रविवार, 1 फ़रवरी 2026

सूतांजली फरवरी (प्रथम) 2026

 


समय कम है,

लेकिन,

अभी भी समय  है।

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मन का उपद्रव

ओशो के व्याख्यान पर आधारित

 

          मन तर्कनिष्ठ है और जीवन रहस्य। जीवन कोई गणित नहीं है, न ही कोई व्यापारी है। जीवन किसी प्रेमी का प्रेम है, प्रेम की अनुभूति है, किसी कवि का स्वर है, संगीतज्ञ की स्वर लहरी है। जीवन सौंदर्य है, काव्य है, प्रेम है, लेकिन, मन यह नहीं मानता। तर्क टेढ़ी-मेढ़ी डगर है, यह हमें टेढ़े मार्ग पर ले जाता है, और जब तक हम उस टेढ़े मार्ग पर चलते रहेंगे तब तक जो सीधे मार्ग पर चलने से मिल सकता था, उससे हम वंचित रहेंगे।

          सारा उपद्रव मन का ही है। मन तूफान है। मन हमारे भीतर उठती तरंगें हैं, लहरें हैं, और हम पूछते हैं, "उपद्रव कैसे शांत हो?" इसका सरल और सीधा एक ही उपाय है कि उपद्रव ही न हो।

          मन हज़ार बहाने खोजता है। कभी कहता शरीर ठीक नहीं है, कभी तबीयत जरा ठीक नहीं है। कभी कहता है घर में काम है, कभी कहता है बाज़ार है, दुकान है, .... हज़ार बहाने हैं। ध्यान से बचने की मन पूरी कोशिश करता है। क्योंकि ध्यान सीधा रास्ता है। रास्ता, जो मंदिर में ले जाता है, इधर-उधर, यहाँ-वहाँ नहीं ले जाता।

          परमात्मा से लोग वंचित हैं - इसलिए नहीं कि वह बहुत कठिन है। वंचित इसलिए है कि वह बहुत सरल है। परमात्मा इसलिए वंचित नहीं है कि वे बहुत दूर है, इसलिए वंचित है कि वे बहुत पास हैं, उसे पाने में कोई कठिनाई नहीं है।

          अगर दूसरे शहर जाना हो, दूसरे गाँव जाना हो तो, तो दूर की यात्रा है, मन निकल जाता है। लेकिन अगर पास वाले कमरे में जाना हो तो? बगल के पड़ोसी के जाना हो तो? पास ही है, यात्रा में यात्रा ही नहीं है। कहाँ जाना है? कहीं जाना ही नहीं है? अगर कहीं जाना है ही नहीं तब मन नहीं निकलता।

          हमारा मन जिस चीज में जटिलता पाता है, उसी में और उसी अनुपात में रस लेता है।  ज्यादा जटिलता ज्यादा रस, कम जटिलता कम रस। क्योंकि चाल टेढ़ी-मेढ़ी हो तो चलने में रस है। सीधे-सीधे में, साफ-सुथरे में मन कहता है, "कुछ रस नहीं, क्या करोगे? इतनी साफ-सुथरी है, कोई भी पहुंच सकता है। मेरी क्या विशिष्टता?"

          दरअसल धर्म बड़ी सीधी चीज़ है, लेकिन मन के कारण पुरोहितों ने धर्म को बहुत जटिल बना दिया, क्योंकि जटिलता में ही रस है, अपील (appeal) है। तो उलटी-सीधी हज़ार चीजें धर्म के नाम से चल रही हैं। उपवास करो, शरीर को सताओ, इस पर्वत पर जाओ, उस नदी में स्नान करो, इस मंदिर में जाओ, वो पूजा-पाठ करो, जप-तप करो और भी न जाने क्या-क्या। उलटा-सीधा बहुत कुछ चल रहा है। और वह चलता इसलिए है क्योंकि हमें यह जँचता है।

          अगर कोई कहे कि बात बिलकुल सरल है, बात इतनी सरल है कि कुछ करना ही नहीं है, सिर्फ खाली, शांत बैठकर भीतर देखना है तो हम उसे छोड़कर चले जाएंगे। हम कहेंगे, "जब कुछ करने को है ही नहीं, तो क्यों समय खराब करना? कहीं और जाएँ, जहाँ कुछ करने को हो।" बस समझ लीजिये कि मन का उपद्रव शुरू हो गया।

          अगर हमें परमात्मा ऐसे ही घर के पीछे ही मिलता हो तो हमारा रस ही खो जाए। हम कहेंगे यह तो जन्मों-जन्मों की बात है, युगों की बात है परमात्मा ऐसे कहीं मिलता है? ऐसे परमात्मा अचानक एक दिन आ जाए और हमें गोद में उठा कर कहे "भाई, मैं आ गया। तुम बड़ी प्रार्थना वगैरह करते थे। अब हम हाज़िर हैं, बोलो!" हम फौरन आँख बंद कर लेंगे, यह सच हो ही नहीं सकता। कोई बहुरूपिया है।           अगर परमात्मा ऐसे ही आ जाए चुपचाप, और कहे कि मैं आ गया; तुमने याद किया था, तो हम कभी भरोसा नहीं करेंगे, कहेंगे यह झूठ है, मक्कारी है। कोई स्वप्न देख रहा हूँ। यह हो ही नहीं सकता।

          हम सरल को मान ही नहीं सकते। क्या परमात्मा ऐसे ही आता है? अगर हमारे मन की टेढ़ी-मेढ़ी चाल न हो, अगर हम सीधे-सरल होकर बैठ जाएँ तो?  परमात्मा ऐसे ही आता है कि उसकी  पगध्वनि भी नहीं सुनाई पड़ती। एक क्षण पहले नहीं था और एक क्षण बाद है। अचानक हम उस दिव्य प्रकाश से भर जाते हैं। अचानक हम देखते हैं कि उसके मेघ ने हमें घेर लिया है। उसके अमृत की वर्षा होने  लगी है।

          हम कभी यह भी न समझ सकेंगे कि मेरी क्या योग्यता थी कि परमात्मा आया! हम कभी समझ ही नहीं सकेंगे कि मेरी पात्रता क्या थी कि परमात्मा मिला?  क्योंकि योग्यता की बात तो तर्क की बात है। परमात्मा किसी पात्रता से थोड़े ही मिलता है। मैंने ऐसा क्या किया था जिसकी वजह से परमात्मा मिला? क्योंकि कुछ करने से परमात्मा नहीं मिलता। वह तुम्हें मिला हुआ ही है। तुम उसे खो ही नहीं सकते। मन की टेढ़ी-मेढ़ी चाल है कि तुम्हें लगता है खो गया। फिर खोज का सवाल उठता है। जिसे कभी खोया नहीं, उसे हम खोजने निकल जाते हैं!

          जिस दिन परमात्मा मिलता है, उस दिन प्रसाद-रूप, अकारण ही मिलता है। हम ज़रा बैठें। हम दौड़े नहीं। हम थोड़ा मन को विसर्जित करें। हम मन की न सुनें। हम मन के धुएं से ज़रा अपने को मुक्त करें। हम ज़रा मन की घाटी से हटें। थोड़ा-सा फासला मन से बनायें और परमात्मा से सारी दूरी मिट जाती है। इसे हम ऐसे कह सकते हैं कि जितने मन के पास हैं, उतने ईश्वर से दूर। जितने मन से दूर, उतने ईश्वर के पास।

          जिस दिन मन नहीं है, उस दिन हम परमात्मा हैं।

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यू ट्यूब पर सुनें :

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