जो होना है वो होकर
रहेगा,
जो नहीं होना है वो नहीं होगा।
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सब तय है, फिर... ?
हमारी जिंदगी का हर पल पहले से तय है। अगर सब पहले से तय है, तो फिर कोशिश क्यों? और अगर कोशिश जरूरी है तो यह कैसे
मानें कि सब पहले से तय है। तो आखिर सच क्या है?
जीवन न ही पूरी तरह भाग्य है और न
ही पूरी तरह हमारे नियंत्रण में। जीवन इन दोनों
के बीच का एक गहरा संतुलन है। कैसे?
एक सरल अनुभव लेते हैं। हम सब ने जीवन में महसूस किया है कि हम किसी
काम में पूरी मेहनत करते हैं लेकिन परिणाम वैसा नहीं मिलता जैसा हम चाहते थे। और
कभी ऐसा भी हुआ होगा कि बिना ज्यादा कोशिश के ही सब कुछ हमारे पक्ष में हो गया।
यही अनुभव हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या सच में मैं सब कुछ कर रहा हूं
या फिर कोई अदृश्य अपनी समझ से सब कुछ चला रहा है?
हम केवल परिणाम के लिए नहीं जी रहे। हम उस प्रक्रिया के लिए जी रहे
हैं जो हमें हर दिन बदलती है। हम कोशिश करते हैं,
हम निर्णय लेते हैं, लेकिन यह कोशिश करने की इच्छा कहां से
आती है? करने की ऊर्जा कहाँ से आती है?
हम कभी बिना रुके काम करने लगते हैं और कभी कुछ करने मन ही नहीं करता। इसका चुनाव
मैंने किया या किसी और ने? हम ईमानदारी से देखें तो समझ आएगा
कि बहुत कुछ अपने आप हो रहा है। मतलब यह कि अगर कुछ करने की इच्छा उठती है तो हम करेंगे
ही और अगर नहीं उठती तो हम चाहकर भी नहीं कर पाएंगे।
अब अगर कोशिश भी तय है तो फिर कोशिश करने का मतलब क्या है?
क्योंकि, अगर हम यह सोच कर बैठ जाते हैं तब हम
जीवन को जी ही नहीं पाएंगे। हम केवल इंतजार करने में ही सारा जीवन निकाल देंगे। हम
जब कोई खेल खेलते हैं तब पूरी कोशिश करना ही असली अनुभव है। अगर हम यह सोचकर खेलना
छोड़ दें कि अंत तो तय है, तब हम उस खेल को कभी जी ही नहीं पाएंगे।
जीवन भी ऐसा ही है। हो सकता है अंत पहले से तय हो। लेकिन उस अंत तक पहुंचने का अनुभव हमारी कोशिश से ही बनता है। कोशिश का
मतलब यह है कि हम उस पल को पूरी तरह जी पाएंगे।
जब हम पूरी ईमानदारी से काम करते हैं तो हमारे भीतर एक संतोष पैदा
होता है जो परिणाम से जुड़ा नहीं होता और जब हम कोशिश नहीं करते तो भीतर एक खालीपन
रह जाता है। हमारी कोशिश भी उसी कहानी का हिस्सा है जो लिखी जा चुकी है। हम उसे
बदलने नहीं, उसे जीने आए हैं। कोशिश ही वह तरीका है जिससे हम इसे
जीते हैं, इसे महसूस करते हैं, इसे
अर्थ देते हैं। हम परिणाम को नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन
उस रास्ते को जी सकते हैं जो हमारे सामने है।
कुछ करो, खुद को साबित करो? यही संघर्ष हमें थका देती है।
समस्या कोशिश में नहीं उस बोझ में है जो हम कोशिश के साथ जोड़ देते हैं। कोशिश के
साथ डर भी रखते हैं - अगर हार गया तो? यही डर हमारी कोशिश को
भारी बना देता है, हमें जल्दी थका देता है। जब हम किसी काम
को सिर्फ करने के लिए करते हैं तब पूरे ध्यान से करते हैं, एक
अलग ही शांति होती है। लेकिन, जब काम को उसके परिणाम से जोड़
देते हैं तब तनाव शुरू हो जाता है।
परिणाम हमारे हाथ में नहीं
है लेकिन प्रयास हमारे अनुभव में है। जब हम कोशिश करते हैं और हर पल परिणाम के
बारे में सोचते रहते हैं। तब ध्यान वर्तमान से हट कर भविष्य में चला जाता है और
यही हमें कमजोर बना देता है। लेकिन जब हम पूरी तरह उस पल में रहते हैं तो उसमें
डूबे रहते हैं और हमारी कोशिश भी मजबूत रहती है और मन शांत रहता है। अतः कम प्रयास
में भी आगे बढ़ जाते हैं क्योंकि परिणाम के डर में नहीं फंसे होते। जो हर पल डर
में जी रहे होते हैं, वे टूट भी जाते हैं क्योंकि वे हर पल खुद को जज कर
रहे होते हैं। हम हर चीज को परिणाम से
जोड़ देते है और वहीं आनंद खत्म होने लगता है। यही जीवन के साथ भी हो रहा है। हम
जी नहीं रहे, बस लगातार हिसाब लगा रहे हैं - क्या मिलेगा?
कहां पहुंचूंगा? लोग क्या सोचेंगे? और सारी ऊर्जा खत्म।
अब, अगर सब
पहले से तय है तब हमारी कोशिश भी तय है? लेकिन हमारे पास एक
आजादी है। हम अपना जीवन कैसे जीते हैं? बोझ बनाकर या एक
अनुभव बनाकर, एक दबाव के साथ या खेल बना कर। फर्क बाहर नहीं
अंदर है, हमारे देखने के तरीके में है। कोशिश छोड़नी नहीं है, बल्कि कोशिश करने के तरीके को बदलना है। कोशिश डर के साथ नहीं समझ के साथ
करनी है। परिणाम में नहीं प्रक्रिया में जीना है। हम वही काम करते हैं लेकिन थकते
नहीं क्योंकि अब ध्यान केवल करने पर है ना कि फल पर। कोशिश ही हमारा अनुभव है, उसे बोझ बनाना हमारी गलती है। कोशिश करो, उसमें डूब
जाओ, उसे जियो ना कि उसे ढोओ।
पहले काम बोझ था, डर था, चिंता थी। लेकिन अब एक हल्कापन आ जाता है।
पहले कोशिश में बेचैनी थी, अब उसी में शांति होती है। बाहर
सब कुछ वही दिखता है लेकिन भीतर सब कुछ बदल जाता है। हम कमजोर नहीं होते स्पष्ट हो
जाते हैं। वही करते हैं जो उस पल सही लगता है। यही असली स्वतंत्रता है।
परिस्थितियां बदलती रहती हैं। कभी सफलता आती है, कभी असफलता। लेकिन हमारे भीतर का संतुलन बना रहता है। अब जीवन एक संघर्ष
नहीं यात्रा बन जाती है। हमारे रिश्ते भी बदल जाते हैं। हम लोगों से जुड़ते हैं लेकिन
उनसे उम्मीदों का बोझ नहीं ढोते।
अगर सब पहले से तय है तो कोशिश क्यों? क्योंकि कोशिश ही जीवन का हिस्सा है, उसे बोझ बनाना हमारी नासमझी है। हमें कुछ
साबित नहीं करना था, केवल इस पूरे खेल को समझना था और जैसे
ही यह समझ आती है, एक गहरी शांति पैदा होती है। जीवन चलता
रहेगा कोशिश चलती रहेगी, लेकिन अब हम उसके साथ बह रहे हैं उसके खिलाफ नहीं, यही असली
आजादी है, यही असली जीवन है।
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