शुक्रवार, 1 जुलाई 2022

सूतांजली, जुलाई 2022

 सूतांजली

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वर्ष : ०५ * अंक : ०१२                                                              जुलाई  * २०२२

जीवन में सबसे बड़ा आनंद वह कार्य करने में है जिसे

लोग कहते हैं

आप नहीं कर सकेंगे।

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विडम्बना

संसार का हर संगठन जानता है कि जिस आवश्यकता की पूर्ति के लिए उसका जन्म हुआ है उस आवश्यकता का बना रहना, बल्कि और बढ़ते रहना ही उसके जिंदा रहने की शर्त है। बीमारियाँ खत्म हो गई तो दवा निर्माता कहाँ जाएंगे? विश्व में शांति और सौहार्द होगा तो हथियार निर्माण का विशाल कारोबार कहाँ जाएगा? दवा निर्माताओं को स्वास्थ्य में रुचि नहीं होती, हथियार बनाने वालों को केवल युद्ध चाहिए और राजनीतिक पार्टियों को समस्याएँ।  इसलिए धर्मों को जन्मे हजारों वर्ष बीत जाने के बाद भी मनुष्य की आत्मा उतनी ही प्यासी है, उसकी चेतना का स्तर कहीं भी ऊपर उठता दिखाई नहीं देता, शांति और विश्व बंधुत्व की जगह धार्मिक, जातीय, सामाजिक संकीर्णता के परस्पर विरोधी दायरे बनते जा रहे हैं। अपनी सामूहिक पहचान को बनाए रखने का आग्रह अहमन्यता तक पहुँचता दिखाई देता है। या तो हर स्थान पर संगठित धर्म की असफलता है या एक संगठन होने के नाते कोई धर्म नहीं चाहता कि वे समस्याएँ  समाप्त हो जिन पर उनकी उपादेयता टिकी है। शायद इसीलिए धर्मों और धर्मगुरुओं को लक्ष्य करके 20वीं सदी के गंभीर विचारक जे. कृष्णमूर्ति ने कहा था, जिस क्षण आप किसी का अनुसरण करते हैं, आप सत्य का अनुसरण बंद कर देते हैं (The moment you follow someone, you cease to follow truth.) धर्म हो, धर्मगुरु हो या धर्म ग्रंथ वह केवल एक इशारा भर करते है। संस्कृत के अनुसार गुरु की अंगुली तो शिष्य को संकेत देती है, मार्ग इस दिशा में है। अब अगर शिष्य अंगुली पकड़ कर बैठ जाए तो अपनी मंजिल पर कैसे पहुंचेगा? धर्मगुरु अगर सही है तो भी वह हमारे और सत्य के मध्य केवल एक सेतु भर है। उस पर चलना तो हमें ही होगा।

          पैगंबर, मसीहा, संत, मोहम्मद सिर्फ सहायता कर सकते हैं, अपने सत्य की खोज तो हमें खुद ही करनी होगी। डॉ.राधाकृष्णन ने कहा था, धर्म ही, प्रत्येक व्यक्ति के अंदर जलनेवाली ज्वाला को प्रज्ज्वलित करने में सहायता करती है। धर्म केवल सहायता करती है, उसे जलाना और जलाए रखना हमारा ही काम है।

यहाँ एक बोध कथा का उल्लेख सामयिक होगा –

संत ने एक रात सपना देखा। सपने में वह स्वर्ग जा पहुँचा। सारा स्वर्ग सजा-धजा था - रास्तों पर फूल, इमारतों पर रोशनी की लड़ियां, चारों ओर नृत्य और संगीत उसने पूछा, 'भाई, क्या बात है? कोई उत्सव है क्या?' जवाब मिला, 'आज परमात्मा का जन्मदिन है। सड़क पर एक लंबा जुलूस गुजरने लगा। जुलूस के आगे घोड़े पर बैठा एक आदमी चल रहा था। संत ने सवाल किया, भाई ये महाशय कौन हैं? जवाब आया, ' ये ही तो हजरत मोहम्मद हैं।' पीछे लोगों का हुजूम उमड़ रहा था। फरीद ने पूछा, 'फिर ये लोग कौन हैं? जवाब मिला, ये लोग मोहम्मद के अनुयायी हैं। इन्हें मुसलमान कहते हैं।'

          पीछे-पीछे क्रूस हाथों में लिए लाखों ईसाइयों के साथ ईसा मसीह आए। इसके बाद अपने स्वर्ण रथ पर बैठे कृष्ण आए, धनुर्धारी राम आए। पीछे नाचते-गाते भक्तों का मेला लगा हुआ था.... इसी तरह पैगंबर आते रहे, जय-जयकार करते जुलूस गुजरते रहे। और सभी जुलूसों के गुजर जाने के बाद अंत में एक अधेड़ सा आदमी आता हुआ दिखाई दिया। उसके साथ कोई नहीं था। वह निपट अकेला चला जा रहा था। उसे देख कर संत विचार में पड़ गया। न कोई अनुगामी, न कोई साथी, यह अकेला कहाँ जा रहा है। संत ने पूछा, 'श्रीमान, आप हैं कौन? मोहम्मद, ईसा, राम, बुद्ध..... सभी को मैं पहचानता हूं। बिना किसी अनुगामी के इस तरह आप कौन हैं?!"

          उस व्यक्ति ने एक उदास-सी मुस्कान के साथ कहा, 'प्रिय मित्र, मैं ही परमात्मा हूँ। आज मेरा जन्मदिन है। लेकिन कुछ लोग, ईसाई बन गए, कुछ मुसलमान, कुछ यहूदी, कुछ हिंदू, कुछ ... मेरे साथ चलने के लिए कोई नहीं बचा'

          ...अगर आपने परमात्मा को लेकर पहले से ही कोई धारणा बना ली है, तो आप उसे नहीं जान सकते। आपकी धारणा ही आपके और ईश्वर के बीच सबसे बड़ी दीवार बनी है। सभी बाह्य धारणाओं को छोड़ देने पर ही अंतर्यात्रा आरंभ हो सकती है। यही सोच मनुष्य के आध्यात्मिक संसार और व्यावहारिक संसार की दूरियाँ मिटाने का भी प्रयास है। अध्यात्म धर्मस्थलों और धर्मग्रंथों में बंद करके रख देने की चीज नहीं है। अध्यात्म वही है, जो बाहर से जीवन और भीतर से आत्मा को बदल सके, अधिक समृद्ध, अधिक विस्तृत कर सके। आध्यात्मिक राह पर पैर जमाकर चलने के लिए जरूरी है कि हमारा व्यक्तिगत जीवन भी प्रेम, शांति और आनंद से परिपूर्ण हो। जैसे आध्यात्मिक क्षेत्र में हिंदुत्व, बौद्ध, जैन,  ताओ, ईसाइयत आदि से सहयोग लिया, उसी तरह बाह्य जीवन में पूर्णता लाने के लिए मनोविज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान, पर्यावरण विज्ञान और समाज शास्त्र आदि से सहायता लेने में भी कोई संकोच नहीं किया जाना चाहिए।

          इस तरह एक अंतर-बाह्य परिपूर्ण, स्वतंत्रचेता और ऊर्जावान मनुष्यों के गतिमान संसार का स्वप्न देखिए। समझिए, कहीं हम सभी उसी भीड़ का ही एक हिस्सा हैं जो परमात्मा को भूल उसके धर्म-संगठनों का अनुगमन कर रहा है?  वेदव्यास ने लिखा है, प्राणियों की अभिवृद्धि के लिए धर्म का प्रवचन किया गया है, अतः जो प्राणियों की अभिवृद्धि का कारण हो, वही धर्म है।

          परमात्मा का अनुगमन कीजिये। कम से कम एक बंदा तो उसके साथ हो।

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ईश्वर को एक अर्जी                                                                     

हे परम पिता, परम अदरणीय एवं आराध्य ईश्वर,

आपके चरणों में मेरा सविनय प्रणाम।

          मैं एक अति नाजुक और आवश्यक विषय पर आपको यह पत्र लिखने का दु:स्साहस करने की आजादी ले रहा हूँ।

          आपने हमें, पूर्णत: रिक्त, बिना आपकी जानकारी और जीवन के उन सिद्धांतों से जिनपर हमें चलना है, अवगत कराये, इस जगत में भेज दिया। आपने हमें इस बात की भी जानकारी नहीं दी कि हमने अपने पूर्व जन्म में कितनी साधना की, हमारी प्रगति हुई या अवनति, हमने कितने कक्षाओं को उत्तीर्ण किया और अब हमें कहाँ से प्रारम्भ करना है।

          अपने हमें बारम्बार नर्सरी कक्षा में ही डाल दिया। आपके नियम हम कभी समझ नहीं पाये।

          जब हम यहाँ एक भोले-भाले और अज्ञानी के रूप में आये तब हमें हजारों प्रकार के वातावरणीय दबावों में डाल दिया; यथा – माता-पिता, दादा-दादी, भाई-बहन, अनेक संबंधी और उनके बच्चे, हमारे अनगिनत पड़ोसी, असंख्य मेहमान और कभी समाप्त न होने वाले पारिवारिक मित्र, सहपाठी, सड़कें, गाँव, कस्बे, शहर के लोग और उनके बच्चे, बाजार, विज्ञापन, रेडियो, टेलीविज़न, विडियो, अखबार उनके विचार और दृष्टिकोण, राजनीतिक पार्टियां और उनके अपने स्वार्थ, संगठन और ट्रस्ट, पंथ और मठ, गुरु और आश्रम, विचारक और अनेकानेक पथ, हर ढंग और रंग के और उनका अलग-अलग गहरा और हलकापन, बिना किसी नियंत्रण के, हमें पूरी तरह भ्रमित करने के लिए। हम इन्हीं सब के आकस्मिक और उलझन से प्राकृतिक रूप में पैदा हुए, हमारे हाथ में कुछ भी नहीं है। तब हमारी गलतियों और त्रुटियों के लिए आप हमें कैसे दोषी ठहरा सकते हैं?

          जब हम युवा थे, उस समय आपने हमें वैवाहिक जीवन के धधकते चूल्हे पर चढ़ा कर हमें बच्चे पैदा करने के कार्य में लगा कर उसे ढोने में लगा दिया। हे मेरे ईश्वर! आप यह जानते थे कि हमें कैसे नये वातावरण और परिस्थितियों में से गुजरना होगा।

          और अब, जब हम अपने विगत जीवन के अनुभवों के आधार पर हम अपनी भूलों और गलतियों, दोषों और मूर्खताओं को समझने लगे हैं, हम कुछ हद तक परिपक्व हो गये, हमें इतना ज्ञान प्राप्त हुआ कि हम कुछ बेहतर और पवित्र जिंदगी समझ पायें, हम दूसरों को ज्ञान देने में सक्षम बने, तब मेरे ईश्वर आपने हमें बूढ़ा और अक्षम बना दिया, और हमारी प्रत्येक मानसिक शक्ति और कार्य करने की  क्षमता को बिगाड़ दिया। यही नहीं अपने तब यमराज को हमारे पास बिना जमानत का वॉरेंट और बिना किसी शर्त का सम्मन के साथ भेज दिया जिसकी न कोई सुनवाई हो सकती है और न ही हम अपनी परिस्थिति बयां कर सकते हैं। आपने न हमें, न हमारे वकील को जिरह करने की अनुमति दी और एक तरफा फैसला सुना दिया।

          मेरे ईश्वर, आपने इस बात को समझने से इंकार कर दिया कि जब हमें इस जीवन का थोड़ा अनुभव और ज्ञान प्राप्त हुआ, हमें अपनी भूलों, मूर्खताओं, और अज्ञान का अहसास हुआ तब हमने यह शपथ ली कि बहुत हुआ अब नहीं और यह निश्चय किया कि अब आगे हम एक अच्छी, पवित्र और सच्चाई की जिन्दगी जिएंगे। तब उस अवसर का लाभ उठाते हुए हमें नए सिरे से नई ऊर्जा के साथ हमारी तीक्ष्ण  मानसिक शक्ति और नए मानस, शरीर तथा आत्मा से आपके अनुरूप कार्य करने और दूसरों को भी परामर्श देने में लगाते। 

          मेरे ईश्वर, आपके वर्तमान कार्य प्रणाली में कहीं-कुछ बुनियादी भूल है। मेरे ईश्वर शायद, आपको एक नई प्रणाली ईजाद करनी चाहिए जिसमें सकारात्मक और नकारात्मक नंबर दिये जाएँ और अगर नकारात्मक १०० नंबर मिल जाएँ तब हमें नर्क में भेजें जहां से हम फिर से शून्य से जीवन प्रारम्भ करें।

          मेरे ईश्वर, अब तक तो आपके पास कई प्रतिभाशाली लोग पहुँच गए होंगे। मैं आपसे निवेदन और प्रार्थना करता हूँ कि आप अब कोई एक ऐसा नवीन तरीका ईजाद कर सकते हैं या बनवा सकते हैं ताकि हम ८४ लाख योनियों में प्रविष्ट होने के कष्ट से बच सकें।

          अगर आपने हमारी प्रार्थना और निवेदन को स्वीकार नहीं किया तब हमें इस बात के लिए बाध्य होना पड़ेगा कि हम इस मुद्दे को भड़काएँ, विद्रोह करें और अपने एक नया साम्राज्य बनाने के लिए आँधी उठाएँ। 

अपनी पूरी श्रद्धा के साथ,

हम हैं

इस धरती के बच्चे

(श्री अरविंद आश्रम-दिल्ली शाखा द्वारा प्रकाशित सुरेन्द्र नाथ जौहर – जीवनी, लेखन और विचार पर आधारित)

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जिंदगी ....., जरूरी यह है कि वह कुछ बेहतर दे           मैंने पढ़ा

एक दिन कहानीकार हाथार्न और कवि लॉन्गफेलो एक साथ भोजन ले रहे थे। हाथार्न ने कहा, 'मैं बड़े दिनों से उस दंतकथा पर कहानी लिखने की सोच रहा हूं, जिसमें एक लड़की अपने प्रेमी से अलग हो जाती है और सारी जिंदगी उसे खोजती फिरती है। सारी जिंदगी, माने बूढ़ी होने तक... और अंत में उसका प्रेमी उसे एक अस्पताल में मिलता है, मृत्यु शैया पर पड़ा हुआ। वह उसके पास पहुंचती है, उसे देखती है, छूती है और वह उसकी बाहों में दम तोड़ देता है। जानते हो लॉन्गफेलो, ये कहानी मुझे बार-बार प्रेरित करती है, लेकिन इसे लिखने में मैं अब तक असमर्थ रहा हूं।"

          लॉन्गफेलो ने एक क्षण सोचते रहने के बाद सवाल किया, 'तुम कहो तो इस पर मैं कविता लिखूं ? हाथार्न ने सहमति दे दी। तब लांगफेलो ने 'इवेजेलिना' नामक मर्मस्पर्शी काव्य की रचना की। दो महान साहित्यकारों के बीच घटी इस घटना से कई चीजें सीखी जा सकती हैं-

एक)                अगर आपके पास ऐसा अवसर है, जिसको आप पूरी तरह से निभाने की मनः स्थिति में नहीं हैं, तो उसे व्यर्थ मत पकड़े रखिए। उदार बनकर उसे किसी और को सौंप दीजिए। इससे वह अवसर ही नहीं, आपका व्यक्तित्व भी एक सुखद राह पा जाएगा।

दो)                   जब आप जीवन को कहानी की तरह लिखने की कोशिश करते-करते थक जाएं, तो कुछ नया करें। यह सोचना शुरू करें कि उसे कविता में कैसे तब्दील किया जाए!

तीन)               अगर आपके पास कोई सपना है, तो उसे दूसरे के सपने में मिलाकर देखें, यह प्रयोग स्वार्थी होती जिंदगी को एक नया और खुशनुमा रसायन बना देगा। एक गीत.....

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   लॉन्गफेलो  कार्ल वोनेगुट    

कार्ल वोनेगुट अपने उपन्यास 'केट्स क्रेडिल' में एक दंतकथा सुनाते हैं, 'ईश्वर ने धरती बनाई, पर जब उसने धरती को देखा, तो उसे सब ओर सूनापन ही दिखाई दिया। तब उसने सोचा, क्यों न इस सूनेपन को ख़त्म करने के लिए मैं मिट्टी से जीवित प्राणियों की रचना करूं? और फिर उसने मिट्टी से उन सब प्राणियों को बनाया जो आज धरती पर विचरते हैं। मनुष्य उन्हीं में से एक था। लेकिन मिट्टी से बना यह अत्त्युत्तम कृति बाकी सब प्राणियों में सबसे सक्षम था। और तो और उसके पास भाषा भी थी। लिहाजा बनते ही उसने आंख झपकाते हुए ईश्वर से पूछा, 'इस सब का क्या अर्थ है ?"

ईश्वर ने कहा, 'बेशक हर वस्तु का अर्थ होता है, लेकिन यह मैं तुम पर छोड़ता हूं कि तुम इस बारे में क्या तय करते हो...'

इतना कहकर ईश्वर ग़ायब हो गया...' यह दृष्टांत जहां ख़त्म होता है, वहां से एक नई कहानी शुरू होती है। अपनी तलाश की कहानी... अब हमारे सामने कोई ईश्वर नहीं, जो जीवन का अर्थ बताए। यह प्रश्न अब हमारा ही दायित्व है। नई भोर आमंत्रण दे रही है कि हम इस सवाल को थामकर आगे बढ़ें और उसकी रोशनी में जीवन को देखें। उसे देखना उदासी में गुम हुए मन के वश का नहीं। पर इस रोशनी को देखने के लिए अदम्य विश्वास की आंख चाहिए।

अनुपमा ऋतु के लेख का अंश

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चरित्र बल                                          लघु कहानी - जो सिखाती है जीना

नोबल पुरस्कार विजेता सी.वी.रमण भौतिकशास्त्र के प्रख्यात वैज्ञानिक थे। अपने विभाग के लिये उन्हें एक योज्ञ वैज्ञानिक की जरूरत थी। कई लोग साक्षात्कार के लिये आये। जब साक्षात्कार समाप्त हो गया, तब उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति, जिसे उन्होंने अयोग्य सिद्ध कर दिया था, कार्यालय के आसपास घूम रहा है। उन्होंने क्रोधित होकर उस व्यक्ति से पूछा कि जब तुम्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया है, तुम यहाँ क्यों घूम रहे हो’?

उस व्यक्ति ने विनय भाव से कहा – आप नाराज़ न हों। मुझे यहाँ आने-जाने के लिये जो राशि दी गयी है, वह शायद गलती से कुछ अधिक दे दी गयी है। इसलिये मैं उस अतिरिक्त राशि को लौटाने के लिये कार्यालय के लिपिक की तलाश कर रहा हूँ।

सी.वी.रमण उस व्यक्ति की बात सुनकर विस्मित रह गये। फिर थोड़ा रुक कर बोले, “अब तुम कहीं मत जाना, मैंने तुम्हारा चयन कर लिया है। तुम चरित्रवान व्यक्ति हो। भौतिकशास्त्र के ज्ञान की कमजोरी तो मैं किसी को पढ़ाकर दूर कर दूँगा, परंतु ऐसा चरित्र मैं कैसे निर्मित करूंगा”?

(गीतप्रेस गोरखपुर की कल्याण से)

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कारावास की कहानी-श्री अरविंद की जुबानी                                   समापन किस्त 

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। इसके रोचक अंश हम जनवरी २०२१ से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसकी उन्नीसवीं तथा अंतिम किश्त है।)

(19)

गोसाई की बात का विश्वास करने से यह भी विश्वास करना होगा कि उन्हीं के कहने से हमारा निर्जन कारावास खत्म हुआ एवं हमें इकट्ठे रहने का हुकुम मिला। उन्होंने बताया कि पुलिस ने उन्हें सब के बीच में रख षड्यन्त्र की गुप्त बातें निकलवाने के लिए यह व्यवस्था की है। गोसाईं नहीं जानते थे कि पहले ही सब ने उनके नूतन व्यवसाय की गन्ध पा ली है, इसलिए कौन षड्यन्त्र में लिप्त हैं, शाखा समिति कहाँ है, कौन पैसे देते या सहायता करते हैं, अब कौन गुप्त समिति का काम चलायेंगे आदि ऐसे अनेक प्रश्न पूछने लगे। इन सब प्रश्नों के उन्हें कैसे उत्तर मिले इसका दृष्टान्त मैंने ऊपर दिया है। लेकिन गोसाईं की अधिकांश बातें ही झूठी थीं। डॉ. डैली ने हमें बताया था कि उन्हीं ने इमर्सन साहब से कह सुनकर यह परिवर्तन कराया था। सम्भवत: डैली की बात ही सच है; हो सकता है कि इस नूतन व्यवस्था से अवगत होने के बाद ही सच है; हो सकता है कि इस नूतन व्यवस्था से अवगत होने के बाद पुलिस ने ऐसे लाभ की कल्पना की हो। जो भी हो, इस परिवर्तन से मुझे छोड़ अन्य सब को परम आनन्द मिला, मैं उस समय लोगों से मिलने-जुलने को अनिच्छुक था, तब मेरी साधना खूब जोरों से चल रही थी। समता, निष्कामता और शान्ति का कुछ-कुछ आस्वाद पाया था; किन्तु तब तक यह भाव दृढ; नहीं हुआ था। लोगों के साथ मिलने से, दूसरों के चिन्तन स्त्रोत का आघात मेरे अपक्व नवीन चिन्तन पर पड़ते ही इस नये भाव का ह्यस हो सकता है, वह जा सकता है। और सचमुच यही हुआ। उस समय नहीं जानता था कि मेरी साधना की पूर्णता के लिए विपरीत भाव के उद्रेक का जागना आवश्यक है, इसीलिए अन्तर्यामी ने हठात् मुझे मेरी प्रिय निर्जनता से वञ्चित कर उद्दाम रजोगुण के स्रोत में बहा दिया। दूसरे सभी आनन्द में अधीर हो उठे। उस रात जिस कमरे में हेमचन्द्र दास, शचीन्द्र सेन इत्यादि गायक थे वह कमरा सबसे बड़ा था, अधिकतर आसामी वहीं एकत्रित हुए थे और रात के दो-तीन बजे तक कोई भी सो न सका। सारी रात हँसी के ठहाके, गाने का अविराम स्रोत, इतने दिन की रुद्ध कथा-वार्ता वर्षा ऋतु की वन्या की तरह बहती रहने से नीरव कारागार कोलाहल से ध्वनित हो उठा। हम सो गये लेकिन जितनी बार नींद टूटी उतनी ही बार सुनी समान वेग से चलती हुई वही हँसी, वही गाने, वही गप्पें अन्तिम प्रहर में वह स्रोत क्षीण हो गया, गायक भी सो गये। हमारा वार्ड नीरवता में डूब गया ......                                             (समाप्त)

 

(श्री अरविन्द का लेख इस स्थान पर आकर समाप्त हो जाता है जहाँ अभियुक्तों को एक बड़े हॉल में स्थानान्तरित कर दिया गया था। 'कारा-काहिनी' (कारावास की कहानी) का अन्तिम हिस्सा मार्च 1910 में 'सुप्रभात' में छपा था, तब तक श्रीअरविन्द ने कलकत्ता छोड़कर चन्दरनगर में शरण ले ली थी। ब्रिटिश सरकार के फिर से पीछे पड़ने पर पॉण्डिचेरी आने से पहले वे चालीस दिनों तक गुप्त रूप से रहे, और 'कारा- कहानी' अधूरी रह गयी। अब श्रीअरविन्द को एक भिन्न प्रकार की क्रान्ति में जुटना था—यह थी आध्यात्मिक क्रान्ति- जिसमें न केवल भारत के लक्ष्य की बल्कि पृथ्वी के भविष्य की बाज़ी लगी थी।

"जब मैं अज्ञान' में सोया पड़ा था,

तो मैं एक ऐसे ध्यान कक्ष में पहुँचा

जो साधु-संतों से भरा था।

                                    मुझे उनकी संगति उबाऊ लगी और

                                    स्थान एक बंदीगृह प्रतीत हुआ;

                                    जब मैं जगा तो

                                                                        भगवान् मुझे एक बंदीगृह में ले गये

                                                                        और उसे ध्यान मंदिर

                                                                        और अपने मिलन-स्थल में बदल दिया।

(श्रीअरविंद)

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बुधवार, 1 जून 2022

सूतांजली, जून 2022

सूतांजली

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वर्ष : ०५ * अंक : ०११             🔊(30.15)                                       जून  * २०२२

सद्गुण एक प्रकार की बुद्धि है जिसे सिखाया नहीं जा सकता और इसलिए यह ज्ञान नहीं है।

जो लोग यह दावा करते हैं कि यह एक ज्ञान है और इसे सिखाया जा सकता है,

वे यह भूल जाते हैं कि उनके अच्छे काम का परिणाम ज्ञान नहीं बल्कि

उनके सच्चे विचारों की देन है। 

प्लेटो



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एक लम्बी लघु कथा

(इस लंबी कथा को आपने लघु कथा के रूप में जरूर सुनी और पढ़ी होगी। फोटो देख कर इसका मजमून भी समझ गए होंगे। लेकिन जरा ठहरिये! हाँ, बात वही है लेकिन अचलेश शर्मा की कलम को महसूस कीजिये, लगेगा की इसे आप पहली बार पढ़ रहे हैं। नहीं, पढ़ नहीं रहे हैं, महसूस कर रहे हैं, इसे जी रहे हैं। इसे ही कहते हैं कलम की ताकत। चाहें तो सुन लीजिये, तब भी एक अलग अहसास होगा।)

पत्नी जिद कर रही थी कि तुलसी लगाने के लिए उसे कुम्हार की दुकान से गमला चाहिए। उस दिन रविवार था, इसलिए नाश्ता करते हुए पति ने प्रस्ताव रखा, 'चलो आज हम वह तुलसी वाला गमला ले आते हैं और खाना भी बाहर ही करते आएंगे। पत्नी खुश। नव-दंपत्ती मिट्टी के सामान वाले कुम्हार की उस दुकान पर पहुँच गया जहाँ  गमले और मिट्टी का सजावटी सामान बनाकर बेचा जाता था। हालांकि तिरपाल के तले और चारों तरफ पड़े सामान को देख कर उसे दुकान नहीं कहा जा सकता। पत्नी ने तुलसी के थांवले जैसा गमला पसंद कर लिया, लेकिन जब दाम पूछे तो वह आश्चर्य से लगभग चीख उठी, 'क्या? एक सौ बीस रुपये? एक सौ बीस रुपए का क्या है इसमें? मिट्टी का ही तो है!"


          बेचारे कुम्हार ने बहुत सारी दलीलें दी, जैसे मेहनत बहुत करनी पड़ती है, बिकता भी कम है, महंगाई बहुत है, वगैरह-वगैरह, लेकिन पत्नी इतने पैसे देने को तैयार ही नहीं थी। आखिर बहुत बहस करके अपनी पसंद का गमला लेकर और 100 रुपए कुछ इस भाव से वहीं रख कर वह गाड़ी की तरफ चल पड़ी, जैसे इतने रुपए भी वह कुछ ज्यादा ही दे रही है। कार में बैठते हुए पति ने देखा कि कुम्हार ने एक बेबसी और उदासी भरे भाव से वे रुपए उठा लिए थे।

          होटल में खाने के लिए दिए गए ऑर्डर में पत्नी अपनी पसंद का आलू जीरा शामिल कराना नहीं भूली थी। कुछ देर में खाना मेज पर सजा दिया गया। खाना खाते-खाते पति हौले से बोला, उस गमले के तुम्हें पूरे पैसे दे देने चाहिए थे।'

"अरे वाह, एक सौ बीस का उसमें क्या है? भला लूट मचा रखी है। तुम भी न!’

'चलो, थोड़ी देर के लिए तुम्हारी बात मान लेते हैं कि उस गमले में एक सौ बीस का कुछ नहीं है। अब जरा इस आलू जीरा की सब्जी को भी देखो। देखो, मेन्यू में इसकी कीमत दो सौ चालीस रुपए लिखी है। अब यह भी देखो कि इसमें आलू कितना लगा होगा। शायद आधा किलो भी नहीं। आज के बाजार भाव से देखें तो पांच रुपए के क़रीब आलू लगे होंगे इसमें। अब मसाले, गैस वगैरह भी लगा लो, तो बहुत से बहुत पैंतीस-चालीस रुपए लग गए होंगे। लेकिन हम यहाँ होटल वाले से नहीं कहते कि आलू जीरे की इस एक प्लेट में दो सौ चालीस का क्या है भला? चुपचाप इसे दो सौ चालीस का ही स्वीकार कर लेते हैं। ऊपर से हम वेटर को टिप भी देकर जाते हैं। तुमको पता है कि जो गमला तुमने लिया है इसे बनाने में उस ग़रीब ने कितनी मशक़्क़त की होगी?' पत्नी के चेहरे पर उत्सुकता आ गई थी।

 

पति बोला, 'सबसे पहले तो वह कहीं ख़ास जगह पर बनी एक ख़ास मिट्टी की खदान से मिट्टी खोद कर लाया होगा। फिर उसमें पानी डाल कर उसने कई दिन तक कई बार उसे रौंदा होगा, तब जाकर वह मिट्टी इस लायक हुई होगी कि उससे कुछ बनाया जा सके। फिर उसने अपने हाथों से बड़े ध्यान और धीरज के साथ इस चौकोर आकार के खास गमले को तैयार किया होगा, क्योंकि चौकोर गमला चाक पर नहीं बनाया जा सकता। फिर इसके गीला रहते हुए ही उसने इस पर नक्काशी की होगी। फिर इसे सूखने के लिए रखा होगा, बहुत संभाल के। इसके सूख जाने पर इसे उपलों के ढेर के अंदर रख कर, उन्हें जला कर इसे पकाया होगा। फिर बड़ी सावधानी के साथ वह इसे अपने घर से ढो कर इस दुकान पर लाया होगा। और उसकी दुकान देखी तुमने? ऊपर तिरपाल से ही तो ढकी है, लेकिन चारों तरफ से खुली है। ऐसे खुले में वह तेज सर्दी, गर्मी, बरसात झेलते हुए वहीं रहता है, वह खाट और उस पर पड़ा उसका बिस्तर वहीं तो था, तुमने देखा होगा।'

          पत्नी विस्मित भाव से बड़े ध्यान से सुन रही थी। पति ने पत्नी की प्लेट में थोड़ा और आलू जीरा परोसते हुए कहा, 'और यह होटल वाला बाजार से आलू मंगा कर कुक को सामान देकर आराम से एसी में बैठा हुआ इसके हमसे दो सौ चालीस रुपए वसूल कर रहा है और हम कोई चूं-चपर किए बिना उसे दो सौ चालीस भी दे रहे हैं और ऊपर से टिप भी।

          पत्नी के चेहरे पर उदासी उतर आई थी पति ने स्थिति को संभालते हुए कहा, 'नहीं डियर, मैं तुम्हारा उपहास नहीं कर रहा हूँ। सोचने वाली बात यह है कि हम कुम्हार, सब्जी वाला, रिक्शा वाला और इसी तरह के ग़रीब लोगों के साथ - इन मेहनतकश गरीब लोगों के साथ जो कि अपने को बचाए रखने के लिए जूझ रहे होते हैं, इन्हीं के साथ मोलभाव क्यों करते हैं, इन्हीं के साथ पैसे कम करने की झिक-झिक क्यों करते हैं? सब्जी की बात चली है, तो सब्जी वाले को ही लो! तुमने देखा होगा कि शायद ही कोई ऐसा भला इंसान होगा, जो सब्जी वाले के साथ पैसे कम कराने के लिए झिक-झिक न करता हो। लेकिन क्या कभी कोई सोचता है कि हमें सब्जी उपलब्ध कराने के लिए वह कितनी मशक्कत करता है। हर रोज मुँह अंधेरे उठ कर वह सब्जी मंडी जाता है, वहाँ से सब्जी तुलवा कर वह उसे अपने ठेले तक लेकर आता है, सारी सब्जियों को धोता है, उन्हें हमारे लिए ठेले पर सजाता है और सारे दिन ही नहीं रात को 8-9 बजे तक वहीं खुले में खड़े-खड़े सब्जियां बेचता है - हर मौसम की मार झेलता हुआ, चाहे सर्दी हो, गर्मी हो, बरसात हो, आंधी हो। और हम उससे कहते हैं कि दो रुपए कम कर दे, और हरा धनिया और मिर्च मुफ़्त में लेना तो जैसे हमारा जन्मसिद्ध अधिकार बन गया है। इस होटल में खाने का एक हजार रुपए का बिल भरने वाला भी कोई एक पापड़ मांग कर तो देखे, पापड़ की क़ीमत तुरंत वह बिल में जोड़ देगा, लेकिन हम उससे यह नहीं कहेंगे कि हमने हजार रुपए का बिल भरा है तो एक पापड़ तो दे दे। कभी नहीं कहेंगे। लेकिन सब्जी वाले से तो गुर्रा कर कहते हैं कि हरी मिर्च डाल दे, धनिया डाल दे। अरे भाई, हरी मिर्च और धनिया क्या उसके घर में उगा था, वह भी तो उस ने मंडी से ख़रीद कर ही लाया होगा, फिर आप मुफ्त में क्यों मांग रहे हैं। और विडंबना देखो कि पैसे से समर्थ व्यक्ति असमर्थ व्यक्ति से मुफ्त में लेने की चाह रखता है। हम जैसे समर्थ लोग होटल, मॉल और कुबेरों की ऐसी ही पॉश जगहों पर यह देखते और महसूस करते हुए भी कि हम मूंडे जा रहे हैं, चुपचाप उस मोटी रकम का भुगतान करने में गर्व समझते हैं, लेकिन गरीब को उसकी लागत और मेहनत के पैसे देने में मोलभाव करने और झिक-झिक करने में हमें संकोच नहीं होता, बल्कि ऐसा करना हम अपना अधिकार समझते हैं। अच्छा तो यह होगा कि हम लोग जो पैसे से समर्थ हैं, वे ग़रीबों के साथ मोलभाव बिल्कुल न करें, उनकी मेहनत को, मशक्कत को सलाम करें और इसलिए हो सके तो बैरे को टिप देने की तरह ही इन्हें भी ऊपर से कभी कुछ इनाम भी दें।'

          पत्नी के चेहरे पर 'ज्ञान प्राप्ति' जैसे कुछ भाव तैरने लगे थे, और खाना खा लेने पर आने वाले तृप्ति के भाव भी बाहर आने पर पत्नी ने अपने स्वर में आग्रह का भाव लाते हुए पति से कहा, 'जरा एक बार फिर वहीं चलें?' पति ने मुस्कुरा कर सहमति दी। कुम्हार की उस दुकान पर वे फिर रुके। पत्नी ने अपनी पसंद के कई और सामान लिए। किसी की भी कीमत पर कोई झिक-झिक नहीं की और पूरे दाम चुकता कर दिए।

          कुम्हार खुश था कि आज अच्छी बिक्री हो गई थी। पति खुश था कि ग़रीब को उसके सामान के सही दाम दिला सका और इसलिए भी कि पत्नी ने उसकी बात पर बहस करने के बजाय बात को समझने की कोशिश की थी और सहजता के साथ आश्वस्त हो गई थी कि ग़रीब से मोल-भाव करना कोई अच्छी बात नहीं है। पत्नी भी खुश थी कि अपनी पसंद का इतना सारा सामान ले लिया था और इसलिए भी कि उसे एक व्यापक दृष्टिकोण और गहरी मानवीय सोच वाला पति मिला था।

(इसके साथ ही मुझे याद आ रहा है एक विदेशी महिला का भारत-भ्रमण वृतांत। वे लिखती हैं। वे अपने पति और दूध-मुंहे बच्चे के साथ भारत भ्रमण पर आई हुई थी और एक पांच सितारा होटल में ठहरे हुए थे। एक पर्यटक स्थल को देखने जाने के लिए गाड़ी से निकलना था और रास्ता कुछ लंबा था। निकलते-निकलते उसे ध्यान में आया कि बच्चे के लिए दूध लेना भूल गई है। होटल के बिल का भुगतान करते हुए उसने बच्चे के लिए दूध मांगा और बच्चे की खाली बोतल बढ़ा दी। जल्दी ही बैरा एक सुंदर सी ट्रे में दूध  भरी बोतल और तीन अंकों वाला बड़ा सा बिल लेकर हाजिर हो गया। महिला ने भुगतान किया और निकल पड़े। कुछ देर में बच्चे ने दूध पी लिया। अब तक वे शहर से बाहर सून-सान सड़क पर आगे बढ़ रहे थे।  बच्चे ने रोना शुरू किया। उसे फिर से भूख लग गई थी। हजार उपाय करने के बाद भी बच्चे का रोना नहीं रुक रहा था, बल्कि बढ़ ही रहा था। महिला लिखती है, हार कर मैंने ड्राईवर को अपनी परेशानी बताई। अगले गाँव पर उसने गाड़ी रोकी और मेरे हाथ से बोतल लेकर एक झोंपड़ी में घुसा। कुछ ही देर बाद दूध से भरी बोतल लेकर बाहर निकला, उसके पीछे-पीछे एक युवक भी आया, एक युवती वहीं दरवाजे पर खड़ी रही। मुझे थोड़ी घिन-सी तो आई लेकिन मेरे पास कोई उपाय नहीं था। बोतल लेते-लेते मैंने सौ एक नोट बढ़ाया। लेकिन मैं विस्मित रह गई। उस युवक ने  कुछ भी लेने से साफ मना कर दिया, “बच्चे के दूध लेकर मुझे नर्क में नहीं जाना है”। तभी मैंने देखा झोंपड़ी से वही महिला आ रही थी। उसके हाथ में और एक बोतल है जिसमें दूध भरा था, सफर में बच्चे को फिर से भूख लग सकती है, इसे रख लीजिये। मैं कुछ समझ नहीं पाई। मुझसे रहा नहीं गया। उस महिला को अपनी बाहों में भर कर मैं रोने लगी।)

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मन का योग

(योग-दिवस पर)

बरसों तक कभी कंदराओं में कैद रहा योग, योगा बनकर आज घर-घर घूमता हुआ विश्व पटल पर पसर गया है। योग की महत्ता बहुत गहरी है, परंतु सतही समझ ने इसे शरीर के स्वास्थ्य तक ही सीमित कर इसे योगा बना दिया है। निःसंदेह इससे थोड़ा स्वास्थ्य तो सुधरा है, परंतु आधुनिक जीवनशैली की चकाचौंध से ग्रसित मन के भटकाव ने योग से मिलने वाले संपूर्ण लाभों से वंचित कर दिया है। मन की बढ़ती चंचलता ने मनुष्य को यंत्रवत बनाते हुए, दुःख के थाल परोस दिए हैं। आज समस्त साधनों और भीड़ से घिरा आदमी, स्वयं को इसीलिए अकेला महसूस कर रहा है क्योंकि उसका मन उसके साथ नहीं है, शरीर यहाँ और मन कहीं और, इस अलगाव को रोकने का नाम है योग। योग का शाब्दिक अर्थ ही है जोड़ यानि जुड़ना। परमात्मा से जुड़ने से पहले खुद से जुड़ना जरूरी है। खुद का परमात्मा से एकात्म हो जाना ही 'योग' है। कण-कण में परमात्मा का भोगी ही योगी होता है।

          मन की उपस्थिति के बिना संपन्न हुए कार्य में न तो गुणवत्ता होती है और न ही उपयोगिता की सुगंध। बालपन के बाद से ही मन की चंचलता बढ़ती जाती है। दैनिक कार्यों की समस्त गतिविधियों, प्रायः मन की गैर हाजिरी के साथ यंत्रवत ही होती रहती हैं और इसीलिए कार्य करने का फल और आनंद पूरी तरह से नसीब नहीं हो पाता। अधूरे मन से किया गया कार्य कभी फलदायी नहीं होता। चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक। दूषित कार्यों में रसिक मन का सानिध्य अधिक होता है।

          योग, मन और कृत्य को जोड़ने का काम करता है। योग के नाम पर केवल ऊँचा-नीचा, टेढ़ा-बाँका और हाँपू-धाँपू होते रहना, योग नहीं है। योग एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें यम और नियम को पालना पहली आवश्यकता है, आसन और प्राणायाम बाद की बात है इनकी प्रवीणता के पश्चात् प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि में योग की पूर्णता होती है। सामान्यजन के लिए सारी सीढ़ियाँ चढ़ पाना संभव नहीं है, विशेषकर भागमभाग वाली इस आधुनिक जीवनशैली में।

          यम यानी अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह को अपने दैनिक जीवन में साधना। अपने मन को इन मूल्यों की समझ के साथ व्यवहार में उतारना । नियम यानी शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान योगाभ्यास में शुचिता को साधे बगैर सीधे आसन और प्राणायाम पर जाने से, श्रम के कारण शरीर भले ही सुधर जाए, लेकिन व्यक्ति नहीं सुधर पाता। इनके बिना किये हुए योग में न सात्विकता है न आध्यात्मिकता, इनके बिना किया हुआ योग अपूर्ण ही है। इस प्रकार के योग से मिलता-जुलता योग तो भोर से लेकर संध्या के बाद तक, सभी स्त्री-पुरुष किया करते थे, जब वर्तमान में उपलब्ध साधनों सुख-सुविधाओं का नितांत अभाव था तब उनके श्रम और लगन ने उन्हें शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मीठी और गहरी नींद भी परोसी, जो आज ढूँढ़ने से भी नहीं मिल पाती है। यम-नियम के अभाव में योगाभ्यास कर शारीरिक बल और एकाग्रता हासिल कर दानव-आतंकवादी भी बना जा सकता है। योग के लिए आध्यात्मिकता की उपस्थिति आवश्यक है। यम-नियम से मुँह मोड़कर आपाधापी को धारण करने वाले लोगों के कारण सामाजिक स्वास्थ्य बिगड़ता हुआ, विक्षिप्तता की ओर जा रहा है। अर्थवान योग के लिए अपने अहंकारिता - बिगड़ैल मन का प्रक्षालन करना अत्यंत जरूरी है। निर्मल मन का साथ यदि बना रहे, तो प्रायः सभी व्याधियों से पार पाया जा सकता है। जीवन में सात्विकता की प्रधानता योग का आधार है। वासनामुक्त चित्त के साथ फल-रहित कर्म की डगर कंटकाकीर्ण नहीं होती।

          कदाचित, आसन और प्राणायाम में भी हमारा ध्यान-मन यानी विचार, हमारे साथ रहें तो लाभ प्राप्ति में शीघ्रता रहेगी जो उपयोगिता के संदर्भ में स्व के साथ सर्वोपयोगी भी होगा। प्राण-प्रण के साथ किया गया कार्य फलीभूत होता ही है। जो भी आसन किया जाए, पूरा मन उसके साथ जुड़ा होना चाहिए, तभी उस आसन से लाभ मिलना संभव है। आसन यानी स्थिति विशेष में बैठना, उपयुक्तता के साथ बैठने का कृत्य। मन सदैव उड़ता ही रहता है, उसे अपने पास बिठा लें, तो हर कृत्य में हम आनंद के आस-पास होंगे। प्राणायाम में श्वास को साधना होता है। श्वास ही प्राण है। प्रत्येक श्वास यदि मन के साये में बनी रहे, तो प्राण के आयाम का निखरना तय है। प्राणायाम के साथ प्रत्याहार और धारणा सधते हैं। इनके सध जाने से ध्यान की उरवर्कता बलवती होती है, जिसमें मन का कोई स्थान नहीं है। मन की शून्यता से ध्यान की गहनता उर्ध्वगामी होकर समाधि का द्वार खटखटाती है और परमात्मा से मिलन संभव हो जाता है।

          सामान्य जन के लिए इतनी लंबी और कठिन यात्रा तो संभव नहीं है, परंतु अपने प्रत्येक कृत्य के साथ मन को जोड़े रखना, संभव अवश्य है - यदि पूर्णता के साथ अभ्यास करें तो। यदि मन के साथ रह पाना संभव न हो, तो भी यह ध्यान रखना कारगर होगा कि इस समय मन-चित्त कहाँ पर है यानी हमेशा होश में रहने का यत्न करें। अभ्यास के रूप में एक गिलास पानी पीने या लघुशंका जैसी छोटी-सी घटना में ध्यानपूर्वक मन को साथ रहने के लिए मना लिया जाए और जब रोम-रोम से निर्दोष मन झाँकने लगे, तो फिर प्रेम करने जैसी महान घटना भी घटित हो सकती है। हो यह रहा है कि जहाँ हम होते हैं, वहाँ मन हमारे साथ नहीं होता और जहाँ मन होता है, वहाँ हम नहीं होते। शरीर और कृत्य के एकाकार मन से योग को प्राण वायु मिलती है। मन-रहित निर्जीव योग, उससे मिलने वाली संभावनाओं को हर लेता है। परिष्कृत मन की गहनता के साथ योग को आत्मसात करने पर संवेदना के पंख लग सकते हैं, करुणा की बाढ़ आ सकती है, ज्ञान-कर्म-भक्ति के भाव के साथ मनुष्यता ऊँचाइयाँ छू सकती है और इसके फलस्वरूप आनंद की वर्षा कर सकती है। इसीलिए अनेक दिवसों के साथ-इस अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर भी, हम साधें - मन का योग ।

-        महावीर योगानन्दी  पर आधारित

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संवेदना                                                      लघु कहानी - जो सिखाती है जीना

तूरीन मार्शल का एक बड़ा हट्टा-कट्टा अर्दली था। अर्दली का एक दुबला-पतला दोस्त था स्टीफन, वह भी मार्शल के घर पर ही नौकर था एक दिन मार्शल तूरीन खिड़की से झुक कर बाहर देख रहे थे उसी समय अर्दली कमरे में  आया और उनकी पीठ पर ज़ोर से घूंसा जमा बैठा। तूरीन गुस्से से पीछे मुड़े। जब अर्दली ने उन्हें देखा तो उसके होश हवास गुम हो गए। मालिक के कदमों पर गिर पड़ा, हाथ जोड़ कर माफी माँगते हुए बोला, “सर, सौ-सौ बार माफी चाहता हूँ, रात के अँधेरे में मुझे लगा कि स्टीफन खड़ा है। मुझे पता नहीं था कि आप खड़े हैं..........”। अर्दली को वाक्य पूरा नहीं करने दिया तूरीन ने, उसे जमीन से उठा कर बाँहों में भरते हुए मुस्कुरा कर बोल उठे, “अरे भाई! अगर स्टीफन भी होता तो भी इतनी ज़ोर से तो नहीं मारना चाहिए था। यह घूँसा उसकी पीठ पर पड़ा होता तो बेचारे की क्या हालत हुई होती”।

          अर्दली तो शर्म से पानी-पानी हुए जा रहा था। उसे लगा कि धरती फट कर उसे अपने अंदर समा क्यों नहीं लेती। उसकी हालत देख मार्शल ने उसके कंधे को दबा कर ठोड़ी ऊपर उठाते हुए कहा, अरे! अब मेरी पीठ भी तो सहलाओ जरा, कैसी झनझना रही है!”

(अग्निशिखा से)

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कारावास की कहानी-श्री अरविंद की जुबानी                                        धारावाहिक

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। इसके रोचक अंश हम जनवरी २०२१ से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसकी अठारहवीं किश्त है।)

(18)

शुरू में किसी ने भी गोसाईं को यह पता न लगने दिया कि सभी उनकी अभिसन्धि भाँप गये हैं। वे भी इतने नासमझ निकले कि बहुत दिन तक कुछ भी न समझ सके, वे समझते थे कि मैं खूब छिपे-छिपे पुलिस की मदद कर रहा हूँ। किन्तु कुछ दिन बाद यह हुकुम हुआ कि हमें अब और निर्जन कारावास में न रख एक साथ रखा जायेगा तब, उस नूतन व्यवस्था से रात दिन पारस्परिक मेल-जोल और बातचीत से कुछ भी ज्यादा दिन छिपा न रहा। उन्हीं दिनों दो एक लड़कों के साथ गोसाई का झगड़ा हुआ, उनकी बातों से और सब के अप्रीतिकर व्यवहार से गोसाई समझ गये कि उनकी अभिसन्धि किसी के लिए भी अज्ञात नहीं रही। जब गोसाई गवाही देते तो कुछ एक अंग्रेजी अखबारों में यह खबर छपती कि आसामी इस अप्रत्याशित घटना से चमत्कृत और उत्तेजित हुए। कहना न होगा, यह थी रिपोर्टरों की कोरी कल्पना बहुत दिन पहले ही सब जान गये थे कि इस तरह की गवाही दी जायेगी। यहाँ तक कि किस दिन कौन-सी साक्षी दी जायेगी उसका भी पता था। ऐसे समय एक आसामी गोसाई के पास जाकर बोले, "देखो भाई, अब और नहीं सहा जाता, मैं भी approver (मुखबिर) बनूंगा, तुम शमसुल आलम को कहो कि मेरी रिहाई की भी व्यवस्था करें।" गोसाईं राजी हो गये। कुछ दिन बाद उनसे कहा इस विषय में गवर्नमेंट की चिट्ठी आयी है इस आसामी के निवेदन के अनुकूल निर्णय (favourable consideration) की सम्भावना है। यह कह गोसाईं ने उन्हें उपेन आदि से कुछ इस तरह की आवश्यक बातें निकलवाने को कहा, जैसे- गुप्त समिति की शाखा कहाँ थी, कौन थे उसके नेता इत्यादि। नकली approver आमोदप्रिय एवं रसिक आदमी थे, उन्होंने उपेन्द्रनाथ के साथ परामर्श कर गोसाईं को कुछ एक कल्पित नाम जता दिये कि मद्रास में विश्वम्भर पिल्लै, सतारा में पुरुषोत्तम नाटेकर, बम्बई में प्रोफेसर भट्ट और बड़ौदा में कृष्णाजीराव भाऊ थे इस गुप्त समिति की शाखा के नेता। गोसाईं ने आनन्दित हो यह विश्वासयोग्य संवाद पुलिस को दे दिया। पुलिस ने भी मद्रास में कोना-कोना छान मारा, बहुत से छोटे-बड़े पिल्लै मिले, लेकिन एक भी पिल्लै विश्वम्भर या अर्द्ध विश्वम्भर तक न मिला, सतारा में पुरुषोत्तम नाटेकर भी अपना अस्तित्व घने अन्धकार में छिपाये रहे, बम्बई में एक प्रोफेसर भट्ट मिल गये, किन्तु वे थे निरीह राजभक्त सज्जन, उनके पीछे कोई गुप्त समिति होने की सम्भावना नहीं थी। फिर भी, गोसाईं ने गवाही देते समय, उपेन से पहले कभी सुनी बात के आधार पर कल्पना-राज्य के निवासी विश्वम्भर पिल्लै इत्यादि षड्यन्त्र के महारथियों की नॉर्टन के श्री चरणों में बलि चढ़ा अपनी अद्भुत prosecution theory (अभियोग सिद्धान्त) को पुष्ट किया। वीर कृष्णाजीराव भाऊ को लेकर पुलिस ने और एक रहस्य रचा। उन लोगों ने बागान से बड़ौदा के कृष्णाजीराव देशपाण्डे नाम किसी "घोष" द्वारा प्रेषित टेलीग्राम की नकल प्रस्तुत की। उस नाम का कोई आदमी था कि नहीं, बड़ौदावासियों को इसका कोई सन्धान नहीं मिला, लेकिन सत्यवादी गोसाई ने बड़ौदावासी कृष्णाजीराव भाऊ की बात कही है तो निश्चय • कृष्णाजीराव भाऊ और कृष्णाजीराव देशपाण्डे हैं एक ही व्यक्ति और कृष्णाजीराव देशपाण्डे हों या न हों, हमारे श्रद्धेय बन्धु केशवराव देशपाण्डे का नाम चिट्ठी-पत्री में मिला था। इसलिए निश्चय ही कृष्णाजीराव भाऊ और कृष्णाजीराव देशपाण्डे एक ही व्यक्ति हैं। इससे यह प्रमाणित हो गया कि केशवराव देशपाण्डे हैं गुप्त षड्यन्त्र के एक प्रधान पण्डा। ऐसे सब असाधारण अनुमानों पर प्रतिष्ठित थी नॉर्टन साहब की वह विख्यात theory (परिकल्पना)।

(क्रमश:, आगे अगले अंक में)

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सूतांजली, अगस्त द्वितीय 2026, आकर्षक घर की कुंजी

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