२कोई ऐसा अक्षर नहीं है,
जिसका प्रयोग
मंत्र-रचना में न हो सके,
कोई ऐसा वृक्ष नहीं है,
जो किसी न किसी व्याधि की औषधि न हो,
कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है,
जो किसी न किसी कार्य के योग्य न हो,
- शुक्राचार्य
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३आकर्षक
घर की कुंजी
संसार के आकर्षणों में एक आकर्षण है,
घर का। जिसका घर आकर्षक है, उसे किसी काल्पनिक स्वर्ग के
पीछे दौड़ने की जरूरत नहीं; क्योंकि वह स्वर्ग में ही है। पर यह
आकर्षक घर होता क्या है? इसके लिए यह जानना आवश्यक है कि आकर्षक
घर, आकर्षक बनाता कैसे है? आकर्षण का
अर्थ है, वह घर जो आपको खींचता हो,
जहां बार-बार जाने की इच्छा हो, जहां रहने की इच्छा हो।
पहले तो संयुक्त परिवार में तो कई
दादा-दादी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची होते थे और
भाई-बहन-भाभी की तो पूरी फौज ही होती थी। अब तो माँ-बाप,
पति-पत्नी, बेटा-बेटी भी साथ हों तो संयुक्त परिवार जो गया।
खैर, घर में रहनेवाले मुख्य तीन सदस्य हैं पति, पत्नी और बच्चे। तो आकर्षक घर वह है जहां पति, पत्नी
और बच्चों में सद्भाव हो, वे सदा एक होकर रहें। जहाँ यह
सद्भाव है, प्रेम है वह यदि मामूली झोंपड़ी भी है, तब भी वह घर आकर्षक है। जहाँ
सद्भाव नहीं है, वह धन-धान्य से भरा महल हो तो भी, घर आकर्षक नहीं है। लेकिन घर को आकर्षक बनाएँ कैसे?
हर घर में अचार यानि पिकल तो होता ही है। तो एक बार घर को छोड़, देखते हैं एक स्वादिष्ट अचार बनता कैसे है?
४आम का स्वभाव खट्टा होता है, शक्कर और गुड़ मीठा होता है, मेथी का स्वभाव कड़ुवा होता है, मिर्च तीखा होता
है। नामक में लवणता है, राई में कसैलापन है, फिर भी अचार ने इन सब
को मिलाकर इतना अच्छा सामंजस्य बैठाया है कि सभी को अच्छा लगता है। संयुक्त परिवार
में भी इसी प्रकार के अलग-अलग स्वभाव के सदस्य होने के बावजूद भी अचार की तरह सामंजस्य
रहता है, अतः आकर्षण होता है। यह कठिन नहीं है, बशर्ते आपको इसका रहस्य मालूम हो। इसके कई रहस्य हैं – सब एक साथ रहते
हैं, सब अपना गुण बनाए रखते हैं और सब एक दूसरे का गुण लेते भी
हैं। परिवार भी अचार सा स्वादिष्ट और आकर्षक हो जाएगा।
तीखा भी लगेगा, मीठा भी और खट्टा भी। इन सब की प्रकृति अलग-अलग होती है लेकिन सब घुल-मिल
कर रहते हैं और सब के अलग-अलग स्वाद का आभास भी होता है। आम की खटाई का, शक्कर की मिठास का, मेथी के कड़ुएपन का, मिर्च के तीखेपन का, नमक के नमकीन, सब का स्वाद होता है। अलगाव में जुड़ाव, विरोध में
भी सहयोग। और यह इसलिए होता है क्योंकि सब एक दूसरे के गुण को ग्रहण करने का भाव
रखते हैं और अवगुण को नजरंदाज करते हैं। साथ रहने और साथ निभाने की वृत्ति अपनाते
हैं। अगर सब अपनी-अपनी जिद पर हों तो? न अपने को बदलने को
तैयार हों और न ही दूसरे को अपनाने को, तो अचार नहीं बन
सकता। यह तो तभी बनेगा जब सब साथ रहने और साथ निभाने के लिए संकल्पित हों। हमारा
स्वाद एक दूसरे का साथ निभाने में है अलग होने में नहीं। इसमें हमारी स्वतन्त्रता
भी है, समर्पण भी, सौंदर्य भी है शक्ति
भी। ध्यान में हम नहीं अचार है। मैं नहीं, परिवार। अपनी
व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा को गौण करके परिवार की शांति, सुख
और समृद्धि को लक्ष्य बनाना ही सर्वोपरि है। और इसके लिए अपना सर्वोत्तम उत्सर्ग किया, तो बस बन गया आकर्षक घर।
५इसका पहला नियम है - उम्मीदें कम।
घर के सदस्य जब एक दूसरे से बहुत अधिक उम्मीदें करते हैं,
असंभव मांगों की पूर्ति चाहते हैं, तो निराशा
होती है और यह निराशा घर के आकर्षण को खा जाती है। अचार की तरह परिवार के सदस्यों का
स्वभाव बदला नहीं जा सकता। इन आदतों में कुछ आदतें तो पसंद होती हैं कुछ ना-पसंद।
आकर्षक घर वह है, जिसमें हर आदमी दूसरों की ना-पसंद आदतों को
सहने की आदत डाल लेता है। इसी में आकर्षक घर की कुंजी छिपी हुई है।
दूसरा नियम है – भूलना और याद
रखना। कड़वी बातें भूलनी है और मीठी बातें याद रखनी है। नापसंद बातों को,
आदतों को भूल जाना। बोलचाल की भाषा में “रहन-सहन” यानि रहना और
सहना। यह कला घर को आकर्षक बनाने में चित्र, कला और संगीत से
ज्यादा उपयोगी है।
तीसरा नियम है – सही वक्त पर सही
ढंग से कहना – कब, कहाँ और कैसे कहना है। दफ्तर से आते ही झल्ला कर
कहना, ‘आज भी सब्जी-चावल नहीं भिजवाई, कुछ बनाया नहीं, कुछ आए तब रसोई बने।’ थके पति की आवाज भी तेज हो गई। श्रीमती ने कोई अनुचित-गलत बात नहीं कही?
घर में सामान न हो, तो वे प्रबंध कैसे करें? लेकिन सही बात, गलत समय पर,
गलत ढंग से कही गई। हम क्या कहते हैं, इस की कोई कीमत नहीं,
कीमत इस बात की है कि कब कहते हैं और कैसे कहते हैं? सही बात भी बेवक्त और बेढंगा होने के कारण दुःख की जड़ हो जाती है।
आकर्षक घर वह है,
जिस में रहने वालों के मन में सदा वहीं साथ-साथ रहने की इच्छा हो। रहना,
सहना और कहना ही वह कुंजी है जिससे आकर्षक घर का ताला खुलता है।
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