गुरुवार, 1 जनवरी 2026

सूतांजली जनवरी (प्रथम) 2026

 


पुराने आख्यान नये विज्ञान 

          स्वामी कृष्णानंदजी का कथन है कि जब भी आप किसी विचार को वह 'अच्छा' हो या 'बुरा' अपनी मानसिक सहमति प्रदान करते हैं, तो आप उससे सम्बंधित हो जाते हैं। वह आप के सचेतन मन का भाग बन जाता है और उस विचार को आप अपने जाने-माने विचार की तरह जब-तब अनजाने में दुहराने लगते हैं।

          जब आप कथा-वार्ता सुनते हैं या कोई धर्म-ग्रंथ पढ़ते हैं तो आप उन विचारों को जितनी सहमति देते हैं, उसी अनुपात में वे विचार आप के हो जाते हैं और उसी अनुपात में उनसे आप को लाभ मिलता है।

          इस नियम का एक दूसरा पक्ष भी है। जब आप सुने या पढ़े हुए अन्याय, क्रूरता का यह सोच कर मानसिक रूप से समर्थन करते हैं कि, अच्छा हुआ बदला लिया, तो आप के एक शब्द बोले बिना भी, यह कृत्य आप का साथी हो जाता है और वह आप के जीवन का अंग बन जाता है ।

          मानसिक सहमति बड़ी सशक्त है।

          किसी भी दुर्मति या ऋणात्मक विचार से अपने को किसी भी अवस्था में संबंधित मत कीजिए। किसी दुर्मति या ऋणात्मक विचारों वाले से, जाने या अनजाने भी संबंध ही नहीं वार्तालाप भी आपके विचारों, शब्दों को प्रभावित करता है, उनसे भी दूरी बनाये रखिये। इस प्रकार आप अपनी अंतरात्मा की निर्मलता और पवित्रता तथा भाषा की शालीनता को कायम रख सकेंगे।

आप के चारों और सत्य और सौंदर्य का समुद्र लहरा रहा है। अपने आप को इससे सम्बंधित करने की आदत बनाइए, इसे ही आप अपनी मानसिक सहमति प्रदान कीजिए।

          भागवत में  पांडवों के वशंज महाराज परीक्षित की कथा आती है। वे एक धर्मपरायण, न्यायप्रिय एवं सात्विक प्रकृति के जनप्रिय राजा थे। संत समाज में  उनकी प्रतिष्ठा थी और उनका नाम आदर और सम्मान से लिया जाता था। लेकिन इसके बावजूद दुर्मति के कारण उन्हें ऋषि-पुत्र के कोप का भाजन होना पड़ा।

          एक बार राजा परीक्षित मृगया पर हरिण के पीछे दौड़ते-दौड़ते विश्रांत हो गए। भूखे-प्यासे जब जल के लिए चारों तरफ नजर घूमाते लौट रहे थे उनकी नजर शमिक ऋषि कि कुटिया पर पड़ी। अंदर प्रवेश किया और ऋषि से जल प्रदान करने की याचना की। लेकिन ध्यान मग्न होने के कारण ऋषि को न राजा के आगमन का भान हुआ और न ही उन्हें राजा की याचना सुनाई पड़ी। राजा परीक्षित खिन्न हो गए, उन्हें बुरा-भला कहा और कुटी से निकल पड़े। लेकिन तभी उन्हें वहाँ एक मारा हुआ साँप दिखाई पड़ा और दुर्मति से अपने धनुष की नोक से उस साँप को उठा कर ऋषि के गले में डाल वहाँ से प्रस्थान किया।

          उनके प्रस्थान के पश्चात ऋषि-पुत्र, शृंगी ऋषि का कुटी में आगमन होता है, पिता के गले में मरे हुए साँप को देख कर उनकी त्योरियां चढ़ जाती है और ऐसा कृत्य करने वाले की सातवें दिन तक्षक के डँसने से मृत्यु हो जाने का श्राप देता है। फलस्वरूप राजा परीक्षित की सातवें दिन तक्षक के डँसने से मृत्यु हो जाती है।  

          परीक्षित जैसे धर्मपरायण राजा से ऐसे व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जा सकती। फिर, ऐसा क्यों हुआ? एक बार परीक्षित ने कलि से वार्तालाप किया था। राजा परीक्षित ने कलि को देखते ही तत्क्षण धनुष पर तीर का संधान किया। लेकिन कलि ने उनके पैर पकड़ लिए और उनसे प्राणों की भिक्षा मांगने लगा। इस दौरान राजा परीक्षित का कलि से वार्तालाप हुआ।   परम पूज्य स्वामी गोविंददेव गिरि जी भागवत कथा के दौरान बताते हैं कि एक दुर्मति से वार्तालाप का ही यह परिणाम था कि धर्मपरायण राजा परीक्षित से यह जघन्य कार्य हुआ।

          किसी भी अवस्था में किसी भी प्रकार की दुर्मति या ऋणात्मक विचार से अपने को संबंधित मत कीजिए। आप के चारों और सत्य और सौंदर्य का समुद्र लहरा रहा है, डुबकी लगानी है तो उसी में लगाये।

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मंगलवार, 9 दिसंबर 2025

सूतांजली दिसम्बर (द्वितीय) 2025

 


किसने मारा – मैंने या तूने?

          आदित्य राज्य की सेना का सेनापति और शिव का परम भक्त था। युद्ध कला में  कौशल वह राज्य और प्रजा में एक महान योद्धा के रूप में जाना जाता था जो अकेले ही बड़ी संख्या में शत्रुओं से युद्ध कर सकता था। एक दिन, राजा से तकरार हो जाने के कारण उसे उसके पद से हटा दिया गया।

          आदित्य बहुत व्यथित हुए लेकिन हताश नहीं। उन्होंने सोचा, "मैं इसे भगवान शिव द्वारा दिया गया एक अवसर मानूंगा और अपना शेष जीवन उनकी प्रार्थना, चिंतन और भक्ति में समर्पित करूंगा।"

          संसार त्याग कर वे एक तपस्वी बन गए और वे राज्य के बाहर एक जंगल में छोटी सी कुटिया बनाई और शिवलिंग स्थापित कर शिव की पूजा, आराधना और ध्यान में अपना समय बिताने लगे। जंगल के पास के गाँवों के लोग आदित्य को जानते थे, उनका सम्मान करते थे। वे  उनके भोजन और बुनियादी ज़रूरतों का ध्यान रखने लगे।

          एक दिन, लुटेरों का एक समूह गाँव में घुस आया, लूटपाट की, बलात्कार किया और लोगों की हत्या करके भाग गया। ऐसा ही दूसरी बार एक अन्य गाँव में हुआ। गाँव के लोगों को लगा कि जंगल में रहने वाला तपस्वी योद्धा उनकी मदद कर सकता है और इस खतरे को रोक सकता है। वे आदित्य के पास गए, उसे सारी बात बताई और उनसे सहायता की गुहार की। आदित्य ने क्षमा मांगते हुए इंकार कर दिया, “मैं अब एक सन्यासी हूँ, मैं अब कैसे लड़ और मार सकता हूँ?" लेकिन लोगों ने विनती की और उसे घेर लिया। आदित्य ने विचार किया, "मैं इनकी वजह से शारीरिक रूप से जीवित हूँ। मुझे मदद करनी ही होगी।" उसने दृढ़ स्वर में कहा, "ठीक है, लेकिन लुटेरों से निपट के लिए मुझे एक घोड़ा और तलवार चाहिये।" गाँव वाले सोच में पड़ गए। वे घोड़ा और तलवार कहाँ से और कैसे लाएँ?

          अगले दिन राजा के दरबार का एक वरिष्ठ मंत्री, जो आदित्य का घनिष्ठ मित्र भी था, तपस्वी से मिलने आया। गाँव वालों ने उसका स्वागत किया और उसे आदित्य के पास ले गए। उन्होंने मंत्री को लुटेरों के उत्पात की जानकारी दी और बताया कि आदित्य को घोड़े और तलवार की व्यवस्था कर दें  तो वे इस मुसीबत से उन्हें छुटकारा दिला सकते हैं। मंत्री ने उन्हें आश्वस्त करते हुआ कहा कि वे आदित्य के लिए तलवार और घोड़े का इंतज़ाम कर देंगे।" गाँव वालों ने लुटेरों पर नज़र रखी और जब वे दोबारा आए तो उन्होंने आदित्य को सूचित कर दिया।

          जैसे ही उसने तलवार हाथ में ली, उसे लगा कि कोई अद्भुत शक्ति उसके अंदर प्रवेश कर रही है। तपस्वी फिर से योद्धा बन गया। गाँव वाले विस्मय और आश्चर्य से देख रहे थे, तभी आदित्य अपने घोड़े पर सवार होकर चक्रवात की तरह लुटेरों के समूह पर टूट पड़ा और सभी लुटेरों का सफाया कर दिया, जिससे लुटेरों का आतंक हमेशा के लिए खत्म हो गया। गाँव वालों ने कृतज्ञता के आँसुओं के साथ आदित्य के आगे सिर झुकाया।

          लेकिन आदित्य बहुत दुखी था। उसने मन ही मन सोचा, "मैं एक संन्यासी हूँ जिसने अहिंसा का व्रत लिया है, लेकिन करुणा और कृतज्ञता के बहकावे में आकर मैंने लोगों की निर्मम हत्या करने का जघन्य पाप किया है।" पश्चाताप से भरा उसने शिव से प्रार्थना की, "हे मेरे स्वामी, मैंने एक भयंकर पाप किया है, कृपया मुझे क्षमा करें।" वह अपने हृदय में इसी गहरे अपराध बोध के साथ सो गया। उस रात शिव ने उसके स्वप्न में दर्शन दिए और कहा, "आदित्य, दोषी महसूस मत करो। तुमने सही काम किया है, ग्रामीणों को डाकुओं के आतंक से बचाया है। यह मत सोचो कि तुमने उन्हें मारा है। उन्हें तो मैंने ही मारा है, तुम तो केवल निमित्त मात्र हो। क्या तुमने तलवार उठाते समय मेरी शक्ति को अपने भीतर प्रवेश करते हुए महसूस नहीं किया? जब डाकू दूसरी बार आए, तो ग्रामीणों ने अपने इष्ट देवता के रूप में मुझसे उनकी सहायता करने के लिए प्रार्थना की। मैंने तुम्हें अपना साधन बनाकर उनकी प्रार्थनाएँ स्वीकार कर ली।"

***

          श्रीमद्भगवदगीता के 11वें अध्याय में अर्जुन के अनुरोध पर श्री कृष्ण ने उन्हें अपने  विश्वरूप का दर्शन कराया। और फिर 55वें श्लोक में उन्हेंपाने का सीधा और सरल मार्ग बताया है। मत्कर्म कृत्, यानि जो मेरे कर्म करता है, उनके कार्य करता है वह मुझेप्राप्त करता है। उनके क्या कार्य हैं? गीता में ही कृष्ण अपने कार्यों का उल्लेख करते हुए कहते हैं:

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥

यानि - (१) साधुओं (सज्जनों) की रक्षा, (२) दुष्टों का विनाश, और (३) धर्म की स्थापना, ये तीनों कार्यों को करने वाला 'मत्कर्म कृत' है, यानि वह मेरा कार्य करता है।

          इसी अध्याय के 33वें श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं - 

"निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्"

अर्जुन तू सिर्फ निमित्त बन जा

          "अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करो और अपने समृद्ध राज्य का आनंद लो। मैंने उन्हें पहले ही मार डाला है। जो किया मैंने किया, तुम तो केवल निमित्त मात्र हो।" यह तो होना ही है, अगर तू नहीं करेगा तो कोई और करेगा मैं तो तुम्हें सिर्फ मौका दे रहा हूँ।

          जहां हम यह समझ गए कि मैं तो कुछ भी करने वाला नहीं मैं तो सिर्फ निमित्त मात्र हूँ करने वाला तो कोई और ही है और वह तो करके बैठा है, हमारे सारे अहंकार मोम की तरह पिघल कर बह जाएंगे। हम निर्मल और शांत हो जाएंगे। ईश्वर प्राप्ति का मार्ग खुल जाएगा।

          अर्जुन संशय करता है कि मार्ग जानना तो आसान है, लेकिन उस पर चलना कठिन है? इसका उत्तर भी श्री कृष्ण ने 6:35 और 12:9 में दिया है – अभ्यासेन तू कौंतेय और अभ्यायोगेन ततो मा मिच्छाप्तुं निरंतर अभ्यास से यह संभव है। अतः दृड़ निश्चय के साथ निरंतर अभ्यास करते रहें, हिम्मत न हारें।  

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सोमवार, 1 दिसंबर 2025

सूतांजली दिसम्बर (प्रथम) 2025







                                                पानी विरोध नहीं करता।

जब आप अपना हाथ इसमें डालते हैं,

तो आपको बस एक स्पर्श महसूस होता है।

पानी कोई ठोस दीवार नहीं है;

यह आपको रोकेगा नहीं।

लेकिन

पानी हमेशा वहीं जाता है

जहाँ वह जाना चाहता है।

मार्गरेट एटवुड

(कनाडा की साहित्यकार एवं बुकर पुरस्कार विजेता)

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प्रेम

खलील जीब्रान के लेखन पर आधारित

          एकत्रित समुदाय के सामने मंच पर संत विराजमान हो गए। तब उपस्थित समुदाय में से एक महिला ने हाथ जोड़  कर निवेदन किया, “महाराज! आज हमें  प्रेम के विषय में कुछ बताएं।” सबों ने संत पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। गुरु ने गंभीर स्वर में समुदाय को संबोधित करना प्रारम्भ किया-

          जब प्रेम तुम्हें अपनी ओर बुलाए तो उसका अनुगमन करो, लेकिन ध्यान रखो उसकी राहें विकट, विषम और कंटीली हैं।

          जब उसके फैले हुए पंख तुम्हें ढँक लेना चाहें, तो तुम सर झुका कर आत्मसमर्पण कर दो, भले ही उन पंखों के नीचे छिपी तलवार तुम्हें घायल करे। और जब वह तुमसे बोले तो उसमें विश्वास रखो, भले ही उसकी आवाज तुम्हारे सपनों को चकनाचूर कर डाले क्योंकि प्रेम जिस तरह तुम्हें मुकुट पहनाएगा उसी तरह शूली पर भी चढ़ाएगा। जिस तरह वह तुम्हारे विकास के लिए है उसी तरह तुम्हारी काट-छांट के लिए भी है। जिस प्रकार वह तुम्हारी ऊँचाइयों तक चढ़कर सूर्य की किरणों में काँपती हुई तुम्हारी कोमलतम कोंपलों की भी देखभाल करता है, उसी प्रकार वह तुम्हारी नीचाई तक उतरकर, भूमितल से दूर गड़ी हुई तुम्हारी जड़ों को भी झकझोर डालता है।

          अनाज की बालों की तरह वह तुम्हें अपने अंदर भर लेता है। तुम्हारी भूसी दूर करने के लिए तुम्हें फटकता है। तुम्हें पीसकर श्वेत बनाता है। तुम्हें नरम बनाने तक गूँधता है, और तब तुम्हें अपनी पवित्र अग्नि पर सेंकता है जिससे तुम प्रभु के पावन थाल की पवित्र रोटी बन सको। तुम्हारे साथ यह सारी लीला इसलिए करता है कि तुम अपने अंतरतम के रहस्यों का ज्ञान पा सको, और उसी ज्ञान द्वारा जगजीवन के हृदय का एक अंश बन सको।

          लेकिन यदि भयवश तुम केवल प्रेम की शान्ति और प्रेम के उल्लास की ही कामना करते हो, तो तुम्हारे लिए यही भला है कि तुम प्रेम की कूटने वाली खलिहान से बाहर हो जाओ। और ऋतु-हीन संसार में जा बसो, जहाँ तुम हँसोगे, लेकिन पूरी हँसी के साथ नहीं। जहाँ तुम रोओगे, लेकिन सारे आँसुओं के साथ नहीं।

          प्रेम किसी को अपने-आपके सिवा न कुछ देता है, न किसी से अपने-आपके लिए कुछ लेता है। प्रेम न किसी का स्वामी बनता है, न किसी को अपना स्वामी बनाता है। क्योंकि प्रेम प्रेम में ही परिपूर्ण है।

          जब तुम प्रेम करो तब यह न कहो, ईश्वर मेरे हृदय में है। बल्कि कहो, मैं ईश्वर के हृदय में हूँ।

          और कभी न सोचो कि तुम प्रेम का पथ निर्धारित कर सकते हो, क्योंकि प्रेम यदि तुम्हें अधिकारी समझता है तो स्वयं तुम्हारी राह निर्धारित करता है। प्रेम अपने-आपको संपूर्ण करने के सिवा और कुछ नहीं चाहता है। यदि तुम प्रेम करो और तुम्हारे हृदय में कामनाएँ उठे भी तो वे ये हों-

          मैं द्रवित हो सकूँ - बहते हुए झरने की तरह रजनी को सुमधुर गीत से भर सकूँ।

          मैं अत्यंत कोमलता की वेदना अनुभव कर सकूँ।

          मैं अपने प्रेम की अनुभूति से घायल हो सकूँ।

          मैं अपनी इच्छा से और हँसते-हँसते अपना रक्त-दान कर सकूँ।

          मैं पंख फैलाता हुआ हृदय लेकर प्रभात वेला में जाग सकूँ। और

          मैं एक प्रेममय दिन पाने के लिए धन्यवाद कर सकूँ।

          दोपहर को विश्राम कर सकूँ। और

          प्रेम के परम आनंद में तल्लीन हो सकूँ ।

          दिन ढलने पर कृतज्ञता-भरा हृदय लेकर घर लौट सकूँ

          और फिर रात्रि में हृदय में प्रियतम के लिए प्रार्थना और

          होंठों पर उसकी प्रशंसा के गीत लेकर सो सकूँ।

"ये इश्क़ नहीं आसां बस इतना समझ लीजे,

इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।"

                                                                            जिगर मुरादाबादी

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मंगलवार, 11 नवंबर 2025

सूतांजली नवंबर (द्वितीय) 2025




 

हम अनेक बार यह प्रतिक्रिया देते हैं कि पता नहीं यह व्यक्ति कौन सी दुनिया में रहता है, पता नहीं ये कौन से लोक के वासी हैं और इसी प्रकार से पढ़े-लिखों और अनपढ़ों की दुनिया, जवानों बूढ़ों और बच्चों की दुनिया, पुरुषों और महिलाओं की दुनिया? और भी न जाने कितनी दुनिया की रचना हम कर डालते हैं। अलग-अलग इतनी सारी दुनिया? कितनी दुनिया है? कैसी दुनिया है? आध्यात्मिक जीवन में आध्यात्मिक लोग इन अलग-अलग लोगों की अलग ढंग से चर्चा करते हैं लेकिन वहीं साहित्यिक लोग इसकी अलग ढंग से चर्चा करते हैं।

          सामान्यतः हम तीन लोकों की चर्चा करते हैं।

          पहला पाताल लोक जहां आसुरी शक्तियों का निवास मानते हैं। पाताल में दैत्य, दानव और नाग जैसे प्राणियों का निवास माना जाता है, जिनमें वासुकि प्रमुख हैं।

          दूसरा भू-लोक है, यानी वह स्थान जहां मनुष्य यानि मानवीय शक्ति निवास करते हैं। और यही प्रेरणा दी जाती है कि हम भू-लोक के निवासी अपने कर्मों से ब्रह्म लोक के वासी बनें।   

          और तीसरा बह्म लोक जहां देवी, देवताओं का वास है।

          कवीन्द्र रवीद्र ने इन से हट कर तीन भूमियों की चर्चा की है जहां हमारा  वास-स्थान है। और ये तीनों ही हमारी जन्म-भूमि है क्योंकि जन्म के साथ ही हम इन तीनों जगत में रहना प्रारम्भ कर देते हैं। पृथ्वी ही नहीं इसके अलावा और दो जगत हैं जहां हम जन्म से मृत्यु पर्यंत वहाँ रहते हैं। वे लिखते हैं हमारी तीन जन्म भूमियां हैं, और तीनों एक-दूसरे से मिली हुई हैं।

पहली जन्मभूमि है पृथ्वी - मनुष्य का वासस्थान पृथ्वी पर सर्वत्र है। ठण्डा हिमालय और गर्म रेगिस्तान, दुर्गम उत्तुंग पर्वत श्रेणी और बंगाल की तरह समतल भूमि - सभी जगह मानव का निवास है। मनुष्य का निवासस्थान वास्तव में एक ही है - अलग-अलग देशों का नहीं, सारी मानव जाति का। मनुष्य के लिए पृथ्वी का कोई अंश दुर्गम नहीं - पृथ्वी ने उसके सामने अपना हृदय मुक्त कर दिया है।

          मनुष्य का द्वितीय वासस्थान है स्मृतिजगत्। अतीत से पूर्वजों का इतिहास लेकर वह काल का नीड़ तैयार करता है - यह नीड़ स्मृति की ही रचना है। यह किसी विशेष देश की बात नहीं है, समस्त मानव जाति की बात है। स्मृतिजगत् में मानव मात्र का मिलन होता है। मानव का वासस्थान एक ओर पृथ्वी है, दूसरी ओर स्मृतिलोक। मनुष्य समस्त पृथ्वी पर जन्म ग्रहण करता है और समस्त इतिहास में भी। अतीत में, वर्तमान में और फिर इन दोनों के संयोग से भविष्य बुनता है।

          उसका तृतीय वासस्थान है आत्मलोक। इसे हम मानवचित्त का महादेश कह सकते हैं। यही चित्तलोक मनुष्यों के आन्तरिक योग का क्षेत्र है। किसी का चित्त संकीर्ण दायरे में आबद्ध है, किसी के चित्त में विकृति है - लेकिन एक ऐसा व्यापक चित्त भी है जो विश्वगत है, व्यक्तिगत नहीं। उसका परिचय हमें अकस्मात् ही मिल जाता है - किसी दिन अचानक वह हमें आह्वान देता है। साधारण व्यक्ति में भी देखा जाता है कि जहाँ वह स्वार्थ भूल जाता है, प्रेम करता है, वहाँ उसके मन का एक ऐसा पक्ष है जो 'सर्वमानव' के चित्त की ओर प्रवृत्त है।

          मनुष्य विशेष प्रयोजनों के कारण घर की सीमाओं में बद्ध है, लेकिन महाकाश के साथ उसका सच्चा योग है। व्यक्तिगत मन अपने विशेष प्रयोजनों की सीमा से संकीर्ण होता है, लेकिन उसका वास्तविक विस्तार सर्वमानव-चित्त में है। वहाँ की अभिव्यक्ति आश्चर्यजनक है। एक आदमी के पानी में गिरते ही दूसरा उसे बचाने के लिए कूद पड़ता है। दूसरे की प्राण-रक्षा के लिए मनुष्य अपने प्राण संकट में डाल सकता है। हम देखते हैं कि मनुष्य अपनी रक्षा को ही सबसे बड़ी चीज़ नहीं गिनता। इसका कारण यही है कि प्रत्येक मनुष्य की सत्ता दूसरों की सत्ता से जुड़ी हुई है।

          हम सब एक हैं, अलग-अलग नहीं।

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शनिवार, 1 नवंबर 2025

सूतांजली नवंबर (प्रथम) 2025


परिवर्तन के लिए हाथ बढ़ाइए.....

लेकिन मूल्यों को हाथ से जाने मत दीजिये

दलाई लामा

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पुरातन - नूतन का नाता

          आचार्य महाप्रज्ञजी ने एक बार बताया –

          एक आदिवासी नगर में गया। उसने नगर को देखा। बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं, बाज़ार, वस्तुएं, भोजन, आभूषण और साज-सज्जा देखी। उसे सब कुछ बहुत सुंदर लगा। जब वह लौट कर जंगल में अपनी झोंपड़ी में पहुंचा तो परिवार के लोगों ने जानना चाहा, नगर कैसा होता है?

          आदिवासी के पास इस सवाल का जवाब नहीं था। वह जानता तो था, पर बता नहीं सकता था। बताता भी कैसे? पूछने वालों ने कभी नगर नहीं देखा था। उन्हें झोंपड़ी के अलावा किसी विशाल घर का कुछ पता नहीं था। वे सूखी रोटियां जानते थे, पकवान क्या होता है, वे क्या जानें?

          यही हाल हमारी समझ का भी है। कुछ नया जानने के लिए पुराना संदर्भ तो होना चाहिए। हम उन सारे संदर्भों को भूलते जा रहे हैं। यही हमारे जीवन की व्यथा है। हमारा पिछला हर कदम हमारी आने वाली यात्रा की तरफ बढ़ाने वाला है। यह बात हमें समझनी होगी। तभी हम वह समझ सकेंगे, जो हम समझना चाहते हैं।”

          पावन कुमार गुप्त का यह मानना है कि अब हमें य समझना होगा कि हम पिछले कई शताब्दियों से जिस रास्ते पर चल रहे हैं अगर उस रास्ते पर चल कर हम सुखी हो रहे हैं, शुभ हो रहा है तो ठीक, वरना हमें यह समझ लेना चाहिए कि हमने गलत रास्ता चुन लिया है, और साथ ही यह भी कि रास्ते और भी हैं।

हम अपने लोगों के साथ अपने विगत से अपनी वृत्ति, अपने चित्त को समझ कर उसके अनुसार अपना रास्ता चुन सकते हैं। पर क्योंकि कई लोगों को ऐसी बातों से कुछ ऐसा आभास होने लगता है कि पीछे जाने की बात हो रही है, इसलिए यह कहना ज़रूरी है कि पीछे जाना कुछ होता नहीं है। नवीनता तो एक बाध्यता है, ठीक उसी तरह जैसे कर्म एक बाध्यता है।

सवाल यह है कि 'क्या करें?' सवाल यह भी नहीं है कि आगे जाएं या पीछे। चूंकि आगे ही जाया जा सकता है, इसलिए चुनाव सिर्फ इस बात का करना है कि किस प्रकार की नवीनता का प्रयास किया जाए या किस रास्ते पर आगे जाया जाए। हर समाज की अपनी-अपनी नवीनता होती है। पर जिन समाजों का अपने विगत से सहज संबंध होता है वे समाज सहज होते हैं और उनमें एक मजबूती, एक आत्मविश्वास दिखता है। उनका विगत ही वह धरातल देता है जिससे उनके समाज को मजबूती  मिलती है। इसी की वजह से नए विचारों और प्रभावों की आंधी में मजबूत समाजों के पाँव नहीं उखड़ते, बल्कि अपने विगत से इन नई बातों का मेल बिठा कर वे अपने लिए एक सहज नवीनता का निर्माण कर लेते हैं। इस प्रक्रिया में, कुछ विगत का और कुछ नवीन विचारों और प्रभावों का अंश छूटता जाता है और साथ ही दोनों के मिलन से कुछ नए का सृजन भी होता रहता है। यही प्रक्रिया विगत से नाता रखते हुए, समाज को नित नवीन बनाती रहती है।

आधुनिक विचारों, यंत्रों और प्रभावों का आना नियति है। हर समाज इन नए विचारों, यंत्रों और प्रभावों का अपने-अपने तरीके से अपने विगत के साथ मेल बैठाता है और अपनी एक विशिष्ट नवीनता का सृजन करता है। विगत और वर्तमान के योग में एक संगीत होता है। इसके विपरीत हमारे जैसे समाज, जिनका अपने विगत से सहज संबंध नहीं रह गया है - या यह संबंध चोरी-छिपे होता है - वे शंकालु, हर समय स्पष्टीकरण देते, अपने को प्रगतिशील दिखाने की फिराक में नकलची या फिर झूठी शान बघारते दिखते हैं। ये सभी कमज़ोरी की निशानियाँ हैं।

जिस प्रकार मनुष्य और मनुष्य के बीच समानताएं होते हुए अनेक प्रकार की विशिष्टताएं भी हैं, उसी प्रकार अलग-अलग संस्कृतियों, समाजों और सभ्यताओं में भी समानताएं और विशिष्टताएं दोनों एक साथ विद्यमान रहती हैं। इन विशिष्टताओं की अनदेखी नहीं की जा सकती। जब-जब इनकी अनदेखी की जाती है, तो फिर उन्हीं सभ्यताओं, समाजों और संस्कृतियों की मान्यताएं हावी हो जाती हैं जो उस कालखंड में ताकतवर होती हैं।

'वसुधैव कुटुंबकम्' का अर्थ यह नहीं है कि दुनिया के सभी समाज किसी एक ताकतवर सभ्यता के रास्ते पर चलें। बल्कि इसका अर्थ यह है कि सभी को शुभ के अर्थ में अपने तरीके से, सहजता से जीने की छूट हो। सभी अपनी सीरत, अपनी विशिष्टताओं के आधार पर अपनी दुनिया बना सकें।

          मान्यता और वास्तविकता के इस भेद का सामना हमें करना ही पड़ेगा। काफी समय से हम इसे देख कर भी अनदेखा करते रहे हैं। हमें वास्तविकता और अनुभव के सत्य को स्वीकारते हुए इन नई गढ़ी गई मान्यताओं पर प्रश्नचिह्न लगाना होगा। हिम्मत जुटानी होगी कि उन गढ़ी हुई मान्यताओं को वास्तविकता के आधार पर, ज़रूरत पड़े तो, अस्वीकार कर दें। फिर अनुभव के ही आधार पर इस वास्तविकता को स्वीकार करें कि हमारी और दूसरी सभ्यताओं के बीच समानता होते हुए भी हमारी अपनी अलग विशिष्टताएं हैं। हम अपने विगत को पहचान कर उससे अपने चित्त को समझते हुए कुछ समझ पैदा करें। समझें कि हम कैसे अपने आपको, अपने परिवेश को, पेड़-पौधों, नदी-नालों, पशु पक्षियों, अपने लोक को देखते हैं। यह हमारे लिए श्रेयस्कर तो होगा ही, सहज भी होगा। हमारे लिए यह एक अवसर है कि हम अपनी खोई हुई स्मृति को फिर से जगा कर अपनी दृष्टि से इस जीव-जगत को देखें और विगत से अपना सहज संबंध स्थापित करते हुए अपने अनुभव पर आधारित मान्यताओं के आधार पर अपना जीवन जिएं।

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शनिवार, 11 अक्टूबर 2025

सूतांजली अक्तूबर (द्वितीय) 2025

 


अनेक लोग यह मानते हैं कि अहिंसा कमजोरों का हथियार है। यह मान्यता उनकी भ्रांतियों पर आधारित है। उन्हें अपने बल पर बहुत भरोसा होता है, घमंड की हद तक। लेकिन अगर भीम के सामने दुर्योधन खड़ा हो, अर्जुन के सामने कर्ण खड़ा हो तब उनका भरोसा डिग जाता है। भीम या अर्जुन की विजय उनके बल के कारण नहीं बल्कि कृष्ण के कारण हुई थी। कृष्ण के रूप में उन्होंने सत्य और धर्म को अपनाया था। यही नहीं, इंद्र द्वारा कर्ण को प्रदत्त अमोघ शक्ति से अर्जुन को बचाने का श्रेय भी कृष्ण को ही जाता है। कृष्ण के कारण ही कर्ण को अमोघ शक्ति का प्रयोग घटोत्कच पर करना पड़ा। बर्बरीक, जिसे कलयुग में श्याम बाबा के नाम से पूजा जाता है, को कौरवों के पक्ष में जाने से रोकने का श्रेय भी कृष्ण को ही जाता है।

          शारीरिक बल के बावजूद अगर आप में अटकल नहीं है, आप दाव-पेंच नहीं जानते, लाठी भांजने का अभ्यास नहीं है, तलवार-भाला चलाने में समर्थ नहीं हैं, व्यूह रचना नहीं आती  तो आपका बल काम का नहीं। निशाना ठीक नहीं है तो पिस्टल, बंदूक मशीनगन क्या काम करेगा? टैंक, मिसाइल, ड्रोन, जेट चलाने में निपुण नहीं हैं तब आपका हथियार आपकी रक्षा नहीं कर सकेगा। अहिंसा भी ऐसा ही एक हथियार है, जिसका प्रयोग करना आपको आना चाहिए, अन्यथा आप जीत नहीं सकते। अहिंसा के साथ, सत्य और धर्म आपके पक्ष में होना चाहिए।

           सत्याग्रह व्यक्ति के भीतर सद्वृत्ति के निर्माण का भी औज़ार। इस हथियार से दुश्मन का नहीं, दुश्मनी का नाश होता है। गांधी ने इसके परिणाम देखे थे अतः उन्होंने इस हथियार का प्रयोग बहुतायत से और सफलता पूर्वक किया।

          दक्षिण अफ्रीका में ट्रेन से बाहर फेंके जाने के बाद, बघ्घी के कोचवान ने भी बघ्घी में बैठने देने से इंकार करने और चाबुक से मारने पर गोरों द्वारा गांधीजी का पक्ष लेते हुए देख गांधीजी ने यह निष्कर्ष निकाला कि जहां वेदना है, वहां संवेदना हैयदि वेदना के साथ सत्य और अहिंसा जुड़ जाती है तो संवेदना ज्यादा प्रबल होगी  जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल में डॉ सिंह ने नगर के निवासियों में सफलता पूर्वक इस संवेदना को जागृत किया और उन्हें जनता का भरपूर सहयोग मिला।

          प्रशासन ने कर्मचारियों में व्याप्त बुराइयों को दूर करने का वातावरण बनायाप्रायश्चित के 5 नियमों ने कर्मचारियों में व्यापक परिवर्तन लायाकई ने उसी दिन जो गुटका, बीड़ी, शराब छोड़ी तो दुबारा शुरू नहीं की। डॉ.सिंह कहते हैं, “मुझे अत्यंत हर्ष है कि मैं अपनी सेवानिवृत्ति से पहले ठेका कर्मचारियों का वेतन बढ़वाने में भी सफल रहा

          सत्याग्रह ने फिर एक बार अपने प्रभाव को सिद्ध किया।  सत्याग्रह के ऐसे परिणाम सामने आते ही रहते हैं बस चर्चा नहीं होती।

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बुधवार, 1 अक्टूबर 2025

सूतांजली अक्तूबर (प्रथम) 2025

 


भय दासता है, 

                                        कार्य स्वतन्त्रता है,

                                                                      साहस विजय है।

                                                                                                    श्री माँ (पांडिचेरी )

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सत्याग्रह

हमारे पूर्वज अपने किसी भी सिद्धांत को स्पष्ट करने के लिए दृष्टांत का प्रयोग करते थे। हमारे प्राचीन ग्रंथ ऐसे दृष्टांत से भरे हुए हैं। कहीं सिद्धांत पहले है फिर दृष्टांत तो कहीं दृष्टांत पहले और फिर सिद्धांत।

यह दृष्टांत, कहानी या उपमा न होकर एक सत्य घटना ही है जो कुछ वर्षों पहले ही जयपुर के सबसे बड़े अस्पताल, सवाई मानसिंह अस्पताल में घटी थी। डॉ. वीरेंद्र सिंह अस्पताल के अधीक्षक थे और गांधी के सत्याग्रह में उनका गहरा विश्वास था। अधीक्षक बनने के कुछ समय बाद ही अस्पताल के ठेका कर्मचारियों ने एक दिन की नोटिस देकर अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर दीठेका कर्मचारियों की मुख्य मांग थी, पैसे बढ़ाओ!

          ठेके के कर्मचारियों के भुगतान के नियम राजस्थान प्रदेश के समस्त सरकारी कार्यालयों और अस्पतालों के लिए समान होते हैं। अतः अकेले सवाई मानसिंह अस्पताल के ठेका कर्मचारियों के पैसे बढ़ाने की बात समझ से बाहर थीपैसों के अलावा उनकी सारी मांगें मानने में अधीक्षक को कोई भी कठिनाई नहीं थीयह निर्णय भी हुआ कि तनख्वाह का निर्णय एक कमिटी पर छोड़, बाकी मांगें मान ली जाएठेकाकर्मियों ने समझौता स्वीकार भी कर लिया। समझौता सम्पन्न भी हुआ। लेकिन फिर कर्मियों का मन पलट गया, उन्हें लगा तनख्वाह बढ़ाने की  मांग भी स्वीकार हो जाएगी। अतः हड़ताल भी तभी खत्म करेंगे। अस्पताल के अध्यक्ष डॉ.सिंह को लगा कि उन्हें ठगा गया है और उन्होंने निश्चय किया कि अब तो हड़ताल का मुकाबला करेंगे

दूसरे दिन सफाई कर्मचारी भी हड़ताल में शामिल हो गएनगर निगम से बात की लेकिन मदद नहीं मिलीचीफ सेक्रेटरी से बात की तो उन्होंने नगर निगम को सफाई कर्मचारी भेजने के आदेश दिए लेकिन जब नगर निगम की वैन  कर्मचारियों को लेकर आई तो हड़ताली कर्मचारियों ने उनके खिलाफ नारे लगाए, उनसे बातचीत की और वे सभी बिना काम किये लौट गए

          अस्पताल के प्रशासनिक अधिकारियों ने राय दी कि पुलिस की मदद से कर्मचारियों को हटाया जाए। लेकिन अध्यक्ष बल प्रयोग के पक्ष में नहीं थे। हड़ताल के मुकाबले के लिए प्रथम चरण में कुछ छात्रों को कुछ समय कम्प्युटर पर बैठाया गया, फिर रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन ने गोखले हॉस्टल एवं इंजीनियरिंग के छात्रों की मदद लीआइ. टी. सचिव ने भी 20 लोगों को भेज दियाउसी समय ई.टीवी और अखबार में दर्शकों और पाठकों से अपील करते हुए अध्यक्ष ने अनुरोध किया ‘वर्षों तक बीमारी में आपके सहायक न सवाई मानसिंह अस्पताल को आज आपकी जरूरत है आप स्वैच्छिक काम के लिए आमंत्रित हैं  रोगियों की वेदना की बात सुन, जयपुर की जनता में संवेदना जागृत हुई पहले दिन 10 लोग आए, दूसरे दिन तो लोगों का तांता लग गया जन सहयोग की इस अनूठी पहल ने अस्पताल-व्यवस्था  चरमराने से बच गई।

          छठे दिन हड़ताली कर्मचारियों में बेचैनी फैलने लगी और शाम तक उनका प्रतिनिधि मंडल समझौते के लिए तैयार हो गया। उन्हें काम पर आने कहा गया तो उन्होंने लिखकर देने कहा। लेकिन अध्यक्ष डॉ.सिंह ने इंकार कर दिया। उन्हें पहले हस्ताक्षर के हश्र के बाद दूसरा हस्ताक्षर करना उचित नहीं लगा। डॉ.सिंह अडिग रहे। हड़ताल जारी रहीस्वयंसेवकों ने अस्पताल की व्यवस्था संभाल ही रखी थी

          रात को हड़ताली नेता आए। डॉ.सिंह ने इनकार करते हुआ कहा, "अब मैं तुमसे नहीं, सारे हड़ताली कर्मचारियों से बात करूंगासुबह सबको ऑडिटोरियम में इकट्ठे करो।" ऑडिटोरियम में करीब 800 लोग इकट्ठे हुए। उन्होंने हड़ताल की बात न करके बीड़ी, सिगरेट, शराब जैसे नशीली चीजों के हानिकारक असर पर आधे घंटे का स्लाइड प्रोग्राम दिखायाअंत में कहा पिछले 8 दिनों की हड़ताल में न तुम्हारा कुछ बिगड़ा, न हमारा कुछ बिगड़ा बिगड़ा उन दुखी रोगियों का, जो यहां इलाज की उम्मीद में भर्ती हुएमांगों पर तो बातचीत से ही समाधान निकलेगा, हड़ताल से नहींहड़ताल-रूपी गलती का आपको प्रायश्चित करना चाहिए

          ‘प्रायश्चित! कैसे प्रायश्चित?’, कर्मियों को बड़ा आश्चर्य हुआ।

          अध्यक्ष ने पांच बातें बताई : चोरी नहीं, कामचोरी नहीं, यूनीफॉर्म में रहें, रोगियों से मृदु बोलें, तथा बीड़ी, गुटका और शराब का सेवन नहीं करेंइन 5 बातों को जीवन में उतारने की प्रतिज्ञा लें?

          सबों ने स्वीकार किया और लिखित भी दे दिया। डॉ सिंह ने पैसे बढ़ाने के लिए सतत प्रयास का वादा कियाकर्मचारियों के जायज हक के लिए अध्यक्ष प्रयत्नशील रहे लेकिन रोगियों के जीवन को खतरे में डालकर हड़ताल जैसे ब्लैकमेल के सामने झुकने को तैयार नहीं हुए। इस कठिन घड़ी में जयपुर की जनता के दिल में रोगियों की वेदना ने संवदेना जागृत की और वे स्वयंसेवक बन आगे आए प्रेस ने इस घटना का उल्लेख 'सवाई मानसिंह अस्पताल में निकला सत्याग्रह से हड़ताल का इलाज' के शीर्षक से किया।

          यह था दृष्टांत, अगले अंक में सिद्धान्त

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सूतांजली जनवरी (प्रथम) 2026

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