छोटी-छोटी चीज़ों पर उत्तेजित होने और उन्हें तुम्हें
विक्षुब्ध करने की अनुमति क्यों दी जाये?
अगर तुम शान्त-अचञ्चल रहो तो चीजें ज़्यादा अच्छी तरह चलेंगी
और अगर कोई कठिनाई उठे भी, तुम 'शान्ति' और 'शक्ति' के प्रति खुल कर,
शान्त मन के साथ, उससे बाहर निकलने का रास्ता भी ढूँढ़ निकालोगे।
यही है आगे ही आगे बढ़ते रहने का रहस्य ।
बहुत शान्त रहो, उस 'शक्ति' पर पूरा भरोसा रखो
कि
वह तुम्हें रास्ता दिखलाये और
चीज़ों को अधिकाधिक ठीक कर दे।
अगर तुम ऐसा करो तब भूलें भी सीखने के साधन और
प्रगति की ओर उठाए क़दम बन जाती हैं।
श्री अरविन्द
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तुम कौन हो?
मानव को क्या चाहिए? सुख, शांति, सुकून? ये कहाँ मिलेंगे – अंदर या बाहर?
यह
हम सब जानते हैं, फिर भी हम कहाँ खोजते रहते हैं – बाहर, क्यों?
हमारी
प्रकृति है – कुछ-न-कुछ करते रहना। अगर कुछ न करना हो तो भरोसा
नहीं होता?
अशोक
वाटिका में फूल सफेद थे या लाल? कौन सही थे -
तुलसीदास या हनुमान?
उत्तरा
के गर्भ में गदा घूम रही थी या चक्र? कौन
सही है - शुक मुनि या राजा परीक्षित?
स्थायी
निवास कहाँ है? - यहाँ है या वहाँ? तब -
जाना है या लौटना?
ऐसे ही और अनेक प्रश्न हैं, जिनके
उत्तर हम जानते हैं लेकिन फिर भी उन पर भरोसा नहीं करते फलस्वरूप जो चाहते हैं वह
नहीं मिलता और जो मिलता है वह हम चाहते नहीं। एक तरफ है खुशबूदार मीठे फल-फूल और
दूसरी तरह है भयानक जंगल काँटों, खड्डों, जंगली पशुओं से भरा। लेकिन दूर से जंगल हरा-भरा दिखता है और बगिया ठीक
नजर ही नहीं आती। किसी ने बताया भी कि दूर से जंगल दिखेगा,
बगिया नहीं दिखेगी। सावधान रहना, बगिया में जाना, जंगल में नहीं। लेकिन हम क्या करते हैं? और जो करते
हैं उसे ही भोगते हैं।
अध्यात्म साधना का अर्थ है भीतर की यात्रा। हम बाहर से बहुत परिचित
हैं। हमारे जीवन की पूरी-की-पूरी यात्रा ही बाहर की ओर हो रही है। हमारी शिक्षा भी
हमें बाहर की ओर ले जाती है और हमारे अनुसंधान के सारे प्रयत्न भी हमें बाहर ही
भटकाते हैं। भीतर की यात्रा करने का कोई अवकाश ही नहीं है। व्यक्ति बाहर में इतना
व्यस्त है कि उसे कभी यह सोचने का मौका ही नहीं मिलता कि उसे भीतर की यात्रा भी
करनी चाहिए। सच्चाई यह है कि बाहर में जितना है,
भीतर उससे बहुत अधिक है। जो भीतर की यात्रा कर लेता है उसे बाहर का सत्य असत्य
जैसा प्रतिभाषित होता है। किन्तु भीतर की यात्रा करने का अवसर ही जब जीवन में नहीं
आता तब यह जानने को नहीं मिलता कि भीतर में कोई सार है, भीतर
कुछ ऐसा है जिसे देखना चाहिए, जानना चाहिए, अनुभव करना चाहिए। इसलिए अध्यात्म-साधना जरूरी है।
आचार्य महाप्रज्ञ कहते हैं इसीलिये शिक्षा और शोध के साथ
अध्यात्म-साधना बहुत जरूरी है। जैसे दिन-भर का थका हुआ पक्षी अपने घोंसले में आकर
विश्राम करता है वैसे ही बहिर्मुखी प्रवृत्तियों से त्रस्त आदमी कहीं विश्राम ले सके,
कहीं शांति का अनुभव कर सके, वह स्थान हो सकता
है केवल अध्यात्म, केवल भीतर का प्रवेश। जो बाहर से थका हुआ
प्रतीत होता है उसे बाहर की कोई भी वस्तु विश्राम नहीं दे सकती, शांति नहीं दे सकती। दो दिशाएँ हैं-- एक बाहर की और एक भीतर की। दोनों
एक-दूसरे की प्रतिपक्षी दिशाएँ हैं।
यह ध्यान देने योग्य है कि सभी समाजों में मनुष्य की स्वयं अपने
बारे में जिज्ञासा उतनी नहीं रही जितनी की ईश्वर के बारे में। कारण,
मनुष्य की दृष्टि बहिर्गामी होती है। वह अपने अन्दर की दुनिया के
बजाय बाहर की दुनिया के बारे में ज़्यादा सोचता है। बाहर जाना हो तो चलना है, लेकिन अंदर जाना हो तो कहीं चलना ही नहीं है। स्वरूप, न ईश्वर का स्पष्ट था, न आत्मा का। पर ईश्वर के
बारे में विचार करते हुए बाहरी संसार का आलंबन तो था। उसे लगता था कि जब वह ईश्वर
के बारे में बात करता है तो उसका कुछ आधार है, इसलिए उसके
बारे में बात करना सार्थक है। पर आत्मा के बारे में चर्चा,
यह तय करना ही कठिन है कि बात किसके बारे में की जा रही है और किस आधार पर?
कोई परेशान था। उसे ईश्वर से मिलना था। लेकिन कोई बता नहीं रहा था, वह कहाँ मिलेगा? यूंही सफर के दौरान एक सहयात्री ने
बताया कि उनके गाँव के एक महात्मा उसे मिलवा सकते हैं, ईश्वर
से। बस, वह उसके साथ हो लिया। गाँव पहुँचने पर सहयात्री ने
सामने की पहाड़ी की चोटी की ओर इशारा किया। वह आनन-फानन में पहाड़ी की चोटी पर पहुँच
गया। उसने देखा एक महात्मा ध्यान में बैठे हैं। वह भी उनके सामने इंतजार में बैठ गया। ध्यान से उठने पर महात्मा से कहा, ‘मुझे ईश्वर से मिलना है,
क्या आप मिलवा सकते हैं’? “हाँ, लेकिन आज नहीं”, उन्होंने कुछ दिनों के बाद प्रातः
ब्रह्म मुहूर्त में आने कहा। वह तैयार होकर पहुँच गया। कुछ समय के ध्यान के बाद
महात्मा ने पूछा, ‘तुम कौन हो? ईश्वर का क्या बताऊँ, कौन मिलने आया है’?
उसने अपना नाम बताया। महात्मा ने
कहा - यह तो तुम्हारा नाम है, ‘तुम कौन हो’?
उसने अपना व्यवसाय बताया। यह तो
तुम्हारा काम है, तुम कौन हो?
मैं मालिक हूँ। यह तो तुम्हारा ओहदा
है, तुम कौन हो?
वह बस इस मैं ......... और .......... तुम कौन हो? के बीच फंसा रह गया। उसके हर उत्तर पर महात्मा वही प्रश्न दुहराते, तुम कौन हो? वह परेशान होने लगा। महात्मा ने कहा
परेशान मत हो, अभी जाओ, जब पता लग जाए
कि तुम कौन हो? फिर आ जाना। वह आता रहा, जाता रहा, लेकिन गाड़ी “तुम कौन हो?” से आगे नहीं बढ़ी। फिर अचानक उसने आना बंद कर दिया।
कई महीनों के बाद अचानक महात्मा की उससे मुलाक़ात हुई। उन्होंने
पूछा - तुम आए नहीं? क्या तुम्हें पता नहीं लगा कि तुम कौन हो? वह, महात्मा के चरणों में गिर पड़ा और बोल हाँ
महाराज, मैं जान गया कि मैं कौन हूँ,
इसलिए फिर आपके पास आने की आवश्यकता नहीं रही।
अपने को जानना ही अंतर्यात्रा है।
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