गुरुवार, 11 जून 2026

सूतांजली जून द्वितीय 2026

 


जो होना है वो होकर रहेगा,

जो नहीं होना है वो नहीं होगा।

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सब तय है, फिर... ?

हमारी जिंदगी का हर पल  पहले से तय है। अगर सब पहले से तय है, तो फिर कोशिश क्यों? और अगर कोशिश जरूरी है तो यह कैसे मानें कि सब पहले से तय है। तो आखिर सच क्या है?

जीवन न ही पूरी तरह भाग्य है और न ही पूरी तरह हमारे नियंत्रण में। जीवन इन दोनों के बीच का एक गहरा संतुलन है। कैसे?

एक सरल अनुभव लेते हैं। हम सब ने जीवन में महसूस किया है कि हम किसी काम में पूरी मेहनत करते हैं लेकिन परिणाम वैसा नहीं मिलता जैसा हम चाहते थे। और कभी ऐसा भी हुआ होगा कि बिना ज्यादा कोशिश के ही सब कुछ हमारे पक्ष में हो गया। यही अनुभव हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या सच में मैं सब कुछ कर रहा हूं या फिर कोई अदृश्य अपनी समझ से सब कुछ चला रहा है?

हम केवल परिणाम के लिए नहीं जी रहे। हम उस प्रक्रिया के लिए जी रहे हैं जो हमें हर दिन बदलती है। हम कोशिश करते हैं, हम निर्णय लेते हैं, लेकिन यह कोशिश करने की इच्छा कहां से आती है? करने की ऊर्जा कहाँ से आती है? हम कभी बिना रुके काम करने लगते हैं और कभी कुछ करने मन ही नहीं करता। इसका चुनाव मैंने किया या किसी और ने? हम ईमानदारी से देखें तो समझ आएगा कि बहुत कुछ अपने आप हो रहा है। मतलब यह कि अगर कुछ करने की इच्छा उठती है तो हम करेंगे ही और अगर नहीं उठती तो हम चाहकर भी नहीं कर पाएंगे।

अब अगर कोशिश भी तय है तो फिर कोशिश करने का मतलब क्या है? क्योंकि, अगर हम यह सोच कर बैठ जाते हैं तब हम जीवन को जी ही नहीं पाएंगे। हम केवल इंतजार करने में ही सारा जीवन निकाल देंगे। हम जब कोई खेल खेलते हैं तब पूरी कोशिश करना ही असली अनुभव है। अगर हम यह सोचकर खेलना छोड़ दें कि अंत तो तय है, तब हम उस खेल को कभी जी ही नहीं पाएंगे। जीवन भी ऐसा ही है। हो सकता है अंत पहले से तय हो। लेकिन उस अंत तक पहुंचने  का अनुभव हमारी कोशिश से ही बनता है। कोशिश का मतलब यह है कि हम उस पल को पूरी तरह जी पाएंगे।

जब हम पूरी ईमानदारी से काम करते हैं तो हमारे भीतर एक संतोष पैदा होता है जो परिणाम से जुड़ा नहीं होता और जब हम कोशिश नहीं करते तो भीतर एक खालीपन रह जाता है। हमारी कोशिश भी उसी कहानी का हिस्सा है जो लिखी जा चुकी है। हम उसे बदलने नहीं, उसे जीने आए हैं। कोशिश ही वह तरीका है जिससे हम इसे जीते हैं, इसे महसूस करते हैं, इसे अर्थ देते हैं। हम परिणाम को नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन उस रास्ते को जी सकते हैं जो हमारे सामने है।

कुछ करो, खुद को साबित करो? यही संघर्ष हमें थका देती है। समस्या कोशिश में नहीं उस बोझ में है जो हम कोशिश के साथ जोड़ देते हैं। कोशिश के साथ डर भी रखते हैं - अगर हार गया तो? यही डर हमारी कोशिश को भारी बना देता है, हमें जल्दी थका देता है। जब हम किसी काम को सिर्फ करने के लिए करते हैं तब पूरे ध्यान से करते हैं, एक अलग ही शांति होती है। लेकिन, जब काम को उसके परिणाम से जोड़ देते हैं तब तनाव शुरू हो जाता है।

 परिणाम हमारे हाथ में नहीं है लेकिन प्रयास हमारे अनुभव में है। जब हम कोशिश करते हैं और हर पल परिणाम के बारे में सोचते रहते हैं। तब ध्यान वर्तमान से हट कर भविष्य में चला जाता है और यही हमें कमजोर बना देता है। लेकिन जब हम पूरी तरह उस पल में रहते हैं तो उसमें डूबे रहते हैं और हमारी कोशिश भी मजबूत रहती है और मन शांत रहता है। अतः कम प्रयास में भी आगे बढ़ जाते हैं क्योंकि परिणाम के डर में नहीं फंसे होते। जो हर पल डर में जी रहे होते हैं, वे टूट भी जाते हैं क्योंकि वे हर पल खुद को जज कर रहे होते हैं। हम हर चीज को परिणाम  से जोड़ देते है और वहीं आनंद खत्म होने लगता है। यही जीवन के साथ भी हो रहा है। हम जी नहीं रहे, बस लगातार हिसाब लगा रहे हैं - क्या मिलेगा? कहां पहुंचूंगा? लोग क्या सोचेंगे? और सारी ऊर्जा खत्म।

          अब, अगर सब पहले से तय है तब हमारी कोशिश भी तय है? लेकिन हमारे पास एक आजादी है। हम अपना जीवन कैसे जीते हैं? बोझ बनाकर या एक अनुभव बनाकर, एक दबाव के साथ या खेल बना कर। फर्क बाहर नहीं अंदर है, हमारे देखने के तरीके में है। कोशिश छोड़नी नहीं है, बल्कि कोशिश करने के तरीके को बदलना है। कोशिश डर के साथ नहीं समझ के साथ करनी है। परिणाम में नहीं प्रक्रिया में जीना है। हम वही काम करते हैं लेकिन थकते नहीं क्योंकि अब ध्यान केवल करने पर है ना कि फल पर। कोशिश ही हमारा अनुभव है, उसे बोझ बनाना हमारी गलती है। कोशिश करो, उसमें डूब जाओ, उसे जियो ना कि उसे ढोओ।

 पहले काम बोझ था, डर था, चिंता थी। लेकिन अब एक हल्कापन आ जाता है। पहले कोशिश में बेचैनी थी, अब उसी में शांति होती है। बाहर सब कुछ वही दिखता है लेकिन भीतर सब कुछ बदल जाता है। हम कमजोर नहीं होते स्पष्ट हो जाते हैं। वही करते हैं जो उस पल सही लगता है। यही असली स्वतंत्रता है।

परिस्थितियां बदलती रहती हैं। कभी सफलता आती है, कभी असफलता। लेकिन हमारे भीतर का संतुलन बना रहता है। अब जीवन एक संघर्ष नहीं यात्रा बन जाती है। हमारे रिश्ते भी बदल जाते हैं। हम लोगों से जुड़ते हैं लेकिन उनसे उम्मीदों का बोझ नहीं ढोते।

अगर सब पहले से तय है तो कोशिश क्यों? क्योंकि कोशिश ही जीवन का हिस्सा है, उसे बोझ बनाना हमारी नासमझी है। हमें कुछ साबित नहीं करना था, केवल इस पूरे खेल को समझना था और जैसे ही यह समझ आती है, एक गहरी शांति पैदा होती है। जीवन चलता रहेगा कोशिश चलती रहेगी, लेकिन अब हम उसके साथ बह रहे हैं  उसके खिलाफ नहीं, यही असली आजादी है, यही असली जीवन है।

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सोमवार, 1 जून 2026

सूतांजली जून (प्रथम) 2026

 


निर्माण और विध्वंस

युग-युगान्तरों में जब भी पृथ्वी पर नयी सृष्टि का या नयी चेतना का आविर्भाव हुआ, हमेशा ही उसमें पुरातन के विलय और विनाश की अवस्था रही है। शिव-नाट्य के दो स्वरूप हैं, सृष्टि का आनन्द और साथ ही विनाश का उल्लास - लास्य और ताण्डव, निर्माण और विध्वंस - दोनों ही आज तक समान रूप से आवश्यक रहे हैं- एक दूसरे के पूरक।

विनाश का अर्थ है अनावश्यक, अनुपयुक्त, उस सब का विनाश जो नये आगमन को स्वीकार करने से इनकार करता है, उसमें बाधा डालता है, उसके निषेध का प्रयत्न करता है - उस सब का जो अवश्यम्भावी नये भविष्य के साथ सामञ्जस्य में नहीं है। पृथ्वी का विकास प्रगति-क्रम का अभियान है - अगर कोई उसकी गति के साथ-साथ चलने में असफल होता है तो उसे रास्ते से हटना होगा, नहीं तो उसे हटा दिया जायेगा ताकि दूसरे आ रहे कदमों के लिए जगह बनायी जा सके।

अगर कोई उस पुरातन सृष्टि में हो या कम-से-कम उससे प्रेम करता हो, उससे जुड़ा हुआ हो, तो ध्वंस पीड़ादायक हो जाता है, यहाँ तक कि उसके लिए वह भय-जन्य और ग्लानि-जन्य हो जाता है। पर अगर उसके अन्दर नवीन के लिए आकांक्षा है, तब वह इस ध्वंस की आवश्यकता को अनुभव करता है और काम की अविलम्ब पूर्ति के लिए इसका स्वागत करता है, वह उस विध्वंस के उल्लास का आनन्द लेता है। कम-से-कम शिव तो लेते हैं, दिव्य शक्ति तो लेती है।

वास्तव में यही इस समय विश्व में घटित हो रहा है। महाकाली ने तैयारी की विनाश और विलय का - अपना कार्य प्रारम्भ कर दिया है ताकि महालक्ष्मी और महासरस्वती का मार्ग प्रशस्त हो सके। महेश्वरी के अपार प्रेम और करुणा ने इस कार्य को स्वीकृति दी है, इसे समर्थन दिया है। वह नयी सृष्टि, वह नया जगत्, जिसका निर्माण दिव्य ने किया और जिसे वे इतने अधिक प्रेम और सावधानी से अब भी बना रहे हैं, तैयार हैं - प्रकट होने के लिए, भौतिक क्षेत्र में अपने उद्घाटन के लिए तैयार हैं। लेकिन मनुष्य अभी तैयार नहीं है, वह अब भी इससे इनकार करता है, अब भी ऐसे लोग हैं जो अपने पुरातन मृत जगत् को पकड़े हुए हैं  - और बहुत कस कर पकड़े हुए हैं - वह धूर्तता के इस खेल से प्रेम करते हैं। उन्हें इसमें अपने अस्तित्व का नाश दिखता है।  शायद सत्य उसकी अहंकारपूर्ण प्रकृति और दुर्बोध बनावट से वह इनकार करता है, उस नयी चेतना, नयी वास्तविकता में जितना अधिक हो सकता है बाधा पहुँचाता है। दिव्य ने अपने असीम प्रेम के कारण इस इनकार को अपने ऊपर लेने का प्रयत्न किया, अधिक-से-अधिक तत्त्वों को बदलने की, उनमें विश्वास पैदा करने की कोशिश की - फिर, जब इससे अधिक नहीं किया जा सका तो उन्होंने कार्यक्षेत्र को अपने दूसरे रूप के लिए छोड़ दिया ताकि वह इस अपरिहार्य कार्य को कर सके पुराने कठोर जगत् को तोड़ने के कार्य को। यह एक आवश्यकता है पृथ्वी के और मनुष्य के भी अन्तिम श्रेयस् के लिए।

कार्य आरम्भ हो चुका है - इसे शिव का नर्तन, ताण्डव कहो या माता काली का प्रचण्ड नर्तन - यह आरम्भ हो चुका है और तीव्र और तीव्रतर गति से अपने मार्ग पर बढ़ रहा है। विनाश, विलय, विघटन - हाँ, यह प्रथम परिणाम है और हम अब इसे प्रत्यक्ष देख रहे हैं और इसमें भाग ले रहे हैं, चाहे हम इसे पसन्द करें अथवा नहीं। यह परम प्रभु का निश्चय है - इसे घटित होना ही है। वे जो सत्य से जुड़े हुए हैं बचे रहेंगे, वे जो मिथ्या के साथ मैत्री करेंगे नष्ट हो जायेंगे - मनुष्य के पास चुनने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है, सचेतन रूप से या अचेतन रूप से। यह एक अपरिहार्य स्थिति है, जो सत्य के आकांक्षी हैं, उन्हें दुःख या शोक करने की कोई आवश्यकता नहीं।

अगली अवस्था स्वभावतः मलबा साफ़ करने की होगी - एक पूरी सफ़ाई - उस सब का विलोपन जो सत्य के विरुद्ध था, मृत जगत् का ध्वंसावशेष, वह क्षेत्र - वहाँ से वह सब कुछ साफ़ किया जायेगा जो गन्दा और मलिन है। क्योंकि केवल तभी नयी वास्तविकता आगे आने में समर्थ होगी, दिव्य का कार्य पूरा होगा।

नयी सृष्टि पहले ही विद्यमान है - अपना रूप ले रही है - इस समय जो कुछ भी घट रहा है, वह इसीलिए घट रहा है ताकि नयी सृष्टि जल्दी-से-जल्दी सम्मुख आ जाये। वे बाहरी ढाँचे को तोड़ रही हैं जिसके अन्दर नयी वास्तविकता स्थापित हो चुकी है। इसे एक मुर्दा खोल कह सकते हैं जिसे तोड़ा जा रहा है ताकि नयी वास्तविकता बाहर आ सके। यह दिव्य ने अपना 'छिन्नमस्ता' रूप धारण किया है। जो कुछ भी वे नष्ट कर रही हैं वे उनके अपने ही अंश हैं - वे मानों, अपने ही शरीर के पुराने अनुपयोगी अंगों से पीछा छुड़ा रही हैं।

श्रीअरविन्द के शब्दों में कहें तो:

“मुहूर्त कई बार बड़ा भयावह होता है, एक अग्नि और एक चक्रवात और एक तूफ़ान, ईश्वर के कोप के कोल्हू का चलना; पर जो इस घड़ी में अपने प्रयोजन के सत्य पर खड़ा रह सकता है, वह है जो खड़ा रहेगा; अगर वह गिर भी जायेगा, तो पुनः उठ खड़ा होगा; अगर वह हवा के पंखों पर ग़ायब होता लगेगा, तो भी वह लौट आयेगा।"                                                                                                                                                                - नलिनिकांत गुप्त

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सूतांजली जुलाई द्वितीय

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