बुधवार, 1 जून 2022

सूतांजली, जून 2022

सूतांजली

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वर्ष : ०५ * अंक : ०११             🔊(30.15)                                       जून  * २०२२

सद्गुण एक प्रकार की बुद्धि है जिसे सिखाया नहीं जा सकता और इसलिए यह ज्ञान नहीं है।

जो लोग यह दावा करते हैं कि यह एक ज्ञान है और इसे सिखाया जा सकता है,

वे यह भूल जाते हैं कि उनके अच्छे काम का परिणाम ज्ञान नहीं बल्कि

उनके सच्चे विचारों की देन है। 

प्लेटो



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एक लम्बी लघु कथा

(इस लंबी कथा को आपने लघु कथा के रूप में जरूर सुनी और पढ़ी होगी। फोटो देख कर इसका मजमून भी समझ गए होंगे। लेकिन जरा ठहरिये! हाँ, बात वही है लेकिन अचलेश शर्मा की कलम को महसूस कीजिये, लगेगा की इसे आप पहली बार पढ़ रहे हैं। नहीं, पढ़ नहीं रहे हैं, महसूस कर रहे हैं, इसे जी रहे हैं। इसे ही कहते हैं कलम की ताकत। चाहें तो सुन लीजिये, तब भी एक अलग अहसास होगा।)

पत्नी जिद कर रही थी कि तुलसी लगाने के लिए उसे कुम्हार की दुकान से गमला चाहिए। उस दिन रविवार था, इसलिए नाश्ता करते हुए पति ने प्रस्ताव रखा, 'चलो आज हम वह तुलसी वाला गमला ले आते हैं और खाना भी बाहर ही करते आएंगे। पत्नी खुश। नव-दंपत्ती मिट्टी के सामान वाले कुम्हार की उस दुकान पर पहुँच गया जहाँ  गमले और मिट्टी का सजावटी सामान बनाकर बेचा जाता था। हालांकि तिरपाल के तले और चारों तरफ पड़े सामान को देख कर उसे दुकान नहीं कहा जा सकता। पत्नी ने तुलसी के थांवले जैसा गमला पसंद कर लिया, लेकिन जब दाम पूछे तो वह आश्चर्य से लगभग चीख उठी, 'क्या? एक सौ बीस रुपये? एक सौ बीस रुपए का क्या है इसमें? मिट्टी का ही तो है!"


          बेचारे कुम्हार ने बहुत सारी दलीलें दी, जैसे मेहनत बहुत करनी पड़ती है, बिकता भी कम है, महंगाई बहुत है, वगैरह-वगैरह, लेकिन पत्नी इतने पैसे देने को तैयार ही नहीं थी। आखिर बहुत बहस करके अपनी पसंद का गमला लेकर और 100 रुपए कुछ इस भाव से वहीं रख कर वह गाड़ी की तरफ चल पड़ी, जैसे इतने रुपए भी वह कुछ ज्यादा ही दे रही है। कार में बैठते हुए पति ने देखा कि कुम्हार ने एक बेबसी और उदासी भरे भाव से वे रुपए उठा लिए थे।

          होटल में खाने के लिए दिए गए ऑर्डर में पत्नी अपनी पसंद का आलू जीरा शामिल कराना नहीं भूली थी। कुछ देर में खाना मेज पर सजा दिया गया। खाना खाते-खाते पति हौले से बोला, उस गमले के तुम्हें पूरे पैसे दे देने चाहिए थे।'

"अरे वाह, एक सौ बीस का उसमें क्या है? भला लूट मचा रखी है। तुम भी न!’

'चलो, थोड़ी देर के लिए तुम्हारी बात मान लेते हैं कि उस गमले में एक सौ बीस का कुछ नहीं है। अब जरा इस आलू जीरा की सब्जी को भी देखो। देखो, मेन्यू में इसकी कीमत दो सौ चालीस रुपए लिखी है। अब यह भी देखो कि इसमें आलू कितना लगा होगा। शायद आधा किलो भी नहीं। आज के बाजार भाव से देखें तो पांच रुपए के क़रीब आलू लगे होंगे इसमें। अब मसाले, गैस वगैरह भी लगा लो, तो बहुत से बहुत पैंतीस-चालीस रुपए लग गए होंगे। लेकिन हम यहाँ होटल वाले से नहीं कहते कि आलू जीरे की इस एक प्लेट में दो सौ चालीस का क्या है भला? चुपचाप इसे दो सौ चालीस का ही स्वीकार कर लेते हैं। ऊपर से हम वेटर को टिप भी देकर जाते हैं। तुमको पता है कि जो गमला तुमने लिया है इसे बनाने में उस ग़रीब ने कितनी मशक़्क़त की होगी?' पत्नी के चेहरे पर उत्सुकता आ गई थी।

 

पति बोला, 'सबसे पहले तो वह कहीं ख़ास जगह पर बनी एक ख़ास मिट्टी की खदान से मिट्टी खोद कर लाया होगा। फिर उसमें पानी डाल कर उसने कई दिन तक कई बार उसे रौंदा होगा, तब जाकर वह मिट्टी इस लायक हुई होगी कि उससे कुछ बनाया जा सके। फिर उसने अपने हाथों से बड़े ध्यान और धीरज के साथ इस चौकोर आकार के खास गमले को तैयार किया होगा, क्योंकि चौकोर गमला चाक पर नहीं बनाया जा सकता। फिर इसके गीला रहते हुए ही उसने इस पर नक्काशी की होगी। फिर इसे सूखने के लिए रखा होगा, बहुत संभाल के। इसके सूख जाने पर इसे उपलों के ढेर के अंदर रख कर, उन्हें जला कर इसे पकाया होगा। फिर बड़ी सावधानी के साथ वह इसे अपने घर से ढो कर इस दुकान पर लाया होगा। और उसकी दुकान देखी तुमने? ऊपर तिरपाल से ही तो ढकी है, लेकिन चारों तरफ से खुली है। ऐसे खुले में वह तेज सर्दी, गर्मी, बरसात झेलते हुए वहीं रहता है, वह खाट और उस पर पड़ा उसका बिस्तर वहीं तो था, तुमने देखा होगा।'

          पत्नी विस्मित भाव से बड़े ध्यान से सुन रही थी। पति ने पत्नी की प्लेट में थोड़ा और आलू जीरा परोसते हुए कहा, 'और यह होटल वाला बाजार से आलू मंगा कर कुक को सामान देकर आराम से एसी में बैठा हुआ इसके हमसे दो सौ चालीस रुपए वसूल कर रहा है और हम कोई चूं-चपर किए बिना उसे दो सौ चालीस भी दे रहे हैं और ऊपर से टिप भी।

          पत्नी के चेहरे पर उदासी उतर आई थी पति ने स्थिति को संभालते हुए कहा, 'नहीं डियर, मैं तुम्हारा उपहास नहीं कर रहा हूँ। सोचने वाली बात यह है कि हम कुम्हार, सब्जी वाला, रिक्शा वाला और इसी तरह के ग़रीब लोगों के साथ - इन मेहनतकश गरीब लोगों के साथ जो कि अपने को बचाए रखने के लिए जूझ रहे होते हैं, इन्हीं के साथ मोलभाव क्यों करते हैं, इन्हीं के साथ पैसे कम करने की झिक-झिक क्यों करते हैं? सब्जी की बात चली है, तो सब्जी वाले को ही लो! तुमने देखा होगा कि शायद ही कोई ऐसा भला इंसान होगा, जो सब्जी वाले के साथ पैसे कम कराने के लिए झिक-झिक न करता हो। लेकिन क्या कभी कोई सोचता है कि हमें सब्जी उपलब्ध कराने के लिए वह कितनी मशक्कत करता है। हर रोज मुँह अंधेरे उठ कर वह सब्जी मंडी जाता है, वहाँ से सब्जी तुलवा कर वह उसे अपने ठेले तक लेकर आता है, सारी सब्जियों को धोता है, उन्हें हमारे लिए ठेले पर सजाता है और सारे दिन ही नहीं रात को 8-9 बजे तक वहीं खुले में खड़े-खड़े सब्जियां बेचता है - हर मौसम की मार झेलता हुआ, चाहे सर्दी हो, गर्मी हो, बरसात हो, आंधी हो। और हम उससे कहते हैं कि दो रुपए कम कर दे, और हरा धनिया और मिर्च मुफ़्त में लेना तो जैसे हमारा जन्मसिद्ध अधिकार बन गया है। इस होटल में खाने का एक हजार रुपए का बिल भरने वाला भी कोई एक पापड़ मांग कर तो देखे, पापड़ की क़ीमत तुरंत वह बिल में जोड़ देगा, लेकिन हम उससे यह नहीं कहेंगे कि हमने हजार रुपए का बिल भरा है तो एक पापड़ तो दे दे। कभी नहीं कहेंगे। लेकिन सब्जी वाले से तो गुर्रा कर कहते हैं कि हरी मिर्च डाल दे, धनिया डाल दे। अरे भाई, हरी मिर्च और धनिया क्या उसके घर में उगा था, वह भी तो उस ने मंडी से ख़रीद कर ही लाया होगा, फिर आप मुफ्त में क्यों मांग रहे हैं। और विडंबना देखो कि पैसे से समर्थ व्यक्ति असमर्थ व्यक्ति से मुफ्त में लेने की चाह रखता है। हम जैसे समर्थ लोग होटल, मॉल और कुबेरों की ऐसी ही पॉश जगहों पर यह देखते और महसूस करते हुए भी कि हम मूंडे जा रहे हैं, चुपचाप उस मोटी रकम का भुगतान करने में गर्व समझते हैं, लेकिन गरीब को उसकी लागत और मेहनत के पैसे देने में मोलभाव करने और झिक-झिक करने में हमें संकोच नहीं होता, बल्कि ऐसा करना हम अपना अधिकार समझते हैं। अच्छा तो यह होगा कि हम लोग जो पैसे से समर्थ हैं, वे ग़रीबों के साथ मोलभाव बिल्कुल न करें, उनकी मेहनत को, मशक्कत को सलाम करें और इसलिए हो सके तो बैरे को टिप देने की तरह ही इन्हें भी ऊपर से कभी कुछ इनाम भी दें।'

          पत्नी के चेहरे पर 'ज्ञान प्राप्ति' जैसे कुछ भाव तैरने लगे थे, और खाना खा लेने पर आने वाले तृप्ति के भाव भी बाहर आने पर पत्नी ने अपने स्वर में आग्रह का भाव लाते हुए पति से कहा, 'जरा एक बार फिर वहीं चलें?' पति ने मुस्कुरा कर सहमति दी। कुम्हार की उस दुकान पर वे फिर रुके। पत्नी ने अपनी पसंद के कई और सामान लिए। किसी की भी कीमत पर कोई झिक-झिक नहीं की और पूरे दाम चुकता कर दिए।

          कुम्हार खुश था कि आज अच्छी बिक्री हो गई थी। पति खुश था कि ग़रीब को उसके सामान के सही दाम दिला सका और इसलिए भी कि पत्नी ने उसकी बात पर बहस करने के बजाय बात को समझने की कोशिश की थी और सहजता के साथ आश्वस्त हो गई थी कि ग़रीब से मोल-भाव करना कोई अच्छी बात नहीं है। पत्नी भी खुश थी कि अपनी पसंद का इतना सारा सामान ले लिया था और इसलिए भी कि उसे एक व्यापक दृष्टिकोण और गहरी मानवीय सोच वाला पति मिला था।

(इसके साथ ही मुझे याद आ रहा है एक विदेशी महिला का भारत-भ्रमण वृतांत। वे लिखती हैं। वे अपने पति और दूध-मुंहे बच्चे के साथ भारत भ्रमण पर आई हुई थी और एक पांच सितारा होटल में ठहरे हुए थे। एक पर्यटक स्थल को देखने जाने के लिए गाड़ी से निकलना था और रास्ता कुछ लंबा था। निकलते-निकलते उसे ध्यान में आया कि बच्चे के लिए दूध लेना भूल गई है। होटल के बिल का भुगतान करते हुए उसने बच्चे के लिए दूध मांगा और बच्चे की खाली बोतल बढ़ा दी। जल्दी ही बैरा एक सुंदर सी ट्रे में दूध  भरी बोतल और तीन अंकों वाला बड़ा सा बिल लेकर हाजिर हो गया। महिला ने भुगतान किया और निकल पड़े। कुछ देर में बच्चे ने दूध पी लिया। अब तक वे शहर से बाहर सून-सान सड़क पर आगे बढ़ रहे थे।  बच्चे ने रोना शुरू किया। उसे फिर से भूख लग गई थी। हजार उपाय करने के बाद भी बच्चे का रोना नहीं रुक रहा था, बल्कि बढ़ ही रहा था। महिला लिखती है, हार कर मैंने ड्राईवर को अपनी परेशानी बताई। अगले गाँव पर उसने गाड़ी रोकी और मेरे हाथ से बोतल लेकर एक झोंपड़ी में घुसा। कुछ ही देर बाद दूध से भरी बोतल लेकर बाहर निकला, उसके पीछे-पीछे एक युवक भी आया, एक युवती वहीं दरवाजे पर खड़ी रही। मुझे थोड़ी घिन-सी तो आई लेकिन मेरे पास कोई उपाय नहीं था। बोतल लेते-लेते मैंने सौ एक नोट बढ़ाया। लेकिन मैं विस्मित रह गई। उस युवक ने  कुछ भी लेने से साफ मना कर दिया, “बच्चे के दूध लेकर मुझे नर्क में नहीं जाना है”। तभी मैंने देखा झोंपड़ी से वही महिला आ रही थी। उसके हाथ में और एक बोतल है जिसमें दूध भरा था, सफर में बच्चे को फिर से भूख लग सकती है, इसे रख लीजिये। मैं कुछ समझ नहीं पाई। मुझसे रहा नहीं गया। उस महिला को अपनी बाहों में भर कर मैं रोने लगी।)

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मन का योग

(योग-दिवस पर)

बरसों तक कभी कंदराओं में कैद रहा योग, योगा बनकर आज घर-घर घूमता हुआ विश्व पटल पर पसर गया है। योग की महत्ता बहुत गहरी है, परंतु सतही समझ ने इसे शरीर के स्वास्थ्य तक ही सीमित कर इसे योगा बना दिया है। निःसंदेह इससे थोड़ा स्वास्थ्य तो सुधरा है, परंतु आधुनिक जीवनशैली की चकाचौंध से ग्रसित मन के भटकाव ने योग से मिलने वाले संपूर्ण लाभों से वंचित कर दिया है। मन की बढ़ती चंचलता ने मनुष्य को यंत्रवत बनाते हुए, दुःख के थाल परोस दिए हैं। आज समस्त साधनों और भीड़ से घिरा आदमी, स्वयं को इसीलिए अकेला महसूस कर रहा है क्योंकि उसका मन उसके साथ नहीं है, शरीर यहाँ और मन कहीं और, इस अलगाव को रोकने का नाम है योग। योग का शाब्दिक अर्थ ही है जोड़ यानि जुड़ना। परमात्मा से जुड़ने से पहले खुद से जुड़ना जरूरी है। खुद का परमात्मा से एकात्म हो जाना ही 'योग' है। कण-कण में परमात्मा का भोगी ही योगी होता है।

          मन की उपस्थिति के बिना संपन्न हुए कार्य में न तो गुणवत्ता होती है और न ही उपयोगिता की सुगंध। बालपन के बाद से ही मन की चंचलता बढ़ती जाती है। दैनिक कार्यों की समस्त गतिविधियों, प्रायः मन की गैर हाजिरी के साथ यंत्रवत ही होती रहती हैं और इसीलिए कार्य करने का फल और आनंद पूरी तरह से नसीब नहीं हो पाता। अधूरे मन से किया गया कार्य कभी फलदायी नहीं होता। चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक। दूषित कार्यों में रसिक मन का सानिध्य अधिक होता है।

          योग, मन और कृत्य को जोड़ने का काम करता है। योग के नाम पर केवल ऊँचा-नीचा, टेढ़ा-बाँका और हाँपू-धाँपू होते रहना, योग नहीं है। योग एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें यम और नियम को पालना पहली आवश्यकता है, आसन और प्राणायाम बाद की बात है इनकी प्रवीणता के पश्चात् प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि में योग की पूर्णता होती है। सामान्यजन के लिए सारी सीढ़ियाँ चढ़ पाना संभव नहीं है, विशेषकर भागमभाग वाली इस आधुनिक जीवनशैली में।

          यम यानी अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह को अपने दैनिक जीवन में साधना। अपने मन को इन मूल्यों की समझ के साथ व्यवहार में उतारना । नियम यानी शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान योगाभ्यास में शुचिता को साधे बगैर सीधे आसन और प्राणायाम पर जाने से, श्रम के कारण शरीर भले ही सुधर जाए, लेकिन व्यक्ति नहीं सुधर पाता। इनके बिना किये हुए योग में न सात्विकता है न आध्यात्मिकता, इनके बिना किया हुआ योग अपूर्ण ही है। इस प्रकार के योग से मिलता-जुलता योग तो भोर से लेकर संध्या के बाद तक, सभी स्त्री-पुरुष किया करते थे, जब वर्तमान में उपलब्ध साधनों सुख-सुविधाओं का नितांत अभाव था तब उनके श्रम और लगन ने उन्हें शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मीठी और गहरी नींद भी परोसी, जो आज ढूँढ़ने से भी नहीं मिल पाती है। यम-नियम के अभाव में योगाभ्यास कर शारीरिक बल और एकाग्रता हासिल कर दानव-आतंकवादी भी बना जा सकता है। योग के लिए आध्यात्मिकता की उपस्थिति आवश्यक है। यम-नियम से मुँह मोड़कर आपाधापी को धारण करने वाले लोगों के कारण सामाजिक स्वास्थ्य बिगड़ता हुआ, विक्षिप्तता की ओर जा रहा है। अर्थवान योग के लिए अपने अहंकारिता - बिगड़ैल मन का प्रक्षालन करना अत्यंत जरूरी है। निर्मल मन का साथ यदि बना रहे, तो प्रायः सभी व्याधियों से पार पाया जा सकता है। जीवन में सात्विकता की प्रधानता योग का आधार है। वासनामुक्त चित्त के साथ फल-रहित कर्म की डगर कंटकाकीर्ण नहीं होती।

          कदाचित, आसन और प्राणायाम में भी हमारा ध्यान-मन यानी विचार, हमारे साथ रहें तो लाभ प्राप्ति में शीघ्रता रहेगी जो उपयोगिता के संदर्भ में स्व के साथ सर्वोपयोगी भी होगा। प्राण-प्रण के साथ किया गया कार्य फलीभूत होता ही है। जो भी आसन किया जाए, पूरा मन उसके साथ जुड़ा होना चाहिए, तभी उस आसन से लाभ मिलना संभव है। आसन यानी स्थिति विशेष में बैठना, उपयुक्तता के साथ बैठने का कृत्य। मन सदैव उड़ता ही रहता है, उसे अपने पास बिठा लें, तो हर कृत्य में हम आनंद के आस-पास होंगे। प्राणायाम में श्वास को साधना होता है। श्वास ही प्राण है। प्रत्येक श्वास यदि मन के साये में बनी रहे, तो प्राण के आयाम का निखरना तय है। प्राणायाम के साथ प्रत्याहार और धारणा सधते हैं। इनके सध जाने से ध्यान की उरवर्कता बलवती होती है, जिसमें मन का कोई स्थान नहीं है। मन की शून्यता से ध्यान की गहनता उर्ध्वगामी होकर समाधि का द्वार खटखटाती है और परमात्मा से मिलन संभव हो जाता है।

          सामान्य जन के लिए इतनी लंबी और कठिन यात्रा तो संभव नहीं है, परंतु अपने प्रत्येक कृत्य के साथ मन को जोड़े रखना, संभव अवश्य है - यदि पूर्णता के साथ अभ्यास करें तो। यदि मन के साथ रह पाना संभव न हो, तो भी यह ध्यान रखना कारगर होगा कि इस समय मन-चित्त कहाँ पर है यानी हमेशा होश में रहने का यत्न करें। अभ्यास के रूप में एक गिलास पानी पीने या लघुशंका जैसी छोटी-सी घटना में ध्यानपूर्वक मन को साथ रहने के लिए मना लिया जाए और जब रोम-रोम से निर्दोष मन झाँकने लगे, तो फिर प्रेम करने जैसी महान घटना भी घटित हो सकती है। हो यह रहा है कि जहाँ हम होते हैं, वहाँ मन हमारे साथ नहीं होता और जहाँ मन होता है, वहाँ हम नहीं होते। शरीर और कृत्य के एकाकार मन से योग को प्राण वायु मिलती है। मन-रहित निर्जीव योग, उससे मिलने वाली संभावनाओं को हर लेता है। परिष्कृत मन की गहनता के साथ योग को आत्मसात करने पर संवेदना के पंख लग सकते हैं, करुणा की बाढ़ आ सकती है, ज्ञान-कर्म-भक्ति के भाव के साथ मनुष्यता ऊँचाइयाँ छू सकती है और इसके फलस्वरूप आनंद की वर्षा कर सकती है। इसीलिए अनेक दिवसों के साथ-इस अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर भी, हम साधें - मन का योग ।

-        महावीर योगानन्दी  पर आधारित

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संवेदना                                                      लघु कहानी - जो सिखाती है जीना

तूरीन मार्शल का एक बड़ा हट्टा-कट्टा अर्दली था। अर्दली का एक दुबला-पतला दोस्त था स्टीफन, वह भी मार्शल के घर पर ही नौकर था एक दिन मार्शल तूरीन खिड़की से झुक कर बाहर देख रहे थे उसी समय अर्दली कमरे में  आया और उनकी पीठ पर ज़ोर से घूंसा जमा बैठा। तूरीन गुस्से से पीछे मुड़े। जब अर्दली ने उन्हें देखा तो उसके होश हवास गुम हो गए। मालिक के कदमों पर गिर पड़ा, हाथ जोड़ कर माफी माँगते हुए बोला, “सर, सौ-सौ बार माफी चाहता हूँ, रात के अँधेरे में मुझे लगा कि स्टीफन खड़ा है। मुझे पता नहीं था कि आप खड़े हैं..........”। अर्दली को वाक्य पूरा नहीं करने दिया तूरीन ने, उसे जमीन से उठा कर बाँहों में भरते हुए मुस्कुरा कर बोल उठे, “अरे भाई! अगर स्टीफन भी होता तो भी इतनी ज़ोर से तो नहीं मारना चाहिए था। यह घूँसा उसकी पीठ पर पड़ा होता तो बेचारे की क्या हालत हुई होती”।

          अर्दली तो शर्म से पानी-पानी हुए जा रहा था। उसे लगा कि धरती फट कर उसे अपने अंदर समा क्यों नहीं लेती। उसकी हालत देख मार्शल ने उसके कंधे को दबा कर ठोड़ी ऊपर उठाते हुए कहा, अरे! अब मेरी पीठ भी तो सहलाओ जरा, कैसी झनझना रही है!”

(अग्निशिखा से)

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कारावास की कहानी-श्री अरविंद की जुबानी                                        धारावाहिक

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। इसके रोचक अंश हम जनवरी २०२१ से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसकी अठारहवीं किश्त है।)

(18)

शुरू में किसी ने भी गोसाईं को यह पता न लगने दिया कि सभी उनकी अभिसन्धि भाँप गये हैं। वे भी इतने नासमझ निकले कि बहुत दिन तक कुछ भी न समझ सके, वे समझते थे कि मैं खूब छिपे-छिपे पुलिस की मदद कर रहा हूँ। किन्तु कुछ दिन बाद यह हुकुम हुआ कि हमें अब और निर्जन कारावास में न रख एक साथ रखा जायेगा तब, उस नूतन व्यवस्था से रात दिन पारस्परिक मेल-जोल और बातचीत से कुछ भी ज्यादा दिन छिपा न रहा। उन्हीं दिनों दो एक लड़कों के साथ गोसाई का झगड़ा हुआ, उनकी बातों से और सब के अप्रीतिकर व्यवहार से गोसाई समझ गये कि उनकी अभिसन्धि किसी के लिए भी अज्ञात नहीं रही। जब गोसाई गवाही देते तो कुछ एक अंग्रेजी अखबारों में यह खबर छपती कि आसामी इस अप्रत्याशित घटना से चमत्कृत और उत्तेजित हुए। कहना न होगा, यह थी रिपोर्टरों की कोरी कल्पना बहुत दिन पहले ही सब जान गये थे कि इस तरह की गवाही दी जायेगी। यहाँ तक कि किस दिन कौन-सी साक्षी दी जायेगी उसका भी पता था। ऐसे समय एक आसामी गोसाई के पास जाकर बोले, "देखो भाई, अब और नहीं सहा जाता, मैं भी approver (मुखबिर) बनूंगा, तुम शमसुल आलम को कहो कि मेरी रिहाई की भी व्यवस्था करें।" गोसाईं राजी हो गये। कुछ दिन बाद उनसे कहा इस विषय में गवर्नमेंट की चिट्ठी आयी है इस आसामी के निवेदन के अनुकूल निर्णय (favourable consideration) की सम्भावना है। यह कह गोसाईं ने उन्हें उपेन आदि से कुछ इस तरह की आवश्यक बातें निकलवाने को कहा, जैसे- गुप्त समिति की शाखा कहाँ थी, कौन थे उसके नेता इत्यादि। नकली approver आमोदप्रिय एवं रसिक आदमी थे, उन्होंने उपेन्द्रनाथ के साथ परामर्श कर गोसाईं को कुछ एक कल्पित नाम जता दिये कि मद्रास में विश्वम्भर पिल्लै, सतारा में पुरुषोत्तम नाटेकर, बम्बई में प्रोफेसर भट्ट और बड़ौदा में कृष्णाजीराव भाऊ थे इस गुप्त समिति की शाखा के नेता। गोसाईं ने आनन्दित हो यह विश्वासयोग्य संवाद पुलिस को दे दिया। पुलिस ने भी मद्रास में कोना-कोना छान मारा, बहुत से छोटे-बड़े पिल्लै मिले, लेकिन एक भी पिल्लै विश्वम्भर या अर्द्ध विश्वम्भर तक न मिला, सतारा में पुरुषोत्तम नाटेकर भी अपना अस्तित्व घने अन्धकार में छिपाये रहे, बम्बई में एक प्रोफेसर भट्ट मिल गये, किन्तु वे थे निरीह राजभक्त सज्जन, उनके पीछे कोई गुप्त समिति होने की सम्भावना नहीं थी। फिर भी, गोसाईं ने गवाही देते समय, उपेन से पहले कभी सुनी बात के आधार पर कल्पना-राज्य के निवासी विश्वम्भर पिल्लै इत्यादि षड्यन्त्र के महारथियों की नॉर्टन के श्री चरणों में बलि चढ़ा अपनी अद्भुत prosecution theory (अभियोग सिद्धान्त) को पुष्ट किया। वीर कृष्णाजीराव भाऊ को लेकर पुलिस ने और एक रहस्य रचा। उन लोगों ने बागान से बड़ौदा के कृष्णाजीराव देशपाण्डे नाम किसी "घोष" द्वारा प्रेषित टेलीग्राम की नकल प्रस्तुत की। उस नाम का कोई आदमी था कि नहीं, बड़ौदावासियों को इसका कोई सन्धान नहीं मिला, लेकिन सत्यवादी गोसाई ने बड़ौदावासी कृष्णाजीराव भाऊ की बात कही है तो निश्चय • कृष्णाजीराव भाऊ और कृष्णाजीराव देशपाण्डे हैं एक ही व्यक्ति और कृष्णाजीराव देशपाण्डे हों या न हों, हमारे श्रद्धेय बन्धु केशवराव देशपाण्डे का नाम चिट्ठी-पत्री में मिला था। इसलिए निश्चय ही कृष्णाजीराव भाऊ और कृष्णाजीराव देशपाण्डे एक ही व्यक्ति हैं। इससे यह प्रमाणित हो गया कि केशवराव देशपाण्डे हैं गुप्त षड्यन्त्र के एक प्रधान पण्डा। ऐसे सब असाधारण अनुमानों पर प्रतिष्ठित थी नॉर्टन साहब की वह विख्यात theory (परिकल्पना)।

(क्रमश:, आगे अगले अंक में)

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रविवार, 1 मई 2022

सूतांजली मई 2022

 सूतांजली

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वर्ष : ०५ * अंक : ०१०                      🔉(24.48)                                मई  * २०२२

घर की चहारदीवारी आदमी को सुरक्षा देती है पर साथ ही उसे एक सीमा में बाँधती भी है।

स्कूल-कॉलेज जहां व्यक्ति के मस्तिष्क का विकास करते हैं, वहीं नियम-कायदे

और अनुशासन के नाम पर उसके व्यक्तित्व को कुंठित भी करते हैं .....

बात यह है बंधु, कि हर बात का विरोध उसके भीतर ही रहता है।

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धूप-छाँह

आपके जीवन में क्या है? धूप या छाँह!

अगर धूप है, तो छाँह से बच नहीं सकते।

आप दुःखी हैं या सुखी?

दुःखी हैं तो सुख के क्षण भी आएंगे।

आप जीवित हैं या मृत!

अगर जीवित हैं, तो मृत्यु भी निश्चित है।  

आप युवा हैं या बुजुर्ग?

अगर युवा हैं तो बुजुर्ग होना अवश्यंभावी है।

सूर्योदय जितना अटल है, सूर्यास्त भी उतना ही अटल है।

          अगर प्रकृति के ये नियम अवश्यंभावी हैं तो फिर इससे क्या घबराना? लेकिन इनका सामना करने के लिए तैयारी  करनी पड़ेगी! क्या आपने इसकी तैयारी की है? आर्थिक सुरक्षा के नाम पर भले ही आपने अनेक धन – करोड़, सौ करोड़, हजार करोड़ - सँजोया हो, बड़े रकम की जीवन बीमा या हैल्थ बीमा लिया हो तब भी ये कम पड़ सकते हैं, गायब हो सकते है, जरूरत के समय नदारद हो सकते हैं। पहरेदार लगाए हों, ज़ेड सुरक्षा की व्यवस्था की हो, मजबूत दरवाजे और निवास बनाया हो तब भी इनमें से कोई भी आपको छाँह, दुःख, मृत्यु, बुढ़ापे से नहीं बचा सकता। तब क्या इनसे बचने का कोई उपाय नहीं है? है, जरूर है, आपके हैसियत के अंदर ही है? क्या है वह उपाय? आसान भी है, कठिन भी।

          कठिन समय में इंद्रजीत सिंह तुलसी की लिखी ये पंक्तियाँ याद कीजिये:

जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबहो शाम
कि रास्ता कट जाएगा मित्र, कि बादल छंट जाएगा मित्र

कि दुःख से झुकना न मित्र, कि इक पल रुकना न मित्र
जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबहो शाम

          मैं कई महीनों बाद दिल्ली से वापस कोलकाता पहुँचा। मुझे कोलकाता आए हुए कुछ ही दिन  हुए थे कि बड़े भाई साहब गिर पड़े और उनके कूल्हे की हड्डी चिटक है। उनके बच्चे बाहर रहते हैं। उनकी पूरी व्यवस्था हमने ही की। भाई साहब ईश्वर का शुक्र मनाते रहे कि हमारे आने के बाद गिरे। अगर हमारे आने के पहले गिर गए होते तो बहुत परेशानी होती। तकलीफ के कारण कोसने के बजाय वे ईश्वर के शुक्र गुजार थे कि हमारे आने के बाद गिरे।

जो जीवन से हार मानता, उसकी हो गयी छुट्टी
कि रूठे यार मना मित्र, कि यार को यार बना मित्र
न खुद से रह ख़फ़ा मित्र, खुदी से बने खुदा मित्र
जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबहो शाम

मैं और मेरी पत्नी अपनी वर्षों से सँजोई तमन्ना पूरी करने सड़क मार्ग से कोलकाता-विशाखापत्तनम-अरकू-केचला-चित्रकोटे छत्तीसगड़-वृन्दावन-दिल्ली का कार्यक्रम बना निकल पड़े। हमारी यात्रा बड़ी सुखद, उल्लास पूर्वक, आनंद दायक और हर्षोल्लास से बढ़ रही थी। हम अपने पहले पड़ाव, विशाखापत्तनम तक पहुँच गए थे और आगे का कार्यक्रम भी सुनिश्चित कर लिया था।  तभी अचानक पत्नी की तबीयत गड़बड़ा गई, उसे अस्पताल में भर्ती करना पड़ा, ऑपरेशन भी करवाया और अपना कार्यक्रम रद्द कर हम वापस लौट आए। शुक्र है ईश्वर का कि यह सब विशाखापत्तनम में हुआ, वहाँ अपना घर है, स्वास्थ्य और उपचार की पूरी सुविधाएं उपलब्ध हैं। सब कार्य सुचारु रूप से सम्पन्न हुआ और हम सकुशल अपने घर लौट आए। शुक्र है ईश्वर का कि यह सब विशाखापत्तनम में ही हुआ जहाँ अपना घर, लोग, स्वास्थ्य सुविधायें तथा डॉक्टर-अस्पताल आदि उपलब्ध थीं। अगर यह कहीं और रास्ते में हुआ होता तो यह सोच कर रूह काँप उठती है। शुक्र है ईश्वर का कि सही ठौर-ठिकाने पर ही पीड़ा हुई।

उजली उजली भोर सुनाती तुतलेय तुतलेय बोल
अन्धकार में सूरज बैठा अपनी गठरी खोल
कि उससे आँख लड़ा मित्र समय से हाथ मिला मित्र
जीवन चलने का नाम चलते रहो सुबहो शाम

         

परिस्थितियाँ – दुर्घटना सब वही थीं लेकिन इस सोच ने हमें न तो दुखी किया, न कमजोर बनाया और न ही हतोत्साहित किया। यह केवल अपनी-अपनी सोच का फर्क है। अगर सोच निर्मल है, ईश्वरार्पण है, खीज नहीं है, तो दुःख में  भी सुख है, छाँह में भी धूप है, मौत में भी जिंदगी है, सूर्यास्त भी सूर्योदय है, बुढ़ापे में भी जवानी है।

         हमारे जीवन में निश्चितता कभी नहीं होगी। कभी हमें जो प्रिय है वह होगा तो कभी अप्रिय, कभी ईष्ट - कभी अनिष्ट होगा ही। हमेशा जो हमें प्रिय है वही होता रहे यह कभी भी संभव नहीं है। यह उतार-चढ़ाव हमेशा होता रहेगा। इस जीवन में उतार-चढ़ाव, अप्रत्याशित मोड़ आते ही रहेंगे, अतः हमें अपना ध्यान परमात्मा की तरफ लगाना है ताकि हमें वापस घूमना न पड़े। जिंदगी तो ऐसे ही चलेगी। इसका सबसे अच्छा उदाहरण हमारे देश की सड़कें हैं। एकदम सपाट, सुंदर, चौड़ी सड़क पर कब कहाँ अंध मोड़, बैरियर, बम्प, खड्डे, साइकिल, उल्टी दिशा से वाहन आ जाएगा कुछ पता नहीं। यानी जीवन कभी एक समान नहीं होगा लेकिन हम अपने मन को समान रख सकतें हैं। बाहर हमेशा ही विषम रहेगा – सब दिन जात न एक समान – लेकिन अपने आंतर को ही हम  सम रख सकते हैं।

हिम्मत अपना दीन धर्म है, हिम्मत है ईमान
          हिम्मत अल्लाह, हिम्मत वाहेगुरु
                    हिम्मत है भगवान्,
जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबहो शाम

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पढ़ना, सुनना, गुनना, घुलना 

हम गीता के तीसरे अध्याय में हैं। श्री कृष्ण अर्जुन की शंका और मोह का नाश करने में लगे हैं। इसी क्रम में अनेक उपदेश के साथ-साथ ज्ञान की बातें भी बता रहे हैं। अर्जुन विचार कर रहा है कि भगवान इतना ज्ञान दे रहे हैं लेकिन फिर भी मानव उन्हें क्यों नहीं अपनाता, क्यों ये उनके आचरण में नहीं दिखता?

          इसके पहले कि अर्जुन प्रश्न करे भगवान उसकी शंका का समाधान कर देते हैं:-

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।

प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ।। ३३ ।।

सभी प्राणी प्रकृति  को प्राप्त होते हैं अर्थात् अपने स्वभाव  के परवश हुए कर्म करते हैं। ज्ञानवान् भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा?

          यानी, ज्ञान की बातें सुनकर, पढ़कर, गुनकर भी अज्ञानी ही नहीं ज्ञानी के स्वभाव में वह ज्ञान नहीं दिखता, क्योंकि हर मनुष्य अपनी प्रकृति के वश में होकर उसी के अनुसार आचरण करता है। हर मनुष्य की प्रकृति अपनी अलग-अलग होती है और यह प्रकृति उसे जन्म से मिलती है। जब तक मनुष्य उस ज्ञान के साथ घुल-मिल कर उसे आत्मसात नहीं कर लेता तब तक वह ज्ञान प्रकट नहीं होता। जैसे दूध में चीनी डाल देने मात्र से दूध में मिठास नहीं आती। क्योंकि चीनी तो दूध के बर्तन के पेंदे में  बैठ जाती है। जब उसी चीनी को मिलाया जाता है तब वह उसमें घुल-मिल जाती है, दूध चीनी को आत्मसात कर लेता है, तब उसमें मिठास आती है।

          मनुष्य को समझना चाहिए कि पढ़ना, सुनना और गुनना पर्याप्त नहीं बल्कि उसके अनुसार कर्म करना, उसे अपने कर्म में उतारना, उसके अनुरूप आचरण करना आवश्यक है। कर्म में आने पर ही वे ज्ञान दृष्टिगोचर होते हैं। अतः सिर्फ पढ़ने, सुनने, देखने, गुनने और आज की दुनिया में आगे फॉरवर्ड करने के साथ-साथ उसके अनुरूप कर्म भी कीजिये। यही महत्वपूर्ण है। अगर कर्म में अवतरित कर लिया तो फिर फॉरवर्ड करने की आवश्यकता नहीं। कर्म स्वयं उसे फॉरवर्ड करेगा।

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बचपन की भाषा                                                                   मैंने पढ़ा

वो मेरा इस धरती पर तीसरा दिन था... मां ने हुलसकर पूछा, 'कैसा है मेरा लाल ?' तो आया ने जवाब दिया, 'बड़े मजे में है.... मैं उसे तीन बार दूध पिला चुकी हूं।' मैं चिल्लाया, 'नहीं... ये झूठ बोल रही है। मैं बिलकुल भी मजे में नहीं हूं। सख्त होने की वजह से बिस्तर मुझे तकलीफ़ दे रहा है और इसके द्वारा पिलाया दूध कड़वा था, क्योंकि इसके स्तनों से भयंकर दुर्गंध आ रही थी। पर मेरी मां ने मेरी बात नहीं सुनी, क्योंकि वो मेरी भाषा नहीं समझती थीं। इक्कीसवें दिन जब मेरा नामकरण हुआ, तब पादरी ने मां से कहा, 'आपको खुश होना चाहिए, आपके बेटे ने ईसाई के रूप में जन्म लिया।' हैरानगी से भरकर मैंने पादरी से कहा, 'तब तो स्वर्ग में आपकी मां बहुत दुखी होंगी, क्योंकि... 'मगर चूंकि पादरी भी मेरी भाषा से अनजान था, वो मेरी बात नहीं समझ सका। सात साल की उम्र में एक नजूमी ने मेरी मां को बताया, 'आपका बेटा बड़ा होकर नेता बनेगा।' मैं फ़ौरन बोला, 'नहीं मैं केवल और केवल संगीतकार बनूंगा।' पर अफ़सोस इस बार भी कोई मेरी बात नहीं समझा।

          अब मैं तैंतीस बरस का हूं। मेरी मां, आया और उस पादरी का स्वर्गवास हो चुका है, लेकिन कल मुझे वो ज्योतिषी मिला। बातचीत के दौरान उसने कहा, 'मैं तो शुरू से जानता था कि तुम एक महान संगीतकार बनोगे। मैंने तुम्हारी मां को बताया भी था।' उसकी इस बात पर मैंने कुछ नहीं कहा, क्योंकि अब तक मैं भी बचपन की भाषा भूल गया था।

खलील जिब्रान

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जीवन की नदी में हर कहानी बह रही है...                                         मैंने पढ़ा

500 ईसा पूर्व इटली में दार्शनिकों का एक समूह था – ईलिया। इस समूह में एक दार्शनिक थे - परमेनीडीज (540-480 ई.पू.) उनका मानना था कि कोई चीज कभी ख़त्म नहीं होती। हर अस्तित्वमान चीज़ सदा अस्तित्व में रहती है। उनका कहना था कि ज्ञानेन्द्रियां हमारे सामने अंत का झूठ रखती हैं, पर एक दार्शनिक होने के नाते मेरा कर्तव्य है कि मैं हर भ्रम की कलई खोलूं।

          परमेनीडीज के समय में एक और दार्शनिक थे - हिरेक्लिटस (540-480 ई.पू.) उनका कहना था कि चीजें कभी ख़त्म नहीं होतीं, बस बदल जाती हैं। निरंतर बहाव या परिवर्तन ही संसार का आधारभूत लक्षण है। वे कहते थे, 'हर चीज बहती है। हम एक ही नदी को दोबारा नहीं देख सकते, क्योंकि हर बीतते क्षण के साथ नदी का बहाव नया हो जाता है और हमारी दृष्टि भी।'

          सिसली के दार्शनिक एम्पीडोक्लीज (490-430 ई.पू.) का मानना था कि संसार की रचना के चार स्रोत हैं – हवा, धरती, आग और पानी। जीवन की कहानी इन्हीं से फूटती है और नया रूप पाने के लिए इन्हीं में समा जाती है, कभी ख़त्म न होने के लिए...

(सबों का अपना नजरिया होता है देखने का, कहने का। उनमें विरोध नहीं होता, होना भी नहीं चाहिए। यह तो सुनने वाले पर निर्भर करता है कि उसने क्या समझा! हो सकता है, बात एक ही हो, सिर्फ कहने का ढंग अलग-अलग। महत्वपूर्ण है आपको क्या सही लगा और उसे आपने किस हद तक अपनाया।)

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तरीका                                                   लघु कहानी - जो सिखाती है जीना

एक अंधा व्यक्ति एक बड़ी हवेली के बाहर बैठकर भीख मांग रहा था। उसने अपने पास एक छोटा सा बोर्ड लगाया हुआ था, “मैं अंधा हूँ, कृपया मेरी मदद करें”। दोपहर होने चली थी और उसके कटोरे में कुछ ही सिक्के आए थे। तभी वहाँ से एक रचनाकार गुजरा। उसकी नज़र उस अंधे भिखारी और उसके बोर्ड पर पड़ी। उसने उसके बोर्ड पर लिखे हुए वाक्य को मिटा कर उस पर कुछ और लिखा और कुछ सिक्के डालकर चल दिया। शाम को वह व्यक्ति दुबारा वहाँ से लौटा। अब उस भिखारी के कटोरे में ढेर सारे सिक्के थे। भिखारी उसके कदमों की आहट पहचान गया। उसने उससे पूछा, तुमने बोर्ड पर क्या लिखा था? कुछ खास नहीं मैंने तुम्हारी ही बात को दूसरे तरीके से लिख दिया था, उस व्यक्ति ने जवाब दिया। उस साइन बोर्ड पर लिखा था, आज से बसंत शुरू हो गया, लेकिन मैं देख नहीं सकता

किसी भी बात को कहने का तरीका उसके उद्देश्य को पूरा करने में अहम भूमिका रखता है।

 (उजाले के गाँव में से)

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कारावास की कहानी - श्री अरविंद की जुबानी                                        धारावाहिक 

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। इसके रोचक अंश हम जनवरी २०२१ से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसकी सत्रहवीं किश्त है।)

 

(17)

हम जितने दिन अलग-अलग कोठरियों में बन्द थे उतने दिन केवल गाड़ी में मजिस्ट्रेट के आने से पहले एक घण्टा या आधा घण्टा और खाने के समय कुछ बातें करने का अवसर पाते। जिनका परस्पर परिचय या आलाप था वे इस समय कोठी (cell) की नीरवता और निर्जनता का प्रतिशोध लेते, हंसी, आमोद और नाना विषय की आलोचना में समय बिताते। लेकिन ऐसे अवसरों पर अपरिचितों के साथ बात करने की सुविधा नहीं होती इसलिए मैं अपने भाई बारीन्द्र और अविनाश को छोड़ और किसी से भी ज्यादा बात न करता, उनका हंसी-मजाक, उनकी बातें सुनता पर स्वयं उसमें भाग न लेता। किन्तु एक व्यक्ति बातचीत में मेरे पास खिसक आते। वे थे भावी मुखबिर (approver)  नरेन्द्रनाथ गोस्वामी। दूसरे लड़कों की तरह उनका स्वभाव न शान्त था न शिष्ट, वे थे साहसी और लघुचेता एवं चरित्र, वाणी और कर्म में असंयत। पकड़े जाने के समय नरेन गोंसाई ने अपना स्वाभाविक साहस और प्रगल्भता दिखायी थी, लेकिन लघुचेता होने के कारण कारावास का थोड़ा सा भी दुःख और असुविधा सहन करना उनके लिए असाध्य हो उठा था। वे थे जमींदार के बेटे अतः सुख, विलास और दुनीति में पले, वे कारागृह के कठोर संयम और तपस्या से अत्यन्त कातर हो गये थे, और यह भाव सब के सामने प्रकट करने में भी कुण्ठित नहीं हुए। जिस किसी भी उपाय से इस यन्त्रणा से मुक्त होने की उत्कट लालसा उनके मन में दिन-दिन बढ़ने लगी। पहले उन्हें यह आशा थी कि अपनी स्वीकारोक्ति का पत्याहार कर वे यह प्रमाणित कर सकेंगे कि पुलिस ने शारीरिक यन्त्रणा देकर दोष स्वीकार कराया था। उन्होंने हमें बताया कि उनके पिता इस तरह के झूठे गवाह जुटाने के लिए कृतसंकल्प थे। किन्तु थोड़े दिनों में ही और एक भाव सामने आने लगा। उनके पिता और एक मुखतार उनके पास बार-बार जेल में आने जाने लगे, अन्त में जासूस शमसुल आलम भी उनके पास आ बहुत देर तक गुप-चुप बातें करने लगे। ऐसे समय हठात् गोसाईं के कौतुहल और प्रश्न करने की प्रवृत्ति देख बहुतों के मन में सन्देह हुआ। भारतवर्ष के बड़े-बड़े आदमियों के साथ उनका परिचय या घनिष्ठता थी कि नहीं, गुप्त समिति को किस-किस ने आर्थिक सहायता दे उसका पोषण किया, समिति के और कौन-कौन सदस्य बाहर या भारत के अन्यान्य प्रदेशों में थे, अब कौन समिति का कार्य चलायेंगे, शाखा समिति कहाँ है इत्यादि अनेक छोटे-बड़े प्रश्न बारीन्द्र और उपेन्द्र से पूछते। गोसाईं की यह ज्ञानतृष्णा की बात अचिरात् सबके कर्णगोचर हुई और शमसुल आलम के साथ उनकी घनिष्ठता की बात भी अब गोपनीय प्रेमालाप न रह खुला रहस्य (open secret) हो उठी। इसे लेकर खूब आलोचना होती और किसी-किसी ने यह भी लक्ष्य किया कि हमेशा पुलिस-दर्शन के बाद ही इस तरह के नये-नये प्रश्न गोसाईं के मन में चक्कर काटते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि उन्हें इन प्रश्नों का सन्तोषजनक उत्तर नहीं मिला। जब पहले-पहल आसामियों में यह बात प्रचारित होने लगी तब गोसाईं ने स्वयं स्वीकार किया था कि पुलिस उनके पास आ "सरकारी गवाह" बन जाने के लिए उन्हें नाना उपायों से समझाने की चेष्टा कर रही है। कोर्ट में उन्होंने मुझसे एक बार यह बात कही थी। मैंने उससे पूछा था, “आपने क्या उत्तर दिया।" वे बोले, "मैं क्या मान लूँगा! मानने पर भी भला मैं क्या जानता हूँ जो उनकी इच्छानुसार साक्ष्य दूंगा?" उसके कुछ दिन बाद उन्होंने फिर से जब इस बात का उल्लेख किया तो देखा कि यह बात बहुत आगे बढ़ चुकी है। जेल में Identification Parade (पहचान परेड) के समय मेरी बगल में गोंसाई खड़े थे, तब उन्होंने मुझसे कहा: "पुलिस केवल मेरे पास ही आती है।" मैंने उपहास करते हुए कहा, “आप यह बात कह क्यों नहीं देते कि सर ऐन्दू फ्रेजर गुप्त समिति के प्रधान पृष्ठपोषक थे, इससे उनका परिश्रम सार्थक होगा।" गोसाई बोले, "ऐसी बात तो मैंने कह ही दी है। मैं उन्हें कह चुका हूँ कि सुरेन्द्रनाथ बेनर्जी हैं हमारे प्रधान (head)  और मैंने उन्हें भी एक बार बम दिखाया है।" स्तम्भित हो मैंने उनसे पूछा, "यह बात कहने की जरूरत क्या थी ?" गोसाईं बोले, "मैं..... का श्राद्ध करके रहूँगा उस तरह की और भी बहुत सी खबरें मैंने दी है। मरें साले प्रमाण (corroboration)  खोजते खोजते क्या पता, इस उपाय से, मुकद्दमा फिस ही हो जाये इसके उत्तर में मैंने केवल इतना कहा था, "ऐसी शरारत से बाज़ आइये। उनके साथ चालाकी करते-करते खुद ही ठगे जायेंगे।" पता नहीं गोसाईं की यह बात कहाँ तक सच थी। और सब आसामियों की यह राय थी कि हमारी आँखों में धूल झोंकने के लिए उन्होंने ऐसा कहा था।  मेरा ख्याल था कि तब तक गोसाईं  मुखबिर (approver) होने के लिए पूर्णतया कृतनिश्चय नहीं थे, यह ठीक है कि इस विषय में वे बहुत आगे बढ़ चुके थे, किन्तु पुलिस को ठग उनका केस मिट्टी कर देने की आशा भी उन्हें थी। चालाकी और असदुपाय से कार्यसिद्धि ही दुष्प्रवृत्ति की स्वाभाविक प्रेरणा है। तभी से समझ गया था कि गोसाईं पुलिस के वश हो सच झूठ उन्हें जो भी चाहिये, वह कह अपने को बचाने की चेष्टा करेंगे। एक नीच स्वभाव का और भी निम्नतर दुष्कर्म की ओर अध:पतन हमारी आँखों के सामने नाटक की तरह अभिनीत होने लगा। मैंने लक्ष्य किया कि किस तरह गोसाईं का मन दिन-प्रतिदिन बदलता जा रहा है, उनके मुख, भावभंगिमा और बातचीत में भी परिवर्तन हो रहा है। विश्वासघात कर आने संगी-साथियों का सर्वनाश करने के लिए वे जो कुछ जुटा रहे थे उसके समर्थन के लिए क्रम से नाना अर्द्धनैतिक और राजनीतिक युक्तियां बाहर करने लगे। ऐसी मनोरंजक मनोवैज्ञानिक अध्ययन (interesting psychological study) प्रायः सहज ही हाथ नहीं लगती।                                                                                              (क्रमश:, आगे अगले अंक में)

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