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शनिवार, 1 दिसंबर 2018

सूतांजली दिसम्बर 2018

सूतांजली               ०२/०५                                              दिसम्बर २०१८
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मेरे लिए आदर प्रकट करने का यह तरीका गलत है

गांधीजी के जीवन के अनेक प्रसंग हैं। लेकिन कई प्रसंग ऐसे हैं जिन्हे पढ़ कर हमें रुकना पड़ता है, उस पर विचार करना पड़ता है। ये हमें प्रभावित करती हैं, हम अछूते नहीं रह पाते। एक लंबी सांस लेकर इतना तो कहते ही हैं कि This is why Gandhi is Gandhi (इसी कारण गांधी गांधी थे)। उनके साथ रहने वाले भी अछूते नहीं रह पाते थे और पारस के सम्पर्क से स्वर्ण बन जाते थे, खुद अनुकूल और प्रतिकूल दोनों के तर्क देते थे।  ऐसा ही एक प्रसंग नवजीवन प्रकाशन की पुस्तक से।
  
श्रीगणेश वसुदेव मालवंकर, जो बाद में स्वतंत्र भारत के लोकसभा के अध्यक्ष बने, सत्याग्रह के प्रारम्भिक दिनों में गांधीजी के असहयोग प्रस्ताव से पूर्णतया सहमत नहीं थे। इसलिए जब कलकत्ता अधिवेशन से लौटकर श्री वल्लभभाई पटेल ने यह प्रश्न अहमदाबाद म्युनिसिपैलिटी में उपस्थित किया तो वह उलझन में पड़ गए। दो शिक्षकों को नोटिस दिया था। अगर म्युनिसिपैलिटी असहयोग नहीं करती तो वे इस्तीफा दे देंगे। इस पर वल्लभ भाई पटेल ने प्रस्ताव पेश किया कि उन दोनों के इस्तीफे मंजूर कर लिए जाएँ। मालवंकरजी ने इसमें एक संशोधन सुझाया कि इस बारे में मतदाताओं को विश्वास में लेना चाहिए और इसलिए इस प्रस्ताव पर एक महीने बाद विचार करना चाहिए।  

गणेश वसुदेव मालवंकर
सर्वसम्मति से यह संशोधन पास हो गया। अब प्रश्न यह था कि मतदाता मालवंकरजी का साथ नहीं देते तो क्या उन्हे अपने पद से त्यागपत्र दे देना चाहिए? उन्होने ऐसा ही करने का निश्चय किया। वे असहयोग करने के विरोध में थे। उन्होने मतदाताओं के लिए असहयोग के अनुकूल और प्रतिकूल दोनों तरह के एक-एक वक्तव्य तैयार किया और हरेक के पास वह वक्तव्य, उत्तर के लिए  मतपत्र और पते सहित लिफाफा भेजने का निश्चय किया।

गांधीजी उस समय अहमदाबाद में थे। उनको दिखाने के लिए यह वक्तव्य लेकर उनके पास गए। गांधीजी ने उसे ध्यान पूर्वक पढ़ा। बोले, मालवंकर, तुमने यह बहुत लंबा वक्तव्य लिखा है
मालवंकर ने उत्तर दिया, बापू, सब समझ जाएँ, इसलिए यह जरूरी था और थोड़े से शब्दों में बड़ी बात कह डालने वाली लेखन कला मुझमें नहीं है

बहुत देर तक वे उस प्रश्न को लेकर विचार विनिमय करते रहे। खुले दिल से बीच-बीच में हंसी मज़ाक करते हुए बातें हुईं, लेकिन गांधीजी मालवंकरजी को अपनी बात नहीं समझा सके। मालवंकरजी ने कहा, बापू, मेरे मन में आपके लिए आदर है। विचारों में भी हमारा मतभेद है, फिर भी ऐसा लगता है कि शायद मेरे ही विचारों में भूल हो। इसलिए मैं आपसे सहमत होने का विचार कर रहा हूँ

गांधीजी हंस पड़े। बोले, मेरे लिए आदर है, इसलिए सहमत होना चाहते हो। मेरे लिए आदर प्रकट करने का यह तरीका बहुत गलत है। तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम जो कुछ ठीक समझते हो उसे खुले मन से व्यक्त करो। मेरी गलती नजर आए तो आलोचना करो, जिससे मैं अपनी भूल समझ सकूँ। मेरा आदर व्यक्त करने का तो यही सही तरीका है

यह कहते हुए वे बहुत गंभीर हो गए, लेकिन शायद मालवंकरजी को यह कठिन मालूम हो रहा था। गांधीजी ने कहा, कठिन तो नहीं मालूम होना चाहिए। तुम निर्भय होकर अपना यही वक्तव्य छपवा दो। यह ठीक ही है। मेरे जो विचार दिये हैं, वे भी ठीक हैं
यह सुनकर मालवंकरजी को थोड़ा संतोष हुआ। वे विदा लेकर जाने के लिए उठे, लेकिन दरवाजे तक पहुंचे भी नहीं थे कि गांधीजी ने बुलाकर कहा, मालवंकर जरा अपना वक्तव्य दिखाना। मुझे तो लगता है कि मेरे विचारों के विरोध में और तुम्हारे विचारों के अनुकूल कुछ और बातें लिखी जा सकती हैं
यह कहते हुए उन्होने स्वयं अपने हाथ से उस वक्तव्य में अपने ही विरुद्ध दो-तीन बातें और जोड़ दीं।


गांधी की कहानी

30 जनवरी 1948, शुक्रवार के जिस दिन महात्माजी की मृत्यु हुई, उस दिन वे वही थे, जो सदा से रहे थे – अर्थात एक साधारण नागरिक, जिसके पास न धन था, न सम्पत्ति थी, न सरकारी उपाधि, न सरकारी पद, न विशेष प्रशिक्षण योग्यता, न वैज्ञानिक सिद्धि और न कलात्मक प्रतिभा। फिर भी, ऐसे लोगों ने, जिनके पीछे सरकारें और सेनाएँ थीं, इस अठहत्तर वर्ष के लंगोटधारी छोटे-से आदमी को श्रद्धांजलियाँ भेंट कीं। भारत के अधिकारियों को विदेशों से संवेदना के 3441 संदेश प्राप्त हुए, जो सब बिना मांगे आए थे, क्योंकि गांधीजी एक नीति-निष्ठ व्यक्ति थे।                                                                                                    लुईफिशर



गांधी ने कह दिया .....


गांधी ने हिंसक रास्ते से आजादी खोजने वालों  से कह दिया था कि खून से निकलने वाला समाज भी खूनी ही होगा, और वैसा भारत मुझे कबूल नहीं। उन्होने सुभाष बोस से कह दिया कि हिटलर और मुसोलिनी की मदद से मिली आजादी अंग्रेजों की गुलामी से बेहतर नहीं हो सकती; उन्होने जवाहरलाल से कह दिया – भले ही मैंने तुम्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया है लेकिन हमारे तुम्हारे बीच भारत की भावी तस्वीर को लेकर जो खाई है, उसे इतिहास में दर्ज कर, हमें एक-दूसरे से अलग रास्ते पर चल पड़ना चाहिए; उन्होने हिंदुत्व के पैरोकारों से कह दिया कि जहां तक छुआ-छात का सवाल है, अगर वेदों में लिखा है तो मैं उस वेद को मनाने से इंकार करता हूँ; उन्होने मुहम्मद जिन्ना से कह दिया – राष्ट्र धर्मों से नहीं, संस्कृतियों से बनते हैं और इसलिए मैं मानता हूँ कि हिंदुस्तान में रहने वाले सारे ही धर्म यहाँ एक-सी आजादी व सम्मान से रह सकते हैं और इसलिए मैं दो राष्ट्र के आपके सिद्धान्त का मरते दम तक विरोध करूंगा; उन्होने अम्बेडकर से कह दिया – मैं सामाजिक न्याय की  हर लड़ाई की अगली कतार में खड़ा मिलूंगा लेकिन यह काम भारतीय समाज को तोड़ कर और उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करके नहीं कर सकेंगे; और अंग्रेजों से कह दिया – भगवान के लिए इस देश को एनार्की में छोड़ कर आप यहाँ से चले जाइए। भारत को रक्त का सागर भले पार करना पड़े, वह अपना भविष्य खोज खुद लेगा।                                                                                                                                                                                                                                                                     कुमार प्रशांत

सोमवार, 5 नवंबर 2018

सूतांजली नवंबर 2018



सूतांजली                            ०२/०४                                           नवंबर  २०१८
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साध्य ही नहीं साधन भी पवित्र होना चाहिए

चम्पारण के अपने अनुभवों को लिपि बद्ध करते हुए अनुग्रह नारायण सिंह (गांधी मार्ग मई-जून २०१७) गांधी की विचित्र सोच पर लिखते हैं:
पटना से निकल कर हम लोग बेतिया में फिर इकट्ठे हुए। कमिटी के सामने कौन-कौन गवाह पेश किए जाएँ, कौन-कौन बयान रखे जाएँ इन सब पर विचार होने लगा। महात्माजी कमिटी के एक सदस्य घोषित किए गए और सदस्य के नाते उनके पास पुरानी सारी गोपनीय किताबें, सरकारी रिपोर्टें भेज दी गईं। हम लोगों ने उन रिपोर्टों को पढ़ा और दूसरों को भी बताया। महात्माजी को जब मालूम पड़ा तो वे बहुत बिगड़े। बोले, जब सरकार की ओर से ये कागजात हमारे विश्वास पर दिये गए हैं, तब इनके बारे में दूसरों को कुछ बताना विश्वासघात हुआ। हमलोगों को यह बात समझ में तो नहीं आई पर दोष स्वीकार कर लेने में ही भलाई थी।

तहक़ीक़ात का दिन सुनिश्चित होने पर सरकार की ओर से जिला मजिस्ट्रेट की गवाही की बात हुई। कॉक साहब जिला मजिस्ट्रेट थे। वे एक सीधे ईमानदार आदमी थे। उनकी रिपोर्ट चंपारण के किसानों के अनुकूल थी। उनके स्टेनोग्राफर ने रिपोर्ट की एक कॉपी चुपचाप हमलोगों के पास भेजी। हम लोगों ने वह पढ़ी और फिर महात्माजी को दे दी। महात्माजी ने पूछा कि यह क्या है? जब हमलोगों ने सारी बात बताई तब उन्होने उस कागज को देखने से इंकार कर दिया। उनका कहना था कि यह रिपोर्ट हमें चोरी से मिली है। हमें इसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। यदि स्टेनोग्राफर अपनी नौकरी से इस्तीफा देने को तैयार हो और खुले रूप से रिपोर्ट लेकर हमारे पास आए तो मैं सोच सकता हूँ कि इस रिपोर्ट को पढ़ूँ या न पढ़ूँ। हम लोग आश्चर्य चकित हो गए। मेरे मन में तो यह ख्याल आ ही नहीं सकता था कि इतना जरूरी कागज मेरे पास आए और मैं उसे लेने या पढ़ने से इंकार कर दूँ। पर बापू कुछ अलग ही सोचते थे। उनकी बात हमने समझी और रिपोर्ट वापस कर दी गई।

नेताओं के व्यक्तिगत जीवन और सार्वजनिक विचार में तब भेद किया जाता था। किसी का व्यक्तिगत चरित्र कैसा भी क्यों न हो, यदि वह राजनीति में हिस्सा लेता है तो वह बड़ा नेता है। उनके पास जो भी जरूरी कागजात आएँ, चाहे वे किसी भी तरीके से क्यों न आए हों, उसका इस्तेमाल करने में कोई आपत्ति, सदाचार की दृष्टि से भी, नहीं मालूम देती थी। महात्माजी ने इस पूरे प्रश्न पर नया ही प्रकाश डाला। भविष्य में व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन के भेद को मिटाने कि उन्होने बड़ी कोशिश की और कुछ हद तक वे सफल भी हुए। 

सुभाष चंद्र बोस से गांधी का प्रमुख मतभेद यही था। सुभाष मानते थे कि साध्य अगर पवित्र है तो साधन की परवाह नहीं करनी चाहिए। लेकिन गांधी का दृड़ विश्वास था कि साध्य कितना ही पवित्र हो अगर साधन पवित्र नहीं है तो साध्य पवित्र नहीं रह सकता। गांधी ने हिंसक रास्ते से आजादी खोजने वालों  से कह दिया था कि खून से निकलने वाला समाज भी खूनी ही होगा। और वैसा भारत मुझे कबूल नहीं। उन्होने सुभाष बोस से कह दिया की  हिटलर और मुसोलिनी की मदद से मिली आजादी अंग्रेजों की गुलामी से बेहतर नहीं हो सकती।
गांधी बनाम गांधीवादी

व्यवहार चतुर लोगों ने कहा, सीधी अंगुली से घी नहीं निकलता। व्यापारी बोलते हैं, यह दुनिया भले आदमियों की नहीं है। कूटनीतिज्ञ कहते हैं, कांटे से ही कांटा निकल सकता है। संसारी तत्वज्ञ कहते हैं, यह जगत साधुओं की नहीं है। यानि प्रत्येक व्यक्ति की शिकायत दूसरे प्रत्येक व्यक्ति के खिलाफ है। गांधीजी ने सबकी बात सुनी और कहा, ये सब दुनिया के बारे में शिकायत करने वाले हैं। उनका मतलब यह है कि अगर दुनिया में त्रुटियाँ नहीं होती तो हमें पसंद आती  उन लोगों के मन में यह भावना छिपी हुई है कि मैं उन बुरे लोगों में नहीं हूँ। मैं तो सीधा सदा हूँ लेकिन इस टेढ़ी दुनिया में मुझे भी देढ़ा बनना पड़ता है। मैं तो भला हूँ लेकिन इस बुरी दुनिया में मुझे भी बुरा बनना पड़ता है दुनिया की इस निंदा में यह असंतोष है कि वह सतप्रवृत्त एवं सदगुण संपन्न नहीं है; परंतु उसे वैसा होना चाहिए, यह गर्भित इच्छा भी है

दुनिया का हर आदमी यही कहता है कि यह संसार इसी तरह दु:साध्य एवं दुराध्य है। हरेक की  शिकायत दूसरे सब लोगों के खिलाफ है। इसका मतलब यह हुआ कि मनुष्य व्यक्तिश: (individually) सतप्रवृत्त एवं सदाकांक्षी है, लेकिन समूहश: (in group) असत प्रवृत्त एवं असदाकांक्षी है। लेकिन यह भी सही नहीं है । केवल दृष्टि में परिवर्तन करने का है। दुनिया बुरी है इसलिए मूझे भी  बुरा बनना पड़ता है’, इसके बजाय अगर प्रत्येक व्यक्ति यह संकल्प करे कि, दुनिया चाहे जैसी चले, लेकिन मैं तो नेकी और प्रेम से चलूँगा, तो दुनिया का कायाकल्प होगा। इसीको बापू हृदय परिवर्तन का तत्व कहते थे।

गांधीवादी कहता है, मैं तराश-खराश कर दूसरों के स्वभाव को पूरा मुलायम बना दूँगा। बापू कहते थे, मैं पहले अपने स्वभाव के दोषों को दूर करूंगा 
अक्तूबर में  “कौन जानता गांधी को”
2 अक्तूबर 2018, गांधी की 150वीं जयंती के प्रारम्भ होने के पूर्व हमने गांधी प्रश्नोत्तरी का खेल “कौन जानता गांधी को” का शुभारंभ 30 सितम्बर को किया। अध्यापकों, प्रधानाध्यापकों, संचालकों, न्यासियों (trustees) तथा शहर के अन्य गणमान्य लोगों को इस खेल की झलक दिखाई गई।

कौन जानता गांधी को एक गांधी प्रश्नोत्तरी का खेल है जिसे शहर के विद्यालयों में खिलाने की व्यवस्था की गई है। विद्यार्थियों की उम्र को ध्यान में रखते हुए इस खेल को तीन भागों में बांटा गया है – जूनियर या प्राइमरी (कक्षा 1-5), मीडियम या सेकेंड्री (कक्षा 6-8) तथा सीनियर या उच्चतर माध्यमिक (कक्षा 9-12)। 

उद्घाटनके पश्चात इस खेल का आयोजन शहर के दो विद्यालयों में यथा सेठ सूरजमल जालान बालिका विद्यालय तथा मारवाड़ी बालिका विद्यालय में क्रमश: 6 एवं 11 अक्तूबर को सफलता पूर्वक किया गया। छात्राओं के अतिरिक्त अध्यापिकाओं ने पूरे खेल को बड़े ध्यान से देखा, सराहा  और कहा कि बच्चों के लिए ही नहीं बल्कि उनके लिए भी खेल ज्ञानवर्द्धक तो है ही, इसकी प्रस्तुति भी बहुत मनोरंजक होने के कारण पूरे समय तक सबों को बांध कर रखती है। विजेताओं को गांधी साहित्य तथा प्रतिभागियों को एक वर्ष की “गांधी मार्ग” की सदस्यता हमारी तरफ से प्रदान की गई। 13 अक्तूबर से शहर के विद्यालयों में दुर्गा पूजा की छुट्टियाँ प्रारम्भ हो गईं। 

इस कार्यक्रम का आयोजन आगामी 2 अक्तूबर 2019 तक करने का निश्चय किया गया है।
संपादक

सेठ सूरजमाल बालिका विद्यालय
मारवाड़ी बालिका विद्यालय






बुधवार, 3 अक्टूबर 2018

सूतांजली अक्तूबर 2018


सूतांजली                            ०२/०३                                               अक्तूबर २०१८
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कौन जानता गांधी को?

2 अक्तूबर 2018 से प्रारम्भ हो गया है महात्मा गांधी का 150वां जन्मदिन। देश ही नहीं, विदेशों मे भी इस अवसर पर साल भर चलने वाले कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। क्या आप इनमें से किसी से भी जुड़े हैं? या आप खुद कोई आयोजन कर रहे हैं? अगर नहीं, तो सबसे पहले इस पर विचार कीजिये और अपने आप को इससे जोड़िए। गांधी से जुड़ना केवल सत्य व अहिंसा से जुड़ना नहीं यह जोड़ है मानव का मानव से, सृष्टि का सृष्टि से, विध्वंस को छोड़ सृजन से।

अगर आप यह सोच रहे हैं कि आप इस आयोजन से कैसे जुड़ सकते हैं’? न जानकारी है, न आर्थिक सामर्थ्य, न शारीरिक बल, न समय, तो मैं कहीं पढ़ी यह बात बताना चाहूँगा – “हमने जन्म लिया और हम जीवित हैं। किस लिए जन्म लिया और किस लिए जीवित हैं – यह हम नहीं जानते। जब तक जीवित हैं अपने हित के साथ सब के हित के लिए जीयें। सबके हित के लिए यानि मात्र मनुष्य के लिए नहीं, सभी जीवधारियों के हित के लिए भी। जीयो तो बस इस तरह जियो। इस तरह जीने के लिए शायद कष्ट भी उठाना पड़े । पूछोगे दूसरों का हित करने की क्षमता हममें नहीं तो? हममें से बहुत लोगों को दो समय की रोटी कमाना ही एक समस्या है। ऐसे में दूसरों का भला क्या हित कर पाएंगे? इस बारे में इतना तो कर ही सकते हैं कि  दूसरों के प्रति अन्याय न हो। इस तरह तो जिया ही जा सकता है। दूसरों को सुख न दे पाएँ, न सही, पर दुख तो न दिया जाए”।    

हमने गांधी पर आधारित एक प्रश्नोत्तरी (क्विज) तैयार किया है-“कौन जानता गांधी को पावर पॉइंट पर आधारित यह खेल बच्चों के लिए प्रमुखतया 3-5, 6-8 तथा 9-12 कक्षा के विद्यार्थियों के लिए है और समय है लगभग 60 मिनट। इस खेल का उद्देश्य बच्चों में गांधीजी के बारे में जागरूकता पैदा करना और सच्चाई बताना है। हम यह खेल अपने शहर, कोलकाता के विभिन्न विद्यालयों, संस्थाओं (रोट्राक्ट, लियो आदि) , आवासीय कॉम्प्लेक्स आदि में आयोजित करेंगे। आपके लिए जहां भी संभव हो इस खेल का आयोजन करवाएँ। इस खेल से आप और भी कई प्रकार से जुड़ सकते हैं। अगर आप जुड़ना चाहते हैं, किसी भी रूप में तो हमें सम्पर्क करें, ई मेल,  SMS या व्हाट्स ऐप पर।
                                                                                                                                          संपादक
गांधी? कौन गांधी? क्या किया उसने ? 

मैंने एक दन्त कथा पढ़ी - रक्तचिन्ह। वैसे तो दन्त कथा का अर्थ होता है वह कहानी जिसे सुनी गई हो और सत्य से दूर कपोल कल्पना हो। हो सकता है यह दादी-नानी की कहानी रही हो। अब इस कथा की उत्पत्ति की मुझे जानकारी नहीं है लेकिन मैंने इसे पढ़ा राजेन्द्र लहरिया के लघु उपन्यास लोकलीला में। वैसे देखा जाय तो उपन्यास में जिस लीला का आख्यान है उसे लोकतन्त्र कहते हैं। पता नहीं लेखक ने इसमें से तन्त्र को क्यों छोड़ दिया। खैर हम उसे छोड़ सुने, नहीं पढ़ें  दन्त कथा – रक्तचिन्ह।

एक था राजा। । दो ही प्रकार के राजा हुआ करते थे – क्रूर और दुष्ट या फिर दयालु और  न्यायप्रिय। हमारी कथा  का राजा प्रजाबंधु था। सब सुखी थे। अमन चैन था। अत: राजा भी आराम से था। षटरस भोजन करता और हर प्रकार के सुख और भोग का आनंद लेने के लिए भी उसके पास समय था।  धीरे-धीरे बूढ़ा होने लगा। और जैसे जैसे बूढ़ा होने लगा उसे दो विचित्र इच्छाएं उत्पन्न हो गईं। मृत्यु की चिंता सवार हुई, अत: अमरत्व की ईच्छा पैदा हुई। और इसके साथ  इंसान के खून पीने की इच्छा बलवती होने लगी। बहुत सोच विचार के बाद भी जब उसे कोई उपाय नहीं समझ आया तो उसने अपनी समस्या अपने मंत्रियों  के सामने रखी।  राजा की इच्छा सुनकर मंत्री मण्डल को काठ मार गया, उनकी बोलती बंद हो गई। सब एक दूसरे का मुंह ताकने लगे। आखिर आपस में सलाह करके उन्होने  कहा कि राजन आपकी यह इच्छा संसार में कोई पूरी नहीं कर सकता। लेकिन धर्मराज कर सकते हैं, अत: राजन को धर्मराज की तपस्या कर उन्हे प्रसन्न करना चाहिए। राजा  धार्मिक तो था ही। वह तुरंत तपस्या पर बैठ गया। उसने बड़ी कठिन तपस्या की। यह कठिन तपस्या भी बड़ी विचित्र चीज है। कुछ एक स्थानों पर तो इस कठिन तपस्या की चर्चा है, यथा-एक टांग पर खड़े होकर, दोनों हाथ उठाकर, बिना हिले डुले कि चीटियों ने अपने घर  बना लिए। लेकिन अधिकतर जगह पर इस कठिन की कोई व्याख्या नहीं है। मैं सोचता हूँ कि अगर इस कठिन तपस्या को वह कर सकता था तो हम क्यों नहीं कर सकते? खैर यह विषयांतर हो जाएग अत: मान लेते हैं कि राजा ने बड़ी कठिन तपस्या की। शायद इन्द्र को उनकी तपस्या से कोई भय नहीं रहा होगा या फिर उस समय रंभा-उर्वशी व्यस्त रहीं होंगी।  अत: वे राजन की तपस्या भंग करने नहीं आईं। परिणाम यह हुआ कि राजा की तपस्या पूर्ण हुई और धर्मराज प्रसन्न हो गए। राजा ने अपनी इच्छा का वर मांग लिया और धर्मराज ने, मरता  क्या न करता, वर दे  दिया। लेकिन साथ ही उस तथास्तु के ऊपर एक तारा का चिन्ह (star mark) लगा दिया। जिसका अर्थ होता है, शर्तें  (T&C) हैं। राजन ने नियम पढ़ा। सौभाग्य से दो ही नियम थे, अत: पढ़ने में दिक्कत नहीं हुई। पहला- जिस भी इंसान का खून पीने की इच्छा होगी उससे राजा को कहना होगा, “मैं तुम्हारा खून पीना चाहता हूँ”।  बस राजा की जीभ अपने आप लंबी हो जाएगी, उस आदमी तक पहुँच जाएगी और  वह उसका खून पी सकेगा। दूसरा – अगर उस इंसान ने खून देने से इंकार कर दिया तो यह वरदान उसी समय समाप्त हो जाएगा और राजा का अमरत्व भी। धर्मराज इतना बता कर गायब हो गए। इधर राजा का चेहरा राक्षसों की तरह भयानक हो गया। जो भी देखता डर कर काँपने लगता, उसकी बोलती बंद हो जाती और राजा आराम से उसका खून पी लेता।

इस तरह वर्षों, लगभग दो, ढाई सौ या तीन सौ वर्ष गुजर गए। एक दिन राजा की सवारी जा रही थी। तभी उसने देखा सामने से एक  नौजवान किसान चला आ रहा है। उसके दोनों हाथों में सामान था। ऐसा प्रतीत हो रहा थी कि किसी मेले से अपने माँ-बाप, पत्नी, बच्चों के लिए उपहार  लिए उन्हे देने के लिए चला जा रहा है। परिवार को मिलने वाली खुशी का अंदाजा करते हुए वह लगभग दौड़ता हुआ बड़ी प्रसन्न मुद्रा में चला जा  रहा था। उसे देखते ही राजा को उसका खून पीने की  इच्छा जागृत हो गई और आनन फानन में उसने कहा,  मैं तुम्हारा खून पीना चाहता हूँ”। अपने परिवार को मिलने वाली खुशी का खून वह इस प्रकार बरदस्त नहीं कर पाया और छूटते ही उसके मुंह से निकल गया, “नहीं राजन, आप मेरा खून नहीं पी सकते”। उसके यह कहते ही राजा को मिला वरदान समाप्त हो  गया। उसकी शक्ति समाप्त हो गई  और वह वहीं पर गिर पड़ा। कुछ ही देर में राजा की मृत्यु हो गई।

“कैसा लगा आपको गांधी का यह परिचय?”
“गांधी? लेकिन इसमें गांधी हैं कहाँ?”
“क्यों क्या आपको गांधी नहीं दिखे? तब मिक्रोस्कोप लगा कर पंक्तियों के बीच में पढ़ें। गांधी साफ साफ दिख जाएंगे। अरे भाई, साधनहीन, श्रीहीन, कमजोर, निहत्थे किसान, मजदूर और जनता में हिम्मत फूंकने वाला तो वो गांधी ही था जिसके कारण वे साधन सम्पन्न बलवान हथियारों से लैस ब्रिटिश साम्राज्य को कह सके, तुम मेरा खून नहीं पी सकते।”


रविवार, 2 सितंबर 2018

सूतांजली सितंबर २०१८


सूतांजली                            ०२/०२                                    सितंबर २०१८
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क्या सत्य कहा जा सकता है ?

सत्य में कुछ भी काट दिया जाये या कुछ भी बढ़ा दिया जाये तो सत्य न रहे। सत्य बस जितना है उतना ही है। उसमें कुछ भी, थोड़ा भी, जोड़ या घटा दिया जाए, तो सत्य सत्य नहीं रहता।

इसलिए हजारों वर्ष तक ऋषियों ने कोशिश की कि ग्रंथ न लिखे जाएँ। क्योंकि लिखे हुए में वह तो छूट जाएगा, कट जाएगा,  जिसे कहने के लिए यह सब कहा था, यद्यपि इसमें वह कहा नहीं जा सकता। वे खाली रिक्त स्थान तो छूट जाएंगे, और वही थे असली। वेद लिखे गए कोई पाँच हजार वर्ष पहले। लेकिन लिखे जाने के पहले से हजारों वर्षों तक वे अस्तित्व में थे। जो वेद ऐसे विचार को जन्म दे सकते थे, लिखने की कला न खोज पाये हों, यह नासमझी की बात है। वे भाषा न बना पाये हों, लिपि न बना पाये हों, यह पागलपन की बात है।

आग्रह था कि न लिखे जाएँ। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को सीधा ही संक्रमित करता रहे। क्योंकि वह व्यक्ति शब्द भी दे सकेगा और वह शून्य मौजूदगी भी दे सकेगा। किताब जड़ हो जाएगी, शून्य मौजूदगी नहीं दे सकेगी। किताब उनके भी हाथ लगेगी जो कुछ नहीं जानते, अज्ञानी हैं। और किताब अज्ञानी के हाथ लग जाए तो अज्ञानी को इतनी जल्दी ज्ञानी होने का भ्रम पैदा होता है जिसका कोई हिसाब नहीं। अज्ञानी होना बुरा नहीं, अज्ञान में ज्ञान का भ्रम हो जाना बहुत खतरनाक है
ज्ञानी अकर्म से व्यवस्था करता है। उसकी मौजूदगी ही व्यवस्था देती है, उसे कोई कर्म नहीं करना पड़ता। जैसे घर में पिता का आगमन बच्चे को अपने आप व्यवस्थित कर देता है। पिता को कुछ करना नहीं पड़ता। मालिक की मौजूदगी कार्यालय में अनुशासन बनाए रखती है। मालिक को इस के लिए अलग से कुछ करना नहीं पड़ता। ज्ञानी की मौजूदगी सक्रियता है। उसका होना काफी है। जैसे चुंबक हो, तो फिर उसे कुछ करना नहीं पड़ता, लोहे के टुकड़े खींचे चले आते हैं।

आप चाहते हों कि आपके घर में शांति हो, तो उसके लिए कोई नियम मत बनाइये, सिर्फ आप शांत होते चले जाइए। और थोड़े ही दिनों में आप पाएंगे कि घर में अनूठी शांति उतरने लगी है। न मालूम, अन्जान रास्तों से शांति घर में उतरने लगेगी। जिनमें कल तक सब अशांति का उपाय दिखता था, वे भी शांत होते मालूम होने लगेंगे। सिर्फ आप शांत हो जाइए। आपने कहीं कुछ भी नहीं किया, अगर कुछ किया तो सिर्फ अपने भीतर किया।

इस दुनिया में शक्तिहीन ही काम करते हैं, शक्तिशालियों के तो होने से ही काम हो जाता है। जो नहीं जानते, वे ही केवल श्रम करके कुछ कर पाते हैं, जो जानते हैं, वे तो विश्राम से भी कर लेते हैं। जिन्हे पता है, वे तो मौन से भी बोल लेते हैं, और जिन्हे  पता नहीं है, वे लाख लाख शब्दों का उपयोग करके भी कुछ नहीं कह पाते।   
लाओत्से

बोलने से तो सत्य को बोला नहीं जा सकता। और बोलते ही सिद्धान्त विवाद बन जाता है। इसलिए सब सिद्धान्त वाद बन जाते हैं। वाद बनते ही विपरीत वाद निर्मित होता  है। संघर्ष और कलह और संप्रदाय और मत, सारे उपद्रव का जन्म होता है। गांधी ने हर समय कहा गांधीवाद  जैसा कोई वाद नहीं । मेरे पास देने के लिए कोई नया विचार नहीं है, सत्य और अहिंसा उतना ही पुराना है जितना इंसान। गांधी यही कहते थे मेरा जीवन ही मेरा संदेश है

बुद्ध कहते थे कि जो मैं कह सकता था, वह मैंने कहा; लेकिन वह असली बात नहीं है। जो मैं नहीं कह सकता था, वह मैंने नहीं कहा है; वही असली बात है। इसलिए जो मेरे कहने को सुनते रहे हैं वे मुझे नहीं समझ पाएंगे; जिन्होने मेरे न कहने को भी सुना है, वही मुझे समझ सकते हैं। न कहने को जिन्होने सुना है! न कहना भी सुना जा सकता है!

                                                                                        ओशो से प्रेरित
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आदि शंकराचार्य द्वारा आर्यावर्त का गठन

जब सनातन धर्म आडम्बर और कर्मकांड के दल दल में फंसा पाताल में धँसता जा रहा था उसी समय आचार्य शंकराचार्य का, सूर्य के सदृश्य, भारत के क्षितिज पर आगमन होता है। अपने ज्ञान और कौशल से वे सिर्फ सनातन धर्म की पुनर्स्थापना ही नहीं करते बल्कि आर्यावर्त को संगठित कर उसके संचालन की भी व्यवस्था करते हैं। देश के चारों कोनों में चार धाम की स्थापना करते हैं, चार देवी-देवता, चार वेद, चार महा मंत्र तथा चार आचार्यों को प्रतिष्ठित करते हैं और उनके भविष्य में सुचारु रूप से चलते रहने का भी सुप्रबंध करते हैं। 
आदि शंकराचार्य
आचार्य शंकर ने देश को संगठित करने के लिए देश के चारों कोनों में एक-एक मठ की स्थापना की। सबसे पहले उन्होने दक्षिण में तुंगभद्रा नदी के तट पर शृंगेरी मठ की स्थापना की। यहाँ के देवता आदिवाराह, देवी शारदाम्बा, वेद यजुर्वेद और महावाक्य अहं ब्रह्मास्मि’ (मैं ब्रह्म हूँ, बृहदारण्यक उपनिषद १.४.१०, यजुर्वेद) है। सुरेशाचार्य को मठ का अध्यक्ष नियुक्त किया। इसके बाद उन्होने उत्तर दिशा में अलकनंदा नदी के तट पर बदरिकाश्रम (बद्रीनाथ) के पास ज्योतिर्मठ की स्थापना की जिसके देवता श्रीमन्नारायण तथा देवी श्रीपूर्णगिरि हैं। यहाँ के संप्रदाय का नाम आनंदवार, वेद अथर्ववेद तथा महावाक्य अयमात्मा ब्रह्म (आत्मा ब्रह्म है, मांडूक्य उपनिषद १.२ अथर्ववेद), है। मठ का अध्यक्ष तोटकाचार्य को बनाया। पश्चिम में उन्होने द्वारकापुरी में शारदा मठ की स्थापना की जहां के देवता सिद्धेश्वर, देवी भद्रकाली, वेद सामवेद और महावाक्य तत्वमसी (तू वही है, छांदोग्य उपनिषद, ६.८.७, साम वेद) है। इस मठ का अध्यक्ष हस्तमानवाचार्य को बनाया। उधर पूर्व दिशा में जगन्नाथपुरी के पास महानदी के तट पर गोवर्धन मठ की स्थापना की जहां के देवता जगन्नाथ, देवी विशाला, वेद ऋग्वेद और महावाक्य प्रज्ञान ब्रह्म (ज्ञान ब्रह्म है, ऐतरेय उपनिषद ३.३, ऋग वेद) है। यहाँ उन्होने हस्तामलकाचार्य को मठ का अध्यक्ष बनाया। इस प्रकार शंकराचार्य ने अपने सांगठिक कौशल से सम्पूर्ण भारत को धर्म एवं संस्कृति के अटूट बंधन में बांध कर विभिन्न मत-मतांतरों के माध्यम से सामंजस्य स्थापित किया और एक सूत्र में पिरोया।

शुक्रवार, 3 अगस्त 2018

सूतांजली, अगस्त २०१८



सूतांजली                ०२/०१              अगस्त २०१८                                               ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
पहला वर्ष

और देखते ही देखते पहला वर्ष बीत गया। इस माह से हमने दूसरे वर्ष में प्रवेश किया है। जब यात्रा प्रारम्भ की थी, भरोसा नहीं था कि दूसरा वर्ष देख पाएंगे। यह तो आपलोगों का सहयोग एवं उत्साहवर्द्धन ही है कि हम केवल अपना वजूद बनाये रखने में ही सक्षम नहीं रहे बल्कि हमने विस्तार भी पाया है, आगे बढ़ते जा रहे हैं। अब तो आगे बढ़ रहे हैं कहने में भी डर लगता है। जैसे रंगों का, व्यक्तियों का, नारों का, गीतों का, पत्रों का राजनीतिकरण हो चुका है वैसे ही आगे बढ़ रहे हैं भी राजनीतिज्ञों का ही जुमला हो गया है। यही कहना ठीक है, पहला कदम ही महत्वपूर्ण है। कदमों की शृखंला उसके पीछे अपने आप बनने लगती है। गांधी ने जब दांडी यात्रा शुरू की तो उनके साथ तो गिने चुने ही लोग थे। देश तो उनके पीछे अपने आप हो गया।

सूतांजली के संबंध में कई अलग अलग सुझाव मिले। इसके स्वरूप को बड़ा करने का सुझाव भी मिला, लेकिन कइयों का मत था कि इसका वर्तमान स्वरूप ही इसे विशिष्ट पहचान देता है, अत: ऐसा ही रखा जाय। इस माह से हमने केवल इसके अक्षरों का आकार थोड़ा बड़ा किया है। वर्तमान में यह पत्र अंतर्देशीय पत्र में छाप कर भेजा जा रहा है। कुछ लोगों को उनके मेल पर भेजा जाता है।  इस माह से हमने एक नया घर बनाया है - www.sootanjali.blogspot.com हमारे पुराने पत्र यहाँ उपलब्ध हैं। आने वाला हर पत्र भी वहाँ उपलब्ध रहेगा, ज्यादा सामाग्री और लिंक के साथ। आपकी इच्छानुसार सूतांजली पत्र या मेल या दोनों रूपों में आपके पास भेजी जा सकती है। इसमें कोई भी बदलाव चाहते हों तो हमें sootanjali@gmail.com पर मेल करें या ९४३२२९५२५० पर संदेश भेजें। अपना पूरा नाम तथा ठिकाना जरूर से लिखें। और एक बात, अगर आप चाहते हैं कि सूतांजली आपके किसी परिचित को भी भेजी जाय तो हमें उन्हे भी भेजने में खुशी होगी। कृपया उनका विवरण (नाम एवं ठिकाना) भेजें, उपरोक्त मेल या फोन पर।  

सूतांजली के लिए आपके पास कोई भी सामाग्री हो तो अवश्य भेजें। सुझाव हो तो जरूर बताएं। हम उस पर विचार करेंगे। आपके सहयोग के लिए एक बार फिर आभार।                                                           संपादक
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संस्कृति एवं संस्कार

“और संस्कार”?
“क्या होता है ये, आपका संस्कार? किसे कहते हैं संस्कार”?
“वह ज्ञान जिसे हम पूर्वजों से, परिवर से, समाज से, आड़ोस-पड़ोस से, उनकी बातों से, उनके तौर तरीकों से सीखते हैं”?
“बस रहने दीजिये आपका वो परिवार, समाज, पड़ोस। परिवार वाले हमारे लिए खड्डा खोदने मे कोई कसर नहीं छोड़ते, समाज पूरी तरह दक़ियानूसी और रूढ़िग्रस्त है, पड़ोस झाँकने भी नहीं आता। यही है न आपके संस्कार की पाठशाला”?
“मेरी सुनो तो कहूँ”।
“हाँ हाँ, कहिए न, क्या कहना है आपको”?

“मैं इतना कुछ नहीं जानता हूँ। लेकिन हाँ मेरा बेटा विदेश में रहता है। कुछ समय पहले उसने भारत में भारतीय पद्धति से विवाह किया। विवाह के बाद दोनों, बेटा और बहू, विदेश चले गए। लेकिन बहू को उस देश के नियमों के तहत कुछ महीने बाद ही कुछ समय के लिए वापस आना पड़ा। आवश्यक कार्यवाही पूरी होने पर वह वापस चली गई। जाने के पहले सासू माँ के साथ कपड़े खरीदने बाजार गई। विदेशी परिधान के साथ-साथ भारतीय पोशाक भी खरीद रही थी। सास को आश्चर्य हुआ, “क्या ये पोशाकें वहाँ चलती हैं”?
“नहीं, लेकिन जब आप और बाबा वहाँ आएंगे तो आपलोगों के सामने मैं विदेशी पोशाक पहन कर नहीं घूमूंगी”।
“.........”
“तो आपका मतलब यह कि भारतीय पोशाक पहनना ही संस्कार है”?

“कुछ समय पहले स्काइप पर उन्ही बेटे-बहू से कुछ बातें कर रहे थे। कुछ देर में बेटा उठ कर चला गया लेकिन बहू बात करती रही। थोड़ी देर बाद दिखाई पड़ा कि बेटा कहीं बाहर जाने के लिए तैयार हो कर आया। हमने पूछ कहीं बाहर जा रहा है?’ बहू ने बताया कि हमलोगों का मूवी जाने के कार्यक्रम था। हमने तुरंत कहा, था मतलब, कहा क्यों नहीं? जाओ तुम भी जल्दी से तैयार हो जाओ और बात समाप्त कर लाइन काट दी।
“आपसे अपनी बात कहने की हिम्मत न होना ही संस्कार है”?

 “नहीं, इनमें से कोई भी संस्कार नहीं है। लेकिन इन घटनाओं में आपसी सम्बन्धों को जोड़ने वाला वह पतला सा धागा जो न दिखाई पड़ता है न दिखाया जा सकता है, वह भावना जो न बताई जा सकती है न समझाई जा सकती है, वह समझ जो उस धागे को देखने की शक्ति प्रदान करती है वही संस्कार है। यह समझ कि मैं सिर्फ मैं नहीं हूँ, बल्कि मैं से बहुत ज्यादा व्यापक एक परिवार हूँ, समाज हूँ, गाँव-शहर-देश-विश्व-ब्रह्मांड और इन सबसे ऊपर मानव हूँ। यह दृष्टि जो बिना पढ़े, बताए, समझाये मिलती है, उसे संस्कार कहते हैं। संस्कार हमें केवल अपने अधिकारों से नहीं बल्कि अपने उत्तरदायित्वों से रूबरू करवाता है। संस्कार और संस्कृति ज़िम्मेदारी संभालने के लिए है, अधिकार प्राप्त करने के लिए नहीं’”हर समय बदलते रहने में न बदलने वाली चीज संस्कृति है। उसे देखने वाली दृष्टि संस्कार है।   
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ब्लॉग / मेल विशेष

जब बच्चे के विवाह का प्रसंग आता है तो हम कहते हैं हमें तो पढ़ा लिखा लेकिन संस्कारी बच्चा चाहिए। अगर बच्चा ऑक्सफोर्ड-हारवर्ड से पढ़ा लिखा हो, फर्राटे दार अँग्रेजी बोलता हो, स्थानीय भाषा भी बोलता हो, गाड़ी चलाता हो, दफ्तर में काम करता हो, CEO बनने वाला  हो। तो उसका स्टेटस तो बहुत अच्छा है, लेकिन हम तो कह देंगे कि नहीं नहीं हमें तो संस्कारी बच्चा चाहिए। तो क्या उसमें संस्कार नहीं है? क्या वह जंगली है? यही भाषाओं और विचारों का अंतर है। जिसे हम मूल्यवान समझते हैं और संस्कारी मानते हैं। यानि कि जो हमारी परंपरा में रचा-बसा हो, वो जो हमारे परिवार में भी जुड़ सके वह हमारे लिए संस्कारी है। यानि जो अपनी परंपरा से जुड़ा है वह संस्कारी है। वह जो हमारी परंपरा से जरा भी जुड़ा न हो उसे हम अ-संस्कारी तो नहीं लेकिन हाँ आधुनिक कहेंगे।  इन  दोनों में  खाई है और घर्षण भी है। ऐसा नहीं है कि उच्च शिक्षित बच्चा संस्कारी नहीं या संस्कारी बच्चा उच्च शिक्षित नहीं हो सकता। होता यह है कि एक संस्कारी लेकिन साधारण पढ़ा लिखा बच्चा अपने कर्तव्य बोध से दबा रहता है और अपने अधिकारों के प्रति उदासीन। वहीं शिक्षित बच्चा कार्यालय में कार्यरत बॉस के अस्तित्व को स्वीकार करता है, उसके अनुरूप मर्यादा में रहता है, तथा अपने पद के अनुसार अपने अधिकारों के साथ साथ अपने जिम्मेदारियों के प्रति ज्यादा सजग रहता है। अधिकारों का प्रयोग अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में करता है। यही नहीं उत्तरदायित्व को निभाने के लिए जरूरत पड़ने पर अधिकार को छोड़ भी देता है। लेकिन वही बच्चा जब परिवार में आता है तब यह विस्मृत कर देता है कि यहाँ बॉस और कोई है। वह अपने अधिकारों के प्रति तो सजग होता है लेकिन उत्तरदायित्वों के प्रति उदासीन। समुचित ढंग से अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करने पर  अधिकार स्वत: प्राप्त हो जाते हैं। अधिकार और कर्तव्य के बीच सामंजस्य बना रहे तो न कोई विरोध न कोई घर्षण। संस्कार और शिक्षा ३६ नहीं ६३ हैं, बस समझ का फेर है


शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

सूतांजली, जुलाई २०१८


  सूतांजली                           ०१/१२                     जुलाई २०१८                
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क्या हम समझदार हैं?

चंदामामा। न मैं चाँद की बात कर रहा हूँ न मामा की। मैं बात कर रहा हूँ उस पत्रिका की जिसे हमारे मोहल्ले का हर बच्चा बड़े चाव से पढ़ा करता था, अब से करीब ३०-४० वर्ष पूर्व। इसका प्रकाशन देश की अनेक भाषाओं में होता था। पत्रिका हमारे घर में आया करती थी और आने के पहले से हम पत्रिका का आरक्षण करवाते थे। कौन, किस समय और किस दिन पढ़ेगा? ताकि सब, मिल बाँट कर थोड़ा थोड़ा पढ़ सकें। बेहतरीन कागज, उत्तम छपाई, रंगीन चित्र। ऐतिहासिक, नैतिक, सामाजिक, धार्मिक, लघु एवं धारावाहिक कहानियाँ। चंदामामा का प्रत्येक अंक सँभाल कर रखते थे। और फिर, कुछ समय के बाद उसका ऑपरेशन होता था। प्रत्येक पन्ने को बहुत सँभाल कर अलग अलग करते, विषयानुसार एवं धारावाहिक कहानियों को अलग एक साथ कर उन्हे मंढाया जाता। फिर हम बच्चों के पुस्तकालय में  जमा कर लिया जाता था। इसकी सबसे ज्यादा मांग रहती। हम बच्चों को इस चंदामामा ने कितना कुछ दिया – सिखाया इसका आकलन करना आसान नहीं है। दर्द यह है कि यह या ऐसी कोई दूसरी पत्रिका अब उपलब्ध नहीं है।

प्रस्तुत है इसी पत्रिक में पढ़ी एक लघु कहानी। एक गाँव में तीन भाई रहते थे। तीनों वैद्य थे। सबसे बड़ा भाई साधारण वैद्य। उसे गाँव के बाहर कोई नहीं जानता था। मंझला भाई उत्तम वैद्य था। उसे दिखाने आसपास के कई गावों से मरीज  आया करते थे। लेकिन सबसे छोटा भाई श्रेष्ठ वैद्य था। दूर दूर से लोग उससे इलाज कराने आते थे। उसकी ख्याति सुन कर शहर के एक पत्र के संवाददाता उनसे मिलने पहुँच गए। बात-चीत के दौरान उस वैद्य ने बताया कि सही अर्थों में सबसे बड़ा भाई श्रेष्ठ वैद्य है और वह स्वयं एक साधारण वैद्य है। उसकी बात सुन कर संवाददाता हैरान रह गया। छोटे भाई ने समझाया, बड़ा भाई नाड़ी  परीक्षण तथा रोगी के लक्षण देख कर ही आसन्न रोग समझ लेते हैं। अत: आरंभ में ही हलकी-फुलकी औषधि या खान पान में उलट फेर कर उसका निराकरण कर देते हैं।  गाँव में घूमते हुए ही व्यक्ति के लक्षण देख कर बिना पूछे ही उसे सलाह दे, उसके आने वाले रोग को वहीं रोक लेते हैं। मंझले भाई को थोड़ा कम समझ में आता है। जब तक रोग कुछ ज्यादा बढ़ नहीं जाता और उसके लक्षण प्रगट नहीं होते, वह सही निदान नहीं कर पाता है। अत: उसे जड़ी-बूंटियों का लंबे समय तक सेवन करवाना पड़ता है। और मैं तो जब रोग बहुत बढ़ कर असाध्य हो जाता है तभी निदान कर पाता हूँ। इस कारण मुझे कई बार शल्य चिकित्सा का सहारा लेना पड़ता है। लोग इन बातों को समझते नहीं है। लोगों के अज्ञान पर ही मेरी वैद्यगिरी चल रही है नहीं तो कोई मुझे पूछे भी नहीं।

आज के इस आधुनिक युग में क्या हम इन्टरनेट के बिना दुनिया की कल्पना कर सकते हैं? लेकिन इन्टरनेट आया कहाँ से, किसने बनाया, कौन करता है इसका रख रखाव? हमने कभी जानने की कोशिश की? और इस इन्टरनेट के लिए हमें न तो कोई मूल्य देना पड़ता है और न  ही कहीं, कभी कोई पंजीकरण करना पड़ता है। लेकिन फिर भी हमें यह उपलब्ध है २४ X, बिना किसी छुट्टी के। कभी भी रख-रखाव के लिए भी बंद नहीं। ISP (इंटरनेट प्रदान करने वाली कंपनियाँ) हमें इंटरनेट नहीं देतीं वे हमें केवल उससे जोड़ भर देती हैं। बनाने वाले ने बनाया और विश्व को समर्पित कर दिया – बिना नाम एवं दाम के

हम विकिपीडिया का भी प्रयोग करते हैं। इन्टरनेट पर उपलब्ध जानकारी का असीमित भंडार। पूरा इनसाइक्लोपीडिया। लेकिन बिना किसी मूल्य के और फिर वही २४X, बिना किसी छुट्टी के। दुनिया के हर देश में, हर कोने में और अनेक भाषाओं में उपलब्ध है। इतना ही नहीं  निरंतर नई जानकारियाँ जोड़ने का कार्य भी चलता रहता है।  लेकिन इसे किसने बनाया? कौन करता है इसका रख रखाव? इसमें सब जानकारी कौन और कैसे डालता है?  क्या इसके प्रयोग के लिए किसी को भी  कोई मूल्य देना या पंजीकरण कराना पड़ता है? हम बेखबर हैं। इसे भी बनाने वाले ने बनाया और मानव को  समर्पित कर दिया – बिना नाम एवं दाम के

कम्प्युटर का बटन दबाते ही हमें सबसे पहले जो दिखाई पड़ता है वह है विंडो। आप समझ रहे हैं, मैं खिड़की की बात नहीं कर रहा हूँ में उस सॉफ्टवेयर की बात कर रहा हूँ जिसके बिना हमारा कम्प्युटर चल नहीं सकता। यह या तो हमें चोरी करना पड़ता है या खरीदना पड़ता है। बनाने वाले ने इससे बिलियन की कमाई की और उसमें से मिलियन का दान किया है। बनाने वाले को बच्चा बच्चा जानता है। ऐसा कौन सा विश्वविद्यालय है जहां इसकी सफलता की कहानी नहीं पढ़ाई गई हो? बनाने वाले ने बनाया और दुनिया भर में बेचा – नाम और दाम के साथ।

सत्य की गति बड़ी सूक्ष्म है। जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वह समझते नहीं। 

पवित्र-पाप जो सच्चा-पुण्य है

क्या आपने महाभारत पढ़ी है? आसान नहीं है इस ग्रंथ को पढ़ना। विशाल ग्रंथ है। इसे आद्योपांत पढ़ने के लिए समय भी चाहिए और धैर्य भी। ग्रंथ में कई बातें बार बार दोहराई गई हैं, यथा, “धर्म की गति बड़ी सूक्ष्म है”। यानि दैनिक जीवन में क्या धर्म है और क्या अधर्म यह समझना आसान नहीं है। जीवन में कई बार ऐसे प्रसंग आते हैं  जिन्हे ऊपरी तौर पर देखने से अधर्म प्रतीत होता है लेकिन सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर उसमें से धर्म की खुशबू आती है। कई बार हम इसे सूंघ लेते हैं लेकिन कभी भ्रमित भी हो जाते हैं और सही निर्णय नहीं ले पाते कि क्या पाप है और क्या पुण्य।

कभी-कभी किसी काम को करते वक्त मनुष्य एक अजीब-सी दुविधा में पड़ जाता है, सोचता है कि वह जो करने जा रहा है वह पाप है अथवा पुण्य। निर्णय मनुष्य को अपने विवेक से करना पड़ता है। जिसको हम पाप समझते हैं कभी वह भी पवित्र होता है और किसी पुण्य से कम नहीं होता। ऐसा ही एक प्रसंग एक प्रसिद्ध नेता ने सुनाया था। उन्होने बताया कि, कभी-कभी सार्वजनिक अभिनंदन के मौके पर एक व्यक्ति को ढेर सारे लोग सम्मानित करने और माला पहनाने लगते हैं, तब ऐसा भी होता है कि उसे पहले से पहनाई गई माला को दुबारा उठाकर दूसरा व्यक्ति फिर से पहना देता है। हालांकि यह बात साधारण नजर में नहीं आती है, मगर आ जाए तो अच्छा नहीं माना जाता है

वे आगे बोले, चेन्नई के एक प्रसिद्ध मंदिर में रोज हजारों लोग दर्शन करने जाते हैं।  दर्शनार्थियों की भीड़ लगी रहती है। वहाँ एक दिन मेरा भी जाना हुआ। साथ में एक स्थानीय सज्जन भी थे। मंदिर के बाहर फूलों की कई दुकानें थीं, जिनमें रंगीन आकर्षक फूलों की मालाएँ लटक रही थीं। मैंने अपने साथ के सज्जन से कहा कि हमें भी एक अच्छी सी माला लेनी चाहिए। कह कर एक फूल  की बड़ी दुकान की तरफ अपने कदम बढ़ा दिये। 
साथ वाले सज्जन ने मुझे रोका और कहा, यहाँ नहीं, हम उस तरफ फूल माला लेते हैं। कहकर उन्होने अंगुली से एक बुढ़िया की  तरफ इशारा किया जो टोकरी में कुछ मालाएँ लेकर जमीन पर बैठी थी।
मैंने धीरे से एतराज किया, वहाँ क्यों, किसी अच्छी दुकान से माला लेते हैं, भगवान को चढ़ानी है तब पैसे की तरफ नहीं देखना चाहिए
उन सज्जन ने कहा, पैसे की बात नहीं है, कोई और बात है। इन बड़ी दुकानों में नए फूल की माला बिकती है, और यह बुढ़िया मंदिर में से भगवान को चढ़ायी हुई माला ले आती है और उसे बेचती है। यहाँ आने वाले ज़्यादातर लोग इस बात को जानते हैं, और उससे कोई माला नहीं खरीदता है
सुनकर मुझे घोर आश्चर्य हुआ, चंद पैसों के लिए आप ऐसा क्यों करते हैं?’
वे बोले, मैं उस बुढ़िया को भी उतने ही पैसे देता हूँ, जितना बड़ी दुकानों मे लगता है
मगर, भगवान को चढ़ाये हुए फूलों को दुबारा चढ़ने से पाप नहीं लगता है’?
वे सज्जन बोले, “पाप और पुण्य की बात मैं नहीं जानता हूँ, मैं तो बस इतना जानता हूँ कि मेरे जैसे चंद लोग इस बुढ़िया से माला खरीद लेते हैं तब इसकी दो रोटी का इंतजाम हो जाता है। यह बुढ़िया किसी से भी एक पैसा दान नहीं लेती है”।

सुनकर मैं सोचने को मजबूर हो गया कि क्या भगवान को चढ़ाये हुए फूलों को उस बुढ़िया से खरीदना पाप था या कि एक पवित्र-पाप जो सच्चा पुण्य होता है।
रिलीफ़, फरवरी २०१८

सूतांजली, अगस्त द्वितीय 2026, आकर्षक घर की कुंजी

  २कोई ऐसा अक्षर नहीं है, जिसका प्रयोग मंत्र-रचना में न हो सके , कोई ऐसा वृक्ष नहीं है, जो किसी न किसी व्याधि की औषधि न हो , कोई ऐसा...