बुधवार, 11 मार्च 2026

सूतांजली मार्च (द्वितीय) 2026

 


जीना? या जीवित रहना?

          हम प्रायः मात्र श्वास लेने, हृदय के धड़कने, नित्य-कर्म और अपने परिवार का भरण-पोषण करने और साथ-साथ गीता में वर्णित कर्तव्य कर्मों को निभाने की क्रियाओं को ही जीना मनाने की भूल करते हैं। हम इन्हीं क्रियाओं में लीन रहते हैं और अगर इसे रुचि पूर्वक कर लिया तो इसे एक सफल जीवन तक मान लेते हैं। वास्तव में हमारा यह अस्तित्व निरर्थक है, भले ही हम एक लंबी उम्र पा लें और स्वस्थ रहें। ब्रह्मांड के निम्नतर प्राणी तो यही करते हैं, फिर इस मानव शरीर का क्या अर्थ? हम में और उनमें फिर कोई फर्क ही नहीं रहा! शतायु होने पर भी सही अर्थों में हम सिर्फ जीवित हैं, जी नहीं रहे। जीना इन सबसे अलग कुछ और ही होता है।    

          हममें-से जो वास्तव में जीवित हैं उन्हें विचार करने पर अपना जीवन, इसके सम्पूर्ण चमत्कारिक अनुभवों की विविधता के समक्ष अत्यल्प प्रतीत होगा। उनके लिए, जीवन एक सतत साहसिक कार्य है, एक खुला परिदृश्य है, जिसमें हर मोड़ पर खुशियां और तृप्ति का आनंद लेने के अनंत अवसर हैं। वे जीवन के सार को पकड़ने का प्रयत्न करेंगे, और इस प्रक्रिया में, ब्रह्मांड में छिपी सम्भावनाओं का अनुसंधान और आकलन करेंगे। उन्हें इसका अनुभव होगा कि उनमें चारों ओर प्रतीत होने वाले अराजक और अशांत भ्रमजाल में से सार्थक को प्राप्त कर लेने की इच्छाशक्ति और स्व-निर्धारित उद्देश्य निहित हैं।

          ये वे लोग हैं जो समुद्र के किनारे चलते समय हवा के थपेड़ों, उन पर पड़ने वाली ठंडी फुहारों, गीली रेत पर लम्बे कदम उठाते समय अंगों की गति, लय का आनंद लेते हैं। वे प्रकृति के समुद्री तट को महसूस करते हैं।

          बदले में, वे एक ऊंचे व्यक्तित्व और जागृत परोपकारी भावना से सम्पन्न होते हैं, जो उन असहाय भाइयों के लिए भी उत्साह, उपयोगिता और संतुष्टि का वातावरण तैयार करता है जो लड़खड़ा कर पिछड़ गये हैं। उन्हें कोई भी कठिनाई, कोई भी बाधा, कोई भी परेशानी हतोत्साहित नहीं कर सकती जिन्होंने वास्तव में जीवित रहने की क्षमता प्राप्त कर ली है, वे स्वतः प्रोत्साहित होते हैं।

          कठिनाइयां भाग्य के साहस के समान हैं और बाधाएं केवल उनके कौशल को परखने के लिए रुकावटें है, परेशानियां उन्हें शक्ति देने के लिए केवल टॉनिक हैं। प्रत्येक विपरीत परिस्थिति का सामना करने के बाद वे निश्चित रूप से उर्ध्वगामी होते हैं, और यह भावना जीवन के अंतिम क्षण तक जीवित रहती है।  

          यदि आपको लगता है कि प्रारम्भिक युवावस्था का आनंद हमेशा के लिए खो गया है, यदि आप मानते हैं कि भावना और रोमांस क्षणभंगुर हैं, यदि आपको दैनिक जीवन सामान्य और नीरस लगता है, यदि आप कल्पना करते हैं कि आप अपने अवसरों से कुछ सार्थक बनाने के लिए बहुत बूढ़े या निर्बल हो गये हैं, तो आप केवल जी रहे हो, आप वास्तव में जीवित नहीं हो।

          यदि आपने बीमारी, गरीबी और दुख को नियति मानकर स्वीकार कर लिया है, यदि आप मानते हैं कि शरीर और मन की कोमलता, आनंदमय दृष्टिकोण और जीवन में संतुष्टि, एक मायावी मृगतृष्णा है, तो आप बिना सोचे समझे जीवित होने की प्रक्रिया से गुज़र रहे हैं, लेकिन वास्तव में जीवन जीने से बहुत दूर हैं। ऐसे विचारों के लिए उनके अस्तित्व में कोई स्थान नहीं है।

          वृद्धावस्था अनुभवों का खजाना है। वृद्ध इंसान पृथ्वी का सबसे बड़ा शिक्षालय है। वृद्धावस्था को मौत का प्रतीक्षालय बनाने की जगह उसे जीवन का अनूठा आयाम बनाएं। इस अवस्था को आध्यात्मिक उर्जा से परिपूर्ण बनाएं। अध्यात्म का मतलब है अपनी चेतना का परम चेतना में समर्पण। यदि आप वृद्ध या अतिवृद्ध भी हैं तो भी बुढ़ापे को बोझ न समझें, इसे ओजपूर्ण बनाएं। ऐसा करने से आपको जीवन में एक नये रस-रहस्य का अनुभव होगा।

          आईंस्टाइन मानते थे कि स्वयं अपने को लेकर मैं तो प्रतिदिन यही अनुभव करता हूं कि मेरे भीतर और बाहरी जीवन के निर्माण में कितने अनगिनत व्यक्तियों के श्रम और कृपा का हाथ रहा है और इसी अनुभूति से उद्दीप्त मेरा अंतःकरण कितना छटपटाता है कि मैं कम-से-कम इतना तो इस दुनिया को दे सकूं जितना कि मैंने उससे अभी तक लिया है।

         तो आप क्या कर रहे हैं, जीवन जी रहे हैं या केवल जीवित हैं?

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यू ट्यूब पर सुनें :

https://youtu.be/DEn73UskfQI

रविवार, 1 मार्च 2026

सूतांजली मार्च (प्रथम) 2026

 


जो दूसरों को इज्जत देते हैं, असल में वे खुद इज्जतदार होते हैं।

क्योंकि

इंसान दूसरों को वही देता है जो उसके पास होता है।

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बिना मोल का अनमोल रत्न

जी हाँ, एक ऐसा अनमोल रत्न जिसका कोई मोल नहीं है। इसका कोई  मूल्य नहीं चुकाना पड़ता है, आपको कोई मेहनत भी नहीं करनी पड़ती, आप जैसे हैं वैसे ही सहजता से रहते हैं। आपकी सहजता, आपका अपनापन, आपकी ईमानदारी, आपके स्वभाव से ही, यह रत्न स्वयं आपकी झोली में आ जाता है। एक बार यह रत्न आपके हाथ लग जाए तो इसे बड़ी सावधानी से रखना पड़ता है। नहीं-नहीं कोई पहरेदार, ताला चाबी, लॉकर में नहीं रखा जाता। हर समय आपके साथ ही रहता है। एक बार खो जाए, टूट जाए तो फिर वापस नहीं मिलता, नहीं जुड़ता।  और सब से आश्चर्य की बात यह है कि आपको खुद पता नहीं चलता कि यह आपको कब, कैसे और क्यूँ मिला और कब, कैसे और क्यों खो गया, बस अटकलें लगा सकते हैं। एक बात और यह होता किसी और का है लेकिन रहता आपके पास है।

स्वामी मंथर गति से अपने घर की ओर लौट रहे थे। आज मठ से लौटते उन्हें देर हो गई थी। उस छोटे से कस्बे में सड़कें सुनसान हो चली थीं। स्वामी निश्चिंत चले जा रहे थे कि अचानक उनकी नजर एक व्यक्ति पर पड़ी। उसके रंग-ढंग से उन्हें लगा कि वह थोड़ा घबड़ाया हुआ और परेशान है। उन्होंने अंदाज लगाया कि शायद परदेशी है। स्वामी को देख, वह उनके पास आया और किसी धर्मशाला का पता पूछा। स्वामीजी ने उसे पास की एक धर्मशाला का पता दिया, लेकिन इस पर उसने पूछा, "क्या मैं वहाँ बिना बिस्तर के रह सकूँगा?"

"क्या मतलब?" स्वामी जी को प्रश्न बड़ा अटपटा सा लगा।  

"बात यह है," उस व्यक्ति ने बताया, "धर्मशाला वाले उसी को ठहरने देते हैं, जिसके पास बिस्तर या सन्दूक होता है, परंतु मेरे पास बस यही एक थैला है ।"

"क्यों? ऐसे क्यों?"

"वे कहते हैं कि जिनके पास बिस्तर नहीं है, वे या तो चोर हैं या बम-पार्टी वाले क्रांतिकारी।"

यह सुनकर स्वामीजी को हँसी आ गई। पर उन भाई की समस्या काफी उलझी हुई थी। तब क्या करें? वे इसी असमंजस में थे कि स्वामीजी ने उनसे कहा, "आइए! मेरे साथ, मेरी कुटिया में, यहाँ पास में ही मेरी कुटिया है। मेरे पास ठहरने में तुम्हें कोई दिक्कत नहीं होगी।"

          वह व्यक्ति पहले तो कुछ समझा नहीं और जब समझा तो हिचकिचाया लेकिन उसके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था। अतः उन्हीं के पास उनकी कुटिया में ही कुछ दिनों के लिए ठहर गया। कुटिया साफ सुथरी और बड़ी थी।

          अगले दिन अचानक स्वामी को एक तार मिला, लिखा था-"माँ सख्त बीमार है, एकदम आओ।" उन्होंने जल्दी-जल्दी सामान बटोरा। गाड़ी जाने में केवल एक घंटा शेष था। उन्होंने उसी गाड़ी से जाने का निश्चय किया, पर वह अतिथि उस समय घर पर नहीं थे और शीघ्र लौटने की कोई आशा भी नहीं थी। तब उन्होंने एक पत्र लिखा, जिसमें तार की चर्चा करके बताया कि वे घर जा रहे हैं, वह आराम से कमरे में रहें, और जाते समय चाबी उसी स्थान पर रख दें। फिर ताला लगा, चाबी को चिट्ठी में लपेट उसी स्थान पर रख दिया, जहाँ पर रखने का नियम था। उन्हें आशा थी कि वह दो-तीन दिन में लौट आएँगे, लेकिन समय कुछ ज्यादा लग गया। जब लौटे तब  फिर अपने काम में लग गए।

उनके मस्तिष्क में यह बात बिलकुल ही नहीं आई कि अपने पीछे वह मकान में एक अंजान अतिथि को छोड़ गए थे। वह अंजान व्यक्ति वास्तव में अतिथि ही था। स्वामीजी ने देखा कि अतिथि ने उनसे जो कुछ पाया था, उसे वह वहीं सुरक्षित अवस्था में छोड़ गया था।

वह 'जो कुछ' क्या था? – वह था - 'भरोसा' !

'भरोसा ही बिना मोल के मिलने वाला अनमोल रत्न है।

इस रत्न को सहेज कर रखिए। कभी हाथ से फिसलने मत दीजिये। हिफाजत से रखिए।

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यू ट्यूब पर सुनें :

 https://youtu.be/whz0m6lKqIw

सूतांजली अप्रैल (द्वितीय) 2026

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