बुधवार, 1 अप्रैल 2026

सूतांजली अप्रैल (प्रथम) 2026


 

बीतने वाला वर्ष चाहे जैसा भी बीता हो,

उसे 'बीती ताहि बिसार दे' के भाव से ही याद करें। तभी

आने वाले वर्ष के स्वागत में फूल बिछाये जा सकते हैं।

यह फूल बिछाना ही उन आशाओं और उमंगों का प्रतीक है जो

जीवन को नये उत्साह के साथ जीने का भाव जगाती हैं।

नया वर्ष आप सबके लिए मंगलमय हो,

हम सब मिलकर आने वाले कल को

बेहतर ढंग से जीने के संकल्प के साथ आगे बढ़ें।

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मौन संवाद

          हाँ, शायद इसलिए क्योंकि मनुष्य सहज रूप से शब्दों को बनाने में सक्षम होने के कारण अपने आप पर बहुत गर्व महसूस करता है। वह पृथ्वी पर पहला प्राणी है जो बोल सकता है, जो स्पष्ट ध्वनियाँ निकालता है, इसलिए वह बेकार बोलता है उनके साथ खेलता है, यह मूर्खता है।

          कुछ लोग मौन में सोचने में सक्षम नहीं हैं, इसलिए उन्हें बोलने की आदत हो जाती है। लेकिन व्यक्ति जितना अधिक विकसित होता है, उतना ही अधिक बुद्धिमान होता है, उसे खुद को व्यक्त करने की उतनी ही कम आवश्यकता होती है। वास्तव में, जो व्यक्ति बहुत सचेत है, जो मानसिक रूप से, बौद्धिक रूप से, बहुत विकसित है, वह केवल तभी बात करता है जब इसकी आवश्यकता होती है। और जितना अधिक कोई विकसित होता है और विकास के उच्च स्तर पर होता है, उसे बोलने की बहुत कम आवश्यकता महसूस होती है। यह इस कारण से होता है क्योंकि यह आपको अपने स्वयं के विचारों के प्रति जागरूक होने में मदद करती है। वह बेकार की बातें नहीं करता है।

          जो हमेशा निचले स्तर पर होता है उसे ही बात करने की आवश्यकता होती है। सामाजिक पैमाने के सबसे निचले स्तर के लोग ही सबसे अधिक बात करते हैं, वे अपना समय बात करने में बिताते हैं। वे रुक नहीं सकते! उनके साथ जो कुछ भी होता है, वे तुरंत शब्दों में व्यक्त करते हैं।

          अगर आप बोलने से पहले सोचने की आदत बना लें, तब आप जो कुछ भी कहते हैं, उसमें से कम-से-कम आधा समय बचा सकेंगे। बोलने से पहले सोचना और केवल वही कहना जो बिलकुल ज़रूरी लगता है - तो आप बहुत जल्दी समझ जाएंगे कि बहुत कम शब्द ज़रूरी हैं, सिवाय व्यावहारिक दृष्टिकोण के, काम में, जब कोई किसी के साथ काम कर रहा हो फिर भी, इसे कम-से-कम किया जा सकता है।

          सूफी फकीर हज़रत इनायत खान  कहते हैं कि जब आप किसी ऐसे समूह के बीच में होते हैं जहाँ हर कोई बात कर रहा होता है और आप बात नहीं करते हैं, तो आप सोचते हैं कि हर कोई सोचेगा, "वह क्यों नहीं बोल रहा है? वह ऐसा क्यों है? मुझे लगता है कि उसे कुछ समस्याएँ हैं",... । यह आप पर बात करने का अवचेतन दबाव डालता है। इस दबाव के आगे न झुकें। अगर आपको बात करने का मन नहीं है तो बात न करें। बेकार की बकबक करने से चुप रहना बेहतर है। सामान्य सामाजिक संबंधों में, गपशप और बकबक दोस्ती और सौहार्द के स्रोत हैं। औसत आदमी केवल उसी के साथ दोस्ताना महसूस करता है जो बात कर सकता है। वह मौन की उपस्थिति में असहज महसूस करता है। लेकिन उच्च स्तर पर, एक आंतरिक रूप से उन्नत व्यक्ति बातचीत की तुलना में मौन में अधिक सामंजस्य महसूस करता है। लेकिन यह स्वीकार करना औसत मानसिकता के लिए कठिन है; इसके लिए एक निश्चित स्तर की आंतरिक परिपक्वता और समझ की आवश्यकता होती है।

          ओशो ने बताया कि एक युवा महिला पर्वतारोहण अभियान के दौरान एक युवा जापानी के साथ थी जो अंग्रेजी नहीं जानता था। इसलिए वे एक दूसरे से बात नहीं कर सकते थे। वे चुपचाप लंबे समय तक चलते और चढ़ते रहे। इस युवा महिला ने बताया कि उसे उसके साथ "एक गहरी आंतरिक मित्रता" महसूस हुई जो उसने अपने किसी भी दोस्त के साथ कभी महसूस नहीं की। मैंने उससे कहा, "इसका एक कारण भाषा की बाधा हो सकती है। आप दोनों जानते थे कि आप बात नहीं कर सकते, जिससे मौन में आपसी स्वीकृति और समझ पैदा होती है। जब आपका मन मौन स्वीकृति की स्थिति में होता है, तो यह दिल की गहरी भावना को जगाने में मदद करता है। अगर ऐसी कोई भाषा की  बाधा नहीं है और अगर दूसरा व्यक्ति चुप है, तो आप संदिग्ध हो जाएंगे और सोचेंगे, 'वह बात क्यों नहीं कर रहा है' और आपका मन नकारात्मक अटकलों में लिप्त होने लगेगा 'शायद वह मुझे पसंद नहीं करता।' और आपके विचार और भावनाएँ दूसरे व्यक्ति में भी वैसे ही विचार और भावना उत्पन्न करेंगी। अगर वह स्वभाव से शांत और संकोची है, तो वह आपकी सोच के दबाव में आकर बात करने के लिए मजबूर हो जाएगा। इससे एक सतही और महत्वहीन गपशप हो सकती है और आप उसके लिए कभी भी वह गहरी भावना महसूस नहीं कर पाएंगे।"

          गंगा किनारे तुलसीदास और सूरदास का सत्संग हुआ। दोनों घंटों मौन एक दूसरे के सामने बैठे मुसकुराते रहे। और फिर हाथ जोड़, एक दूसरे को प्रणाम कर खड़े हुए। दोनों प्रसन्न चित्त, उनके रोम-रोम से संतोष और प्रसन्नता टपक रही थी। उनके शिष्य बड़े विचलित हो उठे, ये कैसी मुलाक़ात? तुलसी ने सूरदास के लिए कहा महान संत और भक्त हैं, मैं उनके सामने तिनके के समान हूँ। उधर सूर ने तुलसी के लिए कहा ऐसा अनुरागी, ज्ञानी समर्पित संत मैंने नहीं देखा-सुना। उनके भावों से मैं भाव-विभोर हो गया। जब भाव संप्रेषित होते हैं, शब्द अपना अर्थ खो देते हैं। मौन उच्च कोटि का सबसे सटीक वार्तालाप है

         चीनी दार्शनिक ताओ अपने शिष्य के साथ प्रातः सैर के लिए जाते थे। एक दिन उनके साथ उनके शिष्य का एक मित्र भी साथ हो लिया। सब मौन थे। उनके मित्र को इस सैर में बड़ा आनंद आया। सब लौटने लगे, शिष्य के मित्र से नहीं रहा गया और बोल पड़ा, “बड़ी सुहावनी भोर है।” सब लौट आए। ताओ ने अपने शिष्य को कहा दूसरे दिन से अपने मित्र को साथ न लें, बहुत बोलता है। मौन से उच्च संवाद नहीं है।

          तब, अगली बार मुंह खोलने के पहले सोच लें क्या बोलना जरूरी है?

          बिना बोले भी बातचीत की जा सकती है।

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बुधवार, 11 मार्च 2026

सूतांजली मार्च (द्वितीय) 2026

 


जीना? या जीवित रहना?

          हम प्रायः मात्र श्वास लेने, हृदय के धड़कने, नित्य-कर्म और अपने परिवार का भरण-पोषण करने और साथ-साथ गीता में वर्णित कर्तव्य कर्मों को निभाने की क्रियाओं को ही जीना मनाने की भूल करते हैं। हम इन्हीं क्रियाओं में लीन रहते हैं और अगर इसे रुचि पूर्वक कर लिया तो इसे एक सफल जीवन तक मान लेते हैं। वास्तव में हमारा यह अस्तित्व निरर्थक है, भले ही हम एक लंबी उम्र पा लें और स्वस्थ रहें। ब्रह्मांड के निम्नतर प्राणी तो यही करते हैं, फिर इस मानव शरीर का क्या अर्थ? हम में और उनमें फिर कोई फर्क ही नहीं रहा! शतायु होने पर भी सही अर्थों में हम सिर्फ जीवित हैं, जी नहीं रहे। जीना इन सबसे अलग कुछ और ही होता है।    

          हममें-से जो वास्तव में जीवित हैं उन्हें विचार करने पर अपना जीवन, इसके सम्पूर्ण चमत्कारिक अनुभवों की विविधता के समक्ष अत्यल्प प्रतीत होगा। उनके लिए, जीवन एक सतत साहसिक कार्य है, एक खुला परिदृश्य है, जिसमें हर मोड़ पर खुशियां और तृप्ति का आनंद लेने के अनंत अवसर हैं। वे जीवन के सार को पकड़ने का प्रयत्न करेंगे, और इस प्रक्रिया में, ब्रह्मांड में छिपी सम्भावनाओं का अनुसंधान और आकलन करेंगे। उन्हें इसका अनुभव होगा कि उनमें चारों ओर प्रतीत होने वाले अराजक और अशांत भ्रमजाल में से सार्थक को प्राप्त कर लेने की इच्छाशक्ति और स्व-निर्धारित उद्देश्य निहित हैं।

          ये वे लोग हैं जो समुद्र के किनारे चलते समय हवा के थपेड़ों, उन पर पड़ने वाली ठंडी फुहारों, गीली रेत पर लम्बे कदम उठाते समय अंगों की गति, लय का आनंद लेते हैं। वे प्रकृति के समुद्री तट को महसूस करते हैं।

          बदले में, वे एक ऊंचे व्यक्तित्व और जागृत परोपकारी भावना से सम्पन्न होते हैं, जो उन असहाय भाइयों के लिए भी उत्साह, उपयोगिता और संतुष्टि का वातावरण तैयार करता है जो लड़खड़ा कर पिछड़ गये हैं। उन्हें कोई भी कठिनाई, कोई भी बाधा, कोई भी परेशानी हतोत्साहित नहीं कर सकती जिन्होंने वास्तव में जीवित रहने की क्षमता प्राप्त कर ली है, वे स्वतः प्रोत्साहित होते हैं।

          कठिनाइयां भाग्य के साहस के समान हैं और बाधाएं केवल उनके कौशल को परखने के लिए रुकावटें है, परेशानियां उन्हें शक्ति देने के लिए केवल टॉनिक हैं। प्रत्येक विपरीत परिस्थिति का सामना करने के बाद वे निश्चित रूप से उर्ध्वगामी होते हैं, और यह भावना जीवन के अंतिम क्षण तक जीवित रहती है।  

          यदि आपको लगता है कि प्रारम्भिक युवावस्था का आनंद हमेशा के लिए खो गया है, यदि आप मानते हैं कि भावना और रोमांस क्षणभंगुर हैं, यदि आपको दैनिक जीवन सामान्य और नीरस लगता है, यदि आप कल्पना करते हैं कि आप अपने अवसरों से कुछ सार्थक बनाने के लिए बहुत बूढ़े या निर्बल हो गये हैं, तो आप केवल जी रहे हो, आप वास्तव में जीवित नहीं हो।

          यदि आपने बीमारी, गरीबी और दुख को नियति मानकर स्वीकार कर लिया है, यदि आप मानते हैं कि शरीर और मन की कोमलता, आनंदमय दृष्टिकोण और जीवन में संतुष्टि, एक मायावी मृगतृष्णा है, तो आप बिना सोचे समझे जीवित होने की प्रक्रिया से गुज़र रहे हैं, लेकिन वास्तव में जीवन जीने से बहुत दूर हैं। ऐसे विचारों के लिए उनके अस्तित्व में कोई स्थान नहीं है।

          वृद्धावस्था अनुभवों का खजाना है। वृद्ध इंसान पृथ्वी का सबसे बड़ा शिक्षालय है। वृद्धावस्था को मौत का प्रतीक्षालय बनाने की जगह उसे जीवन का अनूठा आयाम बनाएं। इस अवस्था को आध्यात्मिक उर्जा से परिपूर्ण बनाएं। अध्यात्म का मतलब है अपनी चेतना का परम चेतना में समर्पण। यदि आप वृद्ध या अतिवृद्ध भी हैं तो भी बुढ़ापे को बोझ न समझें, इसे ओजपूर्ण बनाएं। ऐसा करने से आपको जीवन में एक नये रस-रहस्य का अनुभव होगा।

          आईंस्टाइन मानते थे कि स्वयं अपने को लेकर मैं तो प्रतिदिन यही अनुभव करता हूं कि मेरे भीतर और बाहरी जीवन के निर्माण में कितने अनगिनत व्यक्तियों के श्रम और कृपा का हाथ रहा है और इसी अनुभूति से उद्दीप्त मेरा अंतःकरण कितना छटपटाता है कि मैं कम-से-कम इतना तो इस दुनिया को दे सकूं जितना कि मैंने उससे अभी तक लिया है।

         तो आप क्या कर रहे हैं, जीवन जी रहे हैं या केवल जीवित हैं?

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रविवार, 1 मार्च 2026

सूतांजली मार्च (प्रथम) 2026

 


जो दूसरों को इज्जत देते हैं, असल में वे खुद इज्जतदार होते हैं।

क्योंकि

इंसान दूसरों को वही देता है जो उसके पास होता है।

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बिना मोल का अनमोल रत्न

जी हाँ, एक ऐसा अनमोल रत्न जिसका कोई मोल नहीं है। इसका कोई  मूल्य नहीं चुकाना पड़ता है, आपको कोई मेहनत भी नहीं करनी पड़ती, आप जैसे हैं वैसे ही सहजता से रहते हैं। आपकी सहजता, आपका अपनापन, आपकी ईमानदारी, आपके स्वभाव से ही, यह रत्न स्वयं आपकी झोली में आ जाता है। एक बार यह रत्न आपके हाथ लग जाए तो इसे बड़ी सावधानी से रखना पड़ता है। नहीं-नहीं कोई पहरेदार, ताला चाबी, लॉकर में नहीं रखा जाता। हर समय आपके साथ ही रहता है। एक बार खो जाए, टूट जाए तो फिर वापस नहीं मिलता, नहीं जुड़ता।  और सब से आश्चर्य की बात यह है कि आपको खुद पता नहीं चलता कि यह आपको कब, कैसे और क्यूँ मिला और कब, कैसे और क्यों खो गया, बस अटकलें लगा सकते हैं। एक बात और यह होता किसी और का है लेकिन रहता आपके पास है।

स्वामी मंथर गति से अपने घर की ओर लौट रहे थे। आज मठ से लौटते उन्हें देर हो गई थी। उस छोटे से कस्बे में सड़कें सुनसान हो चली थीं। स्वामी निश्चिंत चले जा रहे थे कि अचानक उनकी नजर एक व्यक्ति पर पड़ी। उसके रंग-ढंग से उन्हें लगा कि वह थोड़ा घबड़ाया हुआ और परेशान है। उन्होंने अंदाज लगाया कि शायद परदेशी है। स्वामी को देख, वह उनके पास आया और किसी धर्मशाला का पता पूछा। स्वामीजी ने उसे पास की एक धर्मशाला का पता दिया, लेकिन इस पर उसने पूछा, "क्या मैं वहाँ बिना बिस्तर के रह सकूँगा?"

"क्या मतलब?" स्वामी जी को प्रश्न बड़ा अटपटा सा लगा।  

"बात यह है," उस व्यक्ति ने बताया, "धर्मशाला वाले उसी को ठहरने देते हैं, जिसके पास बिस्तर या सन्दूक होता है, परंतु मेरे पास बस यही एक थैला है ।"

"क्यों? ऐसे क्यों?"

"वे कहते हैं कि जिनके पास बिस्तर नहीं है, वे या तो चोर हैं या बम-पार्टी वाले क्रांतिकारी।"

यह सुनकर स्वामीजी को हँसी आ गई। पर उन भाई की समस्या काफी उलझी हुई थी। तब क्या करें? वे इसी असमंजस में थे कि स्वामीजी ने उनसे कहा, "आइए! मेरे साथ, मेरी कुटिया में, यहाँ पास में ही मेरी कुटिया है। मेरे पास ठहरने में तुम्हें कोई दिक्कत नहीं होगी।"

          वह व्यक्ति पहले तो कुछ समझा नहीं और जब समझा तो हिचकिचाया लेकिन उसके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था। अतः उन्हीं के पास उनकी कुटिया में ही कुछ दिनों के लिए ठहर गया। कुटिया साफ सुथरी और बड़ी थी।

          अगले दिन अचानक स्वामी को एक तार मिला, लिखा था-"माँ सख्त बीमार है, एकदम आओ।" उन्होंने जल्दी-जल्दी सामान बटोरा। गाड़ी जाने में केवल एक घंटा शेष था। उन्होंने उसी गाड़ी से जाने का निश्चय किया, पर वह अतिथि उस समय घर पर नहीं थे और शीघ्र लौटने की कोई आशा भी नहीं थी। तब उन्होंने एक पत्र लिखा, जिसमें तार की चर्चा करके बताया कि वे घर जा रहे हैं, वह आराम से कमरे में रहें, और जाते समय चाबी उसी स्थान पर रख दें। फिर ताला लगा, चाबी को चिट्ठी में लपेट उसी स्थान पर रख दिया, जहाँ पर रखने का नियम था। उन्हें आशा थी कि वह दो-तीन दिन में लौट आएँगे, लेकिन समय कुछ ज्यादा लग गया। जब लौटे तब  फिर अपने काम में लग गए।

उनके मस्तिष्क में यह बात बिलकुल ही नहीं आई कि अपने पीछे वह मकान में एक अंजान अतिथि को छोड़ गए थे। वह अंजान व्यक्ति वास्तव में अतिथि ही था। स्वामीजी ने देखा कि अतिथि ने उनसे जो कुछ पाया था, उसे वह वहीं सुरक्षित अवस्था में छोड़ गया था।

वह 'जो कुछ' क्या था? – वह था - 'भरोसा' !

'भरोसा ही बिना मोल के मिलने वाला अनमोल रत्न है।

इस रत्न को सहेज कर रखिए। कभी हाथ से फिसलने मत दीजिये। हिफाजत से रखिए।

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बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

सूतांजली फरवरी (द्वितीय) 2026


 

क्या आप मानते हैं कि अनेक लोग नून, तेल, लकड़ी के चक्कर में वह नहीं कर सके जो वे करना चाहते थे और उनमें कुछ करने की काबिलियत भी थी?  अगर उन्हें दैनिक जीवन की जद्दोजहद से छुटकारा मिला होता तो वे भी उन सब की बराबरी या उनसे अच्छा कर सकते थे जिन्होंने काफी कुछ हासिल किया, नाम कमाए, पुरस्कार पाये, सम्मान मिला और एक सफल संतोषप्रद जीवन यापन कर सके। ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं जो यह मानते हैं कि वे एक सच्चा जीवन जीना चाहते थे, साधना करना चाहते थे, ऐसे जीवन के प्रति उनके मन में बड़ी उत्कंठा थी, लेकिन जीवन की वास्तविकताओं ने उन्हें जंजीरों में बांध दिया और पूरा जीवन उन जंजीरों से ही जूझते रहे।

          लेकिन अगर जरा गहराई से विचार करें तो हम पाएंगे कि यह सच्चाई नहीं है। वे सब जो मील के पत्थर बने उनके जीवन में भी अनेक कठिनाइयाँ थीं, बंधन थे, हथकड़ियाँ थीं, मजबूरियाँ थीं लेकिन वे डिगे नहीं। जीवन की हर जिम्मेदारियों को बखूबी निभाते रहे लेकिन  निगाहें हर समय लक्ष्य पर बनी रही, उसके प्रति सजग बने रहे, और अंत में मंजिल हासिल कर ली।

          पांडिचेरी की माताजी ने एक बार कहा,

          “अपने इस वर्तमान प्राथमिक अस्तित्व के शुरू से ही मैं ऐसे कई व्यक्तियों के सम्पर्क में आई जो कहा करते थे कि उनमें एक अधिक गहन और सच्चे जीवन के प्रति बहुत अभीप्सा और उत्कंठा है। लेकिन वे जीवन निर्वाह के लिये उपार्जन की कठोर आवश्यकताओं से गुलामों की तरह बंधे हैं और यह बोझ उनकी तमाम शक्ति और समय को इतना खींच लेता है कि वे कुछ और कर पाने में, किसी अन्य महत्वपूर्ण कार्य के लिये न समय पाते हैं, न समर्थ रह पाते हैं। यह मैंने कई लोगों को कहते सुना था और उनकी दीन हालातों को देखा था जो जिम्मेदारियों के कारण हो गई थीं।

          मैं उस समय बहुत कम उम्र की थी और उनकी बातें सुनकर अपने से कहा करती थी कि यदि मैं कभी कर सकी तो एक छोटा सा जगत ऐसा निर्माण करने की कोशिश करूँगी जहाँ लोग अपने खाने, पहनने, ओढ़ने की जो अनिवार्य आवश्यकताएं हैं उनमें व्यस्त नहीं रहेंगे और तब मैं देखूँगी कि उनकी शक्ति इन आवश्यकताओं से मुक्त रहकर दिव्य जीवन और अपने आंतरिक उपलब्धि की ओर उन्मुख होती है या नहीं। और अपने जीवन के मध्य काल में मुझे ये साधन प्राप्त हुए और मैंने उस स्थितियों का निर्माण करने का अवसर पाया जो जीवन यापन करने की ठोस जरूरतों को पूरा करने के बोझ से मुक्त थी और मैं इस निष्कर्ष पर पहुंची कि वस्तुतः यह जीवनयापन की बेबसी नहीं है जो लोगों को आंतरिक खोज, आत्म साक्षात्कार और महान अभीप्सा से रोकती है वरन् यह एक तमस भाव, शिथिलता और आलस्य है, तथा "मुझे परवाह नहीं" वाला दृष्टिकोण है जो उन्हें उच्च जीवन की ओर बढ़ने से रोकता है। मैंने यहाँ तक अनुभव किया कि जिन्होंने जीवन की कठोरतम अवस्थाओं को झेला है और उनका सामना किया है उनमें गहन अभीप्सा और जागरूकता रही है। लेकिन मैं उस समय की प्रतीक्षा में हूँ जब लोगों में अनुकूल स्थितियों में सच्ची भावना जागेगी और वे अपने लापरवाह दृष्टिकोण से उभरकर उच्च जीवन के प्रति उन्मुख होंगे।”

          एक बार अपने आस-पड़ोस पर, परिचितों पर निगाह घूमा कर देखिये आप देखेंगे ऐसा कोई नहीं जिन्हें दैनिक जीवन से जूझना न पड़ा हो। लेकिन ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो विपरीत परिस्थितियों से जूझते रहे, उन्हें अपने अनुकूल बनाया, मंज़िलें हासिल कीं और अपना परचम लहराया।

          आप भी कर सकते हैं, बस अपना दृष्टिकोण बदलो। लक्ष्य स्पष्ट रखो, आँखों से ओझल होने मत दो, अपनी जिम्मेदारियों को संभालते हुए लक्ष्य प्राप्ति के लिए लगनशील रहो।  तुम में दम है, कर सकते हो। आज का दिन सबसे खराब नहीं सबसे अच्छा है। यही नहीं, आज के बाद कल फिर एक दिन है। फिर देर किस बात की, अपनी शक्तियों को पहचानो, उठो अपने सपनों को पूरा करो।

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रविवार, 1 फ़रवरी 2026

सूतांजली फरवरी (प्रथम) 2026

 


समय कम है,

लेकिन,

अभी भी समय  है।

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मन का उपद्रव

ओशो के व्याख्यान पर आधारित

 

          मन तर्कनिष्ठ है और जीवन रहस्य। जीवन कोई गणित नहीं है, न ही कोई व्यापारी है। जीवन किसी प्रेमी का प्रेम है, प्रेम की अनुभूति है, किसी कवि का स्वर है, संगीतज्ञ की स्वर लहरी है। जीवन सौंदर्य है, काव्य है, प्रेम है, लेकिन, मन यह नहीं मानता। तर्क टेढ़ी-मेढ़ी डगर है, यह हमें टेढ़े मार्ग पर ले जाता है, और जब तक हम उस टेढ़े मार्ग पर चलते रहेंगे तब तक जो सीधे मार्ग पर चलने से मिल सकता था, उससे हम वंचित रहेंगे।

          सारा उपद्रव मन का ही है। मन तूफान है। मन हमारे भीतर उठती तरंगें हैं, लहरें हैं, और हम पूछते हैं, "उपद्रव कैसे शांत हो?" इसका सरल और सीधा एक ही उपाय है कि उपद्रव ही न हो।

          मन हज़ार बहाने खोजता है। कभी कहता शरीर ठीक नहीं है, कभी तबीयत जरा ठीक नहीं है। कभी कहता है घर में काम है, कभी कहता है बाज़ार है, दुकान है, .... हज़ार बहाने हैं। ध्यान से बचने की मन पूरी कोशिश करता है। क्योंकि ध्यान सीधा रास्ता है। रास्ता, जो मंदिर में ले जाता है, इधर-उधर, यहाँ-वहाँ नहीं ले जाता।

          परमात्मा से लोग वंचित हैं - इसलिए नहीं कि वह बहुत कठिन है। वंचित इसलिए है कि वह बहुत सरल है। परमात्मा इसलिए वंचित नहीं है कि वे बहुत दूर है, इसलिए वंचित है कि वे बहुत पास हैं, उसे पाने में कोई कठिनाई नहीं है।

          अगर दूसरे शहर जाना हो, दूसरे गाँव जाना हो तो, तो दूर की यात्रा है, मन निकल जाता है। लेकिन अगर पास वाले कमरे में जाना हो तो? बगल के पड़ोसी के जाना हो तो? पास ही है, यात्रा में यात्रा ही नहीं है। कहाँ जाना है? कहीं जाना ही नहीं है? अगर कहीं जाना है ही नहीं तब मन नहीं निकलता।

          हमारा मन जिस चीज में जटिलता पाता है, उसी में और उसी अनुपात में रस लेता है।  ज्यादा जटिलता ज्यादा रस, कम जटिलता कम रस। क्योंकि चाल टेढ़ी-मेढ़ी हो तो चलने में रस है। सीधे-सीधे में, साफ-सुथरे में मन कहता है, "कुछ रस नहीं, क्या करोगे? इतनी साफ-सुथरी है, कोई भी पहुंच सकता है। मेरी क्या विशिष्टता?"

          दरअसल धर्म बड़ी सीधी चीज़ है, लेकिन मन के कारण पुरोहितों ने धर्म को बहुत जटिल बना दिया, क्योंकि जटिलता में ही रस है, अपील (appeal) है। तो उलटी-सीधी हज़ार चीजें धर्म के नाम से चल रही हैं। उपवास करो, शरीर को सताओ, इस पर्वत पर जाओ, उस नदी में स्नान करो, इस मंदिर में जाओ, वो पूजा-पाठ करो, जप-तप करो और भी न जाने क्या-क्या। उलटा-सीधा बहुत कुछ चल रहा है। और वह चलता इसलिए है क्योंकि हमें यह जँचता है।

          अगर कोई कहे कि बात बिलकुल सरल है, बात इतनी सरल है कि कुछ करना ही नहीं है, सिर्फ खाली, शांत बैठकर भीतर देखना है तो हम उसे छोड़कर चले जाएंगे। हम कहेंगे, "जब कुछ करने को है ही नहीं, तो क्यों समय खराब करना? कहीं और जाएँ, जहाँ कुछ करने को हो।" बस समझ लीजिये कि मन का उपद्रव शुरू हो गया।

          अगर हमें परमात्मा ऐसे ही घर के पीछे ही मिलता हो तो हमारा रस ही खो जाए। हम कहेंगे यह तो जन्मों-जन्मों की बात है, युगों की बात है परमात्मा ऐसे कहीं मिलता है? ऐसे परमात्मा अचानक एक दिन आ जाए और हमें गोद में उठा कर कहे "भाई, मैं आ गया। तुम बड़ी प्रार्थना वगैरह करते थे। अब हम हाज़िर हैं, बोलो!" हम फौरन आँख बंद कर लेंगे, यह सच हो ही नहीं सकता। कोई बहुरूपिया है।           अगर परमात्मा ऐसे ही आ जाए चुपचाप, और कहे कि मैं आ गया; तुमने याद किया था, तो हम कभी भरोसा नहीं करेंगे, कहेंगे यह झूठ है, मक्कारी है। कोई स्वप्न देख रहा हूँ। यह हो ही नहीं सकता।

          हम सरल को मान ही नहीं सकते। क्या परमात्मा ऐसे ही आता है? अगर हमारे मन की टेढ़ी-मेढ़ी चाल न हो, अगर हम सीधे-सरल होकर बैठ जाएँ तो?  परमात्मा ऐसे ही आता है कि उसकी  पगध्वनि भी नहीं सुनाई पड़ती। एक क्षण पहले नहीं था और एक क्षण बाद है। अचानक हम उस दिव्य प्रकाश से भर जाते हैं। अचानक हम देखते हैं कि उसके मेघ ने हमें घेर लिया है। उसके अमृत की वर्षा होने  लगी है।

          हम कभी यह भी न समझ सकेंगे कि मेरी क्या योग्यता थी कि परमात्मा आया! हम कभी समझ ही नहीं सकेंगे कि मेरी पात्रता क्या थी कि परमात्मा मिला?  क्योंकि योग्यता की बात तो तर्क की बात है। परमात्मा किसी पात्रता से थोड़े ही मिलता है। मैंने ऐसा क्या किया था जिसकी वजह से परमात्मा मिला? क्योंकि कुछ करने से परमात्मा नहीं मिलता। वह तुम्हें मिला हुआ ही है। तुम उसे खो ही नहीं सकते। मन की टेढ़ी-मेढ़ी चाल है कि तुम्हें लगता है खो गया। फिर खोज का सवाल उठता है। जिसे कभी खोया नहीं, उसे हम खोजने निकल जाते हैं!

          जिस दिन परमात्मा मिलता है, उस दिन प्रसाद-रूप, अकारण ही मिलता है। हम ज़रा बैठें। हम दौड़े नहीं। हम थोड़ा मन को विसर्जित करें। हम मन की न सुनें। हम मन के धुएं से ज़रा अपने को मुक्त करें। हम ज़रा मन की घाटी से हटें। थोड़ा-सा फासला मन से बनायें और परमात्मा से सारी दूरी मिट जाती है। इसे हम ऐसे कह सकते हैं कि जितने मन के पास हैं, उतने ईश्वर से दूर। जितने मन से दूर, उतने ईश्वर के पास।

          जिस दिन मन नहीं है, उस दिन हम परमात्मा हैं।

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मंगलवार, 13 जनवरी 2026

सूतांजली जनवरी (द्वितीय) 2026


 

जीवन में अद्भुत घटनाएँ घटती हैं, कभी हमारा ध्यान उन पर जाता है कभी नहीं, हम कभी उनके प्रति सजग होते हैं कभी नहीं, लेकिन हम उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। हमारे ध्यान और सजगता का उन घटनाओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन इतना जरूर होता है कि वैसी घटनाओं की तीव्रता उनका क्रम कम या ज्यादा हो जाता है। ये घटनाएँ हमारे-अपने जीवन में बदलाव ला सकती हैं। अपने जीवन को बदलने का यह अत्यंत सरल उपाय है जिसे हम प्रायः नजर अंदाज कर देते हैं। किसी पुस्तकालय में बैठा था, कई पत्रिकाएँ पड़ी थीं। उनके पन्ने पलटने लगा। कई लघु कथाओं पर नजर पड़ी, एक-से-एक जीवनोपयोगी। उन्हें पढ़ता और विचार करने लगता। ऐसा लगा कि ये लघु कथाएँ किसी विशेष प्रयोजन के कारण ही मेरी आँखों के सामने आ रही हैं। मैंने उनमें से दो को आप लोगों से साझा करने का मन बनाया। प्रस्तुत है वही दो लघु कथाएँ।

 

***

घर

- खलील जिब्रान

बस, यही एक ऐसा घर है जहां तुम बिना किसी आमंत्रण के अनगिनत बार जा सकते हो।

इस घर में, प्यार भरी निगाहें तबतक दरवाज़े पर लगी रहती हैं, जब तक तुम दिख नहीं जाते! यह घर, तुम्हें उन बेफिक्री के दिनों की याद दिलाता है जहां तुमने खुशियों-भरा बचपन गुज़ारा था।

वह घर, जहां तुम्हारी उपस्थिति तुम्हारे माता-पिता के चेहरे की खुशी बन कर छा जाती थी। इस घर में, वह खुशी तुम्हारे लिए आशीष है और मां-बाप से बातचीत एक पुरस्कार।

यह ऐसा घर है, जहां यदि तुम नहीं जाओगे तो घर का मालिक उदास हो जायेगा;

इस घर में दो मोमबत्तियां जला कर संसार में उजाला किया जाता है, जो तुम्हारे जीवन को सुखमय बना दे।

इस घर में खाने के समय यदि तुम कुछ नहीं खाते हो तो मकान-मालिक का दिल टूट जायेगा, वह नाराज़ भी हो सकता है।

यह घर तुम्हें जीवन की सारी खुशियां देता है।

          बच्चों, इससे पहले कि बहुत देरी हो जाये इन घरों की कीमत पहचान लो।

         भाग्यशाली हैं वे जिनके पास जाने के लिए मां-बाप का घर है।

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वृद्धाश्रम

मीरा जैन

          आज माँ अस्पताल में भर्ती शायद अन्तिम साँसें गिन रही थी। अपनी माँ की हालत से व्यथित नवल, अपने फेसबुक तथा वट्सअप के दोस्तों से एक विनम्र अपील की -

          "प्यारे दोस्तों! मेरी माँ बहुत बीमार है माँ जल्दी स्वस्थ हो जाए इसलिए आप सभी की दुआ और प्रार्थना कि मुझे बेहद आवश्यकता है।"

          परिणामतः दोस्तों की आत्मीय संवेदनाएँ लगातार प्राप्त होती रहीं थी और वह उन्हें निरन्तर प्रेषित करने के बजाय उसका दुख कम करने हेतु स्वयं ही उसके पास अस्पताल पहुँच गया और उसके कानों में माँ के स्वास्थ्य सुधार का एक अचूक नुस्खा बताया जिसे सुन नवल के चेहरे पर छायी चिन्ता की लकीरें कम होने के बजाय फैलकर दुगुनी हो गयी थी। आगंतुक ने केवल इतना ही कहा था-

          "तुम अन्दर जाकर माँ के कानों में केवल इतना ही कह दो, "माँ तुम जल्दी ठीक हो जाओ, तुम्हारे बिना घर सूना पड़ा है।"

          वह आगन्तुक और कोई नहीं वृद्धाश्रम का मैनेजर था।

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यू ट्यूब पर सुनें :

https://youtu.be/FHxKSm2Oqq8


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