गुरुवार, 1 दिसंबर 2022

सूतांजली दिसम्बर 2022

सूतांजली

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वर्ष : 06 * अंक : 05                                                                दिसम्बर   * 2022

श्रद्धा, प्रसन्नता, अंतिम विजय में विश्वास,

ये चीजें हैं जो सहायता देती हैं और

प्रगति को ज्यादा आसान और तेज़ बनाती हैं।

तुम्हें जो अच्छी अनुभूतियाँ होती हैं उन्हें ज्यादा महत्व दो।

                                                                                                                        श्रीमाँ

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बड़ी-बड़ी छोटी-छोटी बातें                                               मेरे विचार  

(कई दशक पहले)

सेव क्या भाव?  20 रुपए

और नारंगी? 15 रुपये

मौसमी? 15 रुपये

सफेदा (चीकू)? 18 रुपए

अंगूर? 25 रुपये

सब 2-2 किलो तौल दो।

फल-वाला बहन जी को देखता रह गया। असमंजस में पड़ा फलवाले ने सब तौल दिये, बहन जी,  किलो के हिसाब से रुपए पकड़ा कर चल दी। फलवाला कुछ देर तक अंगुलियों के बीच रुपए को दबाये बहन जी की तरफ देखता रहा इस आशा से कि बहन जी शायद कुछ कहेंगी। लेकिन बहन जी तो थैला उठा कर जा चुकी थी। बात यह थी कि बहन जी की खरीद-दारी में कुछ के भाव किलो के थे तो कुछ के दर्जन के। बहन जी को इसकी जानकारी नहीं थी। यह जानकारी थी उसकी माँ-सासू माँ को जो अब बाजार जाने लायक नहीं रह गई थीं। धीरे-धीरे ऐसे बहनों की संख्या बढ़ती गई और दर्जन भी किलो में परिवर्तित हो गया। यह भी सही है कि कुछ समय बाद भाव भी किलो के हिसाब से ही व्यवस्थित हो गया।  परिवार के बुजुर्गों को इसकी जानकारी है। प्रारम्भ में यह परिवर्तन धीरे-धीरे ही हुआ होगा लेकिन फिर अचानक एक विस्फोट सा हुआ, (धमाका नहीं) – अचानक लगा कि सब जगह यही हो रहा है और आप भी उसका ही हिस्सा बन गए।

          घर पर मरम्मत के काम के लिए बालू, सीमेंट और स्टोन चिप्स चाहिए थे। घर के पास ही दुकान पर सब समान लिखा दिया और बताया कि सामान ऊपर छत पर चढ़ाना है। पूछने पर बताया कि छत तीन तल्ले पर है। उसके चेहरे पर असमंजस के भाव आ गए, कहा, ‘आपका तो मकान पुराना है चार तल्ले के बराबर की ऊंचाई है। मैंने विरोध किया और बताया कि कोरोना के बाद भी छत का काम हुआ था और तब भी इसको लेकर कोई बात ही नहीं थी। लेकिन मोंटू सहमत होता नहीं दिख रहा था, उसने पेन छोड़ दिया और एक निःश्वास छोड़ता हुआ बोला, ‘समय बदल गया है। उसने पैसे नहीं लिए, बोला मजूरा (मजदूर) को भेज कर पता लगाने के बाद ही हिसाब करेगा, पैसे माल पहुँचने के बाद ले लेगा। मैं समझ नहीं पाया कि यह क्या हो रहा है। खैर, पूरा सामान लिखवा कर वापस चला आया। सामान दूसरे दिन सुबह आना था।

          सुबह की सैर पर था कि फोन की घंटी बजी, पता चला की मजदूर समान लेकर आ गए हैं। उधर से मजदूर की आवाज आई, ‘आपनादेर बाड़ी तो तीन तौलार, छत तो चार तौलाते। (आपका मकान तो तीन तल्ले का है और छत चार तल्ले पर है)। वह स्थानीय भाषा बंगला में बोल रहा था। मैं बात तुरंत समझ गया। मैंने बंगला में जवाब न देकर हिन्दी में बोला, ‘नहीं मेरा मकान दो तल्ले का है और छत तीन तल्ले पर है।  माल चढ़ाने के पहले खुद जा कर देख लो फिर चढ़ाना। सैर से लौट कर आया तब तक पूरा माल तीन तल्ले पर चढ़ चुका था। उसने मेरी बात मान ली थी। राहत की सांस ली।

          यहाँ यह बताता चलूँ कि यह पूरा खेल भाषा का हुआ। बात यह है कि अँग्रेजी में ग्राउंड फ्लोर के बाद 1-2-3 फ्लोर शुरू होते हैं। हमारी हिन्दी में ग्राउंड फ्लोर का कोई, बोलचाल का शब्द नहीं है लेकिन हिन्दी में भी नीचे के तल्ले को छोड़ कर ही 1-2-3 तल्ले शुरू होते हैं। भारत की अन्य भाषा में क्या है मुझे जानकारी नहीं लेकिन बंगला में ग्राउंड फ्लोर एक तल्ला है, यानि सब मकानों के ऊंचाई एक-एक तल्ला बढ़ जाती है। विचार करने पर मुझे लगा कि कहीं पर मजूरी जोड़ते समय इस बंगला के हिसाब से ऊंचाई जोड़ कर पैसे लिए और दिये गए। किसी ने विरोध नहीं किया और फिर एक तल्ले की मजूरी फाऊ में मजदूरों को मिलने लगी। किसी ने विरोध किया तो मान लिया नहीं तो .....  क्या पता कल मजदूर इस बात पर अड़ जाए और मजदूरी एक तल्ले की ज्यादा देनी पड़े।

          ये तो हमारी दिनचर्या की छोटी-छोटी बातें हैं जो हमारे देखते-देखते बदल जाती हैं। पहले कुछ लोग करते हैं और फिर देखा-देखी सब वैसे ही हो जाते हैं। हमारा भी इसी प्रकार क्रमिक विकास हुआ। वैज्ञानिक खोज के अनुसार बंदर का विकास होकर मानव बना। लेकिन एक बार यह विकास हो जाने के बाद अब कोई बंदर मानव नहीं बन रहा है और न ही कोई मानव बंदर। यानी विकास होता है पतन नहीं। और ऐसे क्रमिक विकास का विस्फोट सा होता है, यानी पहले धीरे-धीरे और फिर अचानक सर्वत्र फैल जाता है।

          विज्ञान यही मानता है कि ब्रह्मांड में सब परिवर्तन – स्वरूप हो या भाव या चिंतन – ऐसे ही होता है। विश्व के किसी एक कोने में अचानक कुछ परिवर्तन होता है, धीरे-धीरे वे परिवर्तन बढ़ते जाते हैं और जब एक निश्चित प्रतिशत या मात्रा में यह परिवर्तन हो जाता है तब अचानक एक विस्फोट सा होता है और सारा विश्व उसकी चपेट में आ जाता है। इसका इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि ये परिवर्तन अच्छे हैं या बुरे, सात्विक हैं या तामसिक, दैवी हैं आसुरी – इसका सरोकार होता है केवल संख्या से, अनुपात से।

          शायद यही कारण है कि सामूहिकता पर ज़ोर दिया जाता है – संख्या बल बढ़ाने के लिए। लेकिन इस संख्या का प्रभाव तभी होता है जब सब प्रक्रिया से जुड़ें, केवल उपस्थित होना नाकाफी है। दुर्जन मन से जुड़ते हैं और सज्जनों में अलगाव रहता है, मन का जुड़ाव नहीं होता है। राम-कृष्ण की कथा में शायद आपने पढ़ा-सुना होगा कि जब भी अवतार आए कभी अकेले नहीं आए, अपने सभी गणों को उन्होंने भेजा। क्यों? क्या वे समर्थ नहीं थे? कारण केवल एक था दुर्भावना को कमजोर करना और सद्भावना को सुदृड़ करना। अगर भावना पवित्र हो जाए तब फिर अंजाम देना सहज होता है और उसका प्रभाव भी लंबे समय तक रहता है।

          आज की वर्तमान घटना अमेरिक-रूस-यूक्रेन और कुछ ही वर्ष पहले की घटना अमेरिका-उत्तर कोरिया के घटनाक्रम पर दृष्टिपात करें। रूस-यूक्रेन में बम-गोली-मिसाइल, मौतें-विध्वंस, जान-माल की हानि के बाद भी कोई परिणाम नहीं निकला है, और अमेरिका-उत्तर कोरिया बिना एक गोली छोड़े, बिना कोई बम-मिसाइल दागे, बिना किसी जान-माल की हानि के सब कुछ सहजता से सम्पन्न हो गया। आज की, रूस-यूक्रेन की, घटना की हम लंबी चर्चा करते हैं, अनवरत। अमेरिका-उत्तर कोरिया को हमने नजरंदाज किया। चर्चा करनी ही है तो शांति और अहिंसा की कीजिये, अशांति और हिंसा की नहीं। जिसकी चर्चा ज्यादा होगी, उसी की बढ़ोतरी होगी।

          हमें खुद को विचार करना है हम क्या चाहते हैं, कैसे चाहते हैं और उसके लिए क्या कर रहे हैं। यह कभी मत सोचिए कि आप अकेले क्या कर सकते हैं, आप न तो अकेले हैं और न ही कमजोर। एक अकेले में भीड़ से ज्यादा ताकत होती है।

          सकारत्मकता में विश्व को बदलने की क्षमता है। इन बड़ी-बड़ी छोटी-छोटी बातों में आणुविक ऊर्जा होती है, इन्हें नजरंदाज मत कीजिये। इनसे जुड़िये। लोग अपने आप जुड़ेंगे। दुनिया बदल जाएगी।

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परमात्मा यानी क्या ?                                                        मैंने पढ़ा

परमात्मा - जो समझ में नहीं आता है, उसी का नाम परमात्मा है। जो समझ में आ जाता है, उसका नाम संसार है। जो समझ में नहीं आता, वह भी है। समझ पर ही अस्तित्व की परिसमाप्ति नहीं है। समझ के पार भी अस्तित्व फैला हुआ है, इस बात की उद्घोषणा ही परमात्मा है। परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं है।

          इसलिए जो परमात्मा को व्यक्ति मानकर खोजने चलेंगे, व्यर्थ ही भटकेंगे, कहीं न पहुंचेंगे। परमात्मा तो अज्ञात का नाम है। अज्ञात का ही नहीं वरन अज्ञेय का। जिसे जानो तो जान न पाओगे, जिसे जितना जानने की चेष्टा करोगे, उतना ही पाओगे कि अनजाना हो गया। लेकिन फिर भी एक और द्वार से परमात्मा में प्रवेश होता है, उस द्वार का नाम ही प्रेम है। जानने से नहीं जाना जाता, लेकिन प्रीति से जाना जाता है, प्रेम से जाना जाता है।

          जानना ही अगर जानने का एकमात्र ढंग होता तो परमात्मा से संबंधित होने का कोई उपाय न था लेकिन एक और ढंग भी है। बुद्धि ही नहीं है तुम्हारे भीतर सब कुछ, हृदय का भी स्मरण करो।  सोच-विचार ही सब कुछ नहीं है तुम्हारे भीतर, भाव की आर्द्रता को भी थोड़ा अनुभव करो। आँखें सिर्फ कंकड़-पत्थर ही नहीं देखती है, उनसे प्रीति के आंसू भी झरते हैं। अगर विचार पर ही ठहरे रहे तो परमात्मा नहीं है। इसलिए नहीं कि परमात्मा नहीं है, बल्कि इसलिए कि विचार की क्षमता नहीं है परमात्मा को जानना।

          बुद्धि पदार्थ को जान सकती है परमात्मा को नहीं। हृदय परमात्मा को जान सकता है, पदार्थ को नहीं। कान संगीत सुन सकते हैं, रोशनी नहीं देख सकते। आँखें रोशनी देख सकती हैं, गंध का अनुभव नहीं कर सकते। प्रत्येक अनुभूति का अपना द्वार है और प्रत्येक अनुभूति केवल अपने ही द्वार से उपलब्ध होती है। 

          इस जीवन का सब कुछ तो हम विचार से सुलझा लेते हैं। और इसलिए एक भ्रांति पैदा होती है कि जब विचार से सब कुछ सुलझ जाता है, गणित सुलझ जाता है, भाषा सुलझ जाती है, तर्क सुलझ जाता है, दर्शन सुलझ जाता है, भूगोल, इतिहास, राजनीति, विज्ञान सब बुद्धि से सुलझ जाता है  - तो एक आशा बंधती है कि इस बुद्धि से हम परमात्मा को भी सुलझा लें। और इसी आशा में उपद्रव हो जाता है। इसी आशा में हमारी निराशा के बीज हैं। इसी आशा में हमारी विफलता है। और विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक तुम्हें बुद्धि की शिक्षा दी जाती है। इस जगत में कहीं भी तो कोई स्थान नहीं है जहां हृदय का प्रशिक्षण होता है। इसलिए मैं कहता हूं, यह जगत मंदिरों, मस्जिदों, गिरजा घरों  से भरा है, फिर भी ये सब इस जगत से समाप्त हो गये हैं। क्योंकि ये हैं वह जगह, जहां हृदय का प्रशिक्षण मिलना चाहिए।

          तुम्हारे मंदिर भी बुद्धि से भर गये हैं। वे भी पाठशालाएं हैं। वहां धर्मशास्त्र समझाया जा रहा है। तुम्हारे मंदिर भी मस्तिष्क के ही आवास हो गये हैं। अब वहां हृदय नहीं नाचता, अब वहां प्रेम की बांसुरी नहीं बजती, अब तो वहां भी तर्क के जाल फैलाये जा रहे हैं। हिन्दू है, वह मुसलमान के खण्डन में लगा है, मुसलमान है, वह हिन्दू के खण्डन में लगा है। आर्यसमाजी सनातनी का खण्डन कर रहा है, सनातनी आर्यसमाजी का खण्डन कर रहा है। मंदिरों में भी खण्डन-मण्डन हो रहा है। प्रीति का फूल खिले तो खिले कहाँ? मस्जिदों में भी प्रेम की शराब नहीं ढाली जा रही है, वहाँ भी तर्क और तर्क के सहारे ही जितना दूर तक जाया जा सकता है, उतनी दूर तक जाने की कोशिश की जा रही है।

          तर्क तो ऐसा जैसे अंधे के हाथ में लकड़ी। थोड़ा टटोल लेता है। और अंधे के हाथ में लकड़ी फिर भी थोड़ा काम आती है। एकदम व्यर्थ है, ऐसा मैंने कहा भी नहीं, ऐसा मैं कहूंगा भी नहीं उसकी अपनी सार्थकता है। अंधा आदमी है तो लकड़ी से टटोलकर अपने घर आ जाता है, दरवाजा खोज लेता है, अपने जूते तलाश कर लेता है, टकराता नहीं। मगर अंधे की लकड़ी उसकी आंख नहीं बनती, और न आँख बन सकती है। और अगर आंख मिल जाए तो लकड़ी को तत्क्षण छोड़ देना होगा। फिर कौन चिन्ता करता है लकड़ी की!

          इसलिए जिन्होंने हृदय को थोड़ा खुलने का अवसर दिया, हृदय की कली को फूल बनने दिया, उन्होंने फिर तर्क की बकवास छोड़ दी। फिर वे परमात्मा में जीने लगे। वे परमात्मा के  लिए प्रमाण नहीं देते फिर वे स्वयं परमात्मा के प्रमाण हो जाते हैं। उनका उठना, उनका बैठना, उनका बोलना --सब परमात्मा की अभिव्यक्ति हो जाती है उनका सारा जीवन परमात्मा का एक गीत हो जाता है। उनके जीवन से एक सुवास उठती है।

          तुम्हारे जीवन में भी वैसी सुवास उठ सकती है। हकदार तुम भी हो। उतने ही मालिक हो तुम, जितना कोई बुद्ध, जितना कोई कृष्ण, जितना कोई क्राइस्ट। उतने ही मालिक हो तुम, जितने महावीर, जितने मुहम्मद, जितनी मीरा । तुम्हारी मिल्कियत जरा भी कम नहीं है। मगर, अगर तुम दीवाल से निकलने की चेष्टा करोगे और न निकल पाओ, तो अपने भाग्य को कसूर मत देना। दरवाजा है तो दीवाल से निकलने की चेष्टा क्यों कर रहे हो? क्यों दीवाल पर सिर मार रहे हो? और सिर से जितने भी काम होते हैं, बस वे दीवाल से सिर मारने जैसे हैं।

          तुम्हारे भीतर एक और भी अंतरंग जगत है। तुम्हारे भीतर भाव का भी एक लोक है। बहुत कोमल, बहुत नाजुक। और चूंकि कोमल है, नाजुक है, इसलिए बहुत छिपाकर रखा गया है। जितनी बहुमूल्य चीज होती है, उतना ही तो गहरा हम खोदकर जमीन में उसे गाड़ देते हैं! कि चोरी न हो जाए। बुद्धि तो ऊपर-ऊपर है, क्योंकि कचरा है। हृदय बहुत गहरे में है, क्योंकि वहीं तुम्हारी संपदा है, वहीं  तुम्हारी समाधि छिपी है, और वहीं तुम्हारे समाधान हैं। बुद्धि कामचलाऊ है; बाजारू है, सस्ती है। हृदय तुम्हारे जीवन का मूल आधार है।

ओशो

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यू ट्यूब पर सुनें : à

https://youtu.be/ugAohn2uySU


मंगलवार, 1 नवंबर 2022

सूतांजली नवंबर 2022

 सूतांजली

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वर्ष : 06 * अंक : 04                                                                नवंबर  * 2022

गलत आस्थाओं से बड़ा 

कोई दैत्य नहीं हो सकता, और

झूठी मर्यादाएं

सबसे ज्यादा भयानक होती हैं

नित्शे

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अस्तित्व                                                                   मेरे विचार

हे मेरे आराध्य, मैं बहुत परेशान हूँ, दुखी हूँ, मेरे पास लोगों के उत्तर नहीं हैं। सब पूछते हैं कि अगर ईश्वर है तो वह कहाँ है? दिखता क्यों नहीं? आता क्यों नहीं? सब इसे मेरी कपोल कल्पना बताते हैं, मेरा ही नहीं तुम्हारा भी मज़ाक उड़ते हैं। एक बार- सिर्फ एक बार तो आ जाओ, सब को दिखा दो कि हाँ तुम हो, तुम दिखते हो, तुम आते हो। कहते हैं कि भगवान भक्तों के तारणहार हैं, भक्तों की सुनते हैं, भगवान से भगवान के भक्त का स्थान  ऊंचा है, तब आ जाओ, एक बार आ जाओ.......

तभी एक मृदुल-कोमल स्वर प्रस्फुटित हुआ, मैं कहाँ नहीं हूँ, कहाँ नहीं दिखता हूँ, कहाँ नहीं आता हूँ? अब अगर देखते हुए भी कहो कि नहीं दिख रहे हो, तो इसमें मेरा क्या दोष?

सेव के बीज में क्या तुम्हें सेव का पेड़ दिखता है? वही मैं हूँ,

अणु और परमाणु दिखते हैं? उसकी ताकत मैं ही तो हूँ।

रेडियो की तरंगों में तैरने वाले शब्द दिखते हैं? वे मैं ही तो हूँ।

पानी में छिपी बिजली कौन है? मैं ही तो हूँ।

यही नहीं बादलों में छिपी गर्जना और बिजली कौन है? मैं ही तो हूँ।

तुम्हारी रसोई में जलने वाली गैस का ताप भी मैं ही तो हूँ।

तुम भले ही मुझे सीधे-सीधे नहीं देख रहे हो लेकिन मेरे हर कार्य को होते हुए तो देख ही रहे हो। तुम मुझे मंदिर, गिरजा, गुरु-द्वारा, चर्च, मस्जिद वगैरह में देख रहे हो, लेकिन मैं तो वहाँ हूँ ही नहीं। तु म मुझे वहाँ देखो जहाँ मैं हूँ। तुम मुझे उन पाँच तत्वों में खोजो, जो इस सृष्टि के अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं। ये हैं:

१. धरती माँ, जिसने इस सृष्टि के निर्माण के लिए सब कुछ दिया और सब सह लेती है,

२. जल, जो हर जीव-जानवर-पेड़ के जड़ में जाकर उन्हें आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है,

३. सूर्य, अपनी गरमी से प्राणी मात्र को विकसित, अंकुरित और परिपक्व करता है,

४. वायु, जीवन के लिए आवश्यक श्वास प्रदान करता है, और

५. आकाश, इस सृष्टि को बनाये रखता है।  

मैं हर किसी को, हर जगह, हर समय बिना किसी भेद भाव के मिलता हूँ। अतः मेरे अस्तित्व को समझ ही नहीं पाते।

अगर मैं हर किसी में हूँ तब तुम मुझे अलग से बाहर क्यों देखना चाहते हो? क्या तुम इतना भी नहीं समझते कि अगर मैं सब में से बाहर आ जाऊँ तो यह पूरी सृष्टि, तुम्हारे समेत नष्ट हो जाएगी?  तब मुझे कौन देखेगा? मुझे देखने के लिए कौन बचेगा?

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प्रकृति की शक्तियाँ                                                       मेरे विचार

हम इस धरा को स्थिर मानते हैं। यह कहा भी जाता है कि धरती की तरह स्थिर रहो, गंभीर रहो। जिस धरातल पर हम खड़े है, बैठे हैं, चल रहे हैं एवं दिन भर अनेक अन्य कार्य कर रहे हैं अगर उसमें जरा भी गति आ जाए तो क्या हम वह सब सुचारु रूप से कर पाएंगे जिन्हें हम निरंतर कर रहे हैं? चलती रेल में, गाड़ी में, हवाई जहाज में, घूमते स्टेज पर हमारा संतुलन बिगड़ जाएगा। हमारा ध्यान-एकाग्रता तिरोहित हो जाएगी।  लेकिन क्या यह धरा स्थिर है? इसकी गति है 1000 मील प्रति घंटा यानी 450 मीटर प्रति सेकेंड। यह तो केवल एक गति है, अपनी धुरी पर घूमने की। इसके अलावा यह सूर्य के भी चारों ओर चक्कर लगाती रहती है, अनवरत। लेकिन इसके बावजूद हमें इसका भान तक नहीं होता। क्यों? इसका कारण है धरती की विशालता। इसकी इस विशालता के कारण हमें यह धरती स्थिर प्रतीत होती है।  हमारे अपने आकार और धरा के आकार की कोई तुलना नहीं की जा सकती और इसी सापेक्षता के कारण हमें इसकी गति का अनुभव नहीं होता।

          कहा जाता है कि प्रकृति की शक्तियाँ अन्धी और उग्र होती हैं। लेकिन बात ऐसी बिलकुल नहीं है। हम अपने सापेक्ष अनुपातों के आधार पर 'प्रकृति के बारे में ऐसा निर्णय कर बैठता है। ज़रा ठहरो, एक उदाहरण लें। जब भूकम्प आता है तो बहुत से टापू पानी में डूब जाते हैं और हजारों आदमी मर जाते हैं। हम कहते हैं: “यह प्रकृति दैत्य है।" मानवीय दृष्टि से यह 'प्रकृति' दैत्य है। उसने किया क्या? वह एक विभीषिका ले आयी। लेकिन ज़रा देखो, ज़रा कूदने या दौड़ने या ऐसा ही कुछ करने में जब हमें अच्छी चोट लग जाये तो हम काले, नीले हो उठते हैं। हमारे कोषाणुओं के लिए यह ऐसी ही चीज़ है जैसे भूकम्प। हम बहुत सारे कोषाणुओं को नष्ट कर देते हैं। यह अनुपात का प्रश्न है। हमारे लिए, हमारी छोटी-सी चेतना के लिए, बहुत ही छोटी चेतना के लिए यह बहुत भयानक चीज़ मालूम होती है, लेकिन आख़िर तो यह धरती पर (विश्व में भी नहीं), किसी जगह अस्त-व्यस्तता ही है। हम केवल धरती की बात कर रहे हैं। यह क्या है? कुछ भी नहीं, विश्व के अन्दर एक ज़रा सा खिलौना। और अगर हम इस विश्व की बात करें तो लोकों का गायब हो जाना भी क्या है? - बस, जरा-सी अस्त व्यस्तता। यह कुछ भी नहीं है। अगर हम अपनी चेतना को जरा सा विकसित करें तब बात तुरंत समझ आ जाती है कि ये प्राकृतिक आपदाएँ धरती की दृष्टिकोण से ही, विश्व दृष्टिकोण न लें तो भी, नगण्य सी हैं, अति साधारण हैं। ठीक ऐसी ही जैसे हाथी पर एक मक्खी बैठ जाए तो हाथी को इसका भान तक नहीं होता। अगर हो सके तो हमें अपनी चेतना को विस्तृत बनाना चाहिये। 

         एक व्यक्ति था जो अपनी चेतना को विस्तृत करना चाहता था। उसने एक तरकीब खोज निकाली थी। वह रात को खुले में लेट जाता और तारों को देखा करता था, उनके साथ तादात्म्य करने की कोशिश करता था और विशाल जगत् की गहराई में चला जाता था और इस तरह अनुपात का भाव पूरी तरह खो देता था। वह धरती और उसकी सभी छोटी-मोटी चीज़ों की व्यवस्था भूल कर आकाश के जैसा विशाल बन जाता था - हम इसे विश्व के जैसा विशाल नहीं कह सकते क्योंकि हम विश्व के एक छोटे-से टुकड़े को ही देखते हैं, लेकिन वह तारों भरे आकाश जैसा विशाल बन जाता था और तब, सामयिक रूप में सभी छोटी-मोटी अ-पवित्रताएँ झड़ जाती हैं और तब हम चीज़ों को एक बड़े पैमाने पर समझ सकते हैं। यह एक बड़ी अच्छी दिमागी कसरत है।

          ये बहुत अच्छी कसरत है, आवश्यक भी। अपनी तुच्छता का अनुभव करने के लिए, अपनी चेतना को विस्तृत करने के लिए। दोनों में तुलना करने की कोशिश करो तब हम देखेंगे - हम एक सड़क पर चल रहे हैं। चींटियों की एक सेना एक बिल से दूसरे बिल की ओर जा रही है (हम किसी से बातें कर रहे हों और नीचे नहीं देखते); बड़ी लापरवाही से एक पैर रखते हैं, फिर दूसरा, और हम जाने बिना ही सैकड़ों चींटियों को मार डालते हैं। अगर हम चींटी होते तो कहते: “क्या ही दुष्ट और पाशविक शक्ति है यह!" हम तो सिर्फ़ चल रहे हैं, धीरे-धीरे, बेखबर, हमने ध्यान नहीं दिया। ऐसी सत्ताएँ भी हैं जिनके लिए हम केवल छोटी-छोटी चींटियों के समान हैं। वे रखती हैं, पहला कदम और फिर दूसरा, और हजारों आदमी मर जाते हैं। उन्हें इसकी ख़बर तक नहीं होती! उन्होंने यह जान-बूझकर नहीं किया है। वे बस चल रही थीं। बस, इतना ही।

          जब हम लड़ते हैं तो इसका मतलब है युद्ध। छोटे युद्ध होते हैं और बड़े युद्ध होते हैं। धरती पर मनुष्यों का यह युद्ध है क्या? अगर उन सत्ताओं की दृष्टि से देखा जाये जिनके लिए मनुष्य चींटी से बढ़ कर नहीं हैं...। जब हम चींटियों का युद्ध देखते हैं तो वह हमें बिलकुल स्वाभाविक लगता है! हम कह सकते हैं, “देखो, चीटियाँ लड़ रही हैं।"  तो विश्व की विशाल शक्तियों के लिए धरती पर युद्ध करते हुए मनुष्य लड़ती हुई चीटियों जैसे हैं, यह कुछ भी नहीं है। हमें चीज़ों का मूल्यांकन मानवीय चेतना के माप से नहीं करना चाहिये...। मनुष्य के लिए प्रकृति विकराल वस्तु है। । वह अत्यन्त विकट है। सभी शक्तियाँ उसकी सेवा में हैं, सभी क्रियाओं की सृष्टि वही करती है। और हम बस उतना ही जानते हैं जो इस धरती पर हो रहा है! हम  प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, एक प्रकार के अनुमानात्मक ज्ञान से यह जानते हैं कि बाक़ी विश्व में क्या हो रहा है। ये मानवीय चेतना के अनुपात में विकट और विकराल शक्तियों की क्रीड़ाएँ और संघर्ष हैं। ये ऐसी चीजें हैं जो मानवीय अवधि की तुलना में अनन्त काल तक रहती हैं। तो ये काल में विशाल हैं, देश में विशाल हैं और मानवीय चेतना के लिए ये लगभग अबोधगम्य हैं। लेकिन इन शक्तियों के लिए मानवीय आकार और गतियों का सचमुच वही अनुपात है (शायद उससे भी कम) जो हमारे लिए चींटियों के झुण्ड का है।

          उदाहरण के लिए, आँधी को लो जो चला करती है। वैज्ञानिक हमसे कहते हैं, “आँधियाँ प्रकृति की शक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं और अमुक-अमुक घटनाओं का परिणाम हैं।” वे गरमी और ठण्ड, ऊँचे और नीचे आदि की बात करेंगे और हमसे कहेंगे: “आँधी चलने का यह कारण है; ये वातावरण में पैदा होने वाली हवा की लहरें हैं।" लेकिन बात ऐसी नहीं है। उनके पीछे सत्ताएँ होती हैं। वे इतनी बड़ी हैं कि उनका रूप हमसे बच निकलता है। यह ऐसा ही होगा जैसे किसी चींटी से कहा जाये कि मनुष्य के रूप का वर्णन करे - वह न कर पायेगी, कर पायेगी क्या? वह अधिक-से-अधिक छोटी उँगली की छोटी-सी पोर को देखती है और पैर पर चलती है—यह एक लम्बी यात्रा है और वह यह न जान पायेगी कि मनुष्य का आकार कैसा होगा। तो यहाँ भी वही चीज़ है। ये शक्तियाँ जो आँधी, मेह, भूकम्प आदि ले आती हैं, अभिव्यक्तियाँ हैं - चाहो तो संकेत कह लो इन्हें—इस प्रकार की सत्ताओं की गतियों की अभिव्यक्तियाँ हैं जो भयावह रूप से भीमकाय हैं। हम मुश्किल से ही उनके पैर का अन्तिम सिरा देखते हैं और उनके विस्तार का अन्दाज़ा नहीं लगा सकते।

          हम जैसे-जैसे अपनी चेतना का विकास करते जाते हैं हमारा दृष्टिकोण भी विशाल होता जाता है। अति महत्वपूर्ण घटनाएँ भी नगण्य और सूक्ष्म प्रतीत होने लगती हैं। हमारा प्रकृति से, उन सत्ताओं से साक्षात्कार होने लगता है, दृष्टि विशाल हो जाती है।

(श्रीमाँ के उत्तरों पर आधारित)

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रहम के देवता                 

ईश्वर प्रेम, आस्था और विश्वास का तालमेल है। यह रहम है, रहमान है। दीनबंधु है, दयानिधि है। अगली बार कभी मन में ईश्वर की तलाश का प्रश्न उभरे तो किसी को माफ करके  देखिएगा......आपको अपनी रहम में ही उस खुदा के दीदार होंगे। किसी रोते हुए के चेहरे पर हंसी की रंगोली बनाकर निहारिए, यक्नीनन जगदीश्वर आपकी आँखों के सामने होंगे। उनका कोई आकार नहीं है। वे कण-कण में व्याप्त हैं.... हर दुखियारे की हंसी में, प्रेम की तलाश में भटकते हृदयों में, स्वयं के पूर्ण होने की यात्रा कर रहे साधकों में, संगीत की झंकार में, गायन की मिठास में...... ।

          एक धर्माचार्य कहते थे – सुहृद के आत्म-बल में ईश्वर विराजते हैं, क्योंकि सद्गुणों के, सतप्रवृत्तियों के, श्रेष्ठताओं के समुच्चय हैं। यह बात राम और कृष्ण के रूप में प्रमाणित भी हो चुकी है। मनुष्य योनि में जन्मे श्री राम और श्री कृष्ण ने अपने गुणों को उस ऊंचाई तक विकसित किया, मानवता की इस तरह से रक्षा की कि ईश्वर माने गए.....सो आप दृढ़ हों तो खुद को भी ईश्वरत्व की ओर ले जा सकते हैं।

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शनिवार, 1 अक्टूबर 2022

सूतांजली अक्तूबर 2022

 सूतांजली

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वर्ष : 06 * अंक : 03                                                                अक्तूबर  * 2022

मुट्ठीभर संकल्पवान लोग,

जिनकी अपने लक्ष्य में दृड़ आस्था है,

इतिहास की धारा बदल सकते हैं

महात्मा गांधी

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पहली सीढ़ी...... शिक्षा का दायित्व....... वसंत                        मैंने पढ़ा

अभी-अभी दो कहानियाँ पढ़ीं, नवनीत में। दो नहीं बल्कि तीन। तीनों को एक साथ मिला कर पढ़ा, तीनों को एक दूसरे के साथ जोड़ कर पढ़ा। बहुत कुछ कहती हैं ये कहानियाँ-संस्मरण-घटनाएँ। मुझे लगता है आप भी समझ जाएंगे।

         पहली सीढ़ी

“एक राजकुमार जेन गुरु के पास शिक्षा प्राप्त करने पहुंचा और उन्हें प्रणाम कर बैठ गया और बोला - 'मुझे ज्ञान चाहिए और तुरंत' गुरु ने कहा- 'ठीक है कुछ प्रबंध करते हैं। पूछने पर पता चला कि राजकुमार को एक ही काम अच्छी तरह करना आता है और वह है शतरंज खेलना। जेन गुरू राजकुमार और अपने एक शिष्य, जिसे शतरंज का थोड़ा-बहुत ज्ञान था, के बीच एक बाजी का प्रस्ताव रखते हैं। शर्त यह होगी कि जो हारेगा उसका गला काट दिया जायेगा। खेल शुरू हुआ। राजकुमार शुरूआत से ही अपने प्रतिद्वंद्वी पर हावी हो गया। पर थोड़ी ही देर बाद उसके मन में विचार आया कि मेरे कारण इस बेचारे शिष्य को अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा। उसे एक तरकीब सूझी कि वह जान-बूझकर गलत चालें चलेगा। लेकिन खराब खेलना उसने सीखा नहीं था। अतः खराब खेलने के लिए उसे बहुत एकाग्रता की ज़रूरत पड़ी। उस एकाग्रता के कारण वह पसीने से तर-बतर हो गया। जेन गुरु ने यह सब देखा तो खेल रुकवा दिया और बोले 'आज का पाठ समाप्त हुआ। आज तुमने दो महत्त्वपूर्ण बातें सीखीं - करुणा और एकाग्रता - यह शिक्षा की पहली सीढ़ी है।”

शिक्षा एक अमोघ शक्ति है जिसका प्रयोग विद्यार्थी अपनी क्षमता के अनुसार करता है। अतः उसके हाथ को मजबूत करने के पहले उसको साधना आवश्यक होता है, अन्यथा उस शिक्षा का प्रयोग निर्माण के बदले  विध्वंस के लिए होता है। हमने योग को योगा बना कर अधूरे ज्ञान को पूरे विश्व में फैला दिया। योग (अष्टांग योग) के आठ चरण हैं। पहला चरण है यम और दूसरा नियम। यम यानि अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। नियम यानि शौच (शुद्धता), संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान।  इन दो के बाद आता है तीसरा आसन और चौथा प्राणायाम। लेकिन इसके प्रथम दो मूल पाठ यम-नियम को छोड़ हम सीधे तीसरे और चौथे अध्याय आसन-प्राणायाम पर पहुँच गए।

यम-नियम से मरहूम विद्यार्थी को हमने सीधे आसन और प्राणायाम का पाठ पढ़ाना प्रारम्भ  कर दिया। फलस्वरूप शिक्षार्थी इस शक्ति का प्रयोग विध्वंस के लिए भी कर रहे हैं।  

अभी अपने पढ़ा जेन गुरु ने शिक्षा की शुरुआत कैसे की। और अब:

         शिक्षा का दायित्व

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद एक नाज़ी यातना शिविर में एक पत्र पाया गया था। पत्र में लिखा था, 'प्रिय अध्यापकों, मैं यातना-शिविर में बच जाने वालों में से एक हूँ। मेरी आंखों ने वह देखा है जो किसी को नहीं देखना चाहिए। पढ़े-लिखे इंजीनियरों ने गैस चैम्बर बनाये, उच्च शिक्षा प्राप्त डॉक्टरों ने बच्चों को ज़हर दिया, नवजात शिशुओं को मारने वाली नर्सें ही थीं। औरतों-बच्चों को मारने वाले स्नातक और स्नातकोत्तर थे। इसलिए मैं शिक्षा पर संदेह करता हूं। मेरी प्रार्थना है, अपने विद्यार्थियों को मनुष्य बनना सिखाइए। आपके प्रयास पढ़े-लिखे राक्षसों के निर्माण के लिए नहीं होने चाहिए। शिक्षा तभी महत्वपूर्ण है जब वह हमारे बच्चों को बेहतर इंसान बनाये।

शिक्षा के साथ-साथ शिक्षा का दायित्व बताना आवश्यक है। केवल अधिकार ही नहीं कर्तव्य का पाठ भी पढ़ना जरूरी है। क्या आप एटम बम बनाने की विधि हर किसी को बताएँगे? पश्चिमी विचारों के प्रवाह में पड़कर हमने इतना तो याद कर लिया कि सब को पढ़ना-लिखना सिखा देना चाहिए, पर उसके हानि लाभ का विचार नहीं करते। गांधी ने इसीलिए शिक्षा का विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि शिक्षित करने के पहले हमें शिक्षित करने का उद्देश्य निश्चित करना होगा, यह जानना होगा कि किसे, क्या और क्यों पढ़ना है। पढ़े-लिखे दानव पैदा करने के बजाय अनपढ़ मानव बेहतर हैं।

यह सोच गलत है कि आज की शिक्षा से नम्रता-करुणा-दया-एकाग्रता अपने आप आ जाती है। हाँ, ये हर मनुष्य में हैं लेकिन इन्हें जाग्रत करना पड़ता है, इन्हें लाना पड़ता है। बसंत भी अपने आप नहीं आता, लाना पड़ता है। गलत कह रहा हूँ, तो अब तीसरी बात पढ़िये :

        वसंत को लाना पड़ता है

एक विरोधाभास-सा है, बाहर की दुनिया और भीतर कहीं उमंगे उत्साह में। मन मुस्काने का कर रहा है और कहीं कुछ है जो उसे रोक रहा है। भीतर, कहीं से एक आवाज़ सी उठती है यह कहती हुई कि वसंत आता कब है, उसे तो लाना पड़ता है। यह सही है कि ऋतुओं के क्रम में वसंत की अपनी जगह है। ऋतु के अनुरूप ही पत्ते भी चहकते हैं, फूल भी खिलते हैं। हवा भी महकती है। हां, यह सब दिख रहा है। पर वसंत तो तब उतरता है जीवन में, जब मन चहके, भीतर कहीं जीवन के प्रति उत्साह उमड़े और बहती हवा गाल थपथपाते हुए कहे..... कि दशाश्वमेध घाट का आखिरी पत्थर कुछ और मुलायम हो गया है, सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आंखों में एक अजीब सी चमक है, राह चलता हर व्यक्ति मुसकुराता सा प्रतीत होता है, यह चराचर में वसंत के उमड़ने की स्थिति है।

.....वसंत के बीज को हवा और पानी देने की आवश्यकता है, खाद देने की आवश्यकता है। यह हवा, यह पानी, यह खाद उस जिजीविषा का नाम हैं जो ज़िंदा होने और ज़िंदा रहने के अंतर को समझाती है। सांस तो आदमी लेता रहेगा, पर यह सांस सार्थक तब बनेगी जब सांस में आदमी उस गरमाहट को महसूस कर सकेगा जो मां की गोद में मिलती है। एक सुरक्षा का अहसास देती है यह गर्मी और आश्वासन भी कि जीवन को बेहतर बनाया जा सकता।

..... धूप, हवा, पानी, यह सब तो प्रकृति देती है हमें, पर जो जादुई और रासायनिक क्रिया इन्हें जीवन का संबल बना देती है, उसे सक्रिय करना हमारे अपने हाथ में है। सच बात तो यह है इस सक्रियता का रहस्य इस बात को समझने में है कि जीवन ऋतुओं का इंद्रधनुष है। इस इंद्रधनुष के रंग अपने समय पर चहकते-महकते तो हैं पर इस प्रक्रिया का अनुभव करना पड़ता है- कोशिश करनी पड़ती है। इस अनुभव को जीने की। यह अनुभव तब होता है जब हम जीवन को वसंत-मय बनाने के प्रति सजग होते हैं। विपरीत परिस्थितियां एक चुनौती हैं इस सजगता के लिए। इस चुनौती को स्वीकार करना ही जीना कहलाता है। जब हम इसे स्वीकार करते हैं तब जीवन में वसंत खिलता है। आता नहीं है वसंत, जीवन में उसे लाना पड़ता है

तब साहब, वसंत आता नहीं है लाया जाता है। समयानुसार प्रकृति तो वसंत में सज जाती है लेकिन  हाँ उसके साथ समरस नहीं हुए तो वसंत नहीं आता। पिछले दो वर्षों में महामारी के चलते वसंत आया तो सही लेकिन पता ही नहीं चला। शिक्षा हासिल कर ली तो शैक्षिक उपाधि तो मिली लेकिन अगर हृदय समरस नहीं हुआ, निर्माण का उत्साह नहीं बना, तो शिक्षित नहीं हो पाये।

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....वाद पर विवाद                                                        मेरे विचार

 वाद!.... न जाने कितने और कैसे-कैसे। और-तो-और  वाद पर विवाद भी। व्यक्ति-वाद, समाज-वाद, राष्ट्र-वाद, साहित्य-वाद, विचार-वाद! पूरब, पश्चिम और मध्य वाद; पूर्व-मध्य, मध्य-पूर्व, पश्चिम-मध्य, मध्य-पश्चिम वाद भी हैं। अपने दस दिशाएँ मानते हैं। तीन पर कब्जा हो चुका है, सात अभी भी उपलब्ध हैं। देर-सवेर वे भी शायद किसी-न-किसी की संपत्ति हो जायेंगी। कोई एक को मानता है तो कोई दूसरे को। इन में कट्टर-वादी और नरम-वादी भी हैं। इनमें तीखी बहसें भी होती हैं, और जब बहस में उतरते हैं तब न अच्छा-अच्छा रहता है और न बुरा-बुरा। न यह ध्यान रहता है कि तर्क है या कुतर्क।  क्या सही है और क्या गलत की अनदेखी कर, बस एक ही मुद्दा रहता है सामने वाले को गलत और अपने को सही सिद्ध करना। एक को केवल अच्छाई-ही-अच्छाई दिखती है तो दूसरे को केवल बुराई-ही-बुराई। इस तथ्य का विस्मरण हो जाता है कि हर किसी में अच्छाई और बुराई साथ-साथ होती है। दूसरे की अच्छाई को स्वीकार करने में हीनता और अपनी बुराई मनाने में अपमान का अनुभव होता है।

          नित्शे का कहना है, आत्मा हमारी चेतना से कहती है – यह कष्ट है; इसे महसूस करो, और हम यातना महसूस करने लगते हैं। वह कहती है – यह सुख है और हमें वह सुख लगने लगता है  लेकिन फसाद की जड़ तो यह है कि एक की आत्मा को जिसमें सुख दिखता है, दूसरे की आत्मा को उसी में दुःख नजर आता है। बस फिर वे दोनों आत्मा-यें बिना विचार किए आपस में भीड़  जाती हैं।

          गाँधी कइयों को बड़ा सुख देते हैं तो बहुतों को कष्ट। दोनों तरफ कट्टर-वादियों को कमी भी नहीं है। गाहे-बगाहे, उनके बीच वाद-विवाद होते ही रहते हैं। दुःख की बात तो यह है कि इनमें से अधिकतर तो ऐसे लोग हैं जिन्हें गांधी के बारे में जो भी थोड़ी-बहुत जानकारी है वह सिर्फ व्हाट्सप्प और सोशल मीडिया से मिली विकृत जानकारी है। मेरे अपने अनेक दोस्त, मित्र और परिचित हैं। वे मेरे वाद से परिचित हैं। जब भी मौका मिलता है मुझे उकसाते हैं, मैं कुछ बोलूँ, बहस करूँ। लेकिन मैं चुप-चाप सुन लेता हूँ। कुछ देर में समझ जाते हैं कि मैं उनके साथ बहस नहीं करूंगा, कुछ नहीं बोलूँगा। और हम मुसकुराते हुए अन्य विषयों पर मुड़ जाते हैं। 

          एक बार गाँधी बंगाल के किसी प्रांत में एक सभा को संबोधित कर रहे थे। तभी उस सभा-स्थल के नजदीक से मार्क्सवादियों का एक जुलूस निकला। नारे लगा रहा था – गाँधी-वाद मुर्दाबाद’, गाँधी-वाद का नाश हो। गाँधी वहीं सभा स्थल से ही बोले, ठहरो, ठहरो मैं भी आता हूँ। मैं भी तुम्हारे साथ हूँ क्योंकि गाँधी-वाद जैसी न कोई विचार-धारा है न ही कोई वाद

          गांधी कहते हैं, न मैंने कोई नई बात कही है और न ही ऐसे किसी वाद का समर्थक या प्रचारक हूँ। सत्य, अहिंसा, सौहार्द, अपरिग्रह.... जैसी बातें मेरी नहीं हैं। ये सदियों से चली आ रही हैं। विश्व के विभिन्न धर्मों से ही मैंने ये बातें सीखी हैं और मैं इन पर अमल करता हूँ। अपने अनुभव से जो समझा हूँ, सीखा हूँ वही करता हूँ, कहता हूँ। इतना ही नहीं, मैं यह भी कहता कि मैंने जो कहा वह अंतिम नहीं है। मैं रोज-रोज सीख रहा हूँ। इस कारण मेरे कहे में विरोधाभास भी मिलेगा। मैं यही कहता हूँ कि मैंने जो बात अंत में कही है उसे ही सही मानी जाए। क्योंकि जैसे-जैसे मैं  सीखता गया, जानता गया, समझता गया, मेरे विचरों को भी नई दिशा मिलती गई। और अंत में जो कहा वह भी अंतिम सत्य नहीं है। मैं यहीं तक पहुंचा हूँ, तुम्हें यहाँ रुकना नहीं है, आगे बढ़ना है और इसके आगे का सत्य जानना है। इस अवस्था में  क्या गाँधी-वाद जैसे किसी वाद का स्थान है? गाँधी-वादी तो वे हैं जो वहीं रुक गए। उसे ही अंतिम सत्य मान लिया। उन्होंने सत्य के प्रयोग को आगे बढ़ाया ही नहीं।  

          अभी कुछ समय पहले एक मैनेजमेंट गुरु का वीडियो काफी प्रचलित हुआ जिसमें उन्होंने अपने किसी इंटरव्यू की चर्चा की। उनसे पूछा गया कि क्या वे गाँधी-वादी हैं? उन्होंने प्रति-प्रश्न किया कि गाँधी-वाद क्या है? अब, जब प्रति-प्रश्न किया गया और बात आगे बढ़ानी भी है, तो जो है ही नहीं, उसके व्याख्या कर दी गई। गुरु ने उस व्याख्या को पकड़ कर यह घोषणा कर दी कि न राम  गाँधी-वादी थे, न कृष्ण और न मैं गाँधी-वादी हूँ। वे न गांधी को समझ सके, न कृष्ण को न राम को।

          क्या आप मुझे बताएँगे कि कौन से धर्म में सत्य, अहिंसा, सौहार्द, अपरिग्रह.... नहीं है? कौन सा समुदाय, संप्रदाय, सभ्यता, संस्कृति इनसे इंकार करेगी? हाँ, यह जरूर है कि अपने-अपने देश-काल के अनुसार किसी ने सत्य पर ज़ोर दिया तो किसी ने अहिंसा पर, किसी ने किसी और पर। लेकिन सब में कम या ज्यादा इन सब का संपुट है।

हम गाँधी से प्रश्न करते हैं, उन्हें उलाहना देते हैं:

अहिंसा तो कमजोरों के लिए हैं, इसने तो हमें निपुंसक बना दिया।

सत्य से क्या फायदा, आज के जुग में यह नहीं चलता।

सौहार्द भाई चारा अतीत की बातें हैं, हम मिट जाएंगे।

“अगर तुम्हारे गाल पर एक थप्पड़ मारे तो तुम अपना दूसरा गाल आगे बढ़ा दो।

इनमें से एक भी गाँधी की देन नहीं हैं। उन्हें गांधी ने गीता से, बाइबिल से, कुरान से, ग्रंथ साहिब से तथा अन्य धर्मों से ही लिया है।  फिर प्रश्न गांधी से ही क्यों करते हैं? सीधी सी बात है – धर्म पर सीधे प्रश्न करने से डर लगता है, भयभीत हो जाते हैं। साहस की ओट में दुर्बल लोग हैं ये। 

हर धर्म कहता है इनका पालन करो, इन्हें अपनाओ, इन्हें मानो। ये सब केवल प्रवचन दे कर ही अपने दायित्व का निर्वाह मान लेते हैं। और हम भी एक कान से सुन कर दूसरे से निःसंकोच निकाल देते हैं। सभा में सब सुन कर उसे वहीं छोड़ कर चले आते हैं। लेकिन गाँधी कहने पर रुके नहीं, इन्हें माना, अपनाया। यहाँ तक तो शायद ठीक था, वे इससे एक कदम आगे बढ़ जाते हैं और  दूसरों को यथासंभव इसे मानने और अपनाने के लिए बाध्य किया। यहीं से एक बड़े तबके ने उन्हें सिर-माथे पर बैठाया और दूसरे ने उनका विरोध किया।

          मानव का मनोविज्ञान कहता है – हम जिसे सही जानते हैं, उसे सही मानते नहीं। हम जिसका आदर करते हैं, उसकी सुनते नहीं। हम मानते कुछ हैं, चाहते कुछ और। हम हर पल इस द्वंद्व में जी रहे हैं। हम दोहरी जिंदगी जीते हैं। स्वयं को छोड़ बाकी पूरी दुनिया ईमानदार हो, सत्यवादी हो। स्वयं के लिए झूठ बोलना, बेईमानी करना व्यावहारिक होना है, दूसरों के लिए नहीं। घूस ले कर काम करवाने में बड़ा आनंद आता है लेकिन जब देना पड़ता है तब खीज होती है। हम जब इस द्वंद्व से निकल जाएंगे, तब बस एक ही रह जाएगा।

गांधी ने जिसे सही जाना, उसे ही माना, वही किया और वही करने को कहा। और बस यहीं गांधी से विरोध शुरू हो गया।

अंत में गीता के १८वें अध्याय का ६७वां श्लोक :

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।

न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥

तुझे यह गीता रूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तप रहित मनुष्य से कहना चाहिये, न भक्ति रहित और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिये; तथा जो मुझमें दोष दृष्टि रखता है उससे भी नहीं कहना चाहिये।  

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