शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

सूतांजली, फ़रवरी २०२०


सूतांजली                            ०३/०७                                               फरवरी २०२०
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अर्थ-काम -> धर्म -> मोक्ष
          शाम घिर आई है। सूर्य अस्त होने को है। घनघोर जंगल में भटक गया हूँ। रास्ता नहीं सूझ रहा है। कभी ईधर बढ़ता हूँ कभी उधर। अजीब अजीब पक्षियों और जानवरों की आवाजें आ रही हैं। निपट अकेला हूँ। मन घबरा रहा है। फोन पर न जीपीएस पकड़ रहा है न ही कोई टावर। दिल की धड़कन भी धीरे धीरे बढ़ रही है। तभी जंगली जानवर की दहाड़ सुनाई पड़ती है। चौंक कर नजर घुमाता हूँ। एक शेर धीरे धीरे आगे बढ़ रहा है। मेरे पैर जड़ हो गए। धीरे धीरे पीछे होने लगा। धड़कन और बढ़ गई। पसीने पसीने हो गया। जीभ जैसे तालू से चिपक गई। पूरी ताकत बटोर कर भागना शुरू करता हूँ। बाघ मेरे पीछे है। मुड़ मुड़ कर देख कर भागने के चक्कर में गिर पड़ता हूँ और शेर ने छलांग लगा दी। मेरे मुंह से ज़ोर की चीख निकल पड़ती है और आँख खुल जाती है। अपने को बिस्तर पर पड़ा पाता हूँ। पसीना अभी भी है, धड़कन अभी भी तेज है, लेकिन अब शेर नहीं है। मैं आराम से पड़ा हूँ। डर दूर हो जाता है। धीरे धीरे शांत हो जाता हूँ। समझ लेता हूँ कि “वह सपना था यह यथार्थ है”। मन में यह प्रश्न नहीं उठा क्या यह भी स्वप्न है और यथार्थ कुछ और?
          मेरे गुल्लक में २० रुपये हैं। मेरे लिए २ रुपए का बहुत महत्व है। किसी और के गुल्लक में २०००० रुपए हैं उसके लिए २ रुपयों का कोई महत्व नहीं लेकिन २००० का है। तीसरे के गुल्लक में २० लाख रुपए हैं। उसके लिए २००० का महत्व नहीं लेकिन २ लाख का है। एक ही समय में अलग अलग लोगों के लिए रुपयों का महत्व अलग अलग है। जबकि वे २ हों या २ लाख उन सब का, उस समय, समान मूल्य है। जैसे जैसे हमारी पूंजी बढ़ती जाती है हमारे लिए कम पूंजी का महत्व कम होता जाता है। जैसे जैसे हमारा ज्ञान बढ़ता जाता है हमारा ध्यान छोटे ज्ञान या छोटी बातों से हटता जाता है। जैसे जैसे हमारा ध्यान छोटी बातों से अलग हो जाता है, हममें बड़प्पन आने लगता है। जैसे जैसे पूंजी बढ़ती जाती है काम भी बढ़ता जाता है। वैसे ही जैसे जैसे ज्ञान बढ़ता है मन शांत होने लगता है।
          अर्थ का अर्थ सिर्फ धन नहीं है। हमार पद, हमारी शान, हमारा रुतबा, हमारी शक्ति हमारा अभिमान-स्वाभिमान सब हैं। उसी प्रकार काम का अर्थ सिर्फ काम वासना नहीं बल्कि कामनाएँ हैं। हमारी इन कामनाओं की फेहरिस्त लंबी है, बहुत लंबी। बल्कि यह भी कह सकते हैं अंत हीन हैं। ये लगातार बदलती रहती हैं। जुड़ती रहती हैं। हर अर्थ और हर काम बुरा नहीं है जैसा कि साधारणतया हम समझते हैं।  अ-धार्मिक अर्थ और काम त्याज्य हैं जबकि धर्मयुक्त काम करने योग्य हैं। धर्म का यही कार्य है। हमें अ-धार्मिक से धार्मिक की तरफ प्रवृत्त करना। जब हमें काम चाहिये अर्थोपार्जन के लिए, इसका स्वरूप अधार्मिक हो जाता है। लेकिन जब हमें अर्थ चाहिए काम पूरा करने के लिए तब यह धार्मिक हो जाता है।
          जब हम इस प्रकार धार्मिक कार्यों में प्रवृत्त होने लगते हैं तब प्रश्न उठने लगता है – इसके बाद? मैं कौन हूँ? मैं कहाँ से आया हूँ? कहाँ जाऊंगा?  धर्म का कार्य यही है कि वह ऐसे प्रश्नों को उत्पन्न करने लगता है। सब प्रकार की धार्मिक प्रार्थना, जप, ध्यान, उपासना मन के मैल को साफ कर ऐसे प्रश्नों को जागृत करते हैं। अर्थ और काम से हम मैल जमा करते रहते हैं, ये क्रियाएँ इन्हे साफ करती रहती हैं। जैसे जैसे मैल साफ होता जाता है, तीव्रता गहरी  होती जाती और ऐसे प्रश्न का आना स्वाभाविक होता जाता है। शेर यथार्थ था, या यह बिस्तर? यह बिस्तर यथार्थ है या इसके बाद  भी कुछ और है? ये सब कौन करा रहा है? सृष्टि के बाद क्या? नचिकेता के मन में यही प्रश्न तीव्र था। मरने के बाद क्या होता है? इसे जानने में कई कई जन्म भी लग जाते हैं। हमार ज्ञान बढ़ने लगता है, हमारे अनेक अनुत्तरित प्रश्नों के जवाब हमें मिलने लगते हैं। हमें यह सब दिखने लगता है। २० हजार और २० लाख का फर्क समझ आने लगता है। पूर्व जन्म, वर्तमान जन्म और आगे के जन्म का फर्क समझ आने लगता है। असीम दिख जाने पर छोटा अपने आप छूट जाता है। शेर और बिस्तर का यथार्थ समझ आ जाता है। इस समझ के आने को ही  हम तीसरे नेत्र का खुलना कहते हैं। इसे जानने की इच्छा को ही मोक्ष की इच्छा या मुमुक्षा कहते हैं। इन उत्तरों की खोज एक पुरुषार्थ बन जाता है। उस ज्ञान को प्राप्त करने की इच्छा को ही मोक्ष पुरुषार्थ कहते हैं।
        जीवन के यही चार पुरुषार्थ हैं – अर्थ और काम जिसे धर्म नियंत्रित कर दिशा प्रदान करता है मोक्ष की तरफ।
(आचार्य श्रद्धेय श्री नवनीतजी द्वारा श्री औरोबिंदो आश्रम, मधुवन, रामगड़ में जून २०१९ को दिये गए व्याख्यान पर आधारित)
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श्री अरविंद का दूसरा और तीसरा पागलपन
(पिछले अंक (फरवरी 2020) में श्री अरविंद के तीन पागलपनों की चर्चा की थी, जिसका जिक्र  उन्होने अपनी पत्नी से एक पत्र में किया था। उनका पहला पागलपन था ‘2 आना रखना और 14 आना देना। उनके शेष दो पागलपन, जिसकी चर्चा उन्होने की, वे ये हैं।)
दूसरा पागलपन  - भगवान का साक्षात दर्शन प्राप्त करना
          “दूसरा पागलपन, हाल में ही सिर पर सवार हुआ है वह यह है कि चाहे जैसे भी हो, भगवान का साक्षात दर्शन प्राप्त करना ही होगा। आजकल का धर्म है, बात बात में मुंह से भगवान का नाम लेना, सबके सामने प्रार्थना करना, लोगों को दिखाना कि मैं कितना धार्मिक हूँ। मैं इसे नहीं चाहता। ईश्वर यदि हैं तो उनके अस्तित्व को अनुभव करने का, उनका साक्षात दर्शन प्राप्त करने का कोई न कोई पथ होगा, वह पथ चाहे कितना भी दुर्गम क्यों न हो, उस पथ से जाने का मैंने दृड़ संकल्प कर लिया है। हिन्दूधर्म का कहना है कि अपने शरीर के, अपने भीतर ही वह पथ है। जाने के नियम भी दिखा दिये हैं, उन सबका पालन करना मैंने प्रारम्भ कर दिया है, एक मास के अंदर अनुभव कर सका हूँ कि हिन्दूधर्म की बात झूठी नहीं है, जिन जिन चिन्हों की बात कही गई है उस सबकी उपलब्धि मैं कर रहा हूँ। अब मेरी इच्छा है कि तुम्हें भी उस पथ पर ले चलूँ, ............ उस पथ पर चलने से सिद्धि प्राप्त हो सकती है, किन्तु प्रवेश करना अपनी इच्छा पर निर्भर करता है, कोई तुम्हें पकड़ कर नहीं ले जा सकता.........”

तीसरा पागलपन – मैं स्वदेश को माँ मानता हूँ
          “तीसरा पगलापन यह है कि अन्य लोग स्वदेश को एक जड़ पदार्थ, कुछ मैदान, खेत, वन, पर्वत, नदी-भर समझते हैं, मैं स्वदेश को माँ मानता हूँ।, उसकी भक्ति करता हूँ, पूजा करता हूँ। माँ की छाती पर बैठ कर यदि कोई राक्षस रक्तपान करने के लिए उद्यत हो तो भला बेटा क्या करता है? निश्चिंत हो कर भोजर करने, स्त्री-पुत्र के साथ आमोद-प्रमोद करने के लिए बैठ जाता है या माँ का उद्धार करने के लिए दौड़ पड़ता है? मैं जानता हूँ कि पतित जाति का उद्धार करने का बल मेरे अंदर है, शारीरिक बल नहीं, तलवार या बंदूक लेकर मैं युद्ध करने नहीं जा रहा हूँ, वरन ज्ञान का बल है। क्षात्र तेज एकमात्र तेज नहीं है, ब्रह्म तेज भी एक तेज है, वह तेज ज्ञान के ऊपर प्रतिष्ठित होता है। यह भाव नया नहीं है, आजकल का नहीं है, इस भाव को लेकर ही मैंने जन्म ग्रहण किया है, यह भाव मेरी नस-नस में भरा है, भगवान ने इसी महाव्रत को पूरा करने के लिए मुझे पृथ्वी पर भेजा है। ....  
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चलते चलते – इन्हे भी जानिए
          क्या आपने सुना है ह्यूमेनिटी हॉस्पिटल का नाम? या फिर सुभाषिणी मिस्त्री का नाम? १५००० स्क्वायर फीट में फैला ४५ बिस्तरों वाले इस अस्पताल के प्रेरणा स्त्रोत हैं ये शब्द “अमीर हो या गरीब, बच्चा 
सुभाषिणी मिस्त्री

हो या बूढ़ा, सबों के लिए सस्ते मूल्यों पर चिकित्सा। हम यह सुनिश्चित करते हैं कि सबों को सुलभ दरों पर चिकित्सा उपलब्ध हो”। ये शब्द हैं सुभाषिणी मिस्त्री के - एक अति साधारण सड़क के किनारे तरकारी बेचने वाली महिला के जिसने  इस अस्पताल का सपना देखा और उसे मूर्त रूप दिया। अहा!जिंदगी की इन पर नजर पड़ी जून २०१५ में और सबसे बड़ी बात कि सरकार की भी इस पर नजर पड़ी और २०१८ में पद्मश्री से नवाजा। www.humanityhospital.org पर जाएँ और सामर्थ्य है तो लाल रंग से लिखे DONATE पर जरूर से क्लिक करें। 

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निवेदन
आपलोगों के द्वारा हमारे उत्साहवर्धन के हम आभारी है। आपसे प्रेरणा पा कर हम सूतांजली का स्वरूप बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। आपके सहयोग की आवश्यकता है, यथा स्वरचित या संकलित लेख और कविता, प्रूफ रीडर, डिजाइनर, सुझाव और आपका स्नेह तथा आशीर्वाद। आप जितना और जैसा सहयोग कर सकें आपका स्वागत है।            
                     - महेश
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हमें आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहता है। - महेश

बुधवार, 1 जनवरी 2020

सूतांजली, जनवारी २०२०


सूतांजली                            ०३/०६                                               जनवरी २०२०
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पहला पागलपन – २ आना रखना १४ आना देना
          पागल किसे कहते हैं? जो बनी बनाई लीक पर नहीं चलता, जो अपनी सुख-सुविधा और सुरक्षा की परवाह न करके नए रास्ते बनाने की कोशिश करता है। दुनिया उसे ही तो पागल कहती है। लेकिन जब ऐसे पागल को सफलता मिल जाती है तब हम उसे ही अपना पथ प्रदर्शक मान लेते हैं, उसके आगे सर झुकाते हैं। ऐसे ही एक पागल हैं श्री अरविंद , जिन्हें हमने अपना पथ प्रदर्शक माना और उनके सामने अपना सर झुकाया । अपनी धर्मपत्नी श्रीमती मृणालिनी देवी को लिखे एक पत्र में उन्होने अपने तीन पागलपनों की चर्चा की है। वे लिखते हैं –
श्री अरविंद

          मेरे तीन पागलपन हैं। पहला पागलपन है मेरा यह दृड़ विश्वास कि भगवान ने जो गुण, प्रतिभा, उच्च शिक्षा, विद्या, धन दिया है, वह सब भगवान का है। जो कुछ परिवार के भरण पोषण में  लगता है और नितांत आवश्यक है उसे ही अपने लिए खर्च करने का अधिकार है, उसके बाद जो कुछ बचा रह जाता है उसे भगवान को लौटा देना उचित है। यदि मैं सब अपने लिए, सुख के लिए, विलास के लिए खर्च करूँ तो मैं चोर कहलाऊंगा। हिन्दू शास्त्र कहते हैं कि जो भगवान का धन लेकर भगवान को नहीं लौटाता, वह चोर है। आज तक मैं भगवान को दो आना देकर, चौदह आना, अपने सुख में खर्च कर, हिसाब चुकता कर, सांसारिक सुख में मस्त था। जीवन का अर्धांश वृथा ही गया, पशु भी अपना और अपने परिवार का उदर भर कर कृतार्थ होता है।
          मैं इतने दिनों तक पशुवृत्ति और चौर्यवृत्ति करता आ रहा था – यह मैं समझ गया हूँ। यह जान कर मुझे बड़ा अनुताप और अपने ऊपर घृणा हो रही है; अब नहीं, वह पाप मैंने जीवन भर के लिए छोड़ दिया है। भगवान को देने का अर्थ क्या है?  इसका अर्थ है, धर्म-कार्य में व्यय करना। जो रुपया सरोजिनी (बहन) और उषा को दिया है उसके लिए मुझे कोई अनुताप नहीं, परोपकार करना धर्म है। आश्रित की रक्षा करना महा धर्म है, किन्तु केवल भाई-बहन को देने से हिसाब नहीं चुक जाता। इस दुर्दिन में समस्त देश मेरे द्वार पर आश्रित है, मेरे तीस कोटी भाई-बहन इस देश में हैं, उनमें से बहुतेरे अनाहार से मर रहे हैं, अधिकांश कष्ट और दु:ख से जर्जरित होकर किसी प्रकार बचे हुए हैं, उनका हित करना होगा।
          ......... केवल सामान्य लोगों की तरह खा-पहन कर, ठीक ठीक जिस चीज की जरूरत है उसे ही खरीद कर और सब भगवान को दे दूँगा – यही मेरी इच्छा है। अगर तुम सहमत हो, त्याग स्वीकार करो तो मेरी अभिलाषा पूर्ण हो सकती है। ........” 
(श्री अरविंद सोसाइटी द्वारा प्रकाशित पत्रिका अग्निशिखा से। २रा और ३रा पागलपन अगले अंक में)
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मित्र और मित्रता

प्रश्न – क्या होती है मित्रता और किसे कहते हैं मित्र?
खलीलजिब्रान के उत्तर –
·        हमारा मित्र
-      हमारे अभावों की पूर्ति है।
-      हमारा खेत है जिसमें हम प्रेम का बीज बोते हैं और कृतज्ञता का फल प्राप्त करते हैं।
-      हमारा भोजन है, आवास है, अलाव है – क्योंकि हम उसके पास अपनी भूख लेकर जाते हैं और शांति पाने की इच्छा से उसे खोजते हैं।
·        जब हमारा मित्र अपना दिल खोलकर हमारे सामने रखे तब हम “ना” कहने से डरें नहीं और “हाँ” कहने से हिचकें नहीं।
·        जब मित्र चुप हो जाता है तब भी हमारा हृदय उसके दिल की आवाज सुनना बंद नहीं करता, क्योंकि मित्रता में, शब्दों के बिना ही सारे विचार, कामनाएँ और आशाएँ अव्यक्त ही पैदा होती हैं और संप्रेषित होती हैं।
·        मित्रता में आत्मीयता को और गहरा बनाने के सिवा और कोई प्रयोजन नहीं होता है।

·        हमारी प्रिय से प्रिय वस्तु मित्र के लिए होती है क्योंकि जिसने हमारे जीवन का भाटा देखा है उसे जीवन का ज्वार भी दिखाना है।
·        मित्र ऐसी वस्तु नहीं है जिसे हम समय की हत्या करने के लिए खोजते हैं बल्कि उसे समय को सजीव करने के लिए खोजते हैं।
·        मित्र का कार्य हमारे अभाव की पूर्ति करना नहीं बल्कि हमारे खालीपन को भरना है।
·        हमारी मैत्री के माधुर्य में हास्य का स्फुरण और उल्लास का विनिमय हो।
·        इन्ही सुबह की नन्ही ओस की बूंदों में हृदय प्रभात देखता है और ताजा हो उठता है।
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१०८ ही क्यों?
          संख्या तो महज एक संख्या ही है। क्या ऐसा है? अगर ऐसा है तब कोई संख्या शुभ या अशुभ कैसे हो गई? विश्व के हर देश में, समुदाय में, संप्रदाय में शुभ और अशुभ संख्या है और इस मान्यता के पीछे कोई-न-कोई तर्क भी है। अत: हर संख्या महज एक संख्या नहीं है, उससे ज्यादा है। हम १०८ को अति शुभ मानते हैं। इसके कई कारण हैं। हर कारण का अपना अलग औचित्य है। हर माला में १०८ मनके होते हैं। ये मनके भी अलग अलग बीजों के बने होते हैं यथा चन्दन, तुलसी, मूंगा, रुद्राक्ष आदि। इनका प्रयोग मंत्रों के जाप की गिनती के लिए किया जाता है। इन्हे लोग गले में भी पहनते हैं। इनके अलावा मणि-माणक्य-मोतियों की भी मालाएँ होती हैं। इनके मनकों की संख्या निर्धारित नहीं होती है। मंत्रों के जाप के लिए बनी माला १०८ मनकों की  होती हैं। इसके अलावा एक १०९वां मनका, जिसे सुमेरु कहते हैं, प्रारम्भ और समाप्त होने की जानकारी देने के लिए होता है। इसे लांघते नहीं। १०८ जाप पूरा करने के बाद सुमेरु से माला को पलटकर पुन: जाप प्रारम्भ किया जाता है। प्रश्न है १०८ ही क्यों?
          हमारी पृथ्वी वृत्ताकार है। एक वृत्त ३६०का होता है।  राशियाँ १२ होती हैं। इन १२ राशियों को अँग्रेजी में जोडियक साइन कहते हैं। ये १२ राशियाँ हिन्दी और अँग्रेजी में  हैं – १.मेष (एरिस), २.वृषभ (टोरस), ३.मिथुन (जौमिनी), ४.कर्क (कैंसर), ५.सिंह (लियो), ६.कन्या (वर्गो), ७.तुला (लिब्रा), ८.वृश्चिक (स्कोर्पिओ), ९.धनु (साजीटेरियस), १०.मकर (कैप्रीकोर्न), ११.कुम्भ (एक्वेरियस) और १२.मीन (पाइसेस)। इन्ही १२ राशियों में समाहित हैं २७ नक्षत्र। ये हैं – १.अश्विनी, २. भरिणी, ३.कृतिका, ४.रोहिणी, ५.मृगशिरशा, ६.आर्द्रा, ७.पुनर्वसु, ८.पुष्य, ९.आश्लेषा, १०.मघा, ११.पूर्वाफाल्गुनी, १२. उत्तराफाल्गुनी, १३.हस्त, १४.चित्रा, १५.स्वाति, १६.विशाखा, १७.अनुराधा, १८.ज्येष्ठा, १९.मूला, २०.पूर्वाषाढ़ा, २१.उत्तराषाढ़ा, २२.श्रवणा, २३.धनिष्ठा, २४.शतभिषा, २५.पूर्वाभद्रपद, २६. उत्तराभद्रपद और २७.रेवती। २८वां नक्षत्र  अभिजित है लेकिन इसकी गणना नक्षत्रों में नहीं होती है।   इन २७ चक्रों को ४ चरणों में  विभक्त किया जाता है जिसे पद कहते हैं। इस पूरे चक्र में कितने पद हैं? २७ नक्षत्र X ४ पद = १०८। अत: १०८ बार मंत्र जाप कर प्रार्थना करने से हम हमारी सम्पूर्ण पृथ्वी से प्रार्थना कर रहे हैं।
          अब इसका वैज्ञानिक रूप भी देखें। अगर हम इस १०८ पद का एक ज्यामितीय चित्र बनाएँ और उसे वैज्ञानिकों द्वारा खोजी हुई  गॉड पार्टीकल के चित्र से मिलाएँ तो दोनों में अद्भुद समानता देखने को मिलती है। वैज्ञानिकों का मत है कि हमारी इस सृष्टि का कारण यही गॉड पार्टिकल है।
१०८ पदों का श्री यंत्र



गॉड पार्टिकल 
          









दूसरी ध्यान देने वाली बात यह है कि इस पूरी गणना में अंक को बहुत महत्व दिया गया है। हमारी सृष्टि में ९ गृह हैं, ३६० (३+६+०=९) कोण हैं, १०८ (१+०+८=९) पद हैं और २७ (२+७=९) नक्षत्र हैं। हमारा “श्री यंत्र”, संसार का सबसे रहस्यमय ज्यामतीय पहेली भी ९ त्रिभुजों (ट्रैंगल) से ही बना है। ये सब गणनाएँ इस बात की तरफ इशारा करती हैं कि हम जब भी १०८ बार मंत्रों का जाप करते हैं हम सीधे पूरी सृष्टि से प्रार्थना करते हैं, ९ ग्रहों से प्रार्थना करते हैं,  १२ राशियों से प्रार्थना करते हैं, २७ नक्षत्रों से प्रार्थना करते हैं, निर्गुण निराकार ब्रह्म से प्रार्थना करते हैं 
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ओस की बूंदें

कहते हैं शब्दों में अर्थ, सीप में मोती, आँख में चरित्र, बोली में जन्मक्षेत्र, फूल में खुशबू, और चाल में आत्मबल में छिपा रहता है। देखने को पारखी दृष्टि चाहिए।
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 निवेदन

आपलोगों के उत्साहवर्धन के हम आभारी है। आपसे प्रेरणा पा कर हम सूतांजली का स्वरूप बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। आपके सहयोग की आवश्यकता है, यथा स्वरचित या संकलित लेख और कविता, प्रूफ रीडर, डिजाइनर, सुझाव और आपका स्नेह तथा आशीर्वाद। आप जितना और जैसा सहयोग कर सकें आपका स्वागत है।                                  - महेश


रविवार, 1 दिसंबर 2019

सूतांजली दिसंबर 2019


सूतांजली                            ०३/०५                                               दिसंबर २०१९
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जीवन मंत्र

नजात हासिल करने का तरीका क्या है?’
हलाल मुकाम से दीनार हासिल करना और हलाल काम में सर्फ करना
मतलब?
“अर्थ शुचि: स शुचि:।”
यानि
पैसा पैदा करना ईमानदारी से।
पैसा खर्च करना भले कामों में।
समझे? पांडवों और कौरवों की तरह या युधिष्टिर की तरह?
पैसा पवित्र तो अन्न पवित्र। अगर अन्न पवित्र तो रोटी शुद्ध।
अगर रोटी शुद्ध और अन्न पवित्र तो मन पवित्र
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भ्रष्टाचार से मुक्ति

गांधीरिसर्च फ़ाउंडेशन के संस्थापक दिवंगत डॉ. भंवरलाल जी जैन ने भ्रष्टाचार के दानव से मुक्ति का एक रास्ता सुझाया – “यदि जनता के प्रत्येक कार्य के निष्पादन की समय सीमा निर्धारित हो जाए, तो विलम्ब और भ्रष्टाचार के भस्मासुरों को नियंत्रित किया जा सकता है। नियत समय सीमा में  कार्य  का निष्पादन न होने या शुल्क जमा होने के पश्चात भी नियत समय सीमा में कार्य न होने पर संबन्धित अधिकारियों को उत्तरदायी ठहरा कर उनके वेतन से पीड़ित व्यक्ति के नुकसान की भरपाई की जाए तो चमत्कारी परिणाम प्राप्त होगा। साथ ही, यदि कोई अधिकारी अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर किसी नागरिक से मनमाना जुर्माना या सजा सुनाई हो और वह जांच निष्पक्ष हो जाय तो ऐसे अधिकारी को उसी अनुपात में कठोर सजा दी जानी चाहिए। ऐसे प्रावधान की व्यवस्था कानून एवं अधिकारियों के नियुक्ति – पत्र में होनी चाहिए
          यहाँ मैं अपना एक निजी अनुभव साझा करना चाहूँगा। मेरी एक परिचिता एक संस्था में कार्यरत थीं। वहां प्रोविडेंट फ़ंड की सुविधा उपलब्ध थी। अचानक एक दिन संस्था बंद हो गई। महिला ने प्रोविडेंट फंड खाता बंद कर उसके पैसे वापस देने के लिए आवेदन दिया। संस्था के कार्यालय में ताला लगा था और निर्देशक लापता। अत: कोई चारा न होने के कारण नियमानुसार उसने बैंक से अपना दस्तखत प्रमाणित (वेरिफ़ाई) करवा कर आवेदन जमा कर दिया। विभाग ने आवेदन रद्द कर वापस लौटा दिया इस निर्देश के साथ कि संस्था के निर्देशक द्वारा अपनी पहचान करवायें। यह संभव न होने के कारण महिला ने फिर से आवेदन भिजवा दिया और लिखा कि  निर्देशक गायब हैं और नियमानुसार बैंक से भी प्रमाणित कराया जा सकता है।  विभाग अब चुप बैठ गया। बड़े कष्ट से महिला जब संबन्धित अधिकारी से मिली तो उन्हे साफ शब्दों में बताया गया कि उन्हे नियमावली से कोई सरोकार नहीं है। वहाँ उनका ही नियम चलता है और उनके नियम के अनुसार संस्था के निर्देशक का प्रमाण पत्र आवश्यक है। उन्हे पैसे नहीं मिले। जब महिला ने इसकी चर्चा मेरे से की तब मैंने समझाया कि इसका मतलब है अधिकारी को पैसे चाहिए। महिला भड़क उठी। मैंने दूसरा रास्ता सुझाया। सूचना का अधिकार लेकिन साथ ही चेताया कि पैसे मिल जाएंगे लेकिन समय लगेगा। वह तैयार हो गई। मैंने सूचना के अधिकार के अंतर्गत कार्यवाही प्रारम्भ की। जब पहला आवेदन देने गया तब मुझे धमकाया गया, इससे कुछ नहीं होगा और पैसे कभी नहीं मिलेंगे। मैं उसके पीछे लगा रहा। लेकिन अति तो तब हुई जब विभाग ने उस महिला को धमकाने के लिए विभाग से महिला के घर आदमी तक भेजा। लेकिन हम डटे रहे। लगभाग 12 महीने लगे। पूरा पैसा मय ब्याज के आ गया।
        यह तो व्यक्ति का फैसला है कि वह काम करना चाहता है या रोड़े अटकाना। नियम तो बनाने ही होंगे लेकिन उतने भर से काम नहीं होने का, उस पर चलना होगा। पहले आप के बदले पहले मैं।
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काली चमड़ी, गोरा नकाब

इंफ़ोसिस के संस्थापक श्री नारायणमूर्ति अपनी एक पुस्तक में लिखते हैं कि तीन पुस्तकों ने उनकी विचारधारा को बहुत प्रभावित किया। ये पुस्तकें हैं – १. मैक्स वेबर की प्रोटेस्टंट एथिक एंड द स्पिरिट ऑफ कैपिटलिज़्म, २. महात्मा गांधी की माई एक्सपेरिमेंट विथ ट्रुथ, और ३. फ्रैंज फ़ैनन की ब्लैक स्किन, व्हाइट मास्क।
          इनमें गांधी के प्रभाव को रेखांकित करते हुए वे आगे लिखते हैं कि लोगों कि आकांक्षाओं को उभारने, एक महान सपने को पाने के लिए उनसे बलिदान स्वीकार करवाने और सबसे महत्वपूर्ण उस सपने को हकीकत में बदलने में  अच्छे नेतृत्व की महत्ता के प्रति महात्मा गांधी ने मेरी आंखे खोलीं। गांधी ने जाना था कि अगर अनुयायियों को बलिदान करना है तो नेताओं में उनका विश्वास होना अत्यंत जरूरी है। विश्वास पाने के लिए उन्होने सबसे शक्तिशाली अस्त्र का प्रयोग किया – मिसाल बनकर नेतृत्व करना। वे गरीब लोगों की तरह ही खाते, कपड़े पहनते, यात्रा करते और रहते थे। ............... अपने कहे पर जी कर दिखाना महात्मा के लिए बेहद जरूरी था, जिन्हे हमारे लोगों के नब्ज की समझ किसी भी दूसरे भारतीय नेता से ज्यादा थी। 
          नारायणमूर्ति आगे लिखते हैं कि वेबर और गांधी को पढ़ने के बाद मैं इस उलझन में पड़ा रहा कि मेरे देश में विकास उस तरह की प्रगति क्यों नहीं कर पा रहा जो इतनी स्वाभाविक लगती थी। इसका उत्तर उन्हे फ़ैनन की पुस्तक से मिला। वे लिखते हैं उत्तर-ओपनिवेशिक समाज में सुशिक्षित वर्ग की ओपनिवेशिक मानसिकता पर उनकी अत्यंत उपयोगी किताब ने गरीब और अधिकारहीन लोगों कि प्रगति में बाधा डालने वाली नौकरशाही और सुशिक्षितों की भूमिका के प्रति मेरी आंखे खोल दीं। उत्तर-उपनिवेशवाद समाज में सफ़ेद नकाब पहने काले सुशिक्षितों की यह मानसिकता कि शासक और शासितों के अधिकार और जिम्मेदारियाँ अलग-अलग होते हैं और यह विषमता शासकों के पक्ष में झुकी होती है  भारतीय सुशिक्षितों का इस तरह का विषमता पूर्ण बर्ताव मैं रोज देखता हूँ कि किस तरह वे .........
          कौन रोक रहा है भारत की प्रगति? काली चमड़ी में, गोरे नकाबधारी। इन्हे पहचानें। जब इनकी सही पहचान होगी और जनता इनसे हिसाब मांगने लगेगी तब होगा हमारा उद्धार, तब हमें मिलेगी आर्थिक और सामाजिक स्वतन्त्रता।
          यस, वी कैन। हाँ, हम कर सकते हैं। हाँ, हम करेंगे। हाँ, इन सबका यही एक उत्तर है। 
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बात ज्यादा, काम कम  

जब गांधी ने एक स्वाधीन भारत की कल्पना की तब उसमें केवल राजनीतिक स्वाधीनता नहीं थी बल्कि आर्थिक और सामाजिक स्वाधीनता भी थी। स्वाधीनता के बहुत पहले ही गांधी ने कहा जब हम स्वतन्त्रता की बात करते हैं तब उसके साथ ही साथ हमें यह भी निश्चित कर लेना चाहिए कि कैसी स्वतन्त्रता और किससे स्वतन्त्रता? अन्यथा गुलामी ही स्वतन्त्रता के रूप में फिर से आ जाएगी और इसका विचार हमें पहले ही कर लेना होगा। और वही हुआ जिसका डर था। गुलामी ही स्वतन्त्रता के रूप में वापस चली आई। पूरा प्रशासन वैसे ही चलता रहा। सत्ता में वही लोग रहे। स्वतन्त्रता केवल इन मुट्ठी भर लोगों के बीच ही सीमित रह गई।
          अभी अभी हमने गांधी की १५०वीं जन्म जयंती बड़े धूम धाम से मनाई। बहुत शोर किया, नगाड़े बजाये। लंबी लंबी बातें तो बहुत की लेकिन क्या कुछ ठोस कार्य भी कर पाये? क्या कहीं हमने अपने आचरण में गांधी को जीया? अपनी मृत्यु के ठीक पहले यानि २९ जनवरी १९४८ को गांधी ने अपना वसीयतनाम लिखा जो बाद में हरिजन में प्रकाशित हुआ। इस वसीयतनामे के केवल शब्दों पर न जाएँ बल्कि इसके भीतर छिपी भावनाओं और दूरगामी प्रभावों पर भी विचार करें।
          हम पढे लिखे बुद्धिजीवी वर्ग भाषण करने, वक्तव्य देने, पुस्तक छपवाने, साक्षात्कार देने, फोटो खिंचवाने का कार्य कर अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह समझ लेते हैं। उसे कार्य रूप में परिणित करने की न तो सोच है न उद्यम। नारायणमूर्ति ने अपने संस्मरण को साझा करते हुए लिखा , दरअसल, हमारे अधिकांश बुद्धिजीवियों के लिए अभिव्यक्ति ही एक बड़ी उपलब्धि होती है! किसी विचार के क्रियान्वन की दिशा में कोई प्रगति किए बिना उस पर चर्चा करते रहने की प्रवृत्ति कभी कभी हास्यास्पद स्तर  तक पहुँच जाती है। अगर मेरी गणना सही है, तो पिछले पच्चीस साल में बंगलोर में एक पावर स्टेशन बनाने के लिए अब तक तैंतीस सेमिनार हो चुके हैं। लेकिन फिर भी बंगलोर में कोई पवार प्लांट नहीं है और हम अभी (२००९) तक ब्लैकआउट्स से त्रस्त  हैं”। वह समय कब आयेगा जब हम बात कम काम ज्यादा करेंगे?
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हमें आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहता है। - महेश

शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

सूतांजली, नवंबर २०१९


सूतांजली                            ०३/०४                                               नवंबर  २०१९
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झंझटों से मुक्ति का कठिन उपाय
हाँ, सही पढ़ा है आपने, कठिन उपाय। अब सरल उपाय में क्या धरा है? अब आसान काम हमें आकर्षित नहीं करते। जोखिम भरे काम ही हमें आकर्षित करते हैं।

ताजमहल की भौंडी नकल में अंग्रेजों ने कोलकाता में विक्टोरिया मेमोरियल बनाया। मैं सोचता हूँ अगर यह नहीं होता तो कोलकाता वासियों का क्या होता? सुबह से लेकर शाम तक लोगों का जमावड़ा बना रहता है। सुबह सुबह बुजुर्ग लोग स्वास्थ्य लाभ के लिए आते हैं। दिन में पर्यटक म्यूज़ियम देखने आते हैं। शाम को बच्चों और नव युवक-युवतियों का समय होता है। मैं सुबह घूमने वालों में हूँ। यहाँ एक बुजुर्ग आते हैं। उनका परिचय किसी भी नए शख्स से कराया जाता है तब वे तपाक से २-३ सवाल करते हैं – क्या नाम है? क्या काम है? कौन ग्राहक हैं? इन कतिपय प्रश्नों से वे उस नए मुर्गे के पॉकेट की गहराई नाप लेते हैं। अब अगर उनकी यह आदत है तो है, मुझे अच्छा नहीं लगता तो यह मेरी तकलीफ है।

एक दिन उनके दल के बीच पहुंचा तो पता चला कि वे सज्जन किसी झंझट में हैं और उसी की चर्चा हो रही है। झंझट था, उनके पोते के जन्म का। मैं तुरंत बोला, “झंझट तो है ही? लेकिन इसका पता ७-८ महीने पहले ही चल गया होगा! आपको उसी समय कोई उपाय करना चाहिए था। उस समय चूक गए, कोई बात नहीं तुरंत किसी को गोद देने की व्यवस्था कर लीजिये। लेने वाले मिल जाएंगे। आप कहें तो ऐसी दम्पति खोजने में आपकी मदद करूँ?” सन्नाटा छा गया। भाई साहब जबर्दस्त गरम हो गए। मैंने हाथ  जोड़ कर माफी मांगते हुआ कहा कि मेरा इरादा आपको ठेस पहुँचाने के नहीं था। लोग अक्सर झंझट की चर्चा उससे मुक्ति पाने के उद्देश्य से करते हैं। मैंने उसी इरादे से यह सुझाव दिया। भाई साहब तो नरम नहीं ही पड़े बल्कि उनके मित्रों ने कहा कि बोलचाल की भाषा में हम यही कहते हैं इसका यह अर्थ नहीं होता है जैसा मैंने लगाकर काफी उल्टी सीधी बातें कह दीं। मैंने उनकी बात मनाने से इंकार कर दिया, कहा “जुबान पर वही बात आती है जो हमारे दिमाग में होती है”

अर्थ कमाने की अन्धाधुन्द दौड़ में हमें हमारे सब उत्सव, त्यौहार, खुशी के मौके झंझट लगने लगे हैं। हमें यह पता ही नहीं कि हम क्यों कमा रहे हैं, कितना कमाना है और उस कमाई का क्या करना है? और इसलिए उसमें किसी भी प्रकार का व्यवधान झंझट ही हो गया है। दिवाली-होली-राखी हो या विवाह-जन्म-सालगिरह हो, ये सब झंझट ही हो गए हैं। हम पहले ये मन से मनाते थे अब हम ये धन से मनाते हैं। पहले इनमें हमारा दिल लगता था, अब हमारा दिमाग लगता है। पहले अपने परिवार, परिचित और पास-पड़ोस के साथ और सहयोग से मनाते  थे। अब शुभचिंतक, सहयोगी और मित्रों की टोली रहती है और इवैंट मैनेजमेंट का सहयोग रहता है। इसी कारण ये सब खुशी के मौके झंझट हो गए हैं। झंझट शब्द खुद-ब-खुद होठों पर आ जाता है क्योकि दिल और दिमाग में यही रहता है। हमें हमारे जीवन के सुहावने क्षण अब झंझट सरीखे लगने लगे हैं। अपना रोज-रोज का झंझट सुहावना लगने लगा है और इनके बीच पैदा हुआ सुहावना क्षण, झंझट।

अभी अभी त्योहारों का मौसम गया है, लेकिन आगे आते रहेंगे। कल सुबह जब सैर पर जाएँ या पूजा घर में बैठे हों या रात बिस्तर पर जाएँ  तो थोड़ा सा इस पर विचार कीजिये। उत्सव धन से नहीं मन से मनाइए। दिल खोल कर मनाइए। त्योहार समझ कर मनाइए। और सबसे बड़ी बात परिवार के साथ मनाइए। देखिये झंझट शब्द नहीं आयेगा।  आसान नहीं है, लेकिन उतना कठिन भी नहीं। और मैंने तो पहले ही कह दिया झंझटों से मुक्ति का कठिन उपाय। क्या कहते हैं आप? हाँ, हम कर सकते हैं, करेंगे? होंगे कामयाब?
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समय का उपयोग और सेवा कार्य
दूसरे विश्व युद्ध के समय की बात है। विश्व युद्ध का ऐलान हो चुका था और वाइसराय ने बिना काँग्रेस से सलाह मशवरा किए एक तरफा घोषणा कर दी थी कि भारत मित्र राष्ट्रों के साथ है। यह बात काँग्रेस को पची नहीं और वे नाराज हो गए। इस अवस्था में वाइसराय ने गांधी को चर्चा के लिए आमंत्रित किया। वाइसराय उस समय शिमला में थे अत: गांधी वहीं पहुंचे। कई दिनों की  चर्चा के बाद वाइसराय को बात आगे बढ़ाने के लिए लंदन से निर्देश लेने की आवश्यकता महसूस हुई।  अत: चर्चा में एक सप्ताह का अंतराल आ गया। गांधी एवं उनके साथियों के पास शिमला में कोई दूसरा कार्य नहीं था। उस समय की यातायात की व्यवस्था के अनुसार वहाँ से किसी भी कार्यस्थल तक पहुँचने में कम से कम २ दिनों का समय लगता। यानि आने जाने में ही ४ दिन नष्ट हो जाते, परेशानी और खर्च अलग। अत: गांधी के साथियों को लगा कि अब ७  दिनों की छुट्टी और वे शिमला तथा आस पास की अन्य जगहों में घूमने के कार्यक्रम बनाने लगे। लेकिन गांधी के पास दूसरी योजना तैयार थी। उन्होने वापस सेवाग्राम चलने की घोषणा कर दी। वहाँ मुश्किल से ३ दिन ही रहा जा सकता था। साथी यह नहीं समझ पा रहे थे कि वहाँ ऐसा कौनसा काम है कि भयानक गर्मी में इतनी लंबी यात्रा कर सेवाग्राम जाना और फिर ३ दिन बाद वापस शिमला लौटना। लेकिन गांधी अपनी बात पर अटल रहे। उन्होने कहा, “सेवाग्राम में परचूरे शास्त्री हैं। वे संस्कृत के विद्वान हैं और कुष्ट रोग से पीड़ित होने के कारण उनके परिवार वालों ने उन्हे छोड़ दिया है। उन्हे हमारी सेवा की आवश्यकता है”। गांधी के लिए परचूरे शास्त्री की सेवा करना उतना ही महत्वपूर्ण था जितना शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतिनिधि से दूसरे विश्वयुद्ध में भारत के रुख पर चर्चा करना

समय का सदुपयोग करना और सेवा कार्य को महत्व देना, गांधी के विशेष गुण थे जिसका विश्व के शक्तिशाली सम्राट भी लोहा मानते थे।
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सुख की खोज
सुख!
इसकी खोज में  हम जीवन भर भटकते रहते हैं। दौड़ते रहते हैं। लेकिन यह सुख है कि मृग मिरीचिका कि भांति सामने दिखती तो है लेकिन हाथ नहीं आती।
सबके सुख भी अलग रंग, रूप, आकार और वस्तु की होती है। सुख! किसका सुख? अपना सुख! बस यहीं हम गलत हो जाते हैं।

व्याख्यान चल रहा था। पढ़े लिखे लगभग ५०० वयस्क विद्वान श्रोता जमा थे। अचानक वक्ता ने कहा कि बगल के कमरे में अनेक प्रकार के डब्बे रखे हैं। सब पर एक नाम लिखा है। आपको उस कमरे में जाना है और अपने नाम का डब्बा खोज कर उसे ले आना है। आप के पास इसके लिए ५ मिनट का समय है। कमरे का दरवाजा खुला और भगदड़ मच गई। सब जल्द से जल्द अपना डब्बा खोज कर वापस आना चाहते थे। लोग दौड़ रहे थे, टकरा रहे थे, तनाव में थे। तभी घंटी बजी, समय समाप्त हो चुका था। सब खाली हाथ बाहर निकल आए।

वक्ता ने फिर कहा अब वापस उसी कमरे में जाएँ। समय भी वही ५ मिनट का ही है। लेकिन इस बार आपको अपने नाम का डब्बा नहीं खोजना है, बल्कि आपके हाथ जो डब्बा लगे उस पर लिखे नाम के व्यक्ति को खोज कर वह डब्बा उसे दे देना है। ५ मिनट से कम समय में सब अपने अपने डब्बों के साथ कमरे के बाहर आ गए थे।

वक्ता ने कहा, “ये अलग अलग डब्बे अलग अलग किस्म के आपके सुख हैं। ५ मिनट हमारा जीवन काल है। जब हम अपने सुख को खोजते हैं तब हमें कुछ भी हाथ नहीं लगता, लेकिन जब हम दूसरों को उसका सुख देना शुरू करते हैं सबको उसका सुख मिल जाता है। अपना सुख दूसरों को सुखी बनाने में छिपा है।  
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हमें आपकी प्रतिकृया का इंतजार रहता है। - महेश

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2019

सूतांजली अक्तूबर 2019


सूतांजली                       ०३/०३                                        अक्तूबर २०१९              ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अतिशबाजी और दिवाली
हमारे देश में त्यौहारों का माह प्रारम्भ हो चुका है। हम इन्हें बड़े हर्ष, उल्लास और उमंग से मनाएंगे। इनमें एक प्रमुख त्यौहार दिवाली है। देश के उच्चतम  न्यायालय ने आतिशबाज़ी पर रोक लगा रखी है। शायद यह रोक फिर से दोहराई जाएगी। लेकिन इस प्रतिबन्ध के बावजूद आतिशबाजी होती है। आतिशबाज़ी खुशी जाहिर करने का एक माध्यम है। यह केवल दिवाली पर ही नहीं इसके अलावा अन्य अवसरों पर भी होती है, जैसे विवाह, खेल में जीतने पर, धार्मिक विसर्जन यात्रा पर, अँग्रेजी नव वर्ष आदि पर। जिन कारणों से दिवाली पर आतिशबाज़ी सही नहीं है, ठीक उन्हीं कारणों से इनमें से किसी भी अवसर पर यह सही नहीं है। आतिशबाजी सिर्फ हमारे आनंद व उल्लास को प्रगट करने का एक माध्यम है। इनमें से किसी भी भावना पर लगाम की दरकार नहीं है। लेकिन आतिशबाज़ी आनंद अभिव्यक्त का सही माध्यम नहीं है। इसे रोकने का कार्य कानून से कम समाज सुधार और जन जागरण से ज्यादा अच्छी तरह किया जा सकता है। कानून, भय से सुधार करता है, समाज हृदय परिवर्तन करता है।
गांधीजी से एक बार यह अनुरोध किया गया था कि वे दिवाली पर लोगों को आतिशबाज़ी में रुपए बर्बाद न करने की सलाह दें। 20 अक्तूबर 1928 के यंग इंडिया में गांधीजी लिखते हैं, “मैं इस सुझाव का हृदय से समर्थन करता हूँ”। लेकिन वे यहीं नहीं रुकते। वे इस जोश को एक नई दिशा  देते हैं। वे आतिशबाज़ी बंद करने जरूर कहते हैं लेकिन इसमें लगने वाले पैसे, समय, शक्ति और उत्साह को अवरुद्ध नहीं करते। वे लिखते हैं, “इसमें लगने वाले पैसे, समय और मेहनत को बच्चों के लिए खेल-कूद का आयोजन करने में लगाएँ, पारिवारिक वन-भोजन करें जिसमें  बाजार के पकवानों के बजाय घरेलू पकवानों, फल तथा सूखे फल का प्रयोग किया जाए। अमीर और गरीब का ख्याल छोड़कर बच्चों को खुद अपने हाथों से सफाई करने की शिक्षा एवं ज्ञान दें। इससे बच्चों में शारीरिक श्रम करने का अभ्यास भी होगा और स्वच्छता के प्रति जागरूकता भी बढ़ेगी”।
          यह है असली समाज सुधारक का कार्य। वह प्रवाह को अवरुद्ध नहीं करता बल्कि उसे सही दिशा देता है। वह एक नया मार्ग सुझाता है।
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कहाँ गए अपने उत्सव और त्यौहार
हमारे उत्सव और त्यौहारों के दिन आ गए। इनके साथ याद आए बचपन के वे दिन जब हमें इनका इंतजार होता था। एक तरफ परिवार में नवरात्रि का पाठ और पूजा होती और दूसरी तरफ दुर्गा पूजा में पूरा शहर दुल्हन की तरह सज जाता था। यह एक समय था जब हमें देर रात तक अपने दोस्तों के साथ बाहर रहने की इजाजत मिलती थी। दुर्गापूजा से प्रारम्भ होकर भैयादूज तक जैसे उत्सवों की झड़ी सी लगी रहती थी। दिवाली पर पूरे घर की सफाई के अभियान में भी हम बच्चों का सक्रिय योगदान होता था। दिवाली पर मिट्टी के दीयों  में तेल-बत्ती डाल कर जलाना और उनका ध्यान रखना, दिवाली की शुभकामनाओं के कार्ड तैयार करना और भेजना, एक विशिष्ट कार्य होता था ।
इस शुभकामनाओं के कार्ड को तैयार करने की प्रक्रिया पिछली दिवाली से ही प्रारम्भ हो जाती थी। प्रत्येक प्राप्त हुए कार्ड से नाम, पता और टेलीफ़ोन मिलाना और ठीक करना। उनमें लिखे संदेश का मुआयना कर उनमें से बेहतरीन संदेशों को संभाल कर रखना, फिर एक सुंदर सा सारगर्भित संदेश तैयार करना हमारा काम होता था। इस प्रक्रिया में हमें अपने परिचितों की भी जानकारी मिल जाती थी – कौन हैं और कहाँ रहते हैं। मुझे अच्छी तरह से याद है लोगों को हमारे भेजे हुए संदेश की प्रतीक्षा रहती थी क्योंकि हमारा संदेश विशिष्ट होता था। दरअसल यह पूरी प्रक्रिया हमें इस त्यौहार से जोड़ देती थी।  बच्चन जी ने लिखा भी है “प्यार नहीं पा जाने में है, पाने के अरमानों में”। आनंद और उत्सव न उस पूजा में है, न त्यौहार में, न पटाखों में, न मिठाई में, न जलते दीपक में बल्कि उस पूरी प्रक्रिया में जो हमें सबों से जोड़ती है।
जब भी नई तकनीक आए उसे अपनाना ही चाहिए। लेकिन इस नई तकनीक को अपनाने के चक्कर में कहीं हम गुद्दे को फेंक और छिलके को तो नहीं रख रहे हैं। अब हमारा पारिवारिक शुभकामनाओं का पत्र, हमारा व्यक्तिगत  हो गया है। परिवार के हर सदस्य सबको संदेश भेजते नहीं केवल फॉरवर्ड करते हैं। एक बार नहीं कई कई बार। हाँ, दिखाई देता है कि हम सोशल हो रहे हैं। क्या सचमुच हो रहे हैं?  अगर हो रहे होते तो हमारे संबंध और प्रगाड़ होते, लेकिन ऐसा है नहीं।
श्री अश्विन झाला लिखते हैं “संदेश भेजने के इस सिलसिले में  हम इतने आगे बढ़ गए हैं कि वह अपनी क्षितिज को विस्तारित करते हुए बहुत दूर, सभी सीमाओं से, सभी बंधनों से, सभी नफ़रतों से दूर संदेश फॉरवर्ड करते हैं। इतना कुछ होने के बावजूद भी मानव समुदाय के बीच में दीवारें पहले से क्यों बढ़ी हैं? क्यों हिंसा के कई स्वरूप, शोषण के कई घटक पनप रहे हैं? यह तो विपरीत स्थिति को प्रस्तुत करता है। दरअसल, हम सोशल मीडिया पर तो सक्रिय नजर आते हैं किन्तु वास्तविक जीवन में निष्क्रिय हैं।  जीवन के विशेष दिन पर संदेश को फॉरवर्ड करना ही उस दिन को मनाना हो गया है। मानो संदेश को फॉरवर्ड करने से ही हमने अपनी भावना को व्यक्त कर दिया है। हमें इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि हम कोई शुभकामनाएँ भेज रहे है। हम सिर्फ अंगुली का एक झटका भेज रहे हैं। उसका असर भी एक झटका ही होता है।
इस बार कुछ अलग कीजिये। अपना कुछ लिखिए, रचिए, बनाइये। इस प्रक्रिया में अकेले मत लगिये बल्कि पूरे परिवार को सम्मिलित कीजिये। संदेश में पूरे परिवार का नाम दीजिये। अपनी विशिष्ट पहचान बनाइये। भले ही सजा संवारा न हो, लेकिन लिखा अच्छा हो जो आपके और आपके परिवार की भावनाओं को दर्शाता हो। उस संदेश में अपने परिवार की महक हो। आपके परिवार से यही संदेश सब तक पहुंचे। थोड़ा कठिन है, लेकिन अगर अनुशासन रखें तो यह सम्भव है कि आपके परिवार से एक व्यक्ति के पास एक ही संदेश जाए। संदेश को सजाना संवारना चाहते हैं तो  अपने प्रिंटर को ही कहें एक ई-कार्ड तैयार कर दे, वह आपकी भावना के अनुरूप बना देगा।  लोग मिल जाएंगे जो आपके लिए संदेश लिख भी देंगे और उसे रंग-रोगन, चित्र, संगीत से सजा भी देंगे। जब आप कार्ड प्रिंट करवाते थे, तब भी तो यही करते थे। नई तकनीक आ गई है तो उसका भरपूर प्रयोग करें, शुभकामनाओं को लिखने और भेजने में, उन्हे फॉरवर्ड करने में नहीं। परिवार का जुड़ाव भी होगा और आपके परिवार की एक अलग पहचान भी बनेगी।
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हमें आपकी प्रतिकृया का इंतजार रहता है। - महेश

सूतांजली, अगस्त द्वितीय 2026, आकर्षक घर की कुंजी

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