वह हमेशा उस चीज़ की तुलना में कुछ भी नहीं है
जो किया जाना बाकी है ।
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परख, अहंकार की
एक सेठ थे जिनका अच्छा-खासा जमा-जमाया लंबा
चौड़ा व्यापार था। बच्चे बड़े हो गए थे अतः अब पूरा व्यापार वही संभालते थे। लेकिन सेठजी
गद्दी में ही रहते और कुंजी उन्हीं के पास थी। बड़े सात्विक, धर्मात्मा, विनम्र और दयावान। कभी किसी ने उन्हें
ऊंची आवाज में बोलते नहीं सुना। साधु-संतों का आगमन और सत्संग भी होता रहता था।
किसी भी प्रकार का अभिमान उन्हें छू भी नहीं गया था। उनकी गद्दी में और दो व्यक्ति
थे, एक मुनीम और एक सेवक। सेवक वृद्ध हो चला था, आखिर एक दिन नौकरी छोड़ अपने गाँव चला गया। सेठजी को परेशानी होने लगी। उन्हें
एक सेवक की आवश्यकता थी। संयोग से एक युवक काम की तलाश में आया। सेठजी तो आदमी की
खोज में थे ही। उन्होंने उस युवक को देखा और काम पर लगा लिया।
लेकिन फिर अगले दिन उन्हें ख़याल आया कि
मैंने बिना परखे इसे रख लिया, कहीं धोखा न दे
जाये। अतः वे उसकी परीक्षा लेने लगे। यथा, रुपये गिराना, रुपये से भरे बटुए को गल्ले में बंद करना भूल जाना,
कीमती समान छोड़ देना आदि। लेकिन सेवक हर परीक्षा में बिना दाग के निकलता गया। सेवक, सब उठा-उठा कर सेठ को वापस देता गया। जैसे-जैसे परीक्षा आगे बढ़ती गई
सेठजी का विश्वास दृड़ तो हुआ लेकिन उनकी दुविधा भी बढ़ती गई। घर में बहुत-सी
क़ीमती चीजें हैं। कोई उठा ले गया तो बेकार नयी मुसीबत खड़ी हो जायेगी। इसकी और
जाँच करनी चाहिये। उधर सेवक को बात समझ आने लगी। सेठजी सब चीज़ों को बहुत सम्भाल
कर रखते हैं। ऐसी लापरवाही उनसे नहीं हो सकती। उसे जो भी मिला सेठजी को सौंपता रहा।
लेकिन उसे यह अच्छा नहीं लगा।
आखिर एक दिन सेठ सोने की एक भारी चेन
अलमारी के बाहर ही छोड़ गए। सेठजी ने विचार किया कि सम्भव है,
अधिक प्रलोभन सामने आने पर यह फिसल जाये। अगले दिन देखते क्या हैं
लड़का घर से गायब है। मन-ही-मन कहने लगे, मेरा अन्दाज़ा ठीक
था, लड़का सचमुच किसी बड़ी चीज़ की फिराक़ में था। अरे,
आजकल के लड़के बड़े चलताऊ होते हैं। उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
सेठजी इस ऊहापोह में थे, की उन्हें अपनी गद्दी के किनारे कुछ
रखा दिखायी दिया। उत्सुकता से उठाया तो वह एक पर्चा था, जिसमें
वह सोने की चेन थी और पर्चे पर लिखा था- "सेठजी, अविश्वास
से विश्वास नहीं पाया जा सकता। दूसरे भी आपको परख
सकते हैं।"
सेठजी की आँखें खुल गयीं। उनका पूरा
अभिमान पिघल कर बह गया। उन्होंने उस युवक को बहुत ढूँढ़ा,
पर वह तो उनकी पहुँच से बाहर जा चुका था। उसने परखने वाले को ही परख
लिया था।
अहंकार के अनेक स्वरूप होते हैं। ये
अपना रंग बदलते रहते हैं। इससे बचना आसान नहीं। अगर आप सोच रहे हैं कि आपने अहंकार
को जीत लिया है, उसे मार डाला है तो समझ लीजिये, अहंकार मरता नहीं केवल रूप बदलता है -
हाँ,
अहंकार
मरता नहीं है,
पहले
वह आध्यात्मिक बनाता है,
पहले
वह कहता था मैं दूसरों से अधिक सफल हूँ,
फिर
वह कहने लगता है मैं दूसरों से अधिक जागरूक हूँ।
पहले
उसे
धन पर गर्व था,
अब
उसे त्याग पर गर्व है।
पहले
उसे शरीर सुंदर चाहिए था
अब
उसे व्यक्तित्व पवित्र दिखाना है।
पहले
वह संसार को प्रभावित करना चाहता था
अब
वह साधकों को प्रभावित करना चाहता है।
नाम
नया हुआ पर गांठ वही रही।
गीता
इसे बहुत तीक्ष्ण शब्दों में पकड़ती है – मिथ्याचार।
बाहर
इंद्रियाँ संयमित दिखें पर
भीतर
मन विषयों में घूमता रहे,
तो
वह साधना नहीं
वह
सजाया हुआ पाखंड है।
और
सोलहवें अध्याय में श्रीकृष्ण
दंभ, दर्प और अभिमान को
आसुरी
संपदा में रखते हैं।
शंकर
इसको एक शब्द में पकड़ते हैं – धर्मध्वजारोहणम
धर्म
का ध्वज उठाना बिना धर्म के।
क्योंकि
अहंकार केवल भोग से नहीं बढ़ता
त्याग
की कथा सुनाकर भी बढ़ता है।
ध्यान
से देखें,
हमें
मुक्ति चाहिए, या
मुक्त
दिखने का सुख?
हमें
मौन चाहिए या ऐसा मौन
जिसे
लोग गहराई समझें।
हमें
सत्य चाहिए या
आध्यात्मिक
पहचान।
अहंकार
का सबसे सूक्ष्म स्वरूप वही है,
जहां
वह स्वयम को भी
अहंकार
मानने से भी अस्वीकार कर दे।
साधना
तब प्रारम्भ होती है
जब
भीतर यह दिख जाए जो स्वयं को
पवित्र
सिद्ध करना चाहता है
वही अहंकार है।
भले ही अहंकार को पूरी तरह जीत न पाएँ,
उसे जीतने का प्रयत्न तो
अविराम चलना ही चाहिए।
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यू
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