बुधवार, 1 सितंबर 2021

सूतांजली, सितंबर 2021

सूतांजली

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वर्ष : ०५ * अंक : ०२                   🔊(२५.०५)                                  सितंबर  * २०२१

हमेशा त्रुटियों और गलत प्रवृत्तियों को ही देखने से अवसाद आता है, और

श्रद्धा की हिम्मत टूट जाती है। अभी के अंधेरे की ओर कम देखो,

अपनी आँखें ज्यादातर आने वाले प्रकाश की ओर रखो।

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क्यों हो जाते हैं हम निराश? 🔉 (६.४२)                                  

निराशा के गहनतम अंधकार में भी कहीं-न-कहीं कोई-न-कोई आशा की रौशनी रहती है जो प्राणी को कर्म में लगाये रखती है। हमारी इच्छा-शक्ति ही इस आशा की किरण को प्रज्वलित रखती है और हमें लगातार आशान्वित करती रहती है। इस कारण हम ज्ञान प्राप्ति में लग जाते हैं जो हमारी आशाओं को फलीभूत करती है। हमारी ये आशाएँ कहाँ से और कैसे जन्म लेती हैं? इनका बीजारोपण हमारे पूर्वजन्म में होता है जहाँ से हम संस्कार लेकर ही इस जगत में आते हैं। और फिर परिवार, समाज, वातावरण, श्रवण, पठन-पाठन हमारी इन इच्छाओं को और मजबूत करता है और एक स्वरूप प्रदान करता है।  

हमारी ये इच्छाएँ ही हमें सदैव कर्म के लिए प्रेरित करती हैं। ऐसा नहीं है कि आशा केवल हम मानव में ही होती है, यह विश्व के हर प्राणी में होती है। एक खूंक्खार जानवर अपनी माँद से इसी आशा में निकलता है कि कोई-न-कोई जानवर उसके शिकंजे में आ ही जाएगा, तो वहीं हिरण को यह आशा रहती है कि आज भी वह शेर के पंजों से बच जाएगा। खेल के मैदान में हर खिलाड़ी को इस बात की  आशा रहती है कि अंत में वही जीतेगा। वैसे ही व्यापारी हो या संन्यासी, राजनीतिज्ञ हो या शिक्षाविद, संगीतज्ञ हो या चित्रकार सब को यही आशा रहती है कि वह सफल होगा। और जो इस आशा को बनाए रखता है वह सफल भी होता है। अगर यह आशा ही हमारे प्राण हैं और इसी के कारण हमारा अस्तित्व है तो फिर ऐसा क्या होता है कि हम निराश हो जाते हैं, आशा का लोप हो जाता है? इसके कई कारण हैं: यथा,

1.     हम क्या और कैसी आशा रखते हैं? कई बार हमारी आशा निरर्थक, अविवेकपूर्ण, अनुचित या अन्यायपूर्ण होती हैं। हमारी आशा हमारी क्षमताओं के तुलना में बहुत ज्यादा होती है। कई बार तो हम अपनी आशाओं को ठीक ढंग से रूपायित ही नहीं कर पाते हैं। इन के कारण हम हताश और निराश हो जाते हैं। अपनी आशाएँ सार्थक, विवेकपूर्ण, उचित, न्यायपूर्ण, क्षमतानुसार  एवं स्पष्ट होनी चाहिए। अगर हम इन बातों का ख्याल रखें, तब हमें ऐसी स्थिति का समाना नहीं करना पड़े।

2.     बचपन से ही हम यह पढ़ते-सुनते आए हैं कि हमारे जीवन का एक लक्ष्य होना चाहिए। लेकिन हम इसे गंभीरता से नहीं लेते। सही मायने में हमारे सामने एक नहीं अलग-अलग कई लक्ष्य होने चाहिये -  क) पारिवारिक एवं घरेलू, ख) स्वास्थ्य - शारीरिक एवं मानसिक, ग) शिक्षा, घ) आध्यात्म एवं नैतिक, और च) आर्थिक एवं व्यवसायिक या जीविका। इन सबों का अलग-अलग लक्ष्य होना चाहिए। इन दूरगामी लक्ष्यों को फिर छोटे छोटे अल्पकालीन लक्ष्यों में विभाजित करना और बार-बार इनका पुनर्वालोकन करते रहना भी आवश्यक है। ये हमारी स्वधर्म को परिभाषित करती हैं और हमें जड़ता और निराशा में जाने से बचाती हैं।

3.   हमारी इस यात्रा में  अनेक कठिनाइयाँ और रोड़े आते हैं। हमें हारने-विफल होने का डर सताने लगता है। ऐसी अवस्थाओं में हम प्राय: अपने लक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए अपनी आशाओं को घटा देते हैं और जोखिम को आवश्यकता से ज्यादा महत्व दे देते हैं। होने वाले लाभ के बदले जोखिम हमें भारी लगने लगता है और इस प्रक्रिया में लाभ का मूल्यांकन कम और जोखिम को ज्यादा आँकने की गलती कर बैठते हैं। सही मूल्यांकन करें, लक्ष्य को घटाने पर नहीं रोडों को हटाने पर ध्यान केन्द्रित करें।

4.     होने वाले लाभ को कमतर और जोखिम को अधिक आँकने का कारण हमारा अज्ञान ही होता है। अपनी क्षमताओं का सही आकलन करने और अपने आप पर पूरा भरोसा रखने के लिए ज्ञान आवश्यक है। अभी वर्तमान समय में कोविड टीकाकरण के दौरान टीका लगवाने में हिचकिचाहट एक बहुत ही ज्वलंत और प्रत्यक्ष उदाहरण हमारे सामने है। अपने अज्ञान के कारण ही प्रारम्भ में टीका लगवाने में हिचकिचाहट हो रही थी। हमारा अज्ञान और अहंकार ही इसके लिये उत्तरदायी है जिसका निराकरण ज्ञान से ही होता है

5.   परम सत्य और सापेक्ष सत्य को न समझने तथा इनमें विश्वास न होने पर भी आशा क्षीण होती है।  सापेक्ष सत्य हमारे वर्तमान अल्पकालीन लक्ष्य को हासिल करने के लिए सही हो सकता है लेकिन इसके सहारे परम सत्य को समझना और वहाँ तक पहुँचना आशा को सबल करती है।  

अगर इन बातों पर अपनी नजर बनाये रखें तो आशा का लोप नहीं होता है, निराशा प्रवेश नहीं करती है।

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एक भावपूर्ण प्रार्थना और दृढ़ विश्वास  🔉(३.०२)                               मैंने पढ़ा

संत रामदासजी जब प्रार्थना करते थे तो कभी उनके होंठ नहीं हिलते थे।

शिष्यों ने पूछा, हम प्रार्थना करते हैं तो होंठ हिलते हैं। आपके होंठ नहीं हिलते? आप पत्थर की मूर्ति की तरह खड़े हो जाते हैं। आप कहते क्या हैं अंदर से? क्योंकि, आप अंदर से भी कुछ कहेंगे, तो होंठ पर थोड़ा कंपन आ ही जाता है। चेहरे पर बोलने का भाव आ जाता है।



यह सुनकर संत रामदसजी ने कहा, मैं एक बार राजधानी से गुजरा और राजमहल के  सामने द्वार पर मैंने सम्राट को खड़े देखा, और वहीं एक भिखारी को भी खड़े देखा। वह भिखारी बस खड़ा था। फटे-चिथड़े थे उसके शरीर पर। जीर्ण-जर्जर देह थी, जैसे बहुत दिनों से भोजन न किया हो, शरीर सूख कर काँटा हो गया था। बस आँखें ही दिये की तरह जगमगा रही थीं। बाकी जीवन जैसे सब तरफ से विलीन हो गया हो। वह कैसे खड़ा था यह भी आश्चर्य था? लगता था अब गिरा-तब गिरा!

सम्राट उससे पूछा – बोलो क्या चाहते हो?

उस भिखारी ने कहा – “अगर आपके द्वार पर खड़े होने से मेरी मांग का पता नहीं चलता, तो कहने की कोई जरूरत नहीं। क्या कहना है? मैं द्वार पर खड़ा हूँ, मुझे देख लो मेरा होना ही मेरी प्रार्थना है।  

संत रामदसजी ने कहा, उसी दिन से मैंने प्रार्थना बंद कर दी। मैं परमात्मा के द्वार पर खड़ा हूँ। वह देख लेंगे। मैं क्या कहूँ? अगर मेरी परिस्थिति कुछ नहीं कह सकती, तो मेरे शब्द क्या कह सकेंगे? अगर वे मेरी परिस्थिति नहीं समझ सकते, तो मेरे शब्द को क्या समझेंगे?’

अत: सच्चे भाव और दृड़ विश्वास ही परमात्मा की याद के लक्षण हैं, यहाँ कुछ मांगना शेष नहीं रहता? आपका प्रार्थना में होना ही पर्याप्त है।

(जब हम अपना जीवन एक अंजान डॉक्टर के हाथ में देने से नहीं हिचकिचाते तब हमें क्या चाहिए और हमारे लिए क्या श्रेष्ठ है; क्या यह हम परमात्मा से ज्यादा अच्छा समझते हैं? अगर नहीं, तो निर्णय उसी पर क्यों नहीं छोड़ सकते? श्री अरविंद आश्रम-दिल्ली शाखा से प्रकाशित पत्रिका कर्मधारा से। )

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जन्मदिन 🔉 (६.२४)                                                                             मेरे विचार

आज माधव बहुत प्रसन्न है। मुस्कुराहट उसके चेहरे पर बार-बार दिखाई दे रही है। उसे नींद भी नहीं आ रही है। आज की रात कितनी लंबी है, खत्म ही नहीं हो रही है। कल उसका जन्मदिन है, अरे नहीं हैप्पी बिर्थडे है। सबों कों चहक-चहक कर बता रहा है। सब दोस्तों को बार-बार याद दिलाया है, कहीं कोई भूल नहीं जाये। सपनों में देख रहा है कि उसके लिये कौन क्या गिफ्ट लाया है। उसके लिये जन्मदिन, उपहार लेने का दिन है, दोस्तों के साथ मस्ती करने का दिन है, केक काटने का दिन है, लोगों से जन्मदिन की बधाई लेने और उन्हें धन्यवाद देने का दिन है। यह सोचते और देखते कब आँख लग गई उसे पता ही नहीं चला।  

माँ ने जगाया तो हड़बड़ा कर उठा। माँ ने उसे जन्मदिन के ढेर सारे आशीर्वाद दिये और जल्दी तैयार होने के लिये कहा, क्यों? अभी तो देर है, पार्टी तो शाम को है’, उसने सोचा। माँ ने बताया कि उसे अभी कई नए लोगों के पास जाना है और उन्हें जन्मदिन के गिफ्ट देने हैं। माधव को यह बड़ा अजीब सा लगा। जन्मदिन पर तो गिफ्ट मिलते हैं, लेकिन माँ गिफ्ट देने की बात कर रही है! माँ ने समझाया, ऐसे बहुत से लोग हैं जो न गिफ्ट लेने आते हैं और न ही देने। लेकिन वे हमें जानते हैं और हम उनको। ऐसे भी लोग हैं जिन्हें उसके जन्मदिन का पता नहीं है और हम उन्हें बुलाते भी नहीं। क्या माधव उन्हें गिफ्ट नहीं देगा? उन्हें नहीं बताएगा कि आज उसका जन्मदिन है? माधव खुश हो गया, तब तो बहुत मजा आयेगा। जल्दी जल्दी नहा धोकर, दूध पीकर तैयार है। माँ ने बताया, उन पड़ोसियों का नाम जिनके यहाँ उनका आना-जाना नहीं के बराबर है, उन कर्मचारियों के नाम, जैसे दरवान, मासी, दूध वाला, अखबार वाला, सफाई वाला....., पास पड़ोस के उन दूकानदारों के नाम जिनके सामने से रोज गुजरते हैं उनसे कभी कुछ खरीदते हैं कभी देखते भी नहीं, घर के दरवाजे के पास खड़ा रिक्शावाला, टैक्सीवाला, गाड़ी धोने वाला, पास पड़ोस के ड्राईवर और भी न जाने कितने लोगों के बारे में उसने बताया। यह सुनकर माधव ने भी मुहल्ले के कई बच्चों के नाम जोड़ दिये। लेकिन उसे जाना थोड़ा अजीब सा लगा और संकोच भी हो रहा था। माँ ने कहा शुरू के कुछ लोगों के पास वह भी साथ चलेगी।  माधव चल पड़ा जन्मदिन मनाने, गिफ्ट लेने के बजाय गिफ्ट देने के लिये। जब वह किसी को गिफ्ट देता, लेने वाले की आँखों की खुशी और चेहरे के आश्चर्य से वह अछूता नहीं रहा सका। कई लोगों ने तो उसे गिफ्ट के बदले गिफ्ट दिये भी। उसे शाम की पार्टी के बजाय सुबह की यह पार्टी ज्यादा रोचक और रोमांचकारी लगने लगी। वह अब समझ गया कि जन्मदिन गिफ्ट लेने का नहीं गिफ्ट देने का दिन होता है। यह सिलसिला कई वर्षों से चल रहा है। दूर-दराज के लोग उसे जानने लगे। वह अब माँ-बाप के बेटे के रूप में नहीं बल्कि उसके माँ-बाप की पहचान उससे होने लगी। 

एक मशहूर अमेरिकन फिल्म अभिनेत्री बताती हैं कि उनका बचपन गरीबी में गुजरा। उसे सर्कस देखने का बड़ा शौक था लेकिन उसके पिता के लिए सर्कस के टिकट खरीदना मुश्किल था। एक वर्ष उसने अपने जन्मदिन के तोहफे के रूप में सर्कस देखने की तमन्ना बताई। उस वर्ष से उसके पिता हर वर्ष उसे उसके जन्मदिन पर उसे सर्कस ले जाने लगे। उसे इस दिन का बड़ा इंतजार रहता। एक वर्ष इसी प्रकार वे सर्कस देखने के लिए टिकट की लाइन में खड़े थे। उनके आगे हर उम्र के आठ बच्चे अपने माँ-बाप के साथ खड़े थे। बच्चे बेहद खुश थे। उनकी बातों से साफ जाहीर था कि यह उनके जीवन का पहला सर्कस है। आखिर उनके पिता टिकट खिड़की पर पहुँच गए। उन्होने बताया कि उन्हें आठ बच्चों की और दो माँ-बाप की टिकट चाहिए। टिकट की रकम सुन कर उनके चेहर पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। उनके पास उतने पैसे नहीं थे, बच्चों को क्या कहें यह भी समझ नहीं आ रहा था। अभिनेत्री के पिता ने पूरी बात भाँप ली। उन्होंने झट अपने पॉकेट से बीस डॉलर का एक नोट नीचे गिरा दिया और फिर उसे उठा कर उस सज्जन को देते हुए बोले, यह नोट शायद आपके पॉकेट से गिरा है। दंपत्ति को बात समझते देर नहीं लगी, लेकिन उन्होंने देखा कैसे उनके आत्मसम्मान की रक्षा की गई है, उनके आँखों में आँसू आ गए। काँपते हाथों से उन्होंने वह नोट ले लिया। फिल्म तरीका आगे लिखती हैं कि अब उसके पिता ने उसकी तरफ देखा। उसे बात समझ आ गई। उसने खुशी-खुशी सर्कस न देखने का निर्णय लिया, और वे बिना सर्कस देखे लौट आये। वे कहती हैं कि उन्हें बस सिर्फ यही एक जन्मदिन याद है, इससे बड़ा तोहफा उसने न कभी दिया न कभी उसे मिला।  

दूसरों के आत्म सम्मान की रक्षा करते हुए उनकी सहायता करें, बच्चों को लेना नहीं, देना सिखाएँ।

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कर्म   🔉(२.१३)                                                लघु कहानी - जो सिखाती है जीना

वह एक तूफानी संध्या थी। बस्ती को तूफान ने घेर रखा था। बस्ती के रहने वाले अपने-अपने घरों में छुपे बैठे अपने पापों से तौबा कर रहे थे। बस्ती के धर्म-स्थल का धर्माध्यक्ष बस्ती वालों की मुक्ति के लिये दुआ मांग रहा था। ऐसे समय में धर्म-स्थल के द्वार पर दस्तक हुई और अध्यक्ष की अनुमति पाकर एक ऐसी स्त्री अंदर आई, जो उस बस्ती  में रहती थी, परंतु उसका धर्म बस्ती वालों से भिन्न था। भयंकर तूफान ने उस स्त्री को भयभीत कर दिया था। वह काँपते हुए कदमों से आगे आई। फिर उसने अध्यक्ष के चरणों में गिरकर कहा कि, श्रीमान मैं आपके धर्म से भिन्न धर्म को मानने वाली हूँ। यह बताइये कि क्या मेरे लिए इस तूफानी संध्या में आपके यहाँ स्थान है 

धर्माध्यक्ष ने उपेक्षा से उस स्त्री की ओर देखा और चीखकर कहा, “ऐ दुष्टा, यहाँ से चली जा। क्या तू नहीं जानती कि मुक्ति का मार्ग केवल उनके लिए है, जो मेरा धर्म मानते हैं। मेरे धर्म से किनारा करने वालों के लिए ही यह तूफान भड़का हुआ है।” स्त्री काँपती हुई वापस जाने के लिए मुड़ी और ऐन उसी क्षण भयानक गरज के साथ बादलों में बिजली कौंधी और लहराती हुई धर्म-स्थल पर गिरी। बस्ती के लोग जब उसकी आग बुझाने के लिये भागे हुए आए, तो उन्होंने देखा कि पवित्र धर्माध्यक्ष जलकर राख़ हो चुका था और उनकी बस्ती की दूसरे धर्म को मानने वाली स्त्री जंग लगी बाल्टी हाथ में लिए रोती जाती है और उस स्थान की आग बुझाती फिर रही है।

(उजाले के गाँव में से)

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कारावास की कहानी-श्री अरविंद की जुबानी  🔉(५.३६)                          धारावाहिक

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। इसके रोचक अंश हम जनवरी २०२१ से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसकी नौवीं किश्त है।)  

(९)

मुकदमे के विचित्र जीव

मुकदमे का स्वरूप कुछ विचित्र था। मैजिस्ट्रेट, परामर्शदाता, साक्षी, साक्ष्य, साक्ष्य-सामग्री (exhibits), आसामी सभी विचित्र। दिन-पर-दिन उन्हीं गवाहों और साक्षी-सामग्री का अविराम प्रवाह, उसी परामर्शदाता का नाटकोचित अभिनय, उसी बालक-स्वभाव मैजिस्ट्रेट की बालकोचित चपलता और लघुता। इस अपूर्व दृश्य को देखते-देखते बहुत बार मन में यह कल्पना उठती कि हम ब्रिटिश विचारालय में न बैठ किसी नटकगृह के रंगमंच पर या किसी कल्पनापूर्ण औपन्यासिक राज्य में बैठे हैं। अब उस राज्य के सब विचित्र जीवों का संक्षिप्त वर्णन करता हूँ।   

इस नाटक के प्रधान अभिनेता थे सरकार बहादुर के परामर्शदाता नॉर्टन साहब। प्रधान अभिनेता ही क्यों, इस नाटक के रचयिता, सूत्रधार और साक्षी-स्मारक भी थे, - ऐसी वैचित्रमयी प्रतिभा जगत में विरल है। परामर्शदाता नॉर्टन थे मद्रासी साहब, इसीलिए शायद थे बंगाली बैरिस्टर-मंडली की प्रचलित नीति और भद्रता से अनभ्यस्त एवं अनिभज्ञ। वे कभी राष्ट्रीय महासभा के नेता रहे थे, शायद इसीलिए विरोध और प्रतिवाद सह नहीं सकते 

थे और विरोध को शासित करने के आदी थे। ऐसी प्रकृति को लोग कहते हैं हिंस्रस्वभाव। नॉर्टन साहब कभी मद्रास कार्पोरेशन के सिंह रहे की नहीं, नहीं कह सकता पर हाँ, अलीपुर कोर्ट के सिंह तो थे ही। उनकी कानूनी अभिज्ञता की पैठ पर मुग्ध होना कठिन है – वह थी मानों ग्रीष्मकाल की शीत। किन्तु वक्तृता के अनर्गल प्रवाह में, बात की चोट से राई को पहाड़ बनाने की अद्भुत क्षमता में, निराधार या आधार लिए हुए कथनों को कहने की दु:साहसकिता में, साक्षी और जूनियर बैरिस्टर की भर्त्सना में और सफ़ेद को काला करने की मनमोहिनी शक्ति में नॉर्टन की अतुलनीय प्रतिभा देख मुग्ध होना ही पड़ता था। श्रेष्ठ परामर्शदाताओं की तीन श्रेणीयाँ हैं – जो कानून के पाण्डित्य से और यथार्थ व्याख्या के साथ साक्षी से सच्ची बात उगलवा और मुकदमे-संबंधी घटनाओं और विवेच्य विषय का दक्षता के साथ प्रदर्शन कर जज या जूरी का मन अपनी ओर आकर्षित कर सकते हैं; और जो ऊँची आवज में, धमकियों से, वक्तृता के प्रवाह से साक्षी को हतबुद्ध कर, मुकदमे से विषय को चमत्कारी ढंग से तोड़-मरोड़, गले के ज़ोर से जज या जूरी की बुद्धि भरमा मुकदमे जीत सकते हैं। नॉर्टन साहब थे तीसरी श्रेणी में अग्रगण्य। यह कोई दोष की बात नहीं। वे ठहरे परामर्शदाता व्यवसायी आदमी, पैसा लेने वाले, जो पैसा दे सके उसका अभीप्सित उद्देश्य सिद्ध करना है उनका कर्त्तव्य-कर्म। आजकल ब्रिटिश कानून प्रणाली में सच्ची बात बाहर निकालना वादी या प्रतिवादी का असल उद्देश्य नहीं, किसी भी तरह मुकदमा जीतना ही है उद्देश्य। अतएव, परामर्शदाता वैसी ही चेष्टा करेंगे, नहीं तो उन्हें धर्मच्युत होना होगा। भगवान द्वारा अन्य गुण न दिये जाने पर जो गुण हैं उनके बल पर ही मुकदमा जीतना होगा, अत: नॉर्टन साहब स्वधर्म पालन ही कर रहे हैं। सरकार बहादुर उन्हें हर रोज हजार रुपए देती थी। यह अर्थ व्यवस्था वृथा जाने से  सरकार बहादुर की क्षति होती, यह क्षति न हो इसके लिए नॉर्टन साहब ने प्राणपन से चेष्टा की थी। पर राजनीतिक मुकदमे में आसामी को विशेष उदारता के साथ सुविधा देना और संदेहजनक एवं अनिश्चित प्रमाण पर ज़ोर न देना ब्रिटिश कानून पद्धति का नियम है। नॉर्टन साहब इस नियम को सदा याद रखते, तो मेरे खयाल में, उनके केस की कोई हानि नहीं होती। ...

(क्रमश:, आगे अगले अंक में)

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अपने सुझाव (suggestions) दें, आपको सूतांजली कैसी लगी और क्यों? आप अँग्रेजी में भी लिख सकते हैं।

रविवार, 1 अगस्त 2021

सूतांजली, अगस्त 2021

 सूतांजली

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वर्ष : ०५ * अंक : ०१                    🔊(22.41)                                                   अगस्त   * २०२१

शिकायतें करने से हम शिकायत करने लायक परिस्थितियों को हो आकर्षित करेंगे।

जब हम अपनी हर बात, हर साँस, हर प्राप्ति, हर उपलब्धि के लिए धन्यवाद

देते हैं, तो धन्यवाद देने योग्य अनुभवों को आकर्षित करते हैं।

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धन्यवाद 

🔉(1.50)

इस अंक के साथ हम पाँचवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। यह आपके हौसला-अफजाई कारण ही हो सका है। कोरोना के कारण सूतांजली की छपाई का कार्य पिछले वर्ष से रोक दिया गया है।  इसे हम मेल, फ़ेस बूक, व्हाट्सएप्प और ब्लॉग की सहायता से लोगों तक लगातार पहुँचा रहे हैं। इस तकनीक के प्रयोग के फलस्वरूप हमारे पाठकों की संख्या और पत्राचार में वृद्धि भी हुई है। लेकिन ऐसे पाठक भी हैं जो इसे नहीं पढ़ पा रहे हैं। कइयों का यह मानना भी है कि ऐसे गहन विषयों को पढ़ने और संभाल कर रखने का सुख तो छपे कागज़ पर ही लिया जा सकता है। हम उनके सुझावों का आदर करते हैं और इस पर गंभीरता से विचार करने का आश्वासन भी देते हैं।  

            आप से एक ही अनुरोध है, “मेल या  ब्लॉग या  व्हाट्सएप्प पर संपर्क बनाए रखें और अपने सुझावों से हमारा मार्गदर्शन करते रहें।”

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विज्ञान और आध्यात्म                                                            मेरे विचार (🔉7.36)

चार्ल्स टौएंस (Charles H. Townes-1915-2015) एक अमेरिकन भौतिकी (physicist) वैज्ञानिक थे, उन्हें 1964 में नोबल पुरस्कार से नवाजा गया था। इन्होंने मेसर (maser) का आविष्कार किया था। अपने इस आविष्कार के आधार पर ही लेज़र का आविष्कार भी उन्होंने ही किया।

 

चार्ल्स टौएंस 

मेसर क्या होता है न हमें पता है और न ही जानने की इच्छा है। हाँ लेज़र थोड़ा बहुत जानते हैं, लेकिन और ज्यादा जानकर क्या करना है? अनेक अमेरिकन वैज्ञानिकों को नोबल पुरस्कार मिला है, तो इसमें क्या खास बात है? आप एकदम सही सोच रहे हैं, मैं भी यही सोच रहा हूँ। लेकिन उन्होंने कुछ बड़ी अजीबो-गरीब बातें कही हैं। उन बातों में किसी भी वैज्ञानिक की कोई रुचि नहीं लेकिन हमारी पूरी रुचि उनकी उन बातों में ही है। उन्होंने वैज्ञानिक खोजों और कार्यों तथा आध्यात्मिक चिंतन और विश्लेषणों की तुलना की है, और दोनों में अद्भुत सामंजस्य पाया है। उन्होंने कहा कि इनमें कोई विरोध नहीं है बल्कि दोनों को साथ-साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने की दरकार है। 

 

वे कहते हैं हम इस बात को नकार नहीं सकते कि इस ब्रह्मांड को बड़ी सावधानी और बुद्धिमानी से स्थापित किया गया है। यह कोई साधारण कार्य नहीं  है। इसे बनाने और स्थापित करने में भौतिकी विज्ञान के विशेष नियम का बड़ी सावधानी से अनुपालन किया गया है। ठीक इसी प्रकार जीव और उसके बनाने वाले सृष्टिकर्ता को स्थापित करना भी असाधारण प्रक्रिया है। बहुत से लोग इस बात से पूरी तरह से अनभिज्ञ हैं कि विज्ञान भी अनेक प्रकार की कल्पनाओं के आधार पर ही आगे बढ़ता है और यह विश्वास भी करता है कि विज्ञान के सब नियम सुचारु रूप से चलेंगे। यह एक बहुत बड़ा विश्वास है। विज्ञान यह समझने की कोशिश कर रहा है कि ब्रह्मांड कैसे कार्य करता है लेकिन आध्यात्म यह समझने का प्रयत्न कर रहा है कि इस  ब्रह्मांड को रचने के पीछे क्या कारण है? ब्रह्मांड को रचने के पीछे क्या उद्देश्य है? अगर कोई उद्देश्य और कारण है तब इसकी प्रकृति उसी के अनुरूप होगी। जहाँ विज्ञान उद्देश्य मूलक है वहीं आध्यात्म विषय मूलक है। विज्ञान की अपनी असंगतियाँ हैं तो वहीं आध्यात्म अपने आप में एक पहेली है। हम यह सोचते हैं कि हम अपने ढंग से सोचने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन विज्ञान हमें इसकी इजाजत नहीं देता और न ही आध्यात्म। विज्ञान हो या आध्यात्म हमें असंगतियों के साथ ही जीना होगा क्योंकि दोनों के पास ही सब प्रश्नों के उत्तर नहीं हैं। हम इस बात पर जितनी गहराई से विचार करते हैं  हमें लगता है कि ये दोनों ही एक दूसरे के बहुत नजदीक हैं। लेकिन इसे समझने और इस पर विश्वास करने के लिए दोनों में कई परिवर्तन करने होंगे। हमें यह स्वीकार करना होगा कि विज्ञान में अनेक विरोधाभास हैं। उदाहरण के तौर पर अगर हम सापेक्षता का सिद्धान्त (theory of relativity) और प्रमात्रा यान्त्रिकी (Quantum Mechanics) की बात करें तो दोनों के मध्य विसंगतियाँ हैं, एक दूसरे  के विरोधी हैं। लेकिन फिर भी हम दोनों को सही मानते हैं। ऐसा ही आध्यात्म में भी होता है। अगर आध्यात्म के इतिहास पर विचार करें तो उसमें भी विसंगतियाँ  और विरोधाभास हैं।

 

आध्यात्म की ही तरह विज्ञान में भी रहस्योद्घाटन होते हैं लेकिन जिसे आध्यात्मिक गुरु  रहस्योद्घाटन कह  कर ईश्वर या प्रकृति की देन मानते हैं उसे ही हम विज्ञान में अपना नया विचार, अपनी प्रतिभा की चमक, अपना अनुसंधान बताते हैं। जब मेरे मन में लेज़र का विचार आया तब मैं एक उद्यान में बैठा विचारमग्न था। एकदम से बिजली की तरह अचानक मेरे दिमाग में यह बात कौंध गई कि यह ऐसे क्यों नहीं हो सकता? यह विचार मेरे दिमाग में अचानक कैसे आया, कौन डाल गया! ईश्वर! मुझे इसकी जरा भी भनक नहीं है। लेकिन हम इसकी चर्चा नहीं करते बल्कि यही कहते हैं कि यह मेरा विचार है। ऐसा केवल मेरे साथ नहीं हुआ। प्राय: समस्त वैज्ञानिक खोज इसी प्रकार आकस्मिक ढंग से हुए। मैं यह विश्वास करता हूँ कि आध्यात्म है। मैं ईश्वर को परिभाषित नहीं कर सकता लेकिन मैं उसके अस्तित्व को हर जगह महसूस करता हूँ।

 

लोग कहते हैं  कि यह नहीं हो सकता क्योंकि हम यह नहीं जानते। लेकिन मैं कहता हूँ कि हम यह नहीं जानते, क्योंकि हम यह नहीं जानते।

 

श्रीमती नारायणी गणेश लिखती हैं इस ब्रह्मांड का अस्तित्व दो स्तरों पर है। जब हमारे अंदर खाना पचता है, क्या यह हमारी क्रिया है? एक रेखा हमारे शरीर और मन के कार्यों को विभाजित करती है। सचेतनता और जागरूकता अलग-अलग धरातल पर कार्य करती हैं। एक भौतिकी  है और दूसरी मनोवैज्ञानिक। विज्ञान विघटन (analysis) करता है लेकिन सचेतन (consciousness) संयोग (synthesis)। एक टुकड़े-टुकड़े कर के निष्कर्ष पर पहुंचता है तो दूसरा जोड़-जोड़ कर।  अत: विज्ञान अकेले इस गुत्थी को नहीं सुलझा सकता।

 

वैज्ञानिक अपने सिद्धांतों को भी समय-समय पर काटते रहते है, बदलते रहते हैं, एक दूसरे के विरोधी मतों को प्रतिपादित करते हैं और दोनों को स्वीकार भी करते हैं। स्टीफन हव्किंग ने कुछ समय पहले ही ब्लैक होल संबन्धित अपने सिद्धांतों में परिवर्तन कर दिया और इसे स्वीकार कर लिया गया। तब, जब  विज्ञान निरंतर अपनी बातों को बदलता रहता है, काटता रहता है नित नए खोज कर नए सिद्धांतों को रचता रहता है और उनमें प्रगति करता है तब उधर आध्यात्म भी तो यही करता रहता है। गुरु अलग-अलग विचारों को प्रतिपादित करते रहते हैं, बदलते रहते हैं, एक दूसरे का विरोध भी करते हैं और स्वीकार भी करते हैं। जब दोनों ही अपने-अपने ढंग से अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर ढूंढ रहे हैं तब उनमें विरोध कहाँ है? दोनों ही तो अपने-अपने तरीके से उस परम सत्य को ही तो खोज रहे हैं।

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मेरी साइकिल दौड़                                                         एक चिंतन (🔉 4.40)

क्या शानदार सुबह थी वो! अभी-अभी वर्षा बंद हुई थी। सड़क हल्की-हल्की भीगी हुई थी। उस भीगी सड़क पर दौड़ती मेरी साइकिल से उत्पन्न हो रही ध्वनि एक संगीत पैदा कर रही थी। पेड़ों से आ रही चिड़ियों की आवाज, ऐसा लग रहा था जैसे कोई पखावज बजा रहा है। पेड़-पौधे-घास ऐसा लग रहा था जैसे अभी-अभी नहा कर सज-धज कर सड़क के दोनों किनारे बैठे-बैठे इस प्रकृति के  संगीत पर झूम रही है। अद्भुत नजारा था। कानों के सब मैल नकल गये थे, आँखें हरियाली देख-देख हरी हो रही थी, मन प्रफुल्लित था। मन्द-मन्द चलती बयार आँख, नाक, कान, मुँह हर जगह से शरीर के रोम-रोम को सहलाता फेफड़े में प्रवेश कर स्फूर्ति पैदा कर रहा था। प्रकृति का भर पूर आनंद लेते, गुनगुनाते, साइकिल के पैडल पर पाँव मारते सीधी सड़क पर घर की तरफ लौट रहा था। तभी दूर, बहुत दूर, सड़क की अंतिम छोर पर और एक साइकिल दीख पड़ी। शायद उसकी रफ्तार मेरी रफ्तार से कुछ कम थी। मैंने अपनी रफ्तार थोड़ी बढ़ाई और अपनी नजरें उस पर गड़ा दी। हाँ, मुझे इत्मीनान हो गया कि मेरी रफ्तार उससे ज्यादा है। लेकिन शायद कुछ ही ज्यादा। कुछ भी हो मैंने उससे आगे जाने का मन बना लिया। और बस मेरे और उसके बीच साइकिल दौड़ शुरू हो गई। धीरे-धीरे मैं उसके नजदीक आने लगा। जैसे-जैसे हम दोनों की दूरी कम होती जा रही थी, मेरा उत्साह बढ़ता जा रहा था। और आखिर वह क्षण भी आ गया जब मैं उसके नजदीक पहुँच गया, उसके बराबर। और ये लो, मैं उससे आगे बढ़ गया। लेकिन फिर मैंने अनुभव किया कि मैंने वह दौड़ जीत ली जिसमें शायद मैं अकेला ही प्रतिस्पर्धी था। उसे तो पता ही नहीं था कि कोई उसके साथ दौड़ लगा रहा है? बल्कि मेरे आगे जाने पर उसने मुस्कुरा कर मेरा अभिवादन किया।

 

इस दौड़ में मेरा पूरा ध्यान उस दूसरी साइकिल और उसके सवार पर था। प्रकृति, संगीत, बयार और तो और मेरा ध्यान मेरी मंजिल यानि मेरे घर पर से भी हट गया था। क्योंकि इस दौड़ में, मैं इतना मशगूल हो गया था कि मैं वर्षा से भीगी सड़क को पार कर सूखी सड़क पर आ चुका था, हरियाली को पार कर कंक्रीट के जंगल में था, यहाँ न कोई पेड़ था न कोई पक्षी और तो और मैं वह मोड़ भी पार कर चुका था जहाँ से मुझे मेरी मंजिल के लिये मुड़ना था। मुझे यह भी ध्यान आया कि इस अंजान दौड़ में ऐसे भी कई क्षण आए थे जब मैं डगमगा गया था। मेरा पैर फिसला था, मैं गिर सकता था, मैं किसी से कहीं भिड़ कर घायल हो सकता था। 

 

मैंने धीरे से साइकिल अपनी मंजिल की तरफ मोड़ ली। लौटते लौटते मैं सोच रहा था, यह मेरी आज की सुबह है या अपनी जिंदगी की सुबह? अपनी जिंदगी में मैं ऐसे ही निरर्थक दौड़ में लगा रहता हूँ। दौड़ अपनों से साथ, परिवार वालों के साथ। पड़ोसियों, रिशतेदारों, परिचितों और अपने शुभेच्छुओं के साथ भी हर समय एक प्रतिस्पर्द्धा में  लगा रहता हूँ, अपने को उनसे ज्यादा अच्छा साबित करने के लिए, अपने को उनसे ज्यादा सफल सिद्ध करने के लिए, अपने आप को उनसे ज्यादा महत्वपूर्ण दिखाने के लिये। उनसे की जाने वाली इस निरर्थक स्पर्द्धा में मैं क्या-क्या खो रहा हूँ इसकी तरफ ध्यान ही नहीं जाता। क्या मैं अपने जीवन के आनंद को बरकरार रखते हुए मंजिल पर ध्यान एकाग्र कर पाऊँगा?

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साधारण बनना ही खास बनना है                  लघु कहानी - जो सिखाती है जीना (🔉1.24)

कहते हैं कि रूस देश की महारानी कैथरीन द्वितीया ने एक दिन अपने नौकर को बुलाने के लिए घण्टी बजाई, वह न आया, दुबारा घण्टी बाजी। नौकर महाशय तभी भी नहीं आये। आखिर वे उठीं, अपने कमरे से निकल कर उस तरफ गईं जहाँ नौकर-चाकर रहा करते थे। वहाँ उन्होंने उसे ताश खेलते पाया। वह कोई अचूक चाल चलने के लिए गहरी सोच में डूबा हुआ था। महारानी के आने की  भनक वहाँ बैठे किसी भी व्यक्ति को नहीं मिली। ऐसे तल्लीन थे वे सब तास के खेल में। महारानी भी चुपके से उसके पीछे जाकर खड़ी हो गईं। ताश के पत्तों पर एक नज़र डाल, एक पत्ता निकाल कर चलते हुए बोलीं, “लो, तुम्हारी यह चाल  चल कर मैंने तुम्हें जीता दिया, अब तुम मेरा काम करो”।

(अग्निशिखा से)

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कारावास की कहानी-श्री अरविंद की जुबानी                                 धारावाहिक (🔉6.47)

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। इसके रोचक अंश हम जनवरी २०२१ से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसकी आठवीं किश्त है।)



(८)

मुकदमा शुरू हुआ

इस अवस्था को घनीभूत होने में कुछ दिन लगे। इसी बीच मैजिस्ट्रेट की अदालत में मुकदमा शुरू हुआ। नीरज कारावास की नीरवता से हठात बाह्य जगत के कोलाहल में लाये जाने पर शुरू-शुरू में मन बड़ा विचलित हुआ, साधना का धैर्य टूट गया और पाँच-पाँच घंटे तक मुकदमे के नीरस और विरक्तिकर बयान सुनने को मन किसी भी तरह राजी नहीं हुआ। पहले अदालत में बैठ कर साधना करने की चेष्टा करता, लेकिन अनभ्यस्त मन प्रत्येक शब्द और दृश्य की ओर खिंच जाता, शोरगुल में वह चेष्टा व्यर्थ चली जाती, बाद में भाव परिवर्तन हुआ, समीपवर्ती शब्द और दृश्य मन से बाहर ठेल सारी चिंतन शक्ति को अंतर्मुखी करने की शक्ति जनमी, किन्तु यह मुकदमे की प्रथम अवस्था में नहीं हुआ, तब ध्यान धारणा की प्रकृति क्षमता नहीं थी। इसलिए यह वृथा चेष्टा त्याग, बीच-बीच में सर्वभूतों में ईश्वर के दर्शन कर संतुष्ट रहता, बाकी समय विपत्ति के साथियों की बातों और उनके कार्य-कलापों पर ध्यान देता, दूसर कुछ सोचता, या कभी नॉर्टन साहब की श्रवण योग्य बात या गवाही को सुनता। देखता की निर्जन कारागृह में समय काटना जितना सहज और सुखकर हो उठा है, जनता के बीच और इस गुरुतर मुकदमे के जीवन-मरण के खेल के बीच समय काटना उतना सहज नहीं। अभियुक्त लड़कों का हँसी-मज़ाक और आमोद-प्रमोद सुनना और देखना बड़ा अच्छा लगता, नहीं तो अदालत का समय केवल विरक्तिकर महसूस होता। साढ़े चार बजे कैदियों की गाड़ी में बैठ सानंद जेल लौट आता।  

 

ठाठ-बाट क्रमश: कम होने लगा

पंद्रह-सोलह दिन की बंदी अवस्था के बाद स्वाधीन मनुष्य-जीवन का संसर्ग और एक दूसरे का मुख देख दूसरे कैदी आनंदित हुए। गाड़ी में चढ़ते ही उनकी हँसी और बातों का फव्वारा फूट पड़ता और जो दस मिनट उन्हें गाड़ी में मिलते थे उसमें पल-भर को भी वह स्त्रोत न थमता। पहले दिन हमें खूब सम्मान के साथ अदालत ले गए। हमारे साथ ही थी यूरोपियन सार्जेंटों की छोटी पलटन और उनके साथ थी गोलीभरी पिस्तौलें। गाड़ी में चढ़ते समय सशत्र पुलिस की एक टुकड़ी हमें घेरे रहती और गाड़ी के पीछे परेड करती, उतरते समय भी यही आयोजन था। इस साज-सज्जा को देख किसी-किसी अनभिज्ञ दर्शक ने निश्चय ही सोचा होगा कि ये हास्य-प्रिय अल्पवयस्क लड़के न जाने कितने दु:साहसी विख्यात महायोद्धाओं का दल है। न जाने उनके प्राणों और शरीर में कितना साहस और बल है जो खाली हाथ सौ पुलिस और गोरों की दुर्भेद्य प्राचीर भेद, पलायन करने में सक्षम हैं। इसलिए उन्हें इतने सम्मान के साथ इस तरह ले गये। कुछ दिन यह ठाठ चला, फिर क्रमश: कम होने लगा, अंत में दो-चार सार्जेंट हमें ले जाते और ले आते। उतरते समय वे ज्यादा खयाल नहीं करते थे कि हम जेल में घुसते हैं; हम मानों स्वाधीन भाव से घूम-फिर कर घर लौटे हों, उसी तरह जेल में घुसते। ऐसी असावधानी और शिथलता देख पुलिस कमिशनर साहब और कुछ सुपरिंटेंडेंट क्रुद्ध हो बोले, “पहले दिन पच्चीस-तीस सार्जेंटों की व्यवस्था थी, आजकल देखता हूँ चार-पाँच भी नहीं आते”। वे सार्जेंटों कि भर्त्सना कर और रक्षण-निरीक्षण की कठोर व्यवस्था करते; उसके बाद दो-एक दिन और दो सार्जेंट आते और फिर वही पहले जैसी शिथलता आरंभ हो जाती। सार्जेंटों ने देखा हम बम-भक्त बड़े निरीह और शांत लोग हैं, पलायन में उनका कोई प्रयास नहीं, किसी पर आक्रमण करने या हत्या करने की भी मंशा नहीं, उन्होंने सोचा कि हम क्यों अपना अमूल्य समय इस विरक्तिकर कार्य में नष्ट करें। पहले अदालत में घुसते और निकलते समय हमारी तलाशी लेते थे, उससे हम सार्जेंटों के कोमल कर-स्पर्श का सुख अनुभव करते थे, इसके अलावा इस तलाशी से किसी के लाभ या क्षति की संभावना नहीं थी। स्पष्ट था कि इस तलाशी की आवश्यकता में  हमारे रक्षकों की गंभीर अनास्था है। दो-चार दिन बाद यह भी बंद हो गयी। हम अदालत में किताब, रोटी-चीनी जो इच्छा होती निर्विघ्न ले जाते। पहले-पहल छिपा कर, बाद में खुले आम। हम बम या पिस्तौल चलाएँगे, उनका यह विश्वास शीघ्र ही उठ गया। किन्तु मैंने देखा कि एक भय सार्जेंटों  के मन से नहीं गया। कौन जाने किसके मन में कब मैजिस्ट्रेट साहब के महिमान्वित मस्तक पर जूते फेंकने की बदनीयत पैदा जो जाए, ऐसा हुआ तो सर्वनाश। अत: जूते भीतर ले जाना विशेषतया निषिद्ध था, और उस विषय में सार्जेंट हमेशा सतर्क रहते और किसी तरह की असावधानता के प्रति आग्रह नहीं देखा।

(क्रमश:, आगे अगले अंक में)

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अपने सुझाव (suggestions) दें, आपको सूतांजली कैसी लगी और क्यों? आप अँग्रेजी में भी लिख सकते हैं।

गुरुवार, 1 जुलाई 2021

सूतांजली , जुलाई २०२१

सूतांजली

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वर्ष : ०४ * अंक : १२                 🔊(२१.५६)                            जुलाई   * २०२१

गहरी बातें समझने के लिए, गहरा होना पड़ता है और

गहरा होने के लिए, गहरी चोटें खानी पड़ती हैं।

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ऋषि, ऋषिभाव, ऋषित्व

🔉(५.२०)

ऋषि, मुनि, संत, महात्मा, साधू जैसे कई शब्द हमारी भाषा में प्रचलित हैं और साधारणतया हम इनका  प्रयोग भी समानार्थक शब्दों के रूप में एक-दूसरे के बदले प्रयोग करते हैं। हिन्दी शब्दकोश में भी इन शब्दों का अर्थ प्राय: पर्यायवाची शब्दों के रूप में ही उल्लखित है, यथा:

ऋषि = शास्त्र प्रणेता,  वेद-मंत्रों का प्रकाशन, ज्ञान द्वारा संसार पार करने वाला।

मुनि = मौन व्रती, महात्मा, ऋषि, तपस्वी, त्यागी

संत = साधू, महात्मा, धर्मात्मा

महात्मा = वह जिसकी आत्मा का आशय बहुत ऊंचा हो, बहुत बड़ा साधू

साधू = उत्तम कुल में उत्पन्न, मुनि, सज्जन, धार्मिक

लेकिन अगर भाषा के शब्दकोश को छोड़ हम अपने ग्रन्थों, वेदों और पुराणों को खंगाले तो इन शब्दों का भावार्थ समझ आता है और इनके भावार्थों से साक्षात्कार होता है। इन्हीं शब्दों में एक शब्द ऋषि है, इसी से बना है ऋषित्व और ऋषिभाव।

 

ऋगवेद में एक कथा आती है। गोमती नदी के तटपर हिमवान पर्वत के प्रांत में एक राज्य था। उसका राजा रथवीति अत्यंत धर्मवान, गुणनिधि, नीतिमान था। उन्होंने एक यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ को सम्पन्न करने राजा ने अत्रिवंशज दाभर्य ऋषि को आमंत्रित किया। ऋषि अपने पुत्र के साथ राजा रथवीति का यज्ञ सम्पन्न करने पधारे। यज्ञ का अनुष्ठान प्रारम्भ हुआ। यज्ञानुष्ठान के दौरान ऋषि ने रथवीति की सुशील, सुंदर एवं गुणवती कन्या को देखा। उसे देख उन्होंने विचार किया कि यह कन्या उनकी पुत्रवधु होने लायक है। अत: यज्ञ समाप्ती के बाद ऋषि ने राजा से अपनी  इच्छा जाहीर की। ऋषि के इस प्रस्ताव पर राजा ने अपनी पत्नी के साथ इस पर विचार-विमर्श कर ऋषि के पास आये। रानी ने ऋषि से कहा, “हे ऋषिवर! अब तक हमारे वंश की कन्याएँ ऋषिभाव प्राप्त सत्पुरुषों को ही प्रदान की गई हैं। इसलिए यदि ऋषिपुत्र ऋषित्व – भाव को प्राप्त करले, तो उसका विवाह हम अपनी कन्या से करायेंगे।”

 

रानी के यह वचन सुनकर ऋषिपुत्र, श्यावाश्व ने ऋषिभाव प्राप्त करने का संकल्प किया। तत्पश्चात कथा आगे बढ़ती है। श्यावाश्व दृड़ संकल्प के साथ घोर तपस्या और सत्यनिष्ठ आचरण सम्पन्न करने में मन-वाणी और कर्म से प्रवृत्त हुए। ऋषिपुत्र की तपश्चर्या और साधना से यथासमय मरुद्गणों ने उन्हें ऋषिभाव प्राप्ति का आशीर्वाद प्रदान किया।

 

श्यावाश्व के ऋषिभाव प्राप्त होने के बाद, राजा रथवीति भी परिवार समेत आकर ऋषि श्यावश्व सम्बोधन के साथ ही उनका स्वागत किया और उन्हें गृहस्थाश्रम में प्रवेशहेतु अपनी सुशील, सुयोग्य कन्या प्रदान की।

 

हमें यहाँ यह विचार करना चाहिये की ऋषिभाव क्या है? और ऋषित्व क्या है? वेद अपौरुषेय हैं और ऋषि वे हैं, जो वैदिक मंत्रों का, ऋचाओं का, मंत्रवाक्यों का साक्षात दर्शन करते हैं। ऋषि वह है, जो त्रिकालदर्शी हैं। जो भूत, भविष्य और वर्तमान को एक ही समय में समग्र रूप से देखें। ऋत का अर्थ है, सार्वलौकिक, सार्वकालीक, त्रिकाल – अबाधित सत्य और उस सत्य को जानकर उस ज्ञानशक्ति से जगत-मिथ्यात्व-निश्चय को प्राप्त होनेवाला ही ऋषिभाव को प्राप्त हो जाता है।

 

यहाँ पर बोध के योग्य बात यह है कि ऋषिकुल में जन्म होना और ऋषि-भाव-परमभाव को  प्राप्त होना – ये दोनों बातें अलग-अलग हैं। ऋषिभाव की प्राप्त होने के लिए सत्यनिष्ठा, तपश्चर्या, दृड़संकल्प, ज्ञानसाधना की आवश्यकता है।

(गीतप्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित बोध कथा अंक से)   

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पैसों के मालिक नहीं, रखवाले

🔉(५.३५)

फिक्की लेडीज़ और्गेनाइज़ेशिन (FLO) के चेयरपर्सन के एक इंटरनेशनल समारोह में सुधा मूर्ति ने बतलाया था कि उन्हें जे आर डी टाटा से एक अनमोल सलाह तब मिली, जब उन्होंने अपने पति नारायण मूर्ति की स्टार्ट अप कंपनी इंफ़ोसिस में उनका सहयोग करने के लिए नौकरी छोड़ दी थी। टाटा ने कहा था, “यह याद रखना कि कोई भी पैसे का मालिक नहीं होता, हम केवल पैसों के रखवाले हैं और यह हमेशा एक हाथ से दूसरे हाथ में जाता रहता है। इसीलिए जब आप सफल हों तो इसे समाज को वापस लौटा दें, जिसने आपको बहुत सद्भावना दी है”।

 

आजादी के पहले अपने सपनों के भारत की कल्पना करते हुए महात्मा गाँधी ने ट्रस्टिशिप के सिद्धान्त को प्रतिपादित किया था। मूलत: यह सिद्धान्त उनके मन में १९०३ में आया था जब वे दक्षिण अफ्रीका में थे। इस सिद्धान्त पर उन्होंने पूरी गहराई से विचार किया था और इसके सब आयामों पर विचार कर विस्तार से इसे प्रतिपादित किया था। उनके इस सिद्धान्त की जड़ यही है कि पूंजी का असली मालिक पूंजीपति नहीं बल्कि समाज है। उनका मानना था कि पूंजीपतियों के पास जो पूंजी है उसका असली मालिक वह पूंजीपति खुद नहीं है बल्कि समाज है। पूंजीपति तो सिर्फ उसका रखवाला है, समाज की वह पूंजी उसके पास धरोहर के रूप में है। महात्मा गाँधी के इस ट्रस्टीशिप के सिद्धान्त के अनुसार जो व्यक्ति अपनी आवश्यकता से अधिक संपत्ति का संचय करता है, उसे केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु संपत्ति के उपयोग का अधिकार है। शेष संपत्ति का प्रबंध उसे एक ट्रस्टी की हैसियत से देखभाल कर समाज कल्याण पर खर्च करना चाहिए। महात्मा गाँधी यह स्वीकार करते थे कि सभी लोगों की क्षमता एक सी नहीं होती है। किसी की पैसे  कमाने की क्षमता अधिक होती है किसी की कम। अत: जिनके पास कमाने की क्षमता अधिक है, उन्हें कमाना तो चाहिए लेकिन अपनी जरूरतों को पूरा करने के बाद शेष राशि समाज के कल्याण पर खर्च करना चाहिए। गाँधीजी के अनुसार पूंजीपतियों को अपनी जरूरतें भी सीमित करनी चाहिए तभी वे बची हुई आमदनी को जरूरत मंदों पर खर्च कर सकेंगे।

 

दुर्भाग्यवश देश के बुद्धिजीवी, उद्योगपति और व्यवसायियों के बड़े वर्ग ने, गाँधी के इस सिद्धान्त पर काल्पनिक आदर्शवाद का बल्ला लगा इसे अव्यवहारिक बता इसकी खिल्ली उड़ाई। लेकिन महात्मा गाँधी इससे विचलित नहीं हुए और लगातार और बराबर देश के पूँजीपतियों और धनी व्यक्तियों से इसपर चर्चा करते रहे। अनेक उद्योगपतियों ने इस पर विचार किया और इसे अपनाया। ट्रस्टीशिप सिद्धान्त का पालन करने वाले अनेक उद्योगपतियों में परिवार सहित सादगीपूर्ण रहन-सहन अपनाने वाले जमनालाल बजाज को महात्मा गाँधी का सबसे प्रिय उद्योगपति शिष्य माना जाता है।

 

जे आर डी टाटा
टाटा ने भी गाँधी जी के इस सिद्धान्त पर गहराई से विचार किया और कहा कि इस सिद्धान्त का अक्षरश: पालन नहीं किया जा सकता। लेकिन इसे अपनाया जा सकता है। और देश तथा देश की  जनता के लिए उन्होंने इस सिद्धांत पर चलने का निश्चय किया। उन्होंने ऐसी व्यवस्था की जिसमें टाटा समूह की कंपनियों के शेयर टाटा संस के पास हैं। और टाटा संस के प्राय: ८५ प्रतिशत शेयर सार्वजनिक परोपकारी-धर्मार्थ-सामाजिक ट्रस्ट के पास हैं। इस प्रकार टाटा समूह की कमाई का बड़ा हिस्सा डिविडेंड के रूप में इनके पास आता है और फिर वे ट्रस्ट उसका उपयोग सामाजिक कार्यों के लिए करते हैं। जिनमें शिक्षा, अनुसंधान, कला, साहित्य, चिकित्सा, विज्ञान आदि के लिए किया जाता है। देश में बदलते नियम-कानून के चलते टाटा को अपनी इस व्यवस्था में भी फेर-बदल करने पड़े लेकिन प्रमुखत: उनके कार्यों का सिद्धान्त यही बना रहा। इसी प्रकार विप्रो और इंफ़ोसिस के संस्थापक श्री अजीम प्रेमजी एवं श्री नारायण मूर्ति भी अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा सामाजिक संस्थाओं के निर्माण, उत्थान, रख-रखाव के लिए अपनी सामाजिक ट्रस्ट द्वारा करते हैं।

 

ध्यान रखें आपके पास जो है वह आपका नहीं बल्कि समाज या ईश्वर का है। आप उसमें से सिर्फ अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति, इच्छाओं की नहीं, लायक पूंजी निकालने के अधिकारी हैं। बाकी पूंजी समाज या ईश्वर के कार्यों में लगाकर उन्हें समर्पित करना आपका कर्तव्य है।     

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सामाजिक कार्यकर्त्ता

🔉(४.४२)

(श्री प्रमोद शाह अखिल भारतीय मारवाड़ी युवा मंच के संस्थापक अध्यक्ष रह चुके हैं। अपने कार्यकाल के पश्चात उन्होंने अपने अनुभवों को एक रचनात्मक यात्रा नामक पुस्तक में सँजोया है। उसी पुस्तक के कुछ अंश)

प्रमोद शाह 


एक पल, शायद कुछ भी नहीं, शायद बहुत कुछ। साहिर लुधयानवी ने कहा :

                   उम्र भर रेंगने से कहीं बेहतर हैं,

                             एक लम्हा जो तेरी रूह में वुसअत (विस्तार) भर दे

 इसी एक पल पर किसी ने यह भी लिखा है:

                   तारीख की नजरों से वो दौर भी गुजरे हैं

                             लम्हों ने खता की थी सदियों ने सज़ा पायी।

एक सामाजिक कार्यकर्त्ता और उस पर भी अगर अधिकारी हैं, तब उसके हर पल का महत्त्व स्पष्ट रूप से रेखांकित है।

 

सार्वजनिक मंच पर कार्य करने से पहले अपने युग के काल-खंड को ठीक से समझ लेना आवश्यक है। अर्थात अपने आसपास के वातावरण तथा देश व समाज की  परिस्थितियों पर एक विहंगम दृष्टिपात करना परम आवश्यक होता है। बदलते दौर पर चिंतन-मनन कर यदि हम समाज के लिए कुछ करेंगे तो हमारे श्रम का फल बहुत अधिक मिलेगा। कूप-मंडूक रहकर समाज को गहराई नहीं दे पाएंगे। अत: एक वैज्ञानिक दृष्टि का विकास करना वक्त की माँग  है।

 

सामाजिक कार्य करनेवालों के लिए मशहूर शायर फिराक गोरखपुरी ने, दो टूक अंदाज़ में, तीन बहुत महत्वपूर्ण बातें कही हैं –

१। जो लोग इन्सानों के दु:ख दर्द को मिटाने के ठेकेदार बनते हैं, वे ही लोग इन्सानों के दु:ख की ओर सबसे कम ध्यान देते हैं।

२। यह विचित्र बात है कि जो लोग समाज के बारे में या सामाजिक समस्याओं के संबंध में सोचने और कार्यान्वित करने में व्यस्त रहते हैं, वे व्यक्तियों से प्रेम नहीं कर पाते।

३। संसार में जीवन व्यवस्था का भी एक स्थान है किन्तु उचित या अच्छी जीवन व्यवस्था  चाहना  एवं उसके लिए प्रयत्नशील होना कभी भी सज्जनता और प्रेम का स्थान नहीं ले सकते।

 

इन तीन बातों का निचोड़ यही है कि एक सामाजिक कार्यकर्ता में मानवता के प्रति सहानुभूति, सज्जनता तथा व्यक्तियों से प्रेम की भावना का होना आवश्यक है। इसी प्रकाश में हम देखें तो पाएंगे कि एक कार्यकर्ता या पदाधिकारी में सबको साथ लेकर चलने की भावना, दूसरे की भावना को समझना, सहनशीलता,  विशाल सहृदयता तथा विपरीत परिस्थितियों में विचलित न होना जैसे बुनियादी गुण आवश्यक हैं।

 

इन गुणों में सबसे बड़े बाधक हैं – अहंकार और अति महत्वाकांक्षा। अहंकार, जहां व्यक्ति को स्व-केन्द्रित कर देता है, वह अपने को धूरी मानकर सारे निर्णय लेता है, वहीं अति महत्वाकांक्षा, भले-बुरे का विवेक खो देता है। महत्वाकांक्षा को मनीषियों ने कुछ शर्तों के साथ फिर भी स्वीकृति दी है किन्तु अति-महत्वाकांक्षा तो प्रत्येक स्थिति में त्याज्य है। दोनों में मुख्य अंतर यही है कि हम जो कुछ हो सकते हैं वह करने के लिए परिश्रम करना, उन संभावनाओं का विकास करना, उसे लक्ष्य बनाना, उसे पाने के लिए उचित माध्यमों का प्रयोग करना महत्वाकांक्षा है। किन्तु हम जिस योग्य नहीं हैं, उसे जबरन हासिल करने की कुचेष्टा करना, महज अपनी इच्छापूर्ति के लिए, सही या गलत हर तरह के उपाय करना, चाहे वह सबके लिए अहितकर ही क्यों न हो, अति महत्वाकांक्षा है। यह अहितकर ही नहीं, घातक भी है। 

 

इन बातों पर यदि ठीक से अध्ययन, चिंतन और मनन न किया जाए तो पूरी मेहनत बेकार हो जाती है। इनके अभाव में भवन खड़ा करना, बिना नींव के मकान खड़ा करने समान है।

 

फिराक के अंदाज़में बात समाप्त करते हैं:

                   दिल का एक काम जो बरसों से उठा रक्खा है,

                                      तुम ज़रा हाथ लगा दो तो हुआ रक्खा है।

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और हाँ, ऐसे बच्चे भी होते हैं!                        लघु कहानी - जो सिखाती है जीना

                              🔉(१.३२)

वार्षिक त्यौहार पर मेरे बड़े भाई ने तोहफे में मुझे एक नई गाड़ी दी। मैं खुशी से झूम उठा और हाथों हाथ गाड़ी लेकर शहर घूमने निकल पड़ा। परिवार के सदस्यों के लिए भी मैंने अनेक तोहफे खरीदे। मैं जब उन्हे लेकर अपनी नई गाड़ी की तरफ बढ़ा तो देखा एक छोटा सा बच्चा बड़ी हसरत भरी नजरों से मेरी चमचमाती गाड़ी को देख रहा था। मुझे गाड़ी के पास खड़ा देख कर बच्चे ने पूछा, “जी, क्या यह गाड़ी आपकी है”? मैंने बताया कि ‘हाँ मेरी ही है और इसे मेरे बड़े भाई ने मुझे दी है, क्यों? – मैंने प्रश्न किया। मेरी बात सुनकर वह बच्चा विचारों में खो गया। मैंने सोचा शायद वह सोच रहा होगा, “मेरा भी एक ऐसा ही बड़ा भाई होता”! लेकिन उसने जो कहा मैं चौंक गया और अब मेरे विचारों में खो जाने की बारी थी। उसने कहा,काश! मैं भी अपने छोटे भाई को ऐसा ही कोई उपहार दे पाता”

सोच, देने की रखें, लेने की नहीं ।

(अग्निशिखा में छपी एक कहानी पर आधारित। हम अपने बच्चों को ऐसे संस्कार दे सकते हैं – जहां वे महत्व लेने का नहीं देने का समझें!)

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कारावास की कहानी-श्री अरविंद की जुबानी                                 धारावाहिक

🔉(४.४०)

(७)

भगवान मंगलमय हैं



मेरे निर्जन कारावास के समय डाक्टर डैली और सहकारी सुपरिंटेंडेंट साहब प्राय: रोज मेरे कमरे में आ दो-चार बातें कर जाते। पता नहीं क्यों, मैं शुरू से ही उनका विशेष अनुग्रह और सहानुभूति पा सका था। मैं उनके साथ कोई विशेष बात न करता, वे जो पूछते उसका उत्तर-भर दे देता। वे जो विषय उठाते वह या तो चुपचाप सुनता या केवल दो-एक सामान्य बात कह चुप हो जाता। तथापि वे मेरे पास आना न छोड़ते। एक दिन डैली साहब ने मुझ से कहा मैंने सहकारी सुपरिन्टेंडेंट को कह कर बड़े साहब को मना लिया है कि  तुम प्रतिदिन सवेरे-शाम डिक्री के समाने टहल सकोगे। तुम सारा दिन एक छोटी सी कोठारी में बंद रहो यह मुझे अच्छा नहीं लगता, इससे मन खराब होता है और शरीर भी। उस दिन से मैं सवेरे-शाम डिक्री के आगे खुली जगह में घूमने लगा। शाम को दस, पंद्रह, बीस मिनट घूमता, लेकिन सवेरे एक घंटा, किसी-किसी दिन दो घंटे तक बाहर रहता, समय की कोई पाबंदी नहीं थी। यह समय बहुत अच्छा लगता। एक तरफ जेल का कारख़ाना, दूसरी तरफ गोहालघर – मेरे स्वाधीन राज्य की दो सीमायें। कारखाने से गोहालघर, गोहालघर से कारखाने तक घूमते-घूमते या तो उपनिषद के गंभीर, भावोद्दीपक, अक्षय शक्तिदायक मंत्रों की आवृत्ति  करता या फिर कैदियों के कार्यकलाप और यातायात देख सर्वघट में नारायण हैं इस मूल सत्य को उपलब्ध करने की चेष्टा करता। वृक्ष, गृह, प्राचीर, मनुष्य, पशु, पक्षी, धातु और मिट्टी में, सर्वभूतों में सर्वं खल्विदं ब्रह्म मंत्र का मन-ही-मन उच्चारण कर इस उपलब्धि को आरोपित करता। यह करते-करते ऐसा भाव हो जाता कि कारागार और कारागार न लगता। वह उच्च प्राचीर, वह लौह कपाट, वह सफ़ेद दीवार, वह सूर्य-रश्मि-दीप्त, नील-पत्र शोभित वृक्ष, वह छोटा-मोटा सामान मानों अब अचेतन नहीं रहा, सर्वव्यापी, चैतन्यपूर्ण हो सजीव हो उठा, ऐसा लगता कि वे मुझसे स्नेह करते हैं, मुझे आलिंगन में भर लेना चाहते हैं। मनुष्य, गौ, चींटी और विहंग चल रहे है, उड़ रहे हैं, गा रे हैं। बातें कर रहे हैं, पर है यह सब प्रकृति की  क्रीडा; भीतर एक महान निर्मल, निर्लिप्त आत्मा शांतिमय आनंद में निमग्न हो विराजमान है। कभी-कभी ऐसा अनुभव होता मानों भगवान उस वृक्ष के नीचे खड़े आनंद की वंशी बजा रहे हैं, और उस 

जेल की कोठारी के बाहर का बरामदा 
माधुर्य से मेरा हृदय मोह ले रहे हैं। सदा यह एहसास होने लगा कि कोई मुझे आलिंगन में भर रहा है, कोई मुझे गोद में लिए हुए है। इस भावस्फुटन से मेरे सारे मन-प्राण को अधिकृत कर एक निर्मल महती शांति विराजने लगी, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। प्राणों का कठिन आवरण खुल गया और सभी जीवों पर प्रेम का स्त्रोत उमड़ पड़ा। प्रेम के साथ दया, करुणा, अहिंसा इत्यादि सात्विक भाव मेरे रज:प्रधान स्वभाव को अभिभूत कर और पनपने लगे। और जैसे-जैसे वे बढ़ने लगे वैसे-वैसे आनंद भी बढ़ा एवं निर्मल शांतिभाव गंभीर हुआ। मुक़द्दमे की दुष्चिन्ता पहले ही दूर हो गयी थी, अब उससे उल्टा विचार मन में आया। भगवान मंगलमय हैं, मेरे मंगल के लिए ही मुझे कारागृह में लाये हैं, कारा मुक्त और अभियोग-खंडन अवश्य होगा यह दृड़ विश्वास जम गया। इसके बाद बहुत दिनों तक मुझे जेल में कोई भी कष्ट भोगना नहीं पड़ा।

(क्रमश:, आगे अगले अंक में)

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