आप
जो कुछ भी करते हैं
उसे
करने का आनंद लीजिये,
आप
जो करते हैं
उसमें
दिलचस्पी लीजिये,
उसे
बेहतर और बेहतर कीजिये
प्रगति
में ही
सच्चा
आनंद निहित है ।
- श्रीमां
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दर्शन - तब और अब
एक
समय था, जब हमें मंदिरों-आश्रमों-आध्यात्मिक एवं पवित्र
स्थलों में एक शांति का अनुभव होता था और सहज ही लग जाता था। गर्भ गृह में एक
विशेष अनुभूति होती थी और एक विशेष सकारात्मक स्पंदन का स्पष्ट अनुभव होता था। लेकिन
अब परिस्थिति बदल गई है, इन दिनों ऐसे अनुभव प्रायः नदारद
हैं, या हल्के हैं, या काफी कठिनाई से अनुभव करते हैं। उन्हीं स्थलों में अब एक
अलग-सा वातावरण अनुभव करते हैं। कभी-कभी मन शांत होने के बजाय उद्विग्न हो जाता है, खिन्न भी। क्यों?
अब
इन स्थलों में यह कम या अधिक अन्धकारपूर्ण और विजातीय तत्त्वों का आक्रमण-सा होता
है, वे, हो सकता है शुभेच्छा के
साथ आ आते हों, पर वे साथ ही लगभग पूर्ण अज्ञान लेकर आते हैं
और सारा-का-सारा यहाँ वातावरण में फेंक देते हैं; और इसलिए,
स्वाभाविक रूप से जो उस समय हो रहा होता है, उसके
प्रति यदि हम ज़रा-सा भी ग्रहणशील होते हैं तो हम इस परिवर्द्धित अज्ञान के बोझ
तले अपने को कुचला हुआ अनुभव करते हैं।
ऐसा
नहीं है कि इन स्थानों पर कोई अज्ञान नहीं हैं, पर फिर
भी, मात्रा थोड़ी भिन्न है। यहाँ, उस
सबके लिए दिन-रात, दृश्य-अदृश्य रूप में चेतना में एक प्रकार
की निरन्तरता, चल रही है; और कोई इसे चाहे
या न चाहे, सब
चीज़ों के बावजूद हम इसे अपने अन्दर ग्रहण करते हैं और कुछ काल के बाद वह अपना कार्य
करने लगती है।
जब
थोड़े-से लोग आते हैं तो कुछ चीजें बदलती हैं, पर वह परिवर्तन
इतना अधिक नहीं होता जिससे कि कोई दुःखद अनुभव हो; परन्तु जब
आज के समय की, इस प्रकार की भीड़ आती है, एक प्रकार से इन स्थानों पर एकाएक टूट पड़ती है, तब
समूचा स्तर तुरंत नीचे गिर जाता है, और यदि हम उन्हें अपने
अन्दर प्रवेश करने में रोकने में असफल हों, तथा अपने मस्तक
को इन डुबाने वाली तरंगों से, अज्ञान की इस ग़र्क़ करने वाली
बाढ़ से, अपने को ऊपर बनाये रखने में समर्थ न हों, यदि हम अपना सिर इससे ऊपर न उठा सके तो, हम बहुत
बेचैनी अनुभव करते हैं।
उन
दिनों, विशेष दर्शन के दिन या विशेष त्योहारों पर दर्शन
देने से पहले, सर्वदा ही कुछ शक्तियों की या उस विशिष्ट
अनुभूति की एकाग्रता होती थी जिसे वे लोगों को देना चाहते थे। और इसलिए प्रत्येक
दर्शन एक कदम आगे बढ़ना होता था; हर बार कोई चीज़ जोड़ी जाती
थी। परन्तु यह उस समय होता था जब कि दर्शनार्थियों की संख्या सीमित होती थी। यह सब
दूसरे ढंग से व्यवस्थित होता था, और यह उस दिन के लिए आवश्यक
तैयारी का एक अंग था। इसी कारण, कई विशाल एवं तीर्थस्थलों के
मंदिरों में, तब भी
दर्शनार्थियों की संख्या अधिक होती थी लेकिन इसके बावजूद सब कुछ व्यवस्थित होता
था।
ऐसा
प्रतीत होता है कि यह वही चीज़ है जो उन लोगों के साथ होती है जो विशेष दिनों पर, जैसे जन्मदिन पर, अधिक ग्रहणशील होते हैं अथवा
जिन्हें अपनी ग्रहणशीलता जगाने के लिए किसी विशेष घटना को याद करने की ज़रूरत होती
है।
परन्तु
यह विशेष एकाग्रता, अब, अन्य समयों पर होती है,
केवल विशेष दर्शन-दिवसों पर नहीं। और यह दूसरे अवसरों पर, अन्य परिस्थितियों में पहले से कहीं अधिक होती है। यह क्रिया बहुत अधिक
तेज़ हो गयी है, गति बढ़ गयी है; अवस्थाएँ
एक के बाद एक बहुत तीव्रता से आती हैं। और सम्भवतः उनका अनुसरण करना अधिक कठिन हो
गया है; बहरहाल, यदि हम अनुसरण करने की
परवाह नहीं करते तो वह पहले की अपेक्षा अधिक तेज़ी से पीछे छूट जाती है; हमें लगता है कि हमें देर हो गयी है अथवा वह छोड़ दिया गया है। सारी चीजें
शीघ्रता के साथ बदलती हैं।
और
यह कहना ही होगा कि इन विशेष दर्शन-दिवसों का, लोगों
की इस सब भीड़ के रहते आन्तरिक प्रगति की दृष्टि से उतना अधिक लाभ नहीं होता - अर्थात्
मंदिर-आश्रम के अन्दर - जितना कि बाहर की ओर फैलाव के लिए होता है। इन दिवसों की
उपयोगिता कुछ भिन्न प्रकार की है; यह उपयोगिता, सर्वोपरि, आगे बढ़ने के लिए, एक
विशालतर क्षेत्र अधिगत करने तथा अधिक सुदूर बिन्दुओं तक पहुँचने के लिए है। परन्तु
एकाग्रता कम होती है और एक बड़ी भीड़ की यह असुविधा होती है, जो थी तो हमेशा से ही, पर जो इन विगत वर्षों में
प्रारम्भ के दिनों की अपेक्षा बहुत अधिक बढ़ गयी है। प्रारम्भ में ऐसी भीड़ नहीं
होती थी; और संभवतः
अब भीड़ भी थोड़ी भिन्न प्रकार की होती है।
इस भीड़ को न तो आप रोक सकते हैं और न ही नियंत्रित कर सकते हैं, लेकिन आप अपने आप को व्यवस्थित कर सकते हैं। ऐसे वातावरण से, ऐसी भीड़ से अपने आप को अलग रखिए, इनसे मत जुड़िये, अपने आप को इनसे असंतृप्त रखिये।
तब आप ऐसा अनुभव नहीं करेंगे।
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