शनिवार, 1 जनवरी 2022

सूतांजली जनवरी 2022

 सूतांजली

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वर्ष : ०५ * अंक : ०६                      🔊(२३.१४)                                          जनवरी    * २०२२

परिवर्तन के कारण नये युग का आना,

पुराने युग की अवहेलना नहीं है,

पुराने युग का विस्तार है नया युग। 

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नया सवेरा                                                                  मैंने पढ़ा



द्वाभा ने समुद्र के पीछे से झाँक कर प्रातः को निहारा, आलसी बादलों को देखा, नीचे खिले पुष्पों पर टकटकी बांधी, हरीतिमा की मन-ही-मन प्रशंसा की और अंत में पवन को धन्यवाद दिया जो सब  को बाहों में लिये झूला झुला रहा था। सब मस्ती में सो रहे थे, बाँस के पेड़ तो खर्राटे तक भर रहे थे। सब को गहरी नींद में देख वह मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुई और चुपके से बिना पदचाप किये समुद्र के पीछे से होती हुई आकाश तक आ गयी। यहाँ  विराजमान होने के पहले उसने अपनी वही शैतानी दोहरायी। साथ लाये हुए गुलाल को पहले निकटवर्ती बादलों पर छिड़का और फिर जिधर दृष्टि घूमी वहीं गुलाल की वर्षा कर दी।

          पवन ने देखा कि द्वाभा ने अपना कार्य कर लिया तो उसने अपनी गति जरा मंद करके ऊपर ताका। चारों तरफ गुलाल-ही-गुलाल बिखरा हुआ। यह देख पवन का भी सीना जरा तन गया और उसने सोचा: अगर मैं प्रकृति को झूला झुला कर न सुला देता तो भला द्वाभा अपनी शैतानी किस तरह कर पाती ?"

          इधर सूर्य भी गुलाल की छटा को देख मुस्कुरा उठा। उसकी एक मुस्कान ने बहुत से गुलाल को इस तरह समेट लिया जैसे धूप के आते ही ओस की बूंदें उसमें सिमट जाती हैं। आलसी बादलों ने धीरे से आँखें खोलीं। अपने ऊपर गुलाल देख उन्होंने द्वाभा को फिर से मन-ही-मन कोसा और एक भीगे हुए विहंग की भांति अपने पंखों को झाड़ते हुए गुलाल निकालने का प्रयत्न करने लगे। लेकिन वह साधारण गुलाल तो था नहीं जो यूँ साफ हो जाता। हारकर, अपने पंखों को समेट वे सूर्य के अधरों की ओर ताकने लगे जो एक ही मुस्कान में सारे गुलाल को समेट लेते हैं।

          धरती ने भी आँखें खोलीं और अपनी क्रोड में सोये फूल-पत्तों को जगाया। अपने ऊपर बिखरी लालिमा देख संपूर्ण धरती हर्ष से पुलकित हो उठी, उसके लिये तो यह श्रीमाँ का स्पर्श और आशीर्वाद था। चिड़िया अपने-अपने घोंसलों से निकल कर उस दिव्य शक्ति का स्वागत गान करती इधर से उधर नाचने लगीं। नीरव पुष्प अभीप्सा की अंजलि लिये ऊपर की ओर टकटकी लगाये उस महान् शक्ति का आवाहन करने में लग गये। नेत्रों को सुख देनेवाली हरीतिमा मानों पर खोलते हुए पक्षी की तरह पत्ते खोलकर उड़ने के लिये उद्यत हो रही थी।

प्रत्येक प्राणी में से, प्रत्येक वस्तु के अंदर से एक अभीप्सा उठ रही थी। ऐसा लगता था कि संपूर्ण पृथ्वी से एक सामूहिक, शांत, नीरव प्रार्थना का मधुर गुंजन उठ रहा हो। समस्त वातावरण होमाग्नि की जिह्वाओं की भांति ऊपर की ओर उठ रहा था। यह सारा दृश्य देख मेरा मन अधीर हो उठा।....

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... अंदर प्रवेश करते ही माँ भगवती के साक्षात् दर्शन हुए। बादल का ही एक ऊँचा उठा हिस्सा उनका सिंहासन था। उनके आस-पास कोई भौतिक वस्तु न थी। उनके पास पहुँचते ही मैंने संपूर्ण श्रद्धा भाव से अपने आपको श्रीमाँ के चरणों में सौंप दिया। मुझे आशीर्वाद देते हुए उन्होंने मुझे अपने बिलकुल पास बैठा लिया। कुछ पलों तक वे मुझे केवल देखती रहीं, फिर अचानक बोलीं: "तुमने भी निर्वाण ले लेने की ठानी है?"

          माँ ने जब देखा कि मैं उनके प्रश्न को ठीक तरह से समझ नहीं पायी तो वे फिर बोलीं: "जानती हो निर्वाण किसे कहते हैं? यह वह अवस्था है जिसमें मनुष्य धरती की सब वस्तुओं को छोड़-छाड़ कर अपनी इच्छाओं पर विजय पाकर धरती के कोलाहल से दूर हो जाता है। वह स्वयं तो ऊपर आ जाता है लेकिन अपने पीछे वालों को उसी अंधेरे कुएँ में पड़ा रहने देता है।"

          "हाँ, मैं भी .... वगैरह किसी का ख्याल किये बिना अकेली ही आ गयी थी। उन्हें तो उस समय मैं ऐसे भूल गयी मानों कभी जाना ही न हो। हाँ, मेरा कर्तव्य यही होगा कि पुनः धरती पर जाकर अपनी सभी सखियों को बदल कर उनके साथ आऊँ। लेकिन क्या सब यहाँ आने को सहमत होंगी?" मैंने मन में सोचा।

          "नहीं, पहले उनके अंदर तुम्हें वह अभीप्सा जगानी होगी जिसके आगे संसार के सब सुख नगण्य लगने लगें। तब तुम रहस्य को पाने के लिये तैयार हो जाओगी और तुम्हें यहाँ आने की जरूरत न होगी। तुम्हारी सच्ची पुकार सुनकर मुझे ही धरती पर दौड़ते हुए आना पड़ेगा। जाओ, मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ हैं, मेरी सच्ची सेविका बनकर कार्य करना। मैं तुम्हारे भीतर इतनी शक्ति दे रही हूँ कि बिना धागे के आकाश में आजादी से विचर कर मेरा संदेश सुना सको। अब तुम किसी बंधन में न रहोगी।...

                              “मैं हूँ पतंगे कागजी, डोर है उसके हाथ में,

                                        चाहा इधर घटा दिया, चाहा उधर बढ़ा दिया।”

(वंदनाजी, श्रीअरविंद की साधिका हैं और वर्तमान में श्रीअरविंद सोसाइटी से निकलने वाली पत्रिका अग्निशिखा की संपादिका हैं। यहाँ उनके लेख का प्रारम्भिक और अंतिम अंश दिया गया है। स्व का चिंतन हमें अकेले को स्वर्ग में ले जाता है लेकिन जब हम सर्व का चिंतन करते हैं तब स्वर्ग ही धरा पर अवतरित हो जाती है। श्रीअरविंद ने कहा था कि अगर कहीं स्वर्ग है तो मै उसे धरा पर ही लाऊँगा, मुझे स्वर्ग यहीं चाहिए – सं.।)

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निर्भीक



निर्विवाद रूप से अगर हम भरत के निर्भीक व्यक्तियों की सूची बनाएँ तो जनरल बिपिन रावत, चीफ़ ऑफ डीफ़्फेंस स्टाफ, का नाम अग्रणी नामों में होगा। यह नाम उनके कुछ कार्यों या कुछ वक्तव्यों के कारण नहीं बल्कि जिस तरह उन्होंने एक निर्भीक व्यक्तितत्व का जीवन जिया उसके लिए होगा। राहुल सिंह और शिव अरूर की पुस्तक इंडियाज मोस्ट फियरलेस्स  पुस्तक में उनके द्वारा लिखी हुई प्रस्तावना अभी कुछ दिन पहले 

व्हाट्सएप्प में मुझे प्राप्त हुई। मैं उसे यहाँ छापने  से अपने आप को नहीं रोक पा रहा हूँ। जनरल ने निर्भीकता का अर्थ समझाने के लिए महात्मा गाँधी की उक्ति उद्धृत की है,

निर्भीकता आध्यात्मिकता की पहली शर्त है। डरपोकों की कोई नैतिकता नहीं होती।

प्रश्न है क्या हम जनरल रावत से ज्यादा बहादुर, निर्भीक और समझदार हैं?

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बापू की कमी खलती है

 (गाँधी को याद करने वालों की कमी नहीं... और समय के साथ उनको याद करने वालों की संख्या में भी लगातार वृद्धि हो रही है। लेकिन जैसा और जिस प्रकार मयंक सक्सेना याद करते हैं वैसा कितने लोग याद करते है...? अगर आप गाँधी को याद करने वालों में नहीं हैं तो पहले खुद अपनी निगाहों से उसको जानिये।)

मैं खाँटी वामपंथी हूँ बापू, लेकिन न मालूम क्यों सालों से हर रोज तुम्हें महसूस करता हूँ... कम्यूनिस्ट हो जाने के बाद और शिद्दत से... और हिन्द स्वराज के कुछ हिस्सों में उतर जाने के बाद  मिशनरी तरीके मैं तुम्हारे बारे में जिद करता हूँ... मैं सोचता हूँ कि तुम होते तो आज एफडीआई को लेकर क्या कहते... मैं पूछता हूँ कि क्या तुम दुबारा गुजरात में ही पैदा होना चाहते... क्या तुम नरोडा में  जाकर उपवास करने लगते... 

          लेकिन बापू वे तुमको बताते हैं मजबूरी का नाम, क्या मजबूरी थी तुम्हारी बापू, मोहनदास होने के बावजूद तुम जाकर बैठ गए थे जलते हुए नोआखाली में... तब जब पूरा मुल्क तुम्हारा दिल्ली में इंतजार करता था। बापू जब तुम्हारी वह पार्टी, जिसे तुमने भंग कर देने की सिफ़ारिश की थी, दिल्ली में आजादी का जश्न मना रही थी... तुम उपवास कर रहे थे कि नोआखाली में दंगे रुक जाएँ, लोग अपना ही खून बहाना बंद करें... कभी तुम्हारे जिस रास्ते में फूल फेंके जाते थे, वहाँ काँच की बोतलें फेंकी जा रही थीं और तुम बता रहे थे कि दरअसल महात्मा होना क्या होता है... तुम चाहते तो जा सकते थे दिल्ली, लेकिन आखिर क्यों किस मजबूरी के तहत तुम वहाँ जान जोखिम में डाल कर बैठे रहे, तुम दिल्ली नहीं लौटे... लौटे तो शांति स्थापित करवाकर... इंसान से दरिंदा बने वे लोग फिर से इंसान बन गए थे, क्या इसी को करिश्मा कहते हैं... हम वामपंथी ईश्वर को नहीं मानते, लेकिन इस करिश्मा को करिश्मा जरूर मानते हैं... बापू शायद तुम्हारे राम कोई और थे, वे कहानियों वाले राम तो नहीं थे।

          कहानी वाले राम से बापू बड़ा डर लगता है... लेकिन बापू तुमने जो चंपारण में किया... नोआखाली में किया... हम वामपंथी न सिंगूर में, नंदीग्राम में कर पाये... और न ही कर पाये गुजरात में, ये तो हमारा ही काम था दरअसल... और मालूम है, जिन्होंने तुमको मारा था, उन्होंने ही इस बार भी तुमको मारा, फिर से कत्ल कर दिया... फर्क बस ये था कि इस बार वे  हे राम के नारे लगा रहे थे... लेकिन हम सोचते हैं कि अगर तुम होते तो क्या करते बापू... क्या नरसंहार के दोषियों के  हाथों अपने आश्रम का जीर्णोद्धार करवाते... क्या तुम अभी भी काँग्रेस को राजनीति में बने रहने देते... बापू क्या कहते तुम जो गुवाहाटी में हुआ उस पर... क्या  तुम चाहते कि लोग टोपियों पर तुम्हारा नाम लिख कर उछालते रहते... बापू हमारा काम तुमने किया... हम अपना काम करना अभी तक सीख नहीं पाये हैं... ।

          बापू तुम्हारी बहुत याद आती है, जब इंसान को मजहब में बंटा देखता हूँ... मैं तुम्हारे राम को नहीं मानता, लेकिन यह जरूर मानता हूँ कि उसके नाम पर कत्ल भी नहीं होने चाहिये... मैं भी चाहता  हूँ कि तुम होते तो शायद आज भी गरीबों के... किसानों के साथ खड़े होते... भले ही अपने लोगों के खिलाफ खड़ा होना पड़ता... तुम्हारा पहला आंदोलन भी किसानों के लिए ही था न, वो चंपारण वाला... तुम कहते थे न कि मशीनों को इंसानों का रोजगार छीनने की छूट नहीं होनी चाहिये, बापू अगर तुम बदल सकते हो तो आ जाओ... और नहीं बदल सकते ... तो मेरे जेहन में भी आना छोड़ दो...  

          बापू तुम्हारी पार्टी और साथी एफडीआई के साथ होते, तो क्या तुम भी उनके साथ खड़े हो जाते... क्या तुम किसानों की जमीन छीनकर विकास करने के सपने से सहमत हो जाते... जल, जंग और जमीन की लड़ाई के सत्याग्रह पर किसी भी वामपंथी से पहला हक क्या तुम्हारा नहीं होता बापू... बापू तुम्हारी कमी बेहद खलती है, खासकर तब, जब गाँधी के नाम से लेकर लेनिन और मार्क्स तक का नाम लेने वाले ये सब भूल गये हैं कि उनको दरअसल करना क्या है... बापू पूरे देश के गाँव चंपारण हो गये हैं और न जाने कितने इलाके नोआखाली बन चुके हैं... बापू क्या तुम देखना चाहते थे ऐसा आजाद भारत, जो आगे बढ़ते-बढ़ते फिर से मध्य युग में पहुँच जाये...

          तुम हिन्द स्वराज को लेकर नेहरू और पटेल सबसे बहस करते थे न बापू, लेकिन अब उस किताब पर कोई बहस नहीं होती... वो लाइब्रेरी के उदास कोनों में धूल खाती है... स्वराज एक उपेक्षित शब्द है... ठीक महात्मा की तरह... और हाँ अब तुम मजबूर भी नहीं रहे... तुम्हें शायद पता नहीं हो, लेकिन हाल ही में क्षेत्र और धर्म की राजनीति करने वाले एक शख्स को इस देश का नया महापुरुष घोषित किया गया... बताया भी गया कि उनके देहांत पर बापू के देहांत से ज्यादा लोग जुटे... बापू हिंसा, अलगाव और सरकारी दमन इस देश का नया धर्म है... परम धर्म... अहिंसा, एक टूटा हुआ सपना है... जिसे हमारी सरकार ने साबरमती आश्रम और डाक टिकटों में हिफाजत से सहेज दिया है...

          आज भी साम्यवादी के तौर पर १०० में से ९० बार मेरी तुमसे मुठभेड़ होती है, और चाहता हूँ कि झूठ बोल दूँ पर ८० बार तुम जीतते हो बापू... ८० बार... तुम्हारी ही बात को मैं अपने शब्दों में कहता हूँ हर जगह कहता हूँ कि १०० में से ९९ रास्ते अहिंसा के हैं एक आखिरी रास्ता हिंसा का है... लेकिन वो आखिरी है... और दुनिया के ९९ मसले पहले ९९ रास्तों से हल हो सकते हैं...

          बापू मैं तुम्हें अक्सर देख भी पाता हूँ... कभी दशरथ मांझी में कभी इरोम शर्मिला में... और अभी हाल ही में मैंने हरदा और खंडवा में १०० से ज्यादा गाँधी देखे थे... बापू तुमने सच कहा था... और मालूम है मैं ही यह नहीं मानता, भगत सिंह भी मानते थे... लेनिन भी... और बाकी सब भी...                             ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

असली पूंजी                                       लघु कहानी (संस्मरण) - जो सिखाती है जीना

गाँधीजी देश भर में भ्रमण कर चरखा संघ के लिए धन इकट्ठा कर रहे थे। अपने दौरों के दौरान वे उड़ीसा में  एक सभा को संबोधित करने पहुँचे। उनके भाषण के बाद एक बूढ़ी गरीब महिला खड़ी हुई, उसके बाल सफ़ेद हो चुके थे, कपड़े फटे थे और वह कमर से झुक कर चल रही थी, किसी तरह वह भीड़ से होते हुए गाँधीजी के पास पहुँची।

मुझे गाँधी को देखना है’, उसने आग्रह किया और उन तक पहुँच कर उनके पैर छूए।

फिर उसने अपनी साड़ी के पल्लू में बंधा एक ताँबे का सिक्का निकाला और गाँधीजी के चरणों में रख दिया। गाँधीजी ने सावधानी से सिक्का उठाया और अपने पास रख लिया। उस समय चरखा संघ का कोश जमनालाल बजाज संभाल रहे थे। उन्होंने गाँधीजी से वह सिक्का माँगा, लेकिन गाँधीजी ने उसे देने से मना कर दिया।

मैं चरखा संघ के लिए हजारों रुपए के चेक / नगद संभालता हूँ,’ जमनालालजी ने हँसते हुए कहा, फिर भी आप मुझ पर इस सिक्के को ले के यकीन नहीं कर रहे हैं?’

यह ताँबे का सिक्का उन हजारों से कहीं अधिक कीमती है गाँधीजी बोले, यदि किसी के पास लाखों है और वह हजार-दो हजार दे देता है तो उसे कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन ये सिक्का शायद उस औरत की कुल जमा-पूंजी थी। उसने अपना सारा संसार दान दे दिया। कितनी उदारता दिखाई उसने। कितना बड़ा बलिदान दिया उसने!!! इसलिए इस ताँबे के सिक्के का मूल्य मेरे लिए एक करोड़ से भी अधिक है

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कारावास की कहानी-श्री अरविंद की जुबानी                                        धारावाहिक

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। इसके रोचक अंश हम जनवरी २०२१ से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसकी तेरहवीं किश्त है।)

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गवाहों की श्रेणियाँ

जो गवाही देने आये थे उन्हें तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है। पुलिस और गोयन्दा, पुलिस के प्रेम में आबद्ध निम्न श्रेणी के लोग और सज्जन, और तीसरे अपने दोषवश पुलिस-प्रेम से वञ्चित, अनिच्छा से आये हुए गवाह । हर श्रेणी का गवाही देने का ढंग था अलग-अलग। पुलिस महोदय प्रफुल्ल भाव से, अम्लान वदन अपने पूर्व ज्ञात वक्तव्यों को मनमाने ढंग से बोल जाते, जिसे पहचानना होता पहचान लेते-कोई सन्देह नहीं, दुविधा नहीं, भूल-चूक नहीं। पुलिस के संगी-साथी अतिशय आग्रह के साथ गवाही देते, जिसे पहचानना होता उसे भी पहचान लेते और जिसे नहीं पहचानना होता उसे भी बहुत बार अतिशय उत्सुकतावश पहचान लेते। अनिच्छा से आये गवाह जो कुछ जानते होते वही कहते, लेकिन वह बहुत थोड़ा होता; नॉर्टन साहब उससे असन्तुष्ट हो और यह सोच कर कि साक्षी के पेट में अपार मूल्यवान् और सन्देहनाशक प्रमाण हैं, जिरह के बल पर उसका पेट चीर उन्हें बाहर निकालने की भरपूर चेष्टा करते । इससे साक्षी महाविपद् में पड़ जाते। एक ओर नॉर्टन साहब की गर्जना और बर्ली साहब की लाल-लाल आँखें, दूसरी ओर झूठी गवाही दे देशवासियों को कालेपानी भेजने का महापाप। गवाहों के सामने एक गुरुतर प्रश्न उठ खड़ा होता, नॉर्टन और बर्ली को खुश करें या भगवान् को। एक तरफ़ क्षणस्थायी विपत्ति- मनुष्यों का कोप, दूसरी ओर पाप का दण्ड-नरक और परजन्म में दुःख। लेकिन वे सोचते, नरक और परजन्म तो दूर की बातें हैं, मनुष्यकृत विपद् तो उन्हें अगले क्षण ही ग्रस सकती है। बहुतों के मन में यह डर था कि मिथ्या साक्ष्य देने के लिए राजी न होने पर भी मिथ्या साक्ष्य के अपराध में पकड़े जायेंगे, क्योंकि ऐसे स्थलों पर परिणाम के दृष्टान्त विरल नहीं। अतएव इस श्रेणी के साक्षियों को जो समय साक्षी के कठघरे में अतिवाहित करना पड़ता वह उनके लिए विलक्षण भीति और यन्त्रणा का समय होता। जिरह शेष होने पर उनके अर्द्ध-निर्गत प्राण फिर से देह में लौट उन्हें यन्त्रणामुक्त करते। कुछ एक साहस के साथ गवाही देते, नॉर्टन की गर्जना की परवाह न करते, अंगरेज परामर्शदाता भी यह देख जातीय प्रथा का अनुसरण कर नरम पड़ जाते। इस तरह कितने ही साक्षी आये, कितनी तरह की गवाहियाँ दे गये, किन्तु एक ने भी पुलिस के लिए उल्लेखनीय कोई सुविधा नहीं की। एक ने साफ़ कहा- मैं कुछ नहीं जानता, समझ नहीं आता क्यों पुलिस मुझे ज़बरदस्ती खींच लायी है! इस तरह का मुक़द्दमा चलाना शायद भारत में ही सम्भव है, दूसरे देशों में जज इससे झुंझला उठते और पुलिस का गंजन कर अच्छा सबक सिखाते। बिना अनुसन्धान किये दोषी निर्दोष का विचार न कर कठघरे में खड़ा करना, अन्दाज़ से सौ-सौ साक्षी खड़े कर देश का पैसा बहाना और आसामियों को निरर्थक लम्बे समय तक कारा- यन्त्रणा में रखना इस देश की पुलिस को ही शोभा देता है। लेकिन बेचारी पुलिस क्या करे? वह तो नाम की गोयन्दा थी, उसमें जब वह क्षमता ही नहीं थी तो ऐसे साक्षियों के लिए एक विशाल जाल फेंक कर अन्दाज़ से उत्तम, मध्यम और अधम साक्षी फँसा कठघरे में खड़ा करना ही था एकमात्र उपाय। क्या मालूम शायद वे कुछ जानते हों, कुछ प्रमाण दे भी दें ?                                                   (क्रमशः आगे अगले अंक में)

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अपने सुझाव (suggestions) दें, आपको सूतांजली कैसी लगी और क्यों? आप अँग्रेजी में भी लिख सकते हैं।

यू ट्यूब लिंक --> 

https://youtu.be/27HCnS2tErw



 

बुधवार, 1 दिसंबर 2021

सूतांजली दिसंबर 2021

 सूतांजली

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वर्ष : ०५ * अंक : ०५                      🔊 (24.30)                                         दिसम्बर   * २०२१

बिना समर्पण के पूर्णता प्राप्त नहीं होती,

बिना लगन के उपलब्धि नहीं होती

बिना त्याग के रचना नहीं होती

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यह या वह                                                              मेरे विचार

मानव दो दुविधाओं के मध्य पिसता रहता है। यह या वह, ये या वो, इधर या उधर? हाँ या ना? ऐसे प्रश्न उसके जीवन में प्रत्येक दिन आते हैं जिनका उसे उत्तर देना होता है, उसे दो में से एक का चुनाव करना होता है, दो में से एक निर्णय लेना पड़ता है। गुरु की आवश्यकता होती है केवल सही निर्णय लेने के लिए नहीं बल्कि सही निर्णय लेने की प्रक्रिया को समझने के लिए ।  बिना किसी भेद-भाव के, बिना व्यक्तिगत लाभ के, गुरु व्यक्ति को निर्णय लेने में सहायक ही नहीं होता बल्कि उसका परिचय सही निर्णय लेने की प्रक्रिया  से भी करवाता है। एक बार प्रक्रिया समझ आ गई तो प्रश्न शनै:-शनै: कम होने लगते हैं, स्वयं निर्णय लेने की क्षमता का भी विकास हो जाता है।

          गीता के पन्ने पलटें, अर्जुन भी इसी मोह से ग्रस्त है। हर समय वह दो-राहे पर खड़ा है और यह निर्णय नहीं ले पा रहा है कि उसके लिए उत्तम मार्ग कौन-सा है। अपनी तार्किक बुद्धि से उसे गलत मार्ग ही सही लगता है। श्रीकृष्ण एक गुरु की भाँति उसे प्रक्रिया समझा कर उसे सही मार्ग दिखा रहे हैं। गीता का प्रारम्भ ही यहीं से है – युद्ध करूँ या उससे विमुख हो सन्यास लूँ? तीसरे अध्याय में अर्जुन का प्रश्न है कि अगर कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ है तब कर्म में क्यों लगूँ? पाँचवें अध्याय में अर्जुन को शंका है कि जब श्रीकृष्ण एक तरफ कर्मों के सन्यास की बात करते हैं तो फिर कर्मयोग की प्रशंसा क्यों कर रहे हैं? दोनों में कौन-सा उसके लिए कल्याणकारी है? बारहवें अध्याय तक पहुँचते-पहुँचते अर्जुन के अनेक प्रश्नों के उत्तर दे दिये गये हैं, अर्जुन प्रक्रिया समझने लगा है। अब उसे दो में कौन-सा श्रेष्ठ है इसकी जिज्ञासा पैदा हो गई है। अतः अब उसकी जिज्ञासा है कि सगुण और निर्गुण रूप भजने वाले उपासकों में योग वेत्ता कौन है? और फिर अंतिम अध्याय में अर्जुन जिज्ञासा करता है कि संन्यास और त्याग में क्या फर्क है?

          हम अपने जीवन में पग-पग पर ऐसे ही दो-राहे पर खड़े होते हैं। हमें एक मार्ग का चयन करना पड़ता है। जब हमने अपनी प्रवृत्ति के अनुसार सही या गलत मार्ग का चयन किया तब हमारा ही वह निर्णय हमें जीवन में सुख या  दुःख, शांति या अशांति के मार्ग पर आगे ले चलता है।  


 

         कौन-सा मार्ग चुनें, तपस्या का या समर्पण का? बहुधा यह प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने इस शंका का समाधान बहुत ही सरल भाषा में एक उदाहरण के माध्यम से समझाया है।  श्रीरामकृष्ण कहा करते थे, तुम बन्दर के बच्चे और बिल्ली के बच्चे, इन दोनों में से किसी एक के मार्ग का अनुसरण कर सकते हो। 

बन्दर के बच्चे को इधर-उधर जाने के लिए अपनी माँ की छाती से चिपकना पड़ता है, उसे अपनी माँ को कस


कर पकड़े रहना पड़ता है और यदि कहीं उसकी मुट्ठी ढीली हो जाये तो वह गिर जाता है। यहाँ पूरा उत्तरदायित्व बच्चे पर है माँ पर नहीं। दूसरी ओर, बिल्ली का बच्चा अपनी माँ को नहीं पकड़ता, बल्कि माँ ही उसे पकड़े रखती है, इसलिए उसे न कोई भय होता है, न उसका कोई उत्तरदायित्व; उसे तो बस केवल इतना ही करना है कि अपनी माता को पकड़ने दे और "माँ-माँ" करता रहे। यहाँ बच्चे का कोई उत्तरदायित्व नहीं है, सब दारोमदार माँ पर ही है।

          श्रीमाँ कहती हैं, योग-साधना के दो मार्ग हैं, एक है तपस्या का और दूसरा है समर्पण का। तपस्या का मार्ग दुष्कर है, इस मार्ग में तुम सर्वथा अपने ऊपर ही निर्भर रहते हो, अपने निजी सामर्थ्य से ही आगे बढ़ते हो। तुम अपनी शक्ति के अनुपात में ही ऊँचे उठते हो और उसी के अनुसार फल पाते हो। इस मार्ग में नीचे गिरने का भय हमेशा लगा रहता है। और एक बार गिरे तो तुम गहरी खाई में जाकर चूर-चूर हो जाओगे और इसका इलाज शायद ही हो सके। परन्तु दूसरा मार्ग, समर्पण का मार्ग, निरापद और निश्चित है। परन्तु शिक्षित लोगों को इसमें कठिनाई होती है। उन्हें यह शिक्षा मिली है कि वे उन सभी चीज़ों से डरें और बचें - जो उनकी व्यक्तिगत स्वाधीनता पर आँच लायें। व्यक्तित्व की भावना उनकी घुट्टी में मिली होती है। और समर्पण का अर्थ है इस सब का त्याग। इस समर्पण-मार्ग को यदि तुम पूर्ण रूप से और सच्चाई के साथ अपना लो तो कोई गम्भीर कठिनाई या कोई खतरा नहीं रहता। प्रश्न केवल सच्चाई का है

          समर्पण का अर्थ? किसका समर्पण? किसको समर्पण? श्री अरविंद कहते हैं “समर्पण का अर्थ है अपने अन्दर की प्रत्येक चीज को भगवान के  हाथों में अर्पित कर देना, जो कुछ हम हैं और हमारे पास है सब कुछ उत्सर्ग कर देना, अपने ही विचारों, कामनाओं, अभ्यासों आदि  पर आग्रह न करना, बल्कि दिव्य सत्य को ऐसा अवसर देना कि वह उनके स्थान में अपने ज्ञान, संकल्प और कर्म को सर्वत्र स्थापित कर दे।



          श्रीमाँ कहती हैं, “सबसे महत्वपूर्ण है तुम्हारे चरित्र का समर्पण, तुम्हारी जीवन शैली विधि का समर्पण, ताकि वह बदल सके। यदि तुम अपनी एकदम निजी  प्रकृति का समर्पण न करो तो यह प्रकृति कभी परिवर्तित नहीं होगी।...सच पूछा जाये तो मनुष्य जो कुछ करता है वह नहीं, बल्कि अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वह क्या है। कार्यकलाप चाहे जो हो, वास्तव में कार्य जिस तरह किया जाता है वह नहीं, बल्कि चेतना की जिस स्थिति में वह किया जाता है वह महत्त्वपूर्ण है।

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ऐ सुख तू कहाँ मिलता है ?                                               मेरे विचार

 

ऐ सुख, तू कहाँ मिलता है?

क्या तेरा कोई पक्का ठिकाना है? क्यों बन बैठा है अंजाना?

आखिर क्या है तेरा ठिकाना?

कहाँ-कहाँ ढूँढा तुझको, पर तू न कहीं मिला मुझको।

ढूँढा ऊँचे मकानों में, बड़ी-बड़ी दुकानों में,

स्वादिष्ट पकवानों में, चोटी के धनवानों में,

वे भी तुझको ही ढूँढ रहे थे, बल्कि, मुझ से ही पूछ रहे थे। 

क्या आपको कुछ पता है? ये सुख, कहाँ रहता है?  ..........

         कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना ही है कि है हर कोई, अमीर हो या गरीब, छोटा हो या बड़ा, सुख ढूँढ रहा है हर जगह ढूँढ रहा है। और इस ढूँढने में सब इतने मशगूल हैं कि उस जगह को छोड़ आये जहाँ सुख रहता था।

          मेरी गली की नुक्कड़ पर एक दुकान है। रोज़मर्रा की वस्तु वहाँ मिल जाती है। दुकान इतनी ही बड़ी है कि उसमें एक बार में सिर्फ एक ही आदमी घुस सकता है। हम अपनी हर चीज सड़क पर ही खड़े रह कर खरीदते हैं। मैं भी यदा-कदा खरीददारी कर लिया करता हूँ। छोटे बच्चे उसके नियमित ग्राहक हैं। वहाँ से खरीदने के लिए उन्हें न किसी के साथ की जरूरत है और न पैसों की। अकेले चले जाते हैं और मनोज, दुकान का मालिक, जानता है कि पैसे तो मिल हो जायेंगे। अभी कोरोना के प्रथम लहर के समय आते-जाते उससे थोड़ा बतिया लिया करता था। उस दिन सुबह-सुबह उधर से जा रहा था। मनोज बस दुकान खोल ही रहा था। मुझे देख रुक गया, कैसा समय आ गया है अंकल !’ मुख्य मंत्री ने पिछले सप्ताह ही हर सप्ताह किसी भी 2 दिन के पूर्ण लॉक डाउन का ऐलान किया था। चंद सप्ताह पहले ही उससे बात हो रही थी तब उसने बताया था कि बिक्री बहुत खराब थी, अब सुधार रही है। लेकिन बीमारी बढ़ जाने के कारण बिक्री फिर घट गई है। मैंने समझा कि शायद इसी बात को इंगित करके उसने यह बात कही है। अतः मैंने भी जोड़ दिया हाँ, भैया कौन जानता था ऐसा खराब समय भी आ सकता है। मुझे ताज्जुब हुआ जब उसने आगे जोड़ा, कितना अच्छा समय आ गया है। पहले 6 दिन कमाते थे और सातवाँ  दिन पिछली कमाई का हिसाब और अगली कमाई का तैयारी में समाप्त हो जाता था। अब बड़े सुखी हैं। 5 दिन कमाते हैं, 1 दिन दुकान की तैयारी और 1 दिन बीवी-बच्चों, माँ-बाप के साथ कमाई का आनंद लेते हैं सीधे-साधे शब्दों में कहूँ तो उसने अनजाने में आनंद का पता दे दिया। 

          यही बात उस मछुआरे ने उस सेठ / साहब / पढ़े लिखे नौजवान को कही थी। आपने भी पढ़ी या सुनी होगी। लेकिन  इसके शब्द थोड़े अलग हैं। वह मछुआरा समुद्र के किनारे मछली पकड़ने के बाद सो रहा था। हार्वर्ड के पढ़े लिखे एमबीए नौजवान के पूछने पर कि इसके बाद दिन भर वह क्या करता है, वह बताता है, मैं देर तक सोता हूँ, अपने बच्चों के साथ खेलता हूँ और फिर दिन में कुछ देर सो लेता हूँ। शाम को गाँव में अपने दोस्तों – परिवार वालों से मिलने चला जाता हूँ, उनके साथ खाता-पीता हूँ, गिटार  बजाता हूँ, गाने गाता हूँ और अपनी ज़िंदगी पूरे उल्लास से जीता हूँ

         एमबीए नौजवान ने फिर अपना पूरा ज्ञान दिया, तरक्की के रास्ते सुझाए, लाखों करोड़ों कमाने के गुर बताये। मछुआरा पूछता रहा, उसके बाद?’  और फिर अंत में 25-30 वर्षों बाद क्या –इसके बाद तुम शान से पास ही के किसी गाँव में अपना मकान बनाना। देर से उठाना, मछलियाँ पकड़ना, दिन में सोना और अपनी शाम दोस्तों के साथ बिताना  इस पर मछुआरे ने मुसकुरा कर कहा, मैं अभी यही तो कर रहा हूँ! हार्वर्ड के एमबीए का नौजवान सर झुका कर निकल लिया।

ऊपर दी गई कविता की अंतिम पंक्तियाँ हैं,

          मैं बच्चों की मुस्कान में हूँ, परिवार के संग जीने में हूँ,

          माँ बाप के आशीर्वाद में हूँ, बच्चों की सफलता में हूँ,

       जो मिला उसी में कर संतोष, आज को जी ले, कल की न सोच।

       कल के लिए आज को न खोना। मेरे लिए कभी दुखी न होना।

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वाह हिंदुस्तान!                                                              मैंने पढ़ा

 

(हम उन लोगों में हैं जिन्हें अपना मुल्क, अपने लोग, अपनी भाषा, अपना पहनावा, अपना कुछ भी पसंद नहीं। हमें अपनी हर कमजोरी और हर बुराई  की जानकारी है, लेकिन हम यह भी मानते हैं कि उसे दुरुस्त करना हमारी नहीं किसी और की ज़िम्मेदारी है। हमें अपनी खूबसूरती का भान नहीं है, हमें अपनी ताकत का अंदाज़ नहीं, हम अपनी अच्छाइयों से भी बेखबर हैं। ऐसे में अमेरिकी जाने-माने हास्य लेखक मार्क ट्वेन का भारत यात्रा वृत्तान्त बहुत कुछ कहता है।)



18 जनवरी से 31 मार्च 1896 के बीच मार्क ट्वेन ने भारत के अनेक नगरों की यात्राएं कीं और यहाँ के निवासियों के जीवन को सूक्ष्म दृष्टि से देखा-जाना-पहचाना। हमारे इतिहास और सांस्कृतिक सम्पदा ने उन्हें इस तरह प्रभावित किया था कि उन्होंने एक स्थान पर लिखा – “भारत में समस्त विश्व की सारी चीजें सबसे पहले शुरू हुई। यहीं की सभ्यता पहली सभ्यता थी। यहाँ की भौतिक सम्पदा भी विश्व कि सबसे पहली सम्पदा थी। और सबसे अधिक विचारक और बुद्धिजीवी भी यहीं पैदा हुए। यही एकमात्र देश है, जिसकी संसार की श्रेष्ठतम विशिष्टताओं पर एकाधिकार रहा है। दूसरे देशों में कोई एक उल्लेखनीय वस्तु हो सकती है, पर यहाँ तो हर वस्तु उल्लेखनीय है। किसी देश में कुछ वस्तुएँ दोहरी हो सकती हैं, लेकिन भारत के चमत्कार अपने हैं। इनका कोई अनुकरण संभव नहीं है। इनकी विशालता, भव्यता और स्वदेशी चरित्र अपने आप में अनुपम है।”

          “यह हिंदुस्तान है! सपनों और राग-रंगों की धरती, बेइंतहा दौलत और बेइंतहा दरिद्रता की धरती, शान-शौकत और फटे हाल लोगों की धरती, महलों और झोपड़ियों की धरती, अकाल और टिड्डी  दल  के हमलों की धरती, मामूली लोगों और महान लोगों की धरती, अलादीन के चिराग, शेरों और हथियों की धरती, काले नाग और जंगलों की धरती, यही है एक सौ राष्ट्रों के एक देश की धरती, मानव सभ्यता के फलने-फूलने की क्रीड़ास्थली, मनुष्य की वाणी की जन्मस्थली, इतिहास की जननी, आख्यानों की दादी, परम्पराओं की परदादी, जिसका  अतीत दुनिया के शेष हिस्सों से प्राचीनतम है। संसार में सूर्य के नीचे विश्व का यह एक ही देश है, जहाँ लोग गरीबी में हैं, बंधन में  हैं और मुक्त भी हैं। एक ऐसा देश जिसे सब लोग देखने की इच्छा रखते हैं। जिसने भी एक बार देख लिया या एक झलक भी ले ली, वह सारे संसार के दर्शन से बढ़कर है”। ये उद्गार भी उसी अमेरिका के विश्व प्रसिद्ध व्यंग्यकार, उपन्यासकार, पर्यटन-लेखक और भाषण कर्त्ता मार्क ट्वेन के हैं। यह उन्होंने तब व्यक्त किए जब वे एक सदी से कुछ पहले मुंबई पोर्ट पर पहुंचे और वहाँ के जीवन की इंद्र्धनुषी हलचल से अभिभूत हो उठे। इस दौरान उन्होंने ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, इंग्लैंड, मौरिशस, दक्षिण अफ्रीका, फिजी और श्री लंका का भ्रमण किया।

          ट्वेन ने हिंदुस्तान में मुंबई, पूना, बनारस, कलकत्ता, दार्जीलिंग, आगरा, जयपुर, दिल्ली और दूसरे अनेक नगरों की यात्राएँ कीं, जिनमें से अधिकतर यात्राएँ रेल से की थीं। उन्होंने हिंदुस्तान के होटलों, यहाँ की खुशनुमा पार्टियों, लोगों के लम्बे-लम्बे नामों, गलियारों, फकीरों और वेषभूषा के बारे में भी बहुत कुछ लिखा। एक जगह वे लिखते हैं, “दूसरे देशों में स्टेशन पर रेलगाड़ी का इंतजार करना बहुत थकाने वाला और उबाऊ होता है, लेकिन हिंदुस्तान में ऐसा कोई एहसास नहीं होता। यहाँ के स्टेशनों पर भारी चहल-पहल और शोरगुल रहता है। आभूषण पहने नर-नारियों की भीड़ नजर आती है। उनकी बहुरंगी वेषभूषा और परिधानों को देखकर मन जितना आनंदित होता है, उसे शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता”।

(वह आँख, नाक, कान पैदा करें जिनमें अपनी मिट्टी की खूबसूरती देखने, सोंधी सुगंध सूंघने और उसका संगीत सुनने की क्षमता हो।)

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हौसला                                                   लघु कहानी - जो सिखाती है जीना

 

मेंढकों का एक झुण्ड जंगल घूमने निकला। सैर करते-करते दो मेंढक एक गहरे गड्ढे में गिर गये। बाहर खड़े दोस्तों ने गड्ढे में झाँका। उन्हें लगा कि कितनी भी कोशिश क्यों न की जाये, उनका बाहर निकल पाना नामुमकिन है। वे गड्ढे में फँसे मेढकों से कहने लगे कि हाथ पैर मारने का कोई फायदा नहीं, वे किसी भी कीमत पर बच नहीं पायेंगे। वह गड्ढा उनके लिए मौत का गड्ढा साबित होगा। दोनों मेंढकों ने उन्हें अनसुना कर दिया और बाहर निकलने की भरसक कोशिश करते रहे। बाहर से झाँकते मेंढक उनके न बच पाने की बात दोहराते जा रहे थे। आखिरकार एक मेंढक निराश हो गया। उसने बाहर निकल पाने की आशा छोड़ दी और वहीं मर गया। दूसरा मेंढक अब भी बाहर निकलने की कोशिश में बराबर जुटा था। कुछ देर बाद वह गड्ढे से बाहर आ गया। बाहर निकलते ही उसने अपने मित्रों को धन्यवाद दिया। मेंढक कुछ समझ नहीं पाये। उसने उन्हें बताया कि वह बहरा है और जब वह बाहर आने के लिए लड़ रहा था, तब उन्हें सुन तो नहीं पा रहा था, लेकिन यह भलीभाँति समझ रहा था कि वे सब उसे बाहर आने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे।

आपके मुंह से निकले शब्द किसी का हौसला बुलंद या पस्त कर सकते हैं, इसलिए हमेशा सकारात्मक बोलें। 

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कारावास की कहानी-श्री अरविंद की जुबानी                                        धारावाहिक

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। इसके रोचक अंश हम जनवरी २०२१ से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसकी बारहवीं किश्त है।)

 


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"द्रोण ने क्या किया?"

कुछ एक साक्षियों के विरुद्धाचरण करने पर भी अधिकांश नॉर्टन साहब के प्रश्नों का अनुकूल उत्तर देते। इनमें जाने-पहचाने कम ही थे, कोई-कोई किन्तु परिचित भी था। देवदास करण महाशय ने हमारी विरक्ति दूर कर हमें खूब हँसाया था, चिरकाल हम उनके कृतज्ञता के ऋण में बँधे रहेंगे। इन साक्षी ने यह गवाही दी थी कि मेदिनीपुर के सम्मेलन के समय जब सुरेन्द्र बाबू ने अपने छात्रों से गुरुभक्ति के बारे में पूछा था तब अरविन्द बाबू बोल पड़े थे, "द्रोण ने क्या किया?" यह सुनते ही नॉर्टन साहब के आग्रह और कौतुहल की सीमा न रही, उन्होंने नि:स्सन्देह यह सोचा होगा कि द्रोण या तो कोई बम का भक्त है या राजनीतिक हत्यारा या मानिकतल्ला, बागान या छात्रमण्डली से संयुक्त। नॉर्टन के ख़याल में इस वाक्य का अर्थ शायद यह था कि अरविन्द घोष ने सुरेन्द्र बाबू को गुरुभक्ति के बदले बम का पुरस्कार देने का परामर्श दिया था, तब तो मुक़द्दमे में बड़ी सुविधा हो सकती है। अतएव उन्होंने साग्रह प्रश्न किया, "द्रोण ने क्या किया?" शुरू में साक्षी किसी भी तरह प्रश्न का उद्देश्य समझ न सके। पाँच मिनट तक इसे लेकर खींचतानी चलती रही, अन्त में करण महाशय ने दोनों हाथ ऊपर फैला नॉर्टन साहब को जतलाया, "द्रोण ने अनेक चमत्कार दिखलाये थे।" इससे नॉर्टन साहब सन्तुष्ट नहीं हुए। द्रोण के बम का अनुसन्धान न मिलने तक सन्तुष्ट हों भी कैसे? दोबारा पूछा, “अनेक चमत्कार क्या बला है? क्या विशेष किया है उन्होंने?" साक्षी ने इसके अनेकों उत्तर दिये, एक से भी द्रोणाचार्य के जीवन के इस गुप्त रहस्य का भेद नहीं खुला। नॉर्टन साहब भड़क उठे, गरजना शुरू किया। साक्षी भी चिल्लाने लगे। एक वकील ने हँसते हुए यह सन्देह व्यक्त किया कि शायद साक्षी को पता नहीं कि द्रोण ने क्या किया। करण महाशय इस पर क्रोध और क्षोभ से आग बबूला हो उठे। चिल्लाये, “क्या? मैं? मैं नहीं जानता कि द्रोण ने क्या किया? वाह, क्या मैंने वृथा ही सारा महाभारत पढ़ा?" आधे घण्टे तक द्रोणाचार्य की मृत-देह पर करण और नॉर्टन का महायुद्ध चला। हर पाँच मिनट बाद अलीपुर विचारालय को कँपाते नॉर्टन अपना प्रश्न गुँजाने लगे, "Out with it, Mr. Editor! what did Drona do?" (हाँ, बताइये-बताइये, सम्पादक महाशय, द्रोण ने क्या किया?) उत्तर में सम्पादक महाशय ने एक लम्बी रामकहानी आरम्भ की, किन्तु द्रोण ने क्या किया, इसका कोई विश्वसनीय संवाद नहीं मिला। सारी अदालत ठहाकों से गूँज उठी। अन्त में टिफ़िन के समय करण महाशय ज़रा ठण्डे दिमाग से सोच-समझ कर लौटे और समस्या की यह मीमांसा बतलायी कि बेचारे द्रोण ने कुछ नहीं किया, बेकार ही उनकी परलोक गत आत्मा को ले आधे घण्टे तक खींचतान हुई, अर्जुन ने ही गुरु द्रोण का वध किया था। अर्जुन के इस मिथ्या अपवाद से द्रोणाचार्य ने निस्तार पा कैलाश पर सदाशिव को धन्यवाद दिया होगा कि करण महाशय की गवाही के कारण अलीपुर के बम-केस में उन्हें कठघरे में खड़ा नहीं होना पड़ा। सम्पादक महाशय की एक बात से सहज ही अरविन्द घोष के साथ उनका सम्बन्ध प्रमाणित हो जाता। किन्तु आशुतोष सदाशिव ने उनकी रक्षा की।                                                                                             (क्रमशः आगे अगले अंक में)

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