मंगलवार, 1 दिसंबर 2020

सूतांजली दिसंबर २०२०

सूतांजली

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वर्ष : ०४ * अंक : ०५                   👂🔊 (00.00-24.24)                       दिसंबर * २०२०

आप जो कर रहें हैं वही सोच रहे हैं या जो सोच रहे हैं वही कर रहे हैं?

कौन हैं आप?

वह, जो कर रहा है या वह, जो सोच रहा है?

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मैं कौन हूँ?

(00.00-06.03)

मैं कौन हूँ? यह एक शाश्वत प्रश्न है। अनादि काल से यह प्रश्न ऋषियों, मुनियों, संतों, चिंतकों, दार्शनिकों, मनोवैज्ञानिकों को मथता रहा है, भारत में ही नहीं पूरे विश्व में। अलग-अलग देश-काल में अलग-अलग लोगों ने अपने ज्ञान और अनुभव के आधार पर अपने अपने ढंग से इसका उत्तर दिया भी है। लेकिन  इनमें एक्य तो है ही नहीं विरोधाभास भी है। और यह प्रश्न आज भी जस-का-तस-खड़ा है।

 इसका यह अर्थ नहीं है कि कोई भी इसका उत्तर ढूंढ नहीं पाया। अनेकों ने अपने अपने ढंग से इसे व्याख्यायित किया है। किसी एक की सुनें तो वही सटीक लगता है; लेकिन दो विरोधाभासी व्याख्या सुनें तो असमंजस की स्थिति पैदा हो जाती है। लेकिन दोनों ही अपनी अपनी जगह पर सही हैं; जब तक एक सर्वमान्य व्याख्या ढूंढ न ली जाये। आज हम इसी विषय पर कुछ विरोधी व्याख्याओं की चर्चा करेंगे।   

 मैं ईश्वर हूँ 

एक व्यक्ति को ईश्वर से मिलने की तीव्र इच्छा थी। वह ईश्वर को ढूँढता रहता था। ऋषियों, मुनियों, साधुओं के चक्कर लगाता रहता था, कोई उसे ईश्वर से मिला दे! अचानक उसे पता चला, एक पहाड़ी की कन्दरा में एक मुनि रहते हैं वे उसकी मुलाक़ात ईश्वर से करा सकते हैं। वह व्यक्ति भागा भागा उनके पास पहुंचा। हाथ जोड़ कर प्रणाम कर चुपचाप उनके नजदीक बैठ गया। मुनि के पूछने पर उसने बताया मैंने सुना है आप ईश्वर से साक्षात मुलाक़ात करा सकते हैं। मैं ईश्वर से मिलने के लिए भटक रहा हूँ। क्या आप मेरी मुलाक़ात ईश्वर से करा सकते हैं’?” मुनि सहर्ष तैयार हो गए, “यह कौन सी बड़ी बात है, बोलो तुम कब मिलना चाहते हो”? व्यक्ति बहुत खुश हुआ और कहा कि जब मुनि चाहें, वह प्रस्तुत है। मुनि ने उसे निश्चित दिन, समय और स्थान पर आने के लिए कहा। तय समय पर वह व्यक्ति स्नान कर, शुभ्र वस्त्र धारण कर, प्रसन्न हृदय बताए हुए स्थान पर पहुँच गया। उसने देखा मुनि पहले से ही वहाँ विराजमान हैं। श्रद्धा पूर्वक मुनि को प्रणाम कर, हाथ जोड़ वह शांति पूर्वक बैठ गया। मुनि ने उसे आशीर्वाद दिया। और बोले, “इसके पहले की ईश्वर तुम से मिलें  मुझे उन्हें तुम्हारा परिचय देना होगा। अत: बताओ तुम कौन हो”? व्यक्ति ने अपना नाम बताया। मुनि ने कहा, नहीं यह तो तुम्हारा नाम है। ईश्वर को तुम्हारे नाम से कोई मतलब नहीं, तुम कौन हो, यह बताओ। व्यक्ति ने बताया कि वह एक बड़ी संस्था का संचालक है। मुनि ने फिर कहा यह तो तुम्हारा ओहदा है, तुम कौन हो’?

मैं सरल हृदय हूँ, आस्तिक हूँ, ईश्वर का आराधक हूँ, व्यापारी हूँ,  .......”

“ये तो तुम्हारे कार्य हैं। तुम कौन हो?”

व्यक्ति पसीने से तर बतर हो गया। उसने एक एक कर बताया कि वह पुरुष है, इंसान है, जीव है, आदि आदि। लेकिन मुनि इस सब उत्तरों को खारिज कर उसी प्र्शन पर अटके रहे तुम कौन हो’? व्यक्ति को मौन देख मुनि ने कहा कोई बात नहीं, अभी वापस जाओ, समझो कि तुम कौन हो। जब समझ जाओ तब फिर से आ जाना।

 व्यक्ति लौट आया। बहुतों से मिला, पढ़ा, सुना और फिर से मुनि के पास पहुंचा। लेकिन मुनि ने फिर से सब उत्तरों को खारिज कर वहीं पर डटे रहे, “तुम कौन हो?” निराश, व्यक्ति लौट आया। चिंतन करता रहा। एक दिन अचानक मुनि की एक प्रवचन में उस व्यक्ति से मुलाक़ात हो गई। मुनि ने पूछा, “तुम फिर आए नहीं? ईश्वर से मिलने की इच्छा नहीं रही?’ व्यक्ति ने आदरपूर्वक मुनि को प्रणाम किया और हाथ जोड़ कर बोला, “नहीं मुनिवर ऐसी बात नहीं है। मैं पहचान गया कि मैं कौन हूँ। और जब मैं अपने को जान गया तब ईश्वर से मुलाक़ात हो गई”।

मैं परमेश्वर हूँ – श्री अरविंद   (06.03-07.14)

प्रत्येक मनुष्य की सनातन और विराट आत्मा स्वयं परमेश्वर है; उसकी व्यक्तिगत आत्मा भी परमेश्वर का ही अंश है,  ममैवांश:, जो निश्चय ही  परमेश्वर से कट कर अलग हुआ टुकड़ा नहीं है, क्योंकि परमेश्वर के संबंध में ऐसी कोई कल्पना नहीं की जा सकती कि वे छोटे छोटे टुकड़ों में बंटे हुए हों, बल्कि वे परम चेतना की आंशिक चेतना हैं, परम शक्ति का शक्त्यांश हैं, सत्ता के आनंद के द्वारा जगत-सत्ता का आंशिक आनंद –उपभोग हैं, और इसलिए व्यक्त रूप में या जैसा कि हम कहते हैं, प्रकृति में यह सत्ता उसी परम अनंत तथा असीमित सत्ता का ही एक सान्त तथा सीमित भाव है।

-       गीता प्रबंध

मेरे विचार ही मैं हूँ – डॉ.वेन डायर  (07.14-10.39)

(डॉ.वेन डायर एक अमेरिकन स्वयं-सहायता (सेल्फ हेल्प), आध्यात्मिक और प्रेरक लेखक हैं)

मैं कौन हूँ” इसका उत्तर तो मिला, लेकिन इसे कैसे समझें, कैसे मानें? यह बहुत सरल भी है और अत्यंत कठिन भी।

मैं कौन हूँ? क्या मैं यह शरीर हूँ? बाहर से दिखने वाली त्वचा, बाल, कान, आँख आदि का हाड़-मांस से बनी यह देह। नहीं केवल इतना नहीं। यह तो केवल बाहरी खोल है। इसके अंदर भरा है मांस, नसें, रक्त, हड्डी, फेफड़ा, हृदय, किडनी, लीवर और भी बहुत कुछ। तो क्या, यह स्थूल रूप में जो कुछ दिखता है वही मैं हूँ। अगर हाँ, तब यह सब तो आप भी है। हाँ, बाहर की चमड़ी का रंग थोड़ा अलग हो सकता है, आकार-प्रकार अलग है लेकिन मूलत: ये सब एक ही है। तो क्या मैं और आप एक ही हैं? आप ही क्यों पृथ्वी के सब मानव भी ऐसे ही है। क्या सब मानव एक ही हैं? मानव ही क्यों, पशु, पक्षी, जानवर भी तो कमोबेश इन्ही के बने हुए हैं। तो क्या हम सब और ये सब एक ही हैं? कतई नहीं। तब फिर क्या अलग अलग है? कैसे? सही बात बात तो यह है कि 99% हम वह नहीं हैं जो हमें स्थूल रूप से दिखता  है। बल्कि वह है जिसे हम देख नहीं पाते, सूंघ नहीं पाते, छू नहीं पाते। हम मुख्यरूप से उसके बने हैं जो इन सब से अलग है, स्थूल नहीं है, हर मानव को मानव से अलग करता है, पशु और मानव को अलग करता है। वह है हमारा दिमाग, हमारी भावनाएँ, हमारे विचार, हमारा ज्ञान, हमारी चेतना। तब, अब मैं  दो भागों में बाँट गया - एक मेरा यह स्थूल भाग और दूसरा मेरा अदृश्य भाग। अब अगर मैं थोड़ा प्रयत्न करूँ, अभ्यास करूँ  तो इन दोनों को अलग अलग देख सकूँगा, अनुभव कर सकूँगा। पता चलेगा मेरे शरीर कुछ और कर रहा है लेकिन असली मैं कुछ और। हमें अनुभव होने लगेगा हमारा शरीर कई गलत काम कर रहा है लेकिन मैं नहीं। अगर अभ्यास करते रहें तो जल्दी ही वह समय भी आ जाएग जब हमारा शरीर भी वही करने लगेगा जो मैं करना चाहता हूँ। और तब परम शांति, सुख और आनंद का अनुभव होगा। उसकी अनुभूति बताई नहीं जा सकती केवल महसूस की जा सकती  है। यह पथ अपने आप हमें अपने असली मैं तक पहुंचा देगा। हम अपने को पहचान लेंगे कि “मैं” मैं नहीं मेरे विचार हैं।   

क्या मेरे विचार ही मैं हूँ?  जे.कृष्णमूर्ति   (10.39-13.29)

विचार से आपका क्या तात्पर्य है? आप विचार कब करते हैं? स्पष्टत: विचार किसी प्रतिक्रिया का परिणाम होता है, चाहे वह तंत्रिकीय प्रतिक्रिया हो या मनोवैज्ञानिक – है वह संगृहीत स्मृति की प्रतिक्रिया ही। किसी अनुभूति के प्रति तंत्रिकाओं में तत्काल प्रतिक्रिया होती है और संचित स्मृति मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया करती है जो जाति, वर्ग, गुरु, परिवार, परंपरा आदि-आदि से प्रभावित रहती है – और आप इस सब को विचार कह देते हैं। इस प्रकार विचार–प्रक्रिया स्मृति की प्रतिक्रिया है, है न? यदि आपकी कोई स्मृति नहीं है तो विचर भी नहीं होंगे। किसी परिस्थिति के प्रति स्मृति की प्रतिक्रिया ही विचार-प्रक्रिया को गति प्रदान करती है।

यह बात बिलकुल साफ है कि सारी विचारणा अतीत के प्रति होने वाली प्रतिक्रिया ही है – अतीत अर्थात स्मृति, ज्ञान, अनुभव। सारी विचारणा अतीत का परिणाम होती है। अतीत अर्थात काल, बीता हुआ काल। बीता हुआ काल जो अतीत में अनंत छोर तक विस्तार पा गया है – उसी को काल मान लिया गया है, काल अतीत के रूप में, काल वर्तमान के रूप में, काल भविष्य के रूप में, काल को इस तीन खंडो में विभाजित कर दिया गया है लेकिन काल तो नदी की तरह है – प्रवाहमान। इसे इन खंडों में हमने बांटा है और विचार इन खंडों में अटकता-भटकता रहता है। अत: हमको यह स्पष्टत: समझ लेना चाहिए कि हमारे विचार स्मृति का प्रत्युत्तर होते हैं और स्मृति यंत्रवत होती है। ज्ञान सदैव अपूर्ण रहता है और इसलिए इससे उपजी सारी अवधारणा सीमित व आंशिक रहती है, कभी स्वतंत्र नहीं होती। अत: विचार की कोई स्वतन्त्रता नहीं होती। परंतु हम ऐसी स्वतन्त्रता का अन्वेषण आरंभ कर सकते हैं जो विचारों की प्रक्रिया न हो और जिसमें मन अपने समस्त द्वन्द्वों और अतिक्रमण कर रहे समस्त प्रभावों के प्रति केवल सजग रहे।

श्री अरविंद, श्री जे.कृष्णमूर्ति, श्री सद्गुरु, डॉ वेन डायर

मैं जीवन हूँ – सद्गुरु    (13.29-24.24)

यह एक सच्चाई है कि हमारे पास सबसे विकसित स्नायु-प्रणाली (न्यूरोलॉजिकल सिस्टम) है, किसी कीड़े मकोड़े या जानवर किसी की भी तुलना में। पर हमारी एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया भी है। आपकी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया चाहे कुछ भी हो, आपके विचार और भवनाएं सिर्फ इसलिए घटित  हो रही हैं क्योंकि आपने एक खास मात्रा में जानकारी इकट्ठी की हैं। अगर आप सोचते हैं कि वह एक अच्छा इंसान है तो एक तरह का विचार, अगर सोचते हैं कि वह एक अच्छा इंसान नहीं है तो दूसरे तरह का विचार। ये सब जानकारी जो आपने इकट्ठा की हैं वो चाहे सही हो या गलत इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आपने जिस तरह की जानकारियाँ इकट्ठा की हैं वे आपकी भावनाओं और विचारों का ढंग निर्धारित करती हैं। आप इन्सानों को समझा दें कि उनकी यह मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया उनका अपना नाटक है, इसका सच्चाई से कोई लेना देना नहीं है।

यहाँ सौ लोग बैठे हो सकते हैं और हर कोई अपनी एक अलग मनोवैज्ञानिक स्थिति में हो सकता है। और वे सब अपनी अलग अलग दुनिया में हैं। वे इस दुनिया में नहीं हैं। लोग प्राय: मेरे पास आकर कहते हैं कि सद्गुरु मैं ध्यान करना चाहता हूँ लेकिन मेरे मन में विचार आते हैं। मैं पूछता हूँ, “देखिये मैं आपको एक दूसरे तरह का ध्यान सिखा दूँगा जिससे आपका गुर्दा, कलेजा, दिल काम करना बंद कर देगा। क्या आप सीखना चाहेंगे?”

“नहीं, नहीं, नहीं”।

“तो आप सिर्फ अपने दिमाग का ही काम बंद करना चाहते हैं, क्यों? जब आप बैठ कर ध्यान करते हैं तब आपका दिल, गुर्दा, कलेजा सब काम करते हैं, आपको कोई दिक्कत नहीं है। सिर्फ दिमाग के काम करने पर आपको दिक्कत है?

ऐसा क्यों है? क्योंकि आपकी पहचान आपके किडनी के काम करने से जुड़ी हुई नहीं है लेकिन अपनी विचार प्रक्रिया और भावनाओं से आपकी पहचान बुरी तरह जुड़ी हुई है। आप उससे इतने ज्यादा जुड़े हुए हैं कि आपको लगता है आप खुद वही हैं। और इस वजह से जीवन का अनुभव इसके पीछे छुप गया है। बताइये पिछले चौबीस घंटों में ऐसे कितने पल थे जब आपने विचारों से परे जाकर, बिना किसी पूर्वाग्रह के, किसी चीज को देखा? क्या आप सिर्फ आकाश की तरह मौजूद हो सकते हैं? सिर्फ जीवन। क्या आप जीवन हैं? हाँ। आप ठीक से विचार कीजिये, क्या आप वाकई जीवन हैं? हाँ। आप जीवन हैं। मैं एक जीवन हूँ इसलिए मेरा एक शरीर है। मेरे पास विचार हैं, भावनाएं हैं, घर है, मेरा ..... और न जाने क्या क्या है। ये सब साजो सामान है। आप साजो समान का अनुभव कर रहे हैं, क्या आप रोज जीवन का अनुभव कर रहे हैं?

आप अपने मनोवैज्ञानिक नाटक को जीवन समझने की गलती कर रहे है। आपका मनोवैज्ञानिक नाटक आपका नाटक है। शायद उसका निर्देशन बुरा है। जब इसका निर्देशन बुरा होता है तब कष्ट होता है, लेकिन जब निर्देशन अच्छा होता है तब आनंद लेते हैं। तब आपका मनोवैज्ञानिक नाटक आपका अपना है। आप इसे चलने दें। इसमें कुछ गलत नहीं है। यह ऐसा है जैसे हम एक खेल खेलना शुरू करते हैं। आपको टेनिस खेलना पसंद है, आनंद आता है। मान लीजिये आपने टेनिस खेलना शुरू किया और आप रुक नहीं पा रहे हैं ....... 24 घंटे, तो आप टेनिस से कैसा दुख पाएंगे? अभी बस यही हो रहा है। आपकी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया बेलगाम हो गई है। वो बस चलती ही जा रही है...... बिन रुके। तो इसका आसान हल ये है कि आप इसे रोकने की कोशिश न करें। आपको  दिमाग के काम करने से परेशानी है, क्योंकि उससे आपकी पहचान है। आपने गलती से समझ लिया है कि आपके विचार आप हैं। आप जो भी सोचते हैं, आप समझते हैं कि वो आप हैं। मगर आपके विचार एक खास सूचना से पैदा हो रहे हैं जो आपने बाहर से इकट्ठा किए हैं। अगर मैं आपकी सारी याददाश्त मिटा दूँ तो...... क्या आप विचार पैदा कर पाएंगे? नहीं। यह केवल आपके द्वारा इकट्ठा की गई जानकारी से ही आ रहा है।  आपने जो जानकारियाँ इकट्ठा की हैं वो सब अपनी मर्जी से इकट्ठा नहीं की हैं। जब आप सड़क पर चलते हैं तब वह हर चीज जो आप देखते, सुनते, सूंघते, चखते, पढ़ते और छूते हैं वो आपके मन में दर्ज हो जाती हैं। आप इससे बच नहीं सकते। आपके अंदर जानकारी के रूप में जो जाता है वो पूरा आपके हाथ में नहीं है, 90 फीसदी आपके हाथ में नहीं है। इसमें कुछ भी अच्छा, बुरा, बदसूरत, सुंदर नहीं है। ये बस जानकारी हैं। आप इसे अपनी तरह से पहचान कर कहते हैं कि अरे ये अच्छा है, और वो अच्छा बन जाता है। आप कहते हैं ये बुरा है और वो बुरा बन जाता है। यह दरअसल आपका किया धरा है। मगर जानकारी बस बरस रही है सिर्फ दर्ज हो रही है। आप जो भी इकट्ठा कर रहे हैं वो आपका हो सकता है, पर वो आप नहीं हो सकते। 

मैं इसे अपनी कुर्सी कह सकता हूँ। लेकिन अगर मैं यह कहूँ कि यह मैं हूँ तो आप सोचेंगे कि मैं पागल हो गया हूँ। फिलहाल हम सब के साथ यही हुआ है। इसे थोड़ा आसान तरीके से समझाता हूँ। हमारा शरीर, ये शरीर, क्या आप ऐसे ही पैदा हुए थे? नहीं आप छोटे से आए थे लेकिन आप अब इतने बड़े हो गए हैं। ये कैसे हुआ? बस उस भोजन से जो आपने खाया। यह धरती पर जिस पर आप चल रहे हैं वो भोजन बन गई है और अब ऐसी है। मेरे और आप जैसे अनगिनत लोग इस धरती पर आ चुके हैं। अब वो लोग कहाँ हैं? वे सब अब मिट्टी की परत हैं। तो यह सिर्फ मिट्टी है जो भोजन में बदल गई है। इस भोजन को खा कर हमने यह शरीर बना लिया। यह सच है कि यह शरीर भी समय के साथ इकट्ठा किया गया है। जो आप इकट्ठा करते हैं वो आपका हो सकता है पर क्या वो आप हो सकते हैं? ज्यादा से ज्यादा आप अपने द्वारा इकट्ठा की  गई चीज को अपनी कहने का दावा कर सकते हैं लेकिन आप यह नहीं कह सकते कि यह “मैं” हूँ। आप जो भी इकट्ठा करते हैं वो कभी आप खुद नहीं हो सकते।  अगर आपने जानकारी के रूप में जो भी इकट्ठा किया है उसे आप साफ साफ जान लें कि मैं यह नहीं हूँ, तब  जीवन को बस जीवन की तरह देखने लगेंगे। बिना किसी चीज से प्रभावित हुए। बिना किसी चीज से पहचान जोड़े। बिना किसी पूर्वाग्रह के। बस एक जीवन। क्या यह सच है कि आप मूलरूप से बस एक जीवन हैं? आपने एक शरीर एकत्रित किया तो हमने आपको आदमी कहा, फिर आपने अपने अंदर कुछ चीजें इकट्ठा की तो हमने आप को ये-वो और सब कुछ कहा। लेकिन मुख्य रूप से क्या आप सिर्फ एक जीवन हैं? और क्या यह सबसे महत्वपूर्ण है कि आप जीवित हैं। क्या आप अभी जीवित हैं? आपके ज़िंदगी में अभी सबसे महत्वपूर्ण यही है कि आप जीवित हैं। लेकिन दुर्भाग्य से इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। आप जो सोच रहे हैं वो आपके अपने जीवित होने से ज्यादा अहं हो गया है। मेरी छोटी सी भावना मेरी जीवित होने से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है।

इस ब्रह्मांड में यह सौर मण्डल एक कण की तरह है। कल सुबह पूरा सौरमंडल गायब हो जाए तो कोई ध्यान नहीं देगा। उस कण में पृथ्वी, एक बहुत छोटा कण है। उस सूक्ष्म कण में हमारा शहर एक उससे भी अतिसूक्ष्म कण है। इसमें आप एक बड़े आदमी  हैं? यही एक गंभीर समस्या है। यही आपका एक मनोवैज्ञानिक नाटक है। हमारा मनोवैज्ञानिक नाटक सूरज का रास्ता रोकने वाले बादल की तरह है। हम जीवन का अनुभव नहीं करते, हम सिर्फ उन विचारों, भावनाओं, पूर्वाग्रहों और फालतू चीजों का अनुभव करते हैं  जिन्हें हम पैदा करते हैं। स्रष्टा की सृष्टि में रहने के बजाय हम अपनी बनाई हुई तुच्छ सृष्टि में रहते हैं, यह एक बड़ी बात है। मैंने कोई रचना नहीं की इसलिए मैं इस सृष्टि में हूँ, इस दुनिया में हूँ, जीवित हूँ। मैं जीवन हूँ।

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रविवार, 1 नवंबर 2020

सूतांजली, नवम्बर 2020

 सूतांजली

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वर्ष : ०४ * अंक : ०४                         👂 🔊 (18.55)                                    नवम्बर * २०२०

       


तमसो मा ज्योतिर्गमय

दीपोत्सव के वंदन

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माँ से प्रार्थना

(00.00 - 03.03)

माँ, मुझे मेरे क्रोध से, अकृतज्ञता और मूर्खता भरे दर्प से मुक्त कर। मुझे शान्त, विनम्र और कुलीन बना। वर दे कि मैं अपने कर्म और अपनी सभी गतिविधियों में तेरे ही दिव्य नियंत्रण का अनुभव करूँ।

 मैं प्रार्थना करता हूँ कि मैं सभी हठधर्मिता और स्वाग्रही-भाव से मुक्त हो जाऊँ ताकि मैं तुम्हारा  विनीत तथा आज्ञाकारी सेवक बन सकूँ, तुम्हारे कार्य के लिये उपयुक्त यंत्र बन सकूँ और मैं प्रार्थना करता हूँ कि माँ, मैं जो कुछ करूँ तुम्हारे प्रति समर्पित होकर करूँ और सदा तुम्हारा पथ-प्रदर्शन पाता रहूँ।

माँ, वर दे कि आज से मैं एक सुदृड़ निश्चय के साथ अपने अन्दर से सभी भूलों को निकाल बाहर फेंक दूँ और मुझे वर दे कि मैं इस कार्य में ऊर्जा तथा अध्यवसाय के साथ तब तक लगा रहूँ जब तक कि मैं इसमें पूरी तरह सफल न हो जाऊँ। वर दे कि मैं समस्त घमण्ड, झगड़ालू-प्रवृत्ति, आत्म-अहंकार और दर्प से पिण्ड छुड़ा लूँ; वर दे कि मैं तुम्हारा विरोध कभी न करूँ, हमेशा तुम्हारी आज्ञा का पालन करूँ; वर दे कि मैं न कभी दूसरों से ईर्ष्या करूँ, न विद्वेष, अपशब्द, अभद्र व्यवहार, मिथ्यात्व, आत्म-ख्याति, माँग, असंतोष और शिकायत के चंगुल से निकल जाऊँ। वर दे कि मैं सबके साथ मैत्री का व्यवहार करूँ, किसी के भी प्रति कभी दुर्भावना न रखूँ।

माँ, वर दे कि मैं तुम्हारा सच्चा बालक बन सकूँ।

(श्री अरविंद सोसाइटी की पत्रिका अग्निशिखा में प्रकाशित प्रार्थना पर आधारित)

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वंश या धर्म?

(03.03 - 5.39)

वंश के नष्ट होने से धर्म का नाश होता है या धर्म के नष्ट होने से वंश समाप्त होता है?

कई बार मन में यह दुविधा उत्पन्न हो जाती है। पहले क्या नष्ट हुआ कौरव वंश या धर्म? धर्म के नष्ट होने से अधर्म आ कर उस स्थान को भर देता है। फिर यह अधर्म ही उस कुल को नष्ट कर देता है। जैसे वायुमंडल में ऐसी कोई जगह नहीं जहां वायु न हो, वैसे ही धर्म या अधर्म किसी एक का वास रहता है। जिस प्रकार गरम हवा के ऊपर उठ जाने से शीतल हवा उस रिक्त स्थान को भर देती है उसी प्रकार अधर्म के नष्ट होने पर धर्म और धर्म के हट जाने से अधर्म आ उपस्थित होता है। कितने ही काले-अँधियारे बादल हों रात नहीं होती। रात होती है सूर्य के अस्त होने से। अत: हमें धर्म कृत्य नित्य करते रहना चाहिए। धर्म का अभाव, अधर्म उत्पन्न कर देता है।

ब्राह्मण का कार्य है धर्म की स्थापना करना और राजा का कार्य है अधर्म का नाश करना।  इस प्रकार दोनों ही धर्म राज्य की स्थापना करते हैं। धर्मात्मा राजा वही है जो अधर्म के नाश के साथ साथ ब्राह्मण को संरक्षण दे, धर्म की स्थापना में भी सहयोग दे। संन्यासी भी कर्म विहीन नहीं होते। उनका कार्य केवल भिक्षाटन पर जाना और अपनी कुटी में आराम करना नहीं है। उनके लिए भी करने योग्य कर्म करने का विधान है। धार्मिक कार्य में प्रवृत्त न रहने से संन्यासी का संन्यास अधूरा ही कहा जाएगा।

अत: धर्म का समर्थन करें, अधर्म का विरोध भी

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कैसे थमाएं परम्परा अगली पीढ़ी को

(5.39-11.55)

हमारी मान्यता, हमारी परम्परा, हमारी संस्कृति, हमारे संस्कार। ये वे तत्व हैं जिसे हमने अपने बुजुर्गों से पाया है और हमारा यह दायित्व बनता है कि हम इन्हें और समृद्ध कर भावी पीढ़ी को थमायें। यह हमारे जीवन का रिले रेस है। जाने-अनजाने हम सब इस दौड़ में शामिल हैं। हमारी जीत इसी बात पर निर्भर करती है कि कितनी सावधानी से हमने इस दौड़ की छड़ी को पकड़ा, निभाया और फिर आगे पकड़ाया। इन तीन प्रक्रियाओं में हमें इन्हे जस-का-तस आगे नहीं बढ़ाना है। जब ये हमारे हाथ में होती है तब हमें इसे और परिष्कृत करना है, सजाना है, सँवारना है। जिसने अपना अर्थ खो दिया है उसे छोड़कर नये मूल्यों और अर्थों को जोड़ना है। इसलिए यह जरूरी है कि लेते समय और देते समय इसका अर्थ भी समझें और समझाएँ। अगर समझने - समझाने का कार्य साथ साथ न चला तो यह निश्चित है कि ये खुद अपनी मौत मर जाएंगे। इसका अस्तित्व बनाये  रखने के लिए जितना छोड़ रहे हैं उतना ही जोड़ना भी होता रहे। इस जोड़-घटाव में हमें सावधान रहना होगा। हम अपने सांस्कृतिक मूल्यों तथा मान्यताओं को अंधविश्वास मान कर छोड़ रहे हैं और पश्चिम को बिना समझे सुविधा के नाम पर अपना रहे हैं। हमें अपनी धरती से जुड़े प्रगतिशील जीवन-मूल्यों को, स्वाभिमान को साथ लिए नये कीर्तिमान गढ़ने हैं? हिमालय सा उत्तरदायित्व है हम पर और इस युवा पीढ़ी पर।

श्री सुदर्शन बिड़ला ने कहा कि हम अगली पीढ़ी को क्या दे कर जाएंगे? कितना भी धन दें, उसका कोई भरोसा नहीं, वह रहेगा या नहीं। हम सबसे महत्वपूर्ण वस्तु जिसे अपने बच्चों को दे कर जा सकते हैं वह है संस्कार। जीवन पर्यंत ये उसके साथ रहेंगे। बाकी सब नष्ट हो सकते हैं, खो सकते हैं। खो कर वापस पा सकते हैं। लेकिन मिले हुए संस्कार जीवन पर्यंत हमारे साथ रहते हैं। इसे हम खो नहीं सकते और अगर छोड़ दिया तो फिर पाना आसान नहीं। जीवन के संगीत की इस छड़ी को बहुत संभाल कर लेना, चलना और आगे बढ़ाना है। हम इस रेस में हैं या इससे बाहर हो गए यह इसी बात पर निर्भर करता है कि हमने अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह कितनी ज़िम्मेदारी से किया है। सही ढंग से निर्वाह न कर पाने के कारण विश्व की अनेक महान सभ्यताओं का नामों निशान मिट गया, लेकिन  कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। जब तक इस कुछ बात को समझते और समझाते रहेंगे हम बने रहेंगे नहीं तो हम भी इतिहास के पन्नों तक सीमित रह जाएंगे। 

ऑस्ट्रेलिया, सिडनी एवं अन्य कई शहरों से एक पत्रिका निकलती है – इंडियन लिंक, अँग्रेजी में। बिना किसी मूल्य के प्राय: हर भारतीय स्टोर में मिल जाती है, ऑस्ट्रेलिया में। इसकी संपादिका हैं श्रीमती रजनी आनंद लूथरा। वे लिखती हैं कि उनकी सास नियम से, हर दिवाली पर पूजा की थाली से एक रुपये का एक सिक्का 

निकाल कर अलग से, इसी प्रकार दिवाली पर निकाले गए सिक्कों के साथ रख देती थीं। पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा ने अजीबो गरीब सिक्कों का एक खजाना तैयार कर दिया जिसमें अनमोल और अनेक तरह के सिक्के थे। हर वर्ष एक सिक्का जुड़ता रहा। कालांतर में रजनी के साथ रहने वे भारत से ऑस्ट्रेलिया आ गईं। उन्होंने अपना वह खजाना हम दो बहुओं में बाँट दिया। उन्होने कुछ कहा नहीं लेकिन हम दोनों हर वर्ष दिवाली पर एक डॉलर उसमें जमा करने लगे। दिवाली हमारा एक पारम्परिक त्यौहार है। देश-काल के अनुसार इसमें अनेक रंग भरते जा रहे हैं। दीयों के बदले अब छोटे बच्चे अनेक रंग और आकार की मोमबत्ती प्रयोग करना चाहते हैं। कई वही मिट्टी के दिये ही प्रयोग करते हैं, तो कोई दान-उपकार-पुण्य कार्यों से जुड़ी संस्थाओं द्वारा बनाये गए विशेष दीपक प्रयोग करना पसंद करते हैं। लोग दिवाली की मिठाई के बदले मेवे और पौधे बांटने लगे हैं। गांधीजी ने दिवाली पर पटाखे पर समय और पैसे के साथ वातावरण को दूषित करने के बजाय उस धन और समय का उपयोग बच्चों के लिए खेल या चित्रकारी प्रतियोगिता आयोजित करने या फिर
श्रीमती रजनी लूथरा 


पारिवारिक पिकनिक जिसमें घर के बने भोजन और मिठाइयों का सेवन हो
, का सुझाव दिया। रजनी लूथरा लिखती हैं दिवाली जितना पारम्परिक है उतना ही क्रमानुसार उन्नति का प्रतीक भी है। परम्परा का निर्वाह आवश्यक है लेकिन साथ ही मूल्यों, ज्ञान और बुद्धिमत्ता को सँभाल कर रखना भी जरूरी है। समय, स्थान और वातावरण के अनुसार उनमें नये और सार्थक बदलाव और जुड़ाव भी आवश्यक है। परम्परा के नाम पर हम अपने बच्चों को एक नई और स्वस्थ्य संस्कार की छड़ी पकड़ा सकते हैं जिससे नये  संगीत का संचालन हो सके, रिले रेस में आगे रहने का अंदाज़  मिले।

अपनी हस्ती को बचाए रखने के लिए हमें परम्परा को निरन्तर क्रमिक विकासोन्मुख बनाये रखना है। कौन जनता है कई पीढ़ियों बाद दिवाली पर सँजोये गए सिक्कों में अनेक देश-काल के विविध प्रकार के सिक्के जमा हों।

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निष्काम कर्म और कर्म-संन्यास

(11.55-17.09)

(रामायण और महाभारत पर अनेक कहानियाँ और उपन्यास लिखे गए हैं और अभी भी लिखे जा रहे हैं।  फिल्म और टीवी सिरियल भी बने हैं और अभी भी बन रहे हैं। नाटकों का भी मंचन होता रहा है। गीता पर भी अनेक व्याख्याएँ हैं, टीकाएँ हैं, प्रवचन हैं। कृष्ण और भागवत की तो अनगिनत कहानियाँ और उपन्यास हैं। लेकिन गीता पर; मेरी जानकारी में, नरेंद्र कोहली की शरणम गीता पर रचा गया पहला उपन्यास है। प्रस्तुत है इसी उपन्यास से लिया गया है यह उद्धरण।)

          “अर्जुन, तुम्हें स्मरण है कि जब तुम लोग इंद्रप्रस्थ में थे तो एक रात तुम्हारे पास एक ब्राह्मण आया था। उसकी गाय कोई चुरा कर ले गया था। वह ब्राह्मण चोर को पकड़ने और गाय को लौटा लाने में तुम्हारी सहायता चाहता था। और तुम उसकी सहायता के लिए गए थे”। श्रीकृष्ण ने पूछा।

          हाँ, स्मरण है मुझे, मैं अपना गाँडीव लेने के लिए शस्त्रागार में गया था और संयोग से धर्मराज और पांचाली भी वहाँ उपस्थित थे”। अर्जुन ने उत्तर दिया, “परिणामत: चोर को पकड़ने और ब्राह्मण की गाय लौटा लाने के पश्चात, मैं अपने ही बनाए हुए नियमों के अनुसार बारह वर्षों के वनवास के लिए चला गया था”।

          “चोर को पकड़ने से तुम्हें क्या लाभ हुआ”?

          “वह काम मैंने अपने लाभ के लिए नहीं, शासन के दायित्व के रूप में किया था”।

          “यदि तुम चाहते तो क्या ब्राह्मण तुम्हें कोई पारिश्रमिक नहीं देता”?

          “किन्तु वह काम तो मैंने अपने कर्त्तव्य के रूप में किया था। उसमें पारिश्रमिक का प्रश्न ही कहाँ था। और ब्राह्मण के पास था ही क्या कि वह एक राजकुमार को पारिश्रमिक देता”।

          “अर्थात तुम जानते थे कि उस सारे परिश्रम के बदले में तुम्हें कुछ नहीं मिलने वाला”?

          मैंने कहा न, वह मेरा कर्तव्य था, मेरा शासकीय दायित्व था, मेरा धर्म था। वह कुछ अर्जित करने के लिए नहीं था”।

          “यदि तुम चाहते तो वह चोर भी गाय चुरा ले जाने की सुविधा पाने के लिए तुम्हें उत्कोच दे सकता था”, श्रीकृष्ण बोले।

          “मैंने आपसे कहा न कि मैंने अपने धर्म का निर्वाह किया था”।

          इसी को निष्काम कर्म कहते हैं और यही कर्म-योग है। .........।” कृष्ण बोले, “उस घटना के पश्चात उस ब्राह्मण से न सही, किन्तु धर्मराज से कोई पुरस्कार मांग सकते थे; किन्तु तुम तो पांचों भाइयों में हुए एक संधि के निर्वाह के लिए वनवास के लिए चले गए”।

          “....... किन्तु कर्म-संन्यास मेरे मन में, अब भी बहुत स्पष्ट नहीं है। इस विषय में अनेक विद्वान अनेक प्रकार के मत प्रस्तुत करते हैं”, अर्जुन ने कहा।

          “हाँ, विद्वानों का तो काम ही है, विभिन्न प्रकार के मत प्रस्तुत करना। कृष्ण बोले, “वह उनके अपने स्वभाव, अपने अनुभव और अपने गुरुओं की विभन्नता के कारण है”।

          “कई विद्वान कामनाओं से पूर्ण कर्मों के त्याग को संन्यास मानते हैं”। अर्जुन ने कहा, “क्या, इसका अर्थ है कि जिस कर्म के साथ कामना जुड़ी हो, उस कामना को त्यागने के स्थान पर कर्म को ही त्याग दिया जाए”?

          “अनेक मनीषी कहते हैं कि कर्म को उसके दोष के कारण नहीं, कर्म मात्र को दोष मान कर उसका त्याग कर देना चाहिए

          “किंतु यह तो संभव ही नहीं है”। अर्जुन ने आतुरता से कहा, “आप तो यह नहीं मानते न”?

          “बात तो विद्वानों की है। पहले उसकी चर्चा कर लें”। श्री कृष्ण बोले, “क्योंकि कुछ विद्वान तो यह भी कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप रूपी कर्त्तव्य-कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए”। श्री कृष्ण बोले, “क्या विचार है तुम्हारा”?

          “मैं आपका विचार पूछ रहा हूँ”।

          “तो पहले हम त्याग को जान लें। श्री कृष्ण बोले,यज्ञ, दान और तप मनीषियों को पवित्र करने वाले हैं। उनके त्याग से सृष्टि का कोई लाभ नहीं होगा। आसक्ति और फलाकांक्षा कर्म को दूषित करते हैं। उनका त्याग कर्म को पवित्र करता है। इसलिए नियत कर्म का त्याग उचित नहीं है। यह मोहपूर्ण त्याग है, अत: वह तमस त्याग है”

          “कर्म दुखरूप है। परिश्रम के भय से मैं कर्म का त्याग कर दूँ तो”?

        “वह राजस त्याग है”। श्री कृष्ण बोले, “कर्तव्य मान कर कर्म को करना और उसके फल का त्याग, सात्विक त्याग है

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त्यौहारों पर अभिनंदन

(17.09-17.51)

जाते जाते दिवाली के वार्षिक पर्व पर अभिनंदन / बधाई संदेश के लिए फिर से एक सुझाव। दूसरों के बनाये गए संदेशों को अंगुली के झटके से मत भेजिये। अपना पारिवारिक संदेश खुद बनाएँ या बनवाएँ और उसे ही औरों के पास भेजें। नये युग में, नयी तकनीक अपनाएं लेकिन समझदारी से; संस्कार और संस्कृति से ओत-प्रोत। अपनी पहचान बनाएँ। अनुकरण मत करिये, अनुकरणीय बनिये।

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ज़ूम पर सूतांजली के आँगन में

(17.51-18.55)

अक्तूबर    

अक्तूबर माह में एक  प्रसारण हुआ। रविवार 11 अक्तूबर को श्री आशीष करनानी ने गुड वेजिटेरियन फूड ऑफ कोलकाता के बारे में बताया। वक्तृता में आशीष ने कोलकाता में उपलब्ध लजीज़ स्ट्रीट फूड्स की जानकारी दी। साथ ही दुर्लभ शाकाहारी भोजन के सम्बंध में भी बताया। इस कार्यक्रम को यू ट्यूब के निम्नलिखित लिंक पर देखा जा सकता है  ->  

https://youtu.be/HsB2o5TKNaw

 नवम्बर

नवंबर माह  के प्रसारण की जानकारी यथा समय व्हाट्सएप्प एवं मेल पर दी जायेगी।

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अपने सुझाव (suggestions) दें, आपको सूतांजली कैसी लगी और क्यों, नीचे दिये गये एक टिप्पणी भेजें पर क्लिक करके। आप अँग्रेजी में भी लिख सकते हैं।

 

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

सूतांजली, अक्तूबर २०२०

 सूतांजली

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वर्ष : ०४ * अंक : ०३                                   🔊                                                       अक्तूबर * २०२०

बुराई खोजने का शौक है

तो आईने का इस्तेमाल कीजिये

दूरबीन का नहीं

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चार्ली चैपलिन की फिल्म “द ग्रेट डिक्टेटर(००.०० -०.९००)

(अँग्रेजी फिल्म जगत के जाने माने विदूषक और निर्माता चार्ली चैपलिन महात्मा गांधी को बड़े आदर की दृष्टि से देखते थे। लेकिन जब उन्हें पता चला कि गांधी मशीनों के खिलाफ हैं तब वे बड़े व्यथित हुए। उन्हे यह बात न तो गंवारा हुई और न ही समझ आई। जब गांधी लंदन पहुंचे तब चैपलिन उनसे मिलने उनके पास लंदन की झोंपड़-पट्टी के इलाके में गए जहां गाँधी ठहरे हुए थे। उनकी यह प्रसिद्ध मुलाक़ात 22 सितंबर 1931 को हुई। चैपलिन ने गाँधी से बड़े  झिझकते हुए पूछा  कि वे मशीनों के खिलाफ क्यों हैं? गाँधी ने स्पष्ट शब्दों में उन्हे बताया कि वे मशीनों के खिलाफ नहीं हैं। और फिर उन्होंने चार्ली को विस्तार से स्वतन्त्रता का अर्थ समझाया । उन्होंने चार्ली को बताया कि जब-जहाँ  मशीन आदमी की स्वतन्त्रता छीनती है तब वहाँ मैं मशीन के प्रयोग का विरोध करता हूँ। चार्ली चैपलिन गाँधी की बातों से पूर्ण रूप से संतुष्ट और आश्वस्त होकर वहाँ से निकले। उन पर गाँधी की बातों का अमिट प्रभाव पड़ा और तब निर्माण हुआ उनकी बहुचर्चित फिल्म द ग्रेट डिक्टेटर” का। इस फिल्म में गाँधी का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।)

द ग्रेट डिक्टेटर का पोस्टर 

कुछ समय पहले चार्ली चैपलिन की फिल्म “द ग्रेट डिक्टेटर” का एक दृश्य व्हाट्सएप्प पर बहुत साझा किया गया। आपको भी यह विडियो जरूर मिला होगा। इस विडियो में चार्ली एक सेना नायक के वेश में अपार जन समुदाय को संबोधित कर रहे हैं। शायद आपने इसे देखा होगा। उसे इस परिदृश्य में फिर से एक बार देखिये  और समझिये। इस दृश्य के विडियो का लिंक दे रहा हूँ। प्रस्तुत है इस भाषण का हिन्दी अनुवाद, आपके लिये:

फिल्म का एक दृश्य
 “मुझे खेद है लेकिन मैं सम्राट बनना नहीं चाहता, मुझे यह कार्य नहीं आता। मैं न किसी को जीतना चाहता हूँ और न ही किसी पर हुकूमत चलाना चाहता हूँ। अगर संभव है तो मैं सबों की सहायता करना चाहूँगा – ज्यू, नास्तिक, काला या गोरा कोई भी। हम सब एक दूसरे की सहायता करना चाहते हैं। मानव का यही स्वभाव है। हम सब एक दूसरे के आनंद के साथ जीना चाहते हैं, उनके दु:ख के साथ नहीं। हम एक दूसरे को घृणा करना नहीं चाहते। इस संसार में हर किसी के लिए जगह है, और हमारी यह पवित्र भूमि बहुत समृद्ध है और हर किसी की आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है। जीने की कला स्वतन्त्र और खूबसूरत हो सकती है, लेकिन हम रास्ता भूल गए हैं। लालच ने हमारी आत्मा में जहर घोल दिया है, दुनिया ने घृणा की दीवारें खड़ी कर दी हैं, भेड़-चाल ने हमें दु:ख और रक्तपात में ढकेल दिया है। हमारी चाल तेज हो गई है लेकिन हमने अपने आप को कमरों में बंद कर लिया है। मशीनों ने हमें बहुतायत में सामग्री उपलब्ध कराई है लेकिन हमारी जरूरतें अधूरी रह गई हैं। हमारे ज्ञान ने हमें निंदक बना दिया है, हमारी चतुराई ने हमें कठोर और निर्दयी बना दिया है। हम सोचने बहुत लगे हैं लेकिन संवेदनहीन हो गये हैं। हमें मशीन से ज्यादा मानवता की आवश्यकता है। चतुराई के स्थान पर हमें दया और सौम्यता की अधिक आवश्यकता है। इन गुणों के अभाव में हम जीवन को हिंसक बना देंगे और उसे खो देंगे। हवाई यात्रा, रेडियो ने हमें एक दूसरे के नजदीक लाया है। इन आविष्कारों ने हमारी मानवतावादी दृष्टिकोण को ही उजागर किया है। हम, सार्वभौमिक भाईचारे और हमारी एकता की सोच को प्रतिपादित करते हैं। अभी मेरी आवाज पूरे संसार के करोड़ों लोगों तक पहुँच रही है। करोड़ों निराश पुरुष, महिला और बच्चे, जो एक व्यवस्था के शिकार हैं जिसने उनको यातनायें दीं और निरीह व्यक्तियों को जेलों में ठूँसा है। वे सब जो मेरी आवाज सुन रहे हैं, मैं उनसे विनती करता हूँ कि आप निराश न हों। हमारे ऊपर दु:खों का पहाड़ टूट पड़ा है, लेकिन हमारे लालच, मानव के विकास की कड़ुवाहट, मानव की घृणा सब समाप्त हो जायेंगी और तानाशाही समाप्त होगी। तानाशाहों को जनता से मिली ताकत, वापस जनता के हाथों में चली जायेगी। जब तक मरने के लिए तैयार हैं स्वतन्त्रता का नाश नहीं हो सकता। सैनिकों, पाशविक लोगों के सामने समर्पण मत करो। वे जो तुमसे घृणा करते हैं, सैनिकों की जिंदगी में तुम्हें गुलाम बनाते हैं, तुम्हें बताते हैं कि तुम्हें क्या सोचना है, तुम्हें क्या खाना है और कैसा अनुभव करना है,  तुम्हारे दिमाग में छेद करते हैं, तुम्हें पशु समझते हैं और तुम्हें तोपों का चारा समझते हैं उन जैसे अप्राकृतिक लोगों के सामने तुम समर्पण मत करो। ये यांत्रिक लोगों के पास दिल और दिमाग भी यांत्रिक ही है। तुमलोग न तो यंत्र हो न ही पशु। तुमलोग इंसान हो। तुमलोगों के पास मानव को प्यार करने वाला मानवीय दिल है। तुमलोग घृणा नहीं करते हो। केवल वे जो अप्राकृतिक हैं, जिनके पास प्यार का सागर नहीं है केवल वही घृणा करते हैं। सैनिकों युद्ध गुलामी के लिए नहीं स्वतन्त्रता के लिए करो। 17वें अध्याय में संत ल्यूक ने कहा है, “ईश्वर का राज्य मानव के अंदर है।” किसी एक व्यक्ति में नहीं, व्यक्तियों के किसी एक दल में नहीं बल्कि हर व्यक्ति में है – तुम्हारे अंदर है। इंसान में क्षमता है, क्षमता है यंत्र बनाने की, क्षमता है आनंद उत्पन्न करने की। तुम्हारे पास ताकत है जीवन को मुक्त और सुंदर करने की, इस जीवन को एक सुंदर और खूबसूरत साहसिक यात्रा में बदलने   की।  तब गणतन्त्र के नाम पर हम उस ताकत का प्रयोग करें। हम सब एक हो जाएँ, हम सब एक नया  संसार बनायें, एक सभ्य संसार जिसमें सब के पास काम हो। एक ऐसा संसार जिसमें युवाओं का भविष्य हो और बुजुर्गों की सुरक्षा हो। इस प्रकार के आश्वासन दे कर निर्दयी लोगों ने ताकत और सत्ता  हासिल की। लेकिन उन लोगों ने झूठ बोला। उन लोगों ने अपना वादा पूरा नहीं किया, और कभी करेंगे भी नहीं। तानाशाहों ने अपने आप को स्वतंत्र किया लेकिन जनता को गुलाम बना लिया। अब हम सब एक हो जायें, उस वादे को पूरा करने के लिये। हम लोग एक जुट होकर संघर्ष करें संसार को आजाद करने के लिए, संसार को उसकी सीमा से मुक्त करें, लालच, घृणा और असहिष्णुता से मुक्त करें। हम एक उद्देश्य के लिए संघर्ष करें। एक संसार के लिए जहां विज्ञान और विकास मानवमात्र की खुशी के लिए हो। सैनिकों, गणतन्त्र के नाम पर हम सब एक जुट हो जायें।        

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धर्म क्यों? (०९.०० - १७.०३)

हर जीव, छोटा हो या बड़ा, मानव हो या पशु, कीट पतंगे या पेड़-पौधे-वनस्पति इन सबों में कुछ समान लक्षण होते हैं। इनमें से दो विशेष लक्षणों पर हम गौर करेंगे। ये हैं सुरक्षित रहना (to preserve) और वृद्धि करना (to propagate)। ये दोनों लक्षण हम हर जीव में देखते हैं। हर जीव अपने आप को बचाना चाहता है, खुश रहना चाहता है। और जब संरक्षित हो जाता है तब अपने आप को फैलाना चाहता है। हर जीव खुद तो नहीं रह सकता लेकिन अपने जैसा बनाये रखना चाहता है। हर जीव मुश्किलों को झेल कर, खुश रहना चाहता है और अपनी प्रजाति को बचाये रखना चाहता है। सामान्य रूप से यह छोटे से छोटे जीव से लेकर बड़े से बड़े जीव में देखने को मिलता है। केवल जीव ही नहीं बल्कि हर संस्था, छोटे से समुदाय या क्लब से लेकर बड़े से बड़े देश तक में यह लक्षण देखने को मिलता है।

हमारे शास्त्रों ने इन दोनों गुणों को अर्थ और काम कहा है। ये दोनों गुण ही हर जीव का लक्ष्य है – प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से। चाहे या अनचाहे हम सब इसी ओर बढ़ रहे हैं। हमें लगता है कि हमारे अनेक लक्ष्य हैं और अलग अलग हैं लेकिन इन सबों पर गौर किया जाये, उनकी विवेचना की जाये  तो ये सब सिमट कर इन्हीं दो पर आजायेंगे – अर्थ और काम। अर्थ का अर्थ, शक्ति है जिससे हमें सुरक्षा प्राप्त होती है। धन का भी यही कार्य है। धन, अर्थ का एक ही हिस्सा है। इसका अर्थ केवल धन नहीं है। काम का अर्थ काम-वासना नहीं है। यह इसका संकुचित अर्थ है। काम से तात्पर्य इच्छाओं से है, कामनाओं से है। ये कामनाएँ सूक्ष्म भी हो सकती हैं, विराट भी। इन कामनाओं में एक कामना अपनी कामनापूर्ति भी है। यह बताना नहीं पड़ता, यह स्वत: पैदा होती है। इसकी तालिका अनंत है, लगातार बढ़ती रहती हैं, बदलती रहती हैं। पशुओं में भी अर्थ की कामना होती  है। उनके अर्थ में धन नहीं होता है लेकिन शक्ति की कामना होती है। मनुष्य और पशु में यही समानता होती है। अर्थ और काम, ये दो पुरुषार्थ, मनुष्य और पशु दोनों में होती हैं।

मनुष्य और पशु में एक अंतर है इच्छाशक्ति की। स्वतंत्र इच्छाशक्ति मनुष्य में बहुत स्पष्ट है और उभर कर दिखती है, जबकि पशुओं में इसकी कमी है।  पशुओं में यह इच्छाशक्ति स्वाभाविक होती है। मानव अपने बारे में बहुत संवेदनशील होता है जबकि पशुओं में यह नहीं या नहीं के बराबर होता है। ये दो गुण मनुष्य की उन्नति के भी साधन हैं और उसकी अवनति के भी। मनुष्य में स्वाभाविक प्रवृत्ति के अलावा कुछ अलग, कुछ नया बनाने की प्रवृत्ति होती है। मानव में सौंदर्य की समझ होती है। मानव की इस प्रवृत्ति के कारण ही इतनी सभ्यता, कला, संगीत, साहित्य, संस्कृति का विकास हुआ है। विश्व की 70% अर्थ व्यवस्था इसी पर आधारित है। आवश्यकता पर आधारित अर्थ व्यवस्था तो सिर्फ 30% ही है। दुनिया इसी के चारों तरफ घूम रही है। इसे ही विकास भी कहते हैं। यही नई सोच, नई तकनीक, नये  निर्माण करता है।

यह तो हुआ इसका सकारात्मक पक्ष। अब थोड़ा इसका नकारात्मक पक्ष भी देखें । यही जलन उत्पन्न करता है। यही दुख पैदा करता है। ज्यादातर दुख ठीक भोजन – पानी मिलने के बाद शुरू होता है। खाली पेट का दुख अलग तरह का है और उसका समाधान भी बहुत आसान है। लेकिन भरे पेट का दुख अलग किस्म का है और उसे मिटाना बहुत कठिन है।  मैं अमीर हूँ, मैं अपनी गाड़ी से खुश हूँ, मेरे बेटे की शादी से मैं सुखी हूँ। लेकिन रातों रात किसी और की अमीरी के किस्से सुन कर, पड़ोसी की गाड़ी देख कर, दोस्त के बेटे की शादी में शरीक होकर मैं दुखी हो जाता हूँ। किसी जलसे में खुशी-खुशी जाता हूँ, वहाँ कोई शब्द मेरे कानों में पड़ जाते हैं और मैं दुखी हो जाता हूँ। यह मेरे स्वतन्त्र इच्छाशक्ति और मैं कैसा दिखता हूँ का नकारात्मक पक्ष है। सारे जलन का कारण यही है। हमारे सारे दुख इसी कारण होते हैं।

हमारा अर्थ और काम पुरुषार्थ, हमारी इच्छाशक्ति और मैं कैसा दिखता हूँ को मिला कर एक भयंकर मिश्रण पैदा कर देता है। यह हमें जीवन भर उलझाये रखता है। अगर हम इस पर ध्यान न दें तो बचपन से बुढ़ापा तक इसी उलझन में निकल जाये। हमें अपना रुतबा हर समय, निरंतर नवीनीकरण कराते रहना पड़ता है। सारा खेल इसी का है। ये हमारे उपजाये दुख हैं। इसका निवारण भी आसान नहीं है। तब अर्थ और काम में एक और चीज लाई जाती है, वह है धर्म। धर्म हमारी सुरक्षा की भावना या असुरक्षा के डर को नियमित करता है, दिशा देता है। अगर यह नहीं हो तो यह तबाही मचा देगा। हर भोग की सीमाएं निर्धारित करना होता है। यह धर्म बताता है। धर्म याद दिलाता रहता है कि भोग की सीमाएं है, एक दिन यही दर्द का कारण बन जाएंगे। इस प्रकार धर्म एक पुरुषार्थ बन जाता है। अगर यह न हो तो फिर चार्वाक बन जाता है जब तक जियो मजे से जियो, ऋण लेकर घी पियो।  बैंक से लोन लो और मजे करो। मरने के बाद तो वह रोये जिसने ऋण दिया। लेकिन अगर सब ऋण लें और न चुकाएं तो फिर एक ऐसी परिस्थिति आ जायेगी कि कोई भी ऋण देने वाला नहीं बचेगा। फिर क्या होगा? अत: धर्म तो लाना ही पड़ेगा, नहीं तो अंत आ ही जाएगा। धर्म का कार्य है अपरिमित, निरंकुश अर्थ और काम में एक रुकावट लाना जिससे प्रणाली चल सके, बंद न हो जाए। अगर हम उसे नजर अंदाज करें तो बच नहीं सकते, अन्त निश्चित है।  चूंकि धर्म का कार्य, अर्थ और काम को नियंत्रित करना है, इस कारण धर्म बहुतों की आँखों का कंकड़ बन जाता है। 

(आचार्य श्रद्धेय श्री नवनीतजी द्वारा श्री औरोबिंदो आश्रम, मधुवान, रामगड़ में ४ जून २०१९ को दिये गए व्याख्यान से संकलित)

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ज़ूम पर सूतांजली के आँगन में

सितम्बर   

सितम्बर माह में इसके दो  प्रसारण हुए। रविवार 13 सितम्बर को देश के “सुपरिचित चेहरों के अनसुने संस्मरण” के अंतर्गत सुश्री रामकृष्ण परमहंस, मुकेश, धर्मवीर भारती, दिलीप कुमार, भवानी प्रसाद मिश्र, जोश मलीहाबादी, पंडित रवि शंकर, हरिवंश राय बच्चन एवं लता मंगेशकर के संस्मरण सुनाये गये। इस कार्यक्रम का यू ट्यूब लिंक ->  

https://youtu.be/Tw6zaG5slAE

27 सितम्बर को गाँधी की अहिंसा विषय पर प्रोफेसर प्रेम आनंद मिश्र, विभागाध्यक्ष , अहिंसा शोध भवन, गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद ने सूचिन्तित वक्तृता प्रदान की। श्री प्रियंकर पालीवाल, कवि, समीक्षक, संपादक ने विषय प्रवर्तन किया। श्री राजेन्द्र केड़िया ने धन्यवाद ज्ञापन किया। श्रोताओं की अनेक जिज्ञासाओं एवं  शंकाओं का वक्ता ने समुचित निवारण किया। इस वक्तृता का यू ट्यूब लिंक ->   https://youtu.be/t0x9DuMM9PA

अक्तूबर

अक्तूबर माह में इसके दो  प्रसारण करने की इच्छा है, रविवार 11 एवं 25 अक्तूबर को। त्यौहारों का मौसम होने के कारण व्यवधान भी हो सकता है। यथा समय इसकी सूचना व्हाट्सएप्प एवं मेल पर दी जायेगी। अगर आपको सूचना नहीं मिल रही है तो कृपया अपना नाम एवं फोन नम्बर या ई-मेल हमें भेजें, sootanjali@gmail.com पर। आपकी उपस्थिती और सहयोग के लिए हम आपके आभारी हैं।

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सूतांजली, अगस्त द्वितीय 2026, आकर्षक घर की कुंजी

  २कोई ऐसा अक्षर नहीं है, जिसका प्रयोग मंत्र-रचना में न हो सके , कोई ऐसा वृक्ष नहीं है, जो किसी न किसी व्याधि की औषधि न हो , कोई ऐसा...