रविवार, 1 फ़रवरी 2026

सूतांजली फरवरी (प्रथम) 2026

 


समय कम है,

लेकिन,

अभी भी समय  है।

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मन का उपद्रव

ओशो के व्याख्यान पर आधारित

 

          मन तर्कनिष्ठ है और जीवन रहस्य। जीवन कोई गणित नहीं है, न ही कोई व्यापारी है। जीवन किसी प्रेमी का प्रेम है, प्रेम की अनुभूति है, किसी कवि का स्वर है, संगीतज्ञ की स्वर लहरी है। जीवन सौंदर्य है, काव्य है, प्रेम है, लेकिन, मन यह नहीं मानता। तर्क टेढ़ी-मेढ़ी डगर है, यह हमें टेढ़े मार्ग पर ले जाता है, और जब तक हम उस टेढ़े मार्ग पर चलते रहेंगे तब तक जो सीधे मार्ग पर चलने से मिल सकता था, उससे हम वंचित रहेंगे।

          सारा उपद्रव मन का ही है। मन तूफान है। मन हमारे भीतर उठती तरंगें हैं, लहरें हैं, और हम पूछते हैं, "उपद्रव कैसे शांत हो?" इसका सरल और सीधा एक ही उपाय है कि उपद्रव ही न हो।

          मन हज़ार बहाने खोजता है। कभी कहता शरीर ठीक नहीं है, कभी तबीयत जरा ठीक नहीं है। कभी कहता है घर में काम है, कभी कहता है बाज़ार है, दुकान है, .... हज़ार बहाने हैं। ध्यान से बचने की मन पूरी कोशिश करता है। क्योंकि ध्यान सीधा रास्ता है। रास्ता, जो मंदिर में ले जाता है, इधर-उधर, यहाँ-वहाँ नहीं ले जाता।

          परमात्मा से लोग वंचित हैं - इसलिए नहीं कि वह बहुत कठिन है। वंचित इसलिए है कि वह बहुत सरल है। परमात्मा इसलिए वंचित नहीं है कि वे बहुत दूर है, इसलिए वंचित है कि वे बहुत पास हैं, उसे पाने में कोई कठिनाई नहीं है।

          अगर दूसरे शहर जाना हो, दूसरे गाँव जाना हो तो, तो दूर की यात्रा है, मन निकल जाता है। लेकिन अगर पास वाले कमरे में जाना हो तो? बगल के पड़ोसी के जाना हो तो? पास ही है, यात्रा में यात्रा ही नहीं है। कहाँ जाना है? कहीं जाना ही नहीं है? अगर कहीं जाना है ही नहीं तब मन नहीं निकलता।

          हमारा मन जिस चीज में जटिलता पाता है, उसी में और उसी अनुपात में रस लेता है।  ज्यादा जटिलता ज्यादा रस, कम जटिलता कम रस। क्योंकि चाल टेढ़ी-मेढ़ी हो तो चलने में रस है। सीधे-सीधे में, साफ-सुथरे में मन कहता है, "कुछ रस नहीं, क्या करोगे? इतनी साफ-सुथरी है, कोई भी पहुंच सकता है। मेरी क्या विशिष्टता?"

          दरअसल धर्म बड़ी सीधी चीज़ है, लेकिन मन के कारण पुरोहितों ने धर्म को बहुत जटिल बना दिया, क्योंकि जटिलता में ही रस है, अपील (appeal) है। तो उलटी-सीधी हज़ार चीजें धर्म के नाम से चल रही हैं। उपवास करो, शरीर को सताओ, इस पर्वत पर जाओ, उस नदी में स्नान करो, इस मंदिर में जाओ, वो पूजा-पाठ करो, जप-तप करो और भी न जाने क्या-क्या। उलटा-सीधा बहुत कुछ चल रहा है। और वह चलता इसलिए है क्योंकि हमें यह जँचता है।

          अगर कोई कहे कि बात बिलकुल सरल है, बात इतनी सरल है कि कुछ करना ही नहीं है, सिर्फ खाली, शांत बैठकर भीतर देखना है तो हम उसे छोड़कर चले जाएंगे। हम कहेंगे, "जब कुछ करने को है ही नहीं, तो क्यों समय खराब करना? कहीं और जाएँ, जहाँ कुछ करने को हो।" बस समझ लीजिये कि मन का उपद्रव शुरू हो गया।

          अगर हमें परमात्मा ऐसे ही घर के पीछे ही मिलता हो तो हमारा रस ही खो जाए। हम कहेंगे यह तो जन्मों-जन्मों की बात है, युगों की बात है परमात्मा ऐसे कहीं मिलता है? ऐसे परमात्मा अचानक एक दिन आ जाए और हमें गोद में उठा कर कहे "भाई, मैं आ गया। तुम बड़ी प्रार्थना वगैरह करते थे। अब हम हाज़िर हैं, बोलो!" हम फौरन आँख बंद कर लेंगे, यह सच हो ही नहीं सकता। कोई बहुरूपिया है।           अगर परमात्मा ऐसे ही आ जाए चुपचाप, और कहे कि मैं आ गया; तुमने याद किया था, तो हम कभी भरोसा नहीं करेंगे, कहेंगे यह झूठ है, मक्कारी है। कोई स्वप्न देख रहा हूँ। यह हो ही नहीं सकता।

          हम सरल को मान ही नहीं सकते। क्या परमात्मा ऐसे ही आता है? अगर हमारे मन की टेढ़ी-मेढ़ी चाल न हो, अगर हम सीधे-सरल होकर बैठ जाएँ तो?  परमात्मा ऐसे ही आता है कि उसकी  पगध्वनि भी नहीं सुनाई पड़ती। एक क्षण पहले नहीं था और एक क्षण बाद है। अचानक हम उस दिव्य प्रकाश से भर जाते हैं। अचानक हम देखते हैं कि उसके मेघ ने हमें घेर लिया है। उसके अमृत की वर्षा होने  लगी है।

          हम कभी यह भी न समझ सकेंगे कि मेरी क्या योग्यता थी कि परमात्मा आया! हम कभी समझ ही नहीं सकेंगे कि मेरी पात्रता क्या थी कि परमात्मा मिला?  क्योंकि योग्यता की बात तो तर्क की बात है। परमात्मा किसी पात्रता से थोड़े ही मिलता है। मैंने ऐसा क्या किया था जिसकी वजह से परमात्मा मिला? क्योंकि कुछ करने से परमात्मा नहीं मिलता। वह तुम्हें मिला हुआ ही है। तुम उसे खो ही नहीं सकते। मन की टेढ़ी-मेढ़ी चाल है कि तुम्हें लगता है खो गया। फिर खोज का सवाल उठता है। जिसे कभी खोया नहीं, उसे हम खोजने निकल जाते हैं!

          जिस दिन परमात्मा मिलता है, उस दिन प्रसाद-रूप, अकारण ही मिलता है। हम ज़रा बैठें। हम दौड़े नहीं। हम थोड़ा मन को विसर्जित करें। हम मन की न सुनें। हम मन के धुएं से ज़रा अपने को मुक्त करें। हम ज़रा मन की घाटी से हटें। थोड़ा-सा फासला मन से बनायें और परमात्मा से सारी दूरी मिट जाती है। इसे हम ऐसे कह सकते हैं कि जितने मन के पास हैं, उतने ईश्वर से दूर। जितने मन से दूर, उतने ईश्वर के पास।

          जिस दिन मन नहीं है, उस दिन हम परमात्मा हैं।

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मंगलवार, 13 जनवरी 2026

सूतांजली जनवरी (द्वितीय) 2026


 

जीवन में अद्भुत घटनाएँ घटती हैं, कभी हमारा ध्यान उन पर जाता है कभी नहीं, हम कभी उनके प्रति सजग होते हैं कभी नहीं, लेकिन हम उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। हमारे ध्यान और सजगता का उन घटनाओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन इतना जरूर होता है कि वैसी घटनाओं की तीव्रता उनका क्रम कम या ज्यादा हो जाता है। ये घटनाएँ हमारे-अपने जीवन में बदलाव ला सकती हैं। अपने जीवन को बदलने का यह अत्यंत सरल उपाय है जिसे हम प्रायः नजर अंदाज कर देते हैं। किसी पुस्तकालय में बैठा था, कई पत्रिकाएँ पड़ी थीं। उनके पन्ने पलटने लगा। कई लघु कथाओं पर नजर पड़ी, एक-से-एक जीवनोपयोगी। उन्हें पढ़ता और विचार करने लगता। ऐसा लगा कि ये लघु कथाएँ किसी विशेष प्रयोजन के कारण ही मेरी आँखों के सामने आ रही हैं। मैंने उनमें से दो को आप लोगों से साझा करने का मन बनाया। प्रस्तुत है वही दो लघु कथाएँ।

 

***

घर

- खलील जिब्रान

बस, यही एक ऐसा घर है जहां तुम बिना किसी आमंत्रण के अनगिनत बार जा सकते हो।

इस घर में, प्यार भरी निगाहें तबतक दरवाज़े पर लगी रहती हैं, जब तक तुम दिख नहीं जाते! यह घर, तुम्हें उन बेफिक्री के दिनों की याद दिलाता है जहां तुमने खुशियों-भरा बचपन गुज़ारा था।

वह घर, जहां तुम्हारी उपस्थिति तुम्हारे माता-पिता के चेहरे की खुशी बन कर छा जाती थी। इस घर में, वह खुशी तुम्हारे लिए आशीष है और मां-बाप से बातचीत एक पुरस्कार।

यह ऐसा घर है, जहां यदि तुम नहीं जाओगे तो घर का मालिक उदास हो जायेगा;

इस घर में दो मोमबत्तियां जला कर संसार में उजाला किया जाता है, जो तुम्हारे जीवन को सुखमय बना दे।

इस घर में खाने के समय यदि तुम कुछ नहीं खाते हो तो मकान-मालिक का दिल टूट जायेगा, वह नाराज़ भी हो सकता है।

यह घर तुम्हें जीवन की सारी खुशियां देता है।

          बच्चों, इससे पहले कि बहुत देरी हो जाये इन घरों की कीमत पहचान लो।

         भाग्यशाली हैं वे जिनके पास जाने के लिए मां-बाप का घर है।

***

वृद्धाश्रम

मीरा जैन

          आज माँ अस्पताल में भर्ती शायद अन्तिम साँसें गिन रही थी। अपनी माँ की हालत से व्यथित नवल, अपने फेसबुक तथा वट्सअप के दोस्तों से एक विनम्र अपील की -

          "प्यारे दोस्तों! मेरी माँ बहुत बीमार है माँ जल्दी स्वस्थ हो जाए इसलिए आप सभी की दुआ और प्रार्थना कि मुझे बेहद आवश्यकता है।"

          परिणामतः दोस्तों की आत्मीय संवेदनाएँ लगातार प्राप्त होती रहीं थी और वह उन्हें निरन्तर प्रेषित करने के बजाय उसका दुख कम करने हेतु स्वयं ही उसके पास अस्पताल पहुँच गया और उसके कानों में माँ के स्वास्थ्य सुधार का एक अचूक नुस्खा बताया जिसे सुन नवल के चेहरे पर छायी चिन्ता की लकीरें कम होने के बजाय फैलकर दुगुनी हो गयी थी। आगंतुक ने केवल इतना ही कहा था-

          "तुम अन्दर जाकर माँ के कानों में केवल इतना ही कह दो, "माँ तुम जल्दी ठीक हो जाओ, तुम्हारे बिना घर सूना पड़ा है।"

          वह आगन्तुक और कोई नहीं वृद्धाश्रम का मैनेजर था।

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गुरुवार, 1 जनवरी 2026

सूतांजली जनवरी (प्रथम) 2026

 


पुराने आख्यान नये विज्ञान 

          स्वामी कृष्णानंदजी का कथन है कि जब भी आप किसी विचार को वह 'अच्छा' हो या 'बुरा' अपनी मानसिक सहमति प्रदान करते हैं, तो आप उससे सम्बंधित हो जाते हैं। वह आप के सचेतन मन का भाग बन जाता है और उस विचार को आप अपने जाने-माने विचार की तरह जब-तब अनजाने में दुहराने लगते हैं।

          जब आप कथा-वार्ता सुनते हैं या कोई धर्म-ग्रंथ पढ़ते हैं तो आप उन विचारों को जितनी सहमति देते हैं, उसी अनुपात में वे विचार आप के हो जाते हैं और उसी अनुपात में उनसे आप को लाभ मिलता है।

          इस नियम का एक दूसरा पक्ष भी है। जब आप सुने या पढ़े हुए अन्याय, क्रूरता का यह सोच कर मानसिक रूप से समर्थन करते हैं कि, अच्छा हुआ बदला लिया, तो आप के एक शब्द बोले बिना भी, यह कृत्य आप का साथी हो जाता है और वह आप के जीवन का अंग बन जाता है ।

          मानसिक सहमति बड़ी सशक्त है।

          किसी भी दुर्मति या ऋणात्मक विचार से अपने को किसी भी अवस्था में संबंधित मत कीजिए। किसी दुर्मति या ऋणात्मक विचारों वाले से, जाने या अनजाने भी संबंध ही नहीं वार्तालाप भी आपके विचारों, शब्दों को प्रभावित करता है, उनसे भी दूरी बनाये रखिये। इस प्रकार आप अपनी अंतरात्मा की निर्मलता और पवित्रता तथा भाषा की शालीनता को कायम रख सकेंगे।

आप के चारों और सत्य और सौंदर्य का समुद्र लहरा रहा है। अपने आप को इससे सम्बंधित करने की आदत बनाइए, इसे ही आप अपनी मानसिक सहमति प्रदान कीजिए।

          भागवत में  पांडवों के वशंज महाराज परीक्षित की कथा आती है। वे एक धर्मपरायण, न्यायप्रिय एवं सात्विक प्रकृति के जनप्रिय राजा थे। संत समाज में  उनकी प्रतिष्ठा थी और उनका नाम आदर और सम्मान से लिया जाता था। लेकिन इसके बावजूद दुर्मति के कारण उन्हें ऋषि-पुत्र के कोप का भाजन होना पड़ा।

          एक बार राजा परीक्षित मृगया पर हरिण के पीछे दौड़ते-दौड़ते विश्रांत हो गए। भूखे-प्यासे जब जल के लिए चारों तरफ नजर घूमाते लौट रहे थे उनकी नजर शमिक ऋषि कि कुटिया पर पड़ी। अंदर प्रवेश किया और ऋषि से जल प्रदान करने की याचना की। लेकिन ध्यान मग्न होने के कारण ऋषि को न राजा के आगमन का भान हुआ और न ही उन्हें राजा की याचना सुनाई पड़ी। राजा परीक्षित खिन्न हो गए, उन्हें बुरा-भला कहा और कुटी से निकल पड़े। लेकिन तभी उन्हें वहाँ एक मारा हुआ साँप दिखाई पड़ा और दुर्मति से अपने धनुष की नोक से उस साँप को उठा कर ऋषि के गले में डाल वहाँ से प्रस्थान किया।

          उनके प्रस्थान के पश्चात ऋषि-पुत्र, शृंगी ऋषि का कुटी में आगमन होता है, पिता के गले में मरे हुए साँप को देख कर उनकी त्योरियां चढ़ जाती है और ऐसा कृत्य करने वाले की सातवें दिन तक्षक के डँसने से मृत्यु हो जाने का श्राप देता है। फलस्वरूप राजा परीक्षित की सातवें दिन तक्षक के डँसने से मृत्यु हो जाती है।  

          परीक्षित जैसे धर्मपरायण राजा से ऐसे व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जा सकती। फिर, ऐसा क्यों हुआ? एक बार परीक्षित ने कलि से वार्तालाप किया था। राजा परीक्षित ने कलि को देखते ही तत्क्षण धनुष पर तीर का संधान किया। लेकिन कलि ने उनके पैर पकड़ लिए और उनसे प्राणों की भिक्षा मांगने लगा। इस दौरान राजा परीक्षित का कलि से वार्तालाप हुआ।   परम पूज्य स्वामी गोविंददेव गिरि जी भागवत कथा के दौरान बताते हैं कि एक दुर्मति से वार्तालाप का ही यह परिणाम था कि धर्मपरायण राजा परीक्षित से यह जघन्य कार्य हुआ।

          किसी भी अवस्था में किसी भी प्रकार की दुर्मति या ऋणात्मक विचार से अपने को संबंधित मत कीजिए। आप के चारों और सत्य और सौंदर्य का समुद्र लहरा रहा है, डुबकी लगानी है तो उसी में लगाये।

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मंगलवार, 9 दिसंबर 2025

सूतांजली दिसम्बर (द्वितीय) 2025

 


किसने मारा – मैंने या तूने?

          आदित्य राज्य की सेना का सेनापति और शिव का परम भक्त था। युद्ध कला में  कौशल वह राज्य और प्रजा में एक महान योद्धा के रूप में जाना जाता था जो अकेले ही बड़ी संख्या में शत्रुओं से युद्ध कर सकता था। एक दिन, राजा से तकरार हो जाने के कारण उसे उसके पद से हटा दिया गया।

          आदित्य बहुत व्यथित हुए लेकिन हताश नहीं। उन्होंने सोचा, "मैं इसे भगवान शिव द्वारा दिया गया एक अवसर मानूंगा और अपना शेष जीवन उनकी प्रार्थना, चिंतन और भक्ति में समर्पित करूंगा।"

          संसार त्याग कर वे एक तपस्वी बन गए और वे राज्य के बाहर एक जंगल में छोटी सी कुटिया बनाई और शिवलिंग स्थापित कर शिव की पूजा, आराधना और ध्यान में अपना समय बिताने लगे। जंगल के पास के गाँवों के लोग आदित्य को जानते थे, उनका सम्मान करते थे। वे  उनके भोजन और बुनियादी ज़रूरतों का ध्यान रखने लगे।

          एक दिन, लुटेरों का एक समूह गाँव में घुस आया, लूटपाट की, बलात्कार किया और लोगों की हत्या करके भाग गया। ऐसा ही दूसरी बार एक अन्य गाँव में हुआ। गाँव के लोगों को लगा कि जंगल में रहने वाला तपस्वी योद्धा उनकी मदद कर सकता है और इस खतरे को रोक सकता है। वे आदित्य के पास गए, उसे सारी बात बताई और उनसे सहायता की गुहार की। आदित्य ने क्षमा मांगते हुए इंकार कर दिया, “मैं अब एक सन्यासी हूँ, मैं अब कैसे लड़ और मार सकता हूँ?" लेकिन लोगों ने विनती की और उसे घेर लिया। आदित्य ने विचार किया, "मैं इनकी वजह से शारीरिक रूप से जीवित हूँ। मुझे मदद करनी ही होगी।" उसने दृढ़ स्वर में कहा, "ठीक है, लेकिन लुटेरों से निपट के लिए मुझे एक घोड़ा और तलवार चाहिये।" गाँव वाले सोच में पड़ गए। वे घोड़ा और तलवार कहाँ से और कैसे लाएँ?

          अगले दिन राजा के दरबार का एक वरिष्ठ मंत्री, जो आदित्य का घनिष्ठ मित्र भी था, तपस्वी से मिलने आया। गाँव वालों ने उसका स्वागत किया और उसे आदित्य के पास ले गए। उन्होंने मंत्री को लुटेरों के उत्पात की जानकारी दी और बताया कि आदित्य को घोड़े और तलवार की व्यवस्था कर दें  तो वे इस मुसीबत से उन्हें छुटकारा दिला सकते हैं। मंत्री ने उन्हें आश्वस्त करते हुआ कहा कि वे आदित्य के लिए तलवार और घोड़े का इंतज़ाम कर देंगे।" गाँव वालों ने लुटेरों पर नज़र रखी और जब वे दोबारा आए तो उन्होंने आदित्य को सूचित कर दिया।

          जैसे ही उसने तलवार हाथ में ली, उसे लगा कि कोई अद्भुत शक्ति उसके अंदर प्रवेश कर रही है। तपस्वी फिर से योद्धा बन गया। गाँव वाले विस्मय और आश्चर्य से देख रहे थे, तभी आदित्य अपने घोड़े पर सवार होकर चक्रवात की तरह लुटेरों के समूह पर टूट पड़ा और सभी लुटेरों का सफाया कर दिया, जिससे लुटेरों का आतंक हमेशा के लिए खत्म हो गया। गाँव वालों ने कृतज्ञता के आँसुओं के साथ आदित्य के आगे सिर झुकाया।

          लेकिन आदित्य बहुत दुखी था। उसने मन ही मन सोचा, "मैं एक संन्यासी हूँ जिसने अहिंसा का व्रत लिया है, लेकिन करुणा और कृतज्ञता के बहकावे में आकर मैंने लोगों की निर्मम हत्या करने का जघन्य पाप किया है।" पश्चाताप से भरा उसने शिव से प्रार्थना की, "हे मेरे स्वामी, मैंने एक भयंकर पाप किया है, कृपया मुझे क्षमा करें।" वह अपने हृदय में इसी गहरे अपराध बोध के साथ सो गया। उस रात शिव ने उसके स्वप्न में दर्शन दिए और कहा, "आदित्य, दोषी महसूस मत करो। तुमने सही काम किया है, ग्रामीणों को डाकुओं के आतंक से बचाया है। यह मत सोचो कि तुमने उन्हें मारा है। उन्हें तो मैंने ही मारा है, तुम तो केवल निमित्त मात्र हो। क्या तुमने तलवार उठाते समय मेरी शक्ति को अपने भीतर प्रवेश करते हुए महसूस नहीं किया? जब डाकू दूसरी बार आए, तो ग्रामीणों ने अपने इष्ट देवता के रूप में मुझसे उनकी सहायता करने के लिए प्रार्थना की। मैंने तुम्हें अपना साधन बनाकर उनकी प्रार्थनाएँ स्वीकार कर ली।"

***

          श्रीमद्भगवदगीता के 11वें अध्याय में अर्जुन के अनुरोध पर श्री कृष्ण ने उन्हें अपने  विश्वरूप का दर्शन कराया। और फिर 55वें श्लोक में उन्हेंपाने का सीधा और सरल मार्ग बताया है। मत्कर्म कृत्, यानि जो मेरे कर्म करता है, उनके कार्य करता है वह मुझेप्राप्त करता है। उनके क्या कार्य हैं? गीता में ही कृष्ण अपने कार्यों का उल्लेख करते हुए कहते हैं:

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥

यानि - (१) साधुओं (सज्जनों) की रक्षा, (२) दुष्टों का विनाश, और (३) धर्म की स्थापना, ये तीनों कार्यों को करने वाला 'मत्कर्म कृत' है, यानि वह मेरा कार्य करता है।

          इसी अध्याय के 33वें श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं - 

"निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्"

अर्जुन तू सिर्फ निमित्त बन जा

          "अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करो और अपने समृद्ध राज्य का आनंद लो। मैंने उन्हें पहले ही मार डाला है। जो किया मैंने किया, तुम तो केवल निमित्त मात्र हो।" यह तो होना ही है, अगर तू नहीं करेगा तो कोई और करेगा मैं तो तुम्हें सिर्फ मौका दे रहा हूँ।

          जहां हम यह समझ गए कि मैं तो कुछ भी करने वाला नहीं मैं तो सिर्फ निमित्त मात्र हूँ करने वाला तो कोई और ही है और वह तो करके बैठा है, हमारे सारे अहंकार मोम की तरह पिघल कर बह जाएंगे। हम निर्मल और शांत हो जाएंगे। ईश्वर प्राप्ति का मार्ग खुल जाएगा।

          अर्जुन संशय करता है कि मार्ग जानना तो आसान है, लेकिन उस पर चलना कठिन है? इसका उत्तर भी श्री कृष्ण ने 6:35 और 12:9 में दिया है – अभ्यासेन तू कौंतेय और अभ्यायोगेन ततो मा मिच्छाप्तुं निरंतर अभ्यास से यह संभव है। अतः दृड़ निश्चय के साथ निरंतर अभ्यास करते रहें, हिम्मत न हारें।  

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सोमवार, 1 दिसंबर 2025

सूतांजली दिसम्बर (प्रथम) 2025







                                                पानी विरोध नहीं करता।

जब आप अपना हाथ इसमें डालते हैं,

तो आपको बस एक स्पर्श महसूस होता है।

पानी कोई ठोस दीवार नहीं है;

यह आपको रोकेगा नहीं।

लेकिन

पानी हमेशा वहीं जाता है

जहाँ वह जाना चाहता है।

मार्गरेट एटवुड

(कनाडा की साहित्यकार एवं बुकर पुरस्कार विजेता)

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प्रेम

खलील जीब्रान के लेखन पर आधारित

          एकत्रित समुदाय के सामने मंच पर संत विराजमान हो गए। तब उपस्थित समुदाय में से एक महिला ने हाथ जोड़  कर निवेदन किया, “महाराज! आज हमें  प्रेम के विषय में कुछ बताएं।” सबों ने संत पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। गुरु ने गंभीर स्वर में समुदाय को संबोधित करना प्रारम्भ किया-

          जब प्रेम तुम्हें अपनी ओर बुलाए तो उसका अनुगमन करो, लेकिन ध्यान रखो उसकी राहें विकट, विषम और कंटीली हैं।

          जब उसके फैले हुए पंख तुम्हें ढँक लेना चाहें, तो तुम सर झुका कर आत्मसमर्पण कर दो, भले ही उन पंखों के नीचे छिपी तलवार तुम्हें घायल करे। और जब वह तुमसे बोले तो उसमें विश्वास रखो, भले ही उसकी आवाज तुम्हारे सपनों को चकनाचूर कर डाले क्योंकि प्रेम जिस तरह तुम्हें मुकुट पहनाएगा उसी तरह शूली पर भी चढ़ाएगा। जिस तरह वह तुम्हारे विकास के लिए है उसी तरह तुम्हारी काट-छांट के लिए भी है। जिस प्रकार वह तुम्हारी ऊँचाइयों तक चढ़कर सूर्य की किरणों में काँपती हुई तुम्हारी कोमलतम कोंपलों की भी देखभाल करता है, उसी प्रकार वह तुम्हारी नीचाई तक उतरकर, भूमितल से दूर गड़ी हुई तुम्हारी जड़ों को भी झकझोर डालता है।

          अनाज की बालों की तरह वह तुम्हें अपने अंदर भर लेता है। तुम्हारी भूसी दूर करने के लिए तुम्हें फटकता है। तुम्हें पीसकर श्वेत बनाता है। तुम्हें नरम बनाने तक गूँधता है, और तब तुम्हें अपनी पवित्र अग्नि पर सेंकता है जिससे तुम प्रभु के पावन थाल की पवित्र रोटी बन सको। तुम्हारे साथ यह सारी लीला इसलिए करता है कि तुम अपने अंतरतम के रहस्यों का ज्ञान पा सको, और उसी ज्ञान द्वारा जगजीवन के हृदय का एक अंश बन सको।

          लेकिन यदि भयवश तुम केवल प्रेम की शान्ति और प्रेम के उल्लास की ही कामना करते हो, तो तुम्हारे लिए यही भला है कि तुम प्रेम की कूटने वाली खलिहान से बाहर हो जाओ। और ऋतु-हीन संसार में जा बसो, जहाँ तुम हँसोगे, लेकिन पूरी हँसी के साथ नहीं। जहाँ तुम रोओगे, लेकिन सारे आँसुओं के साथ नहीं।

          प्रेम किसी को अपने-आपके सिवा न कुछ देता है, न किसी से अपने-आपके लिए कुछ लेता है। प्रेम न किसी का स्वामी बनता है, न किसी को अपना स्वामी बनाता है। क्योंकि प्रेम प्रेम में ही परिपूर्ण है।

          जब तुम प्रेम करो तब यह न कहो, ईश्वर मेरे हृदय में है। बल्कि कहो, मैं ईश्वर के हृदय में हूँ।

          और कभी न सोचो कि तुम प्रेम का पथ निर्धारित कर सकते हो, क्योंकि प्रेम यदि तुम्हें अधिकारी समझता है तो स्वयं तुम्हारी राह निर्धारित करता है। प्रेम अपने-आपको संपूर्ण करने के सिवा और कुछ नहीं चाहता है। यदि तुम प्रेम करो और तुम्हारे हृदय में कामनाएँ उठे भी तो वे ये हों-

          मैं द्रवित हो सकूँ - बहते हुए झरने की तरह रजनी को सुमधुर गीत से भर सकूँ।

          मैं अत्यंत कोमलता की वेदना अनुभव कर सकूँ।

          मैं अपने प्रेम की अनुभूति से घायल हो सकूँ।

          मैं अपनी इच्छा से और हँसते-हँसते अपना रक्त-दान कर सकूँ।

          मैं पंख फैलाता हुआ हृदय लेकर प्रभात वेला में जाग सकूँ। और

          मैं एक प्रेममय दिन पाने के लिए धन्यवाद कर सकूँ।

          दोपहर को विश्राम कर सकूँ। और

          प्रेम के परम आनंद में तल्लीन हो सकूँ ।

          दिन ढलने पर कृतज्ञता-भरा हृदय लेकर घर लौट सकूँ

          और फिर रात्रि में हृदय में प्रियतम के लिए प्रार्थना और

          होंठों पर उसकी प्रशंसा के गीत लेकर सो सकूँ।

"ये इश्क़ नहीं आसां बस इतना समझ लीजे,

इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।"

                                                                            जिगर मुरादाबादी

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मंगलवार, 11 नवंबर 2025

सूतांजली नवंबर (द्वितीय) 2025




 

हम अनेक बार यह प्रतिक्रिया देते हैं कि पता नहीं यह व्यक्ति कौन सी दुनिया में रहता है, पता नहीं ये कौन से लोक के वासी हैं और इसी प्रकार से पढ़े-लिखों और अनपढ़ों की दुनिया, जवानों बूढ़ों और बच्चों की दुनिया, पुरुषों और महिलाओं की दुनिया? और भी न जाने कितनी दुनिया की रचना हम कर डालते हैं। अलग-अलग इतनी सारी दुनिया? कितनी दुनिया है? कैसी दुनिया है? आध्यात्मिक जीवन में आध्यात्मिक लोग इन अलग-अलग लोगों की अलग ढंग से चर्चा करते हैं लेकिन वहीं साहित्यिक लोग इसकी अलग ढंग से चर्चा करते हैं।

          सामान्यतः हम तीन लोकों की चर्चा करते हैं।

          पहला पाताल लोक जहां आसुरी शक्तियों का निवास मानते हैं। पाताल में दैत्य, दानव और नाग जैसे प्राणियों का निवास माना जाता है, जिनमें वासुकि प्रमुख हैं।

          दूसरा भू-लोक है, यानी वह स्थान जहां मनुष्य यानि मानवीय शक्ति निवास करते हैं। और यही प्रेरणा दी जाती है कि हम भू-लोक के निवासी अपने कर्मों से ब्रह्म लोक के वासी बनें।   

          और तीसरा बह्म लोक जहां देवी, देवताओं का वास है।

          कवीन्द्र रवीद्र ने इन से हट कर तीन भूमियों की चर्चा की है जहां हमारा  वास-स्थान है। और ये तीनों ही हमारी जन्म-भूमि है क्योंकि जन्म के साथ ही हम इन तीनों जगत में रहना प्रारम्भ कर देते हैं। पृथ्वी ही नहीं इसके अलावा और दो जगत हैं जहां हम जन्म से मृत्यु पर्यंत वहाँ रहते हैं। वे लिखते हैं हमारी तीन जन्म भूमियां हैं, और तीनों एक-दूसरे से मिली हुई हैं।

पहली जन्मभूमि है पृथ्वी - मनुष्य का वासस्थान पृथ्वी पर सर्वत्र है। ठण्डा हिमालय और गर्म रेगिस्तान, दुर्गम उत्तुंग पर्वत श्रेणी और बंगाल की तरह समतल भूमि - सभी जगह मानव का निवास है। मनुष्य का निवासस्थान वास्तव में एक ही है - अलग-अलग देशों का नहीं, सारी मानव जाति का। मनुष्य के लिए पृथ्वी का कोई अंश दुर्गम नहीं - पृथ्वी ने उसके सामने अपना हृदय मुक्त कर दिया है।

          मनुष्य का द्वितीय वासस्थान है स्मृतिजगत्। अतीत से पूर्वजों का इतिहास लेकर वह काल का नीड़ तैयार करता है - यह नीड़ स्मृति की ही रचना है। यह किसी विशेष देश की बात नहीं है, समस्त मानव जाति की बात है। स्मृतिजगत् में मानव मात्र का मिलन होता है। मानव का वासस्थान एक ओर पृथ्वी है, दूसरी ओर स्मृतिलोक। मनुष्य समस्त पृथ्वी पर जन्म ग्रहण करता है और समस्त इतिहास में भी। अतीत में, वर्तमान में और फिर इन दोनों के संयोग से भविष्य बुनता है।

          उसका तृतीय वासस्थान है आत्मलोक। इसे हम मानवचित्त का महादेश कह सकते हैं। यही चित्तलोक मनुष्यों के आन्तरिक योग का क्षेत्र है। किसी का चित्त संकीर्ण दायरे में आबद्ध है, किसी के चित्त में विकृति है - लेकिन एक ऐसा व्यापक चित्त भी है जो विश्वगत है, व्यक्तिगत नहीं। उसका परिचय हमें अकस्मात् ही मिल जाता है - किसी दिन अचानक वह हमें आह्वान देता है। साधारण व्यक्ति में भी देखा जाता है कि जहाँ वह स्वार्थ भूल जाता है, प्रेम करता है, वहाँ उसके मन का एक ऐसा पक्ष है जो 'सर्वमानव' के चित्त की ओर प्रवृत्त है।

          मनुष्य विशेष प्रयोजनों के कारण घर की सीमाओं में बद्ध है, लेकिन महाकाश के साथ उसका सच्चा योग है। व्यक्तिगत मन अपने विशेष प्रयोजनों की सीमा से संकीर्ण होता है, लेकिन उसका वास्तविक विस्तार सर्वमानव-चित्त में है। वहाँ की अभिव्यक्ति आश्चर्यजनक है। एक आदमी के पानी में गिरते ही दूसरा उसे बचाने के लिए कूद पड़ता है। दूसरे की प्राण-रक्षा के लिए मनुष्य अपने प्राण संकट में डाल सकता है। हम देखते हैं कि मनुष्य अपनी रक्षा को ही सबसे बड़ी चीज़ नहीं गिनता। इसका कारण यही है कि प्रत्येक मनुष्य की सत्ता दूसरों की सत्ता से जुड़ी हुई है।

          हम सब एक हैं, अलग-अलग नहीं।

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