शनिवार, 1 जून 2024

सूतांजली जून 2024

 


अपने भीतर की चेतना और संवेदनशीलता को जाग्रत रखें। जिससे,

हर घटना को गहराई से महसूस कर सकें,

गलत को गलत और अंधेरे को अंधेरा कह सकें ।

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मौलिक प्रश्न

          बड़ा विचित्र प्राणी है मानव। जहां उसे अपने जीवन का कुछ समय ही गुजारना है वहाँ के बारे में उसे पूरी जानकारी चाहिये, लेकिन जहां उसे ता-उम्र व्यतीत करना है उसके लिए उस में  कोई जिज्ञासा नहीं।

          “अच्छा! क्या तुम्हारे मन में भी क्या कभी यह प्रश्न उठता है कि इस दुनिया का निर्माण किसने किया? क्यों किया? यह दुनिया है क्या?  क्या उद्देश्य है उसका? हमें क्यों भेजा है यहाँ? दुनिया के मालिक तो ईश्वर हैं। हम उन्हें कितना जानते हैं? क्या उन्हें जानना आवश्यक है?,” शून्य की तरफ देखते हुए विनोद ने प्रश्न किया।

          प्रशांत अपनी चिर-परिचित मुद्रा में गर्दन झुकाये, एकाग्र चित्त से विनोद के प्रश्न सुन रहे हैं। उन्हें पता है ये प्रश्न पूछे नहीं गये हैं, सिर्फ बताये गये हैं। कुछ वर्षों के परिचय में ही प्रशांत और विनोद में आपस में ऐसी समझ आ गई है। हाँ, अभी सिर्फ सुनना है, ये उत्तर की अपेक्षा वाले प्रश्न नहीं हैं।  दोनों दोपहर का भोजन और शाम की चाय प्रायः साथ-साथ लेते हैं और अध्यात्म, मनोविज्ञान और संसार भर की हंसी-विनोद की बातें भी करते रहते हैं, खुल कर हँसते हैं। कभी-कभी उनके लिये अपनी हंसी पर लगाम लगाना भी दुष्कर हो जाता है। उन्हें प्रातः हास्य योगाभ्यास (लाफटर योग) की अलग से जरूरत नहीं है। अनेक बातों पर उनमें सहमति है तो ऐसी भी अनेक विचार हैं जहां उनके मध्य 36 का आंकड़ा है। लेकिन वे कभी विरोधी बातों पर चर्चा नहीं करते। व्यर्थ के विवाद में नहीं पड़ते।

          प्रशांत विनोद द्वारा सूत्रपात किये गए इस गंभीर चर्चा का सूत्र खोज रहे हैं। समझने में समय नहीं लगा। अभी-अभी शारदा वहीं उनके साथ बैठी थी और बता रही थी कि उसने किसी अन्य बड़ी कंपनी में जाने का मन बना लिया है। प्रशांत, शारदा के साथ विनोद कर रहे थे और विनोद, शारदा  की बातें प्रशांत मन से सुन रहे थे। शारदा बता रही थी कि उसने पता लगाया है कि वह किस की कंपनी है, क्या करती है, उसका बॉस कौन होगा – वगैरह-वगैरह। बहुत उत्तेजित है और चहक-चहक कर बता रही थी।

          तभी विनोद ने हस्तक्षेप करते हुए कुछ प्रश्न पूछ लिये, मसलन क्या उसने यह भी पता लगाया है कि इस नयी कंपनी में उसका कर्तव्य-उत्तरदायित्व क्या होगा? कंपनी को उसे से क्या अपेक्षा है? कंपनी उसे क्यों रख रही है?.... ऐसे प्रश्नों से रानी उचट गई और हाथ हिला कर उठ गई। प्रशांत ने मुसकुराते हुए कहा, “बेचारी को भगा दिया!”

          प्रशांत की टिप्पणी को नजर अंदाज करते हुए विनोद अपनी ही रौ में कहते गए, “जो मूलभूत प्रश्न हैं उनके उत्तर न हम जानते हैं और न ही जानना चाहते हैं। ये मौलिक प्रश्न हमें अ-सहज कर देते हैं।  लेकिन ये ही वे प्रश्न हैं जो हमारे जीवन को प्रभावित करती हैं और दुनिया को एक बेहतर दुनिया बना सकती है।”

          “हाँ विनोद, लेकिन ऐसा नहीं है कि लोग इससे बेखबर हैं। ऐसे अनेक लोग हैं जिन्होंने इस पर विचार किया है। सबों को एक जैसा उत्तर नहीं मिला, मिल भी नहीं सकता। सबों को सब प्रश्नों के उत्तर भी नहीं मिले। जो जितने गहरे गया उसे वैसे ही और उतने ही उत्तर भी मिले। किसी ने अपना जीवन सुधारा किसी ने दुनिया को भी सुधारा,” प्रशांत ने जोड़ा।

          “ये प्रश्न उतने कठिन भी नहीं हैं जैसा पहली नजर में प्रतीत होते हैं – इस दुनिया का मालिक कौन है? उसकी हमसे क्या अपेक्षा है? वह हमसे क्या चाहता है? हमारा क्या उत्तरदायित्व है? हमारा क्या कर्तव्य है? हमारा क्या अधिकार है? हमारी क्या सीमाएं हैं? और फिर हम अपने उत्तरदायित्व का कितना और कैसा निर्वाह कर रहे हैं?’ जैसे-जैसे इस पर विचार करते हैं हमें हमारे सामर्थ्य के  अनुरूप उत्तर भी मिलने लगते हैं  और पथ प्रदर्शक भी। श्रीअरविंद का पथ प्रदर्शन श्रीकृष्ण ने ही किया था,” विनोद ने कहा।

          “और ये वे मौलिक प्रश्न हैं जिनके उत्तर मिलने लगते हैं तो दूसरे प्रश्न खुद-ब-खुद विलीन होने लगते हैं। हमें इन पर विचार करना चाहिये”, प्रशांत ने आगे कहा, हमें पहला कदम बढ़ाना होता है और अगर आगे मार्ग न सूझे तो आगे का मार्ग दिखाने कोई-न-कोई आ ही जाता है।

          जो भी आया है, वह जायेगा। साथ कुछ नहीं लाया था, साथ कुछ लेकर नहीं जायेगा। या तो दे कर जाये या छोड़कर जाये। बस यही दो विकल्प हैं हमारे पास। और यह स्पष्ट है कि कुदरत यही चाहता है कि हम छोड़ कर नहीं, दे कर जायें। कुदरत को जो भी देना होता है वह खुद नहीं देता किसी और से दिलवाता है। क्यों? संसार देकर जाने वाले को ही याद करता है छोड़कर जाने वाले को नहीं। कुदरत अपना नाम नहीं चाहता है, वह चाहता है कि आपका नाम हो, अतः छोड़ कर न जायें, दे कर जायें।

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उत्कृष्टता का मोल

          एक बढ़ई किसी गाँव में लकड़ियों की अद्भुत कलात्मक सामग्री और कलाकृतियाँ बनाया करता था। जब भी वह कुछ बनाता उसके मन में एक ही बात होती वह ईश्वर के लिए बना रहा है और कार्य की समाप्ति के बाद वह मानसिक रूप से अपनी कलाकृति को उन्हें ही भेंट कर देता था। उसकी हर सामग्री उत्कृष्टता का नमूना थी। धीरे-धीरे उसकी ख्याति चारों तरफ फैल गई और अब वह कलाकृतियों के साथ-साथ छोटे-मोटे भवन बनाने लगा। आस-पास के शहरों से सेठ आने लगे और अब वह महल भी बनाने लगा। अब वह बढ़ई न रहकर कलाकार बन चुका था। वहाँ का राजा भी उसका हुनर देखने पहुँचा। उसके कार्य को देख कर वह चमत्कृत रह गया। उसने उसे राजधानी में बुला लिया और वहाँ उसने एक-से-बढ़कर-एक भवनों का निर्माण किया।

          समय के साथ वह वृद्ध हो चला, थकने लगा था। एक दिन उसने राजा से कहा कि उसने अनेक निर्माण किए हैं, लेकिन अब उसका शरीर, आँखें, हाथ पहले की तरह सक्षम नहीं रहे अतः अब वह अपने गाँव जा कर बची-खुची जिंदगी वहीं अपने परिवार के साथ बिताना चाहता है। अतः उसे सेवा निवृत्त कर दिया जाये। राजा ने कहा कि जाने के पहले वह उनके लिए एक अंतिम भवन का निर्माण कर दे। राजा के कहने पर वह अंतिम भवन के  निर्माण कार्य में जुट गया। लेकिन इस बार उसकी इच्छा नहीं हो रही थी, बे-मन से बना रहा था। कई जगहों पर उसने कार्य की उत्कृष्टता से समझौता किया, प्रयोग में ली गई लकड़ियों एवं अन्य वस्तुओं से भी समझौता किया।

          खैर, निर्माण कार्य पूरा हुआ और वह राजा को सूचित करने दरबार में पहुंचा। राजा ने प्रसन्नता से कहा, “तुमने हमारे राज्य के लिये अनेक भवनों का निर्माण किया है लेकिन अपने खुद के लिए कभी कोई भवन नहीं बनाया। यह भवन राज्य की तरफ से तुम्हें पुरस्कार में दिया जाता है। अपने समस्त परिवार को यहीं बुला लो और सब साथ में यहीं रहो। अपने जीवन के इस अंतिम निर्माण पर अब वह पछता रहा था। औरों के लिए उसने एक-से-एक उत्कृष्ट निर्माण किये लेकिन अपने खुद के निर्माण में वह चूक गया था। 

          अपने हर कार्य को ईश्वरार्पण करें, उत्कृष्टता में कभी कमी न करें।

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ईश्वरीय अनुकम्पा                                         कहानी जो सिखाती है जीना

          सुकरात समुद्र तट पर टहल रहे थे। उनकी नजर तट पर खड़े एक रोते बच्चे पर पड़ी, प्यार से बच्चे के सिर पर हाथ फेरकर पूछा तुम क्यों रो रहे हो ? लड़के ने बताया मेरे हाथ में जो प्याला है मैं उसमें इस समुद्र को भरना चाहता हूँ पर यह मेरे प्याले में समाता ही नहीं।

          बच्चे की बात सुनकर सुकरात विस्माद में चले गये और स्वयं रोने लगे, अब पूछने की बारी बच्चे की थी, आप भी मेरी तरह रोने लगे पर आपका प्याला कहाँ है?’

          सुकरात ने जवाब दिया, बच्चे, तुम इस प्याले में समुद्र भरना चाहते हो, मैं अपनी बुद्धि में सारे संसार की जानकारी भरना चाहता हूँ। आज तुमने सिखा दिया कि मैं व्यर्थ ही बेचैन रहा। यह सुन बच्चे ने प्याले को दूर समुद्र में फेंक दिया और बोला, सागर, अगर तू मेरे प्याले में नहीं समा सकता तो, मेरा प्याला तो तुम्हारे में समा सकता है

          इतना सुनना था कि सुकरात बच्चे के पैरों में गिर पड़े और बोले बहुत कीमती सूत्र हाथ लगा है। हे  परमात्मा! आप तो मुझ में नहीं समा सकते पर मैं तो आपमें लीन हो सकता हूँ।

          ईश्वर की खोज में भटकते सुकरात को ज्ञान देना था तो भगवान उस बालक में समा गए। सुकरात का सारा अभिमान ध्वस्त कराया, जिस सुकरात से मिलने के लिए सम्राट समय मांगते थे वह सुकरात एक बच्चे के चरणों में लेट गए। ईश्वर जब आपको अपनी अनुकम्पा में लेते हैं तब आपके अंदर का मैं सबसे पहले मिटता है। शायद मैंने उल्टी बात कह दी। जब आपके अंदर का मैं मिटता है तभी ईश्वर की अनुकम्पा होती है

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बुधवार, 1 मई 2024

सूतांजली मई 2024

 


गलत गलत है, भले ही उसे सब कर रहे हों।

                    सही सही है, भले ही उसे कोई न कर रहा हो।

                                                                                      दलाई लामा

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प्रबंधन

          प्रशांत की फोन पर अपनी ही कंपनी के एक अन्य प्लांट मैनेजर संजय से तकरार हो रही थी, "संजय, मुझे दोष मत दो, यह तुम्हारी गलती है.....।"  लेकिन फोन के दूसरे छोर पर गुस्से में संजय के जोर से चिल्लाने की आवाज के कारण प्रशांत आगे बात नहीं कर सका। दोनों के बीच तीखी बहस हुई और आखिरकार प्रशांत ने गुस्से से कांपते हुए फोन पटक दिया।

          प्रशांत, एक बहुराष्ट्रीय इंजीनियरिंग कंपनी के युवा प्लांट मैनेजर, एक बेहद काबिल और  समर्पित अधिकारी हैं। उन्हें गुस्सा कभी आता ही नहीं है, क्योंकि वह तो हर समय उनकी नाक पर ही मौजूद रहता है। अगर जाये तब तो आये। प्रशांत ने संजय से अपना ध्यान हटा अपने एक पर्यवेक्षक (सूपर्वाइज़र), अशोक को फोन किया, "रोलेक्स के बॉयलर प्रोजेक्ट में अभी कितना काम बाकी है?"

दो दिन और लगेंगे सर।”

"दो दिन, क्या बकवास कर रहे हो? यह तो कल ही ख़त्म हो जाना चाहिये था", प्रशांत का चेहरा फिर लाल हो गया और तीखे स्वर में बोला।

"लेकिन सर, हमारी वेल्डिंग मशीन में कुछ समस्या है।"

"बहाने मत बनाओ, मुझे नहीं पता कि तुम क्या और कैसे करोगे, लेकिन तुम्हें इसे आज ही खत्म करना होगा", और प्रशांत ने फोन रख दिया।

          लेकिन तभी प्रशांत का फोन बज उठा। उसे अपने बॉस, गोपाल का परिचित कर्कश स्वर सुना, "तुम क्या कर रहे हो? मैंने कल भारत फोर्जिंग्स के लिये तुम्हारा प्रोग्रेस चार्ट देखा। यह निर्धारित समय से पीछे है। तुम्हें अपनी स्पीड बढ़ानी होगी"।

"लेकिन सर...... "

"बहाने मत बनाओ और काम समय पर पूरा करो", और गोपाल ने लाइन काट दी।

          प्रशांत  ने अपने भीतर के क्रोध को दबाते हुए फोन रख दिया। अपने ठंडे चैंबर में भी प्रशांत  पसीने से लथ-पथ हो चुका था। अपने चेहरे को हथेलियों में लपेट लिया और बुदबुदाया, "ओह, आखिर यह हो क्या रहा है!" उसने डॉ.स्वामीनाथन, जो उसके इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रोफेसर थे, से मिलने का निश्चय और रात करीब 8 उनके घर पर पहुंचा।

          प्रोफेसर स्वामीनाथन कुछ मिनट तक अपने शिष्य के चेहरे को देखते रहे और फिर स्नेह से पूछा, "तुम बहुत परेशान और थके हुए लग रहे हो। तुम्हें क्या परेशान कर रहा है?" प्रशांत  ने सारी बात बताई और पूछा, "मैं अपने क्रोध पर नियंत्रण क्यों नहीं रख पा रहा हूं। खुद पर नियंत्रण कैसे हासिल करूं?"

          स्वामीनाथन सहानुभूतिपूर्वक मुस्कुराये और बोले, "नियंत्रण पाने से पहले तुम्हें स्वयं के प्रति सचेत होना होगा। तुम पूछ रहे हो, 'मेरा नियंत्रण’ 'क्यों नहीं' है?' लेकिन जब तुम क्रोध  से भरे होते हो उस समय तुम्हारा वह मैं  वहाँ है ही नहीं, क्योंकि तुम खुद क्रोध में परिवर्तित हो चुके हो। अतः अपनी भावनाओं पर नियंत्रण हासिल करने की प्रथम सीढ़ी है अपने 'मैं' को पुनः प्राप्त करना। तुम्हारा वह मैं वहाँ से जा चुका है इसलिए क्रोध आता है। अतः जब तुम में क्रोध हो, तब तुमको  जागरूक और सचेत होना होगा कि 'मैं  में क्रोध है। यह मैं  और क्रोध  अलग-अलग हैं। तुम क्रोध नहीं हो। क्रोध तुम्हारे अंदर घटित होने वाली एक आंतरिक गतिविधि है, तुम्हारे अंदर होने वाली हलचल है, तुम वह नहीं हो, वे एक नहीं हैं, वे अलग-अलग हैं। यह नियंत्रण की दिशा में दूसरा कदम है, तुम इसका अभ्यास करो। और जब तुम यह कर लो तब फिर मिलेंगे।”

          जैसे ही प्रशांत ने,  प्रोफेसर स्वामीनाथन की बातों के अनुसार अभ्यास करना प्रारम्भ किया,  उसने अनुभव किया कि विचारों और भावनाओं के प्रति सचेत होने का कार्य, कुछ हद तक उन पर नियंत्रण करने की ओर ले जाता है। जब उसने प्रोफेसर को अपना अनुभव सुनाया, तो स्वामीनाथन ने कहा, "बहुत अच्छे,  अब तुम अपने अंदर की एक क्षमता और शक्ति को पहचान गये हो जिसके बारे में तुम  पहले अंजान थे। अब तुम जानते हो कि तुम्हारे अंदर एक क्षमता है जो तुम्हारे मैं को तुम्हारे विचारों और भावनाओं से पीछे हट सकती है और उन्हें एक साक्षी के रूप में देख सकती है। अगला कदम इस अलगाव को अधिक-से-अधिक पूर्ण और परिपूर्ण बनाना है। इसी पर और अभ्यास करो, पीछे हटना और अपने संज्ञानात्मक दिमाग को विचारों और भावनाओं के प्रवाह से पूरी तरह से अलग कर लेना। उन्हें समुद्र में लहरों की तरह उठते और गिरते हुए देखना। अब जब फिर मिलेंगे तब हम आगे चर्चा करेंगे।"

       प्रशांत  ने इसे व्यवहार में लाने की कोशिश करना प्रारम्भ किया। उसे पता चला कि वह अपने बारे में कितना कम जानता है और जानने के लिये कितना कुछ है। वह अपनी बढ़ती हुई आंतरिक स्वतंत्रता और समझ का अनुभव कर रहा था जो बढ़ती आत्म-जागरूकता और आत्म-अनासक्ति से आती है। रविवार को जब वह दोबारा अपने गुरु से मिला तो प्रशांत ने धन्यवाद देते हुए कहा, "मैं अब अधिक शांतिपूर्ण, सचेत, कम तनावपूर्ण और खुद के अधिक नियंत्रण में हूं।"

          स्वामीनाथन प्रसन्नता से मुस्कुरा उठे और कहा: "बहुत अच्छा। लेकिन तुमने जो भी प्राप्त किया है उससे संतुष्ट मत होना, निरंतर आगे बढ़ते रहना। अधिक-से-अधिक सतर्क और जागरूक रहना और अपने विचारों, भावनाओं, संवेदनाओं, आवेगों, इच्छाओं और उद्देश्यों के अंतरतम स्रोत की खोज करने का प्रयास करना। जब भी तुम्हारे मन में क्रोध या ईर्ष्या जैसी नकारात्मक भावनाएँ आती हैं, तब अहंकार या इच्छा के उन बिंदुओं को पहचानने का प्रयास करना  जिनसे यह उत्पन्न होती हैं। तुम देखोगे कि अधिकांश नकारात्मकताएँ और अशांति आहत अहंकार या असंतुष्ट इच्छा से आती है, और तब तुम यह अनुभव करोगे कि तुम्हारा यह साक्षी भाव केवल द्रष्टा नहीं है उसके पास नियंत्रण की शक्ति भी है। यह शक्ति उन विचारों या भावनाओं को अस्वीकार कर सकता है जिन्हें वह नहीं चाहता है और दूसरे नये विचारों और भावनाओं को उत्पन्न कर सकता है जिन्हें वह विकसित करना चाहता है। और यह जीवन भर की एक आंतरिक यात्रा और नई खोज होगी। जैसे-जैसे आगे बढ़ते जाओगे नये-नये अध्याय खुलते जायेंगे। यही सनातन है, अनंत है जिसका कोई अंत नहीं। युगों से चलता रहा है, युगों तक चलता रहेगा, सनातन है।”  

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प्रश्न पूछो ध्यान से .....

          गीता के ग्यारहवें अध्याय में श्रीकृष्ण के विश्व रूप दर्शन का प्रसंग है। इसके पूर्व के अध्याय में भगवान अपनी विभूतियों का वर्णन करते हैं। इसे सुन अर्जुन के मन में भगवान के उस स्वरूप के दर्शन की इच्छा जागृत होती है और वे श्रीकृष्ण से उस स्वरूप के दर्शन कराने का अनुरोध करते हैं। अर्जुन के इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए भगवान उसे उस स्वरूप का दर्शन कराते हैं। प्रारम्भ में अर्जुन को भगवान के विकराल रूप का दर्शन होता है। इस स्वरूप को देख कर अर्जुन भयभीत हो जाता है, व्याकुल हो जाता है। अर्जुन को जो स्वरूप दिखा उसकी उसे कल्पना नहीं थी, अर्जुन ने उसका विस्तृत वर्णन किया। भय के कारण उसका मतिभ्रम तक हो जाता है और पूछता है कि आप हैं कौन’, उन्हें बारंबार प्रणाम कर पूछता है कि मैं आप कि प्रवृत्ति को जानना चाहता हूँ। अलग-अलग सम्बोधनों से अर्जुन उनकी स्तुति करता है और यह भी कहता है कि आपके इस स्वरूप को देख कर मैं हर्षित भी  हो रहा हूँ लेकिन साथ ही मेरा मन भय से व्याकुल भी हो रहा है अतः आप मुझे अपना चतुर्भुज स्वरूप दिखाइये। भय से किंकर्तव्यविमूढ़ हुआ अर्जुन अब अपनी प्रारम्भिक शिष्टाचार को भूल कर सीधे-सीधे चतुर्भुज स्वरूप के दर्शन की इच्छा जाहिर करता है।

          कौन से शिष्टाचार की? आइये एक बार गौर करते हैं अर्जुन के पहले प्रश्न पर। अर्जुन सीधे अपनी इच्छा जाहिर नहीं करता, वह कहता है कि

एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर |
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम || 11.3||

 हे परमेश्वर! आप वास्तव में वही हो जिसका आपने मेरे समक्ष वर्णन किया है!, किन्तु हे परम पुरुषोत्तम! मैं आपके विराट रूप को देखने का इच्छुक हूँ।

यहाँ अर्जुन यह स्वीकार करता है कि श्री कृष्ण वैसे ही हैं जैसा उन्होंने अपना वर्णन किया है। लेकिन उसी एक ही सांस में वह उनके उस स्वरूप को देखने की इच्छा भी प्रकट करता है। लेकिन इसके तुरंत बाद उसे अपनी भूल का अहसास होता है कि बिना यह जाने-समझे कि वह उसके दर्शन का अधिकारी है या नहीं, केशव उसके दर्शन करवाना चाहते हैं या नहीं इस प्रकार से अपनी इच्छा जाहीर करना उचित नहीं और तब वह अपने प्रश्न को संशोधित करते हुए आगे जोड़ता है :

 

मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽत्मानमव्ययम्।।11.4।।

 

हे प्रभो! यदि मेरे द्वारा आपका  वह रूप देखा जाना सम्भव है – ऐसा आप मानते हैं, तो

 हे योगेश्वर मुझे  आपके उस अविनाशी स्वरूप का दर्शन कराइये  

यानि अगर श्री कृष्ण चाहते हों और अगर अर्जुन उस स्वरूप के दर्शन करने के अधिकारी हों तब  वह श्रीकृष्ण के उस स्वरूप का दर्शन करना चाहते हैं।

तब श्री कृष्ण उसकी जिज्ञासा को शांत करते हुए पहले विकराल और फिर चतुर्भुज स्वरूप का दर्शन कराते हैं। तभी कहा गया है –

“प्रश्न पूछो ध्यान से , उत्तर मिलेगा ज्ञान से”

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विशिष्टता                                                  संस्मरण जो सिखाती है जीना

          अब्राहम लिंकन अमेरिका के उन गिने-चुने राष्ट्रपतियों में से एक हैं जिन्हें आज भी पूरा विश्व याद कर श्रद्धा से नत मस्तक हो जाता है। जब अमेरिका गृह युद्ध में बुरी तरह उलझा हुआ था, वे लिंकन ही थे जिन्होंने बड़े धैर्य और साहस के साथ अपने देश का नेतृत्व किया और देश की किश्ती को उस तूफान से निकाल कर लाये। उनके जीवन की अनेक छोटी-छोटी घटनाएँ प्रचलित हैं जो उनकी सफलता का राज तो खोलती ही हैं साथ ही हमें भी जीवन का पाठ पढ़ाती हैं। वैसी ही अनेक घटनाओं में से एक है यह घटना।  

          सबसे निचले स्तर का एक अमेरिकी सैनिक अपने देश के लिए गृहयुद्ध लड़ रहा था। उसकी पत्नी एक बड़ी झील में डूब गई और उसे किसी भी तरह उसके शव को निकालने और उसे उचित तरीके से दफनाने में मदद करने वाला कोई नहीं मिला। किसी ने उसे अब्राहम लिंकन से मदद मांगने का सुझाव दिया जो उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति थे। लिंकन की व्यवस्था में, सेना के किसी भी रैंक का सैनिक उनसे मिल सकता था।

          सैनिक लिंकन के पास गया और अपनी समस्या बताई। लेकिन उस समय लिंकन, गृहयुद्ध की एक महत्वपूर्ण घटना से निपटने की कठिनाइयों और जिम्मेदारियों में उलझे हुए थे। उन्होंने हल्की उपेक्षा के भाव से कहा, "क्या मुझे ऐसी साधारण सी चीजों के बारे में चिंतित होना पड़ेगा"। अपने देश के राष्ट्रपति के इस कथन से सिपाही बहुत निराश हुआ और हतोत्साहित होकर चला आया। उसके लिए यह घटना साधारण नहीं थी। वह बड़ी आशा लेकर उनसे मिलने गया था।

          लिंकन ने सैनिक से जो कुछ कहा वह वैध हो सकता है, इसलिए नहीं कि वह अमेरिका के राष्ट्रपति थे, बल्कि इसलिए कि वे एक देश का नेतृत्व कर रहे थे जब वह गंभीर संकट से गुजर रहा था। इतनी बड़ी जिम्मेदारी का बोझ उठाने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए सैनिक की समस्या क्या मामूली नजर नहीं आती? लेकिन लिंकन दयालु, कोमल हृदय वाले दुर्लभ नेताओं में से एक थे। गृहयुद्ध की उस समस्या से फारिग होने के कुछ समय बाद लिंकन को लगा कि उन्होंने उस सैनिक से जो कहा वह बहुत निर्दयी और अमानवीय था। अमेरिका के राष्ट्रपति तुरंत उसे अपने शिविर में बुलाने के बजाय खुद युद्ध क्षेत्र में पहुंचे और सैनिक के तंबू में घुस गये। लिंकन ने सैनिक से कहा, "मुझे दुख है, मैंने तुम्हारे साथ एक निर्दयी व्यवहार किया है। मुझे बताओ मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं?"  सैनिक की समस्या को धैर्यपूर्वक सुनने के बाद लिंकन ने सैनिक की पत्नी का शव बरामद करने और उसे दफनाने की पूरी व्यवस्था की।

          केवल वही व्यक्ति जो अपने गहरे हृदय में रहता है वह महसूस कर सकता है जो लिंकन ने महसूस किया। उनके मन में बसने वाला कोई अन्य नेता, चाहे वह कितना भी महान, सुसंस्कृत और परिष्कृत क्यों न हो, उस तरह महसूस नहीं किया होगा जैसा लिंकन ने एक "महत्वहीन" सैनिक की "तुच्छ" समस्या के लिए महसूस किया।

इसका अहसास होना और फिर उस पर अमल करना ही हमें विशिष्ट बनाता है।

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सोमवार, 1 अप्रैल 2024

सूतांजली अप्रैल २०२४


 

अंधेरे को हटाने में समय बर्बाद मत कीजिये।

बल्कि दीये को जलाने में समय लगाइये।

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सीता - अबला या सबला

          हमारा समाज, विशेषकर आज का समाज बड़ा विचित्र है। ऐतिहासिक प्रेरणा चरित्रों को जिनसे हम प्रेरणा लेते रहे, पूजते रहे, अपना पथ प्रदर्शक मानते रहे उनके जीवन में से कुछ खंडों को निकाल कर, उनकी विशेषताओं को नकारात्मक रूप में  प्रस्तुत कर समाज की नजरों से गिराने में लगा है। यही नहीं इसके उलट समाज के निष्काषित, त्याज्य चरित्रों को महिमा मंडित कर उन्हें प्रतिष्ठित करने में तथा उनके साथ अन्याय हुआ है का जुमला उछाल कर उन्हें न्याय दिलाने में लगा है। ये वे लोग हैं जो पहले अपना उद्देश्य स्थापित करते हैं और फिर उसके अनुकूल अपने शब्द जालों से उसे सही प्रमाणित करने का प्रयत्न करते हैं। हमारे समाज का अ-शिक्षित अन-पढ़ वर्ग उनकी लच्छेदार भाषा में फंस जाता है और उनकी भाषा बोलने लगता है। अपने सनातनी परंपरा का निर्वाह करते हुए, जिसने अपने स्थापित सत्यों का विरोध करने वालों को भी  प्रताड़ित नहीं किया, इन सबों का विरोध नहीं किया। चर्वाक, गौतम बुद्ध हमारी ही भूमि के चरित्र हैं जिन्होंने सनातन की स्थापित विचार धाराओं पर कुठराघात करते हुए एक अलग विचार धारा को जन्म दिया और हमारे देश में ही फले-फूले भी।

          रामायण की महत्व पूर्ण नायिका सीता भी एक ऐसा ही चरित्र है। जिसके अनेक रूप हैं। अगर वह पतिव्रता है, तो वीरांगना भी है, समझदार और बलशाली है। जिस धनुष को भू-खंड के शूरवीर पूरी शक्ति लगाने के बावजूद हिला नहीं सके उसे खेल-खेल में उठा लिया। विनय और आदर्श की प्रतिमूर्ति है सीता। इसी  माह माँ सीता और भगवान राम का जन्म दिन है। सिया-राम को समर्पित है हमारा यह अंक।

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साबित करो तुम सीता हो

(कई वर्षों पहले किसी पत्रिका में डॉ.लता अग्रवाल का अपनी प्रताड़ित बेटी के नाम छपा एक छोटा सा पत्र आज अचानक सामने आ गया। उस पर आधारित)

          इतिहास ने सीता के रूप में एक ऐसा चरित्र तैयार किया है जिसे किसी भी दृष्टिकोण से देखें अद्वितीय है। एक ऐसा चरित्र जो न पहले हुआ न बाद में। एक भारतीय नारी के रूप में देखें या देवी के रूप में, ऐतिहासिक चरित्र या आधुनिक नारी की पथ-प्रदर्शिका के रूप में। सवाल तो सिर्फ इतना है कि आपकी नज़र जोड़ पर है या तोड़ पर।  आप उसे वीरांगना के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहते हैं या निरीह, प्रताड़ित नारी के रूप में। सीता में वह सब कुछ है जो एक आदर्श भारतीय गृहिणी में होना चाहिए, साथ ही आधुनिक शिक्षित नारी की समझ, शक्ति, साहस और धैर्य भी।

          हमारे यहां सदियों से समाज सीता के उस एक ही रूप को आदर्श मानकर उसी में संपूर्ण नारी की छवि देखना चाहता है जिसमें वह सीता है। आज समाज ने,  सीता की एक अबला की तस्वीर बना दी है, हर हालात में, खटते-घुटते-मरते हुए, घर-परिवार की सेवा करे, सभी के अनुरूप स्वयं को ढालती रहे। मगर यह अर्ध सत्य है, वे वास्तविक सीता के रूप की कभी चर्चा नहीं करते। हाँ, आवश्यकता पड़ने पर वह सब करे जिसकी समाज अपेक्षा रखता है अगर समाज भी उसी प्रकार प्रत्युतर दे तब। लेकिन अगर शोषण करे तब?  

          एक सीता वह थी, जिसने वैभव त्याग राम के संग जंगल की त्रासदी अपना कर अपने धैर्यवान, आत्मविश्वासी होने का परिचय दिया, वनवास को स्वीकार किया, जंगल में बच्चों को जन्म दिया।  अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ संघर्ष करना, बच्चों को शूरवीर और ज्ञानी बनाना एक अबला नहीं सबला का कार्य है। यही नहीं समझदारी से उसे प्रताड़ित करने वालों की न उसने भर्त्सना की न बातों में विरोध किया बल्कि अपने कार्यों से उसे निरस्त कर विजयी बनी। प्रतिकूल समय में भी अपना संतुलन न खो कर सही निर्णय लिया और समय को अपने अनुकूल बना लिया। ऐसा चरित्र प्रदर्शित किया कि उसे प्रताड़ित करने वाले भी उसकी आलोचना न कर सके। समय के अनुकूल आने पर बड़ी शालीनता से उनका साथ अस्वीकार कर दिया। सीता के इस संघर्ष पूर्ण और ताक़तवर रूप की चर्चा समाज ने कभी नहीं की।

          यह थी असली सीता, समयानुसार निर्णय ले अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया। कथनी के बजाय करनी पर विश्वास रखा। अफ़सोस तो इस बात का है कि अज्ञानता ने जिन रूढ़िगत आस्थाओं को जन्म दिया वे समय के साथ निर्मूल होने के स्थान पर अधिक बलवती होती गई। स्वयं स्त्री अपने प्रति हुए इस षड्यंत्र से सचेत होने के बजाय उसे और ऑक्सीजन प्रदान कर रही है। करनी के बजाय कथनी का सहारा ले रही है। अब हमें सीता के उसी रूप से अपने परिवार को, समाज को  परिचित कराना होगा। धैर्य और विश्वास के साथ साबित करना होगा कि तुम सीता ही हो। मुझे विश्वास है आज की नारी में वह सीता विद्यमान है।

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सीता क्या सिखाती है आज?

         

          एक हिंदू परिवार में, अक्सर सुबह 'रघुपति राघव राजा राम' के जाप सुनती हुई मेरी नींद खुलती। मेरे दादाजी द्वारा सुनाई गई कई कहानियों में मेरे पसंदीदा कहानियाँ राम के साहसिक कारनामों के थे। मैं और मेरे चचेरे भाई अक्सर रसोई के बर्तनों को अपने हथियार के रूप में इस्तेमाल करके इन साहसिक कार्यों को अंजाम देते थे। मेरे चचेरे भाई चाहते थे कि मैं सीता बनूं, लेकिन जिस भूमिका की मैं वास्तव में शौकीन थी वह थी राम की भूमिका। उनके कारनामे सबसे अच्छे थे क्योंकि उन्हें उन बंदरों से दोस्ती की जिनके पास विशेष शक्तियां थीं, जो उन्हें समुद्र के पार ले गए और अनगिनत दुष्ट राक्षसों को मार डाला।

          राम के चरित्र ने मुझे किशोरावस्था के दौरान आकर्षित किया। मैं अपने इस वीर और साहसी नायक को पूजती थी क्योंकि वह बहुत सारे अद्भुत गुणों से युक्त अवतार था। दशरथ के लिए वह प्यारा और आज्ञाकारी उत्तराधिकारी था; कौशल्या का एक देखभाल करने वाला और कोमल पुत्र। उनके भाई उनकी नायक मान कर पूजा करते थे। जब मैंने उस दृश्य को बार-बार पढ़ा, जहां वह अपने पिता की प्रतिज्ञा का शांति से पालन करते हुए, भरत को राजगद्दी सौंपते हुए, अयोध्या छोड़ देते हैं, इसे पढ़ कर मैं जार-जार रोती। लेकिन राम शांत और संयमित बने रहे। जब व्याकुल भरत उनके पास आता है, तो वह हमेशा की तरह उससे प्यार करते हैं लेकिन स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वह अपने पिता से किए गए वादे के खिलाफ नहीं जा सकते।

          मुझे विशेष रूप से वह दृश्य बहुत पसंद आया जहां राम की मुलाकात निषादों के राजा गुहा से होती है, और अयोध्या के राजकुमार और अपेक्षाकृत छोटी स्वदेशी जनजाति के इस शासक के मध्य एक दूसरे के प्रति प्रेम, सौहार्द और सम्मान है। राम ऋषियों के दयालु रक्षक का उत्तरदायित्व भी निभाते हैं। वे सुग्रीव को उसके राज्य को वापस पाने में मदद करते हैं। हालांकि इस जीत के लिए जिस तरीके से एक गुप्त स्थान से सुग्रीव के भाई बाली को तीर से मारा, इस घटना ने मुझे बहुत परेशान किया, लेकिन मैंने इसे पार कर लिया। इन सभी मामलों में, राम जाति या वर्ग या सामाजिक प्रतिष्ठा की परवाह नहीं करते हैं। मैंने इसके लिए उनकी प्रशंसा की।

 

          वनवास के दौरान कैसे राम ने सीता की देखभाल की और उन्हें सुरक्षित और आरामदायक रखने की कोशिश की, कैसे अपने बेहतर फैसले के खिलाफ वह सोने का हिरण लाने गए क्योंकि सीता उसे चाहती थी। जब सीता का अपहरण कर लिया गया था तो वे कितने व्याकुल थे, कैसे उन्होंने सचमुच सीता को बचाने के लिए समुद्र को बांध दिया था। कैसे वे विजयी होकर अयोध्या लौटे और देवताओं के आशीर्वाद से उन्हें राजा और रानी का ताज पहनाया गया। बीच में एक समस्या थी, सीता की बेगुनाही का परीक्षण करने के लिए अग्नि परीक्षा, लेकिन अग्नि देवता द्वारा सीता के गुणों की घोषणा के साथ यह खुशी से समाप्त हो गई, इसलिए मैंने फिर से इसे नजरअंदाज कर दिया।

 

          राम एक अद्भुत राजा मर्यादा पुरूषोत्तम थे, उन्हें धर्म का सर्वोच्च आचरण करने वाला कहा जाता है। लेकिन जैसे ही मैंने नारीत्व में प्रवेश किया, कुछ अप्रत्याशित घटा। सीता के बारे में मेरे दृष्टिकोण में अभूतपूर्ण विलक्षण जागरूकता आ गई। मैंने अब उसे एक आज्ञाकारी बहू, एक विनम्र पत्नी के रूप में नहीं देखा जो जंगल में राम और लक्ष्मण के बीच चलती है और न ही एक ऐसी युवती के रूप में जो रावण के डर से रोती है। मैं अमर चित्र कथा और टीवी की रामायण से आगे बढ़ गई। मैंने वाल्मिकी, कंब, कृत्तिबास और अदभुत रामायण को पढ़ा। मुझे एहसास हुआ कि सीता वास्तव में कितनी शक्तिशाली थी, अपने अनोखे शांतिपूर्ण अंदाज में। मैं उसके पक्ष में क्रोध से भर गई क्योंकि मुझे यह एहसास हुआ कि जब वह गर्भवती थी तो राम ने उसे शहर की तीखी गपशप के कारण कितने गलत तरीके से वाल्मिकी के आश्रम में निर्वासित कर दिया था। राम के क्रूर परित्याग के बावजूद उसने कितनी शालीनता और साहसपूर्वक अपने बेटों को जंगल में पाला और अंत में कैसे उसने एक और अनुचित अग्नि परीक्षा से गुजरने से इनकार कर दिया।

          मैं सीता के राम से घृणा करना चाहती थी, लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकी। पुस्तकों के व्याख्यान ने मुझे राम के बारे में एक अंतिम, जटिल अहसास कराया और यह सीता ही थीं जिन्होंने मुझे यह सिखाया था कि उनके साथ इतना कुछ घटित होने के बावजूद उन्होंने कभी भी राम से नफरत या उनका अनादर नहीं किया बल्कि वे हमेशा उनसे प्यार करती रहीं। क्योंकि वह उस कठिन पंथ को समझती थी जिसका सामना राम को करना पड़ा था। वह अपने दिल की इच्छा के साथ जा सकता था और निर्दोष सीता को अपनी प्यारी रानी के रूप में अपने साथ रख सकता था, भले ही इससे अयोध्या में कानून और व्यवस्था बाधित हो सकती थी। अपने पिता दशरथ के विपरीत, जिन्होंने कैकेयी की राम को निर्वासित करने की अनुचित मांग को स्वीकार कर लिया था, और वही किया जो राज्य के लिए सर्वोत्तम था भले ही इस कारण सीता और राम के हृदय के टुकड़े हो गए। उनके पास समझौता करने का कोई रास्ता नहीं था - ठीक उसी तरह जब सीता के पास भी कोई विकल्प नहीं था उन्होंने अखंडता का रास्ता चुना, अयोध्या में अग्नि परीक्षा देने से इनकार कर दिया और फिर से अपने पति और बच्चों से मिलने की आशा का परित्याग कर सदा के लिए धरती माँ के गोद में समा गई।

 

          यहां वह अंतिम सबक है जो मैंने राम और सीता की कालजयी कहानी से सीखी: कभी-कभी हमारी सार्वजनिक भूमिकाएं और मूल्य हमारी निजी भूमिकाओं और मूल्यों के साथ गहराई से टकराते हैं। कभी-कभी, दुनिया के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाने के लिए, हमें अपने निकटतम और प्रियतम के प्रति लापरवाह, यहां तक कि क्रूर भी होना होगा। युद्ध के मैदान से लेकर बोर्डरूम तक, हर जगह नायक इस दुविधा का सामना करते रहते हैं। इसका समाधान कभी आसान नहीं होता।

 

          मैं राम और सीता की इस महान जोड़ी को सलाम करते हुए अपनी बात समाप्त करती हूं, जिनके पास आज भी हमें सिखाने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन मुझे सीता के बलिदान को पहले रखना होगा और कहना होगा, जय सियाराम!

(दिवाकरुनी की पुस्तक "द फॉरेस्ट ऑफ एनचांटमेंट्स' पर आधारित)

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