हिमालय को लांघना बहुत आसान है, बशर्ते
एक बार में एक कदम उठायें।
------------------ 000 ----------------------
सूतांजली और मैं - एक संस्मरण
आठ वर्ष की यात्रा समाप्त कर हम नौ वें वर्ष में प्रवेश कर
रहे हैं। मन में इच्छा जागृत हुई कि अपने इस सफर की थोड़ी जानकारी पाठकों और
श्रोताओं से साझा करूँ। इस अंक में इसी सफर की कहानी है। इस सफर का बीज तब रोपा
गया जब लगभग चालीस वर्ष पूर्व मैं भारतीय संस्कृति संसद, कोलकाता से जुड़ा – अचानक, अकस्मात, वहाँ के स्वादिष्ट व्यंजनों के कारण। लेकिन जल्द ही मुझे यह अहसास हुआ कि
संसद ‘पेट पूजा’ नहीं सरस्वती की आराधना
का स्थान है। प्रत्येक बुधवार को होने वाली साप्ताहिक अध्ययन गोष्ठी में नियमित रूप से जाने लगा। मस्तिष्क शायद उर्वरा
थी अतः खाद, पानी और अनुकूल वातावरण मिलने के कारण ही वह बीज
शीघ्र ही पुष्पित-पल्लवित हो उठी। अनेक विद्वानों, कवियों, लेखकों, विचारकों, गायकों, संगीतज्ञों, शिल्पकारों, और किन-किन
विधाओं के नाम गिनाऊँ, से मुलाकातें होने लगीं और साथ ही संसद
की समृद्ध पुस्तकालय से पुस्तकें प्राप्त होने लगीं। संसद मेरा दूसरा घर बन गया।
लेकिन फिर अचानक ही पिछले दशक पढ़ने की इच्छा ही समाप्त हो गई।
प्रायः पुस्तकें अच्छी नहीं लगतीं। कुछ एक पृष्ठ से ज्यादा पढ़ ही नहीं पाता। पुस्तकों
के बिना बड़ा बेचैन रहने लगा। संसद के सदस्यों एवं अन्य विद्वजनों से चर्चा की, वर्तमान समय के लेखकों-कवियों
के नाम पूछने लगा जिनकी पुस्तकें पढ़ूँ। कुछेक मिलीं, पढ़ीं, अच्छी लगीं लेकिन फिर, वहीं का वहीं। सौभाग्य से एक दिन मैंने अपनी समस्या का जिक्र डॉ.बाबूलाल
अगरवाल से किया। उन्होंने कहा, - महेश जी आपका घड़ा भर
गया है, कुछ उलट डालिए। मैं समझा नहीं। उन्होंने मुझे कुछ
लिखने और उसे कम्प्युटर में डालने की सलाह दी। मैंने ध्यान नहीं दिया लेकिन फिर श्री
नर नारायण जी हरलालका ने भी लिखने कहा और रास्ता सुझाया। आखिर सोच-विचार कर, ‘सूतांजली’ लिखना शुरू किया।
विचार था कि 2-3 महीने तो निकाल दूँगा फिर राम-जाने। अंतर्देशीय-पत्र (inland-letter) में छाप
कर परिचितों को भेजना प्रारंभ किया और फिर यह पन्ना ब्लॉग और यू ट्यूब तक पहुँच गया।
पढ़ने के लिए इतनी सामग्री मिलने लगी, जिसकी मैं कल्पना भी
नहीं कर सकता। श्री गौरी शंकर शारदा जी के सौजन्य से बीकानेर में श्री
शुभू पटवा जी से मुलाक़ात हुई। उनके लिखे पत्र मेरी धरोहर हैं। शारदाजी मुझे
बराबर इन लेखों के संग्रह को पुस्तक का रूप देने का आग्रह करते रहते हैं, शायद उनका प्रोत्साहन कभी फलीभूत हो ही जाए। इनके अलावा श्रीमान राज
गोपाल सुरेका, श्री गोपाल डागा,
प्रशांत कुमार, अश्विन जाला, डॉ.बवेजा, डॉ.रमेश बीजलानी, अनूप गड़ोदिया, रतन शाह, प्रमोद शाह, नन्द
लाल रुंगटा, राजेन्द्र (लक्खी) रुंगटा,
किरीट पटेल, परेश शाह, राजेंद्र केडिया, रमाकांत गट्टानी, गणेश
भट्ट, गौतम अग्रवाल बराबर मुझे प्रोत्साहित एवं मेरा मार्ग
दर्शन करते रहे। इसी श्रेणी में आती हैं डॉ.अपर्णा राय, श्रीमति बिमला बूबना, रश्मि करनानी, रश्मि हरलालका, बिंदिया अगरवाल, कविता बूबना,
रेणु बूबना, दुर्गा व्यास,
चित्रा नेवटिया, निशा बैरोलिया, जूही
बैरोलिया, एवं अन्य। एक विशेष नाम
आदर सहित मैं अवश्य लेना चाहूंगा – श्रीमति रवि प्रभा बर्मन। प्रिंट मीडिया
से एलेक्ट्रोनिक मीडिया अपनाने के बाद उनका साथ छूट गया,
उनकी कमी मुझे बहुत खलती है। इनके अलावा और अनेक नाम हैं जो छूट रहे हैं, उन सबों से कर-बद्ध क्षमा याचना, कहीं-न-कहीं तो
रुकना ही होगा। एक और नाम है जिनसे मेरा व्यक्तिगत परिचय नहीं है, शिक्षिका हैं, जिस प्रकार बिना किसी नागा के, बराबर टिप्पणियाँ
ही नहीं की बल्कि यह भी बताया कि मैंने उनके जीवन की कई गुत्थियाँ सुलझ दीं, वे नियमित पाठक /
श्रोता हैं और जब उन्होंने बताया कि वे अपने छात्रों से भी मेरे चैनल की चर्चा
करती हैं तो मैं अभिभूत हो गया। वे हैं श्रीमति रुचि टंडन। मेरे विचार से एक लेखक का लेखन तभी
सार्थक है जब वह अपने पाठक के जीवन को सार्थक रूप से प्रभावित करता है।
अपने पाठकों से प्राप्त गद्य,
यूट्यूब-ब्लॉग-फ़ेस बुक लिंक से मिली सामग्री को मैंने जहां तक संभव हुआ प्रयोग
किया है। अनेक पद्य भी मिले जिन्हें मैं इस अंक में दे रहा हूँ। नाम रचनाकारों के नहीं बल्कि उनके हैं जिन्होंने
प्रेषित किया है। तीन पाठकों की टिप्पणियाँ भी आपके लिए।
------------------------- OOO ----------------------
प्रतिक्रियाएँ, तीन पाठकों की
(जिन पोस्ट पर टिप्पणी डाली गई है उस पोस्ट का लिंक भी उसके साथ है, ब्लॉग पर
ये भी पोस्ट गए हैं। पाठकों की सुविधा के लिए संबन्धित पोस्ट का लिंक व्हाट्स अप्प पर भी भेज रहे हैं।)
प्रतिक्रियाएँ तो अनेक
पाठकों / श्रोताओं से मिली हैं – व्हाट्स एप्प, यू ट्यूब, ब्लॉग एवं फोन पर। लेकिन हमने खुद तीन की संख्या का अनुशासन निश्चित
किया। उन श्रोताओं से क्षमा याचना जिनकी प्रतिक्रियाएँ हम नहीं दे रहे हैं।
श्री रतन शाह
.... महेशजी, स्टैनफोर्ड युनिवर्सिटी के बारे में मैं भी जानता हूँ लेकिन
आपने जो लिखा इतना तो मैं भी नहीं जानता, कहाँ पढ़ा है आपने
........
यू ट्यूब का लिंक :
https://raghuovanshi.blogspot.com/2024/12/blog-post_20.html
------------------------------
श्री गोपाल डागा
Thanks Mahesh for handling such difficult subject of DUKH so
convincingly. ..... Congratulations.
यू ट्यूब का लिंक : à
ब्लॉग का लिंक : à
https://sootanjali.blogspot.com/2023/09/2023.html
------------------------------------
श्रीमति रुचि टंडन
1।
...Just now
listened your narration on YouTube...
I must congratulate you
on the topic you covered in your audio ..Now I can assure myself that I have
the advantage of getting my problems fixed by listening to your profound
suggestions on simple yet complicated problems ……
ट्यूब का लिंक
- >
ब्लॉग का लिंक ->
https://maheshlodha.blogspot.com/2022/08/blog-post.html
----------
2।
सर, आपके इस
वीडियो ने मुझे व्यक्तिगत और पेशेवर स्तर पर मदद किया है। ऐसे उत्साहजनक शब्दों को
पोस्ट करने के लिए धन्यवाद
Sir aapke posts aur uske
topics bahut he shaandaar hote Hain....main aapke sabhi posts ko save karke
...waqt milte he bade dhyan se sunti hoon...Aisa lagta hai ki yahan per meri
bahut si problems ke bahut perfect solutions hain.
Thank
you so much Sir ❣
ट्यूब का लिंक
- >
ब्लॉग का लिंक ->
https://maheshlodha.blogspot.com/2023/01/blog-post_20.html
----------------
3।
Sir... yesterday I had to dictate a class 12 CBSE students about
a certain topic ... and I tell you Sir ...I got the great
idea to share the content of your post in the assignment. It is very helpful. Thank you
यू ट्यूब का लिंक :
ब्लॉग का लिंक :
https://raghuovanshi.blogspot.com/2024/08/blog-post_23.html
------------------------- OOO ----------------------
कवितायें, पाठकों द्वारा प्रेषित
अज्ञात पाठक से
जो मांगने पर मिले, उसे दान नहीं कहते,
कहने पर जो करे, उसे दया नहीं कहते।
जिस दर पे न हों सजदे, उसे दर नहीं कहते,
हर दर पर जो झुक जाए, उसे सर नहीं कहते।
मेरी
गफलतों की भी हद नहीं तेरी रहमतों की भी हद नहीं,
न
मेरी खता का शुमार है, न
तेरी अता का शुमार है।
रामवालों
को रहीम से बू आती है,
इस्लामवालों
को ईश्वर से बू आती है।
किसको
फुर्सत है करे इंसान की खिदमत,
जब
की इंसान को इंसान से बू आती है।
वो बात दवा भी कर न सकी जो बात दुआ से होती है
जब मुर्शिद१ कामिल२
मिलता है तो बात खुदा से होती है।
१. गुरु २. पूर्ण
------------------------- OOO ----------------------
श्री गोपाल डागा से
कोई जरूरी तो नहीं कि
...
हर बार शरीर की जांच
में ....
हीमोग्लोबिन,
कैल्शियम,
विटामिन्स या अन्य
मिनरल्स ...
ही घटते हों,
कभी कभी अपने
व्यक्तित्व ....
की भी जांच करके....
देख लेनी चाहिए,
क्या पता -
दया,करुणा,मानवता,
दोस्ती
या इंसानियत भी ...
घट
रही हो !!
शब्द *रचे* जाते हैं,
शब्द *गढ़े* जाते हैं,
शब्द *मढ़े* जाते हैं,
शब्द *लिखे* जाते हैं,
शब्द *पढ़े* जाते हैं,
शब्द *बोले* जाते हैं,
*#अंततः*
शब्द
*संवरते* हैं,
शब्द
*निखरते* हैं,
शब्द
*हंसाते* हैं,
शब्द
*मनाते* हैं,
शब्द
*रूलाते* हैं,
शब्द
*मुखर* हो जाते हैं,
शब्द
*प्रखर* हो जाते हैं,
शब्द
*मधुर* हो जाते हैं,
*#फिर भी-*
शब्द
*चुभते* हैं,
शब्द
*बिकते* हैं,
शब्द
*रूठते* हैं,
शब्द
*लड़ते* हैं,
शब्द
*झगड़ते* हैं,
*#किंतु-*
शब्द
*मरते* नहीं,
शब्द
*थकते* नहीं,
शब्द
*रुकते* नहीं,
शब्द
*चुकते* नहीं,
*#अतएव-*
शब्दों
को *मान* दें,
शब्दों
को *सम्मान* दें,
शब्दों
को *पहचान* दें,
शब्दों
को *आत्मसात* करें...
शब्दों
का *अविष्कार* करें...
*#क्योंकि-*
*शब्द*
*अनमोल* हैं...
ज़ुबाँ
से निकले *बोल* हैं,
शब्दों
में *धार* होती है,
शब्दों
की *महिमा अपार* होती है,
शब्दों
का *विशाल भंडार* होता है,
और
सच तो यह है कि-*
*शब्दों
का अपना एक संसार होता है*
------------------
हाथों की लकीरों का
अज़ब खेल है मेरे मालिक!
मुट्ठी में हमारी हैं..!
काबू में तुम्हारी हैं..!
------------------
अकेलापन
बनाम एकांत
(कोविड के दौरान)
'अकेलापन'
इस संसार में
सबसे बड़ी सज़ा है.!
और 'एकांत'
सबसे बड़ा वरदान.!
ये दो समानार्थी दिखने वाले
शब्दों के अर्थ में
आकाश पाताल का अंतर है।
अकेलेपन में
छटपटाहट है,
एकांत में आराम!
अकेलेपन में घबराहट है,
एकांत में शांति।
जब तक हमारी नज़र
बाहर की ओर है
तब तक हम
अकेलापन महसूस करते हैं.!
जैसे ही नज़र
भीतर की ओर मुड़ी,
तो एकांत
अनुभव होने लगता है।
ये जीवन और कुछ नहीं,
वस्तुतः
अकेलेपन से एकांत की ओर
एक यात्रा ही है!
ऐसी यात्रा जिसमें,
रास्ता भी हम हैं,
राही भी हम हैं और
मंज़िल भी हम ही हैं.!!
घर में अकेलापन नहीं अपनापन है
इसका आनंद लीजिए
------------------------------------------------
न इलाज है न दवाई है
ऐ इश्क तेरे टक्कर की
बीमारी आई है॥!!
------------------------------------------------
डागाजी ने अमृता प्रीतम की भी एक रचना भेजी है
अपने पूरे होश-ओ-हवास में
लिख रही हूँ आज मैं
वसीयत अपनी
मेरे मरने के बाद
खंगालना मेरा कमरा
टटोलना हर एक चीज़
घर भर में बिन ताले के
मेरा सामान बिखरा पड़ा है
दे देना मेरे ख़्वाब
उन तमाम औरतों को
जो किचेन से बेडरूम
तक सिमट गयी हैं
अपनी दुनिया में
गुम गयी हैं
वे भूल चुकी हैं सालों पहले
ख़्वाब देखना
बाँट देना मेरे ठहाके
वृद्धाश्रम के उन बूढ़ों में
जिनके बच्चे
अमरीका के जगमगाते शहरों में
लापता हो गए हैं
टेबल पर मेरे देखना
कुछ रंग पड़े होंगे
इन रंगों से रंग देना
उस बेवा की साड़ी
जिसके आदमी के खून से
बॉर्डर रंगा हुआ है
तिरंगे में लिपटकर
वो कल शाम सो गया है
मेरा मान मेरी आबरु
उस वैश्या के नाम है
बेचती है जिस्म जो
बेटी को पढ़ाने के लिए
इस देश के एक-एक युवक को
पकड़ कर
लगा देना इंजेक्शन
मेरे आक्रोश का
पड़ेगी इसकी ज़रुरत
क्रांति के दिन उन्हें
बस
बाक़ी बची
मेरी ईर्ष्या
मेरा लालच
मेरा क्रोध
मेरा झूठ
मेरा स्वार्थ
तो
ऐसा करना
_*उन्हें मेरे संग ही जला देना*_
------------------------- OOO ----------------------
सुरेश धनुका से
दीवाली संदेश -
नारायण-नारायण
आशा है सबने अच्छे से
दिवाली मनाई होगी,
बड़ों का आशीष और छोटों
से ढेरों सम्मान भी पाया होगा!
सचमुच दिवाली ख़ुशियों का
पर्याय है,
महीनों पहले से हम जाने
कितने मनसूबे बनाते हैं और लगे भी रहते है,!
कल भाईदूज भी बीत गई, आज की सुबह कितनी उदास लग रही है ना?
जैसे सारी रौनक़ ही चली
गई,
यह प्रतीक है उस
प्राकृतिक चक्र का, जो कभी किसी के लिये नहीं
रुकता!
दिवाली के बाद भी
इक्के-दुक्के पटाखों का शोर भी सुनाई देता है ,
लगता है जैसे बीते पलों
को वापस लाने की कोशिश की जा रही है,
पर कोई भी चीज तभी अच्छी
लगती है जब उसका समय हो!
दिवाली के बाद की खामोशी, अवसर देती है ,
अपनी खर्च हो चुकी उर्जा को वापस पाने का,
पहले से ज़्यादा ख़ुशियां
समेटने का!
बाहर का दीप भले बुझ गया
हो,
मन में उम्मीद का एक दिया
हमेशा जलाये रखने का!
------------
क्या दिक्कत है ?
हीट को ताप कहने में।
यू को आप कहने में।
स्टीम को भाप कहने में।
फादर को बाप कहने में।
क्या दिक्कत है ?
बैड को ख़राब कहने में।
वाईन को शराब कहने में।
बुक को किताब कहने में।
शाक्स को ज़ुराब कहने में।
क्या दिक्कत है ?
इनकम को आय कहने में।
जस्टिस को न्याय कहने में।
एडवाइज़ को राय कहने में।
टी को चाय कहने में।
क्या दिक्कत है ?
फ़्लैग को झंडा कहने में।
स्टिक को डंडा कहने में।
कोल्ड को ठंडा कहने में।
ऐग को अंडा कहने में।
क्या
दिक्कत है ?
सन को संतान कहने में।
ग्रेट को महान कहने में।
मैन को इंसान कहने में।
गॉड
को भगवान कहने में।
क्या दिक्कत है? क्यों दिक्कत है?
जब अपनी बात अपनी
भाषा में कह सकते हैं
तब अपनी भाषा छोड़
विदेशी भाषा में क्यों कहते हैं?
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
लाइक करें, सबस्क्राइब करें,
परिचितों से शेयर करें।
अपने सुझाव ऑन लाइन दें।
यू ट्यूब पर सुनें :