क्या आप मानते हैं कि अनेक लोग ‘नून, तेल, लकड़ी’ के चक्कर में वह नहीं कर सके जो वे करना चाहते थे और उनमें कुछ करने की काबिलियत भी थी? अगर उन्हें दैनिक जीवन की जद्दोजहद से छुटकारा मिला होता तो वे भी उन सब की बराबरी या उनसे अच्छा कर सकते थे जिन्होंने काफी कुछ हासिल किया, नाम कमाए, पुरस्कार पाये, सम्मान मिला और एक सफल संतोषप्रद जीवन यापन कर सके। ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं जो यह मानते हैं कि वे एक सच्चा जीवन जीना चाहते थे, साधना करना चाहते थे, ऐसे जीवन के प्रति उनके मन में बड़ी उत्कंठा थी, लेकिन जीवन की वास्तविकताओं ने उन्हें जंजीरों में बांध दिया और पूरा जीवन उन जंजीरों से ही जूझते रहे।
लेकिन अगर
जरा गहराई से विचार करें तो हम पाएंगे कि यह सच्चाई नहीं है। वे सब जो मील के
पत्थर बने उनके जीवन में भी अनेक कठिनाइयाँ थीं, बंधन थे, हथकड़ियाँ
थीं, मजबूरियाँ थीं लेकिन वे डिगे नहीं। जीवन की हर
जिम्मेदारियों को बखूबी निभाते रहे लेकिन
निगाहें हर समय लक्ष्य पर बनी रही, उसके प्रति सजग
बने रहे, और अंत में मंजिल हासिल कर ली।
पांडिचेरी
की माताजी ने एक बार कहा,
“अपने
इस वर्तमान प्राथमिक अस्तित्व के शुरू से ही मैं ऐसे कई व्यक्तियों के सम्पर्क में
आई जो कहा करते थे कि उनमें एक अधिक गहन और सच्चे जीवन के प्रति बहुत अभीप्सा और
उत्कंठा है। लेकिन वे जीवन निर्वाह के लिये उपार्जन की कठोर आवश्यकताओं से गुलामों
की तरह बंधे हैं और यह बोझ उनकी तमाम शक्ति और समय को इतना खींच लेता है कि वे कुछ
और कर पाने में, किसी अन्य महत्वपूर्ण कार्य के लिये न समय पाते हैं, न समर्थ रह पाते हैं। यह मैंने कई लोगों को कहते सुना था और
उनकी दीन हालातों को देखा था जो जिम्मेदारियों के कारण हो गई थीं।
मैं
उस समय बहुत कम उम्र की थी और उनकी बातें सुनकर अपने से कहा करती थी कि यदि मैं
कभी कर सकी तो एक छोटा सा जगत ऐसा निर्माण करने की कोशिश करूँगी जहाँ लोग अपने
खाने, पहनने, ओढ़ने की जो अनिवार्य आवश्यकताएं हैं उनमें व्यस्त नहीं रहेंगे और तब मैं देखूँगी कि
उनकी शक्ति इन आवश्यकताओं से मुक्त रहकर दिव्य जीवन और अपने आंतरिक उपलब्धि की ओर
उन्मुख होती है या नहीं। और अपने जीवन के मध्य काल में मुझे ये साधन प्राप्त हुए
और मैंने उस स्थितियों का निर्माण करने का अवसर पाया जो जीवन यापन करने की ठोस जरूरतों
को पूरा करने के बोझ से मुक्त थी और मैं इस निष्कर्ष पर पहुंची कि वस्तुतः यह
जीवनयापन की बेबसी नहीं है जो लोगों को आंतरिक खोज, आत्म साक्षात्कार और महान अभीप्सा से रोकती है वरन् यह एक
तमस भाव, शिथिलता और आलस्य है, तथा "मुझे परवाह नहीं" वाला दृष्टिकोण है जो
उन्हें उच्च जीवन की ओर बढ़ने से रोकता है। मैंने यहाँ तक अनुभव किया कि जिन्होंने
जीवन की कठोरतम अवस्थाओं को झेला है और उनका सामना किया है उनमें गहन अभीप्सा और
जागरूकता रही है। लेकिन मैं उस समय की प्रतीक्षा में हूँ जब लोगों में अनुकूल
स्थितियों में सच्ची भावना जागेगी और वे अपने लापरवाह दृष्टिकोण से उभरकर उच्च
जीवन के प्रति उन्मुख होंगे।”
एक बार
अपने आस-पड़ोस पर, परिचितों पर निगाह घूमा कर देखिये आप देखेंगे ऐसा कोई नहीं जिन्हें दैनिक
जीवन से जूझना न पड़ा हो। लेकिन ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो विपरीत परिस्थितियों
से जूझते रहे, उन्हें अपने अनुकूल बनाया, मंज़िलें हासिल कीं और अपना परचम लहराया।
आप भी कर
सकते हैं, बस अपना दृष्टिकोण बदलो।
लक्ष्य स्पष्ट रखो, आँखों से ओझल होने मत दो, अपनी जिम्मेदारियों को संभालते हुए लक्ष्य प्राप्ति के लिए लगनशील रहो। तुम में दम है, कर सकते
हो। आज का दिन सबसे खराब नहीं सबसे अच्छा है। यही नहीं, आज
के बाद कल फिर एक दिन है। फिर देर किस बात की, अपनी
शक्तियों को पहचानो, उठो अपने सपनों को पूरा करो।
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