सोमवार, 11 मई 2026

सूतांजली मई (द्वितीय) 2026

 


छोटी-छोटी चीज़ों पर उत्तेजित होने और उन्हें तुम्हें विक्षुब्ध करने की अनुमति क्यों दी जाये?

अगर तुम शान्त-अचञ्चल रहो तो चीजें ज़्यादा अच्छी तरह चलेंगी

             और अगर कोई कठिनाई उठे भी, तुम 'शान्ति' और 'शक्ति' के प्रति खुल कर,

                          शान्त मन के साथ, उससे बाहर निकलने का रास्ता भी ढूँढ़ निकालोगे।

यही है आगे ही आगे बढ़ते रहने का रहस्य ।

बहुत शान्त  रहो, उस 'शक्ति' पर पूरा भरोसा रखो कि

                                                                    वह तुम्हें  रास्ता  दिखलाये और

                                                                                                      चीज़ों को अधिकाधिक ठीक कर दे।  

अगर तुम ऐसा करो तब भूलें भी सीखने के साधन और

                                                                                               प्रगति की ओर उठाए क़दम बन जाती हैं।

श्री अरविन्द

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तुम कौन हो?

मानव को क्या चाहिए? सुख, शांति, सुकून? ये कहाँ मिलेंगे – अंदर या बाहर?

यह हम सब जानते हैं, फिर भी हम कहाँ खोजते रहते हैं – बाहर, क्यों?

हमारी प्रकृति है – कुछ-न-कुछ करते रहना।  अगर कुछ न करना हो तो भरोसा नहीं होता?

अशोक वाटिका में फूल सफेद थे या लाल? कौन सही थे - तुलसीदास या हनुमान?

उत्तरा के गर्भ में गदा घूम रही थी या चक्र? कौन सही है - शुक मुनि या राजा परीक्षित?

स्थायी निवास कहाँ है? - यहाँ है या वहाँ? तब - जाना है या लौटना?

ऐसे ही और अनेक प्रश्न हैं, जिनके उत्तर हम जानते हैं लेकिन फिर भी उन पर भरोसा नहीं करते फलस्वरूप जो चाहते हैं वह नहीं मिलता और जो मिलता है वह हम चाहते नहीं। एक तरफ है खुशबूदार मीठे फल-फूल और दूसरी तरह है भयानक जंगल काँटों, खड्डों, जंगली पशुओं से भरा। लेकिन दूर से जंगल हरा-भरा दिखता है और बगिया ठीक नजर ही नहीं आती। किसी ने बताया भी कि दूर से जंगल दिखेगा, बगिया नहीं दिखेगी। सावधान रहना, बगिया में जाना, जंगल में नहीं। लेकिन हम क्या करते हैं? और जो करते हैं उसे ही भोगते हैं।

अध्यात्म साधना का अर्थ है भीतर की यात्रा। हम बाहर से बहुत परिचित हैं। हमारे जीवन की पूरी-की-पूरी यात्रा ही बाहर की ओर हो रही है। हमारी शिक्षा भी हमें बाहर की ओर ले जाती है और हमारे अनुसंधान के सारे प्रयत्न भी हमें बाहर ही भटकाते हैं। भीतर की यात्रा करने का कोई अवकाश ही नहीं है। व्यक्ति बाहर में इतना व्यस्त है कि उसे कभी यह सोचने का मौका ही नहीं मिलता कि उसे भीतर की यात्रा भी करनी चाहिए। सच्चाई यह है कि बाहर में जितना है, भीतर उससे बहुत अधिक है। जो भीतर की यात्रा कर लेता है उसे बाहर का सत्य असत्य जैसा प्रतिभाषित होता है। किन्तु भीतर की यात्रा करने का अवसर ही जब जीवन में नहीं आता तब यह जानने को नहीं मिलता कि भीतर में कोई सार है, भीतर कुछ ऐसा है जिसे देखना चाहिए, जानना चाहिए, अनुभव करना चाहिए। इसलिए अध्यात्म-साधना जरूरी है।

आचार्य महाप्रज्ञ कहते हैं इसीलिये शिक्षा और शोध के साथ अध्यात्म-साधना बहुत जरूरी है। जैसे दिन-भर का थका हुआ पक्षी अपने घोंसले में आकर विश्राम करता है वैसे ही बहिर्मुखी प्रवृत्तियों से त्रस्त आदमी कहीं विश्राम ले सके, कहीं शांति का अनुभव कर सके, वह स्थान हो सकता है केवल अध्यात्म, केवल भीतर का प्रवेश। जो बाहर से थका हुआ प्रतीत होता है उसे बाहर की कोई भी वस्तु विश्राम नहीं दे सकती, शांति नहीं दे सकती। दो दिशाएँ हैं-- एक बाहर की और एक भीतर की। दोनों एक-दूसरे की प्रतिपक्षी दिशाएँ हैं। 

यह ध्यान देने योग्य है कि सभी समाजों में मनुष्य की स्वयं अपने बारे में जिज्ञासा उतनी नहीं रही जितनी की ईश्वर के बारे में। कारण, मनुष्य की दृष्टि बहिर्गामी होती है। वह अपने अन्दर की दुनिया के बजाय बाहर की दुनिया के बारे में ज़्यादा सोचता है। बाहर जाना हो तो चलना है, लेकिन अंदर जाना हो तो कहीं चलना ही नहीं है। स्वरूप, न ईश्वर का स्पष्ट था, न आत्मा का। पर ईश्वर के बारे में विचार करते हुए बाहरी संसार का आलंबन तो था। उसे लगता था कि जब वह ईश्वर के बारे में बात करता है तो उसका कुछ आधार है, इसलिए उसके बारे में बात करना सार्थक है। पर आत्मा के बारे में चर्चा, यह तय करना ही कठिन है कि बात किसके बारे में की जा रही है और किस आधार पर?

कोई परेशान था। उसे ईश्वर से मिलना था। लेकिन कोई बता नहीं रहा था, वह कहाँ मिलेगा? यूंही सफर के दौरान एक सहयात्री ने बताया कि उनके गाँव के एक महात्मा उसे मिलवा सकते हैं, ईश्वर से। बस, वह उसके साथ हो लिया। गाँव पहुँचने पर सहयात्री ने सामने की पहाड़ी की चोटी की ओर इशारा किया। वह आनन-फानन में पहाड़ी की चोटी पर पहुँच गया। उसने देखा एक महात्मा ध्यान में बैठे हैं। वह भी उनके सामने इंतजार में  बैठ गया। ध्यान से उठने पर महात्मा से कहा, मुझे ईश्वर से मिलना है, क्या आप मिलवा सकते हैं’?       “हाँ, लेकिन आज नहीं”, उन्होंने कुछ दिनों के बाद प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में आने कहा। वह तैयार होकर पहुँच गया। कुछ समय के ध्यान के बाद महात्मा ने पूछा, तुम कौन हो? ईश्वर का क्या बताऊँ, कौन मिलने आया है’?

उसने अपना नाम बताया। महात्मा ने कहा - यह तो तुम्हारा नाम है, तुम कौन हो’?

उसने अपना व्यवसाय बताया। यह तो तुम्हारा काम है, तुम कौन हो?

मैं मालिक हूँ। यह तो तुम्हारा ओहदा है, तुम कौन हो?

वह बस इस मैं ......... और .......... तुम कौन हो? के बीच फंसा रह गया। उसके हर उत्तर पर महात्मा वही प्रश्न दुहराते, तुम कौन हो? वह परेशान होने लगा। महात्मा ने कहा परेशान मत हो, अभी जाओ, जब पता लग जाए कि तुम कौन हो? फिर आ जाना। वह आता रहा, जाता रहा, लेकिन गाड़ी “तुम कौन हो?” से आगे नहीं बढ़ी। फिर अचानक उसने आना बंद कर दिया।

कई महीनों के बाद अचानक महात्मा की उससे मुलाक़ात हुई। उन्होंने पूछा - तुम आए नहीं? क्या तुम्हें पता नहीं लगा कि तुम कौन हो? वह, महात्मा के चरणों में गिर पड़ा और बोल हाँ महाराज, मैं जान गया कि मैं कौन हूँ, इसलिए फिर आपके पास आने की आवश्यकता नहीं रही।

अपने को जानना ही अंतर्यात्रा है।

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शुक्रवार, 1 मई 2026

सूतांजली मई (प्रथम) 2026



हम जो कार्य कर रहे हैं
उसमें अगर सफलता प्राप्त करें
तो
वह हमारे कार्य का आरंभ होगा,
समाप्ति नहीं।
                                                               श्री अरविन्द
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 आत्मा की यात्रा

श्री नोलिनी कान्त गुप्त, श्री अरविंद के शिष्य ही नहीं  एक उच्च कोटी के क्रांतिकारी, भाषाविद, विद्वान, आलोचक, कवि, दार्शनिक और योगी भी थे। श्री अरविंद के विचारों से प्रभावित उन्हीं के लेखन पर आधारित है यह यात्रा।

किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उसकी आत्मा या मानसिक सत्ता कुछ समय बाद मानसिक जगत में चली जाती है और वहाँ तब तक विश्राम करती है जब तक कि पृथ्वी पर किसी अन्य शरीर में पुनर्जन्म का समय न आ जायेतब, मृत्यु के बाद के जीवन में दो अवस्थाएँ होती हैं। पहली, पारगमन (यात्रा) और दूसरी, विश्राम।

पारगमन के दौरान मानसिक सत्ता की रक्षा करने वाले और उसके पार्थिव शरीर का निर्माण करने वाले अन्य सभी आवरणों का धीरे-धीरे त्याग हो जाता है। भौतिक शरीर के साथ सूक्ष्म शरीर, फिर प्राण और अंत में मन भी विलीन हो जाते हैं। पिछले जन्मों की स्मृति न होने का कारण यह है कि मृत्यु के साथ ही व्यक्ति, स्मृति का साधन - मस्तिष्क - पीछे छोड़ आता है। वे अपने-अपने ब्रह्मांडीय क्षेत्रों में विलीन हो जाते हैं। सूक्ष्म शरीर अपने तत्वों को सूक्ष्म भौतिक तल में त्याग देता है, प्राण तत्व प्राण जगत में समाहित हो जाते हैं और मानसिक तत्व मानसिक जगत में चले जाते हैं

लेकिन एक उच्चतर स्मृति भी है जो मानसिक चेतना का गुण है। मानसिक सत्ता अक्सर सांसारिक जीवन की सभी भौतिक घटनाओं और विवरणों को याद नहीं रख पाती जो सीधे इसकी चेतना से जुड़ी नहीं होतीं। लेकिन वे सभी चीजें जो इसके स्पर्श से गुज़री हैं और इसके विकास और वृद्धि में योगदान दिया है और बदले में इसका प्रभाव ग्रहण किया है - वस्तुएं, व्यक्ति, घटनाएं या गतिविधियां - मानसिक स्मृति में समाहित हो जाती हैं। और इस प्रकार अतीत को याद करने का, एकमात्र निश्चित तरीका है मानसिक सत्ता में प्रवेश करना, मानसिक चेतना को प्राप्त करना। वहां आत्मा की यात्रा का संपूर्ण परिदृश्य प्रकट होता है।

          मृत्यु और मानसिक जगत में अंतिम विश्राम की प्राप्ति के बीच का सफर मनुष्य के लिए अत्यंत कठिन और जोखिम भरा होता है। वह शरीर की सुरक्षा को त्याग चुका होता है, पर अभी तक उसे मन की शरण नहीं मिली होती; वह अपने अतीत से ग्रस्त और विचलित रहता है - इच्छाएँ, भूख, आकर्षण और विकर्षण, अधूरी योजनाएँ, समस्याग्रस्त षड़यंत्र - ये सब उसे सताते रहते हैं, किए गए और न किए गए कार्य उसके चारों ओर मंडराते रहते हैं और उसकी प्रगति में बाधक बन जाते हैं। न केवल उसका अपना कर्म, बल्कि दूसरों के कर्म भी उसका पीछा करते हैं; वे सभी व्यक्ति जिनके साथ उसका संबंध रहा है, जो अब उसके बारे में सोचते हैं, उस पर दया करते हैं, उसके लिए शोक मनाते हैं, उसकी अनुपस्थिति पर विलाप करते हैं, उसके मार्ग में इतनी बाधाएँ और रुकावटें खड़ी करते हैं कि उसे मुड़कर पीछे देखना पड़ता है। वे मध्यवर्ती संसार  जिनके साथ उस बेचारे निराकार प्राणी को अब संपर्क में आना पड़ता है, और अक्सर उसे ऐसा महसूस होता है जैसे वह बिना चमड़ी वाला हो और उसकी सभी नसें तनाव में हों और असहाय रूप से दर्दनाक प्रभावों के लिए खुली हों।

          शरीर, व्यक्ति के लिए सर्वोच्च किला है: यह एक कवच है, एक इस्पात का ढांचा है जो सूक्ष्म शरीर को अन्य लोकों और उनके प्राणियों के हमलों या कठोर और क्रूर स्पर्शों से बचाता है। शरीर से बाहर निकलने के बाद, व्यक्ति के भटकने और चोट लगने का पूरा खतरा रहता है, जब तक कि उसे किसी संरक्षक देवदूत द्वारा मार्गदर्शन और सुरक्षा न मिले।

          लेकिन अगर किसी के भीतर एक प्रखर, सच्ची और अटूट लौ हो, तो वह कमोबेश आसानी से और बिना किसी नुकसान के इस दौर से गुजर सकता है; लेकिन ऐसा बहुत कम होता है।

          मृत्यु के बाद मनुष्य को विश्राम स्थल तक सुगम और त्वरित मार्ग की ही आवश्यकता होती है। त्वरित मार्ग  मनुष्य के कर्मों और मृत्यु के समय की अंतिम इच्छा एवं प्रार्थना द्वारा निर्धारित होता है, क्योंकि इस महत्वपूर्ण क्षण में चेतना की शक्ति न केवल मार्ग के स्वरूप पर, बल्कि अगले जन्म के स्वरूप पर भी प्रभाव डालती है। अपने स्वयं के पुण्य के अतिरिक्त, उनकी मदद उन लोगों द्वारा भी की जा सकती है जो अभी पृथ्वी पर हैं और जो खुद को उनके मित्र, रिश्तेदार और शुभचिंतक बताते हैं - शोक और विलाप करके या रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों को करके नहीं - क्योंकि ये अक्सर गति को बढ़ाने के बजाय विलंबित करते हैं, बल्कि आंतरिक वैराग्य, शांत प्रार्थना और सद्भावना से: शायद दिवंगत आत्मा को भूल जाना ही उनकी मदद करने का सबसे अच्छा तरीका है। सच्ची सचेत सहायता केवल वही व्यक्ति दे सकता है जिसके पास आवश्यक गुप्त शक्ति और आध्यात्मिक अनुभूति हो।

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सूतांजली जुलाई द्वितीय

  भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिव्य-दृष्टि देकर अपने दर्शन कराये। हमारे पास वह दिव्य-दृष्टि नहीं है ,   परंतु उसे प्राप्त करने की शक...