मंगलवार, 1 सितंबर 2020

सूतांजली सितम्बर 2020

 सूतांजली

~~~~~~~~

वर्ष : ०४ * अंक : ०२                         👂🔊                                सितम्बर * २०२०

तर्क और ज्ञान

ईर्ष्या और अभिमान हमारे दिल में चुपके से ऐसे प्रवेश कर जाते हैं जिसका हमें अहसास तक नहीं होता और हम उसके शिकार हो जाते हैं, हम उसके वाहक हो जाते हैं। एक नगर में एक सेठ रहता था। उसके मन में हमेशा यह रहता था कि उसके नगर में कोई भी मजदूर बेरोजगार न रहे, हर मजदूर को रोजगार मिले। वह रोज सुबह ८ बजे नगर के चौराहे पर चला जाता था और वहाँ खड़े हर मजदूर से बात करता और कहता मेरे यहाँ काम हो रहा है। मुझे मजदूर चाहिए। ९ से ५ तक काम करना है और मैं १०० रुपए दूँगा। चूंकि यह समयानुकूल तय मजदूरी थी, सब मजदूर खुशी खुशी उसके साथ चले जाते थे। ९ बजे सेठ फिर आता था और वहाँ खड़े सब मजदूरों को वापस ५ बजे तक के काम के लिए १०० रूपए की मजदूरी पर ले आता था। इस प्रकार ४ बजे तक वह हर घंटे जाता और वहाँ खड़े हर मजदूर को ५ बजे तक के काम के लिए १०० रुपये की मजदूरी पर ले आता। ५ बजे सब मजदूर हाथ-पैर धो कर मजदूरी लेने जमा हो जाते। तब वे देखते कि ९ बजे से जो काम कर रहा था और ४ बजे से जो काम कर रहा था सब को समान १०० रुपए की ही मजदूरी मिल रही है। तब किसी को क्रोध आता, किसी को दु:ख होता, किसी को ग्लानि होती, कई चुपचाप शांत, स्थिर मन से अपनी मजदूरी लेकर चले जाते, कइयों को यह अन्याय लगता। कई तो सेठ से लड़ पड़ते, “यह तो आप हमारे साथ अन्याय कर रहे हैं”।

सेठ पूछता, तुम्हें ९ से ५ बजे तक काम करना था?’

“हाँ”

तुमने उतनी ही देर काम किया?’

“हाँ”

तुम्हें १०० रुपए ही मजदूरी मिलनी थी?’

“हाँ”

तुम अगर कहीं और काम करते तब भी तुम्हें इतनी ही मजदूरी मिलती?’

“हाँ”

तब तुम क्यों नाराज हो रहे हो? तुमको वह मिला जो तुम्हें मिलना चाहिए था। दूसरे के साथ क्या हुआ यह जानकर तुम क्यों दुखी हो रहे हो? तुम्हें उससे क्या मतलब?’

एक तार्किक इसमें तर्क ढूंढ रहा है, एक ज्ञानी ज्ञान दे रहा है। लेकिन एक इंसान तो बस इतना ही समझ रहा है कि दूसरे के सुख में दुख ढूँढने वाला कभी सुखी नहीं हो सकता। यही हमारा अभिमान है यही हमारी ईर्ष्या है। उन्हें दुख इस बात का था कि दूसरे को भी उतना ही क्यों मिला? हमारे दुख का कारण दूसरे का सुख था। किसी की तारीफ करने का अर्थ यह नहीं कि हम किसी दूसरे की निंदा कर रहे हैं। यह मनोवृत्ति हमें आगे बढ़ने से रोकती है। यह हमें हमारी अंतरात्मा से दूर करती है। यहाँ हमारा अंहकार अनेक प्रकार के तर्क देने लगता है। हम में ईर्ष्या और अभिमान भरने लगता है। यह आवश्यक है कि हम सख्ती से उसे कहें, मैं तुम्हारी नहीं सुनता, अपना मुँह बंद करो”। इसका किसी तर्क से कोई संबंध नहीं, किसी ज्ञान से कोई संबंध नहीं।

यह और ऐसी ही छोटी छोटी कहानियाँ तर्क से परे हैं, ज्ञान की सीमा के बाहर हैं। इनका उद्देश्य जीवन की जटिलताओं को सहज करना है। इन्हें वैसे ही ग्रहण करें, तर्क न करें।

(श्रीमती अपर्णा जी  द्वारा श्री औरोबिंदो आश्रम, वन निवास, नैनीताल में जून २०१९ को दिये गए व्याख्यान से संकलित)

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

सरकारी कर्मचारी

दक्षिण अफ्रीका से लौटने पर गांधी ने अपने राजनीतिक गुरु गोखले से मुलाक़ात की। श्री गोखले ने  गांधी को एक वर्ष तक भारत-भ्रमण की सलाह दी ताकि वे भारत को ठीक से समझ सकें। उनकी बात शिरोधार्य कर गांधी भारत-भ्रमण पर निकल पड़े। उनका उद्देश्य था भारत को समझना। उनके लिए इसका अर्थ था भारतवासियों को समझना और इस कारण उन्हों ने अपनी पूरी यात्रा रेल के तीसरे दर्जे में ही की और बड़े 

शहरों के बदले उनका ध्यान गांवों, कस्बों और छोटे शहरों पर ही  ज्यादा रहा।  इस यात्रा के दौरान उन्हें यह पता चला कि आम जनता रेल में सफर के दौरान  मानने वाले साधारण नियम और अनुशासन का ख्याल नहीं रखते, अत: उन्हें इसकी जानकारी देना आवश्यक है। इसके अलावा उन्होने यह भी साफ तौर पर देखा कि रेलवे कर्मचारियों का भी व्यवहार इन यात्रियों के प्रति सही नहीं है। 1916 में कोचरब आश्रम से उन्होने अपनी प्रतिक्रिया लिखी। यह तो विशेष रूप से रेलवे कर्मचारियों के लिये लिखी गई थी लेकिन आज आजादी के 7 दशकों बाद भी कमोबेश हर विभाग के सरकारी कर्मचारी पर लागू होती है। अत: उनके लिखे में रेल को मैंने सरकारी शब्द से अदल बदल कर दिया है। उन्होने लिखा –

ü  यदि आप सरकारी कर्मचारी हैं तो आप जनता के बहुत से दुख दूर कर सकते हैं। जनता के साथ नम्रता का व्यवहार कर, आप अपने मातहतों को वैसा ही करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

ü  धनी और प्रभावशाली जनता को आप जितना समय और ध्यान देते हैं उतना ही गरीब जनता को भी दें।

ü  आपको रिश्वत नहीं लेनी चाहिए और गरीब जनता को मारना, गली देना, तू कह कर सम्बोधन करना न तो उचित है न ही आपका बड़प्पन है।

ü  जनता को बल पूर्वक दूसरे बलहीन और अनपढ़ का हक नहीं छीनना चाहिए। बल्कि अगर कोई ऐसा कर रहा है तो उसका शांतिपूर्वक प्रतिवाद करना चाहिए।

ü  ज्यादा सामान लेकर सफर नहीं करना चाहिए। सामान इतना ही होना चाहिए कि आपकी सीट के नीचे आ जाये तथा सह यात्रियों को भी अपना सामान रखने की जगह मिल जाये।

ü  सफर में जात-पाँत-वर्ण, शहर-प्रांत आदि का भेद भाव नहीं  रखना चाहिए। भ्रातृ भाव से सबों को माँ भारती का पुत्र ही समझ कर सफर करना चाहिए।

आम जनता में ही एक बहुत बड़ी संख्या सरकारी कर्मचारियों की है। आम जीवन में हर सरकारी कर्मचारी को एक दूसरे विभाग के कर्मचारी से काम पड़ता रहता है। जब उनके साथ भी दुर्व्यवहार होता है उन्हें बुरा लगता है। लेकिन मौका पड़ने पर वे भी वैसा ही दुर्व्यवहार करते हैं। उस समय जरा सा यह विचार करना चाहिए कि उन्हें कैसा लगा था।  बुरे, अच्छों को देख, बुराई छोड़ अच्छे नहीं बनते। लेकिन अगर अच्छे, बुरों को देख, अच्छाई न छोड़ें तो भी दुनिया बदल जाएगी।

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

इत्तिफ़ाक इत्तिफ़ाकन नहीं होते

जी हाँ, सही पढ़ा है आपने। इत्तिफ़ाक इत्तिफ़ाकन नहीं होते, इन्हे साधना पड़ता है या यूं भी कह सकते हैं कई बार हम जाने अनजाने इत्तिफ़ाक को साध लेते हैं। कई बार ऐसा होता है कि सुशील भैया से फोन पर बात करने की इच्छा होती है और तभी उनकी घंटी बज उठती है। या फिर फोन की घंटी बजती है हमें लगता है कि विशाखा का ही फोन है और हैलो करने पर पता चला कि हाँ उसी का फोन है। मैं एक पुस्तक ढूंढ-ढूंढ कर परेशान। न किसी पुस्तकालय में, न किसी दुकान पर, न किसी ऑन लाइन स्टोर पर, कहीं नहीं मिलती और तभी रतन जी के टेबल पर मुझे वह पुस्तक इत्तिफ़ाकन पड़ी मिल जाती है। अभी समोसा खाने को जी चाह रहा है और तभी समधी का ड्राईवर समोसा लेकर हाजिर हो जाता है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों के बारे में विचार कर रहा था तभी समधिन का फोन आता है और बताती हैं कि उनके गुरु शिवपुराण से द्वादश ज्योतिर्लिंगों की कथा फ़ेस बुक पर कर रहे हैं, मैंने उसका लिंक आपको भिजवाया है। ऐसा, कमोबेश हम सबों के साथ हुआ है, होता है। लेकिन हर समय नहीं होता। कभी होता है कभी नहीं। ऐसा क्यों?

एक और सच्चाई है – हमें जब किसी कार्यवश सुबह जल्दी उठना होता है, न हम कोई अलार्म लगाते हैं, न किसी को उठाने बोलते हैं लेकिन फिर भी एकदम सही वक्त पे हमारी नींद टूट जाती  है। क्यों होता है ऐसा? और अगर ऐसा होता है, तो ठीक है, होने दें, अच्छा है।

सोच रहे हैं कि यह हमारे जाने बिना होता है; बिना हमारे किसी मेहनत के होता है; तब इस पर दिमाग खपाने की क्या आवश्यकता है? सीधी सी बात है। प्रकृति के अनेक नियमों की जानकारी हमें धीरे धीरे हुई, जैसे गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त। ये सिद्धान्त तब भी थे जब हमें उनकी जानकारी नहीं थी और अपने नियमों का विधिवत पालन कर रही थीं। ऐसा नहीं हुआ कि पहले और बाद में उसके नियमों में कोई फर्क आया। लेकिन, जानकारी मिलने के बाद उसके आधार पर कई आविष्कार हुए, नई खोजें हुई। जानकारी मिलने पर हमारी निर्माण क्षमता का विकास हुआ। अगर हम उन्हें  जानते हैं तब हम उसके अनुरूप कार्य करते हैं, फलस्वरूप हमारा निर्माण कार्य द्रुत गति से होता है। लेकिन जानकारी न होने पर हो सकता है हम इसके विपरीत कार्य करते हों, जिससे निर्माण कार्य बाधित होता हो। कहने का मतलब यह कि अगर हम इस पर कार्य करें तो इसे साध सकते हैं।  मजे की बात यह है कि यह जानते हैं, मानते  हैं फिर भी समझते नहीं।

हम चाहते हैं प्रेम, लेकिन चिंतन द्वेष का करते हैं। चाहते हैं धन लेकिन डरते रहते हैं गरीबी से। हम चाहते हैं निरोगी काया, लेकिन विचारों में केवल रोग समाया रहता है। यानि जो चाहते हैं, चिंतन उसका उलटा करते हैं। हम कहते हैं, जो बोया वो काटा। इसे हम केवल कर्मणा मानते हैं। लेकिन प्रकृति का सिद्धान्त इसे मनसा, वाचा, कर्मणा मानती है। यानि जब ये तीनों एक साथ होते हैं तभी त्वरित और सटीक ढंग से कार्यान्वित होता है। हमने यह भी देखा और अनुभव किया है कि हम किसी अंजान व्यक्ति से मिलते हैं और देखते ही उससे द्वेष या प्रेम का भाव उत्पन्न होता है और ठीक वैसी ही धारणा उसके मन में हमारे बारे में होती है। कटु वचन के बदले कटु वचन और प्रेम के बदले प्रेम के बोल ही सुनने को मिलते हैं। हम जो कहते हैं, जो सोचते हैं, जो विश्वास करते हैं वही फलीभूत होता है। हम नफरत करते हैं तो नफरत के अनुरूप परिस्थितियों का निर्माण होता है, शिकायत करते हैं तो शिकायत करने लायक परिस्थितियों का निर्माण होता है और धन्यवाद देते हैं तो धन्यवाद देने लायक परिस्थिति पैदा हो जाती है। यही प्रकृति का नियम है। अगर मन, कर्म और वचन में विरोधाभास हो या संदेह हो या अनावश्यक विचार हो  तब हमारी इच्छपूर्ति में रुकावटें पैदा हो जाती हैं। देखें ऐसा होता है या नहीं’, एक बार आजमा कर देखें क्या होता है जैसे विचार रुकावट ही पैदा करते हैं। प्रकृति अति विशाल है, यहाँ बहुत कुछ निरंतर घटित होता रहता है, बहुत से कार्य हमारी सोच और समझ के बाहर होती हैं और अ-तार्किक लगती हैं। इसका केवल एक जवाब है – धैर्य और विश्वास।

हम जो चाहते हैं, वह हमें मिलेगा। हम जैसा चाहते हैं, वैसा ही होगा लेकिन उस पर हमें यकीन करना होगा। दिखना ही विश्वास करना है (सीइंग इज बिलीविंग) के विपरीत डॉ वेन डायर ने कहा आप तब देखेंगे जब आप विश्वास करेंगे (यू विल सी इट व्हेन यू बिलीव इट)। विश्व विख्यात मनोविशेषज्ञ कार्ल हयुंग से पूछा गया, क्या आप मानते हैं कि ईश्वर है’?  उन्होने छूटते ही जवाब दिया,नहीं मैं नहीं मानता कि ईश्वर है, मैं यह जानता हूँ कि ईश्वर है”। हम जितने मनोयोग से किसी विचार को व्यक्त करते हैं उसका परिणाम भी उतना ही तीव्र और सटीक होता है।

इसलिए कहा जाता है हर समय अच्छा सोचें, सकारात्मक सोचें, निर्माण का सोचें। हमारी यह सोच फलीभूत होकर विश्व को बदल देगी।   

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

                                                लघु कहानी - सराहना  और क्षमता

एक नट था। उसकी कलाबाजियाँ देख लोग दाँतो तले अंगुलियाँ दबा लेते थे। वह दो रस्सियों और एक झंडे की मदद से दो बीस मंज़िला इमारतों के बीच की दूरी आसानी से तय कर लेता था। एक ओर की दूरी तय कर लेने के बाद वह अपने सहायक को कंधे पर बैठाकर दूसरे छोर तक वापस आता था। एक दिन जब उसके करतब पर लोग तालियाँ बजा रहे थे तो उसने पूछा कि क्या उन्हें विश्वास है कि वह ऐसा दुबारा कर पायेगा? सभी ने पूरे जोश के साथ हामी भरी । एक पल के  लिए ठहर कर उसने भीड़ से दूसरा सवाल किया। उसने पूछा कि वे लोग आगे आयें जो उसके करतब में सहायक बनने को तैयार हों। अचानक चारों तरफ सन्नाटा छा गया। भीड़ में से  एक भी व्यक्ति आगे नहीं आया। 

प्रतिभा पर सराहना और क्षमता पर विश्वास दो अलग अलग बातें हैं।

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

ज़ूम पर सूतांजली के आँगन में

हमने ज़ूम पर सूतांजली के आँगन में प्रारम्भ किया है। अगस्त माह में इसके तीन प्रसारण हुए, रविवार 2, 16 एवं 30 अगस्त को। 2 अगस्त के प्रसारण में हनुमान चालीसा की व्याख्या की थी श्री संदीप लोधा, सिंगापूर ने। 16 को दार्शनिक कविताओं का गायन एवं पाठ किया गया और 30 अगस्त को श्री प्रमोद शाह ने संगठन की सकारात्मक यात्रा के बुनियादी तत्व पर सारगर्भित चिंतन प्रस्तुत किया जिसे श्रोताओं ने बहुत पसंद किया।

सितम्बर माह में इसके दो  प्रसारण निर्धारित हैं, रविवार 13 एवं 27 सितम्बर को। यथा समय इसकी सूचना व्हाट्सएप्प एवं मेल पर दी जायेगी। अगर आपको सूचना नहीं मिल रही है तो कृपया अपना नाम एवं फोन नम्बर या ई-मेल हमें भेजें, sootanjali@gmail.com पर। आपकी उपस्थिती और सहयोग के लिए हम आपके आभारी हैं।

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

अपने सुझाव (suggestions) दें, आपको सूतांजली कैसी लगी और क्यों, नीचे दिये गये एक टिप्पणी भेजें पर क्लिक करके। आप अँग्रेजी में भी लिख सकते हैं।

 

शनिवार, 1 अगस्त 2020

सूतांजली' अगस्त 2020

सूतांजली

~~~~~~~~

वर्ष : ०४ * अंक : ०१                           👂🔉                                          अगस्त * २०२०

धन्यवाद

इस अंक के साथ साथ हम चौथे वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। यह आपके उत्साहवर्द्धक दिप्पणियों एवं सुझावों के कारण ही हो सका है। कोरोना हमारे लिए नए क्षितिज लेकर उपस्थित हुआ। इस महामारी के कारण सूतांजली की छपाई का कार्य  रुक गया और इसे मेल, फ़ेस बूक, व्हाट्सएप्प और ब्लॉग की सहायता से लोगों तक पहुंचाना प्रारम्भ किया गया। फलस्वरूप हमारे पाठकों की संख्या और पत्राचार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।

इतना ही नहीं हमने ज़ूम पर सूतांजली के आँगन में भी प्रारम्भ किया। इसकी पहली सभा शनिवार १८ जुलाई को प्रयोग के रूप में प्रारम्भ हुई। आपकी उपस्थिती और सहयोग के लिए हम आपके आभारी हैं। अगस्त माह में इसकी दो बैठकें निर्धारित हैं, रविवार 2 एवं 16 अगस्त को। यथा समय इसकी सूचना व्हाट्सएप्प पर दी जायेगी। अगर आपको सूचना नहीं मिल रही है तो कृपया अपना नाम एवं फोन नम्बर हमें भेजें, sootanjali@gmail.com पर।

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

अनुशासित विरोध    

(८ अगस्त १९४२ मुंबई, गवालिया टैंक मैदान – आज का अगस्त क्रांति मैदान – युद्ध की घोषणा का स्थल बना था, और महात्मा गांधी ने अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी को संबोधित किया था। गांधी मार्ग से उसी सम्बोधन का प्रारम्भिक अनुच्छेद।)

 “आपने अभी जो प्रस्ताव पास किया है उसके लिए मैं आपको बधाई देता हूँ। मैं उस तीन साथियों को भी बधाई देता हूँ जिन्होंने यह जानते हुए भी कि प्रस्ताव के पक्ष में भारी बहुमत है, अपने संशोधनों पर मत-विभाजन करने का साहस दिखाया। मैं उन १३ सदस्यों को भी बधाई देता हूँ जिन्होंने प्रस्ताव के विरुद्ध वोट दिया। उन्होने ऐसी कोई बात नहीं की जिसके लिए उन्हे शर्मिंदा होने की जरूरत है। पिछले बीस वर्षों से हम यही सीखते आए हैं कि हमारे समर्थकों की संख्या बहुत कम हो और लोग हमारी हंसी उड़ाएँ, तब भी हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। हमने अपने विश्वासों पर दृढ़ रहना सीखा है .......यह मानते हुए कि हमारे विश्वास ठीक हैं। ऐसा करने से आदमी का चरित्र और नैतिक स्तर ऊंचा होता है।”

हमारे वर्तमान माहौल में इस अनुच्छेद से सीखने और समझने के लिए कई बातें मिलती हैं –

१। विरोध करने वालों को बधाई – हमारे मत अलग अलग हो सकते हैं लेकिन हम एक साथ हैं। समर्थन करने वालों के पहले, हमें, हमारा (सकारात्मक) विरोध करने वालों का आभारी होना सीखना होगा ताकि हम सही रास्ते पर चलते रहें, हमें अपनी कमियों का भी पता चलता रहे, और हम सचेत रहें।  

२। विरोध में शर्मिंदगी नहीं – विरोध करना शर्मिंदगी का काम नहीं है। विरोध करने का तरीका और ध्येय शर्मिंदगी का कारण हो सकता है। अनुशासन के दायरे में, स्वार्थहीन विरोध ही, सृजनात्मक विरोध है। ऐसा विरोध करने में गर्व का अनुभव होना चाहिए।   

३। विरोध करने का साहस और हिम्मत – हम में विरोध करने का साहस और हिम्मत होनी चाहिए। सही और उचित विरोध होने पर ही हम सर्वांगीण दृष्टिकोण अपना सकते हैं। अगर सत्य और अहिंसा को पकड़ कर रखें तो साहस का संचार खुद-ब-खुद हो जाता है, विरोध सृजनात्मक हो जाता है।  

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

सोचो और  समझो

श्री जय प्रकाश नारायण:

जय प्रकाश नारायण

“....हमें याद रखना चाहिए, और कभी भूलना नहीं चाहिए कि लोकतांत्रिक समाजवादी समाज की  रचना के लिए रचनात्मक सेवा की कहीं ज्यादा जरूरत है, बनिस्पत संसदीय विरोध के दावपेंचों के; समाज को सकारात्मक सेवा की ज्यादा जरूरत है बनिस्पत दूसरों की गलतियों व चूकों का फायदा उठाने की चातुरी के”।

बी आर अंबेडकर:

“अब जब हमें स्वतन्त्रता प्राप्त हो गई है, हमारी अपनी चुनी हुई सरकार है, न्यायालय हैं, संविधान है हमें हड़ताल, सत्याग्रह और घेराव जैसे हथियारों का प्रयोग छोड़ कर संविधानिक तरीके से न्यायालयों से न्याय प्राप्त करना चाहिए”। -

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

सामान्य सेवक और निष्ठावान भक्त

 

(विनोबा से बातचीत का अलग ही आनंद था, क्योंकि वे, सवाल के बोझ और जवाब के आतंक से मुक्त, आनंद में पगे होते थे। एक छोटी से बानगी गांधी मार्ग से।)

प्रश्न : लक्ष्मी अपने माँ-बाप के अंतिम समय में भी नहीं आई। उस वक्त उनके पास रहना लक्ष्मी का कर्तव्य नहीं था?

विनोबा का उत्तर : अंतिम समय में आप तो वहाँ थे न! अगर उनके अंतिम समय में सेवा के लिये कोई नहीं होता तो लक्ष्मी का जाना कर्तव्य होता। यह हुई, बात नम्बर एक। नम्बर दो, सामान्य सेवक और निष्ठावान भक्त में अंतर है। सामान्य सेवक के लिये माता-पिता की सेवा के लिये, अगर वहाँ सेवा करने वाला कोई न हो, जाना आवश्यक है। निष्ठावान भक्त के लिये यह जरूरी नहीं। इसका उदाहरण हैं मीराबाई :

                   मातु छोडी, पिता छोड्या, छोड्या सगासोई

                             अंसुवन जल सींचि सींचि प्रेमबलि बोई

                                      मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।

निष्ठावान की भूमिका अलग है। मैं फिर से दोहराता हूँ। सेवा के लिये वहाँ दूसरा व्यक्ति न हो तो जाना जरूरी है। सेवा के लिये कोई है तो केवल दर्शन के लिये जाना जरूरी नहीं। निष्ठावान भक्त और सामान्य सेवक की ये दो अलग-अलग भूमिकाएँ हैं।

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

परतन्त्रता का मूल है - भय

अग्निशिखा में मैंने पढ़ा कि श्रीमाँ अपने अनुभवों की चर्चा करते हुए एक दिन बताती हैं:

मैंने अपनी आंखें खोलीं और क्या देखती हूँ मैं? एक विशाल, क्रुद्ध सर्प मेरे सामने फुफकार रहा था। वह आधा कुंडली मारे बैठा  था। उसे मेरा वहाँ बैठना बिलकुल नहीं गंवारा। मुझे पता नहीं था कि उसकी बाँबी वहीं थी। फिर मैंने यह किया कि यह दिखलाते हुए कि मैं जरा भी भयभीत नहीं हूँ, सीधा उसकी आँखों में आँखें डाल कर 


उसे घूरने लगी, तुम जानते ही हो कि भय के प्रकम्पनों को जानवर एकदम से पकड़ लेते हैं और तुरन्त प्रतिक्रिया करते हैं। मैं उसे घूरती रही। सचमुच मेरे अन्दर कोई डर नहीं था, लेकिन वह साँप इतना क्रुद्ध था कि वह मुझ पर हमला बोलना चाहता था। मैं पैर लम्बे करके बैठी थी, ज़रा भी घबराये बिना, मैंने अपने पैर एक के बाद एक समेट लिए।  सारे समय मैं उसे टकटकी बांधे देखती रही। सम्मोहक दृष्टि से उसे एकटक देखते हुए मैं उठी और मैंने जान-बूझकर एक कदम उसकी ओर बढ़ाया, फिर दूसरा, सारे समय मैं उसे देखती रही; फिर अपनी शक्ति को एकाग्र कर मैंने उससे कहा, “यहाँ से चले जाओ!” मैं उसे घूरे जा रही थी और मैंने अपनी दृष्टि से उससे कहा, “चले जाओ, यहाँ से चले जाओ!” और जब वह और प्रतिरोध न कर सका तो उसने अपना फण एकदम से नीचे गिरा दिया! और वह भागा! वह इस तरह एकदम तेज़ी से निकल भागा। ....... शर्त है कि कभी डरना मत। जहां कहीं डर हो मैं काम नहीं कर सकती। तब काम करना बहुत कठिन हो जाता है। ..... उस क्षण, साँप के सामने, अगर  मैं डर गयी होती तो निश्चित है कि साँप मुझे डस लेता। लेकिन मैं डटी रही और मैंने भय को अपने पास फटकने नहीं दिया, वह फौरन चला गया।  

अक्तूबर 2018 की सूतांजली में मैंने एक दन्त कथा की चर्चा की है; कैसे एक जनप्रिय नेक दिल राजा अचानक राक्षस प्रवृत्ति का बन जाता है और अपनी ही जनता का खून पीने लगता है। इस राक्षसी राजा से छुटकारा पाने का तरीका बहुत ही सहज था। बस, उसके मुंह पर, बिना भय के, इतना ही कहना था तुम मेरा खून नहीं पी सकते। लेकिन राजा को देखते ही लोगों की डर के मारे घिघ्घि बंध जाती, जबान तालू से चिपक जाती और उनके मुंह से कोई बोल ही नहीं फूटते थे। एक दिन अचानक एक नौजवान भय त्याग, साहस से बोल पड़ा तुम मेरा खून नहीं पी सकते और बस जनता को राजा से छुटकारा मिल गया। लोग आजकल पूछते हैं कौन गांधी? क्या किया उंसने?’ उसने यही किया था। भगत सिंह ने अपनी माँ से पूछा था कि हमलोग अंग्रेजों को देश से क्यों नहीं निकाल देते हैं। माँ ने कहा – वे लाखों हैं। भगत ने पूछा – लेकिन हम तो करोड़ हैं? इन करोड़ में भय था जान का, मान का और माल का। गांधी ने उन करोड़ों में से उनका यह डर निकाल दिया और वे जान, माल और मान को खोने के डर को छोड़ गांधी के पीछे चल पड़े और लाखों को खदेड़ दिया।

आज हम भयभीत हैं। हमें डरा रखा है बाजार ने, वैश्विक बाजार ने। क्योंकि उसे डर है कि अगर हम भयमुक्त हो जाएँ तो उनकी तरक्की रुक जाएगी, उनका माल बिकना बंद हो जाएगा। हमारा भय ही उनकी तरक्की का कारण है, इसलिए वे हमें बराबर-लगातार डरा कर रखते है। अगर हमारे पास जो है उससे हमें संतोष हो जाए तब फिर हम क्यों मॉल जाएंगे? अगर हमें अपने चेहरे और चमड़ी की झुर्रियों से डर लगना बंद हो गया तो उनकी क्रीम और लोशन कौन खरीदेगा? अगर हम एक अनुशासित जीवन यापन करें तो हमें इस बात का भय नहीं रहेगा कि हम बीमार पड़ सकते हैं, तब उनकी मेडिकल पॉलिसी कौन खरीदेगा? हम अपने बच्चे पर अविश्वास कर ही बुढ़ापे के लिए नित नए निवेश कर अपना वर्तमान तो खराब करते ही हैं, पिता-पुत्र के स्वाभाविक स्नेह की भी बलि चढ़ा देते हैं। अगर हमें  नागरिकता, गरीबी, भ्रष्टाचार, टैक्स की दर, मंहगाई, असहिष्णुता, धार्मिक मदांधता का भय नहीं दिखाया जाए तो हम क्यों उनके इशारों पर नाचेंगे? हमारे हाथ में प्लास्टिक के रुपये पकड़ा कर हमें टीवी, रेफ्रिजरेटर, गाड़ी और मकान खरीदवाकर कर्ज तले दबा कर उसके ई एम आई के भुगतान का भय नहीं दिखाएंगे तो हम कैसे उनकी मुट्ठी में आएंगे? हम महीने के अंत का इंतजार कमाई का आनंद भोगने नहीं, एक और ई एम आई के सफलतापूर्वक भुगतान का भय कम करने में करते हैं। इस भयपूर्ण माहौल में हम जाने अनजाने आर्थिक गुलाम बन गए हैं। अपने बच्चों पर विश्वास करना छोड़ दिया है, परिचितों से अनबन हो गई है, पारिवारिक माहौल बिगड़ गया है। मानवता लुप्त होती जा रही है।  जब तक भयभीत रहेंगे गुलाम ही बने रहेंगे। हमें अपने आप को इससे मुक्त करना होगा ताकि उन्मुक्त हो कर जी सकें, मुस्कुरा सकें। यह हमारे अपने ही हाथ में है। बाजार की न सुन, अपनी सुनें। उतना ही पैर पसारें जितनी चादर है। क्या करना है – डर कर  भागना या डर का मुक़ाबला कर उसे भगाना? जहां भय गया, गुलामी गई आजादी आई। क्या लेना है – गुलामी या आजादी - मर्जी आपकी है।    

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

अपने सुझाव (suggestions) दें, आपको सूतांजली कैसी लगी और क्यों, नीचे दिये गये एक टिप्पणी भेजें पर क्लिक करके। आप अँग्रेजी में भी लिख सकते हैं।


बुधवार, 1 जुलाई 2020

सूतांजली, जुलाई 2020


सूतांजली                            ०३/१२                                                जुलाई २०२०
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
“अविकसित”.......कौन?
(अग्निशिखा श्रीअरविंद सोसाइटी की मासिक पत्रिका है और वंदनाजी इसकी संपादिका हैं। इसी पत्रिका के फरवरी २०२० अंक से इसे लिया गया है। इसे क्या कहूँ; कहानी, लेख, संस्मरण या कुछ और। जो भी है, प्रस्तुत है आपके लिए, उसका संक्षिप्त रूप। वैसे अगर आप इसे पूरा पढ़ना चाहें तो वह भी आप यहाँ पढ़  (📖) सकते हैं।)

मेरे भाई केविन को पता है कि गिरिजाघर से कहीं ज्यादा भगवान उसकी खाट के नीचे बसते हैं।..... एक रात उसके कमरे के सामने से गुज़रते हुए मैंने उसे कहते सुना था, “लो यीशु, मैं आ गया सोने, तुम भी आ गये क्या अपने बिस्तर पर?”..... मेरी हल्की खिलखिलाहट फूट पड़ी थी, ..... मैंने दरार से झांक कर देखा, केविन पलंग के पास उकड़ूँ बैठा नीचे झांक रहा था, “थक गये क्या यीशु? क्या कहा, छुपा-छुप्पी खेल रहे थे? लेकिन पकड़ में तो आ जाते हो न रोज़ मेरी...”। ..... मेरे लिए तो सब शून्य ही शून्य था, लेकिन केविन तो रूबरू अपने प्रभु से बतिया रहा था, उन से हंसी मज़ाक कर रहा था, दिनचर्या का अपना हवाला दे रहा था... फिर “शुभ रात्रि” कह दोनों अपने-अपने बिस्तरों में दुबक गये थे...!!


केविन मेरा बड़ा भाई, तीन नहीं, बीस साल का बच्चा है। ..... मेरा भैया दुनिया की नज़रों में मानसिक रूप से अपंग है... लेकिन जब से मैं जिंदगी को समझने-परखने के काबिल हुई तब से मैं यही सोचा करती हूँ कि सचमुच अविकसित कौन है? मैं या दुनिया की नज़रों में मंद बुद्धि मेरा प्यारा –सा भाई?” .....

..... मैं कभी कभी उसके उस जगत में उसके साथ हो लेती हूँ तो मुझे अपनी यह दुनिया कितनी उबाऊ, चौकोर-चौकोर खंडों में बंटी हुई, दमघोटूँ, कैसी तो कतरी-ब्योंती सी लगती है, जब कि केविन का हाथ पकड़, उछल कर जब दहलीज़ पार कर उस तरफ पहुँच जाती हूँ तो खुले आसमान का नीला आँचल हम पर लहराता ही रहता है, वहाँ हर काम में हड़बड़ी मचाने के लिये न तो टिकटिक करती हैं घड़ी की सूइयाँ, न होती है आपा-धापी। वहाँ मुझे केविन के साथ-साथ वह सब दिखलाई देता है जो मैं कभी इस नीरस दुनिया में अकेले देख ही नहीं सकती। ..... क्रिसमस के आस-पास वह मुझे “सान्ता” दिखलाता है। ..... केविन के साथ-साथ मैंने क्या-क्या नहीं देखा?? ..... उस दुनिया में सब कुछ सुंदर था, सरल था, फूल-पत्ते, पशु-पक्षी, तितलियाँ-भौरें, चाँद-सितारे सब वहाँ सजीव हँसते-गाते, बतियाते-चहकते थे। न थी वहाँ कोई अनबन, न किसी भी तरह की सौदेबाजी। .....

..... हे भगवान! इस दुनिया की हर चीज पर “यह सही है”, “यह गलत है”, बस इन दोनों में से कोई एक बिल्ला क्यों टंका रहता है??? और केविन की दुनिया में? – वहाँ की हर चीज़ सही है, ..... क्योंकि हर एक चीज़ का रचयिता वह ईश्वर है, .....

..... वह भी इतवार के इंतजार में आँखें बिछाये रहता, .....कपड़े धोने की मशीन निहारने.....मशीन के अंदर नाचते कपड़ों को देख वह कभी उछल-उछल कर नाचता तो कभी कमरे में चक्करघिन्नियाँ काटता। ..... वह मुझसे कहा करता था, “रोज़ी, जानती है, ये कपड़े इसलिए खुश होकर नाचते हैं क्योंकि इन पर जमा मैल पानी में बह जाता है और ये साफ-सुथरे होकर बाहर आते हैं, वैसे ही जैसे जब हमारे अंदर दु:ख-दर्द का कोई मैल होता है तो भगवान के सामने आंसुओं में बह जाता है और फिर हम साफ हो जाते हैं।” हमारे घर में कितना बड़ा दार्शनिक उतर आया था मेरे भाई के रूप में, जिसे दुनिया बरबस तरस खाती थी और मैं भगवान को शुक्रिया अदा करते न थकती थी। .....थकान, असंतोष, खीज, क्रोध उसके पास फटकते ही नहीं, वह सारा दिन हँसता-खिलखिलाता, गुनगुनाता और मन-ही-मन ईश्वर से गपियाता। ..... मोची से लेकर कर्मशाला के निर्देशक – सबका वह दोस्त, ऊंच-नीच का उसे ज्ञान नहीं है और काम से कभी वह अपने हाथ नहीं खींचता .....   वह सचमुच कालातीत था, देशातीत था। ..... अपने प्यारे मौजी भैया के सामने आते ही मेरा सारा गुस्सा-खीज कपूर की तरह हवा हो जाते हैं! उसकी खुशी संक्रामक जो है.....

..... मैं जानती हूँ कि ..... जब तक ज़िंदगी की मेरी नौका उस पार के तट तक नहीं लगेगी, बीच-बीच में मेरी नाव ऊभ-चूभ करती रहेगी ..... लेकिन मेरा मासूम भाई, जो दुनिया की नज़रों में “अविकसित है, समय आने पर उस तट पर आसानी से पहुँच जाएगा  क्योंकि वह उन भगवान के साथ रोज़ रात को हंसता-बतियाता है जो उसकी खाट के नीचे बसते हैं। ..... वह तो अपने संग-संग धरती पर उस स्वर्ग का एक टुकड़ा जो उतार लाया है।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
प्रार्थना

“अगर चूल्हे पर सब कुछ डालकर खाना बनाना शुरू किया जाए तो खाना तो पकता ही है ..... लेकिन वह कितनी देर में पकेगा, यह चूल्हे की लौ पर निर्भर करता है। जितनी तेज लौ होगी, खाना उतनी ही जल्दी बनता है”।
“सूखे से ग्रस्त गाँववाले, मंदिर में, ईश्वर से वर्षा की सामूहिक प्रार्थना करने जमा हुए। लेकिन छाता लेकर तो केवल एक बच्चा ही आया था”।
 “आप मांगों, ईश्वर आपको देगा। आप खोजना शुरू करो, ईश्वर उसका पता देगा। आप खटखटाओ, ईश्वर आपके लिए द्वार खोल देगा”।
श्री अरविंद को श्री कृष्ण के दर्शन हुए। उन्हे पांडिचेरी जाने का निर्देश मिला। श्री रामकृष्ण परमहंस माँ काली से वार्तालाप करते थे। कठिन समय में महात्मा गांधी को ईश्वर से दिशा निर्देश मिलते थे। आज के युग के अनेक पुरुषों के साथ ऐसी अनेक घटनाएँ घटीं हैं। 

किसी कि प्रार्थना सुनी गई, किसी की नहीं। किसी की प्रार्थना तुरंत सुनी गई तो किसी को फल प्राप्ति में समय लगा। किसी ने धैर्य खो दिया तो किसी ने इंतजार किया। किसी ने पूरे मनोयोग से मांगा तो किसी ने आधे-अधूरे मन से। परीक्षा में सर्वोत्तम अंक पाने के लिए प्रार्थनाएँ तो बहुत कीं लेकिन उसके साथ समीचीन तैयारी नहीं की। जब हम परीक्षा के लिए पूरी तैयारी के साथ नहीं बैठे तब हम सर्वोत्तम अंक प्राप्ति की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? जब हम अपने हिस्से का काम नहीं करते तो प्रभु से मदद की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। हमारी प्रार्थना का उत्तर देने के पहले प्रभु यह भी देखता है कि जिस समस्या के लिए हम प्रार्थना कर रहे हैं क्या हम खुद उसे सुलझा सकते हैं? ईश्वर हमसे कर्म की अपेक्षा रखता है। और जब हम पूरे मनोयोग से कर्म करते हैं तो वह एक मददगार के रूप में हमें तकलीफ़ों से निकाल लेता है। वह हमारी समस्याओं को सुलझाने के लिए रास्ता दिखाता है, अंधेरे से प्रकाश की तरफ जाने का रास्ता दिखाता है, तरीका बताता है। वह खुद चल कर हमारे पास नहीं आता लेकिन हमारी तकलीफ़ों को समाप्त करने का रास्ता दिखाता है। उस रास्ते पर चलने का कर्म तो हमें ही करना होता है।

गाँव के एक पुजारी ईश्वर भक्त थे। एक बार गाँव में भीषण बाढ़ आई। सबों को गाँव खाली कर सुरक्षित जगह पर जाने के लिए कहा गया। लेकिन पुजारी ने जाने से मना कर दिया, कहा  तुमलोग जाओ, मेरा ईश्वर पर विश्वास है, वह बचाएगा। गाँव में पानी भरने लगा। कुछ लोग मोटर-साइकिल पर पुजारी को निकालने आये। लेकिन उन्होने फिर मना कर दिया और कहा,  तुमलोग जाओ मेरा ईश्वर पर विश्वास है, वह बचाएगा। पानी और बढ़ गया, रास्ते डूब गए। इस बार कुछ लोग नौका लेकर आए। लेकिन पुजारी ने फिर वही बात दोहरा दी। पानी और बढ़ गया। बहाव तेज हो गया। नौका का आना संभव नहीं रहा। अब हेलीकाप्टर से लोग आए और पुजारी को वहाँ से हटाना चाहे। लेकिन उसने फिर वही बात दोहरा दी। आखिर पूरा गाँव, मंदिर के साथ पुजारी भी डूब गया। जब पुजारी ईश्वर के पास पहुंचा, उसने शिकायत की, मेरा तुम पर से विश्वास उठ गया। मैंने तुम पर इतना भरोसा किया, लेकिन तुम मुझे बचाने नहीं आए। ईश्वर ने कहा, मैंने तो सहायता भेजी थी, लोगों को पैदल, मोटर साइकल, नौका, हेलीकाप्टर पर तुम्हें निकालने के लिए लेकिन तुमने हर बार मना कर दिया। मैं क्या करता’?

जब हम ईश्वर से मदद मांगते हैं तब हमें मदद पाने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। अगर हम चाहते हैं कि ईश्वर हमारी प्रार्थना सुन ले तब हमें भी अपनी तरफ से पूरा प्रयास करना चाहिए और ईश्वर प्रदत्त सहायता को समझ कर स्वीकार भी करना चाहिए। हम यह मानते हैं कि ईश्वर हमारी फरियाद तुरंत सुनेगें। लेकिन वह हमारी फरियाद तभी सुनता है जब वह यह समझता है कि उसे तुरंत सुनना है। अपनी फरियाद हकीकत के तराजू पर भी तौलनी चाहिए। अगर हमारी मांग इस संभावना के अंदर हो तो मांग के मंजूर होने की संभावना भी बढ़ जाती है। प्राय: मांगे, तकलीफ दूर करने की नहीं होती, बल्कि संसार की दौड़ में आगे बढ़ने की होती है। मांगों में काम-क्रोध-लोभ-मोह का समावेश होता है। मांगों की फेहरिस्त (लिस्ट) लंबी होती है। ऐसी मांगे ईश्वर कैसे सुन सकता है? ऐसे ही लोग यह कहते पाये जाते हैं, ईश्वर हमारी बात नहीं सुनता
   
जितनी बड़ी मांग, उतनी गहरी प्रार्थना। बड़े कार्य के लिए बड़ा निवेश। अर्थशास्त्र का यह एक साधारण सा नियम है। वैसे ही प्रार्थना के साथ कर्म का निवेश भी आवश्यक है। ज्यादा लाभ के लिए, ज्यादा पूंजी। जितना कर्म, उतना फल। धर्म-संप्रदाय के मुताबिक प्रार्थना के तरीके भले ही अलग अलग हों लेकिन सब के मूल में भावना समान ही होती है। कर्म के निवेश के साथ स्वार्थ रहित प्रार्थना सर्वश्रेष्ठ होती है।

प्रार्थना की फेहरिस्त छोटी करें। समुचित कर्म का निवेश करें। स्व को हटा कर सर्व का समावेश करें। विश्वास और धैर्य रखें आपको अनुभव होगा ‘ईश्वर आपकी बात सुनता है’। ज़िंदगी कितनी लंबी है, यह बात महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण बात यह भी नहीं है कि हमने कितना नाम, मान,  ऐश्वर्य और समृद्धि कमाई। खास बात यह है कि कैसे जी हमने यह ज़िंदगी?
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
पाठकों से: –
हमें अनेक पाठकों से  सकारात्मक टिप्पणियाँ मिल रही हैं। उत्साहवर्द्धन के लिये सब पाठकों का हार्दिक आभार। आप से अनुरोध है कि आपने कहीं भी सकारात्मक, प्रेरणादायक, सृजनात्मक या भारतीय संस्कृति से संबन्धित कुछ नया सुना, पढ़ा, देखा या ख्याल आया तो हमें भेजें। हमारी कोशिश रहेगी कि हम, उसे, आपके नाम से, अपने पाठकों तक पहुंचाएँ।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अपने सुझाव (comments) दें, आपको सूतांजली कैसी लगी और क्यों, नीचे दिये गये एक टिप्पणी भेजें पर क्लिक करके। आप अँग्रेजी में भी लिख सकते हैं।

सोमवार, 1 जून 2020

सूतांजली, जून 2020


सूतांजली             ०३/११                           जून २०२०
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
क्या आप कुछ करती हैं?
“क्या आप काम-काजी महिला हैं?”
मैं पिछले वर्ष हिमालय की गोद में बसे खूबसूरत नगर नैनीताल के वन-निवास, श्री अरविंद आश्रम के एक साप्ताहिक शिविर में गई थी। जैसी रमणीक जगह वैसे ही खुश मिजाज लोग।  इसी शिविर में थे एक सज्जन बुजुर्ग, ९० वसंत देख चुके थे। फिर भी गज़ब की स्फूर्ति, सेहत और वर्तमान ख्यालात के शख्स। बिरले ही मिलते हैं ऐसे इंसान। यह एक छोटा सा प्रश्न उन्होने ही मुझ से किया। शायद उन्हे लगा कि मैं कहीं न कहीं कुछ न कुछ जरूर करती हूँ। यह एक छोटा सा प्रश्न जिसे अनेक भारतीय महिलाओं से किया जाता है। और वे तुरंत अ-सहज हो जाती हैं। प्राय: बड़ी निराशा से उत्तर देती हैं नहीं मैं कुछ नहीं करती। मैं तो बस सिर्फ एक सीधी साधी गृहस्थ महिला हूँ, या मैं तो सिर्फ एक भारतीय महिला हूँसिर्फ लगाना नहीं भूलतीं और एक अपराध बोध से ग्रसित हो जाती हैं।
 
वन निवास, श्री अरविंद आश्रम, नैनीताल  का प्रमुख भवन 
मैं, चार दशक पहले, अपने समय की एक पढ़ी-लिखी, आधुनिक ख़यालों के परिवार की आजाद सोच की लड़की थी। मेरा विवाह एक मारवाड़ी परिवार में हुआ। मेरे ससुराल वालों को मुझ पर गर्व था। मेरे श्वसुर का पक्का विश्वास था कि अगर मैं कहीं नौकरी कर लूँ या कोई भी व्यवसाय करूँ तो निश्चित तौर पर एक सफल महिला साबित होऊंगी। शायद इसी कारण एक दिन उन्होने मुझे नौकरी या व्यवसाय करने का सुझाव दिया।

आज तो हर बहू नौकरी करना या व्यापार करना अपना हक ही मानती है। पूछने या इजाजत का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता है। उसे लगता है कि इसके बिना उसकी कोई इज्जत नहीं, उसकी कोई अहमियत नहीं। कई वैवाहिक रिश्तों में तो शर्त ही यही होती है मेरी लड़की घर, रसोई-चूल्हा नहीं संभालेगी या मेरी लड़की को रोटी-सब्जी बनाना नहीं आता, घर सँभालना नहीं आता, उसे हमने यह सिखाया ही नहीं है। ऐसे में अगर ससुराल वाले ही काबिलियत देख कर इसकी पेशकश कर दें तो फिर नेकी और पूछ पूछ। हम तो तैयार ही  बैठे हैं, न आता हो तो भी।
 
शिविर के कुछ साथियों के साथ लेखिका, बाएँ से तृतीय 
लेकिन मैं तो जैसे किसी और ही मिट्टी की बनी थी। मैं उनके इस प्रस्ताव पर सकुचा गई। लेकिन फिर साहस कर कहा मैं तो पहले ही बहुत कुछ करती हूँ शायद औरों की तुलना में कम भी नहीं कमाती। श्वसुर जी हैरान, “कैसे, मैं समझा नहीं”?

मैंने उन्हे समझाया। यह कोई जरूरी तो नहीं कि कुछ करने के लिए बाहर जाना ही पड़े। अगर यह कुछ करने के लिए मैं बाहर जाना शुरू करूँ तो सबसे पहले मुझे हर समय नए नए कपड़ों की आवश्यकता पड़ेगी,  बनठन कर बनाव-शृंगार पर भी खर्च करना पड़ेगा। अपनी और परिवार की  इच्छाओं और मूल्यों को ताक पर रख कर सहकर्मियों के साथ साथ प्रतिस्पर्धा में नित-नूतन जगहों पर जाना, खरीदारी करना, पार्टी करना और उनमें जाना और भी न जाने क्या क्या! कभी किसी के बच्चे का जन्मदिन, किसी की शादी की सालगिरह – उनमें जाओ और साथ में उपहार। इसमें खर्च और तनाव दोनों ही होंगे। अभी इन सबों से और इन सब पर होने वाले खर्च को बचाकर कमाई ही तो कर रही हूँ?
 
ऊपर से नीचे - शिविर में प्रभात फेरी, भारतीय खेल, मंच पर श्री शंकरन-आचार्य श्रद्धेय श्री नवनीत एवं आयुर्वेदाचार्य डॉ. सुरिंदर कटोच, सभाकक्ष में श्रोता 
यह तो हुई कमाई की बात। अगर घर के बाहर जाना शुरू कर देती हूँ, तब घर के कार्य नहीं कर पाऊँगी, उनमें बाधा पड़ेगी। न तो समय पर गरम खाना दे पाऊँगी और न ही सही ढंग से देख भाल कर सकूँगी। कभी कपड़े आयरन नहीं होंगे, कभी बटन टूटी मिलेगी, कभी आपकी दवा छूटेगी, कभी किसी बच्चे के स्कूल का काम पूरा नहीं होगा। ये सब काम सही तरह और समय पर न होने के कारण नौकर रखा जायेगा। उसका खर्च तो होगा ही, क्या वह सभी काम सही ढंग से कर लेगा? क्या उसके काम की और उसके खुद की देखभाल नहीं करनी पड़ेगी? और इन सब के कारण घर के सब सदस्य एक प्रकार की झुंझलाहट के शिकार हो जाएंगे। उसके कारण मेरा स्वभाव भी चिड़चिड़ा हो जाएगा। इन सब का असर पॉकेट पर तो पड़ेगा ही परिवार में भी एक प्रकार की अशांति रहने लगेगी, टूटन आने लगेगी।

अभी मैं कोई नौकरी न कर अपने घर को सब तरफ से बचा रही हूँ। बच्चों की देखभाल, बड़ों को समय पर खान-पान, खुद रसोई में सबके लिए सुस्वादु और स्वास्थ्यकर भोजन बनाना और पूरा घर संभालना, यह सब उन रुपयों से बड़ा है जो मैं अपने झूठे दंभ में कमा कर लाऊँगी।

मेरे श्वसुरजी मेरी बात से एकदम सहमत हो गए और उन्होने फिर कभी मुझे नौकरी या व्यवसाय करने को नहीं कहा।   

आज फिर इतिहास दोहरा गया। नैनीताल के उस शिविर में जब उन बुजुर्ग ने वही प्रश्न किया तब मैंने सगर्व कहा, “नहीं, मैं एक गृहस्थ महिला हूँ, लेकिन मैं कमाती हूँ। मैं वह सब कमाती हूँ जिसे दूसरे नहीं कमा सकते। और उसके बाद मैंने श्वसुरजी को कही पूरी बात दोहरा दी। वे बहुत खुश हुए, बोले, “वाह! क्या बात है, आज की पीढ़ी यह क्यों नहीं समझती’?

आज विवाह के चालीस वर्षों बाद, श्वसुर तुल्य बुजुर्ग की यह बात सुन और उनके चेहरे पर आई खुशी देख मुझे बहुत प्रसन्नता हुई और मुझे अपना जीवन सार्थक होता नजर आया।
-      रश्मि करनानी
                 ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
       चिंता ही तरक्की है?
जो यह कहते हैं कि चिंता चिता है’, उन्हे तरक्की की न तो जानकारी है न ही उन्हे हमारी तरक्की की चिंता है। हमने माना “चिंता चिता है”; हमने चिंता न करने की सलाह दी, उपदेश दिया।  इसीलिये हमारी  तरक्की बंद हो गई। जबसे हमने चिंता करना सीख लिया तब से हमारी तरक्की शुरू हो गई। विश्वास कीजिये हम जितनी ज्यादा चिंता करेंगे हमारी तरक्की भी उसी अनुपात में बढ़ती जाएगी, क्योंकि चिंता ही तरक्की का मूल है, चिंता ही हमें तरक्की करने के लिये बाध्य करती है। बाजार पुर-जोर इसी कोशिश में लगा है कि हम चिंता करना छोड़ न दें। बस ऐसा ही समझना चाहिए कि चिंता मिटी - तरक्की रुकी 

सोचिए जरा सा, पोलियो-मलेरिया जैसी बीमारियाँ उन्नत देशों से मिट चुकी हैं। उन्नतिशील देशों में भी समाप्त प्राय: है। हमने इन्हें मिटाने का संकल्प केवल इसीलिये लिया क्योंकि ये बीमारियां  चिंता करने के कारण नहीं होतीं। इन बीमारियों का मूल चिंता नहीं है, अत: हमें इन बीमारियों की आवश्यकता नहीं है। हृदय रोग-चीनी-रक्तचाप-अवसाद जैसी बीमारियों  का सीधा सम्बंध चिंता से है। इसलिए हमें ये चाहिए और ये सब दिन-दुनी रात-चौगुनी गति से फल-फूल रही हैं। हम इन्हें पाल-पोस कर बढ़ाने में लगे हैं। हमने इनके उन्मूलन का कोई अभियान नहीं चलाया। इन्हें रोकने का कोई उपाय नहीं किया। हमने केवल इनके उपचार के लिए नए-नए अस्पताल-संसाधन-दवाइयाँ-उपकरण आदि का ही प्रयास किया है, उन्मूलन का नहीं। हम चिंता मिटाने का कोई प्रयत्न नहीं करते, बल्कि इस बात की चिंता करते हैं कि कहीं लोग चिंता करना बंद न कर दें। हर रोज स्वास्थ्य का  फलता फूलता व्यवसाय यह सिद्ध करता है। बल्कि अब तो हम यह कहने भी लगे हैं – स्वास्थ्य बड़ा व्यापार है - हैल्थ इस बिग बिज़नेस

हमारे दिमाग में जड़ दिया गया है कि बुढ़ापे में बच्चे हमारा ख्याल नहीं रखेंगे।  अत: वर्तमान में पेंशन स्कीम की चिंता करें, वर्तमान को छोड़ भविष्य को सुरक्षित कीजिये; अनजान लोगों के हाथ में अपनी कमाई देकर। मेरे बाद, मेरे परिवार का क्या होगा, इसकी  चिंता में जीवन सुरक्षा बीमा लीजिये, बीमार पड़ जाने पर इलाज के लिए पैसे नहीं होंगे और कोई अपना-पराया सहायता नहीं करेगा, अत: अनजान लोगों पर भरोसा कर मेडिकल बीमा करवाइये, और दुर्धटना घटने पर इलाज के लिये एक्सिडेंट बीमा अलग से लीजिये। सबसे बड़े मजे की बात तो यह कि पिछले वर्ष, पूरा लेखा-जोखा करने के बाद, बाजार द्वारा सुझाई गई रकम की बीमा कराई गई थी। लेकिन एक वर्ष  बाद ही हमें यह समझा दिया गया कि पिछले वर्ष कराई गई बीमा की राशि कम है, यह प्रमाणित कर, बाजार हमें और बीमा करवाने की चिंता से ग्रस्त कर देगा। और इन सब बीमा के भुगतान के लिए वर्तमान खुशियों को ताक पर रख कर, अपनों पर अविश्वास की जड़ पुख्ता कर, ज्यादा कमाने की चिंता में व्यवसाय की, वेतन की वृद्धि की चिंता लगातार करते रहिये।

बाल सफ़ेद होने की चिंता में उसे रंगिये, चेहरे और बदन की झुर्रियां छिपाने की चिंता में क्रीम और लोशन लगाइये, फैशन के साथ चलने के लिए पोशाक रहते हुए भी नये कपड़े खरीदने की चिंता बनाए रखिये। फोन, आइ पैड, लैपटॉप, टीवी को अप-टू-डेट की चिंता बराबर बनाए रखिये, भले ही वे एकदम ठीक चल रहे हों और आपका सब कार्य हो रहा हो। इन सब को प्लास्टिक के पैसे से खरीदते जाइए और मासिक ईएमआइ (EMI) के भुगतान की चिंता बरकरार रखिये। कहीं बीमार न पड़ जाएँ इस चिंता में जिम, पूरे शरीर का परीक्षण (होल बॉडी टेस्ट) और MRI कराते रहिये। पहले वर्ष में एक बार। अगर एक बार करा रहे हैं, तब एक नहीं दो बार, और खुदा ना खस्ता दो बार करवा रहे हैं तब साल में .........बस बढ़ाते रहिये। विटामिन की गोलियां, ताकत की गोलियां, जड़ी-बूटियों का लगातार सेवन करते रहें, बिना यह जाने कि आपको इनकी आवश्यकता है भी या नहीं, और है भी तो कब और कितनी? इसकी न सोच कर बस लेने की चिंता बनाए रखिए। आपको आयोडीन नहीं चाहिए तो भी आयोडिन युक्त नमक खाइये। बिना सोचे समझे घी और चीनी बंद रखने की चिंता रखिये, भले ही आपके शरीर को इनकी आवश्यकता हो। वैसे ही प्रोटीन, फाइबर आदि लेने की चिंता रखिये भले ही वे हमारे शरीर में जरूरत से ज्यादा हों। हम दाल-रोटी, दाल-भात खाते थे और मस्त रहते थे। हमारी तरक्की रुक गई।  चिंता में हमने ये बंद किए हमारी तरक्की शुरू हो गई।

पड़ोसी / पड़ोसन ने कौनसी नई गाड़ी खरीदी, किसके यहाँ कितने इंच का नया टीवी आया, कितने डोर (दरवाजे) का नया रेफ्रीजरेटर आया, विदेश में कहाँ घूम कर आया इस पर बराबर नजर बनाए रखिये और इसकी बराबरी करने की चिंता करते रहिये। अगर धार्मिक हैं तो द्वादश ज्योतिर्लिंग कितनी बार हो आये, मानसरोवर की यात्रा में किसने कितने खर्च किए, कितनी बार भागवत कथा करवाई-कहाँ और किससे, शत-चंडी पाठ, रुद्राभिषेक का भी लेखा-जोखा रखिये, नहीं तो तरक्की रुक जायेगी।

पहले माँ-बाप को यहा पता ही नहीं होता था कि उनका बच्चा कौनसी कक्षा में पढ़ता है?  कोई चिंता नहीं होती थी।  कोई तरक्की नहीं हुई। अब देखिये बच्चा आने के पहले से जो चिंता शुरू होती है वह तब तक बरकरार रहती है जब तक रिले र्रेस की तरह दूसरी चिंता हमारा हाथ नहीं पकड़ लेती। हम खुद ही चिंतित नहीं रहते बल्कि इस बात की भी चिंता बनाए रखते हैं कि उस बच्चे को  भी हर समय चिंता बनी रहे। और हम इसके सब साधन जुटाये रखते हैं। पहले बच्चों को 60 प्रतिशत अंक में प्रथम श्रेणी और 75 प्रतिशत अंक में विशिष्ट श्रेणी मिलती थी। हम खुश हो जाते थे, फलस्वरूप विशेष तरक्की नहीं हुई। अब 90 प्रतिशत भी मिले तो भी अच्छे विध्यालय / उच्च विद्यालय / विश्व विद्यालय में प्रवेश की चिंता बनी रहती है। इसी कारण तरक्की हुई और 99 से 100 प्रतिशत अंक भी मिलने लगे।  

चिंता! चिंता!! और चिंता!!! यही मूल मंत्र है। यही तरक्की का असली रास्ता है। बाजार इस बात का पूरा ध्यान रख रहा है  कि हमारी चिंता बनी रहे, बढ़ती रहे, फलती-फूलती रहे। चिंता मिटी और चिता मिली, चिंता मिटी-तरक्की रुकी।  

वर्तमान हमारी मुट्ठी में है, भविष्य मात्र एक कल्पना है। क्योंकि भविष्य वर्तमान बन कर ही फलीभूत होता है। अगर हम वर्तमान को खुशहाल बना पाये तब भविष्य स्वत: ही खुशहाल हो जाएगा। लेकिन हम भविष्य को खुशहाल बनाने की चिंता में वर्तमान को दुख:हाल बनाते रहते हैं। फलस्वरूप वर्तमान दुख:हाल रहा, भविष्य कभी मुट्ठी में आया ही नहीं। क्या करना है, यह हमें ही सोचना है?                           
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अपने सुझाव (comments) दें, आपको सूतांजली कैसी लगी और क्यों, नीचे दिये गये एक टिप्पणी भेजें पर क्लिक करके। आप अँग्रेजी में भी लिख सकते हैं।

सूतांजली, अगस्त द्वितीय 2026, आकर्षक घर की कुंजी

  २कोई ऐसा अक्षर नहीं है, जिसका प्रयोग मंत्र-रचना में न हो सके , कोई ऐसा वृक्ष नहीं है, जो किसी न किसी व्याधि की औषधि न हो , कोई ऐसा...