पुराने आख्यान नये विज्ञान
स्वामी कृष्णानंदजी का कथन है कि जब भी आप
किसी विचार को वह 'अच्छा' हो या 'बुरा' अपनी मानसिक सहमति प्रदान करते हैं, तो आप उससे सम्बंधित हो जाते हैं। वह आप के सचेतन मन का भाग बन जाता है और
उस विचार को आप अपने जाने-माने विचार की तरह जब-तब अनजाने में दुहराने लगते हैं।
जब आप कथा-वार्ता सुनते हैं या कोई
धर्म-ग्रंथ पढ़ते हैं तो आप उन विचारों को जितनी सहमति देते हैं,
उसी अनुपात में वे विचार आप के हो जाते हैं और उसी अनुपात में उनसे
आप को लाभ मिलता है।
इस नियम का एक दूसरा पक्ष भी है। जब आप
सुने या पढ़े हुए अन्याय, क्रूरता का यह सोच कर मानसिक रूप से समर्थन करते
हैं कि, अच्छा हुआ बदला लिया, तो आप के
एक शब्द बोले बिना भी, यह कृत्य आप का साथी हो जाता है और वह
आप के जीवन का अंग बन जाता है ।
मानसिक सहमति बड़ी सशक्त है।
किसी भी दुर्मति या ऋणात्मक विचार से
अपने को किसी भी अवस्था में संबंधित मत कीजिए। किसी दुर्मति या ऋणात्मक विचारों
वाले से, जाने या अनजाने भी संबंध ही नहीं वार्तालाप भी
आपके विचारों, शब्दों को प्रभावित करता है, उनसे भी दूरी बनाये रखिये। इस प्रकार आप अपनी अंतरात्मा की निर्मलता और
पवित्रता तथा भाषा की शालीनता को कायम रख सकेंगे।
आप के चारों और सत्य और सौंदर्य का समुद्र लहरा रहा है। अपने आप को
इससे सम्बंधित करने की आदत बनाइए, इसे ही आप अपनी
मानसिक सहमति प्रदान कीजिए।
भागवत में पांडवों के वशंज महाराज परीक्षित की कथा आती है।
वे एक धर्मपरायण,
न्यायप्रिय एवं सात्विक प्रकृति के जनप्रिय राजा थे। संत समाज में उनकी प्रतिष्ठा थी और उनका नाम आदर और सम्मान से
लिया जाता था। लेकिन इसके बावजूद दुर्मति के कारण उन्हें ऋषि-पुत्र के कोप का भाजन
होना पड़ा।
एक बार राजा परीक्षित मृगया पर हरिण के
पीछे दौड़ते-दौड़ते विश्रांत हो गए। भूखे-प्यासे जब जल के लिए चारों तरफ नजर घूमाते
लौट रहे थे उनकी नजर शमिक ऋषि कि कुटिया पर पड़ी। अंदर प्रवेश किया और ऋषि से जल
प्रदान करने की याचना की। लेकिन ध्यान मग्न होने के कारण ऋषि को न राजा के आगमन का
भान हुआ और न ही उन्हें राजा की याचना सुनाई पड़ी। राजा परीक्षित खिन्न हो गए, उन्हें बुरा-भला कहा और कुटी से निकल पड़े। लेकिन
तभी उन्हें वहाँ एक मारा हुआ साँप दिखाई पड़ा और दुर्मति से अपने धनुष की नोक से उस
साँप को उठा कर ऋषि के गले में डाल वहाँ से प्रस्थान किया।
उनके प्रस्थान के पश्चात ऋषि-पुत्र, शृंगी ऋषि का कुटी में आगमन होता है, पिता के गले में मरे हुए साँप को देख कर उनकी त्योरियां चढ़ जाती है और ऐसा
कृत्य करने वाले की सातवें दिन तक्षक के डँसने से मृत्यु हो जाने का श्राप देता
है। फलस्वरूप राजा परीक्षित की सातवें दिन तक्षक के डँसने से मृत्यु हो जाती है।
परीक्षित जैसे धर्मपरायण राजा से ऐसे
व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जा सकती। फिर, ऐसा क्यों हुआ? एक बार परीक्षित ने कलि से
वार्तालाप किया था। राजा परीक्षित ने कलि को देखते ही तत्क्षण धनुष पर तीर का
संधान किया। लेकिन कलि ने उनके पैर पकड़ लिए और उनसे प्राणों की भिक्षा मांगने लगा।
इस दौरान राजा परीक्षित का कलि से वार्तालाप हुआ। परम पूज्य स्वामी गोविंददेव गिरि जी भागवत कथा
के दौरान बताते हैं कि एक दुर्मति से वार्तालाप का ही यह परिणाम था कि धर्मपरायण
राजा परीक्षित से यह जघन्य कार्य हुआ।
किसी भी अवस्था में किसी भी प्रकार की दुर्मति
या ऋणात्मक विचार से अपने को संबंधित मत कीजिए। आप के चारों और सत्य और सौंदर्य का
समुद्र लहरा रहा है, डुबकी
लगानी है तो उसी में लगाये।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
लाइक करें, सबस्क्राइब करें,
परिचितों से शेयर करें।
यू ट्यूब पर सुनें :
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें