सोमवार, 1 जून 2026

सूतांजली जून (प्रथम) 2026

 


निर्माण और विध्वंस

युग-युगान्तरों में जब भी पृथ्वी पर नयी सृष्टि का या नयी चेतना का आविर्भाव हुआ, हमेशा ही उसमें पुरातन के विलय और विनाश की अवस्था रही है। शिव-नाट्य के दो स्वरूप हैं, सृष्टि का आनन्द और साथ ही विनाश का उल्लास - लास्य और ताण्डव, निर्माण और विध्वंस - दोनों ही आज तक समान रूप से आवश्यक रहे हैं- एक दूसरे के पूरक।

विनाश का अर्थ है अनावश्यक, अनुपयुक्त, उस सब का विनाश जो नये आगमन को स्वीकार करने से इनकार करता है, उसमें बाधा डालता है, उसके निषेध का प्रयत्न करता है - उस सब का जो अवश्यम्भावी नये भविष्य के साथ सामञ्जस्य में नहीं है। पृथ्वी का विकास प्रगति-क्रम का अभियान है - अगर कोई उसकी गति के साथ-साथ चलने में असफल होता है तो उसे रास्ते से हटना होगा, नहीं तो उसे हटा दिया जायेगा ताकि दूसरे आ रहे कदमों के लिए जगह बनायी जा सके।

अगर कोई उस पुरातन सृष्टि में हो या कम-से-कम उससे प्रेम करता हो, उससे जुड़ा हुआ हो, तो ध्वंस पीड़ादायक हो जाता है, यहाँ तक कि उसके लिए वह भय-जन्य और ग्लानि-जन्य हो जाता है। पर अगर उसके अन्दर नवीन के लिए आकांक्षा है, तब वह इस ध्वंस की आवश्यकता को अनुभव करता है और काम की अविलम्ब पूर्ति के लिए इसका स्वागत करता है, वह उस विध्वंस के उल्लास का आनन्द लेता है। कम-से-कम शिव तो लेते हैं, दिव्य शक्ति तो लेती है।

वास्तव में यही इस समय विश्व में घटित हो रहा है। महाकाली ने तैयारी की विनाश और विलय का - अपना कार्य प्रारम्भ कर दिया है ताकि महालक्ष्मी और महासरस्वती का मार्ग प्रशस्त हो सके। महेश्वरी के अपार प्रेम और करुणा ने इस कार्य को स्वीकृति दी है, इसे समर्थन दिया है। वह नयी सृष्टि, वह नया जगत्, जिसका निर्माण दिव्य ने किया और जिसे वे इतने अधिक प्रेम और सावधानी से अब भी बना रहे हैं, तैयार हैं - प्रकट होने के लिए, भौतिक क्षेत्र में अपने उद्घाटन के लिए तैयार हैं। लेकिन मनुष्य अभी तैयार नहीं है, वह अब भी इससे इनकार करता है, अब भी ऐसे लोग हैं जो अपने पुरातन मृत जगत् को पकड़े हुए हैं  - और बहुत कस कर पकड़े हुए हैं - वह धूर्तता के इस खेल से प्रेम करते हैं। उन्हें इसमें अपने अस्तित्व का नाश दिखता है।  शायद सत्य उसकी अहंकारपूर्ण प्रकृति और दुर्बोध बनावट से वह इनकार करता है, उस नयी चेतना, नयी वास्तविकता में जितना अधिक हो सकता है बाधा पहुँचाता है। दिव्य ने अपने असीम प्रेम के कारण इस इनकार को अपने ऊपर लेने का प्रयत्न किया, अधिक-से-अधिक तत्त्वों को बदलने की, उनमें विश्वास पैदा करने की कोशिश की - फिर, जब इससे अधिक नहीं किया जा सका तो उन्होंने कार्यक्षेत्र को अपने दूसरे रूप के लिए छोड़ दिया ताकि वह इस अपरिहार्य कार्य को कर सके पुराने कठोर जगत् को तोड़ने के कार्य को। यह एक आवश्यकता है पृथ्वी के और मनुष्य के भी अन्तिम श्रेयस् के लिए।

कार्य आरम्भ हो चुका है - इसे शिव का नर्तन, ताण्डव कहो या माता काली का प्रचण्ड नर्तन - यह आरम्भ हो चुका है और तीव्र और तीव्रतर गति से अपने मार्ग पर बढ़ रहा है। विनाश, विलय, विघटन - हाँ, यह प्रथम परिणाम है और हम अब इसे प्रत्यक्ष देख रहे हैं और इसमें भाग ले रहे हैं, चाहे हम इसे पसन्द करें अथवा नहीं। यह परम प्रभु का निश्चय है - इसे घटित होना ही है। वे जो सत्य से जुड़े हुए हैं बचे रहेंगे, वे जो मिथ्या के साथ मैत्री करेंगे नष्ट हो जायेंगे - मनुष्य के पास चुनने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है, सचेतन रूप से या अचेतन रूप से। यह एक अपरिहार्य स्थिति है, जो सत्य के आकांक्षी हैं, उन्हें दुःख या शोक करने की कोई आवश्यकता नहीं।

अगली अवस्था स्वभावतः मलबा साफ़ करने की होगी - एक पूरी सफ़ाई - उस सब का विलोपन जो सत्य के विरुद्ध था, मृत जगत् का ध्वंसावशेष, वह क्षेत्र - वहाँ से वह सब कुछ साफ़ किया जायेगा जो गन्दा और मलिन है। क्योंकि केवल तभी नयी वास्तविकता आगे आने में समर्थ होगी, दिव्य का कार्य पूरा होगा।

नयी सृष्टि पहले ही विद्यमान है - अपना रूप ले रही है - इस समय जो कुछ भी घट रहा है, वह इसीलिए घट रहा है ताकि नयी सृष्टि जल्दी-से-जल्दी सम्मुख आ जाये। वे बाहरी ढाँचे को तोड़ रही हैं जिसके अन्दर नयी वास्तविकता स्थापित हो चुकी है। इसे एक मुर्दा खोल कह सकते हैं जिसे तोड़ा जा रहा है ताकि नयी वास्तविकता बाहर आ सके। यह दिव्य ने अपना 'छिन्नमस्ता' रूप धारण किया है। जो कुछ भी वे नष्ट कर रही हैं वे उनके अपने ही अंश हैं - वे मानों, अपने ही शरीर के पुराने अनुपयोगी अंगों से पीछा छुड़ा रही हैं।

श्रीअरविन्द के शब्दों में कहें तो:

“मुहूर्त कई बार बड़ा भयावह होता है, एक अग्नि और एक चक्रवात और एक तूफ़ान, ईश्वर के कोप के कोल्हू का चलना; पर जो इस घड़ी में अपने प्रयोजन के सत्य पर खड़ा रह सकता है, वह है जो खड़ा रहेगा; अगर वह गिर भी जायेगा, तो पुनः उठ खड़ा होगा; अगर वह हवा के पंखों पर ग़ायब होता लगेगा, तो भी वह लौट आयेगा।"                                                                                                                                                                - नलिनिकांत गुप्त

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यू ट्यूब पर सुनें :

https://youtu.be/AkGUUg96oK4

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