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बुधवार, 1 दिसंबर 2021

सूतांजली दिसंबर 2021

 सूतांजली

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वर्ष : ०५ * अंक : ०५                      🔊 (24.30)                                         दिसम्बर   * २०२१

बिना समर्पण के पूर्णता प्राप्त नहीं होती,

बिना लगन के उपलब्धि नहीं होती

बिना त्याग के रचना नहीं होती

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यह या वह                                                              मेरे विचार

मानव दो दुविधाओं के मध्य पिसता रहता है। यह या वह, ये या वो, इधर या उधर? हाँ या ना? ऐसे प्रश्न उसके जीवन में प्रत्येक दिन आते हैं जिनका उसे उत्तर देना होता है, उसे दो में से एक का चुनाव करना होता है, दो में से एक निर्णय लेना पड़ता है। गुरु की आवश्यकता होती है केवल सही निर्णय लेने के लिए नहीं बल्कि सही निर्णय लेने की प्रक्रिया को समझने के लिए ।  बिना किसी भेद-भाव के, बिना व्यक्तिगत लाभ के, गुरु व्यक्ति को निर्णय लेने में सहायक ही नहीं होता बल्कि उसका परिचय सही निर्णय लेने की प्रक्रिया  से भी करवाता है। एक बार प्रक्रिया समझ आ गई तो प्रश्न शनै:-शनै: कम होने लगते हैं, स्वयं निर्णय लेने की क्षमता का भी विकास हो जाता है।

          गीता के पन्ने पलटें, अर्जुन भी इसी मोह से ग्रस्त है। हर समय वह दो-राहे पर खड़ा है और यह निर्णय नहीं ले पा रहा है कि उसके लिए उत्तम मार्ग कौन-सा है। अपनी तार्किक बुद्धि से उसे गलत मार्ग ही सही लगता है। श्रीकृष्ण एक गुरु की भाँति उसे प्रक्रिया समझा कर उसे सही मार्ग दिखा रहे हैं। गीता का प्रारम्भ ही यहीं से है – युद्ध करूँ या उससे विमुख हो सन्यास लूँ? तीसरे अध्याय में अर्जुन का प्रश्न है कि अगर कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ है तब कर्म में क्यों लगूँ? पाँचवें अध्याय में अर्जुन को शंका है कि जब श्रीकृष्ण एक तरफ कर्मों के सन्यास की बात करते हैं तो फिर कर्मयोग की प्रशंसा क्यों कर रहे हैं? दोनों में कौन-सा उसके लिए कल्याणकारी है? बारहवें अध्याय तक पहुँचते-पहुँचते अर्जुन के अनेक प्रश्नों के उत्तर दे दिये गये हैं, अर्जुन प्रक्रिया समझने लगा है। अब उसे दो में कौन-सा श्रेष्ठ है इसकी जिज्ञासा पैदा हो गई है। अतः अब उसकी जिज्ञासा है कि सगुण और निर्गुण रूप भजने वाले उपासकों में योग वेत्ता कौन है? और फिर अंतिम अध्याय में अर्जुन जिज्ञासा करता है कि संन्यास और त्याग में क्या फर्क है?

          हम अपने जीवन में पग-पग पर ऐसे ही दो-राहे पर खड़े होते हैं। हमें एक मार्ग का चयन करना पड़ता है। जब हमने अपनी प्रवृत्ति के अनुसार सही या गलत मार्ग का चयन किया तब हमारा ही वह निर्णय हमें जीवन में सुख या  दुःख, शांति या अशांति के मार्ग पर आगे ले चलता है।  


 

         कौन-सा मार्ग चुनें, तपस्या का या समर्पण का? बहुधा यह प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने इस शंका का समाधान बहुत ही सरल भाषा में एक उदाहरण के माध्यम से समझाया है।  श्रीरामकृष्ण कहा करते थे, तुम बन्दर के बच्चे और बिल्ली के बच्चे, इन दोनों में से किसी एक के मार्ग का अनुसरण कर सकते हो। 

बन्दर के बच्चे को इधर-उधर जाने के लिए अपनी माँ की छाती से चिपकना पड़ता है, उसे अपनी माँ को कस


कर पकड़े रहना पड़ता है और यदि कहीं उसकी मुट्ठी ढीली हो जाये तो वह गिर जाता है। यहाँ पूरा उत्तरदायित्व बच्चे पर है माँ पर नहीं। दूसरी ओर, बिल्ली का बच्चा अपनी माँ को नहीं पकड़ता, बल्कि माँ ही उसे पकड़े रखती है, इसलिए उसे न कोई भय होता है, न उसका कोई उत्तरदायित्व; उसे तो बस केवल इतना ही करना है कि अपनी माता को पकड़ने दे और "माँ-माँ" करता रहे। यहाँ बच्चे का कोई उत्तरदायित्व नहीं है, सब दारोमदार माँ पर ही है।

          श्रीमाँ कहती हैं, योग-साधना के दो मार्ग हैं, एक है तपस्या का और दूसरा है समर्पण का। तपस्या का मार्ग दुष्कर है, इस मार्ग में तुम सर्वथा अपने ऊपर ही निर्भर रहते हो, अपने निजी सामर्थ्य से ही आगे बढ़ते हो। तुम अपनी शक्ति के अनुपात में ही ऊँचे उठते हो और उसी के अनुसार फल पाते हो। इस मार्ग में नीचे गिरने का भय हमेशा लगा रहता है। और एक बार गिरे तो तुम गहरी खाई में जाकर चूर-चूर हो जाओगे और इसका इलाज शायद ही हो सके। परन्तु दूसरा मार्ग, समर्पण का मार्ग, निरापद और निश्चित है। परन्तु शिक्षित लोगों को इसमें कठिनाई होती है। उन्हें यह शिक्षा मिली है कि वे उन सभी चीज़ों से डरें और बचें - जो उनकी व्यक्तिगत स्वाधीनता पर आँच लायें। व्यक्तित्व की भावना उनकी घुट्टी में मिली होती है। और समर्पण का अर्थ है इस सब का त्याग। इस समर्पण-मार्ग को यदि तुम पूर्ण रूप से और सच्चाई के साथ अपना लो तो कोई गम्भीर कठिनाई या कोई खतरा नहीं रहता। प्रश्न केवल सच्चाई का है

          समर्पण का अर्थ? किसका समर्पण? किसको समर्पण? श्री अरविंद कहते हैं “समर्पण का अर्थ है अपने अन्दर की प्रत्येक चीज को भगवान के  हाथों में अर्पित कर देना, जो कुछ हम हैं और हमारे पास है सब कुछ उत्सर्ग कर देना, अपने ही विचारों, कामनाओं, अभ्यासों आदि  पर आग्रह न करना, बल्कि दिव्य सत्य को ऐसा अवसर देना कि वह उनके स्थान में अपने ज्ञान, संकल्प और कर्म को सर्वत्र स्थापित कर दे।



          श्रीमाँ कहती हैं, “सबसे महत्वपूर्ण है तुम्हारे चरित्र का समर्पण, तुम्हारी जीवन शैली विधि का समर्पण, ताकि वह बदल सके। यदि तुम अपनी एकदम निजी  प्रकृति का समर्पण न करो तो यह प्रकृति कभी परिवर्तित नहीं होगी।...सच पूछा जाये तो मनुष्य जो कुछ करता है वह नहीं, बल्कि अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वह क्या है। कार्यकलाप चाहे जो हो, वास्तव में कार्य जिस तरह किया जाता है वह नहीं, बल्कि चेतना की जिस स्थिति में वह किया जाता है वह महत्त्वपूर्ण है।

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ऐ सुख तू कहाँ मिलता है ?                                               मेरे विचार

 

ऐ सुख, तू कहाँ मिलता है?

क्या तेरा कोई पक्का ठिकाना है? क्यों बन बैठा है अंजाना?

आखिर क्या है तेरा ठिकाना?

कहाँ-कहाँ ढूँढा तुझको, पर तू न कहीं मिला मुझको।

ढूँढा ऊँचे मकानों में, बड़ी-बड़ी दुकानों में,

स्वादिष्ट पकवानों में, चोटी के धनवानों में,

वे भी तुझको ही ढूँढ रहे थे, बल्कि, मुझ से ही पूछ रहे थे। 

क्या आपको कुछ पता है? ये सुख, कहाँ रहता है?  ..........

         कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना ही है कि है हर कोई, अमीर हो या गरीब, छोटा हो या बड़ा, सुख ढूँढ रहा है हर जगह ढूँढ रहा है। और इस ढूँढने में सब इतने मशगूल हैं कि उस जगह को छोड़ आये जहाँ सुख रहता था।

          मेरी गली की नुक्कड़ पर एक दुकान है। रोज़मर्रा की वस्तु वहाँ मिल जाती है। दुकान इतनी ही बड़ी है कि उसमें एक बार में सिर्फ एक ही आदमी घुस सकता है। हम अपनी हर चीज सड़क पर ही खड़े रह कर खरीदते हैं। मैं भी यदा-कदा खरीददारी कर लिया करता हूँ। छोटे बच्चे उसके नियमित ग्राहक हैं। वहाँ से खरीदने के लिए उन्हें न किसी के साथ की जरूरत है और न पैसों की। अकेले चले जाते हैं और मनोज, दुकान का मालिक, जानता है कि पैसे तो मिल हो जायेंगे। अभी कोरोना के प्रथम लहर के समय आते-जाते उससे थोड़ा बतिया लिया करता था। उस दिन सुबह-सुबह उधर से जा रहा था। मनोज बस दुकान खोल ही रहा था। मुझे देख रुक गया, कैसा समय आ गया है अंकल !’ मुख्य मंत्री ने पिछले सप्ताह ही हर सप्ताह किसी भी 2 दिन के पूर्ण लॉक डाउन का ऐलान किया था। चंद सप्ताह पहले ही उससे बात हो रही थी तब उसने बताया था कि बिक्री बहुत खराब थी, अब सुधार रही है। लेकिन बीमारी बढ़ जाने के कारण बिक्री फिर घट गई है। मैंने समझा कि शायद इसी बात को इंगित करके उसने यह बात कही है। अतः मैंने भी जोड़ दिया हाँ, भैया कौन जानता था ऐसा खराब समय भी आ सकता है। मुझे ताज्जुब हुआ जब उसने आगे जोड़ा, कितना अच्छा समय आ गया है। पहले 6 दिन कमाते थे और सातवाँ  दिन पिछली कमाई का हिसाब और अगली कमाई का तैयारी में समाप्त हो जाता था। अब बड़े सुखी हैं। 5 दिन कमाते हैं, 1 दिन दुकान की तैयारी और 1 दिन बीवी-बच्चों, माँ-बाप के साथ कमाई का आनंद लेते हैं सीधे-साधे शब्दों में कहूँ तो उसने अनजाने में आनंद का पता दे दिया। 

          यही बात उस मछुआरे ने उस सेठ / साहब / पढ़े लिखे नौजवान को कही थी। आपने भी पढ़ी या सुनी होगी। लेकिन  इसके शब्द थोड़े अलग हैं। वह मछुआरा समुद्र के किनारे मछली पकड़ने के बाद सो रहा था। हार्वर्ड के पढ़े लिखे एमबीए नौजवान के पूछने पर कि इसके बाद दिन भर वह क्या करता है, वह बताता है, मैं देर तक सोता हूँ, अपने बच्चों के साथ खेलता हूँ और फिर दिन में कुछ देर सो लेता हूँ। शाम को गाँव में अपने दोस्तों – परिवार वालों से मिलने चला जाता हूँ, उनके साथ खाता-पीता हूँ, गिटार  बजाता हूँ, गाने गाता हूँ और अपनी ज़िंदगी पूरे उल्लास से जीता हूँ

         एमबीए नौजवान ने फिर अपना पूरा ज्ञान दिया, तरक्की के रास्ते सुझाए, लाखों करोड़ों कमाने के गुर बताये। मछुआरा पूछता रहा, उसके बाद?’  और फिर अंत में 25-30 वर्षों बाद क्या –इसके बाद तुम शान से पास ही के किसी गाँव में अपना मकान बनाना। देर से उठाना, मछलियाँ पकड़ना, दिन में सोना और अपनी शाम दोस्तों के साथ बिताना  इस पर मछुआरे ने मुसकुरा कर कहा, मैं अभी यही तो कर रहा हूँ! हार्वर्ड के एमबीए का नौजवान सर झुका कर निकल लिया।

ऊपर दी गई कविता की अंतिम पंक्तियाँ हैं,

          मैं बच्चों की मुस्कान में हूँ, परिवार के संग जीने में हूँ,

          माँ बाप के आशीर्वाद में हूँ, बच्चों की सफलता में हूँ,

       जो मिला उसी में कर संतोष, आज को जी ले, कल की न सोच।

       कल के लिए आज को न खोना। मेरे लिए कभी दुखी न होना।

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वाह हिंदुस्तान!                                                              मैंने पढ़ा

 

(हम उन लोगों में हैं जिन्हें अपना मुल्क, अपने लोग, अपनी भाषा, अपना पहनावा, अपना कुछ भी पसंद नहीं। हमें अपनी हर कमजोरी और हर बुराई  की जानकारी है, लेकिन हम यह भी मानते हैं कि उसे दुरुस्त करना हमारी नहीं किसी और की ज़िम्मेदारी है। हमें अपनी खूबसूरती का भान नहीं है, हमें अपनी ताकत का अंदाज़ नहीं, हम अपनी अच्छाइयों से भी बेखबर हैं। ऐसे में अमेरिकी जाने-माने हास्य लेखक मार्क ट्वेन का भारत यात्रा वृत्तान्त बहुत कुछ कहता है।)



18 जनवरी से 31 मार्च 1896 के बीच मार्क ट्वेन ने भारत के अनेक नगरों की यात्राएं कीं और यहाँ के निवासियों के जीवन को सूक्ष्म दृष्टि से देखा-जाना-पहचाना। हमारे इतिहास और सांस्कृतिक सम्पदा ने उन्हें इस तरह प्रभावित किया था कि उन्होंने एक स्थान पर लिखा – “भारत में समस्त विश्व की सारी चीजें सबसे पहले शुरू हुई। यहीं की सभ्यता पहली सभ्यता थी। यहाँ की भौतिक सम्पदा भी विश्व कि सबसे पहली सम्पदा थी। और सबसे अधिक विचारक और बुद्धिजीवी भी यहीं पैदा हुए। यही एकमात्र देश है, जिसकी संसार की श्रेष्ठतम विशिष्टताओं पर एकाधिकार रहा है। दूसरे देशों में कोई एक उल्लेखनीय वस्तु हो सकती है, पर यहाँ तो हर वस्तु उल्लेखनीय है। किसी देश में कुछ वस्तुएँ दोहरी हो सकती हैं, लेकिन भारत के चमत्कार अपने हैं। इनका कोई अनुकरण संभव नहीं है। इनकी विशालता, भव्यता और स्वदेशी चरित्र अपने आप में अनुपम है।”

          “यह हिंदुस्तान है! सपनों और राग-रंगों की धरती, बेइंतहा दौलत और बेइंतहा दरिद्रता की धरती, शान-शौकत और फटे हाल लोगों की धरती, महलों और झोपड़ियों की धरती, अकाल और टिड्डी  दल  के हमलों की धरती, मामूली लोगों और महान लोगों की धरती, अलादीन के चिराग, शेरों और हथियों की धरती, काले नाग और जंगलों की धरती, यही है एक सौ राष्ट्रों के एक देश की धरती, मानव सभ्यता के फलने-फूलने की क्रीड़ास्थली, मनुष्य की वाणी की जन्मस्थली, इतिहास की जननी, आख्यानों की दादी, परम्पराओं की परदादी, जिसका  अतीत दुनिया के शेष हिस्सों से प्राचीनतम है। संसार में सूर्य के नीचे विश्व का यह एक ही देश है, जहाँ लोग गरीबी में हैं, बंधन में  हैं और मुक्त भी हैं। एक ऐसा देश जिसे सब लोग देखने की इच्छा रखते हैं। जिसने भी एक बार देख लिया या एक झलक भी ले ली, वह सारे संसार के दर्शन से बढ़कर है”। ये उद्गार भी उसी अमेरिका के विश्व प्रसिद्ध व्यंग्यकार, उपन्यासकार, पर्यटन-लेखक और भाषण कर्त्ता मार्क ट्वेन के हैं। यह उन्होंने तब व्यक्त किए जब वे एक सदी से कुछ पहले मुंबई पोर्ट पर पहुंचे और वहाँ के जीवन की इंद्र्धनुषी हलचल से अभिभूत हो उठे। इस दौरान उन्होंने ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, इंग्लैंड, मौरिशस, दक्षिण अफ्रीका, फिजी और श्री लंका का भ्रमण किया।

          ट्वेन ने हिंदुस्तान में मुंबई, पूना, बनारस, कलकत्ता, दार्जीलिंग, आगरा, जयपुर, दिल्ली और दूसरे अनेक नगरों की यात्राएँ कीं, जिनमें से अधिकतर यात्राएँ रेल से की थीं। उन्होंने हिंदुस्तान के होटलों, यहाँ की खुशनुमा पार्टियों, लोगों के लम्बे-लम्बे नामों, गलियारों, फकीरों और वेषभूषा के बारे में भी बहुत कुछ लिखा। एक जगह वे लिखते हैं, “दूसरे देशों में स्टेशन पर रेलगाड़ी का इंतजार करना बहुत थकाने वाला और उबाऊ होता है, लेकिन हिंदुस्तान में ऐसा कोई एहसास नहीं होता। यहाँ के स्टेशनों पर भारी चहल-पहल और शोरगुल रहता है। आभूषण पहने नर-नारियों की भीड़ नजर आती है। उनकी बहुरंगी वेषभूषा और परिधानों को देखकर मन जितना आनंदित होता है, उसे शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता”।

(वह आँख, नाक, कान पैदा करें जिनमें अपनी मिट्टी की खूबसूरती देखने, सोंधी सुगंध सूंघने और उसका संगीत सुनने की क्षमता हो।)

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हौसला                                                   लघु कहानी - जो सिखाती है जीना

 

मेंढकों का एक झुण्ड जंगल घूमने निकला। सैर करते-करते दो मेंढक एक गहरे गड्ढे में गिर गये। बाहर खड़े दोस्तों ने गड्ढे में झाँका। उन्हें लगा कि कितनी भी कोशिश क्यों न की जाये, उनका बाहर निकल पाना नामुमकिन है। वे गड्ढे में फँसे मेढकों से कहने लगे कि हाथ पैर मारने का कोई फायदा नहीं, वे किसी भी कीमत पर बच नहीं पायेंगे। वह गड्ढा उनके लिए मौत का गड्ढा साबित होगा। दोनों मेंढकों ने उन्हें अनसुना कर दिया और बाहर निकलने की भरसक कोशिश करते रहे। बाहर से झाँकते मेंढक उनके न बच पाने की बात दोहराते जा रहे थे। आखिरकार एक मेंढक निराश हो गया। उसने बाहर निकल पाने की आशा छोड़ दी और वहीं मर गया। दूसरा मेंढक अब भी बाहर निकलने की कोशिश में बराबर जुटा था। कुछ देर बाद वह गड्ढे से बाहर आ गया। बाहर निकलते ही उसने अपने मित्रों को धन्यवाद दिया। मेंढक कुछ समझ नहीं पाये। उसने उन्हें बताया कि वह बहरा है और जब वह बाहर आने के लिए लड़ रहा था, तब उन्हें सुन तो नहीं पा रहा था, लेकिन यह भलीभाँति समझ रहा था कि वे सब उसे बाहर आने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे।

आपके मुंह से निकले शब्द किसी का हौसला बुलंद या पस्त कर सकते हैं, इसलिए हमेशा सकारात्मक बोलें। 

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कारावास की कहानी-श्री अरविंद की जुबानी                                        धारावाहिक

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। इसके रोचक अंश हम जनवरी २०२१ से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसकी बारहवीं किश्त है।)

 


(12)

"द्रोण ने क्या किया?"

कुछ एक साक्षियों के विरुद्धाचरण करने पर भी अधिकांश नॉर्टन साहब के प्रश्नों का अनुकूल उत्तर देते। इनमें जाने-पहचाने कम ही थे, कोई-कोई किन्तु परिचित भी था। देवदास करण महाशय ने हमारी विरक्ति दूर कर हमें खूब हँसाया था, चिरकाल हम उनके कृतज्ञता के ऋण में बँधे रहेंगे। इन साक्षी ने यह गवाही दी थी कि मेदिनीपुर के सम्मेलन के समय जब सुरेन्द्र बाबू ने अपने छात्रों से गुरुभक्ति के बारे में पूछा था तब अरविन्द बाबू बोल पड़े थे, "द्रोण ने क्या किया?" यह सुनते ही नॉर्टन साहब के आग्रह और कौतुहल की सीमा न रही, उन्होंने नि:स्सन्देह यह सोचा होगा कि द्रोण या तो कोई बम का भक्त है या राजनीतिक हत्यारा या मानिकतल्ला, बागान या छात्रमण्डली से संयुक्त। नॉर्टन के ख़याल में इस वाक्य का अर्थ शायद यह था कि अरविन्द घोष ने सुरेन्द्र बाबू को गुरुभक्ति के बदले बम का पुरस्कार देने का परामर्श दिया था, तब तो मुक़द्दमे में बड़ी सुविधा हो सकती है। अतएव उन्होंने साग्रह प्रश्न किया, "द्रोण ने क्या किया?" शुरू में साक्षी किसी भी तरह प्रश्न का उद्देश्य समझ न सके। पाँच मिनट तक इसे लेकर खींचतानी चलती रही, अन्त में करण महाशय ने दोनों हाथ ऊपर फैला नॉर्टन साहब को जतलाया, "द्रोण ने अनेक चमत्कार दिखलाये थे।" इससे नॉर्टन साहब सन्तुष्ट नहीं हुए। द्रोण के बम का अनुसन्धान न मिलने तक सन्तुष्ट हों भी कैसे? दोबारा पूछा, “अनेक चमत्कार क्या बला है? क्या विशेष किया है उन्होंने?" साक्षी ने इसके अनेकों उत्तर दिये, एक से भी द्रोणाचार्य के जीवन के इस गुप्त रहस्य का भेद नहीं खुला। नॉर्टन साहब भड़क उठे, गरजना शुरू किया। साक्षी भी चिल्लाने लगे। एक वकील ने हँसते हुए यह सन्देह व्यक्त किया कि शायद साक्षी को पता नहीं कि द्रोण ने क्या किया। करण महाशय इस पर क्रोध और क्षोभ से आग बबूला हो उठे। चिल्लाये, “क्या? मैं? मैं नहीं जानता कि द्रोण ने क्या किया? वाह, क्या मैंने वृथा ही सारा महाभारत पढ़ा?" आधे घण्टे तक द्रोणाचार्य की मृत-देह पर करण और नॉर्टन का महायुद्ध चला। हर पाँच मिनट बाद अलीपुर विचारालय को कँपाते नॉर्टन अपना प्रश्न गुँजाने लगे, "Out with it, Mr. Editor! what did Drona do?" (हाँ, बताइये-बताइये, सम्पादक महाशय, द्रोण ने क्या किया?) उत्तर में सम्पादक महाशय ने एक लम्बी रामकहानी आरम्भ की, किन्तु द्रोण ने क्या किया, इसका कोई विश्वसनीय संवाद नहीं मिला। सारी अदालत ठहाकों से गूँज उठी। अन्त में टिफ़िन के समय करण महाशय ज़रा ठण्डे दिमाग से सोच-समझ कर लौटे और समस्या की यह मीमांसा बतलायी कि बेचारे द्रोण ने कुछ नहीं किया, बेकार ही उनकी परलोक गत आत्मा को ले आधे घण्टे तक खींचतान हुई, अर्जुन ने ही गुरु द्रोण का वध किया था। अर्जुन के इस मिथ्या अपवाद से द्रोणाचार्य ने निस्तार पा कैलाश पर सदाशिव को धन्यवाद दिया होगा कि करण महाशय की गवाही के कारण अलीपुर के बम-केस में उन्हें कठघरे में खड़ा नहीं होना पड़ा। सम्पादक महाशय की एक बात से सहज ही अरविन्द घोष के साथ उनका सम्बन्ध प्रमाणित हो जाता। किन्तु आशुतोष सदाशिव ने उनकी रक्षा की।                                                                                             (क्रमशः आगे अगले अंक में)

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यू ट्यूब का संपर्क सूत्र लिंक : à

https://youtu.be/GtMdjaqo4Ng

सोमवार, 1 नवंबर 2021

सूतांजली नवंबर 2021

 सूतांजली

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वर्ष : ०५ * अंक : ०४                       🔊(26.30)                                           नवंबर   * २०२१

भरी दुपहरी में अँधियारा, सूरज परछाईं से हारा,

अन्तरतम का नेह निचोड़ें, बुझी हुई बाती सुलगाएँ

आओ फिर से दिया जलाएँ ।

अटल बिहारी वाजपेयी

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लक्ष्मी-संदेश                                                                   मैंने पढ़ा

(दीपावली के पर्व पर, चालीस दशक पहले रिंकी भट्टाचार्य ने लक्ष्मीजी का यह संदेश नारद के हाथों हम तक पहुँचाया था। हम, उस समय भी थे आज भी हैं। शायद उस समय भी हमने यही कहा होगा क्या करें जमाना ही ऐसा है, हम मबूर हैं। तब से आज के जमाने में सुधार हुआ या खराब हुआ है? इसके लिए किसी भी प्रकार के आँकड़े की  दरकार नहीं है। हम जानते हैं। और, क्या आप को मालूम है यह जमाना कौन है? क्या ये हम ही नहीं हैं? हम कहते हैं क्या करें मजबूर हैं! इससे भी मजेदार बात यह है कि हम मजबूरी में जमाने के अनुसार चल रहे हैं तो मजबूत हैं और जिन्होंने मजबूती के साथ जमाने को बदला उसे मजबूर की संज्ञा दे दी!)

...बसंत से भी लुभावनी ऋतु, चाँदनी दिग-दिगन्त में फैली हुई, नारायण और लक्ष्मी अपने सिंहासनों पर विराजमान। नारायण बोले लक्ष्मी से – हे त्रिभुवन की रक्षा करने वाली, रिद्धी-सिद्धि देनेवाली, तुम मर्त्यलोक के प्राणियों के कष्ट का निवारण कब करोगी।  

लक्ष्मी ने सिर नवाकर ध्यान से स्वामी की बात सुनी और बोली, हे नाथ, मर्त्यलोक के नर-नारी अपने लोभ और मत्सर के कारण कष्ट उठा रहे हैं। वे इतने पतित हो गये हैं, भ्रष्टाचार में लिप्त हो गये  हैं, वासनाओं में  अंधे हैं, बंधुजनों की हत्या में लीन हैं, और घृणा फैलाने में व्यस्त हैं कि अब वे इसी बात के योग्य हैं कि भाँति-भाँति के कष्ट भोगें। अब तो धरती का वातावरण इतना कलुषित हो गया है कि देवगण वहाँ जाना ही नहीं चाहते।  

लक्ष्मी जी के ये कठोर वचन सुनकर नारायण उदास हो गये। उन्होंने पूछा, हे देवी, फिर मर्त्यलोक के प्राणियों के उद्धार का उपाय क्या है? वे क्या करें कि उनके घर में लक्ष्मी का निवास हो?’ यह मर्म वार्ता चल ही रही थी कि लो, नारद भी वीणा टंकारते हुए आ पहुँचे। वे सीधे धरती से आ रहे थे और बिलकुल ताजे आँखों देखे समाचार वहाँ से लाये थे। उन्होंने भी बताया कि धरती कष्टों के बोझ से लदी हुई है। एक कण भी ऐसा नहीं  है जहाँ पावनता हो, आनंद हो।  



लक्ष्मीजी पुन: बोलीं, हे मुनिश्रेष्ट उन्हें जानना चाहिये, विचार करना चाहिये कि वे यह कष्ट क्यों भोग रहे हैं। देवताओं ने मनुष्यों पर कृपा करनी क्यों छोड़ दी? क्यों वे धरती का ध्यान भुला बैठे हैं? इसका कारण यह है कि मनुष्यों में भौतिक समृद्धि की लालसा अतिरेक पर पहुँच गई है। न उनमें बंधुत्व की भावना रह गई है, न अपने से बड़ों के प्रति आदर, न मनुष्य मात्र के लिये करुणा। केवल अपनी लालसाओं का अन्धा दास बन कर रह गया है मनुष्य। फिर भी...”, लक्ष्मी जी असीम करुणा से द्रवित हो कर बोलीं, मैं समस्त पापाचार और प्राणियों के दु:ख का नाश करने पुन: पृथ्वी पर अवतरित  होऊँगी।  

कुछ क्षण विचारों में डूबी रहीं, फिर बोली, सुनो हे ब्रह्मसुत, मेरा संदेश सुनो। विशेषत: पृथ्वी पर नारी-जाति के लिये है यह मेरा संदेश। क्योंकि नारी ही पुरुष जाति की जननी है। स्त्री को यह समझ लेना चाहिये कि वह केवल भोग्या नहीं है। वह समस्त धर्मों का, आचारों का आश्रय है, मनुष्य मात्र के जीवन और संस्कृति की संरक्षिका है। नारी को ब्रह्म मुहूर्त में ही जाग जाना चाहिये। सब तरफ आस-पास उसे स्वच्छता रखनी चाहिये। स्वच्छता होगी तभी तो देवगण पधारेंगे। मैं मनुष्य जाति का कल्याण स्त्री-जाति के माध्यम से ही करती हूँ। अगर स्त्री की बुद्धि भटक जाये, वह स्वार्थी हो जाये, समाज और कुल की मर्यादा का पालन न करे, तो फिर मैं भी कुछ नहीं कर सकती। अगर वह परिवार की देख-भाल भली-भांति करे, तो मैं उसे आनंद और धन-धान्य से भर देती हूँ।  

“जिस घर में गंदगी हो, शोर हो, व्यर्थ की वितंडा हो, उस घर में मैं कभी नहीं जाती। जहाँ लोग मीठी वाणी बोलते हों, जहाँ जीवन पद्धति सुन्दरता से सनी हो, जहाँ शांति छायी हो, वहाँ मैं निवास करती हूँधरा को मेरा वरदान स्त्रियों के माध्यम से ही मिलता है। न मैं जाति देखती हूँ, न संप्रदाय। क्रोध, अहंकार और लोभ तो मुझे जरा भी नहीं भाते। मैं तो उसकी चेरी हूँ, जिसमें नम्रता है, करुणा है, मातृभाव है, संकल्प है, और मर्यादा पालन है।  

हे ब्रह्मसुत, तुमने मेरा संदेश सुना। अब तुम त्वरित गति से भूलोक पधारो और जो मैंने कहा है उसे भूलोक के प्राणियों तक पहुँचा दो, ताकि वे उन कष्टों से मुक्ति पा सकें, जो स्वयं उन्होंने अपने लिये उत्पन्न कर लिये हैं। और मेरी आज्ञा का पालन कर सुख, संतोष और शांति लाभ कर सकें। जो मेरे संदेश को सुनेंगे और समझेंगे, उनका पालन करेंगे, मैं सदा उनके साथ रहूँगी

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शुभ-लाभ और भाषा                                                                मैंने पढ़ा

(काशीनाथ जोशी के कलम से)

शुभ और लाभ ये दो ऐसे शब्द हैं जो हर व्यापारी की गद्दी पर आपको लिखे मिलेंगे। छोटा-बड़ा हर व्यापारी इन दो शब्दों को अपनी गद्दी के पास बड़ी श्रद्धा से लिखवाता है, मानो ये दो शब्द साक्षात गणेश और लक्ष्मी हों। शुभ-लाभ में से शुभ का अर्थ बहुत व्यापक है। शुभ का संबंध उसके व्यापार की वस्तुओं, ग्राहक-समाज दोनों से है। इन दोनों का शुभ सोचते हुए अपने अल्प लाभ या समुचित लाभ की दृष्टि से व्यापार करना ही शुभ-लाभ का व्यापार करना है। शायद यह कहा जायेगा कि आज के जमाने में यह असंभव है। किन्तु क्या सचमुच स्थिति यही है? क्या समाज के शुभ को ध्यान में रख कर व्यापारी वर्ग कार्य कर ही नहीं सकता? इन प्रश्नों पर गहराई से सोचें।

 


एक उदाहरण आजादी की लड़ाई का है। जब उसका नेतृत्व एक बनिये के हाथ में आया, तो शायद उसने शुभ-लाभ की दृष्टि से उस पर सोचा और आंदोलन को आगे बढ़ा कर हमें आजादी का शुभ-लाभ कराया, जादी हासिल की। आजादी की लड़ाई में  हमें जो कुछ प्राप्त करना था, उसमें से आज भी बहुत-कुछ प्राप्त करना शेष है। ऐसी ही एक प्रमुख बात है भाषाई आजादी की। आज भी देश में  विदेशी भाषा अँग्रेजी का प्रभुत्व है इसके लिए बहुत हद तक भारतीय भाषाओं के साथ व्यापारी वर्ग का असहयोग ही जिम्मेदार है। भारत का व्यापारी, भाषाई स्वतन्त्रता की लड़ाई में हिस्सा नहीं ले रहा है।   

यह विचित्र सी बात है; क्योंकि आजादी की लड़ाई के जमाने में भारतीय व्यापारी अपनी भाषा के प्रति आस्थावान था। अँग्रेजी का मोह तब उसे नहीं होता था। दुकान के पटल से ले कर हिसाब लिखने तक हर काम, उसका अपनी भाषा के प्रति सहज आग्रह था। किन्तु अंग्रेजों के जाने के बाद उसे अँग्रेजी से मोह हो गया। उद्योग-व्यापार में अँग्रेजी का प्रचलन बढ़ता गया और भारतीय भाषाएँ पिछड़ती गईं। यह शुभ नहीं है। एक स्वतंत्र देश का व्यापारी अपने ही देश की भाषाएँ छोड़ दे, यह तो अशुभ है।  

यह सहज-सिद्ध बात है कि जो उसके ग्राहकों की भाषा है उसी में काम करना और अपने काम का प्रचार करना व्यापारी के लिये लाभकारी है। शुभ तो यह है ही। फिर हम उल्टा क्यों सोच रहे हैं? क्यों अँग्रेजी की ओर बढ़ रहे हैं? इससे अतिरिक्त लाभ कितना हो रहा है? इन प्रश्नों पर व्यापारी सोचें। वे इसका हिसाब भी लगायें कि अगर दुकान का पटल अँग्रेजी में है तो कितना लाभ हो रहा है और अगर यही पटल हिन्दी में हो तो क्या लाभ में कमी होगी 

उत्तर भारत में ही नहीं अन्य प्रदेशों में भी आधे से अधिक व्यापारियों के पटल या तो हिन्दी में हैं या प्रादेशिक भाषा में। तो क्या भारत का आधा व्यापारी समाज घाटे का व्यापार कर रहा है? निश्चित ही आप कहेंगे, नहीं। वे भी निश्चित ही लाभ कमा रह हैं – शुभ करते हुए लाभ। क्या भारत का बाकी आधा भटका हुआ व्यापारी वर्ग इससे कोई सबक नहीं लेगा 

आइए, इस प्रश्न से जुड़ी हुई दूसरी बात भी सोचें। कहावत हैं यथा राजा तथा प्रजा। इस देश पर जब अंग्रेजों का शासन था, तब दिल्ली का ही नहीं, लखनऊ, पटना, बंबई, कलकत्ता का सारा राजकाज अँग्रेजी में ही चलता था, तो उसे बहुत गलत नहीं कहा जा सकता था। पर आज तो ऐसा नहीं है। केंद्रीय सरकार का बहुत कामकाज अब हिन्दी में होने लगा है। हिन्दी भाषी प्रदेशों में अधिकांश राजकाज हिन्दी में होने लगा है। अनेक अहिंदी राज्य अपनी प्रादेशिक भाषाओं में काम करने लगे हैं। वे भाषाएँ निश्चय ही अँग्रेजी के बजाय हिन्दी के ज्यादा निकट हैं। पर हमारा व्यापारी इस परिवर्तन को देख ही नहीं रहा है। मजेदार बात यह है कि जब हमारा व्यापारी समाज अँग्रेजी की ओर बढ़ रहा है, तब विदेशी कंपनियाँ हिन्दी की ओर बढ़ रही हैं। आज बाजार में ढेरों ऐसे उत्पादन गिनाये जा सकते हैं, जो विदेशी कम्पनियों के हैं: पर जिनके आवरण पर एक तरफ अँग्रेजी है, तो दूसरी तरफ उतनी ही शान से हिन्दी में भी है। ये विदेशी कंपनियाँ व्यापार का गुर जानती हैं। जिन्हें लाभ कमाना है, वे ग्राहक की भाषा को अवश्य महत्व देते हैं। वे यह भी देखते हैं कि हवा किस ओर बह रही है।  

मैंने अपने नगर ग्वालियर के अँग्रेजी पटलों पर सर्वेक्षण किया, तो पाया कि जहाँ भारतीय स्टेट बैंक जैसे आसमान को छूने वाले बड़े प्रतिष्ठान के सब पटल हिन्दी के हैं, वहीं बाल काटनेवालों और दर्जियों के पटल अँग्रेजी के हैं। शायद अपने को छोटा महसूस करने वाले व्यापारी अँग्रेजी का पटल लगा कर बड़ा बनना चाहते हैं। कितनी हस्यास्पद स्थिति है यह 

जो व्यापारी अपने माल को अधिकाधिक ग्राहकों के पास ले जाना चाहता है, जो अपने माल के प्रति ग्राहक को आकृष्ट करना चाहता है, जो ईमानदारी से अपने माल के गुणों को ग्राहक को बतलाना चाहता है - उसके लिये यह आवश्यक है कि वह हिन्दी तथा प्रादेशिक भाषाओं का व्यवहार करे।... व्यापार और व्यापारी का शुभ-लाभ भारतीय भाषाओं के साथ जुड़ा हुआ है। इस बात को हमारे व्यापारी जितना शीघ्र समझें, उतना ही अच्छा होगा।

(प्राय: भारतीय भाषा का समर्थन, विदेशी भाषा का विरोध समझा जाता है और इसे उसी प्रकार प्रसारित भी किया जाता है। यह सत्य से दूर है। अपनी भाषा का समर्थन कभी भी विदेशी भाषा का विरोध नहीं हो सकता। मैं अपनी  माँ का आदर करता हूँ का यह तात्पर्य नहीं है कि मैं दूसरे की माँ आदर नहीं करता। अवश्यकतानुसार विदेशी भाषा का ज्ञान अर्जित करें और प्रयोग भी, लेकिन देश की कुछ प्रतिशत आबादी के लिए पूरे देश को अपनी भाषा छोड़ कर विदेशी भाषा सीखने-सिखाने की पहल दोषपूर्ण है।)

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शक्ति संभावना की                                         लघु कहानी - जो सिखाती है जीना

छांदोग्य उपनिषद में एक कथा है श्वेतकेतु की। उसके पिता उसे उपदेश दे रहे हैं, पास ही एक बरगद का वृक्ष है, उसके नीचे कुछ फल गिरे हुए हैं। पिता ने बेटे को एक फल देते हुए पूछा, “बेटा यह क्या है?”

“यह तो बरगद का फल है”, बेटे ने कहा।



“इसे तोड़ो, इसके भीतर क्या है?”

“इसके भीतर बहुत सारे बीज हैं पिताजी”।

पिता ने बेटे को एक बीज देते हुए कहा, “इसे तोड़ो, इसके भीतर क्या है?”

श्वेतकेतु ने वह नन्हा सा बीच तोड़ा और ध्यान से देखकर कहा, “इसमें तो कुछ भी नहीं है”।

पिता ने कहा, “बस, जहाँ तुम कुछ नहीं देख रहे हो वहीं इतना बड़ा बरगद का पेड़ छुपा है। तमाम विषम-परिस्थितियों से जूझते और संघर्ष करते हुए यही न दिखाई देने वाला कुछ नहीं एक विशाल वृक्ष के रूप में परिवर्तित हो जायेगा। वत्स इसी बीज की तरह टूट जाने की जिद, आकांक्षा और संकल्प लेकर हर व्यक्ति अपनी अदृश्य संभावनाएं तलाशकर पूर्ण क्षमता और मौलिकता के साथ खुद को प्रकट कर सकता है”।

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कारावास की कहानी-श्री अरविंद की जुबानी                                       धारावाहिक

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। इसके रोचक अंश हम जनवरी २०२१ से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसकी ग्यारहवीं किश्त है।)

 


(११)

परामर्शदाता नॉर्टन और मैजिस्ट्रेट बर्ली साहब

यदि नॉर्टन साहब थे नाटक के रचयिता, प्रधान अभिनेता और सूत्रधार तो मैजिस्ट्रेट बर्ली को कहा जा सकता है नाटककार का आश्रयदाता (patron)। बर्ली साहब थे शायद स्कॉच जाति के गौरव। उनका चेहरा स्कॉटलैंड का स्मारक चिह्न था। खूब गोरी, खूब लंबी, अति कृष, दीर्घ देहयष्टि पर छोटा सा सिर देख ऐसा लगता था जैसे अग्रभेदी आक्टोरलोनी के स्मारक पर छोटे-से आक्टोरलोनी बैठे हों, वहाँ क्लियोपेट्रा के स्तम्भ के शिखर पर एक पका नारियल रखा हो। उनके बाल थे धूसर वर्ण और स्कॉटलैंड की सारी ठंड और बर्फ उनके चेहरे के भाव पर जमी हुई थी। जो इतना दीर्घकाय हो उसकी बुद्धि भी तद्रूप होनी चाहिए, नहीं तो प्रकृति की मतिव्ययता के संबंध में संदेह होता है। किन्तु इस प्रसंग में, बर्ली की सृष्टि के समय, लगता है, प्रकृति देवी कुछ नमनी एवं अन्यमनस्क हो गयी थीं।  अंग्रेज़ कवि मरलो ने इस मितव्ययता का, छोटे-से भण्डार  में असीम धन (infinite riches in a little room)  कह वर्णन किया है  किन्तु बर्ली का दर्शन कवि के वर्णन से विपरीत भाव मन में जागता है – असीम भण्डार में क्षुद्र धन। सचमुच, इस दीर्घ देह में इतनी थोड़ी विद्याबुद्धि देख दु:ख होता था और इस तरह के अल्पसंख्यक शासनकर्ताओं द्वारा तीस कोटी भारतवासी शामिल हो रहे हैं यह याद कर अंग्रेजों की महिमा और ब्रिटिश प्रणाली पर प्रगाढ़ भक्ति उमड़ती थी। श्रीयुत व्योमकेश चक्रवर्ती द्वारा जिरह करते समय बर्ली साहब की विद्या की पोल खुली। इतने साल मैजिस्ट्रेटगिरी करने के बाद भी  यह निर्णय करने में उनका सिर घूम गया कि उन्होंने अपने कर कमलों में यह मुकदमा कब ग्रहण किया या कैसे मुकदमा ग्रहण किया जाता है, इस समस्या को सुलझाने में असमर्थ हो चक्रवर्ती साहब पर इसका भर दे साहब स्वयं निष्कृति पाने के लिए सचेष्ट हुए। अभी भी यह प्रश्न मुकदमे की तिजटिल समस्याओं में से एक गिना जाता है कि बर्ली साहब ने कब मुकदमा हाथ में लिया था।  चटर्जी महाशय के प्रति किये गये जिस करुण निवेदन का उल्लेख मैंने किया है उससे भी साहब की चिन्तनधारा का अनुमान लगाया जा सकता है। शुरू से ही वे नॉर्टन साहब के पाण्डित्य और वाग्विलास से मन्त्रमुग्ध हो उनके वश में हो गये थे। ऐसे विनीत भाव से नॉर्टन द्वारा प्रदर्शित पथ का अनुसरण करते, नॉर्टन की हाँ में हाँ मिलाते, नॉर्टन के हँसने से हँसते, नॉर्टन के कुपित होने पर कुपित होते कि यह सरल शिशुवत् आचरण देख कभी-कभी मन में प्रबल स्नेह और वात्सल्य का आविर्भाव होता। बल के स्वभाव में निरा लड़कपन था। उन्हें कभी भी मजिस्ट्रेट न मान सका, ऐसा लगता मानों स्कूल का छात्र हठात् स्कूल का शिक्षक बन शिक्षक के उच्च मंच पर चढ़ बैठा है। ऐसे ही वे कोर्ट का काम चलाते। कोई उनके साथ अप्रिय व्यवहार करता तो स्कूली शिक्षक की तरह शासन करते। हम में से यदि कुछ मुक़द्दमे के प्रहसन से विरक्त हो आपस में बातें करने लगते तो बर्ली साहब स्कूल मास्टर की तरह बिगड़ने लगते, उनकी बात न सुनने पर सबको खड़े हो जाने की आज्ञा देते, उसका भी तुरन्त पालन न किया तो प्रहरी को कहते हमें खड़ा कर देने के लिए। हम स्कूल मास्टर के इस रंग-ढंग को देखने के इतने आदी हो गये थे कि जब बर्ली और चटर्जी महाशय का झगड़ा खड़ा हुआ तो हम प्रति क्षण इस आशा में थे कि अब बैरिस्टर साहब को खड़े रहने का दण्ड मिलेगा। बर्ली साहब ने लेकिन उलटा रास्ता पकड़ा, चिल्लाते हुए बैठ जाइये, मि.चटर्जी कह अलीपुर स्कूल के इस नवागत उद्दण्ड छात्र को बिठा दिया। जैसे कोई-कोई मास्टर छात्र के किसी प्रश्न से या पढ़ाते समय अतिरिक्त व्याख्यान चाहने से खीज कर उसे डाँट देते हैं, बर्ली भी आसामी के वकील की आपत्ति पर खीज उसे डपट देते। कोई-कोई साक्षी नॉर्टन को परेशान करते नॉर्टन सिद्ध करना चाहते थे कि अमुक लेख अमुक आसामी के हस्ताक्षर हैं, साक्षी यदि कहते कि नहीं, यह तो ठीक उस लेख की तरह नहीं, फिर भी हो सकता है, कहा नहीं जा सकता बहुत से साक्षी इसी तरह का उत्तर देते थे तो नॉर्टन अधीर हो उठते। बक-झक कर, चिल्ला कर, डॉट-डपट कर किसी भी उपाय से अभीप्सित उत्तर उगलवाने की चेष्टा करते। उनका अन्तिम प्रश्न होता, “तुम क्या मानते हो, हाँ या ना?” साक्षी न हाँ कह पाते न ना, घुमा-फिरा कर बार-बार वही उत्तर देते। नॉर्टन को यह समझाने की चेष्टा करते कि उनका कोई भी विश्वास नहीं, वे सन्देह में झूल रहे हैं। किन्तु नॉर्टन वह उत्तर नहीं चाहते थे, बार-बार मेघगर्जना करते हुए उसी सांघातिक प्रश्न से साक्षी के सिर पर वज्राघात करते, “हाँ, तो फिर क्या राय है महाशय, आपकी?” नॉर्टन के क्रुद्ध होते ही बर्ली भी ऊपर से गरजते, "टोमारा क्या विश्वास है?" बेचारे साक्षी महाविपद् में पड़ जाते। उनका कोई विश्वास नहीं, लेकिन एक तरफ़ से मजिस्ट्रेट, दूसरी तरफ से नॉर्टन क्षुधित व्याघ्र की तरह उनकी बोटी-बोटी अलग कर अमूल्य अप्राप्य विश्वास बाहर निकलवाने को तत्पर हो दोनों तरफ़ से भीषण गर्जन कर रहे हैं। बहुधा विश्वास ज़ाहिर न होता, चकरायी बुद्धि और पसीने से तर साक्षी उस यन्त्रणा स्थल से अपने प्राण बचा भाग खड़े होते। कोई-कोई प्राणों को ही विश्वास से प्रियतर मान नॉर्टन साहब के चरण-कमलों में झूठे विश्वास का उपहार चढ़ा बच निकलते, नॉर्टन भी अति सन्तुष्ट हो बाकी जिरह स्नेहसहित सम्पन्न करते। ऐसे परामर्शदाता के साथ आ मिले ऐसे मजिस्ट्रेट तभी तो मुक़द्दमे ने और भी अधिक नाटकीय रूप धारण कर लिया था।

(क्रमश:, आगे अगले अंक में)

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