मंगलवार, 11 अगस्त 2026

सूतांजली, अगस्त द्वितीय 2026, आकर्षक घर की कुंजी

 


२कोई ऐसा अक्षर नहीं है,

जिसका प्रयोग मंत्र-रचना में न हो सके,

कोई ऐसा वृक्ष नहीं है,

जो किसी न किसी व्याधि की औषधि न हो,

कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है,

जो किसी न किसी कार्य के योग्य न हो,

                                                                                                                                                      - शुक्राचार्य

------------------ 000 ----------------------

३आकर्षक घर की कुंजी

संसार के आकर्षणों में एक आकर्षण है, घर का। जिसका घर आकर्षक है, उसे किसी काल्पनिक स्वर्ग के पीछे दौड़ने की जरूरत नहीं; क्योंकि वह स्वर्ग में ही है। पर यह आकर्षक घर होता क्या है? इसके लिए यह जानना आवश्यक है कि आकर्षक घर, आकर्षक बनाता कैसे है? आकर्षण का अर्थ है, वह घर जो आपको खींचता हो, जहां बार-बार जाने की इच्छा हो, जहां रहने की इच्छा हो।

          पहले तो संयुक्त परिवार में तो कई दादा-दादी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची होते थे और भाई-बहन-भाभी की तो पूरी फौज ही होती थी। अब तो माँ-बाप, पति-पत्नी, बेटा-बेटी भी साथ हों तो संयुक्त परिवार जो गया। खैर, घर में रहनेवाले मुख्य तीन सदस्य हैं पति, पत्नी और बच्चे। तो आकर्षक घर वह है जहां पति, पत्नी और बच्चों में सद्भाव हो, वे सदा एक होकर रहें। जहाँ यह सद्भाव है, प्रेम है वह यदि मामूली झोंपड़ी भी है, तब भी वह घर आकर्षक है।   जहाँ सद्भाव नहीं है, वह धन-धान्य से भरा महल हो तो भी, घर आकर्षक नहीं है। लेकिन घर को आकर्षक बनाएँ कैसे? हर घर में अचार यानि पिकल तो होता ही है। तो एक बार घर को छोड़, देखते हैं एक स्वादिष्ट अचार बनता कैसे है?

        ४आम का स्वभाव खट्टा होता है, शक्कर और गुड़ मीठा होता है, मेथी का स्वभाव कड़ुवा  होता है, मिर्च तीखा होता है। नामक में लवणता है, राई में कसैलापन  है, फिर भी अचार ने इन सब को मिलाकर इतना अच्छा सामंजस्य बैठाया है कि सभी को अच्छा लगता है। संयुक्त परिवार में भी इसी प्रकार के अलग-अलग स्वभाव के सदस्य होने के बावजूद भी अचार की तरह सामंजस्य रहता है, अतः आकर्षण होता है। यह कठिन नहीं है, बशर्ते आपको इसका रहस्य मालूम हो। इसके कई रहस्य हैं – सब एक साथ रहते हैं, सब अपना गुण बनाए रखते हैं और सब एक दूसरे का गुण लेते भी हैं। परिवार भी अचार सा स्वादिष्ट और आकर्षक हो जाएगा।

          तीखा भी लगेगा, मीठा भी और खट्टा भी। इन सब की प्रकृति अलग-अलग होती है लेकिन सब घुल-मिल कर रहते हैं और सब के अलग-अलग स्वाद का आभास भी होता है। आम की खटाई का, शक्कर की मिठास का, मेथी के कड़ुएपन का, मिर्च के तीखेपन का, नमक के नमकीन, सब का स्वाद होता है। अलगाव में जुड़ाव, विरोध में भी सहयोग। और यह इसलिए होता है क्योंकि सब एक दूसरे के गुण को ग्रहण करने का भाव रखते हैं और अवगुण को नजरंदाज करते हैं। साथ रहने और साथ निभाने की वृत्ति अपनाते हैं। अगर सब अपनी-अपनी जिद पर हों तो? न अपने को बदलने को तैयार हों और न ही दूसरे को अपनाने को, तो अचार नहीं बन सकता। यह तो तभी बनेगा जब सब साथ रहने और साथ निभाने के लिए संकल्पित हों। हमारा स्वाद एक दूसरे का साथ निभाने में है अलग होने में नहीं। इसमें हमारी स्वतन्त्रता भी है, समर्पण भी, सौंदर्य भी है शक्ति भी। ध्यान में हम नहीं अचार है। मैं नहीं, परिवार। अपनी व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा को गौण करके परिवार की शांति, सुख और समृद्धि को लक्ष्य बनाना ही सर्वोपरि है। और इसके लिए अपना सर्वोत्तम उत्सर्ग किया,  तो बस बन गया आकर्षक घर। 

          ५इसका पहला नियम है - उम्मीदें कम। घर के सदस्य जब एक दूसरे से बहुत अधिक उम्मीदें करते हैं, असंभव मांगों की पूर्ति चाहते हैं, तो निराशा होती है और यह निराशा घर के आकर्षण को खा जाती है। अचार की तरह परिवार के सदस्यों का स्वभाव बदला नहीं जा सकता। इन आदतों में कुछ आदतें तो पसंद होती हैं कुछ ना-पसंद। आकर्षक घर वह है, जिसमें हर आदमी दूसरों की ना-पसंद आदतों को सहने की आदत डाल लेता है। इसी में आकर्षक घर की कुंजी छिपी हुई है।

          दूसरा नियम है – भूलना और याद रखना। कड़वी बातें भूलनी है और मीठी बातें याद रखनी है। नापसंद बातों को, आदतों को भूल जाना। बोलचाल की भाषा में “रहन-सहन” यानि रहना और सहना। यह कला घर को आकर्षक बनाने में चित्र, कला और संगीत से ज्यादा उपयोगी है।

          तीसरा नियम है – सही वक्त पर सही ढंग से कहना – कब, कहाँ और कैसे कहना है। दफ्तर से आते ही झल्ला कर कहना, आज भी सब्जी-चावल नहीं भिजवाई, कुछ बनाया नहीं, कुछ आए तब रसोई बने। थके पति की आवाज भी तेज हो गई। श्रीमती ने कोई अनुचित-गलत बात नहीं कही? घर में सामान न हो, तो वे प्रबंध कैसे करें? लेकिन सही बात, गलत समय पर, गलत ढंग से कही गई। हम क्या कहते हैं, इस की कोई कीमत नहीं, कीमत इस बात की है कि कब कहते हैं और कैसे कहते हैं? सही बात भी बेवक्त और बेढंगा होने के कारण दुःख की जड़ हो जाती है।

          आकर्षक घर वह है, जिस में रहने वालों के मन में सदा वहीं साथ-साथ रहने की इच्छा हो। रहना, सहना और कहना ही वह कुंजी है जिससे आकर्षक घर का ताला खुलता है।

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

लाइक करें, सबस्क्राइब करें, परिचितों से शेयर करें।

यू ट्यूब पर सुनें :

https://youtu.be/YsiXJHjCSmk

शनिवार, 1 अगस्त 2026

सूतांजली अगस्त (प्रथम) 2026


 

मंज़िल यूँ ही नहीं मिलती राही को,

          जुनून-सा दिल में जगाना पड़ता है।

                    पूछा चिड़िया से कि घोंसला कैसे बनता है

                    वह बोली तिनका-तिनका उठाना पड़ता है।

------------------ 000 ----------------------

आनंद कहाँ है?

अकबर समझ नहीं सका, पूछने लगा, 'किस लिए? किस के लिए?'

तानसेन ने प्रति प्रश्न किया,

'नदियां किस लिए बह रही हैं?

फूल किस लिए खिल रहे हैं?

सूर्य किस लिए निकल रहा है?

यह किस लिए तो मानव की बुद्धि ने पैदा किया है,

सारा जगत परिपूर्ण है, केवल मानव को छोड़कर, बस वही अधूरा है।

संगीत सम्राट तानसेन, अकबर के नौ-रत्नों में एक, संगीत का बादशाह। जब उसके गायन की स्वर-लहरी हवा में लहराती तो सब मंत्रमुग्ध हो जाते। बादशाह के वे विशेष प्रिय दरबारी थे। ऐसे ही एक गायन के बाद बादशाह ने भाव विभोर होकर तानसेन से कहा, “तुम्हारे संगीत में जादू है, जब भी तुम्हारे संगीत को सुनता हूं, तो मन में ऐसा खयाल उठता है कि तुम जैसा बजाने वाला शायद ही पृथ्वी पर कोई और हो और आगे भी कभी होगा, यह भी भरोसा नहीं होता, तुम शिखर हो।”

तानसेन ने बड़ी विनम्रता से कहा, “नहीं, शहंशाह मैं कुछ भी नहीं हूं। मैं तो अपने गुरु के चरणों की धूल भी नहीं हूं। आप शिखर की बात कर रहे हैं  मैं तो उनके सामने भूमि पर भी नहीं हूं। मैं तो उनके चरणों में भी बैठने योग्य नहीं हूँ। कभी उनके चरणों में बैठने की योग्यता भी हो जाए, तो अपने आप को धन्य समझूँगा, समझूँगा कि बहुत कुछ पा लिया।'

अकबर आश्चर्य चकित रह गए। हर कीमत पर तानसेन को अपने गुरु को दरबार में उपस्थित करने कहा, 'अगर तुम्हारे गुरु जीवित हैं तो तत्क्षण उन्हें दरबार में ले आओ, जो भी भेंट करनी हो, देंगे।”

लेकिन तानसेन ने अपनी असमर्थता जाहिर की, “यही कठिनाई है, क्योंकि उन्हें कुछ लेने को राजी नहीं किया जा सकता, वहां कुछ लेने का प्रश्न ही नहीं है।'

अकबर 'कुछ लेने का प्रश्न नहीं है? तो क्या उपाय किया जाए?'

तानसेन - 'कोई उपाय नहीं, आपको ही चलना पड़ेगा।'

अकबर, चलने तैयार हो गया। लेकिन तानसेन ने उन्हें रोक दिया, कहा, 'अभी चलने से तो कुछ हासिल नहीं होगा। क्योंकि, कहने से वे बजाएंगे, ऐसा नहीं है। जब वे बजाते हैं, तब कोई सुन ले, बात और है। मैं पता लगाता हूं कि वे कब बजाते हैं।”

हरिदास फकीर उनके गुरु थे, यमुना के किनारे रहते थे। गाने-बजने का कोई समय नहीं था। कभी कई दिनों तक नीरवता तो कभी रात तीन बजे उठकर बजाते हैं, नाचते हैं। अकबर और तानसेन को देखकर तो बजाएँगे ही नहीं। दोनों, चोरी से झोपड़ी के बाहर ठंडी रात में छिपकर बैठे रहे, कई रातें गुजर गईं। कुछ सुनने नहीं मिला। और फिर अचानक एक मध्य रात्रि वातावरण जैसे अंगड़ाई लेता उठ बैठा, पुष्प खिल उठे, मंद बयार बहने लगी, रोम-रोम  पुलकित हो उठा, निःशब्दता में संगीत फैल गया। पूरे समय अकबर की आंखों से आंसू बहते रहे, पत्थर की मूर्ति कि तरह बैठा रहा, उसके होठों से एक स्वर भी प्रस्फुटित नहीं हुआ।

संगीत बंद हुआ, तंद्रा टूटी, दोनों मौन वापस चल दिये। महल के द्वार तक कोई वार्तालाप नहीं। अकबर अभी तक स्वर-लहरी में डूबा था। महल के द्वार पर तानसेन से इतना ही कहा, 'तुम अपने गुरु जैसा क्यों नहीं बजा सकते हो?'

तानसेन - 'बात बस इतनी सी है कि मैं कुछ पाने के लिए बजाता हूं, और मेरे गुरु ने कुछ पा लिया है, इसलिए बजाते हैं। मेरे बजाने के आगे कुछ लक्ष्य है, उसमें मेरे प्राण हैं। इसलिए बजाने में मेरे प्राण पूरे कभी नहीं हो सकते। बजाने में मैं सदा अधूरा हूं, अंशमात्र हूं। बजाना मेरे लिए साधन है, साध्य नहीं है। साध्य कुछ और है - भविष्य में, धन में, यश में, प्रतिष्ठा में - साध्य कहीं और है, संगीत तो सिर्फ साधन है। साधन कभी आत्मा नहीं बन पाती, साध्य में ही आत्मा अटकी होती है। अगर साध्य बिना साधन के मिल जाए, तो साधन को छोड़ दूं अभी। लेकिन नहीं मिलता साधन के बिना, इसलिए साधन को खींचता हूं। लेकिन दृष्टि, प्राण, आकांक्षा और सब घूमते हैं साध्य के निकट। लेकिन जिनको आप सुनकर आ रहे हैं, संगीत उनके लिए कुछ पाने का साधन नहीं है। आगे कुछ भी नहीं है, जिसे पाने को वे बजा रहे हैं। बल्कि पीछे कुछ है, जिससे उनका संगीत फूट रहा है और बज रहा है। कुछ पा लिया है, कुछ भर गया है, अब वह बह रहा है। कोई अनुभूति, कोई सत्य, कोई परमात्मा प्राणों में भर गया है। अब वह बह रहा है।'

अकबर कुछ समझ नहीं सका, पूछा, 'किस लिए? किस के लिए?'

तानसेन ने कहा, 'किस लिए? सारा जगत परिपूर्ण है, केवल मानव को छोड़कर, वह अधूरा है। सारा जगत आगे के लिए नहीं जी रहा है, सारा जगत भीतर से जी रहा है। फूल खिल रहा है, खिलने में ही आनंद है। सूर्य निकल पड़ा है, निकलने में ही आनंद है। हवाएं बह रही हैं, बहने में ही आनंद है। आकाश है, होने में ही आनंद है। आनंद आगे नहीं, अभी है, यहीं है।'

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

लाइक करें, सबस्क्राइब करें, परिचितों से शेयर करें।

यू ट्यूब पर सुनें :

https://youtu.be/Est7BT77qK4

शनिवार, 11 जुलाई 2026

सूतांजली जुलाई द्वितीय

 


भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को

दिव्य-दृष्टि देकर अपने दर्शन कराये।

हमारे पास वह दिव्य-दृष्टि नहीं है,  परंतु

उसे प्राप्त करने की शक्ति

अवश्य हमारे पास है

और वह शक्ति है

“श्रद्धा”

------------------ 000 ----------------------

गीता का प्रयोजन, भाव और नीति

          श्रीमदभगवद्गीता सनातन धर्म का अद्भुत ग्रंथ है। गीता ही एकमात्र ऐसा धार्मिक ग्रंथ है जो विश्व के अन्य सब धर्म ग्रन्थों से अलग एक स्वतंत्र ग्रंथ नहीं बल्कि एक अन्य ग्रंथ,  महाभारत का अंश है। कमोबेश हम सब गीता से परिचित हैं लेकिन अगर हमें संक्षेप में इस ग्रंथ की बातें बतानी हो तो प्रायः हम सब एक बार तो मौन हो जाएंगे, समझ ही नहीं पाएंगे की कहाँ से प्रारम्भ करें और कहाँ समाप्त? इसका प्रमुख कारण एक ही है कि हमने कभी इसे पढ़ने-समझने का प्रयत्न किया ही नहीं है। इधर-उधर से सुन कर बस एक धारणा बना ली और उसी से काम चला रहे हैं।

          अनेक लोग तो गीता के कुछ एक–आध श्लोक को लेकर बस उन्हें ही गीता की पूरी शिक्षा मान लेते हैं। यथा, 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन'- कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, फल या परिणाम पर नहीं, यानी निष्काम कर्म को ही गीता की पूरी शिक्षा मान लेते हैं। क्या ऐसा है?

          युद्ध प्रारम्भ होने के पहले ही कृष्ण घोषणा कर चुके थे कि न तो वे युद्ध करेंगे न ही  शस्त्र धारण करेंगे। अर्जुन निःशस्त्र कृष्ण को स्वीकार करते हैं। कृष्ण अर्जुन का सारथी बनना भी स्वीकार कर लेते हैं। यानि कृष्ण अर्जुन के पथ-प्रदर्शक और युद्ध के नेता होंगे।

          पांडवों ने अलग-अलग कारणों से युद्ध में भाग लेना स्वीकार किया था। पांडव क्षत्रिय थे और कौरवों ने उनके साथ असहनीय घोर अन्याय किया था, कौरवों ने उनके राज्य को हड़प लिया था, कौरवों ने उनकी रानी द्रौपदी का बहुत अपमान किया था, पाण्डवों ने उसका बदला लेने की शपथ ली थी। इन सब के बावजूद उन्होंने शांति के सभी उपाय किये। अपने राज्य के बदले केवल पाँच गाँवों पर समझौता करना चाहा पर उनकी वह बात भी नहीं मानी गयी और उन्हें चुनौती दी गयी जिसे क्षत्रिय होने के नाते वे टाल नहीं सके। पांडव रणक्षेत्र में पूर्ण विश्वास के साथ आए थे कि वे उचित मार्ग पर थे, वे धर्म-परायण थे, और उनके शुभ-अशुभ विचारों के अनुकूल था।

अब आती है निर्णायक स्थिति जब अर्जुन के कहने पर श्रीकृष्ण रथ को ले जाकर दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कर देते हैं। अर्जुन अपने पितामह भीष्म को, अपने धनुर्विद्या के गुरु द्रोण को, अपने मामा शल्य को इनके अलावा अपने समस्त नाते एवं रिश्तेदारों को, जिनसे  उनको परस्पर प्रेम का संबंध है, उनमें से बहुत-से अपनी इच्छा के विरुद्ध या उत्तरदायित्व की भावना से विरोधी-दल से जुड़े हुए हैं तो अर्जुन बहुत निराश हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि अर्जुन को इसकी जानकारी नहीं थी, बस इतना ही था कि इस यथार्थ पर पर्दा पड़ा था। देखते ही पर्दा उठ गया। हमारे आँखों पर भी ऐसा ही पर्दा पड़ा रहता है और यथार्थ हमें नहीं सूझता। अर्जुन देखते हैं कि इस लड़ाई में बड़ा खून-ख़राबा होगा, चाहे जो भी जीते, नर-हत्या तो बेतहाशा होगी। अर्जुन ने यह भी सोचा कि ऐसे हत्याकाण्ड के बाद, अपने पितामह और गुरु की हत्या करने के बाद अगर राज्य प्राप्त भी कर लिया तो उसका क्या उपयोग होगा? पर्दा हटते ही जीवन के बारे में, नीति के बारे में अर्जुन की दृष्टि ही बदल जाती है।

          अर्जुन सात्त्विक-राजसिक पुरुष है, सर्वोत्तम पुरुष है, सबसे अधिक नीतिवान पुरुष है, सबसे अधिक साहसी पुरुष है, सत्य की दृष्टि से मन जितना ऊँचा उठ सकता है उतने ऊँचे उठे हुए पुरुष हैं। उनके भी विचार डिग गये हैं। उनके शुभ और अशुभ के पुराने विचार असफल हो गये। अब उन्हें दो ही विकल्प दिखायी देते हैं - या तो वे कौरवों की हत्या करें या कौरव उनका अन्त कर दें। लेकिन वे हत्या नहीं करेंगे। उन्हें  "रक्त-रंजीत सिंहासन नहीं चाहिये”, वे मरने या संन्यास लेने तैयार हैं। आध्यात्मिक और नैतिक दोनों दृष्टियों से ही अर्जुन को यह युद्ध ग़लत लगने लगा। वे किंकर्तव्यविमूढ़ हैं और युद्ध न करने के लिए कृष्ण के आगे बहुत-सी युक्तियाँ रखते हैं।

          यह अवस्था केवल अर्जुन की ही नहीं, हर उस मनुष्य की होती है जो जीवन की ऐसी स्थिति में आता है जहाँ जीवन के बारे में उसकी अपनी वृत्ति हिल जाती है। ऐसी अवस्था में अर्जुन कहते हैं, "मैं  सकपका गया हूँ।" यद्यपि कृष्ण उनके मित्र हैं पर वे पहली बार कृष्ण को "आपका शिष्य हूँ"  कहते हैं मित्र नहीं और कहते हैं, "मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपकी शरण में आया हूँ, केवल आप ही मेरा पथ-प्रदर्शन कर सकते हैं, मैं सचमुच नहीं जानता कि मुझे क्या करना चाहिये।"

          कृष्ण अर्जुन को युद्ध करने के अनेक कारण बताते हैं। लेकिन अर्जुन उत्तर-प्रत्युत्तर करते हैं। श्रीकृष्ण के उत्तरों से अर्जुन पूरी तरह सन्तुष्ट नहीं होते क्योंकि श्रीकृष्ण परम सत्य प्रकट नहीं करते। अन्ततः ग्यारहवें अध्याय में कृष्ण अर्जुन को अपना विराट् रूप दिखलाते हैं। अर्जुन पहली बार अनुभव करते हैं कि उनके सारथी साक्षात् प्रभु हैं। वे कहते हैं - हे कृष्ण, हे यादव, हे मित्र आप की महिमा को न जानते हुए, मैं शायद लापरवाह रहा या प्रेम-वश ऐसा किया। हँसी-हँसी में, प्रमाद और अज्ञानवश मैंने तुम्हें मित्र, कृष्ण, यादव, पता नहीं किस-किस नाम से पुकारा, मुझे क्षमा कर दो”। पहली बार अर्जुन अनुभव करते हैं कि परम प्रभु ही उनके मित्र बने हुए थे।

ग्यारहवें अध्याय के बाद अर्जुन के प्रश्न प्रश्न नहीं रहते, अब वे तर्क नहीं करते, ज़्यादा ग्रहणशील हो जाते हैं। वे अनुभूति चाहते हैं और अन्त में इस निष्कर्ष पर आते हैं कि उन्हें जिस चीज़ की जरूरत है वह निष्काम कर्म नहीं, कर्मयोग है। कृष्ण के पूछने पर "क्या तुम्हारी अस्त-व्यस्तता चली गयी?" तो अर्जुन स्वीकार करते हैं, "हाँ, मेरी अस्त-व्यस्तता चली गयी, हे    हृषिकेश, मेरे हृदय में विराजमान, तुम मुझे जिस तरह नियुक्त करोगे उसी तरह में क्रिया करूँगा।"

          यही गीता की शिक्षा का पूर्ण रूप है। शुरू में अर्जुन अपने सखा से कहते हैं, "मैं तुम्हारा शिष्य हूँ"- और अन्त में जब सारी अस्त-व्यस्तता चली जाती है तो वे कहते हैं, "जिस भाँति नियुक्त करोगे उसी भाँति करूँगा" - दोनों स्थितियों का उत्तर एक ही है, लेकिन पहली स्थिति में उत्तर सामने खड़े हुए कृष्ण को दिया गया है और दूसरी अवस्था में हृदय में स्थित कृष्ण को। अर्जुन कहते हैं- "आप सारे समय मेरा पथ-प्रदर्शन कीजिये, छोटी-बड़ी सभी बातों में रास्ता दिखलाइये। मैं और किसी कारण से नहीं लड़ रहा, केवल आपके आदेश के अनुसार चल रहा हूँ, युद्ध के और सब कारण जा चुके हैं।"

          यह है अर्जुन का अपने मानसिक निष्कर्षों से हट कर  श्री कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण।

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

लाइक करें, सबस्क्राइब करें, परिचितों से शेयर करें।

यू ट्यूब पर सुनें :

https://youtu.be/0ANFUV3kN_Q

बुधवार, 1 जुलाई 2026

सूतांजली जुलाई प्रथम 2026


 

जो कुछ भी किया जा चुका है

वह हमेशा उस चीज़ की तुलना में कुछ  भी नहीं है

जो किया जाना बाकी है ।

------------------ 000 ----------------------

परख, अहंकार की  

          एक सेठ थे जिनका अच्छा-खासा जमा-जमाया लंबा चौड़ा व्यापार था। बच्चे बड़े हो गए थे अतः अब पूरा व्यापार वही संभालते थे। लेकिन सेठजी गद्दी में ही रहते और कुंजी उन्हीं के पास थी। बड़े सात्विक, धर्मात्मा, विनम्र और दयावान। कभी किसी ने उन्हें ऊंची आवाज में बोलते नहीं सुना। साधु-संतों का आगमन और सत्संग भी होता रहता था। किसी भी प्रकार का अभिमान उन्हें छू भी नहीं गया था। उनकी गद्दी में और दो व्यक्ति थे, एक मुनीम और एक सेवक। सेवक वृद्ध हो चला था, आखिर एक दिन नौकरी छोड़ अपने गाँव चला गया। सेठजी को परेशानी होने लगी। उन्हें एक सेवक की आवश्यकता थी। संयोग से एक युवक काम की तलाश में आया। सेठजी तो आदमी की खोज में थे ही। उन्होंने उस युवक को देखा और काम पर लगा लिया।

          लेकिन फिर अगले दिन उन्हें ख़याल आया कि मैंने बिना परखे इसे रख लिया, कहीं धोखा न दे जाये। अतः वे उसकी परीक्षा लेने लगे। यथा, रुपये गिराना, रुपये से भरे बटुए को गल्ले में बंद करना भूल जाना, कीमती समान छोड़ देना आदि। लेकिन सेवक हर परीक्षा में बिना दाग के निकलता गया। सेवक, सब उठा-उठा कर सेठ को वापस देता गया। जैसे-जैसे परीक्षा आगे बढ़ती गई सेठजी का विश्वास दृड़ तो हुआ लेकिन उनकी दुविधा भी बढ़ती गई। घर में बहुत-सी क़ीमती चीजें हैं। कोई उठा ले गया तो बेकार नयी मुसीबत खड़ी हो जायेगी। इसकी और जाँच करनी चाहिये। उधर सेवक को बात समझ आने लगी। सेठजी सब चीज़ों को बहुत सम्भाल कर रखते हैं। ऐसी लापरवाही उनसे नहीं हो सकती। उसे जो भी मिला सेठजी को सौंपता रहा। लेकिन उसे यह अच्छा नहीं लगा।

          आखिर एक दिन सेठ सोने की एक भारी चेन अलमारी के बाहर ही छोड़ गए। सेठजी ने विचार किया कि सम्भव है, अधिक प्रलोभन सामने आने पर यह फिसल जाये। अगले दिन देखते क्या हैं लड़का घर से गायब है। मन-ही-मन कहने लगे, मेरा अन्दाज़ा ठीक था, लड़का सचमुच किसी बड़ी चीज़ की फिराक़ में था। अरे, आजकल के लड़के बड़े चलताऊ होते हैं। उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। सेठजी इस ऊहापोह में थे, की उन्हें अपनी गद्दी के किनारे कुछ रखा दिखायी दिया। उत्सुकता से उठाया तो वह एक पर्चा था, जिसमें वह सोने की चेन थी और पर्चे पर लिखा था- "सेठजी, अविश्वास से विश्वास नहीं पाया जा सकता। दूसरे भी आपको परख सकते हैं।"

          सेठजी की आँखें खुल गयीं। उनका पूरा अभिमान पिघल कर बह गया। उन्होंने उस युवक को बहुत ढूँढ़ा, पर वह तो उनकी पहुँच से बाहर जा चुका था। उसने परखने वाले को ही परख लिया था।

          अहंकार के अनेक स्वरूप होते हैं। ये अपना रंग बदलते रहते हैं। इससे बचना आसान नहीं। अगर आप सोच रहे हैं कि आपने अहंकार को जीत लिया है, उसे मार डाला है तो समझ लीजिये, अहंकार मरता नहीं केवल रूप बदलता है - 

हाँ,

अहंकार मरता नहीं है,

पहले वह आध्यात्मिक बनाता है,

पहले वह कहता था मैं दूसरों से अधिक सफल हूँ,

फिर वह कहने लगता है मैं दूसरों से अधिक जागरूक हूँ।

पहले

उसे धन पर गर्व था,

अब उसे त्याग पर गर्व है।

पहले उसे शरीर सुंदर चाहिए था

अब उसे व्यक्तित्व पवित्र दिखाना है।

पहले वह संसार को प्रभावित करना चाहता था

अब वह साधकों को प्रभावित करना चाहता  है।

नाम नया हुआ पर गांठ वही रही।

गीता इसे बहुत तीक्ष्ण शब्दों में पकड़ती है – मिथ्याचार।

बाहर इंद्रियाँ संयमित दिखें पर

भीतर मन विषयों में घूमता रहे,

तो वह साधना नहीं

वह सजाया हुआ पाखंड है।

और सोलहवें अध्याय में श्रीकृष्ण

दंभ, दर्प और अभिमान को

आसुरी संपदा में रखते हैं।

शंकर इसको एक शब्द में पकड़ते हैं –  धर्मध्वजारोहणम

धर्म का ध्वज उठाना बिना धर्म के।

क्योंकि अहंकार केवल भोग से नहीं बढ़ता  

त्याग की कथा सुनाकर भी बढ़ता है।

ध्यान से  देखें,

हमें मुक्ति चाहिए, या

मुक्त दिखने का सुख?

हमें मौन चाहिए या ऐसा मौन

जिसे लोग गहराई समझें।

हमें सत्य चाहिए या

आध्यात्मिक पहचान।

अहंकार का सबसे सूक्ष्म स्वरूप वही है,

जहां वह स्वयम को भी

अहंकार मानने से भी अस्वीकार कर दे।

साधना तब प्रारम्भ होती है

जब भीतर यह दिख जाए जो स्वयं को

पवित्र सिद्ध करना चाहता है

वही अहंकार है।

          भले ही अहंकार को पूरी तरह जीत न पाएँ,

                    उसे जीतने का प्रयत्न तो अविराम चलना ही चाहिए।

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

लाइक करें, सबस्क्राइब करें, परिचितों से शेयर करें।

यू ट्यूब पर सुनें :

https://youtu.be/RvnIUIqD0gQ

गुरुवार, 11 जून 2026

सूतांजली जून द्वितीय 2026

 


जो होना है वो होकर रहेगा,

जो नहीं होना है वो नहीं होगा।

------------------ 000 ----------------------

सब तय है, फिर... ?

हमारी जिंदगी का हर पल  पहले से तय है। अगर सब पहले से तय है, तो फिर कोशिश क्यों? और अगर कोशिश जरूरी है तो यह कैसे मानें कि सब पहले से तय है। तो आखिर सच क्या है?

जीवन न ही पूरी तरह भाग्य है और न ही पूरी तरह हमारे नियंत्रण में। जीवन इन दोनों के बीच का एक गहरा संतुलन है। कैसे?

एक सरल अनुभव लेते हैं। हम सब ने जीवन में महसूस किया है कि हम किसी काम में पूरी मेहनत करते हैं लेकिन परिणाम वैसा नहीं मिलता जैसा हम चाहते थे। और कभी ऐसा भी हुआ होगा कि बिना ज्यादा कोशिश के ही सब कुछ हमारे पक्ष में हो गया। यही अनुभव हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या सच में मैं सब कुछ कर रहा हूं या फिर कोई अदृश्य अपनी समझ से सब कुछ चला रहा है?

हम केवल परिणाम के लिए नहीं जी रहे। हम उस प्रक्रिया के लिए जी रहे हैं जो हमें हर दिन बदलती है। हम कोशिश करते हैं, हम निर्णय लेते हैं, लेकिन यह कोशिश करने की इच्छा कहां से आती है? करने की ऊर्जा कहाँ से आती है? हम कभी बिना रुके काम करने लगते हैं और कभी कुछ करने मन ही नहीं करता। इसका चुनाव मैंने किया या किसी और ने? हम ईमानदारी से देखें तो समझ आएगा कि बहुत कुछ अपने आप हो रहा है। मतलब यह कि अगर कुछ करने की इच्छा उठती है तो हम करेंगे ही और अगर नहीं उठती तो हम चाहकर भी नहीं कर पाएंगे।

अब अगर कोशिश भी तय है तो फिर कोशिश करने का मतलब क्या है? क्योंकि, अगर हम यह सोच कर बैठ जाते हैं तब हम जीवन को जी ही नहीं पाएंगे। हम केवल इंतजार करने में ही सारा जीवन निकाल देंगे। हम जब कोई खेल खेलते हैं तब पूरी कोशिश करना ही असली अनुभव है। अगर हम यह सोचकर खेलना छोड़ दें कि अंत तो तय है, तब हम उस खेल को कभी जी ही नहीं पाएंगे। जीवन भी ऐसा ही है। हो सकता है अंत पहले से तय हो। लेकिन उस अंत तक पहुंचने  का अनुभव हमारी कोशिश से ही बनता है। कोशिश का मतलब यह है कि हम उस पल को पूरी तरह जी पाएंगे।

जब हम पूरी ईमानदारी से काम करते हैं तो हमारे भीतर एक संतोष पैदा होता है जो परिणाम से जुड़ा नहीं होता और जब हम कोशिश नहीं करते तो भीतर एक खालीपन रह जाता है। हमारी कोशिश भी उसी कहानी का हिस्सा है जो लिखी जा चुकी है। हम उसे बदलने नहीं, उसे जीने आए हैं। कोशिश ही वह तरीका है जिससे हम इसे जीते हैं, इसे महसूस करते हैं, इसे अर्थ देते हैं। हम परिणाम को नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन उस रास्ते को जी सकते हैं जो हमारे सामने है।

कुछ करो, खुद को साबित करो? यही संघर्ष हमें थका देती है। समस्या कोशिश में नहीं उस बोझ में है जो हम कोशिश के साथ जोड़ देते हैं। कोशिश के साथ डर भी रखते हैं - अगर हार गया तो? यही डर हमारी कोशिश को भारी बना देता है, हमें जल्दी थका देता है। जब हम किसी काम को सिर्फ करने के लिए करते हैं तब पूरे ध्यान से करते हैं, एक अलग ही शांति होती है। लेकिन, जब काम को उसके परिणाम से जोड़ देते हैं तब तनाव शुरू हो जाता है।

 परिणाम हमारे हाथ में नहीं है लेकिन प्रयास हमारे अनुभव में है। जब हम कोशिश करते हैं और हर पल परिणाम के बारे में सोचते रहते हैं। तब ध्यान वर्तमान से हट कर भविष्य में चला जाता है और यही हमें कमजोर बना देता है। लेकिन जब हम पूरी तरह उस पल में रहते हैं तो उसमें डूबे रहते हैं और हमारी कोशिश भी मजबूत रहती है और मन शांत रहता है। अतः कम प्रयास में भी आगे बढ़ जाते हैं क्योंकि परिणाम के डर में नहीं फंसे होते। जो हर पल डर में जी रहे होते हैं, वे टूट भी जाते हैं क्योंकि वे हर पल खुद को जज कर रहे होते हैं। हम हर चीज को परिणाम  से जोड़ देते है और वहीं आनंद खत्म होने लगता है। यही जीवन के साथ भी हो रहा है। हम जी नहीं रहे, बस लगातार हिसाब लगा रहे हैं - क्या मिलेगा? कहां पहुंचूंगा? लोग क्या सोचेंगे? और सारी ऊर्जा खत्म।

          अब, अगर सब पहले से तय है तब हमारी कोशिश भी तय है? लेकिन हमारे पास एक आजादी है। हम अपना जीवन कैसे जीते हैं? बोझ बनाकर या एक अनुभव बनाकर, एक दबाव के साथ या खेल बना कर। फर्क बाहर नहीं अंदर है, हमारे देखने के तरीके में है। कोशिश छोड़नी नहीं है, बल्कि कोशिश करने के तरीके को बदलना है। कोशिश डर के साथ नहीं समझ के साथ करनी है। परिणाम में नहीं प्रक्रिया में जीना है। हम वही काम करते हैं लेकिन थकते नहीं क्योंकि अब ध्यान केवल करने पर है ना कि फल पर। कोशिश ही हमारा अनुभव है, उसे बोझ बनाना हमारी गलती है। कोशिश करो, उसमें डूब जाओ, उसे जियो ना कि उसे ढोओ।

 पहले काम बोझ था, डर था, चिंता थी। लेकिन अब एक हल्कापन आ जाता है। पहले कोशिश में बेचैनी थी, अब उसी में शांति होती है। बाहर सब कुछ वही दिखता है लेकिन भीतर सब कुछ बदल जाता है। हम कमजोर नहीं होते स्पष्ट हो जाते हैं। वही करते हैं जो उस पल सही लगता है। यही असली स्वतंत्रता है।

परिस्थितियां बदलती रहती हैं। कभी सफलता आती है, कभी असफलता। लेकिन हमारे भीतर का संतुलन बना रहता है। अब जीवन एक संघर्ष नहीं यात्रा बन जाती है। हमारे रिश्ते भी बदल जाते हैं। हम लोगों से जुड़ते हैं लेकिन उनसे उम्मीदों का बोझ नहीं ढोते।

अगर सब पहले से तय है तो कोशिश क्यों? क्योंकि कोशिश ही जीवन का हिस्सा है, उसे बोझ बनाना हमारी नासमझी है। हमें कुछ साबित नहीं करना था, केवल इस पूरे खेल को समझना था और जैसे ही यह समझ आती है, एक गहरी शांति पैदा होती है। जीवन चलता रहेगा कोशिश चलती रहेगी, लेकिन अब हम उसके साथ बह रहे हैं  उसके खिलाफ नहीं, यही असली आजादी है, यही असली जीवन है।

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

लाइक करें, सबस्क्राइब करें, परिचितों से शेयर करें।

यू ट्यूब पर सुनें :

 https://youtu.be/KDChSNCEbfU

सोमवार, 1 जून 2026

सूतांजली जून (प्रथम) 2026

 


निर्माण और विध्वंस

युग-युगान्तरों में जब भी पृथ्वी पर नयी सृष्टि का या नयी चेतना का आविर्भाव हुआ, हमेशा ही उसमें पुरातन के विलय और विनाश की अवस्था रही है। शिव-नाट्य के दो स्वरूप हैं, सृष्टि का आनन्द और साथ ही विनाश का उल्लास - लास्य और ताण्डव, निर्माण और विध्वंस - दोनों ही आज तक समान रूप से आवश्यक रहे हैं- एक दूसरे के पूरक।

विनाश का अर्थ है अनावश्यक, अनुपयुक्त, उस सब का विनाश जो नये आगमन को स्वीकार करने से इनकार करता है, उसमें बाधा डालता है, उसके निषेध का प्रयत्न करता है - उस सब का जो अवश्यम्भावी नये भविष्य के साथ सामञ्जस्य में नहीं है। पृथ्वी का विकास प्रगति-क्रम का अभियान है - अगर कोई उसकी गति के साथ-साथ चलने में असफल होता है तो उसे रास्ते से हटना होगा, नहीं तो उसे हटा दिया जायेगा ताकि दूसरे आ रहे कदमों के लिए जगह बनायी जा सके।

अगर कोई उस पुरातन सृष्टि में हो या कम-से-कम उससे प्रेम करता हो, उससे जुड़ा हुआ हो, तो ध्वंस पीड़ादायक हो जाता है, यहाँ तक कि उसके लिए वह भय-जन्य और ग्लानि-जन्य हो जाता है। पर अगर उसके अन्दर नवीन के लिए आकांक्षा है, तब वह इस ध्वंस की आवश्यकता को अनुभव करता है और काम की अविलम्ब पूर्ति के लिए इसका स्वागत करता है, वह उस विध्वंस के उल्लास का आनन्द लेता है। कम-से-कम शिव तो लेते हैं, दिव्य शक्ति तो लेती है।

वास्तव में यही इस समय विश्व में घटित हो रहा है। महाकाली ने तैयारी की विनाश और विलय का - अपना कार्य प्रारम्भ कर दिया है ताकि महालक्ष्मी और महासरस्वती का मार्ग प्रशस्त हो सके। महेश्वरी के अपार प्रेम और करुणा ने इस कार्य को स्वीकृति दी है, इसे समर्थन दिया है। वह नयी सृष्टि, वह नया जगत्, जिसका निर्माण दिव्य ने किया और जिसे वे इतने अधिक प्रेम और सावधानी से अब भी बना रहे हैं, तैयार हैं - प्रकट होने के लिए, भौतिक क्षेत्र में अपने उद्घाटन के लिए तैयार हैं। लेकिन मनुष्य अभी तैयार नहीं है, वह अब भी इससे इनकार करता है, अब भी ऐसे लोग हैं जो अपने पुरातन मृत जगत् को पकड़े हुए हैं  - और बहुत कस कर पकड़े हुए हैं - वह धूर्तता के इस खेल से प्रेम करते हैं। उन्हें इसमें अपने अस्तित्व का नाश दिखता है।  शायद सत्य उसकी अहंकारपूर्ण प्रकृति और दुर्बोध बनावट से वह इनकार करता है, उस नयी चेतना, नयी वास्तविकता में जितना अधिक हो सकता है बाधा पहुँचाता है। दिव्य ने अपने असीम प्रेम के कारण इस इनकार को अपने ऊपर लेने का प्रयत्न किया, अधिक-से-अधिक तत्त्वों को बदलने की, उनमें विश्वास पैदा करने की कोशिश की - फिर, जब इससे अधिक नहीं किया जा सका तो उन्होंने कार्यक्षेत्र को अपने दूसरे रूप के लिए छोड़ दिया ताकि वह इस अपरिहार्य कार्य को कर सके पुराने कठोर जगत् को तोड़ने के कार्य को। यह एक आवश्यकता है पृथ्वी के और मनुष्य के भी अन्तिम श्रेयस् के लिए।

कार्य आरम्भ हो चुका है - इसे शिव का नर्तन, ताण्डव कहो या माता काली का प्रचण्ड नर्तन - यह आरम्भ हो चुका है और तीव्र और तीव्रतर गति से अपने मार्ग पर बढ़ रहा है। विनाश, विलय, विघटन - हाँ, यह प्रथम परिणाम है और हम अब इसे प्रत्यक्ष देख रहे हैं और इसमें भाग ले रहे हैं, चाहे हम इसे पसन्द करें अथवा नहीं। यह परम प्रभु का निश्चय है - इसे घटित होना ही है। वे जो सत्य से जुड़े हुए हैं बचे रहेंगे, वे जो मिथ्या के साथ मैत्री करेंगे नष्ट हो जायेंगे - मनुष्य के पास चुनने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है, सचेतन रूप से या अचेतन रूप से। यह एक अपरिहार्य स्थिति है, जो सत्य के आकांक्षी हैं, उन्हें दुःख या शोक करने की कोई आवश्यकता नहीं।

अगली अवस्था स्वभावतः मलबा साफ़ करने की होगी - एक पूरी सफ़ाई - उस सब का विलोपन जो सत्य के विरुद्ध था, मृत जगत् का ध्वंसावशेष, वह क्षेत्र - वहाँ से वह सब कुछ साफ़ किया जायेगा जो गन्दा और मलिन है। क्योंकि केवल तभी नयी वास्तविकता आगे आने में समर्थ होगी, दिव्य का कार्य पूरा होगा।

नयी सृष्टि पहले ही विद्यमान है - अपना रूप ले रही है - इस समय जो कुछ भी घट रहा है, वह इसीलिए घट रहा है ताकि नयी सृष्टि जल्दी-से-जल्दी सम्मुख आ जाये। वे बाहरी ढाँचे को तोड़ रही हैं जिसके अन्दर नयी वास्तविकता स्थापित हो चुकी है। इसे एक मुर्दा खोल कह सकते हैं जिसे तोड़ा जा रहा है ताकि नयी वास्तविकता बाहर आ सके। यह दिव्य ने अपना 'छिन्नमस्ता' रूप धारण किया है। जो कुछ भी वे नष्ट कर रही हैं वे उनके अपने ही अंश हैं - वे मानों, अपने ही शरीर के पुराने अनुपयोगी अंगों से पीछा छुड़ा रही हैं।

श्रीअरविन्द के शब्दों में कहें तो:

“मुहूर्त कई बार बड़ा भयावह होता है, एक अग्नि और एक चक्रवात और एक तूफ़ान, ईश्वर के कोप के कोल्हू का चलना; पर जो इस घड़ी में अपने प्रयोजन के सत्य पर खड़ा रह सकता है, वह है जो खड़ा रहेगा; अगर वह गिर भी जायेगा, तो पुनः उठ खड़ा होगा; अगर वह हवा के पंखों पर ग़ायब होता लगेगा, तो भी वह लौट आयेगा।"                                                                                                                                                                - नलिनिकांत गुप्त

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

लाइक करें, सबस्क्राइब करें, परिचितों से शेयर करें।

यू ट्यूब पर सुनें :

https://youtu.be/AkGUUg96oK4

सूतांजली, अगस्त द्वितीय 2026, आकर्षक घर की कुंजी

  २कोई ऐसा अक्षर नहीं है, जिसका प्रयोग मंत्र-रचना में न हो सके , कोई ऐसा वृक्ष नहीं है, जो किसी न किसी व्याधि की औषधि न हो , कोई ऐसा...