मंगलवार, 1 जून 2021

सूतांजली जून २०२१

सूतांजली

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वर्ष : ०४ * अंक : ११                   🔊(२३.५८)                                    जून   * २०२१

जो इंसान खुद के लिए जीता है,  उसका एक दिन मरण होगा

परंतु

जो इंसान दूसरों के लिए जीता है, उसका सदैव स्मरण होगा।

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जीवन कैसे जिया जाये                                                        मैंने पढ़ा🔉(३.०४)

यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात एक बार भ्रमण करते हुए एक शहर में पहुँचे। वहाँ उनकी एक वृद्ध व्यक्ति से भेंट हुई। दोनों काफी घुल मिल गये। सुकरात ने उन वृद्ध महानुभाव के व्यक्तिगत जीवन में काफी रुचि ली। काफी खुलकर बातें कीं। सुकरात ने संतोष व्यक्त करते हुए कहा, आपका  विगत जीवन तो बड़े  शानदार ढंग से बीता है, पर इस वृद्धावस्था में आपको कौन-कौनसे पापड़ बेलने पड़ रहे हैं, यह तो बताइये?’

 

सुकरात 
वृद्ध किंचित मुसकुराया, मैं अपना पारिवारिक उत्तरदायित्व अपने समर्थ पुत्रों को देकर निश्चिंत हूँ। वे जो कहते हैं, कर देता हूँ, जो खिलाते हैं, खा लेता हूँ और अपने पौत्र-पौत्रियों के साथ खेलता रहता हूँ। बच्चे कभी भूल करते हैं, तब भी चुप रहता हूँ। मैं उनके किसी कार्य में बाधक नहीं बनता। पर जब कभी वे परामर्श लेने आते हैं तो मैं अपने जीवन के सारे अनुभवों को उनके सामने रखकर की हुई भूल से उत्पन्न दुष्परिणामों की ओर से सचेत कर देता हूँ। वे मेरी सलाह पर कितना चलते हैं, यह देखना और अपना मस्तिष्क खराब करना मेरा काम नहीं है। वे मेरे निर्देशों पर चलें ही, यह मेरा आग्रह नहीं। परामर्श देने के बाद भी अगर वे भूल करते हैं तो मैं  चिंतित नहीं होता। उसपर भी वे पुन: मेरे पास आते हैं तो मेरा दरवाजा सदैव उनके लिए खुला रहता है। मैं पुन: उचित सलाह देकर उन्हें विदा करता हूँ।

 

वृद्ध की बात सुनकर सुकरात बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि आपने इस आयु में जीवन कैसे जिया जाय, यह बखूबी समझ लिया है।

(गीतप्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण से)

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कैसे लें बुढ़ापे में आनंद?                                                    मेरे विचार 🔉(१२.५८)

९९ वर्षीय एक वृद्ध का साक्षात्कार (इंटरव्यू) लेने के बाद टेबल पर पड़े अपने सामानों को बटोरते हुए पत्रकार ने उनकी सेहत की शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि उसे इस बात का विश्वास है कि एक वर्ष बाद उनकी १००वीं वर्षगांठ पर भी वह उनका साक्षात्कार लेने आयेगा। वृद्ध सज्जन ने तपाक से जवाब दिया, हाँ, जरूर! क्यों नहीं। मुझे तो आप पूर्ण स्वस्थ लग रहे हैं। यह था आत्म विश्वास उस वृद्ध सज्जन का अपने स्वास्थ के प्रति।

 

पुरस्कार ग्रहण करती मान कौर 
सरदारनी मान कौर, पटियाला पंजाब की रहने वाली हैं। उन्हें चंडीगड़ का चमत्कार के नाम से भी जाना जाता है। ८ मार्च २०२०को महिला दिवस पर भारत के राष्ट्रपति ने उन्हें नारी शक्ति सम्मान से नवाजा। वे एक ऐथेलीट हैं। इसमें खास बात क्या है? उन्होंने अपना ऐथेलीट का जीवन ९३ वर्ष की आयु में प्रारम्भ किया। उन्होंने कई विश्वस्तरीय कीर्तिमान स्थापित किये हैं। उन्हें १०० मीटर दौड़ने में सिर्फ एक मिनट का समय लगता है। वे अलग अलग प्रतियोगिताओं में ३१ अंतर्राष्ट्रीय और १३ राष्ट्रीय गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं।

 

इरने ओ'शेय 

इरने ओशेय (Irene O’Shea) १०२ वर्षीय वह महिला है जिसने १४००० फीट की ऊंचाई से आसमान में छलांग लगाई है। इसके साथ ही वे विश्व की सबसे ज्यादा उम्र की आसमान में छलांग (स्काई डाईविन्ग) लगाने वाली महिला बन गई हैं। यह उनका अपना जन्म दिवस मनाने का अनूठा तरीका है जिसे वे अपनी १००वीं जन्मदिन से मना रही हैं।

 

इनके विडियो अभी पिछले कुछ समय में, कोरोना काल के दौरान, व्हाट्स एप्प पर साझा किये  गये थे। आपने भी देखा होगा। हम तो, शायद, अभी उस उम्र से दूर हैं। तब, आप ही बताएं बुढ़ापा वरदान है या अभिशाप? दरअसल बुढ़ापा वह नियामत है, तोहफा है, जिसे कुदरत ने हमें बिना मांगे दिया है। यह अभिशाप कैसे हो सकता है! यही वह समय है जब हम वह सब कर सकते हैं जिन्हें ता-उम्र नहीं कर पाये। ईश्वर ने दिया तो वरदान ही है, लेकिन हमने खुद अपनी करनी (कार्य) और बरनी (सोच) से इसे अभिशाप में परिणित कर लिया तो इसका जिम्मेदार कौन है?

ईस्टवुड

 

८८ वर्षीय इस्टवुड से उनकी सेहत का राज पूछा गया तो उन्होने कहा, “मैं रोज सुबह जब उठता हूँ तब बुढ़ापे को अपने अंदर घुसने नहीं देता। और फिर उन्होंने एक गाने की धुन तैयार की। उस गीत के बोल हैं  बुढ़ापे को अंदर आने मत दो’(Don’t let the old man in)

 


हम यह कहते रहे हैं कि बच्चा और बूढ़ा एक समान होते हैं। जी हाँ, हम यह कहते रहे हैं लेकिन दर-किनार भी करते रहे हैं। बच्चे को हम  डांट लगाते हैं, उसकी हर इच्छा पूरी नहीं करते हैं, उसकी हर बात को न तो महत्व देते हैं न उन पर ध्यान देते हैं न ही हम उसकी उतनी परवाह करते हैं। लेकिन बच्चा इन में से किसी भी बात की न तो परवाह करता है, न उन्हें याद रखता है और न ही उन्हें दिल पर लेता है। लेकिन क्या हम, वृद्ध, ऐसा करते हैं? बच्चे बन पाते हैं? बेटे-बहू-बेटी से नाराज हो जाते हैं, उसका बुरा मान लेते हैं। 


 

मनोहर अठवाणी ने अच्छे पारिवारिक संबंध बनाये रखने के रहस्य पर बड़े आकर्षक ढंग से हमारा ध्यान खींचा है। वे कहते हैं कि :

एक उम्र के बाद हमें कम बोलना या चुप रहना सीखा लेना चाहिए,

यह मान कर मत चलिये कि हमारी सब इच्छाएं पूरी होंगी,

घमंड से दूर रहें,

बेटे-बेटी-बहू के कार्यों में बेवजह दखलंदाज़ी न करें उन्हें अपनी ज़िंदगी खुद जीने दें,

उनसे यह अपेक्षा  न करें कि वे हर कार्य हमसे पूछ कर ही करेंगे,

अपने जीवन को एक साँचे में ढालें,

खाने-पीने में संयम रखें,

किसी भी बात के लिए ज़िद न करें,

अगर बीमार या कष्ट है तो भी हर समय उसकी चर्चा न करें,

अपने कार्य और इच्छा को सर्वोपरी न मानें,

अपने घर की बातें दूसरों को न बताएं,

छोटे बच्चों की तरह बेटे-बेटी-बहू के कटु वचन का न प्रत्युत्तर दें –

न उसका बुरा मानें और न ही उसे दिल में बैठा कर रखें,

उनसे स्नेह रखें, प्रभू को धन्यवाद दें तथा खुश मिजाज रहें,

न फिजूल की शिकायतें करें न ही अपने किये का गुणगान करें,

अपनी सोच को छोटी न करें,

बच्चों का कुछ बताना ही उनका पूछना समझें,

अगर सोच तंग हुई तो समझ लें कि जंग हुई,

संयम से रहें, लोभ-मोह-लालच से दूर रहें।

ये हैं वे कुछ बरनी जो बुढ़ापे को हमारे अंदर नहीं घुसने देतीं।    

 

लेकिन वह विडियो जिसने मुझे यह लिखने पर मजबूर किया वह था एक बुजुर्ग का विडियो। पाश्चात्य सभ्यता का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि हमें अपने बुढ़ापे की व्यवस्था खुद करनी चाहिए, बच्चों के भरोसे नहीं रहना चाहिए, अगर वे देखभाल करते हैं तो उसे बोनस समझना चाहिए, आवश्यकता पड़ने पर 

भी बच्चों को अपने वृद्धावस्था के लिए बचाया हुआ धन नहीं देना चाहिये। उनका यह कथन मुझे उद्वेलित कर गया। मेरी रात की नींद उड़ गई। हाँ, यह बात सही है कि समय को देखते हुए अपनी व्यवस्था करना उचित है, बच्चों पर बोझ न पड़े इसका ख्याल रखना चाहिये, लेकिन बच्चे हमारी देख-भाल नहीं करेंगे! यह मान कर चलना, अपनी तरफ से जंग का बिगुल बजाना ही है। निवेश करने वाली संस्थाएं तो निरंतर यही सीख देती रहती हैं कि हमारी ज़िम्मेदारी केवल हमारे बच्चों तक है। अपने परिवार के प्रति नहीं, क्योंकि वे माँ-बाप को परिवार का हिस्सा नहीं मानतीं। और इस प्रकार यही कहती हैं कि आप अपनी चिंता कीजिये, माँ-बाप की नहीं। माँ-बाप ने अपनी चिंता खुद की होगी और अगर नहीं की है तो वे खुद भोगें, वे ही इसके जिम्मेदार हैं। इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ कि हमें अपनी व्यवस्था रखने का भरसक प्रयास करना चाहिये। लेकिन उनकी बात के विपरीत मैं उन बुजुर्ग से यही  कहूँगा कि शिक्षा यही दें कि हमें इस विश्वास के साथ बढ़ना चाहिये कि हमारे बच्चे हमारा ख्याल रखेंगे और हम वृद्धावस्था के लिए बचाया हुआ धन उन्हें बोनस के रूप में देकर जाएंगे।  यही नहीं अगर वे देख-भाल रखते हैं तब हमें भी फिजूलखर्ची से बचना चाहिये और उनके लिए जमा किये गये बोनस को अपने ऊपर खर्च न कर या तो उनके ऊपर खर्च करें या उनके लिए बोनस के रूप में ही छोड़ कर जाएँ। यह सोच, हमारे जीवन को बदल देगा, हमारे सम्बन्धों को बदल देगा। हमें यह स्वीकार करना चाहिये कि ताली एक हाथ से नहीं बजती। बच्चे वही सीखेंगे जैसा हम करेंगे। वे वैसा ही सोचेंगे जैसा हम सोचेंगे।

 

मैं यह सोचता रहा कि क्या मैं गलत हूँ? मैं गलत सोच रहा हूँ? श्याम मानव ही ठीक कह रहे हैं? मेरी दुविधा दूर की और यह सब लिखने का साहस जुटाया एक अन्य विडियो ने जिसे बनाया था किसी बहू या बेटी ने। वे कहती हैं कि हम जब बाहर खाने जाते हैं तब सब कुछ देखते हैं लेकिन प्यार नहीं, लेकिन जब घर पर खाते हैं तो और कुछ नहीं देखते सिर्फ प्यार ही देखते हैं, खिलाने वाले का प्यार। वे कहती हैं कि हम अपने घर के हर बुजुर्ग को अपने हाथ से खिलाएँ, यानि रसोई में भले ही कोई सहायता लें लेकिन वहाँ से उनकी थाली तक समान पहुँचने वाला घर का ही कोई सदस्य होना चाहिये। सोच भोजन करने-कराने की रखें, भोजन निपटाने की नहीं। हमारे बच्चे जो देखेंगे वही सीखेंगे।

 

बहुत लोग मानते हैं कि धन है तो सब कुछ है। मैं कुछ वक्त पहले ऑस्ट्रेलिया में था, लंबे समय के लिए। वहाँ अवैतनिक सेवाकार्य करने की इच्छा से कई जगहों पर आवेदन दिया। एक वृद्धाश्रम से बुलावा आया। वहाँ के संचालक से बातचीत हुई। उन्होंने कहा, यहाँ, वृद्धों का सब कार्य करने के लिए लोग हैं, उनके कपड़े बदली करना, स्नान कराना, मंजन कराना, सफाई करना, गाना या गीत सुनाना, पुस्तक पढ़ना आदि कोई भी काम कहें सब होता है लेकिन सब यंत्रवत। उनके साथ बैठ कर उनसे बात करना, उनकी सुनना और अपनी सुनाने वाला कोई नहीं। हाँ पैसे से ऐसे लोग भी मिलते हैं लेकिन महेशजी उनसे ये लोग अपने परिवार की ही बात करना चाहते हैं, दूसरे जहाँ की नहीं। और हम, उनके साथ बाकी पूरी दुनिया की बात कर सकते हैं लेकिन उनके परिवार की नहीं। अगर हम समय दें तो उनकी जिंदगी बदल जाये, वे स्वस्थ हो जायें। वे लोग जो यूरोप-अमेरिका का उदाहरण देते हैं, वे एक बार वहाँ के बुजुर्गों के साथ रहें तब पता चलेगा कि वे ज़िंदगी जी नहीं रहे हैं, जिंदगी काट रहे हैं। कई बार ऐसे यूरोपिएन-अमेरीकन बुजुर्गों के साथ रहने का मौका मिला है, वे अपने परिवार की, बच्चों की ही बात करते हैं। उन्हें भारतीय परिवार देख कर अच्छा लगता है, कइयों की आँखों में तो आँसू तक आ जाते हैं।

 

श्री सुदर्शन बिड़ला ने एक सभा में कहा, हम अपने बच्चों के लिए कितना धन छोड़ कर जाएंगे? १०० करोड़, १००० करोड़, १०००० करोड़? कितना भी छोड़ें एक पीढ़ी के लिए कम पड़ सकता है। एक, और केवल एक ही चीज है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी जाती है, और वह है संस्कार। अपने बच्चों को संस्कारित कीजिये, उन्हें संस्कार दीजिये।  

 

लानत है उस जिंदगी पर जिसमें हमारे पास अपने माँ-बाप, दादा-दादी, नाना-नानी, सास-श्वसुर के लिए समय नहीं। लानत है उस समाज पर जिसमें यह सब हो रहा है और हम उसे चुप-चाप सह रहे हैं। इस मामले में हम कम-से-कम उस सरकार का धन्यवाद तो कर ही सकते हैं कि उसने माँ-बाप की देखभाल करना बच्चों का उत्तरदायित्व ठहराया है और न करने पर सजा की भी व्यवस्था की है। लेकिन यह समाधान नहीं है। कानून पैसे दिलवा सकता है, प्यार नहीं। समाधान तो हमारे और आपके हाथ में ही है, जमा किये गए पैसों में समाधान नहीं, मजबूरी है।    

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कारावास की कहानी-श्री अरविंद की जुबानी                            धारावाहिक(🔉७.५२)

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। अग्निशिखा में इसके रोचक अंश प्रकाशित हुए थे। इसे जनवरी २०२१ से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसकी छठवीं किश्त है।)

(6)

गवर्नमेंट होटल

अलीपुर के गवर्नमेण्ट होटल का जो वर्णन मैंने किया है वह निजी कष्ट-भोग की विज्ञप्ति के लिये नहीं वरन् सुसभ्य ब्रिटिश राज्य में विचाराधीन कैदियों के लिये कितनी अदभुत व्यवस्था थी, निर्दोषों को दीर्धकालव्यापी कितनी यंत्रणा भोगनी पड़ सकती है, यह बतलाने के लिये ही है यह वर्णन। कष्टों के जो कारण दिखलाये हैं, वे तो थे ही किंतु भगवान् की दया दृढ़ थी इसलिये थोड़े दिनों तक ही कष्ट अनुभव किया, उसके बाद तो मन उस दु:ख से अतीत हो कष्ट  अनुभव करने में असमर्थ हो गया था। इसीलिये मन में जेल की स्मृति जगने पर क्रोध या दुःख नहीं, हंसी ही आती है। पहले-पहल जब जेल की विचित्र पोशाक पहन अपने पिंजरे में घुसकर रहने का बन्दोबस्त देखा था तब यही भाव मन में उदित हुआ था। मन-ही-मन हंस रहा था। अंग्रेज जाति का इतिहास और आधुनिक आचरण का निरीक्षण कर बहुत पहले ही मैंने उनके विचित्र और रहस्यमय चरित्र को समझ लिया था, इसीलिये अपने लिये उनकी ऐसी व्यवस्था देखकर भी जरा भी आश्चर्यान्वित या दुःखी नहीं हुआ। साधारण दृष्टि से हम लोगों के साथ उनका ऐसा व्यवहार अतिशय अनुदार व निंदनीय था। हम सब थे कुलीन घरानों के, बहुत-से थे जमींदारों के बेटे, कितने ही वंश, विधा, गुण और चरित्र में थे इंग्लैण्ड के शीर्षस्थानीय व्यक्तियों के समकक्ष! हम जिस अपराध में पकड़े गये थे वह भी सामान्य खून, चोरी, डकैती नहीं था, था देश के लिये विदेशी सरकार के विरूद्ध युद्ध-चेष्टा षड़यंत्र। तिसपर कइयों को दोषी ठहराने में प्रमाण का नितांत अभाव था; पुलिस का संदेह ही था उनके पकड़े जाने का एकमात्र कारण। ऐसे स्थान में सामान्य चोर-डकैतों की तरह रखना - चोर डकैत ही क्यों, पशुओं की तरह पिंजरे में रख, पशुओं का अखाद्य आहार खिलाना, जलकष्टधूप, वर्षा व शीत सहन कराना - इससे ब्रिटिश सरकार और ब्रिटिश जाति की गौरव-वृद्धि नहीं होती। यह है किंतु उनका जातीय चरित्रगत दोष। अंग्रेजों में क्षत्रियोचित गुण होते हुए भी शत्रु या विरुद्धाचरणकारी के साथ व्यवहार करते समय वे हैं सोलह आने बनिये। मेरे मन में तब विरक्ति की भावना ने स्थान नहीं पाया बल्कि मुझमें और देश के साधारण अशिक्षित लोगों में कुछ भेद नहीं रखा गया यह देखकर कुछ आनंदित हुआ, और फिर इस व्यवस्था ने तो मातृभक्ति के प्रेमभाव में आहुति का काम किया । मैंने इसे योग-शिक्षा और द्वंद्व-जय का अपूर्व उपकरण और अनुकूल अवसर माना, तिसपर मैं था चरमपंथी दल का जिनके मत में प्रजातंत्र एवं धनी-दरिद्र का साम्य है राष्ट्रीय भाव का एक प्रधान अंग। याद हो आया - मत को कार्यान्वित करना अपना कर्तव्य समझ सूरत जाते समय सभी ने एक साथ तीसरे दर्जे में यात्रा की थी। कैंप में नेतागण अपना-अपना अलग प्रबंध न कर सबके साथ एकभाव से, एक ही कमरे में सोते। धनी, दरिद्र, ब्राम्हण, वैश्य, शुद्र, बंगाली, मराठी, पंजाबी, गुजराती - सब दिव्य भ्रातृभाव से एक साथ रहते, सोते, खाते। जमीन पर सोना, दाल-भात, दही खाना, सब चीजों में था स्वदेशी का बोलबाला । कलकत्ते और बंबई के विदेश से लौटे हुए लोग और मद्रास के तिलकधारी ब्राम्हण सब एक साथ मिल-जुल  गये थे। इस अलीपुर जेल में रहते समय अपने देश के कैदी, अपने देश के किसान, लुहारकुम्हार, डोम  के समान आहार, समान रहन-सहन, समान कष्ट, समान मान-मर्यादा पा समझा कि सर्वशरीरवासी नारायण ने इस साम्यवाद, इस एकता, इस देशव्यापी भ्रात्रृभाव से सहमत हो मानों मेरे जीवन-व्रत पर अपनी मुहर लगा दी हो । जिस दिन जन्मभूमि-रूपिणी जगज्जननी के पवित्र मण्डप में सारा देश भ्रात्रृभाव में एक प्राण हो जगत् के सामने उन्नतमस्तक हो खड़ा होगा, सहवासी आसामी और कैदियों के प्रेमपूर्ण आचरण एवं सरकार के इस साम्यभाव में, इस कारावास में उस शुभ दिन का हृदय में पूर्वाभास पा कितनी ही बार हर्षित व पुलकित हो उठता था। अभी उसी दिन पूना के "Indian Social Reformer ने मेरी एक सहज बोधगम्य  उक्ति पर व्यंग्य कसते हुए कहा था, ''जेल में तो भगवत्सान्निध्य की बड़ी बाढ़-सी आ गयी दीखती है।''  हाय रे मान-सम्मान के अन्वेषी, अल्प विधा  से, अल्प सदगुण से गर्वित मनुष्य के अहंकार और क्षुद्रता! जेल में, कुटीर में, आश्रम में, दुःखी के हृदय में भगवान् प्रकट नहीं होंगे तो क्या धनी के विलास-भवन में, सुखान्वेषी स्वार्थाध संसारी की सुख-शय्या पर होंगेभगवान् विधा , सम्मान, लोकमान्यता, लोकप्रशंसा, बाह्य  स्वच्छंदता व सभ्यता नहीं देखते। वे दुःखी के सामने ही दयामयी माँ का रूप धरते हैं। जो मानवमात्र में, जाति में, स्वदेश में, दुःखी-गरीब, पतित-पापी में नारायण को देख उनकी सेवा में जीवन समर्पित करते हैं, उन्हींके हृदय में आ बसते हैं नारायण और उथ्थानोधत   पतित जाति में, देश-सेवक की निर्जन कारा में ही संभव है भगवत्-सान्निध्य  की बाढ़।

(क्रमश: आगे अगले अंक में)

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अपने सुझाव (suggestions) दें, आपको सूतांजली कैसी लगी और क्यों? आप अँग्रेजी में भी लिख सकते हैं।


शनिवार, 1 मई 2021

सूतांजली, मई २०२१

 सूतांजली

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वर्ष : ०४ * अंक : १०                       (🔊२२.४५)                           मई  * २०२१

एक सेव में कितने बीज हैं, यह जानने का बहुत सरल उपाय है;

लेकिन हम में से कौन, कभी यह बता पायेगा कि

एक बीज में कितने सेव हैं?  

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मालिक से गुलाम तक का सफर (🔉००.००-०६.२८)

समुद्र तट पर बिखरे कण रेत का सम्मान पाते हैं, लेकिन वही रेत हमारे घर के अंदर में धूल बन तिरस्कार का भागी बनती है। जब रेत, समुद्र तट से वाहनों पर लद कर बाजार की तरफ बढ़ती है तब माल कहलाती है। मिश्रण कारखाने (मिक्सिंग प्लांट) में कच्चा माल (रॉ मैटिरियल) और फिर सीमेंट के साथ मिल कर कंक्रीट बन जाती है और बड़े-बड़े निर्माण करती है। यह पूरा खेल केवल स्थान और साथी का है।

 

भीड़ भरे बाजार में किसी अनजाने को ठोकर लग जाती है और हम अपराध बोध से मुझे क्षमा करें (आइ एम सोर्री) कह उठते हैं। हाथ से छिटक कर कुछ समान जमीन पर गिर पड़ता है और कोई अनजान उसे उठा कर हमारे हाथ में पकड़ा देता है। हम कृतज्ञ भाव से धन्यवाद (थैंक यू) बोल उठते हैं। लेकिन जब यही घटना हमारे अपने किसी परिचित के बीच, भाई-भाई के बीच, पति-पत्नी के बीच, माँ-बाप-बेटे-बेटी के बीच या दोस्तों के बीच होती है तब हम यह शिष्टाचार निभाने की जिददो-जहद नहीं करते। इसे हम अपना अधिकार या कर्त्तव्य मानते हैं। हमारी इस आदत के कारण पढ़े-लिखे लोग, पश्चिमी सभ्यता में गुने लोग इसे अनपढ़-गँवार-अशिष्ट  होना मानते हैं।

ओशो 
ओशो कहते हैं, हम यह मानते हैं कि शिष्टाचार का निर्वाह उन दो लोगों के बीच आवश्यक है जहाँ वे एक दूसरे से अपरिचित हैं। उन अपरिचित व्यक्तियों को एक-दूसरे की जानकारी नहीं है। हो सकता है, अनजाने में लगी ठोकर के कारण दूसरे का मिजाज चढ़ गया हो और वह उसका प्रत्युत्तर देने की तैयारी कर रहा हो? हो सकता है, वहाँ, अपनी भूल का इजहार बढ़ती दुर्घटना और वैमनस्य पर लगाम लगा दे और इसके उलट आभार के शब्द एक नया परिचय तैयार कर दे। लेकिन जहां वे दोनों परिचित हों, जानते हों, ऐसी मार-पीट या नये परिचय के लिए जगह नहीं होती, और परिचित होने के कारण हमें अपने कर्त्तव्य और अधिकार का भान होता है। यहाँ हमारा आपसी प्रेम ही सर्वोपरि होता है जिसके बीच ऐसे शिष्टाचारों के लिए स्थान नहीं होता। यह न हमारा गँवारपन है, और न ही अशिष्टता।  यह है हमारा अपनत्व, प्रेम  और स्नेह। ये शिष्टाचार दो व्यक्तियों के मध्य चिकनाई (लुब्रिकैंट) का काम करती हैं। प्रेम की चिकनाई सर्वोच्च है

 

हमारी जीवन शैली संयुक्त परिवार की रही है, जहां पर हम साथ-साथ रहे-खेले-पढ़े-बड़े हुए। फिर अचानक भूचाल आया वैश्वीकरण का, उपभोक्तावाद का और संचार-तकनीक की क्रांति का। इसने हमें बुरी तरह झकझोर कर रख दिया।  परिवर्तन की गति इतने तेज थी / है कि हम अपने आप को न तो उस गति से बदल सके और न ही समझने, परखने का समय मिला। अनेक परिवर्तनों को सुविधा के नाम पर ज्यों-का-त्यों स्वीकार कर लिया गया। पीढ़ी को तैयार करना परिवार की जिम्मेदारी थी लेकिन अब स्वतंत्र, एकल और निरंकुश जीवन शैली ही मान्य हो गई है। बच्चा छुटपन से ही पारिवारिक व्यापार से जुड़ कर वयस्क होने तक निपुण हो जाता था। अब अपने पैतृक व्यवसाय से जुड़ नहीं पाता और जो परिवार काम देनेवाला था काम खोजने वाला बन गया। जो कभी मालिक हुआ करता था, अब गुलाम बन गया।

 

भारत का अपना इतिहास रहा है, संस्कृति रही है, परम्पराएँ रही हैं। ज्ञान-निपुणता पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती हैं। पिछली पीढ़ी के अनुभव नई पीढ़ी के व्यवसाय, गृहस्थी और सामाजिक जीवन में काम आती हैं। हर पुत्र पिता से आगे निकलता है। कहा ही जाता है कि बालक मानव का पिता है (चाइल्ड इस फादर ऑफ द मैन) । पिता का शिखर ही बच्चे का पहला पड़ाव होता है। लेकिन, पढ़े-लिखे, मोटा वेतन पाने वाले नौकरीपेशा लोगों को इसका प्रभाव नजर नहीं आता। लेकिन इसका दूरगामी प्रभाव पड़ रहा है। इंसान मालिक बनने के बजाय गुलाम बनता जा रहा है। तन ही नहीं, मन से भी। मालिक की स्वतन्त्रता के बजाय गुलामी की सोने की जंजीरें हीं अब ज्यादा पसंद आ रही हैं। उसे जंजीर नहीं  सोना ही दिख रहा है। यह बात समझाने की कोई विगत भी नजर नहीं आती।

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जापान – श्री माँ की दृष्टि में(🔉०६.२८-१५.५०)

(जापान में दिया गया श्री माँ का भाषण, माँ की गहरी दृष्टि और भाषा का प्रवाह, देखने और समझने योग्य है।)

आपने जापान के बारे में मेरे विचार माँगे हैं। जापान के बारे में लिखना एक कठिन काम है। वहाँ के बारे में इतनी सारी चीजें लिखी जा चुकी हैं, बहुत सी उट-पटांग चीजें भी...... लेकिन ये ज्यादातर देश नहीं, देशवासियों के बारे में हैं। वह देश एक अद्भुत, सुरम्य, बहुमुखी, मनोहर, अप्रत्याशित, जंगली या मधुर है। वह देखने में - उत्तरध्रुवीय ठंडे प्रदेशों से लेकर उष्ण कटि-प्रदेशीय तक – दुनिया भर के सभी देशों का समन्वय लगता है। किसी कलाकार की आँख उसकी ओर से उदासीन नहीं रह सकती। मेरा खयाल है कि जापान के बहुत से सुन्दर वर्णन किये जा चुके हैं। मैं उनमें से एक और नहीं बढ़ा रही, मेरा वर्णन निश्चित रूप से उनकी अपेक्षा बहुत कम रोचक होगा। लेकिन आमतौर पर जापानियों को गलत समझा गया है और गलत रूप से पेश किया गया है और इस विषय पर कहने लायक कुछ कहा जा सकता है।

श्री माँ

 
अधिकतर विदेशी लोग जापानियों के उस भाग के सम्पर्क में आते हैं जो विदेशियों के संसर्ग से बिगड़ चुका है – ये पैसा कमाने वाले, पश्चिम की नकल करने वाले जापानी हैं। वे नकल करने में बहुत चतुर हैं और उनमें ऐसी काफी सारी चीजें हैं जिनसे पश्चिम के लोग घृणा करते हैं। अगर हम केवल राजनेताओं, राजनीतिज्ञों और व्यापारियों के जापान को देखें तो यही लगेगा कि यह यूरोप के शक्तिशाली देशों से बहुत ज्यादा मिलता जुलता देश है, लेकिन उसमें ऐसे देश की जीवनी शक्ति और घनीभूत ऊर्जा भरी है जो अभी तक अपनी पराकाष्ठा पर नहीं पहुंचा है। 

 

यह ऊर्जा जापान की एक बहुत मजेदार विशेषता है। वह हर जगह, हर एक बूढ़े, बच्चे, मर्द, औरत, विद्यार्थी, मजदूर सभी के अन्दर दिखाई देती है। शायद “नये अमीरों” को छोड़ कर सभी के जीवन में अद्भुत घनीभूत ऊर्जा का भंडार दिखाई देता है। प्रकृति और सौंदर्य के आदर्श प्रेम के साथ साथ यह संचित शक्ति भी जापानियों की विशिष्ट और सबसे अधिक व्यापक विशेषता है। उदयाचल के उस प्रदेश में पाँव रखते ही आप इस चीज को देख सकते हैं, जहाँ इतने सारे लोग और इतनी निधियाँ एक छोटे से टापू में जमा हैं।

 

यदि आपको उन जापानियों से मिलने का सुअवसर मिले, जैसा कि हमें मिला था, जिनमें अभी तक प्राचीन सामुराई का शौर्य और अभिजात्य अछूता है तो आप समझ सकते हैं कि सच्चा जापान क्या है, आप उनकी शक्ति और रहस्य को पा सकते हैं। वे चुप रहना जानते हैं और यद्यपि उनमें बहुत अधिक तीव्र संवेदनशीलता होती है, लेकिन मैं जिन लोगों से मिली हूँ उनमें ये सबसे कम इसका प्रदर्शन करने वाले लोग हैं। यहाँ एक मित्र तुम्हारे प्राण बचाने के लिए बड़ी ही सरलता से अपनी जान दे सकता है; लेकिन वह कभी तुम्हारे सामने यह न कहेगा कि उसे तुम्हारे लिए इतना गहरा और नि:स्वार्थ प्रेम है। वह इतना तक भी नहीं कहेगा कि वह तुमसे प्रेम करता है। और अगर तुम बाहरी आभासों के पीछे छिपे हुए हृदय को न पढ़ सको तो तुम्हें बहुत अच्छे बाह्य शिष्टाचार के सिवाय कुछ न दिखाई देगा जिसमें सहज भावों के लिए कोई स्थान नहीं होता। फिर भी भाव होते हैं और बाहर अभिव्यक्त न होने के कारण और भी ज्यादा प्रबल होते हैं और कभी मौका आ जाए तो उनके किसी काम द्वारा अचानक प्रेम की गहराई का पता चलता है, वह भी विनयशील और कई बार छिपा हुआ। यह जापानी विशेषता है। संसार के जातियों में सच्चे जापानी, जो पश्चिम के प्रभाव में नहीं आए है, शायद सबसे कम स्वार्थी होते हैं। और यह नि:स्वार्थता पढ़े-लिखे, विद्वान या धार्मिक लोगों की ही विशेषता नहीं है। यह समाज के सभी स्तरों में पायी जाती है। यहाँ कुछ लोकप्रिय और अत्यन्त मनोहर उत्सवों को छोड़ कर धर्म रूढ़ि या सम्प्रदाय नाम की चीज नहीं है। यह उनके दैनिक जीवन में आत्म-त्याग, आज्ञा-पालन और आत्म-समर्पण के रूप में दिखाई देता है।  

 

जापानियों को बचपन से ही सिखाया जाता है कि जीवन कर्त्तव्य है, सुख नहीं है। वे उस कर्त्तव्य को  स्वीकार करते हैं। प्राय: कठोर और कष्टकर कर्त्तव्य को सहनशील आत्म-समर्पण के साथ स्वीकार करते हैं। वे अपने आप को सुखी बनाने के विचार से परेशान नहीं करते। यह सारे देश के जीवन को आनन्द और मुक्त अभिव्यक्ति नहीं, एक असाधारण आत्म-नियंत्रण प्रदान करता है। यह तनाव, प्रयास और मानसिक तथा स्नायविक दबाव का वातावरण पैदा करता है, उस तरह की आत्मिक शांति नहीं देता जैसी, उदाहरण के लिए, भारत में अनुभव की जा सकती है। वास्तव में, जापान में ऐसी कोई चीज नहीं है जिसकी तुलना भारत में व्याप्त शुद्ध भागवत वातावरण से की जा सके। यह वातावरण ही भारत देश को ऐसा अनोखा और बहुमूल्य बनाता है। जापान के मंदिरों में, वहाँ के पवित्र दुर्गम मठों में जो कभी कभी ऊंचे पर्वत की चोटी पर बने होते हैं, बड़े बड़े देवदार के पेड़ों से ढके होते हैं, जो नीचे की दुनिया से बहुत दूर हैं, उनमें भी यह वातावरण नहीं है। वहाँ बाहरी नीरवता है, विश्राम और निश्चलता है, लेकिन शाश्वत का वह आनंदमय संवेदन नहीं है जो एकमेव की जीवन सन्निधि से आता है। यह सच है कि यहाँ सब कुछ एकता के मन और आँखों को सम्बोधित करता है – मनुष्य की भगवान से एकता, प्रकृति की मनुष्य से एकता और मनुष्य मनुष्य की एकता से। लेकिन यह एकता कम ही अनुभव की जाती है या जीवन में उतारी जाती है। निश्चय ही जापानियों में उदार आतिथ्य, पारस्परिक सहायता, पारस्परिक अवलम्ब की भावना बहुत विकसित है। लेकिन अपने संवेदनों, विचारों और सामान्य क्रियाओं में यह सबसे अधिक व्यक्तिवादी और पृथकतावादी जाति है। इन लोगों के लिए रूप प्रधान है, रूप आकर्षक है। वह अभिव्यंजक भी होता है। वह किसी अधिक गहरे सामंजस्य या सत्य, प्रकृति या जीवन के किसी विधान की कहानी कहता है।  प्रत्येक रूप, प्रत्येक क्रिया, बगीचे की व्यवस्था से लेकर प्रसिद्ध चाय समारोह तक, प्रतिकात्मक है, और कभी-कभी एक बहुत ही सादी और सामान्य चीज में गहरा, अलंकृत, इच्छित प्रतीक मिल जाता है जिसे अधिकतर लोग जानते और समझते हैं। लेकिन यह जानना और समझना केवल बाहरी और परम्परागत होता है। वह आध्यात्मिक अनुभवों से आने वाला जीवंत सत्य नहीं होता जो दिल और दिमाग को प्रबुद्ध करे। जापान मौलिक रूप में संवेदनों का देश है। वह अपनी आँखों के द्वारा जीता है। उस पर सौंदर्य का एकछत्र राज्य है और उसका वातावरण मानसिक और प्राणिक क्रिया-कलाप, अध्ययन, निरीक्षण, प्रगति और प्रयास को उत्तेजित करता है, लेकिन शांत, आनंदमय चिंतन मनन को नहीं। लेकिन इस सारे क्रिया कलाप के पीछे एक उच्च अभीप्सा उपस्थित है जिसे उस जाति का भविष्य ही व्यक्त करेगा। 

(श्री अरविंद सोसाइटी की अग्निशिखा में प्रकाशित)

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छेद(🔉१५.५०-१७.३६)

एक लड़के को बहुत गुस्सा आता था। एक दिन उसके पिता ने उसे एक कीलों से भरा बैग दिया और कहा कि जब भी उसे गुस्सा आये, वह चारदीवारी में पीछे की तरफ एक कील जरूर ठोंक दे। पहले दिन उस लड़के ने 37 कीलें दीवार में गाड़ दीं। अगले हफ्ते तक वह अपने गुस्से पर काबू करना सीख चुका था। गाड़ने वाली कीलों का क्रम कम हो गया। उसने दीवार में गड़ी कीलों को देखकर सोचा, अपने गुस्से को रोकने का यह सबसे आसान तरीका है। धीरे-धीरे उस लड़के ने अपने गुस्से पर पूरी तरह से काबू पा लिया। जब उसने अपने पिता को यह बताया तो उन्होने यह सलाह दी कि अब वह जिस दिन उसे एक बार भी गुस्सा नहीं आये, दीवार से एक कील बाहर निकाले। जब उसने सारी कीलें निकाल लीं तो वह अपने पिता के पास पहुंचा। उन्होंने लड़के का हाथ पकड़ा और उसे उस दीवार के पास ले गए और बोले, तुमने बहुत अच्छा काम किया है बेटे, लेकिन उस दीवार के छेदों  की तरफ देखो। अब यह दीवार पहले जैसी कभी नहीं हो सकती। इसी तरह से जब तुम गुस्से में कुछ कहते हो तो घाव भी किसी के हृदय में इसी तरह लगता है। तुम कितनी बार भी माफी मांग लो, निशान हमेशा रहता है।

गुस्से में कही बात का कोई हर्जाना नहीं होता, इसलिए गुस्से पर काबू रखिये।

(उजाले के गाँव में से)

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कारावास की कहानी – श्री अरविंद की जुबानी(🔉१७.३६-२२.४५)

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। अग्निशिखा में इसके रोचक अंश प्रकाशित हुए थे। इसे हम जनवरी माह से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसका पाँचवा अंश है।)

(५)

लपसी – महात्म्य 

अगले दिन सवेरे सवा चार बजे जेल की घंटी बजी। कैदियों को जगाने के लिए यह पहली घंटी थी। कुछ मिनट बाद दूसरी बजती, इसके बाद कैदी पंक्तिबद्ध हो बाहर आ हाथ-मुंह धो, लपसी खा दिन-भर की मशक्कत में लग जाते। इतनी घण्टियों के बजते सोना असंभव जान मैं भी उठ जाता। कुछ देर बाद मेरे दरवाजे पर लपसी हाजिर हुई किन्तु उस दिन उसे खाया नहीं, केवल चाक्षुष परिचय हुआ। इसके कुछ दिन बाद पहली बार इस परमान्न का भोग लगाया। लपसी, अर्थात मांड-सहित उबला भात, यही थी कैदियों की छोटी हाजरी। लपसी की त्रिमूर्ति या तीन अवस्थाएँ हैं। पहले दिन लपसी का प्रज्ञा भाव, अमिश्रित मूल पदार्थ, शुद्ध शिव शुभ्र-मूर्ति। दूसरे दिन लपसी का हरिण्यगर्भ रूप, दाल के साथ सीजा हुआ खिचड़ी के नाम से अभिहित, पीतवर्ण, नाना धर्मसंकुल। तीसरे दिन थोड़े से गुड़ में मिश्रित लपसी की विराट मूर्ति, धूसर वर्ण, कुछ परिणाम में मनुष्य के व्यवहार योग्य। प्राज्ञ और हरिण्यगर्भ का सेवन साधारण मर्त्य मनुष्य के बूते से बाहर मान मैंने उसे त्याग दिया था। कभी कभार विराट के दो ग्रास उदरस्थ कर ब्रिटिश राज्य के नाना सद्गुण और पाश्चात्य सभ्यता के उच्च दर्जे के लोकहितवाद (humanitarianism) के बारे में सोच-सोच कर आनंदमग्न होता रहता था। कहना  चाहिए कि लपसी ही था बंगाली कैदियों का एकमात्र पुष्टिकर आहार, बाकी सब था सारशून्य। वह होने से भी क्या होगा? उसका जैसा स्वाद था, वह केवल भूख से सताये जाने पर ही खाया जा सकता है, वह भी ज़ोर-जबर्दस्ती, मन को बहुत समझा-बुझाकर।

 

उस दिन साढ़े ग्यारह बजे स्नान किया। घर से जो पहन कर आया था, पहले चार-पाँच दिन वही पहने रहना पड़ा। नहाते समय गोहालघर के जो वृद्ध कैदी वौर्डर मेरी देखरेख के लिए नियुक्त हुए थे उन्होंने कहीं से डेढ़ हाथ चौड़ा एंडी का कपड़ा जुटा दिया था, अपने एकमात्र कपड़े सूखने तक वही पहने बैठा रहता। मुझे कपड़े धोने और बर्तन माँजने नहीं पड़ते थे, गोहालघर का एक कैदी यह कर देता था। ग्यारह बजे खाना। कमरे की छितनी के सान्निध्य से बचने के लिए ग्रीष्म की धूप सहते हुए प्राय: ही आँगन में खाया करता। संतरी भी इसमें बाधा नहीं देते। शाम का खाना होता पाँच-साढ़े पाँच बजे। उसके बाद लौह-द्वार का खुलना निषिद्ध था। सात बजे शाम का घंटा बजता। मुख्य जमादार वौर्डरों को इकट्ठा कर उच्च स्वर में नाम पढ़ते जाते थे, उसके बाद सब अपनी अपनी जगह चले जाते। श्रांत निद्रा की शरण ले जेल के इस एकमात्र सुख का अनुभव करते। इस समय दुर्बलचेता अपने दुर्भाग्य  या भावी जेल-सुख की चिंता कर रोया करते। भगवद-भक्त नीरव रात्री में ईश्वर का सान्निध्य अनुभव कर प्रार्थना या ध्यान में आनंद लूटते। रात को इन अभागे, पतित, समाज-पीड़ित तीन सहस्त्र ईश्वरसृष्ट प्राणियों का यह अलीपुर जेल, प्रकांड यंत्रणा-गृह विशाल नीरवता में डूब जाता। ...                                                                                                (क्रमश:, आगे अगले अंक में)

यू ट्यूब लिंक : https://youtu.be/KvbryTiWlvg

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