शनिवार, 1 मार्च 2025

सूतांजली मार्च 2025

 


चाहे कोई सफलता की किसी भी हद तक क्यों न पहुंचे,

जमीन से जुड़े रहना जरूरी है।

जब आप आसमान छूएँ, शांत रहें। मितव्ययी बनें। विनम्र रहें।

अमीर और मशहूर सम्मान पाते हैं।

कीमती और महंगी गाड़ियों से कृत्रिम नशा मिलता है।

लेकिन ओला / उबर से आपको निश्चित रूप से शांति मिलती है।

दिखावे से ज़्यादा सादगी को महत्व दें।

-    वेलुमनी (थायरोकेयर के संस्थापक)

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अहंकार – सहायक भी, अवरोधक भी  

            प्रशांत, कॉलेज के एक युवा छात्र के आध्यात्मिक गुरु हैं श्री स्वामीनाथन, जो एक महान विद्वान और तंत्र योग में निपुण हैं। प्रशांत अपने गुरु के आश्रम का ही एक निवासी है। प्रशांत ने अपने गुरु को अपने एक मानसिक संघर्ष के बारे में लिखा कि उसे अपने सहपाठियों से अपनी श्रेष्ठता की भावना महसूस होती है। उसे लगता कि यह उसका अहंकार है लेकिन प्रशांत अपने को इससे मुक्त नहीं कर पा रहा था।

            उसके गुरु ने जवाब दिया, "इस भावना को बनाये रखो। अपने सहपाठियों पर श्रेष्ठता की गरिमापूर्ण भावना रखने में कुछ भी गलत नहीं है, बशर्ते तुम अपने मन में उच्च आदर्शों को बनाये रखो। यह भावना तुम्हें एक महान जीवन के लिये जागृत करता रहेगा। यह भावना तुम्हें तुम्हारे सहपाठियों के स्तर तक गिरने से रोकेगा और उन सभी हानिकारक आदतों और मूर्खतापूर्ण चीजों में फंसने से रोकेगा जो वे करते हैं।"

            अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद, प्रशांत आश्रम में अपने गुरु से मिलने पहुंचा। स्वामीनाथन ने प्रशांत का गर्मजोशी से स्वागत किया और कहा कि उसने अपने जीवन का एक पड़ाव पार कर लिया है और उसे अब यात्रा के अगले पड़ाव पर जाने की तैयारी करनी है। प्रशांत ने बताया कि यही समझने और उनका सही मार्गदर्शन प्राप्त करने वह उनके पास आया है। स्वामीनाथन कुछ देर मौन रहने के पश्चात बोले: "तुम्हारा आध्यात्मिक झुकाव बहुत प्रबल है और तुम आध्यात्मिक आदर्शों के प्रति खुले हो। तुम्हारे सामने दो विकल्प हैं-

१.     तुम नौकरी कर सकते हो, विवाह कर सकते हो और गीता में बताये गये  मार्ग के अनुसार अपना जीवन व्यतीत कर सकते हो। अपने काम में ईमानदार और कुशल बने रहो, धन कमाओ लेकिन  निःस्वार्थ भाव से अपने परिवार और समाज के गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करो। एक गृहस्थ के रूप में अपनी सभी जिम्मेदारियों को ईमानदारी से पूरा करो। अपने काम के दौरान जो भी सुख, आराम या विलासिता तुम्हें मिले, उसका आनंद लो। लेकिन इन सुखों को लालच में न बदलने दो। दूसरों के साथ अपने रिश्ते में दयालु, परोपकारी और क्षमाशील बनो। निरंतर ईश्वर को याद करो और अपने सभी कार्य, जीवन और कर्म ईश्वर को समर्पित करो। लेकिन, 

२.     अगर तुमको लगता है कि तुम इसके लिये तैयार हो, तो इस चरण को छोड़ आश्रम में पूर्ण आध्यात्मिक जीवन के लिये शामिल हो जाओ। लेकिन अगर तुम इसके लिये तैयार हो तब मुझे अपने गुरु से तुम्हारे बारे में पूछना होगा।

लेकिन कोई भी निर्णय लेने से पहले इन विकल्पों पर ध्यानपूर्वक विचार कर लो।

       प्रशांत ने गुरु की बातें ध्यान से सुनीं, विचारमग्न मौन रहने के बाद उसने कहा, "लेकिन मेरा सांसारिक जीवन में कोई झुकाव नहीं है। मैं इस आश्रम में शामिल होना चाहता हूं और अपने गुरु के मार्ग पर चलना चाहता हूं।"

            स्वामीनाथन ने मुसकुराते हुए कहा, "जल्दबाजी में कोई निर्णय न लो। तुम यहाँ के शांत वातावरण में कुछ  दिन रहो। इससे तुम्हारा मन भी शांत होगा। मैंने जो कहा उस पर चिंतन-मनन करो। ईश्वर से प्रार्थना करो कि तुम्हें ईश्वर की इच्छा के अनुरूप सही विकल्प चुनने में सहायता मिले।"

            प्रशांत ने अगला दिन लगभग पूरी तरह से चिंतन में बिताया। तत्पश्चात, उसने अपने गुरु से निश्चय के साथ कहा, "सर मुझे गहराई से लगता है कि आपने जो रास्ता चुना है, वही मेरे लिये सही रास्ता है। मुझे वैवाहिक  शादीशुदा जीवन में कोई दिलचस्पी नहीं है।"

            स्वामीनाथन ने कहा अब जब तुम इसके लिये अंदर से तैयार हो, मैं अपने गुरु से बात करूंगा। एक हफ़्ते बाद, प्रशांत को अपने गुरु से एक पत्र मिला, तो उसने बड़ी उम्मीद और चिंता के साथ पत्र खोला। पत्र में स्वामीनाथन ने सूचना दी थी कि गुरु ने उसके चयन को मंजूरी दे दी है। प्रशांत के माता-पिता महान आत्मा वाले थे। उन्होंने प्रशांत की आत्मा के चयन को मंजूरी दी और उसे जाने दिया।

       आश्रम में आने के कुछ महीने बाद, एक दिन स्वामीनाथन ने अपने शिष्य से कहा, "प्रशांत, यहाँ तुम्हारा पहला आंतरिक कार्य अपनी चेतना से श्रेष्ठता की भावना को खत्म करना है। इसका एक भी निशान वहाँ नहीं रहना चाहिये।" प्रशांत हैरान था क्योंकि यह उसके गुरु द्वारा कही गई बातों के विपरीत था,"लेकिन सर, जब मैं कॉलेज में था, तब आपने मुझे अपनी श्रेष्ठता की भावना को बनाये रखने के लिये कहा था।" स्वामीनाथन ने मुस्कुराते हुए  उत्तर दिया, "क्योंकि उस वातावरण में यह तुम्हारी गरिमा और चरित्र को बनाये रखने में मददगार था और तुम्हें आस-पास के वातावरण के निम्न स्तर पर जाने से रोकता। लेकिन अब तुम एक बिल्कुल अलग अवस्था में प्रवेश कर चुके हो। तुम आध्यात्मिक पथ पर कदम रख चुके हो; इस पथ पर तुम्हें जो विकसित करना है वह सच्ची विनम्रता है न कि श्रेष्ठता की भावना। यदि तुम श्रेष्ठता की भावना को बनाये रखोगे, तो यह केवल तुम्हारे अहंकार को बनाये रखेगा और तुम्हारी आध्यात्मिक प्रगति को अवरुद्ध करेगा।"

            प्रशांत ने पूछा, "क्या इसका मतलब यह है कि जो चीज एक स्तर पर सहायक है, वह अन्य स्तर पर बाधा बन जाती है?"

            "बिलकुल", स्वामीनाथन ने उत्तर दिया, "हमारे गुरु की एक सूक्ति इस सिद्धांत को सरल और प्रभावशाली शब्दों में प्रस्तुत करती है: 'अहंकार सहायक है, अहंकार ही बाधा है। इच्छा ही सहायक है, इच्छा ही बाधा है। इसमें विकास के चरणों का वर्णन है। पहला चरण वह है जहाँ अहंकार और इच्छा सहायक होते हैं। सभी आध्यात्मिक गुरुओं ने अहंकार और इच्छा के त्याग का उपदेश दिया। लेकिन यह नहीं पहचाना जाता है कि यह सलाह केवल दूसरे चरण में आध्यात्मिक साधकों पर लागू होती है और इसे पूरी मानवता के लिये एक नियम या सिद्धांत के रूप में प्रचारित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि मानवता का एक बड़ा हिस्सा अभी भी पहले चरण में है जहाँ अहंकार और इच्छा सहायक हैं। दूसरे, हम मनुष्य कई सहस्राब्दियों से अहंकार और इच्छा से प्रेरित हैं। आध्यात्मिक गुरुओं के कहने से एक झटके में और अचानक इच्छा का त्याग करना आसान नहीं है, क्योंकि अहंकार और इच्छा के सभी सहस्राब्दी संस्कार हमारे भीतर हैं, अवचेतन में अंतर्निहित हैं। उन्हें पहले व्यक्ति के प्रगतिशील विकास के लिये इस्तेमाल किया जाना चाहिये और फिर एक सचेत आंतरिक अनुशासन के माध्यम से समाप्त किया जाना चाहिये।" व्यक्ति को पहले चरण से क्रम-बद्ध तरीके से दूसरे चरण में लाने के बाद ही अहंकार का त्याग संभव है।

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परोपकार का सिद्धान्त

            डेविड राकॉफ़ लिखते हैं “परोपकार जन्मजात भावना है, लेकिन यह भावना सहजता से जागृत नहीं होती। हर कोई इसके लिए तैयार तो रहता है, लेकिन इसे जागृत करना होता है।”

          परोपकार, यानि दूसरों की निस्वार्थ भलाई करना, सेवा करना, चिंता करना। यह एक ऐसा आदर्श है जो सुनने में अच्छा तो लगता है लेकिन भौतिक जगत में शायद ही इसका कोई अस्तित्व है। अक्सर सबसे नेक इन्सान में भी, जो पूरी तरह से निःस्वार्थी प्रतीत होता है, कहीं-न-कहीं अतिसूक्ष्म रूप में ही सही, स्वार्थ छिपा होता है। स्वार्थरहित होना निःस्वार्थी होने से एक कदम आगे है। स्वार्थ-रहित होने का मतलब है अहंकार को जड़ से उखाड़ देना जो दुनिया को दो हिस्सों में बांटती है: एक तरफ मैं अकेला और दूसरी तरफ बाकी पूरी दुनिया। इस अहंकार का पूरी तरह से खत्म होना आध्यात्मिक विकास की चरम सीमा की पहचान है।

            स्वार्थ इस बुनियादी तथ्य पर आधारित है कि मैं जीना चाहता हूँ लेकिन मैं हर तरफ अन्य अनंत विविध जीवों से घिरा हुआ हूँ और वे भी जीना चाहती हैं। दूसरों के जीने की इच्छा मेरे अस्तित्व के साथ संघर्ष में हो सकती है। मानव मन को पूर्ण स्वार्थी जीवन में कम-से-कम तीन चीजें दोषपूर्ण लगती हैं-

पहला, मैं अपने अस्तित्व के लिए उन अन्य जीवों पर निर्भर करता हूँ; इसलिये, अगर मुझे जीना है, तो कम-से-कम उन सभी जीवन रूपों को जीना होगा जिन पर मेरा अस्तित्व निर्भर करता है।

दूसरा, तर्कसंगत होने के नाते, मैं तर्क भी देता हूँ कि जैसे मुझे जीने का अधिकार है, वैसे ही दूसरों को भी जीने का अधिकार है। और,

तीसरा, दूसरों के अस्तित्व और कल्याण से बेपरवाह होना मुझे कहीं गहरे में असहज महसूस कराता है।

            इस प्रकार, जब भी मैं दूसरों के कल्याण के बारे में सोचता हूँ, तो मैं अपनी कुछ भौतिक, मानसिक या आध्यात्मिक ज़रूरतों को पूरा करता हूँ। जब मैं किसी दान के लिए चेक लिखता हूँ, तो इससे मुझे मिलने वाली संतुष्टि मेरे लिये दूसरों के लिये किये जाने वाले अच्छे काम से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है। 

            अहंकार और परोपकार विपरीत प्रतीत होते हैं, लेकिन परोपकार में अहंकार का एक तत्व छिपा होता है। विचारों और भावनाओं को शुद्ध करने के साथ-साथ अपने परोपकारी कार्यों से अहंकार के तत्व को समाप्त करने की आवश्यकता महसूस होती है। परोपकार का यह कार्य यथासंभव गुप्त रखकर किया जा सकता है। लेकिन इस ठोस कदम से भी अधिक महत्वपूर्ण है आंतरिक कार्य जो परोपकारी कार्यों के साथ आने वाली प्रवृत्ति को प्रभावित करता है:

पहला, मैं जिसे दे रहा हूं उस पर कोई उपकार नहीं कर रहा हूं, जिसे दे रहा हूं वह मुझे सेवा करने का अवसर देकर मेरा उपकार कर रहा है।

दूसरा, मैं देने वाला नहीं हूं, मैं केवल उस चीज को आगे बढ़ाने का एक साधन हूं जो मुझे ईश्वर ने दी है। और,

तीसरा, मैं ईश्वर का आभारी हूं, जिनकी कृपा से मुझे देने की भूमिका सौंपी गई है।

देनहार कोई और है देवत है दिन रैन

            भाग्य में बस एक छोटे से बदलाव से, देने वाला और लेने वाला एक दूसरे की जगह हो सकते थे।

            अंत में, देने वाले और लेने वाले का अलग-अलग व्यक्ति होना केवल एक आंशिक वास्तविकता है। वास्तव में, दोनों एक हैं, और दोनों की स्थायी वास्तविकता ईश्वर ही है। आध्यात्मिक अर्थ में, यह ईश्वर द्वारा ईश्वर को दिया जाने वाला दान है, जो ईश्वर को दिया जाता है। यह ईश्वर से आता है, और ईश्वर के पास ही लौटता है। यह अहंकार के विघटन के साथ होने वाली अनुभूति है जो आध्यात्मिक विकास के शिखर पर पहुँचती है।

            क्या किसी व्यक्ति को वास्तव में परोपकारी कार्य करने में सक्षम होने से पहले विकास के इस स्तर तक पहुँचना आवश्यक है? नहीं, यह केवल आवश्यक नहीं है, बल्कि ऐसा क्रम बहुत अवास्तविक है। आध्यात्मिक विकास एक सतत प्रक्रिया है, जिसे परोपकारी कार्यों द्वारा सहायता प्राप्त होती है। प्रेम का कोई भी कार्य, किसी भी प्रकार का आत्म-दान, भले ही अपूर्ण रूप से किया गया हो, आध्यात्मिक विकास की ओर एक कदम है। जैसा कि स्वामी विवेकानंद ने कहा था, जब भी आप किसी और के बारे में प्रेम से सोचते हैं, तो आप ईश्वर की ओर एक कदम बढ़ाते हैं। आध्यात्मिक पथ पर प्रगति ऐसे कदमों का संचयी परिणाम है। आध्यात्मिक पथ पर जितना आगे बढ़ा जाता है, परोपकारी कार्यों में अहंकार का तत्व उतना ही कम होता जाता है।

            परोपकार, एक मानवीय आवश्यकता है। सवाल यह नहीं है कि हमें दूसरों के बारे में चिंतित होना चाहिए या नहीं, बल्कि यह केवल परोपकार का आधार है। जैसा कि श्री अरविंद ने कहा है, "जीवन आत्म-पूर्ति है जो पारस्परिकता के आधार पर आगे बढ़ता है; इसमें एक दूसरे द्वारा पारस्परिक सहयोग, और अंत में सभी के द्वारा सभी का सहयोग शामिल है। अहम प्रश्न यह है कि क्या यह सहयोग अहंकार के निम्न स्तर यानि संघर्ष, घर्षण और टकराव के साथ किया जायेगा? या क्या यह हमारे अस्तित्व के उस उच्च स्तर यानि सामंजस्य, मुक्त पारस्परिकता और एकता के साधन द्वारा किया जायेगा?"

            हमारा चुनाव ही यह सिद्ध करेगा कि हम दानव बन रहे हैं या मानव? 

(डॉ रमेश बीजलनी की रचना पर आधारित)

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शनिवार, 1 फ़रवरी 2025

सूतांजली फरवरी 2025


 

                  बस अंत नहीं, बसंत है यह, गूँजे दिक-दिगंत यह,

                              वनदेवी आज शृंगार करे, हम मिल कर यह निनाद करें

माँ अज्ञान हमारा दूर करे।

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हे धरती माँ

 (श्री विजय दत्त श्रीधर के लेख पर आधारित)

          हमारे पुराने संस्कृत ग्रन्थों में कहाँ, क्या और कितना दबा पड़ा है शायद हमें इसकी कोई जानकारी नहीं है। जल-शुद्धि की एक संगोष्ठी में उपस्थित समुदाय संस्कृत-साहित्य में भारत की प्राचीन परंपरा और तकनीकों की चर्चा कर रहे थे। तभी एक वैज्ञानिक ने कहा - पुराना सोच पोंगा पंथ है, अनर्गल है, दकियानूसी है।  इतनी सी खरोंच भर करने से जो अमृत छलका वह जानने योग्य है। एक बुजुर्ग ने प्रत्युत्तर में 'भविष्य पुराण' से एक श्लोक पढ़ा जिसका अर्थ है-

'दस कुओं के बराबर एक बावड़ी, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष।'

और - रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून। पानी गये न ऊबरे मोती मानुष चून ।।

      दोनों उद्धरण निरुत्तर कर देने वाले हैं। वे पोंगापंथी नहीं हैं, सिद्ध विज्ञान हैं और लोक शिक्षण का चरम ज्ञान इनमें निहित है।

ऋषि मनीषा ने कहा है- (वृहदधर्म  पुराण, 54, 45-47)

'भाद्र कृष्ण चतुर्दशी को जितनी दूर तक गंगा का फैलाव रहता है उतनी दूर तक दोनों तटों का भू-भाग 'गर्भ' है। उसके बाद 150 हाथ की दूरी का भू-भाग 'तीर' है। तीर से एक गव्यूति (दो हजार धनुष, जो एक कोस या दो मील के बराबर होता है) पर्यंत का भू-भाग क्षेत्र कहलाता है। इस विस्तार में पाप कर्मों का निषेध है।'  व्यवहार में इसका अर्थ है कि जल स्त्रोत के तट से पर्याप्त दूरी तक निवास-वाणिज्य-व्यापार-कल-कारखाने समेत ऐसी किसी भी गतिविधि की इजाज़त नहीं है।

          ताज्जुब है, सैकड़ों साल पहले ऋषि मनीषा को यह ज्ञान-विवेक था!

          'मत्स्य पुराण' में तड़ाग भेदक (तालाब तोड़ने वाले) के लिए जल में डुबो कर मृत्यु दंड देने का प्रावधान है। 'अग्नि पुराण' में भी ऐसा मिलता है। चाणक्य नीति में भी ऐसे दंड का विधान है। लेकिन आज़ादी के बाद सरकारी निकायों द्वारा बनवायी जा रही जल संरचनाएं भ्रष्टाचार के गारे से इतनी बदहाल है कि तड़ाग भेदन के अपराध की नींव पर ही खड़ी होती हैं।

          राजा भोज का भोजताल एक हजार साल से कायम है। परंतु, हजारों करोड़ रुपये की लागत और आधुनिक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के प्रयोग से बनने वाले बांध की एक हज़ार तो क्या, एक सौ साल की गारंटी कोई नहीं दे सकता है।

          बुंदेलखंड, बघेलखंड, मालवा अंचल में नवजात शिशु के जन्म के सवा महीने बाद सद्य-प्रसूता मां घर से बाहर पहला कदम कुएं की ओर रखती है। इस रस्म को कुआं पूजन कहते हैं। निमाड़ में इसका रूप जलवायु पूजन का है। सनातन धर्म को मानने वालों के प्रमुख आराध्य देव हैं विष्णु, शिव, गणेश तथा देवियों में दुर्गा-लक्ष्मी-सरस्वती। इन्हीं की सबसे ज़्यादा पूजा होती है। तब गृह लक्ष्मी का पहला कदम मंदिर की ओर क्यों नहीं? पहली पूजा के लिए जल (कुआं) को सर्वोपरि महत्व क्यों? सवाल  कठिन है लेकिन जवाब सरल है। हमारे पुरखों को जीवन के लिए जल के महत्व की पहचान थी। वे जानते थे कि जल है तो जीवन है और जो जीवनदाता है वही देवता है। वाचिक परम्परा वाली भारतीय संस्कृति में ऐसे लोक-विज्ञान के लिए शोध-पत्र नहीं रचे गये। पेटेण्ट की होड़ नहीं लगी बस, संस्कारों के अनुशासन में वर्जना और प्रोत्साहन को ढाल दिया गया पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनका अनुपालन-अनुकरण होता रहा। मर्म की समझ जहां कमज़ोर पड़ी वहीं विकारों ने डेरा डाल लिया।

    

इलाहाबाद के अंग्रेज़ कमिश्नर हॉकिन्स ने कोई एक शताब्दी पहले फरमान निकाला-शहर की गंदगी गंगा में बहा दी जाये। बाद के वर्षों में गुलाम मानसिकता ने इसे देशभर के लिए कानून मान लिया। इससे शहर तो साफ़ नहीं हुए, नदियां ज़रूर मौत के मुंह में समाने लगीं। धर्म के ठेकेदारों के लिए भी यह निहायत शर्मनाक है, जो नदियों को देवी मां की तरह पूजते और आरती के आडम्बर तो रचते हैं, परंतु उनकी शुद्धि के लिए न तो सचेष्ट हैं, न जागरूक हैं और न ही समाज की चेतना को जाग्रत करने का दायित्व निभा रहे हैं। प्रकृति-चिंतक अमृतलाल वेगड़ कितना सही कहते हैं, 'जब मनुष्य असभ्य था तब नदियां स्वच्छ थीं। आज जब मनुष्य सभ्य हो गया है तब नदियां मलिन और विषाक्त हो गयी हैं..। ज्यों-ज्यों औद्योगिक सभ्यता का दबदबा बढ़ता गया पानी के बुरे दिन शुरू हो गये।'

          इसके विपरीत, औद्योगिक सभ्यता के कई सौ बरस पहले भारतीय ऋषि मनीषा ने जल स्रोतों के साथ मनुष्य के बरताव की लक्ष्मण-रेखा खींच दी थी। उस पर अमल भी किया जाता रहा।

मनुस्मृति, (4-56) में लिखा है - पानी में मल, मूत्र, थूक, रक्त या विष का विसर्जन न करें।  

'नारायणोपनिषद' में कहा गया है-  'जल ही विश्व में सर्वभूत है, जल ही प्राण है, जल ही पशु है, जल ही ब्रहा है, जल ही अमृत है, जल ही स्वराज है, जल ही वेद है, जल ही आकाश है, जल ही सत्य है और जल ही तीनों लोक हैं।' जल और प्रकृति की ऐसी समझ लोक- ज्ञान का चरम है।

          न केवल मानव जीवन बल्कि समूची सृष्टि के लिए शुद्ध जल की अनिवार्यता से अवगत वैदिक ऋषि कामना करता है- (अधर्ववेद, भूमि-सूक्त, 12/1/30)

जो जल संपूर्ण जगत के प्राणियों में जीवन का संचार करने वाला है वह जल स्वयं शिव है। इसलिये जल की पूजा यानि उपयोग करना जानी चाहिये न कि अपव्यय।

          सन् 1732 ईस्वी की घटना है। राजस्थान की जोधपुर रियासत में खेजड़ी वृक्षों की रक्षा करते हुए विश्नोई समाज की 69 महिलाओं और 294 पुरुषों ने प्राण न्योछावर कर दिये थे। इस कुर्बानी ने राजसत्ता के कुल्हाड़ों को वृक्ष-संहार बंद करने पर विवश कर दिया था। राजस्थान में उक्ति प्रचलित है- 'सीस कट्या रूख बचे तो भी सस्ता जाण।' तात्पर्य यह कि जान देकर भी पेड़ बच जाए तो सौदा घाटे का नहीं।

          लोक व्यवहार में पीपल का वृक्ष काटना और उसकी लकड़ियां जलाना वर्जित किया गया है। लोक की आस्था को इससे जोड़ दिया गया। पीपल में विष्णु और वट (बरगद) में शिव का वास माना गया। दोनों दीर्घायु और विशालकाय वृक्ष होते हैं। वातावरण को शुद्ध करने की अपार क्षमता होने के कारण ही ऐसे वृक्ष में देवत्व का वास माना गया। पीपल, वट कटने से बच गये।

          औषधीय गुणों के कारण ही नीम में शीतला माता का वास माना गया। वट-सावित्री व्रत का विधान किया गया। एक व्रत आंवला नवमी का होता है। अशोक का भी औषधीय महत्व है। फलदार-फूलदार पेड़-पौधों को आस्था के लोकाचार और वर्जना के निषेध के साथ जोड़कर संरक्षित किया गया। बचपन में हमें सिखाया जाता था कि शाम होने के बाद पौधों को हाथ नहीं लगाना चाहिए, वे सो जाते हैं। जड़ी-बूटियां चमत्कारी औषधीय गुणों से सम्पन्न हैं। वनवासी समाज बड़ी सूझबूझ और कौशल के साथ इनका प्रयोग उपचार और आरोग्य के लिए सदियों से करता आ रहा है।

          अथर्ववेद का भूमि सूक्त वस्तुतः भारतीय संस्कृति की पर्यावरण चेतना का उद्घोष है। वैदिक ऋषि प्रकृति के समस्त उपादानों से अनुकूल रहने की प्रार्थना करते हुए कहता है- (अथर्ववेद, 1, 3, 15)  सभी नदियां हमारे अनुकूल बहें, वायु हमारे अनुकूल बहे, पक्षी भी हमारे अनुकूल हों।

          अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में कहा गया है- 'हे धरती मां! जो कुछ मैं तुझसे लूंगा वह उतना ही होगा जिसे तू पुनः पैदा कर सके। तेरे मर्मस्थल पर या तेरी जीवन शक्ति पर कभी आघात नहीं करूंगा।' वास्तव में यह सोच मनुष्य के पशु-पक्षी, नदी-पर्वत, जड़-चेतन के साथ सह-अस्तित्व के रिश्ते की है। वृक्ष हमें  प्राणवायु देते हैं और कार्बन डाइ ऑक्साइड सोख लेते हैं। यही वृक्षों का शिवत्व है, महत्व है।

          ... आधुनिक विज्ञान की दुधारी स्थिति है। उसे भी वरदान और अभिशाप की कसौटी पर परखा जाना अभीष्ट है। परमाणु शक्ति की सृजन और विनाश के सामर्थ्य को पहचानें। इससे ऊर्जा पायी जा सकती है तो नागासाकी-हिरोशिमा जैसे भीषण विध्वंस भी रचे गये हैं। चिकित्सा के वरदानों पर तालियां बजाइये तो घातक शस्त्रों पर लानत भेजिये, ध्वनि तरंगों से सूचना-संवादों का संचार कीजिये, तो दंगे-फसाद भी भड़काए जाते हैं।  रासायनिक खाद कीटाणुनाशक खेती में सहायक हो सकते हैं तो उनका अतिरेक मिट्टी की उर्वरा शक्ति को निगल भी सकता है; कैंसर जैसी व्याधियां फैला सकता है। जल-प्रदूषण, कार्बन उत्सर्जन, वनों का विनाश, तपती धरती, सूखती नदियां, यमुना ग्लेशियरों पर मंडराता पिघल जाने का खतरा, बंजर होते खेत, मौत के मुंह में धकेलते रसायन और इस पर भी संयम को मुंह चिढ़ाती हुई लालच की मार..। यही तो इस समय के विकट सवाल हैं जिन्हें आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने पैदा किया है, पनपाया है।

          गांधी जी ने पश्चिम की औद्योगिक सभ्यता को राक्षसी सभ्यता कहा है। असंयमी उपभोक्तावाद और लालची बाज़ारवाद ने सृष्टि विनाश की नींव रखी। भारत का परम्परागत संयमी जीवन-दर्शन ही त्रासद भविष्य से बचाव का मार्ग सुझाता है। समाज में वैज्ञानिक चेतना का प्रसार ज़रूरी है। परम्परागत ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय एवं संतुलन ज़रूरी है। इसके लिए हमें लोक संस्कृति, लोक संस्कार और लोक परम्पराओं के पास लौटना होगा। हमारे सामने एक ही मार्ग है; जो प्रकृति सम्मत है वही ग्राह्य है और जो सृष्टि के विनाश का सरंजाम जुटाता है वह अग्राह्य है, अस्वीकार्य है। पृथ्वी का भविष्य इसी बात पर टिका है कि हम अस्वीकार्य के खिलाफ़ खड़े होंगे। पृथ्वी को मां समझकर ही हम जीवन के भविष्य की कोई सार्थक कल्पना कर सकते हैं।

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नारी - पुरुष

युगों से पुरुष अपने-आपको नारी से बड़ा समझता है तथा अपना प्रभुत्व जमाना चाहता है। उधर नारी अपने-आपको उत्पीड़ित अनुभव करती है और फिर परोक्ष या अपरोक्ष रूप में विद्रोह करती है। इन दोनों का यह झगड़ा युगों से चला आ रहा है;  मूल में यह एक ही है, पर यह अनगिनत रूप-रंगों में प्रकट होता है। यह स्थिति सिर्फ भारत या एशिया या और किसी समूह की या भौगोलिक प्रदेश की नहीं बल्कि पूरे विश्व की है।

          यह तो मानी हुई बात है कि पुरुष सारा दोष नारी पर थोपता है और नारी सारा दोष पुरुष पर। पर, वास्तव में, दोष समान रूप से दोनों का है और दोनों में से किसी को भी अपने-आपको दूसरे से बड़ा मानने का गर्व नहीं करना चाहिये। जब तक प्रधानता और हीनता का यह विचार दूर नहीं कर दिया जायेगा, तब तक कोई भी व्यक्ति इस भ्रान्ति को दूर नहीं कर सकेगा जो मानव जाति को दो विरोधी शिविरों में बांट देती है, और तब तक समस्या का कोई समाधान नहीं हो पायेगा।...

          अपने पारस्परिक सम्बन्ध में पुरुष और स्त्री एक दूसरे के पूरी तरह निरंकुश स्वामी और साथ ही कुछ दयनीय दास भी होते हैं। हां, सचमुच दास; क्योंकि जब तक मनुष्य में इच्छाएं हैं, अभिरुचियां और आसक्तियां हैं, तब तक वह इन वस्तुओं का और उन व्यक्तियों का भी दास है जिन पर वह इन इच्छाओं की पूर्ति के लिए निर्भर रहता है। अतएव, स्त्री, पुरुष की दासी इसलिए है कि वह पुरुष और उसके बल के प्रति आकर्षण अनुभव करती है, उसके अन्दर घर बसाने की इच्छा होती है, वह घर से प्राप्त होने वाली सुरक्षा को चाहती है, और अन्त में उसके अन्दर मातृत्व के प्रति मोह भी होता है। इधर पुरुष भी स्त्री का दास है, अधिकार भावना के कारण, शक्ति और प्रभुत्व की तृष्णा के कारण, काम-वासना की तृप्ति की इच्छा तथा विवाहित जीवन की छोटी-मोटी सुख-सुविधाओं के प्रति आसक्ति के कारण।

          इसलिये कोई भी कानून स्त्री को तब तक बन्धनमुक्त नहीं कर सकता जब तक वह स्वयं ही बन्धन-मुक्त न हो जाये। इसी प्रकार पुरुष भी अधिकार जमाने की आदतों के होते हुए तब तक दासता से मुक्त नहीं हो सकता जब तक वह अपने अन्दर की सारी दासता से मुक्त न हो जाये।...

          जब तक समस्या का सुखद और आमूल समाधान नहीं हो जाता, भारतवर्ष और बातों की भांति इस बात में भी उन प्रचण्ड विरोधात्मक भेदों का देश रहेगा। वस्तुतः, क्या भारतवर्ष में ही उस परमा जननी की अत्यधिक तीव्र भक्ति और पूर्ण उपासना नहीं की जाती जो विश्व को बनाने वाली और शत्रुओं पर विजय पाने वाली है, जो समस्त देवताओं और समस्त जगतों की माता है, सकल वरदायिनी है?  और क्या भारत में ही हम स्त्री-तत्त्व, 'प्रकृति', अर्थात्, 'माया' की अत्यन्त आमूल रूप में निन्दा और उसके प्रति अत्यधिक घृणा प्रदर्शित होते नहीं देखते?

          भारतवर्ष का सारा जीवन ही इस विरोध से सराबोर है, वह अपने मन और हृदय, दोनों में इससे पीड़ित है।... जो भी हो, जब तक एक ऐसी नयी जाति को, जिसे प्रजनन की आवश्यकता के अधीन होने की जरूरत न हो और जो सत्ता के दो पूरक लिगों में विभाजित होने के लिए बाध्य न हो, उत्पन्न करने के लिए प्रकृति को प्रेरित करने वाला नया विचार एवं नयी चेतना प्रकट नहीं हो जाते, तब तक वर्तमान मानवजाति की उन्नति के लिए अधिक-से-अधिक यही किया जा सकता है कि पुरुष और स्त्री दोनों के साथ पूर्ण समानता का व्यवहार किया जाये, दोनों को एक ही शिक्षा तथा प्रशिक्षा दी जाये तथा दिव्य वास्तविकता के साथ, जो कि समस्त लिंग भेदों से ऊपर है, सतत सम्पर्क स्थापित करके समस्त सम्भावनाओं और समस्त समस्वरताओं के उद्‌गम को प्राप्त किया जाये।

          और तब शायद भारतवर्ष, जो विषमताओं का देश है, नयी उपलब्धियों का देश बन जायेगा।

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बुधवार, 1 जनवरी 2025

सूतांजली जनवरी 2025


 

मनुष्य की महानता इसमें नहीं है कि वह क्या है,

बल्कि इसमें है कि वह किसे सम्भव बनाता है।

श्रीअरविंद

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नववर्ष 2025 के आगमन पर हार्दिक बधाई

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आदर्श नागरिक 

          विश्व की कुछ एक प्राचीन सभ्यताओं में एक ग्रीक सभ्यता का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। ग्रीक सभ्यता, यूनान और उसके आस-पास के इलाकों में लगभग 1,200 सालों तक रही। ग्रीक सभ्यता ने कई खोजें कीं जिनका आज भी हमारे जीवन पर असर है। उनका भाषा, राजनीति, शिक्षा, दर्शन, विज्ञान, और कला के क्षेत्रों में बहुत अहम योगदान रहा। ग्रीक विद्वानों में कुछ-एक जिनके नाम से हम परिचित हैं वे हैं होमर, हेरोडोटस, प्लेटो, अरस्तू इरेटोस्थनीज़, हिपार्कस, पोसिडोनियस, थेल्स, हिकेटियस आदि। इस सभ्यता की देन आज भी हमारा मार्ग दर्शन करती हैं।

       ग्रीक के प्रख्यात समाजशास्त्रियों ने मानव के व्यवहार और आचार-विचार के गहन अध्ययन के आधार पर यह बताया कि समाज में तीन प्रकार के लोग होते हैं। इसका सर्वप्रथम उल्लेख जनतंत्र की अवधारणा और समर्थन करने वाले विद्वानों द्वारा प्राचीन ग्रीस में मिलता है। उनके अनुसार किसी भी आधुनिक समाज में तीन प्रकार के लोग होते हैं:

१.      इडियट्स (idiots) – ग्रीक भाषा में इडियट शब्द का मतलब है, “अपना” या “निजी”। इसी से “आम आदमी” और बाद में “अज्ञानी व्यक्ति” का अर्थ आया। 'Idiots' का हिन्दी में अर्थ है - बेवकूफ़, मूर्ख, जड़ बुद्धि, जड़ मति, पागल, मंदबुद्धि व्यक्ति। इडियट शब्द का मूल अर्थ 'अज्ञानी व्यक्ति' था। हालांकि, आजकल इसका इस्तेमाल ज़्यादातर ऐसे व्यक्ति के लिये किया जाता है जिसके पास शिक्षा की कमी है और बुनियादी बुद्धि या सामान्य ज्ञान की कमी है। ग्रीक विद्वानों के अनुसार इडियट्स का अर्थ मूर्ख, जड़, मंद-बुद्धि या पागल नहीं, बल्कि उनके अनुसार ये वे लोग हैं जो पूरी तरह निजी, आत्म-केन्द्रित और स्वार्थी होते हैं। ये लोग सिर्फ-और-सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं, इन्हें अपने भले और सुख की ही परवाह होती है। वे इस संकीर्ण दायरे से बाहर नहीं निकलते। उन्हें समझ और सामाजिकता का जरा भी ज्ञान नहीं होता और वे इसकी कोई परवाह भी नहीं करते। इनमें किसी प्रकार का कोई कौशल नहीं होता, नैतिकता नहीं होती, चरित्र नहीं होता, गुण नहीं होता और वे समाज से कट कर रहने वाले लोग हैं। वे समाज को किसी भी प्रकार का कोई योग दान नहीं देते। अपने निजी विलास, सुख और सुविधा के अलावा और कहीं उनका ध्यान नहीं होता। ग्रीक समाजशास्त्रियों ने इन्हें जंगली लोगों का थोड़ा परिवर्तित और संवर्धित रूप बताया।

 

२.     ट्राइब्स (Tribes) – इसका मतलब है जनजातीय या आदिवासी। जनजाति से जुड़ी चीज़ों या उनके संगठित होने के तरीके का वर्णन करने के लिए ट्राइबल शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। जनजाति ऐसे लोगों का एक समूह होता है जो एक साथ रहते हैं और एक ही भाषा, संस्कृति, और इतिहास साझा करते हैं। यह वह सामाजिक समुदाय होता है जो राज्य के विकास से पहले अस्तित्व में था और आज भी हैं और राज्यों के बाहर ही रहते हैं। ग्रीक विद्वानों का तात्पर्य कोई विशेष जाति या प्रजाति से नहीं था बल्कि ये वे लोग हैं जिनकी सोच जनजाति / कबीले के लोगों की तरह होती है। वे अपने छोटे से संसार में ही रहते हैं जिसका एक छोटा सा समाज होता है, थोड़े से लोग होते हैं। उनका अपना पूर्व निर्धारित क्षेत्र होता है और वे उसी में रहते, विचरते और उससे चिपके रहते हैं, उसके बाहर नहीं निकलते। उनके अपने देवता ही उनके सर्वशक्तिमान ईश्वर स्वरूप होते हैं। वे किसी भी प्रकार की अलग, नयी चीजों और सोच से घबड़ाते हैं। उनके अपने समाज से बाहर के लोग उनके लिए दूसरी ग्रह के लोग हैं। वे उन्हें शक की नजरों से देखते हैं और वे हर समय इस प्रकार के नए लोगों को पूरी ताकत, उग्रता और हिंसा से प्रत्युत्तर देते हैं। ग्रीक विद्वानों ने यह भी बताया कि युद्ध करना इन्हें प्रिय होता है। ये अपने समाज की दुनिया से बाहर नहीं निकलते, अलग-थलग रहते  हैं, बाहर के सभ्य समाज से न कोई इनका सरोकार होता है और न ही कोई संपर्क।


 

३.     सिटिज़न (Citizen)  – सिटीजन का मतलब है नागरिक यानि किसी देश का कानूनी रूप से संबंधित व्यक्ति। नागरिक शब्द के अन्य अर्थ हैं निवासी, नगरवासी, स्थानीय-निवासी, आदि।

 

 ग्रीक विद्वानों ने नागरिक शब्द का इस्तेमाल उस व्यक्ति के लिए किया जो किसी देश के प्रति निष्ठा रखता है और उसके संरक्षण का हकदार है। उसे अपने समाज, नगर, देश की तरफ़ से कुछ अधिकार मिलते हैं उसे अपने कर्तव्य निभाने का एहसास होता है। वह अपने अधिकारों का प्रयोग उन कर्तव्यों को निभाने के लिये करता है। इस संदर्भ में नागरिक का अर्थ कानूनी या राजनीतिक नागरिक से नहीं है। ये आदर्श व्यक्ति होते हैं। ये आदर्श व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में नागरिक हैं।

 

नागरिक का अर्थ कानून या राजनीतिक नागरिक नहीं बल्कि विचारों से नागरिक होना है। ये नागरिक वे व्यक्ति हैं जिनमें सार्वजनिक तौर पर रहने का ज्ञान और समझ होती है। वे यह जानते हैं कि वे समाज के एक सदस्य हैं और इसलिये वे सबों की भलाई के लिए जीते हैं। वे अपने अधिकार ही नहीं दूसरों के अधिकार और पसंद को भी समझते हैं। वे जैसे अपने अधिकारों के प्रति सजग होते हैं वैसे ही अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को भी समझते और उनका भी भली भांति निर्वाह करते हैं। अपने पड़ोसियों का और अल्पसंख्यकों का भी ख्याल रखते हैं। वे अपने आपसी मतभेदों को भी सभ्य तरीके से निपटा लेते हैं। ये ही वे लोग हैं जो एक सभ्य समाज का निर्माण और संरक्षण करते हैं। वे एक ऐसे समाज का निर्माण करते हैं जिसे सही अर्थों में एक सभ्य समाज कहा जाता है। एक ऐसा समाज जहां सब एक दूसरे के परिचित होते हैं, मित्र होते हैं उनमें मित्रता होती है।

       प्राचीन ग्रीक विद्वानों ने इंसान को इन तीन अलग-अलग समूहों में बांटा। जाने-अनजाने हर एक मानव यह निर्णय लेता है कि वह इन तीन समूहों में से किस समूह का इंसान है।

१.      केवल अपने  बारे में सोचने वाले मंद बुद्धि का समूह,

२.     ट्राइब्स की तरह ज्यादा सोच-विचार करने की क्षमता से हीन सिर्फ और सिर्फ अपने समूह में और उसी दायरे में रहना, या

३.     एक सभ्य समाज में विश्व में माने जाने वाले सभ्य नागरिक की तरह। 

हमें भी यह निर्णय लेना है कि इन तीनों में हम कैसा समाज, कैसा शहर, और कैसा देश चाहते हैं? और क्या हम वैसे बन रहे हैं? 

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असहयोग

(तत्कालीन काँग्रेस की बैठक में अपने असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव को स्वीकृत कराने के लिए गांधी ने बड़ी मेहनत की और प्रस्ताव को बड़े ज़ोरदार और तार्किक ढंग से पेश किया। गांधी-मार्ग पत्रिका ने उनके प्रस्तावों, तर्कों और शंका समाधानों को इतिहास से इकट्ठा कर प्रकाशित किया था। उसी के कुछ अंश आप तक पहुंचा रहा हूँ। इसकी पहली कड़ी अक्तूबर 2024 में थी, यहाँ उसकी दूसरी कड़ी प्रस्तुत है।)

विजय के मूलाक्षर : मैं भारत के एक सिरे से दूसरे सिरे तक इसी बात का पता लगाता घूम रहा हूं कि लोगों में सच्ची राष्ट्रीय भावना आई है या नहीं, लोग राष्ट्र की वेदी पर अपना सर्वस्व बलिदान करने को तैयार हैं या नहीं? और यदि कुछ लोग भी बिना कुछ बचाये रखे अपना सब कुछ होम देने को तैयार हों तो इसी क्षण मैं स्वराज्य आपके हाथ में रखवा देने को तैयार हूंइतना त्याग करने को लोग तैयार हैं? पदवीधारी अपनी पदवियां और सम्मान के पदों को छोड़ देने को तैयार हैं? मां-बाप देश की लड़ाई लड़ने के लिए अपने बच्चों की किताबी शिक्षा का बलिदान करने को तैयार हैं? मैं तो कहता हूं कि जब तक हम यह मानते रहेंगे कि जो स्कूल-कॉलेज सरकार के लिए क्लर्क बनाने के कारखाने मात्र हैं, उनमें बच्चों को न भेजने से हम बच्चों की शिक्षा की बलि करते हैं, तब तक स्वराज्य हमसे सैकड़ों कोस दूर हैअन्य राष्ट्रों के हाथों दबी हुई कोई भी जनता एक तरफ उसकी मेहरबानी स्वीकार करती रहे और दूसरी ओर शासक जनता पर जो बोझ और जिम्मेदारी डाले उन्हें वह हटाती रहे, यह नहीं हो सकताविजेताओं की तरफ से होने वाली कोई मेहरबानी विजित जाति के कल्याण के लिए नहीं, परंतु शासकों के लाभ के लिए ही होती है, यह बात जिस क्षण किसी भी पराधीन जाति को समझ आ जाती है, उसी क्षण वह जाति शासकों को हर प्रकार की स्वेच्छापूर्ण सहायता देना बंद कर देती है और किसी प्रकार की सहायता लेने से साफ इनकार कर देती हैहमारी आजादी के लड़ाई की जीत के ये मूलाक्षर हैं



इज्जत-आबरू के लिए : मैं चाहता हूं कि मेरे देश-बंधु मेरी यह बात अच्छी तरह समझ लें, और यदि यह बात उनके गले न उतरी हो तो मेरा प्रस्ताव नामंजूर कर देना ही उनका कर्त्तव्य होगाएक तरफ पंजाब और सारे भारत की इज्जत और दूसरी ओर भारत में कुछ समय तक अंधेर, लड़कों की शिक्षा की बरबादी, अदालतों और धारासभाओं की बंदी और ब्रिटिश संबंध का त्याग - इनके बीच चुनाव करना पड़े, तो भी पंजाब और भारत का सम्मान और उसके साथ आने वाली अराजकता और स्कूलों, अदालतों वगैरह के बंद होने और इनके साथ जुड़ी हुई तमाम व्यवस्था का जरा भी आनाकानी किए बिना स्वागत करूंगा। आपका जी भी उतना ही जल रहा हो, आप भी इस्लाम की इज्जत अक्षुण्ण रखने को मेरे जितने ही उत्सुक हों, पंजाब की इज्जत निष्कलंक करने को तड़प रहे हों तो बिना संकोच के आपको यह प्रस्ताव मंजूर कर लेना चाहिये।

धारासभाओं का बहिष्कार : परंतु इतना ही काफी नहीं हैमुद्दे की असल बात पर तो अभी तक मैं आया ही नहीं। वह बात यह है कि उम्मीदवार तथा मतदाता धारासभाओं का पूर्ण बहिष्कार करें इस समय यही मुद्दे का प्रश्न हो गया हैधारासभाओं द्वारा स्वराज्य मिलेगा या धारासमाओं का त्याग करके मिलेगा? क्या सचमुच धारासभाओं द्वारा स्वराज्य लेने की बात में लोगों को विश्वास है?

स्वदेशी: मैं अवश्य चाहता हूं कि लोग विदेशी माल का बहिष्कार करें, परंतु मैं यह भी जानता हूं कि इस समय यह बात नहीं हो सकतीजब तक हमें सूई-कांटे के लिए भी विदेशों का मुंह ताकना पड़ता है, तब तक विदेशी माल का बहिष्कार असंभव हैपरंतु यदि आप लक्ष्य तक पहुंचने को अधीर हो गए हों और कोई भी कुर्बानी करने को तैयार हों, तो मैं स्वीकार करता हूं कि विदेशी माल का बहिष्कार करते ही पलक मारते भारत अपनी आजादी प्राप्त कर सकता हैइसलिए मैंने आनाकानी किए बिना अपने प्रस्ताव में किया गया संशोधन स्वीकार कर लियामुझे तो लोगों के आगे व्यावहारिक कार्यक्रम रखना है और मैं सहज ही स्वीकार कर लेता हूं कि यदि हमसे विदेशी माल का बहिष्कार हो सके तो वह जबरदस्त चीज हैऐसा बहिष्कार और स्वराज्य दोनों आपको पसंद हों तो प्रस्ताव के अंतिम पैरे में उनका उल्लेख किया है

मैं आपसे इस मामले पर खूब गहरा विचार करके मत देने का अनुरोध करता हूंउसमें आप मेरा ख्याल न करेंमैंने देश की सेवाएं की हों तो उनका ख्याल बीच में न आने दीजिएयहां उनका मूल्य नहीं हो सकतामेरा यह जरा भी दावा नहीं है कि मैं जो कार्यक्रम देश के सामने रखूं, वह भूल रहित ही होगामैं इतना ही दावा करता हूं कि मैंने यह कार्यक्रम तैयार करने में बहुत मेहनत की है, खूब विचार किया है और इस निश्चय पर पहुंचा हूं कि जो व्यावहारिक हो वही कार्यक्रम तैयार किया जाएइन दो बातें का आप अवश्य ध्यान रखेंआपके पास काम करने वाली संस्था भी मौजूद हैफिलहाल यह तरीका तय करते हुए, विचार करने के लिए ही सही, कार्यक्रम को प्रत्यक्ष स्वीकार करने वाले हजारों अनुयायी आपके साथ खड़े हैं(नवजीवन, 19.09.1920)

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बुझते दीपक का सन्देश



दीपक का तेल चुक गया था। केवल रूई की बाती जल कर मन्द-मन्द प्रकाश बिखेर रही थी। उसके अन्तिम समय को निकट आया देख कर एक गृहस्थ ने पूछ ही लिया- 'तुम जीवन-भर आलोक बिखेर कर दूसरों का पथ-प्रदर्शन करते रहते हो, संसार के साथ इतनी भलाई करते रहते हो, फिर भी तुम्हारा इस प्रकार दुःखद अन्त देख कर मेरा हृदय विदीर्ण हुआ जा रहा है।'

बुझते दीपक ने पूर्ण शक्ति के साथ अन्तिम बार अपनी आभा बिखेरते हुए कहा- 'भाई ! इस भौतिक जगत् में जिसका जन्म होता है, उसका अन्त भी होता है। हम प्रयास करने पर भी उससे बच नहीं सकते। हाँ, इतना अवश्य कर सकते हैं कि अपने जीवन की मूल्यवान् घड़ियों को व्यर्थ ही नष्ट न होने दें।'

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सूतांजली, अगस्त द्वितीय 2026, आकर्षक घर की कुंजी

  २कोई ऐसा अक्षर नहीं है, जिसका प्रयोग मंत्र-रचना में न हो सके , कोई ऐसा वृक्ष नहीं है, जो किसी न किसी व्याधि की औषधि न हो , कोई ऐसा...