शनिवार, 1 अगस्त 2026

सूतांजली अगस्त (प्रथम) 2026


 

मंज़िल यूँ ही नहीं मिलती राही को,

          जुनून-सा दिल में जगाना पड़ता है।

                    पूछा चिड़िया से कि घोंसला कैसे बनता है

                    वह बोली तिनका-तिनका उठाना पड़ता है।

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आनंद कहाँ है?

अकबर समझ नहीं सका, पूछने लगा, 'किस लिए? किस के लिए?'

तानसेन ने प्रति प्रश्न किया,

'नदियां किस लिए बह रही हैं?

फूल किस लिए खिल रहे हैं?

सूर्य किस लिए निकल रहा है?

यह किस लिए तो मानव की बुद्धि ने पैदा किया है,

सारा जगत परिपूर्ण है, केवल मानव को छोड़कर, बस वही अधूरा है।

संगीत सम्राट तानसेन, अकबर के नौ-रत्नों में एक, संगीत का बादशाह। जब उसके गायन की स्वर-लहरी हवा में लहराती तो सब मंत्रमुग्ध हो जाते। बादशाह के वे विशेष प्रिय दरबारी थे। ऐसे ही एक गायन के बाद बादशाह ने भाव विभोर होकर तानसेन से कहा, “तुम्हारे संगीत में जादू है, जब भी तुम्हारे संगीत को सुनता हूं, तो मन में ऐसा खयाल उठता है कि तुम जैसा बजाने वाला शायद ही पृथ्वी पर कोई और हो और आगे भी कभी होगा, यह भी भरोसा नहीं होता, तुम शिखर हो।”

तानसेन ने बड़ी विनम्रता से कहा, “नहीं, शहंशाह मैं कुछ भी नहीं हूं। मैं तो अपने गुरु के चरणों की धूल भी नहीं हूं। आप शिखर की बात कर रहे हैं  मैं तो उनके सामने भूमि पर भी नहीं हूं। मैं तो उनके चरणों में भी बैठने योग्य नहीं हूँ। कभी उनके चरणों में बैठने की योग्यता भी हो जाए, तो अपने आप को धन्य समझूँगा, समझूँगा कि बहुत कुछ पा लिया।'

अकबर आश्चर्य चकित रह गए। हर कीमत पर तानसेन को अपने गुरु को दरबार में उपस्थित करने कहा, 'अगर तुम्हारे गुरु जीवित हैं तो तत्क्षण उन्हें दरबार में ले आओ, जो भी भेंट करनी हो, देंगे।”

लेकिन तानसेन ने अपनी असमर्थता जाहिर की, “यही कठिनाई है, क्योंकि उन्हें कुछ लेने को राजी नहीं किया जा सकता, वहां कुछ लेने का प्रश्न ही नहीं है।'

अकबर 'कुछ लेने का प्रश्न नहीं है? तो क्या उपाय किया जाए?'

तानसेन - 'कोई उपाय नहीं, आपको ही चलना पड़ेगा।'

अकबर, चलने तैयार हो गया। लेकिन तानसेन ने उन्हें रोक दिया, कहा, 'अभी चलने से तो कुछ हासिल नहीं होगा। क्योंकि, कहने से वे बजाएंगे, ऐसा नहीं है। जब वे बजाते हैं, तब कोई सुन ले, बात और है। मैं पता लगाता हूं कि वे कब बजाते हैं।”

हरिदास फकीर उनके गुरु थे, यमुना के किनारे रहते थे। गाने-बजने का कोई समय नहीं था। कभी कई दिनों तक नीरवता तो कभी रात तीन बजे उठकर बजाते हैं, नाचते हैं। अकबर और तानसेन को देखकर तो बजाएँगे ही नहीं। दोनों, चोरी से झोपड़ी के बाहर ठंडी रात में छिपकर बैठे रहे, कई रातें गुजर गईं। कुछ सुनने नहीं मिला। और फिर अचानक एक मध्य रात्रि वातावरण जैसे अंगड़ाई लेता उठ बैठा, पुष्प खिल उठे, मंद बयार बहने लगी, रोम-रोम  पुलकित हो उठा, निःशब्दता में संगीत फैल गया। पूरे समय अकबर की आंखों से आंसू बहते रहे, पत्थर की मूर्ति कि तरह बैठा रहा, उसके होठों से एक स्वर भी प्रस्फुटित नहीं हुआ।

संगीत बंद हुआ, तंद्रा टूटी, दोनों मौन वापस चल दिये। महल के द्वार तक कोई वार्तालाप नहीं। अकबर अभी तक स्वर-लहरी में डूबा था। महल के द्वार पर तानसेन से इतना ही कहा, 'तुम अपने गुरु जैसा क्यों नहीं बजा सकते हो?'

तानसेन - 'बात बस इतनी सी है कि मैं कुछ पाने के लिए बजाता हूं, और मेरे गुरु ने कुछ पा लिया है, इसलिए बजाते हैं। मेरे बजाने के आगे कुछ लक्ष्य है, उसमें मेरे प्राण हैं। इसलिए बजाने में मेरे प्राण पूरे कभी नहीं हो सकते। बजाने में मैं सदा अधूरा हूं, अंशमात्र हूं। बजाना मेरे लिए साधन है, साध्य नहीं है। साध्य कुछ और है - भविष्य में, धन में, यश में, प्रतिष्ठा में - साध्य कहीं और है, संगीत तो सिर्फ साधन है। साधन कभी आत्मा नहीं बन पाती, साध्य में ही आत्मा अटकी होती है। अगर साध्य बिना साधन के मिल जाए, तो साधन को छोड़ दूं अभी। लेकिन नहीं मिलता साधन के बिना, इसलिए साधन को खींचता हूं। लेकिन दृष्टि, प्राण, आकांक्षा और सब घूमते हैं साध्य के निकट। लेकिन जिनको आप सुनकर आ रहे हैं, संगीत उनके लिए कुछ पाने का साधन नहीं है। आगे कुछ भी नहीं है, जिसे पाने को वे बजा रहे हैं। बल्कि पीछे कुछ है, जिससे उनका संगीत फूट रहा है और बज रहा है। कुछ पा लिया है, कुछ भर गया है, अब वह बह रहा है। कोई अनुभूति, कोई सत्य, कोई परमात्मा प्राणों में भर गया है। अब वह बह रहा है।'

अकबर कुछ समझ नहीं सका, पूछा, 'किस लिए? किस के लिए?'

तानसेन ने कहा, 'किस लिए? सारा जगत परिपूर्ण है, केवल मानव को छोड़कर, वह अधूरा है। सारा जगत आगे के लिए नहीं जी रहा है, सारा जगत भीतर से जी रहा है। फूल खिल रहा है, खिलने में ही आनंद है। सूर्य निकल पड़ा है, निकलने में ही आनंद है। हवाएं बह रही हैं, बहने में ही आनंद है। आकाश है, होने में ही आनंद है। आनंद आगे नहीं, अभी है, यहीं है।'

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यू ट्यूब पर सुनें :

https://youtu.be/Est7BT77qK4

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सूतांजली अगस्त (प्रथम) 2026

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