यहां ऐसा कुछ नहीं है जो बुरा हो,
वे
केवल अपने स्थान पर नहीं हैं,
देश
में ही नहीं, काल में भी।
श्रीमाँ
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प्रकाश की ओर बढ़ना है
कोई ऐसा मनुष्य नहीं जिसमें गुण न हों, कोई ऐसा मनुष्य नहीं जिसमें अवगुण न हो। हर मनुष्य में गुण भी हैं और
अवगुण भी, यह तो हम पर निर्भर करता है कि हम किस तरह अपने-आप
पर क़ाबू पाकर, उन अवगुणों को गुण में परिवर्तित करें। काले
से काले दिल में भी दीपक की एक लौ होती है और रौशनी से भरपूर दिल में भी एक काली
परछाईं होती है। क्रोध, हिंसा, असत्य,
क्रूरता, लालच, आलस्य इत्यादि बहुत ही
नकारात्मक भावनाएँ हैं जो मनुष्य को प्रकाश से दूर, अंधकार की ओर ले जाती हैं। आज दुनिया को इस नकारात्मकता
के घने काले बादलों ने घेर लिया है। लेकिन इस अँधेरे को रौंदता हुआ एक दिन प्रकाश
ज़रूर निकलेगा।
मशहूर शास्त्रीय संगीतकार स्व. पं. श्री
भीमसेन जोशी गायकी में माहिर थे, पण्डितों के पण्डित
थे। उनका तीन घंटे का कार्यक्रम भी छोटा लगता था! जितना प्रेम और उत्साह उनको
संगीत के लिए था, उतना ही गाड़ियों के लिए भी था! नयी
गाड़ियाँ ख़रीदने में और ख़ासकर उन्हें चलाने में, वे खूब
दिलचस्पी रखते थे। कई बार तो गाने के कार्यक्रम में वे ख़ुद 18 घण्टे का सफर भी बिना रुकावट के पूरा कर लेते थे,
फिर पन्द्रह मिनट में मुँह-हाथ धोकर तैयार हो जाते थे! और बिना
रुकावट के पूरे तीन घण्टे गा लेते थे!
एक बार ऐसा ही एक कार्यक्रम समाप्त कर वे रात के नौ बजे,
अपनी गाड़ी में, अपनी पूरी टोली के साथ निकल
पड़े। पेट्रोल-पम्प गये तो वहाँ के एक कर्मचारी ने उन्हें पहचान लिया और उनसे
निवेदन किया, "पण्डितजी, पौ फटने पर जाइयेगा। रास्ते में घनघोर जंगल है, अभी निकलेंगे
तो डाकुओं का शिकार बन जायेंगे। उस रास्ते से रात को सफ़र करने की किसी की हिम्मत
नहीं होती। पण्डितजी, यह ज़िन्दगी और मौत का सवाल है, यह जानते हुए भी आप क्यों ख़तरा मोल ले रहे हैं?" लेकिन पण्डितजी अपने निश्चय से टस-से-मस नहीं हुए। उनका सुबह नौ बजे गाना
प्रस्तुत करने का वादा किया हुआ था और वे अपने वादे के पक्के थे। भगवान् भरोसे वे
निकल पड़े, शहर से बाहर जंगल की ओर। घुप्प अँधेरा था, और गाड़ियों का यातायात भी न के बराबर था!
पण्डितजी तो निडर होकर अन्धकार को चीरते
हुए तेजी से चले जा रहे थे। कुछ 40-50 किलोमीटर की दूरी तक सफ़र अच्छा रहा,
और फिर... क़यामत उन पर टूट पड़ी!!! रास्ते के बीचों-बीच बड़े-बड़े
पत्थरों और टहनियों से बनी एक दीवार खड़ी थी! पण्डितजी को गाड़ी एकदम से रोकनी
पड़ी। सब की बोलती बन्द हो गयी थी। सहमी हुई टोली बद-से-बदतर परिणामों का चुपचाप
इन्तज़ार कर रही थी। हर एक सदस्य अपने-अपने तरीक़े से अपने-अपने भगवान् की प्रार्थना
करने में जुट गया।
कुछ क्षण बाद, अन्धकार में से
अचानक २०-३० आकृतियाँ उभरीं, और गाड़ी पर टूट पड़ीं। किसी के
हाथ में लाठी, किसी के हाथ में चाकू, तो
किसी के हाथ में बन्दूक! गाड़ी थपथपा कर उनके सरदार ने सब को बाहर निकलने का आदेश
दिया। उसके हाथ में एक मशाल थी। थर-थर काँपते हुए सभी सदस्य एक-एक करके नीचे उतरे।
मशाल की रोशनी में सरदार ने एक-एक को घूरा। अन्त में उतरे पण्डितजी, बिना डर के जैसे ही मशाल की रोशनी उनके चेहरे पर पड़ी तो अचानक सरदार बोल उठा,
"पण्डितजी, आप? आपके
दर्शन करके मैं धन्य हो गया हूँ!" सबके भयभीत चेहरों पर आश्चर्य की लहर दौड़
गयी। पण्डितजी बोले, "तुम तो एक डाकू हो, खूनी हो, तुम्हारा संगीत से क्या वास्ता? तुम मुझे कैसे जानते हो?" सरदार, विनम्रता से बोला, "पण्डितजी, आज से 20 साल पहले, आपने हमारे विद्यालय में गाने का
एक कार्यक्रम प्रस्तुत किया था। आपकी गायकी को सुन कर मैं मन्त्रमुग्ध हो गया था,
ख़ासकर एक भजन सुन कर मैं तो दीवाना हो गया था। आज तक वह भजन मुझे
याद है। बीस सालों से यह आस लगाये बैठा हूँ कि दोबारा मैं आपके मुँह से वह भजन सुन
पाऊँ, लेकिन वह आशा कभी पूरी नहीं हो पायी। मगर आज आप ख़ुद
यहाँ चल कर आ गये! यह मेरा सौभाग्य है। हाथ जोड़ कर यह विनती करता हूँ आपसे,
वह भजन मुझे गाकर सुनाने की कृपा करें, मेरे
कान तरस गये हैं उसे सुनने को!"
पण्डितजी कुछ क्षण चुप रहे,
मानों उस डाकू के शब्दों की सच्चाई को भाँप रहे हों। उन्हें उसके
दिल में एक टिमटिमाता दिया दिखा, और उसे प्रज्वलित करने वे भजन
सुनाने तैयार हो गए। सबों ने गाड़ी से अपने-अपने वाद्य यन्त्र निकाले, और सड़क के किनारे, जंगलों के बीचों-बीच, घास और सूखे पत्तों की कालीन पर विराजमान होकर कार्यक्रम शुरू कर दिया! पूरी
दुनिया में मशहूर, पण्डित भीमसेनजी की सभा में समाज के
उच्चतर वर्ग के लोग हुआ करते थे... लेकिन आज उनकी सभा में बस चोर, डाकू, खूनी और लुटेरे ही थे! फिर भी इन दो विपरीत क़िस्मों की सभाओं में एक चीज़
ज़रूर मेल खा रही थी, और वह थी संगीत के लिए प्रेम। कहते हैं
कि संगीत सभी वर्गों के भेद-भावों के, भाषाओं के परे होता है,
और पण्डितजी की गायकी यह बयान कर रही थी।
प्रकाश की एक छोटी-सी किरण हर किसी के
दिल में सुलगती है। कौन विश्वास करेगा कि भयंकर डाकुओं के सरदार के दिल में एक ऐसा
मर्मस्थल था कि बीस सालों से उसके अन्दर भगवान् के गुणगान करता हुआ एक भजन सुनने
की आस थी! भगवान् हम सभी में मौजूद हैं, हम
चाहे समाज के किसी भी वर्ग के क्यों न हों। अक्सर परिस्थितियाँ हमें ग़लत रास्ते
पर चलने को मजबूर कर देती हैं, लेकिन परिस्थितियाँ चाहे
कितनी भी कठिन क्यों न हों, ग़लत रास्ते पर चल पड़ने से पहले
चुनाव तो हमारे ही हाथों में होता है। तमस भरे दिल में भी प्रकाश की एक किरण होती
ही है। हमें बस सचेत होकर प्रकाश की ओर बढ़ना है!
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