भगवान
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को
दिव्य-दृष्टि
देकर अपने दर्शन कराये।
हमारे
पास वह दिव्य-दृष्टि नहीं है, परंतु
उसे
प्राप्त करने की शक्ति
अवश्य
हमारे पास है
और वह
शक्ति है
“श्रद्धा”
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गीता का प्रयोजन, भाव और नीति
श्रीमदभगवद्गीता
सनातन धर्म का अद्भुत ग्रंथ है। गीता ही एकमात्र ऐसा धार्मिक ग्रंथ है जो विश्व के
अन्य सब धर्म ग्रन्थों से अलग एक स्वतंत्र ग्रंथ नहीं बल्कि एक अन्य ग्रंथ, महाभारत का अंश है। कमोबेश हम सब
गीता से परिचित हैं लेकिन अगर हमें संक्षेप में इस ग्रंथ की बातें बतानी हो तो
प्रायः हम सब एक बार तो मौन हो जाएंगे, समझ ही नहीं पाएंगे
की कहाँ से प्रारम्भ करें और कहाँ समाप्त? इसका प्रमुख कारण
एक ही है कि हमने कभी इसे पढ़ने-समझने का प्रयत्न किया ही नहीं है। इधर-उधर से सुन
कर बस एक धारणा बना ली और उसी से काम चला रहे हैं।
अनेक लोग तो गीता के कुछ एक–आध श्लोक को
लेकर बस उन्हें ही गीता की पूरी शिक्षा मान लेते हैं। यथा, 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन'- कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, फल या परिणाम पर
नहीं, यानी निष्काम कर्म को ही गीता की पूरी शिक्षा मान लेते
हैं। क्या ऐसा है?
युद्ध प्रारम्भ होने के पहले ही कृष्ण घोषणा
कर चुके थे कि न तो वे युद्ध करेंगे न ही शस्त्र धारण करेंगे। अर्जुन निःशस्त्र कृष्ण को
स्वीकार करते हैं। कृष्ण अर्जुन का सारथी बनना भी स्वीकार कर लेते हैं। यानि कृष्ण
अर्जुन के पथ-प्रदर्शक और युद्ध के नेता होंगे।
पांडवों ने अलग-अलग कारणों से युद्ध में
भाग लेना स्वीकार किया था। पांडव क्षत्रिय थे और कौरवों ने उनके साथ असहनीय घोर
अन्याय किया था, कौरवों ने उनके राज्य को हड़प लिया था, कौरवों ने उनकी रानी द्रौपदी का बहुत अपमान किया था, पाण्डवों ने उसका बदला लेने की शपथ ली थी। इन सब के बावजूद उन्होंने शांति
के सभी उपाय किये। अपने राज्य के बदले केवल पाँच गाँवों पर समझौता करना चाहा पर उनकी
वह बात भी नहीं मानी गयी और उन्हें चुनौती दी गयी जिसे क्षत्रिय होने के नाते वे
टाल नहीं सके। पांडव रणक्षेत्र में पूर्ण विश्वास के साथ आए थे कि वे उचित मार्ग
पर थे, वे धर्म-परायण थे, और उनके शुभ-अशुभ
विचारों के अनुकूल था।
अब आती है निर्णायक स्थिति जब अर्जुन के कहने पर श्रीकृष्ण रथ को
ले जाकर दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कर देते हैं। अर्जुन अपने पितामह भीष्म को,
अपने धनुर्विद्या के गुरु द्रोण को, अपने मामा
शल्य को इनके अलावा अपने समस्त नाते एवं रिश्तेदारों को, जिनसे
उनको परस्पर प्रेम का संबंध है, उनमें से बहुत-से अपनी इच्छा के विरुद्ध या उत्तरदायित्व की भावना से
विरोधी-दल से जुड़े हुए हैं तो अर्जुन बहुत निराश हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि
अर्जुन को इसकी जानकारी नहीं थी, बस इतना ही था कि इस यथार्थ
पर पर्दा पड़ा था। देखते ही पर्दा उठ गया। हमारे आँखों पर भी ऐसा ही पर्दा पड़ा रहता
है और यथार्थ हमें नहीं सूझता। अर्जुन देखते हैं कि इस लड़ाई में बड़ा खून-ख़राबा
होगा, चाहे जो भी जीते, नर-हत्या तो
बेतहाशा होगी। अर्जुन ने यह भी सोचा कि ऐसे हत्याकाण्ड के बाद, अपने पितामह और गुरु की हत्या करने के बाद अगर राज्य प्राप्त भी कर लिया
तो उसका क्या उपयोग होगा? पर्दा हटते ही जीवन के बारे में,
नीति के बारे में अर्जुन की दृष्टि ही बदल जाती है।
अर्जुन सात्त्विक-राजसिक पुरुष है,
सर्वोत्तम पुरुष है, सबसे अधिक नीतिवान पुरुष
है, सबसे अधिक साहसी पुरुष है, सत्य की
दृष्टि से मन जितना ऊँचा उठ सकता है उतने ऊँचे उठे हुए पुरुष हैं। उनके भी विचार
डिग गये हैं। उनके शुभ और अशुभ के पुराने विचार असफल हो गये। अब उन्हें दो ही
विकल्प दिखायी देते हैं - या तो वे कौरवों की हत्या करें या कौरव उनका अन्त कर
दें। लेकिन वे हत्या नहीं करेंगे। उन्हें "रक्त-रंजीत सिंहासन नहीं चाहिये”, वे मरने या
संन्यास लेने तैयार हैं। आध्यात्मिक और नैतिक दोनों दृष्टियों से ही अर्जुन को यह युद्ध
ग़लत लगने लगा। वे किंकर्तव्यविमूढ़ हैं और युद्ध न करने के लिए कृष्ण के आगे
बहुत-सी युक्तियाँ रखते हैं।
यह अवस्था केवल अर्जुन की ही नहीं,
हर उस मनुष्य की होती है जो जीवन की ऐसी स्थिति में आता है जहाँ
जीवन के बारे में उसकी अपनी वृत्ति हिल जाती है। ऐसी अवस्था में अर्जुन कहते हैं,
"मैं सकपका गया
हूँ।" यद्यपि कृष्ण उनके मित्र हैं पर वे पहली बार कृष्ण को "आपका शिष्य हूँ" कहते हैं
मित्र नहीं और कहते हैं, "मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपकी शरण में आया हूँ, केवल आप ही मेरा
पथ-प्रदर्शन कर सकते हैं, मैं सचमुच नहीं जानता कि मुझे क्या
करना चाहिये।"
कृष्ण अर्जुन को युद्ध करने के अनेक कारण
बताते हैं। लेकिन अर्जुन उत्तर-प्रत्युत्तर करते हैं। श्रीकृष्ण के उत्तरों से अर्जुन
पूरी तरह सन्तुष्ट नहीं होते क्योंकि श्रीकृष्ण परम सत्य प्रकट नहीं करते। अन्ततः
ग्यारहवें अध्याय में कृष्ण अर्जुन को अपना विराट् रूप दिखलाते हैं। अर्जुन पहली
बार अनुभव करते हैं कि उनके सारथी साक्षात् प्रभु हैं। वे कहते हैं - हे कृष्ण,
हे यादव, हे मित्र आप की महिमा को न जानते हुए,
मैं शायद लापरवाह रहा या प्रेम-वश ऐसा किया। “हँसी-हँसी
में, प्रमाद और अज्ञानवश मैंने तुम्हें मित्र, कृष्ण, यादव, पता नहीं किस-किस
नाम से पुकारा, मुझे क्षमा कर दो”। पहली बार अर्जुन अनुभव
करते हैं कि परम प्रभु ही उनके मित्र बने हुए थे।
ग्यारहवें अध्याय के बाद अर्जुन के प्रश्न प्रश्न नहीं रहते, अब वे तर्क नहीं करते, ज़्यादा ग्रहणशील हो जाते
हैं। वे अनुभूति चाहते हैं और अन्त में इस निष्कर्ष पर आते हैं कि उन्हें जिस चीज़
की जरूरत है वह निष्काम कर्म नहीं, कर्मयोग है। कृष्ण के पूछने
पर "क्या तुम्हारी अस्त-व्यस्तता चली गयी?"
तो अर्जुन स्वीकार करते हैं, "हाँ,
मेरी अस्त-व्यस्तता चली गयी, हे हृषिकेश, मेरे हृदय में
विराजमान, तुम मुझे जिस तरह नियुक्त करोगे उसी तरह में
क्रिया करूँगा।"
यही गीता की शिक्षा का पूर्ण रूप है।
शुरू में अर्जुन अपने सखा से कहते हैं, "मैं
तुम्हारा शिष्य हूँ"- और अन्त में जब सारी अस्त-व्यस्तता चली जाती है तो वे
कहते हैं, "जिस भाँति नियुक्त करोगे उसी भाँति करूँगा"
- दोनों स्थितियों का उत्तर एक ही है, लेकिन पहली स्थिति में
उत्तर सामने खड़े हुए कृष्ण को दिया गया है और दूसरी अवस्था में हृदय में स्थित
कृष्ण को। अर्जुन कहते हैं- "आप सारे समय मेरा पथ-प्रदर्शन कीजिये, छोटी-बड़ी सभी बातों में रास्ता दिखलाइये। मैं और किसी कारण से नहीं लड़
रहा, केवल आपके आदेश के अनुसार चल रहा हूँ, युद्ध के और सब कारण जा चुके हैं।"
यह है अर्जुन का अपने मानसिक निष्कर्षों
से हट कर श्री कृष्ण के प्रति पूर्ण
समर्पण।
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