समृद्धि का प्रवाह ही
लक्ष्मी
का आगमन है
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समृद्धि का प्रवाह
माँ लक्ष्मी बाह्य नहीं
हैं; माँ वह चेतना है जिसमें समृद्धि का अनुभव और उसका
प्रवाह विद्यमान हो। समृद्धि का तात्पर्य सिर्फ यह नहीं है कि हमारे पास कितनी संपत्ति
है। असली समृद्धि यह है कि हमारे भीतर कितना प्रेम, कितनी खुशी, कितनी उदारता, कितनी
कृतज्ञता और देने की भावना है। दरिद्रता का अर्थ धन का अभाव नहीं, बल्कि उस चेतना की दरिद्रता है जहां बहुत
कुछ होने पर भी भीतर निरंतर अभाव का भय जीवित रहता है—
“जो है, उसे किसी भी तरह बचाकर रखना है।”
“मुझे इतना अधिक नहीं
देना चाहिए।”
“पहले मेरे पास और आ जाए,
तब मैं बाँटूँगा।”
इस प्रकार मनुष्य के भीतर अभाव की
चेतना अपना घर बना लेती है। उदारता इस संकुचन को तोड़ती है। जब मनुष्य बिना भय
के, बिना हिसाब के, किन्तु विवेक
पूर्ण ढंग से, अपने भीतर की पूर्णता से देता है, तब उसके अंतःकरण में एक मौन अनुभूति जागती है:
“जो मेरे पास है, वह सिर्फ मेरे लिए नहीं है।”
यही उदारता है। और
यही समृद्धि की शुरुआत है।
“अभाव नहीं है। जीवन पूर्ण है। मैं समृद्धि हूँ।”
यही चेतना लक्ष्मी का
द्वार खोलती है।
जिसके दिल में उत्साह है, यानि हृदय में ऊष्मा है,
प्रेम है, जीवन के प्रति अनुराग है और स्वयं
को पूरे मन से किसी कार्य में अर्पित कर देने की शक्ति है।
एक चेतना ऐसी भी हो सकती है जो कर्म तो
करती है, पर उसमें आनंद नहीं; वह देती
तो है, पर उसमें प्रेम नहीं; वह सेवा
तो करती है, पर आत्मा उसमें सहभागी नहीं होती। इसके विपरीत,
जब हृदय से कुछ करते हैं, तो उसमें एक अलग ही
सुंदरता आ जाती है। माते का क्षेत्र सौंदर्य, माधुर्य,
सामंजस्य और प्रेम का क्षेत्र है, और सच्चा
सौंदर्य तभी जन्म लेता है जब आत्मा में ऊष्मा हो, उत्साह हो।
माँ का संबंध इसी सुंदरता, प्रेम और आनंद से है।
संकीर्ण चेतना बार-बार “मैं” और “मेरा” से
लिपटी रहती है और दुनिया बहुत छोटी हो जाती है। विशालता का अर्थ है—चेतना का
विस्तार, अंतःकरण की विशालता, भीतर का
खुला आकाश। एक विस्तृत चेतना में दूसरों के लिए,
अलग-अलग दृष्टिकोणों के लिए, अप्रत्याशित
संभावनाओं के लिए, सौंदर्य, आनंद और
देने के लिए स्थान होता है। इसलिए माँ लक्ष्मी की समृद्धि के लिए आंतरिक
विस्तार और विशालता आवश्यक है। जब हमारा मन थोड़ा खुलता है, तो हमें दूसरों के लिए भी जगह दिखाई देती है। दूसरों की खुशी हमारी खुशी
हो जाती है, दूसरे की सफलता हमारे लिए हर्ष हो जाता है। यही
भीतर का विस्तार है।
“मेरे पास थोड़ा है,
लेकिन जितना बन पड़ेगा, मैं करूँगा।” यही दिल की
विशालता है।
आंतरिक समृद्धि यानि भीतर से कुछ निरंतर
उमड़ रहा हो, भीतर कुछ ऐसा हो जिसे हम दूसरों के साथ बाँट सकें।
भीतर करुणा, कृतज्ञता, सौंदर्य, ज्ञान, आतिथ्य या केवल किसी दूसरे व्यक्ति को यह
अनुभव कराने की क्षमता हो सकती है कि वह मूल्यवान है। हमारे पास धन न हो,
फिर भी हमारे पास अपार संपत्ति होती है। हम समय-ध्यान-प्रोत्साहन-प्रेम-मुस्कान
बाँट सकते हैं। समृद्ध व्यक्ति पूछता है कि - “मैं क्या
दे सकता हूँ?” न कि : “मुझे क्या मिल सकता है?”
भय,
आसक्ति और स्वार्थ के कारण हम स्वयं को संकुचित कर लेते हैं।
एक बंद मुट्ठी देगी नहीं लेकिन ले भी नहीं सकेगी। इसके विपरीत, खुला हुआ हाथ— दे सकता है और ले भी सकता है। यही
समृद्धि का एक गहन नियम है: प्रवाह। समृद्धि का वास्तविक स्वरूप प्रवाह
है। जीवन में सौंदर्य का प्रवाह हो, प्रेम का प्रवाह हो,
साधनों का उदारतापूर्वक उपयोग हो और आनंद साझा किया जाए, जहाँ प्रवाह रुकता है, वहाँ जीवन की समृद्धि भी
धीरे-धीरे जड़ और संकुचित होने लगती है।
धन समृद्धि की एक अभिव्यक्ति है,
समृद्धि का सार नहीं।
कोई
धनवान हो सकता है, लेकिन आध्यात्मिक रूप से दरिद्र —क्योंकि उसके धन
ने उसे
भयभीत
कर दिया है,
स्वामित्व-बोध
से भर दिया है,
अहंकारी या कठोर हृदय
वाला बना दिया है।
और
कोई व्यक्ति जिसके पास लगभग कुछ भी न हो, उसके
भीतर फिर भी अत्यंत प्रबल चेतना हो सकती है।
वह किसी की मदद
करके खुश होता है।
वह अपने पास जो
है, उसे बाँटने में संकोच नहीं करता।
तो वह भीतर से बहुत समृद्ध
है।
लक्ष्मी को अपनी
तिजोरी – बैंक खाते से भ्रमित मत कीजिए।
इसका अर्थ यह नहीं है कि धन महत्वहीन है
या दरिद्रता अपने-आप में आध्यात्मिक है। जैसे दरिद्रता आध्यात्मिकता नहीं है,
वैसे ही धन भी अपने-आप में आध्यात्मिक दरिद्रता नहीं है। यहाँ संकेत
केवल इतना है कि—भौतिक परिस्थितियाँ और चेतना की समृद्धि दो भिन्न आयाम हैं। वास्तव
में समृद्ध व्यक्ति वह है जिसके भीतर से कुछ सुंदर प्रवाहित हो सकता है। धन कम
होने पर भी मुस्कान, आतिथ्य, प्रोत्साहन,
स्नेह, ज्ञान, समय या
करुणा दे सकता है, इसलिए वह भीतर से दरिद्र नहीं है। उसकी भौतिक
निर्धनता उसकी आंतरिक समृद्धि को रोक नहीं सकती।
यह वचन स्वयं में
महालक्ष्मी को आमंत्रित करने के लिए एक मार्गदर्शन है:
संकुचित
नहीं, विस्तृत बनें।
शीतल
नहीं, ऊष्मावान बनें।
स्वामी
नहीं, उदार बनें।
केवल
देने में नहीं, ग्रहण करने में भी सक्षम बनें।
सौंदर्य,
प्रेम और समृद्धि को अपने जीवन में प्रवाहित होने दें।
उदारता
एक चेतना की एक अवस्था है।
आप
बहुत देते हैं लेकिन यदि भीतर शिकायत या कड़वाहट है, तो आप दरिद्र हैं।
आप
बहुत कम देते हैं, लेकिन यदि सच्चा प्रेम है, तो
आप समृद्ध हैं।
इसलिए
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि :
“मेरे पास कितना है?”, “मुझे
क्या मिलेगा?”
बल्कि
प्रश्न यह है:
“मेरे माध्यम से कितनी समृद्धि प्रवाहित हो सकती है?”, “मैं क्या अर्पित कर सकता हूँ?”
समृद्धि
का प्रवाह ही लक्ष्मी के हृदय के निकट है।
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