहीं थे और शीघ्र लौटने की कोई आशा भी नहीं थी। तब उन्होंने एक पत्र लिखा, जिसमें तार की चर्चा करके बताया कि वे घर जा रहे हैं, वह आराम से कमरे में रहें, और जाते समय चाबी उसी
स्थान पर रख दें। फिर ताला लगा, चाबी को चिट्ठी में लपेट उसी
स्थान पर रख दिया, जहाँ पर रखने का नियम था। उन्हें आशा थी
कि वह दो-तीन दिन में लौट आएँगे, लेकिन समय कुछ ज्यादा लग
गया। जब लौटे तब फिर अपने काम में लग गए।
उनके मस्तिष्क में यह बात बिलकुल ही नहीं आई कि अपने पीछे वह मकान
में एक अंजान अतिथि को छोड़ गए थे। वह अंजान व्यक्ति वास्तव में अतिथि ही था। स्वामीजी
ने देखा कि अतिथि ने उनसे जो कुछ पाया था, उसे वह वहीं सुरक्षित अवस्था में छोड़ गया था।
वह 'जो
कुछ' क्या था? – वह था - 'भरोसा' !
'भरोसा’ ही बिना मोल के मिलने
वाला अनमोल रत्न है।
इस रत्न को सहेज कर रखिए। कभी हाथ
से फिसलने मत दीजिये।
हिफाजत से रखिए।
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