मंगलवार, 1 नवंबर 2022

सूतांजली नवंबर 2022

 सूतांजली

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वर्ष : 06 * अंक : 04                                                                नवंबर  * 2022

गलत आस्थाओं से बड़ा 

कोई दैत्य नहीं हो सकता, और

झूठी मर्यादाएं

सबसे ज्यादा भयानक होती हैं

नित्शे

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अस्तित्व                                                                   मेरे विचार

हे मेरे आराध्य, मैं बहुत परेशान हूँ, दुखी हूँ, मेरे पास लोगों के उत्तर नहीं हैं। सब पूछते हैं कि अगर ईश्वर है तो वह कहाँ है? दिखता क्यों नहीं? आता क्यों नहीं? सब इसे मेरी कपोल कल्पना बताते हैं, मेरा ही नहीं तुम्हारा भी मज़ाक उड़ते हैं। एक बार- सिर्फ एक बार तो आ जाओ, सब को दिखा दो कि हाँ तुम हो, तुम दिखते हो, तुम आते हो। कहते हैं कि भगवान भक्तों के तारणहार हैं, भक्तों की सुनते हैं, भगवान से भगवान के भक्त का स्थान  ऊंचा है, तब आ जाओ, एक बार आ जाओ.......

तभी एक मृदुल-कोमल स्वर प्रस्फुटित हुआ, मैं कहाँ नहीं हूँ, कहाँ नहीं दिखता हूँ, कहाँ नहीं आता हूँ? अब अगर देखते हुए भी कहो कि नहीं दिख रहे हो, तो इसमें मेरा क्या दोष?

सेव के बीज में क्या तुम्हें सेव का पेड़ दिखता है? वही मैं हूँ,

अणु और परमाणु दिखते हैं? उसकी ताकत मैं ही तो हूँ।

रेडियो की तरंगों में तैरने वाले शब्द दिखते हैं? वे मैं ही तो हूँ।

पानी में छिपी बिजली कौन है? मैं ही तो हूँ।

यही नहीं बादलों में छिपी गर्जना और बिजली कौन है? मैं ही तो हूँ।

तुम्हारी रसोई में जलने वाली गैस का ताप भी मैं ही तो हूँ।

तुम भले ही मुझे सीधे-सीधे नहीं देख रहे हो लेकिन मेरे हर कार्य को होते हुए तो देख ही रहे हो। तुम मुझे मंदिर, गिरजा, गुरु-द्वारा, चर्च, मस्जिद वगैरह में देख रहे हो, लेकिन मैं तो वहाँ हूँ ही नहीं। तु म मुझे वहाँ देखो जहाँ मैं हूँ। तुम मुझे उन पाँच तत्वों में खोजो, जो इस सृष्टि के अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं। ये हैं:

१. धरती माँ, जिसने इस सृष्टि के निर्माण के लिए सब कुछ दिया और सब सह लेती है,

२. जल, जो हर जीव-जानवर-पेड़ के जड़ में जाकर उन्हें आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है,

३. सूर्य, अपनी गरमी से प्राणी मात्र को विकसित, अंकुरित और परिपक्व करता है,

४. वायु, जीवन के लिए आवश्यक श्वास प्रदान करता है, और

५. आकाश, इस सृष्टि को बनाये रखता है।  

मैं हर किसी को, हर जगह, हर समय बिना किसी भेद भाव के मिलता हूँ। अतः मेरे अस्तित्व को समझ ही नहीं पाते।

अगर मैं हर किसी में हूँ तब तुम मुझे अलग से बाहर क्यों देखना चाहते हो? क्या तुम इतना भी नहीं समझते कि अगर मैं सब में से बाहर आ जाऊँ तो यह पूरी सृष्टि, तुम्हारे समेत नष्ट हो जाएगी?  तब मुझे कौन देखेगा? मुझे देखने के लिए कौन बचेगा?

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प्रकृति की शक्तियाँ                                                       मेरे विचार

हम इस धरा को स्थिर मानते हैं। यह कहा भी जाता है कि धरती की तरह स्थिर रहो, गंभीर रहो। जिस धरातल पर हम खड़े है, बैठे हैं, चल रहे हैं एवं दिन भर अनेक अन्य कार्य कर रहे हैं अगर उसमें जरा भी गति आ जाए तो क्या हम वह सब सुचारु रूप से कर पाएंगे जिन्हें हम निरंतर कर रहे हैं? चलती रेल में, गाड़ी में, हवाई जहाज में, घूमते स्टेज पर हमारा संतुलन बिगड़ जाएगा। हमारा ध्यान-एकाग्रता तिरोहित हो जाएगी।  लेकिन क्या यह धरा स्थिर है? इसकी गति है 1000 मील प्रति घंटा यानी 450 मीटर प्रति सेकेंड। यह तो केवल एक गति है, अपनी धुरी पर घूमने की। इसके अलावा यह सूर्य के भी चारों ओर चक्कर लगाती रहती है, अनवरत। लेकिन इसके बावजूद हमें इसका भान तक नहीं होता। क्यों? इसका कारण है धरती की विशालता। इसकी इस विशालता के कारण हमें यह धरती स्थिर प्रतीत होती है।  हमारे अपने आकार और धरा के आकार की कोई तुलना नहीं की जा सकती और इसी सापेक्षता के कारण हमें इसकी गति का अनुभव नहीं होता।

          कहा जाता है कि प्रकृति की शक्तियाँ अन्धी और उग्र होती हैं। लेकिन बात ऐसी बिलकुल नहीं है। हम अपने सापेक्ष अनुपातों के आधार पर 'प्रकृति के बारे में ऐसा निर्णय कर बैठता है। ज़रा ठहरो, एक उदाहरण लें। जब भूकम्प आता है तो बहुत से टापू पानी में डूब जाते हैं और हजारों आदमी मर जाते हैं। हम कहते हैं: “यह प्रकृति दैत्य है।" मानवीय दृष्टि से यह 'प्रकृति' दैत्य है। उसने किया क्या? वह एक विभीषिका ले आयी। लेकिन ज़रा देखो, ज़रा कूदने या दौड़ने या ऐसा ही कुछ करने में जब हमें अच्छी चोट लग जाये तो हम काले, नीले हो उठते हैं। हमारे कोषाणुओं के लिए यह ऐसी ही चीज़ है जैसे भूकम्प। हम बहुत सारे कोषाणुओं को नष्ट कर देते हैं। यह अनुपात का प्रश्न है। हमारे लिए, हमारी छोटी-सी चेतना के लिए, बहुत ही छोटी चेतना के लिए यह बहुत भयानक चीज़ मालूम होती है, लेकिन आख़िर तो यह धरती पर (विश्व में भी नहीं), किसी जगह अस्त-व्यस्तता ही है। हम केवल धरती की बात कर रहे हैं। यह क्या है? कुछ भी नहीं, विश्व के अन्दर एक ज़रा सा खिलौना। और अगर हम इस विश्व की बात करें तो लोकों का गायब हो जाना भी क्या है? - बस, जरा-सी अस्त व्यस्तता। यह कुछ भी नहीं है। अगर हम अपनी चेतना को जरा सा विकसित करें तब बात तुरंत समझ आ जाती है कि ये प्राकृतिक आपदाएँ धरती की दृष्टिकोण से ही, विश्व दृष्टिकोण न लें तो भी, नगण्य सी हैं, अति साधारण हैं। ठीक ऐसी ही जैसे हाथी पर एक मक्खी बैठ जाए तो हाथी को इसका भान तक नहीं होता। अगर हो सके तो हमें अपनी चेतना को विस्तृत बनाना चाहिये। 

         एक व्यक्ति था जो अपनी चेतना को विस्तृत करना चाहता था। उसने एक तरकीब खोज निकाली थी। वह रात को खुले में लेट जाता और तारों को देखा करता था, उनके साथ तादात्म्य करने की कोशिश करता था और विशाल जगत् की गहराई में चला जाता था और इस तरह अनुपात का भाव पूरी तरह खो देता था। वह धरती और उसकी सभी छोटी-मोटी चीज़ों की व्यवस्था भूल कर आकाश के जैसा विशाल बन जाता था - हम इसे विश्व के जैसा विशाल नहीं कह सकते क्योंकि हम विश्व के एक छोटे-से टुकड़े को ही देखते हैं, लेकिन वह तारों भरे आकाश जैसा विशाल बन जाता था और तब, सामयिक रूप में सभी छोटी-मोटी अ-पवित्रताएँ झड़ जाती हैं और तब हम चीज़ों को एक बड़े पैमाने पर समझ सकते हैं। यह एक बड़ी अच्छी दिमागी कसरत है।

          ये बहुत अच्छी कसरत है, आवश्यक भी। अपनी तुच्छता का अनुभव करने के लिए, अपनी चेतना को विस्तृत करने के लिए। दोनों में तुलना करने की कोशिश करो तब हम देखेंगे - हम एक सड़क पर चल रहे हैं। चींटियों की एक सेना एक बिल से दूसरे बिल की ओर जा रही है (हम किसी से बातें कर रहे हों और नीचे नहीं देखते); बड़ी लापरवाही से एक पैर रखते हैं, फिर दूसरा, और हम जाने बिना ही सैकड़ों चींटियों को मार डालते हैं। अगर हम चींटी होते तो कहते: “क्या ही दुष्ट और पाशविक शक्ति है यह!" हम तो सिर्फ़ चल रहे हैं, धीरे-धीरे, बेखबर, हमने ध्यान नहीं दिया। ऐसी सत्ताएँ भी हैं जिनके लिए हम केवल छोटी-छोटी चींटियों के समान हैं। वे रखती हैं, पहला कदम और फिर दूसरा, और हजारों आदमी मर जाते हैं। उन्हें इसकी ख़बर तक नहीं होती! उन्होंने यह जान-बूझकर नहीं किया है। वे बस चल रही थीं। बस, इतना ही।

          जब हम लड़ते हैं तो इसका मतलब है युद्ध। छोटे युद्ध होते हैं और बड़े युद्ध होते हैं। धरती पर मनुष्यों का यह युद्ध है क्या? अगर उन सत्ताओं की दृष्टि से देखा जाये जिनके लिए मनुष्य चींटी से बढ़ कर नहीं हैं...। जब हम चींटियों का युद्ध देखते हैं तो वह हमें बिलकुल स्वाभाविक लगता है! हम कह सकते हैं, “देखो, चीटियाँ लड़ रही हैं।"  तो विश्व की विशाल शक्तियों के लिए धरती पर युद्ध करते हुए मनुष्य लड़ती हुई चीटियों जैसे हैं, यह कुछ भी नहीं है। हमें चीज़ों का मूल्यांकन मानवीय चेतना के माप से नहीं करना चाहिये...। मनुष्य के लिए प्रकृति विकराल वस्तु है। । वह अत्यन्त विकट है। सभी शक्तियाँ उसकी सेवा में हैं, सभी क्रियाओं की सृष्टि वही करती है। और हम बस उतना ही जानते हैं जो इस धरती पर हो रहा है! हम  प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, एक प्रकार के अनुमानात्मक ज्ञान से यह जानते हैं कि बाक़ी विश्व में क्या हो रहा है। ये मानवीय चेतना के अनुपात में विकट और विकराल शक्तियों की क्रीड़ाएँ और संघर्ष हैं। ये ऐसी चीजें हैं जो मानवीय अवधि की तुलना में अनन्त काल तक रहती हैं। तो ये काल में विशाल हैं, देश में विशाल हैं और मानवीय चेतना के लिए ये लगभग अबोधगम्य हैं। लेकिन इन शक्तियों के लिए मानवीय आकार और गतियों का सचमुच वही अनुपात है (शायद उससे भी कम) जो हमारे लिए चींटियों के झुण्ड का है।

          उदाहरण के लिए, आँधी को लो जो चला करती है। वैज्ञानिक हमसे कहते हैं, “आँधियाँ प्रकृति की शक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं और अमुक-अमुक घटनाओं का परिणाम हैं।” वे गरमी और ठण्ड, ऊँचे और नीचे आदि की बात करेंगे और हमसे कहेंगे: “आँधी चलने का यह कारण है; ये वातावरण में पैदा होने वाली हवा की लहरें हैं।" लेकिन बात ऐसी नहीं है। उनके पीछे सत्ताएँ होती हैं। वे इतनी बड़ी हैं कि उनका रूप हमसे बच निकलता है। यह ऐसा ही होगा जैसे किसी चींटी से कहा जाये कि मनुष्य के रूप का वर्णन करे - वह न कर पायेगी, कर पायेगी क्या? वह अधिक-से-अधिक छोटी उँगली की छोटी-सी पोर को देखती है और पैर पर चलती है—यह एक लम्बी यात्रा है और वह यह न जान पायेगी कि मनुष्य का आकार कैसा होगा। तो यहाँ भी वही चीज़ है। ये शक्तियाँ जो आँधी, मेह, भूकम्प आदि ले आती हैं, अभिव्यक्तियाँ हैं - चाहो तो संकेत कह लो इन्हें—इस प्रकार की सत्ताओं की गतियों की अभिव्यक्तियाँ हैं जो भयावह रूप से भीमकाय हैं। हम मुश्किल से ही उनके पैर का अन्तिम सिरा देखते हैं और उनके विस्तार का अन्दाज़ा नहीं लगा सकते।

          हम जैसे-जैसे अपनी चेतना का विकास करते जाते हैं हमारा दृष्टिकोण भी विशाल होता जाता है। अति महत्वपूर्ण घटनाएँ भी नगण्य और सूक्ष्म प्रतीत होने लगती हैं। हमारा प्रकृति से, उन सत्ताओं से साक्षात्कार होने लगता है, दृष्टि विशाल हो जाती है।

(श्रीमाँ के उत्तरों पर आधारित)

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रहम के देवता                 

ईश्वर प्रेम, आस्था और विश्वास का तालमेल है। यह रहम है, रहमान है। दीनबंधु है, दयानिधि है। अगली बार कभी मन में ईश्वर की तलाश का प्रश्न उभरे तो किसी को माफ करके  देखिएगा......आपको अपनी रहम में ही उस खुदा के दीदार होंगे। किसी रोते हुए के चेहरे पर हंसी की रंगोली बनाकर निहारिए, यक्नीनन जगदीश्वर आपकी आँखों के सामने होंगे। उनका कोई आकार नहीं है। वे कण-कण में व्याप्त हैं.... हर दुखियारे की हंसी में, प्रेम की तलाश में भटकते हृदयों में, स्वयं के पूर्ण होने की यात्रा कर रहे साधकों में, संगीत की झंकार में, गायन की मिठास में...... ।

          एक धर्माचार्य कहते थे – सुहृद के आत्म-बल में ईश्वर विराजते हैं, क्योंकि सद्गुणों के, सतप्रवृत्तियों के, श्रेष्ठताओं के समुच्चय हैं। यह बात राम और कृष्ण के रूप में प्रमाणित भी हो चुकी है। मनुष्य योनि में जन्मे श्री राम और श्री कृष्ण ने अपने गुणों को उस ऊंचाई तक विकसित किया, मानवता की इस तरह से रक्षा की कि ईश्वर माने गए.....सो आप दृढ़ हों तो खुद को भी ईश्वरत्व की ओर ले जा सकते हैं।

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शनिवार, 1 अक्टूबर 2022

सूतांजली अक्तूबर 2022

 सूतांजली

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वर्ष : 06 * अंक : 03                                                                अक्तूबर  * 2022

मुट्ठीभर संकल्पवान लोग,

जिनकी अपने लक्ष्य में दृड़ आस्था है,

इतिहास की धारा बदल सकते हैं

महात्मा गांधी

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पहली सीढ़ी...... शिक्षा का दायित्व....... वसंत                        मैंने पढ़ा

अभी-अभी दो कहानियाँ पढ़ीं, नवनीत में। दो नहीं बल्कि तीन। तीनों को एक साथ मिला कर पढ़ा, तीनों को एक दूसरे के साथ जोड़ कर पढ़ा। बहुत कुछ कहती हैं ये कहानियाँ-संस्मरण-घटनाएँ। मुझे लगता है आप भी समझ जाएंगे।

         पहली सीढ़ी

“एक राजकुमार जेन गुरु के पास शिक्षा प्राप्त करने पहुंचा और उन्हें प्रणाम कर बैठ गया और बोला - 'मुझे ज्ञान चाहिए और तुरंत' गुरु ने कहा- 'ठीक है कुछ प्रबंध करते हैं। पूछने पर पता चला कि राजकुमार को एक ही काम अच्छी तरह करना आता है और वह है शतरंज खेलना। जेन गुरू राजकुमार और अपने एक शिष्य, जिसे शतरंज का थोड़ा-बहुत ज्ञान था, के बीच एक बाजी का प्रस्ताव रखते हैं। शर्त यह होगी कि जो हारेगा उसका गला काट दिया जायेगा। खेल शुरू हुआ। राजकुमार शुरूआत से ही अपने प्रतिद्वंद्वी पर हावी हो गया। पर थोड़ी ही देर बाद उसके मन में विचार आया कि मेरे कारण इस बेचारे शिष्य को अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा। उसे एक तरकीब सूझी कि वह जान-बूझकर गलत चालें चलेगा। लेकिन खराब खेलना उसने सीखा नहीं था। अतः खराब खेलने के लिए उसे बहुत एकाग्रता की ज़रूरत पड़ी। उस एकाग्रता के कारण वह पसीने से तर-बतर हो गया। जेन गुरु ने यह सब देखा तो खेल रुकवा दिया और बोले 'आज का पाठ समाप्त हुआ। आज तुमने दो महत्त्वपूर्ण बातें सीखीं - करुणा और एकाग्रता - यह शिक्षा की पहली सीढ़ी है।”

शिक्षा एक अमोघ शक्ति है जिसका प्रयोग विद्यार्थी अपनी क्षमता के अनुसार करता है। अतः उसके हाथ को मजबूत करने के पहले उसको साधना आवश्यक होता है, अन्यथा उस शिक्षा का प्रयोग निर्माण के बदले  विध्वंस के लिए होता है। हमने योग को योगा बना कर अधूरे ज्ञान को पूरे विश्व में फैला दिया। योग (अष्टांग योग) के आठ चरण हैं। पहला चरण है यम और दूसरा नियम। यम यानि अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। नियम यानि शौच (शुद्धता), संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान।  इन दो के बाद आता है तीसरा आसन और चौथा प्राणायाम। लेकिन इसके प्रथम दो मूल पाठ यम-नियम को छोड़ हम सीधे तीसरे और चौथे अध्याय आसन-प्राणायाम पर पहुँच गए।

यम-नियम से मरहूम विद्यार्थी को हमने सीधे आसन और प्राणायाम का पाठ पढ़ाना प्रारम्भ  कर दिया। फलस्वरूप शिक्षार्थी इस शक्ति का प्रयोग विध्वंस के लिए भी कर रहे हैं।  

अभी अपने पढ़ा जेन गुरु ने शिक्षा की शुरुआत कैसे की। और अब:

         शिक्षा का दायित्व

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद एक नाज़ी यातना शिविर में एक पत्र पाया गया था। पत्र में लिखा था, 'प्रिय अध्यापकों, मैं यातना-शिविर में बच जाने वालों में से एक हूँ। मेरी आंखों ने वह देखा है जो किसी को नहीं देखना चाहिए। पढ़े-लिखे इंजीनियरों ने गैस चैम्बर बनाये, उच्च शिक्षा प्राप्त डॉक्टरों ने बच्चों को ज़हर दिया, नवजात शिशुओं को मारने वाली नर्सें ही थीं। औरतों-बच्चों को मारने वाले स्नातक और स्नातकोत्तर थे। इसलिए मैं शिक्षा पर संदेह करता हूं। मेरी प्रार्थना है, अपने विद्यार्थियों को मनुष्य बनना सिखाइए। आपके प्रयास पढ़े-लिखे राक्षसों के निर्माण के लिए नहीं होने चाहिए। शिक्षा तभी महत्वपूर्ण है जब वह हमारे बच्चों को बेहतर इंसान बनाये।

शिक्षा के साथ-साथ शिक्षा का दायित्व बताना आवश्यक है। केवल अधिकार ही नहीं कर्तव्य का पाठ भी पढ़ना जरूरी है। क्या आप एटम बम बनाने की विधि हर किसी को बताएँगे? पश्चिमी विचारों के प्रवाह में पड़कर हमने इतना तो याद कर लिया कि सब को पढ़ना-लिखना सिखा देना चाहिए, पर उसके हानि लाभ का विचार नहीं करते। गांधी ने इसीलिए शिक्षा का विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि शिक्षित करने के पहले हमें शिक्षित करने का उद्देश्य निश्चित करना होगा, यह जानना होगा कि किसे, क्या और क्यों पढ़ना है। पढ़े-लिखे दानव पैदा करने के बजाय अनपढ़ मानव बेहतर हैं।

यह सोच गलत है कि आज की शिक्षा से नम्रता-करुणा-दया-एकाग्रता अपने आप आ जाती है। हाँ, ये हर मनुष्य में हैं लेकिन इन्हें जाग्रत करना पड़ता है, इन्हें लाना पड़ता है। बसंत भी अपने आप नहीं आता, लाना पड़ता है। गलत कह रहा हूँ, तो अब तीसरी बात पढ़िये :

        वसंत को लाना पड़ता है

एक विरोधाभास-सा है, बाहर की दुनिया और भीतर कहीं उमंगे उत्साह में। मन मुस्काने का कर रहा है और कहीं कुछ है जो उसे रोक रहा है। भीतर, कहीं से एक आवाज़ सी उठती है यह कहती हुई कि वसंत आता कब है, उसे तो लाना पड़ता है। यह सही है कि ऋतुओं के क्रम में वसंत की अपनी जगह है। ऋतु के अनुरूप ही पत्ते भी चहकते हैं, फूल भी खिलते हैं। हवा भी महकती है। हां, यह सब दिख रहा है। पर वसंत तो तब उतरता है जीवन में, जब मन चहके, भीतर कहीं जीवन के प्रति उत्साह उमड़े और बहती हवा गाल थपथपाते हुए कहे..... कि दशाश्वमेध घाट का आखिरी पत्थर कुछ और मुलायम हो गया है, सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आंखों में एक अजीब सी चमक है, राह चलता हर व्यक्ति मुसकुराता सा प्रतीत होता है, यह चराचर में वसंत के उमड़ने की स्थिति है।

.....वसंत के बीज को हवा और पानी देने की आवश्यकता है, खाद देने की आवश्यकता है। यह हवा, यह पानी, यह खाद उस जिजीविषा का नाम हैं जो ज़िंदा होने और ज़िंदा रहने के अंतर को समझाती है। सांस तो आदमी लेता रहेगा, पर यह सांस सार्थक तब बनेगी जब सांस में आदमी उस गरमाहट को महसूस कर सकेगा जो मां की गोद में मिलती है। एक सुरक्षा का अहसास देती है यह गर्मी और आश्वासन भी कि जीवन को बेहतर बनाया जा सकता।

..... धूप, हवा, पानी, यह सब तो प्रकृति देती है हमें, पर जो जादुई और रासायनिक क्रिया इन्हें जीवन का संबल बना देती है, उसे सक्रिय करना हमारे अपने हाथ में है। सच बात तो यह है इस सक्रियता का रहस्य इस बात को समझने में है कि जीवन ऋतुओं का इंद्रधनुष है। इस इंद्रधनुष के रंग अपने समय पर चहकते-महकते तो हैं पर इस प्रक्रिया का अनुभव करना पड़ता है- कोशिश करनी पड़ती है। इस अनुभव को जीने की। यह अनुभव तब होता है जब हम जीवन को वसंत-मय बनाने के प्रति सजग होते हैं। विपरीत परिस्थितियां एक चुनौती हैं इस सजगता के लिए। इस चुनौती को स्वीकार करना ही जीना कहलाता है। जब हम इसे स्वीकार करते हैं तब जीवन में वसंत खिलता है। आता नहीं है वसंत, जीवन में उसे लाना पड़ता है

तब साहब, वसंत आता नहीं है लाया जाता है। समयानुसार प्रकृति तो वसंत में सज जाती है लेकिन  हाँ उसके साथ समरस नहीं हुए तो वसंत नहीं आता। पिछले दो वर्षों में महामारी के चलते वसंत आया तो सही लेकिन पता ही नहीं चला। शिक्षा हासिल कर ली तो शैक्षिक उपाधि तो मिली लेकिन अगर हृदय समरस नहीं हुआ, निर्माण का उत्साह नहीं बना, तो शिक्षित नहीं हो पाये।

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....वाद पर विवाद                                                        मेरे विचार

 वाद!.... न जाने कितने और कैसे-कैसे। और-तो-और  वाद पर विवाद भी। व्यक्ति-वाद, समाज-वाद, राष्ट्र-वाद, साहित्य-वाद, विचार-वाद! पूरब, पश्चिम और मध्य वाद; पूर्व-मध्य, मध्य-पूर्व, पश्चिम-मध्य, मध्य-पश्चिम वाद भी हैं। अपने दस दिशाएँ मानते हैं। तीन पर कब्जा हो चुका है, सात अभी भी उपलब्ध हैं। देर-सवेर वे भी शायद किसी-न-किसी की संपत्ति हो जायेंगी। कोई एक को मानता है तो कोई दूसरे को। इन में कट्टर-वादी और नरम-वादी भी हैं। इनमें तीखी बहसें भी होती हैं, और जब बहस में उतरते हैं तब न अच्छा-अच्छा रहता है और न बुरा-बुरा। न यह ध्यान रहता है कि तर्क है या कुतर्क।  क्या सही है और क्या गलत की अनदेखी कर, बस एक ही मुद्दा रहता है सामने वाले को गलत और अपने को सही सिद्ध करना। एक को केवल अच्छाई-ही-अच्छाई दिखती है तो दूसरे को केवल बुराई-ही-बुराई। इस तथ्य का विस्मरण हो जाता है कि हर किसी में अच्छाई और बुराई साथ-साथ होती है। दूसरे की अच्छाई को स्वीकार करने में हीनता और अपनी बुराई मनाने में अपमान का अनुभव होता है।

          नित्शे का कहना है, आत्मा हमारी चेतना से कहती है – यह कष्ट है; इसे महसूस करो, और हम यातना महसूस करने लगते हैं। वह कहती है – यह सुख है और हमें वह सुख लगने लगता है  लेकिन फसाद की जड़ तो यह है कि एक की आत्मा को जिसमें सुख दिखता है, दूसरे की आत्मा को उसी में दुःख नजर आता है। बस फिर वे दोनों आत्मा-यें बिना विचार किए आपस में भीड़  जाती हैं।

          गाँधी कइयों को बड़ा सुख देते हैं तो बहुतों को कष्ट। दोनों तरफ कट्टर-वादियों को कमी भी नहीं है। गाहे-बगाहे, उनके बीच वाद-विवाद होते ही रहते हैं। दुःख की बात तो यह है कि इनमें से अधिकतर तो ऐसे लोग हैं जिन्हें गांधी के बारे में जो भी थोड़ी-बहुत जानकारी है वह सिर्फ व्हाट्सप्प और सोशल मीडिया से मिली विकृत जानकारी है। मेरे अपने अनेक दोस्त, मित्र और परिचित हैं। वे मेरे वाद से परिचित हैं। जब भी मौका मिलता है मुझे उकसाते हैं, मैं कुछ बोलूँ, बहस करूँ। लेकिन मैं चुप-चाप सुन लेता हूँ। कुछ देर में समझ जाते हैं कि मैं उनके साथ बहस नहीं करूंगा, कुछ नहीं बोलूँगा। और हम मुसकुराते हुए अन्य विषयों पर मुड़ जाते हैं। 

          एक बार गाँधी बंगाल के किसी प्रांत में एक सभा को संबोधित कर रहे थे। तभी उस सभा-स्थल के नजदीक से मार्क्सवादियों का एक जुलूस निकला। नारे लगा रहा था – गाँधी-वाद मुर्दाबाद’, गाँधी-वाद का नाश हो। गाँधी वहीं सभा स्थल से ही बोले, ठहरो, ठहरो मैं भी आता हूँ। मैं भी तुम्हारे साथ हूँ क्योंकि गाँधी-वाद जैसी न कोई विचार-धारा है न ही कोई वाद

          गांधी कहते हैं, न मैंने कोई नई बात कही है और न ही ऐसे किसी वाद का समर्थक या प्रचारक हूँ। सत्य, अहिंसा, सौहार्द, अपरिग्रह.... जैसी बातें मेरी नहीं हैं। ये सदियों से चली आ रही हैं। विश्व के विभिन्न धर्मों से ही मैंने ये बातें सीखी हैं और मैं इन पर अमल करता हूँ। अपने अनुभव से जो समझा हूँ, सीखा हूँ वही करता हूँ, कहता हूँ। इतना ही नहीं, मैं यह भी कहता कि मैंने जो कहा वह अंतिम नहीं है। मैं रोज-रोज सीख रहा हूँ। इस कारण मेरे कहे में विरोधाभास भी मिलेगा। मैं यही कहता हूँ कि मैंने जो बात अंत में कही है उसे ही सही मानी जाए। क्योंकि जैसे-जैसे मैं  सीखता गया, जानता गया, समझता गया, मेरे विचरों को भी नई दिशा मिलती गई। और अंत में जो कहा वह भी अंतिम सत्य नहीं है। मैं यहीं तक पहुंचा हूँ, तुम्हें यहाँ रुकना नहीं है, आगे बढ़ना है और इसके आगे का सत्य जानना है। इस अवस्था में  क्या गाँधी-वाद जैसे किसी वाद का स्थान है? गाँधी-वादी तो वे हैं जो वहीं रुक गए। उसे ही अंतिम सत्य मान लिया। उन्होंने सत्य के प्रयोग को आगे बढ़ाया ही नहीं।  

          अभी कुछ समय पहले एक मैनेजमेंट गुरु का वीडियो काफी प्रचलित हुआ जिसमें उन्होंने अपने किसी इंटरव्यू की चर्चा की। उनसे पूछा गया कि क्या वे गाँधी-वादी हैं? उन्होंने प्रति-प्रश्न किया कि गाँधी-वाद क्या है? अब, जब प्रति-प्रश्न किया गया और बात आगे बढ़ानी भी है, तो जो है ही नहीं, उसके व्याख्या कर दी गई। गुरु ने उस व्याख्या को पकड़ कर यह घोषणा कर दी कि न राम  गाँधी-वादी थे, न कृष्ण और न मैं गाँधी-वादी हूँ। वे न गांधी को समझ सके, न कृष्ण को न राम को।

          क्या आप मुझे बताएँगे कि कौन से धर्म में सत्य, अहिंसा, सौहार्द, अपरिग्रह.... नहीं है? कौन सा समुदाय, संप्रदाय, सभ्यता, संस्कृति इनसे इंकार करेगी? हाँ, यह जरूर है कि अपने-अपने देश-काल के अनुसार किसी ने सत्य पर ज़ोर दिया तो किसी ने अहिंसा पर, किसी ने किसी और पर। लेकिन सब में कम या ज्यादा इन सब का संपुट है।

हम गाँधी से प्रश्न करते हैं, उन्हें उलाहना देते हैं:

अहिंसा तो कमजोरों के लिए हैं, इसने तो हमें निपुंसक बना दिया।

सत्य से क्या फायदा, आज के जुग में यह नहीं चलता।

सौहार्द भाई चारा अतीत की बातें हैं, हम मिट जाएंगे।

“अगर तुम्हारे गाल पर एक थप्पड़ मारे तो तुम अपना दूसरा गाल आगे बढ़ा दो।

इनमें से एक भी गाँधी की देन नहीं हैं। उन्हें गांधी ने गीता से, बाइबिल से, कुरान से, ग्रंथ साहिब से तथा अन्य धर्मों से ही लिया है।  फिर प्रश्न गांधी से ही क्यों करते हैं? सीधी सी बात है – धर्म पर सीधे प्रश्न करने से डर लगता है, भयभीत हो जाते हैं। साहस की ओट में दुर्बल लोग हैं ये। 

हर धर्म कहता है इनका पालन करो, इन्हें अपनाओ, इन्हें मानो। ये सब केवल प्रवचन दे कर ही अपने दायित्व का निर्वाह मान लेते हैं। और हम भी एक कान से सुन कर दूसरे से निःसंकोच निकाल देते हैं। सभा में सब सुन कर उसे वहीं छोड़ कर चले आते हैं। लेकिन गाँधी कहने पर रुके नहीं, इन्हें माना, अपनाया। यहाँ तक तो शायद ठीक था, वे इससे एक कदम आगे बढ़ जाते हैं और  दूसरों को यथासंभव इसे मानने और अपनाने के लिए बाध्य किया। यहीं से एक बड़े तबके ने उन्हें सिर-माथे पर बैठाया और दूसरे ने उनका विरोध किया।

          मानव का मनोविज्ञान कहता है – हम जिसे सही जानते हैं, उसे सही मानते नहीं। हम जिसका आदर करते हैं, उसकी सुनते नहीं। हम मानते कुछ हैं, चाहते कुछ और। हम हर पल इस द्वंद्व में जी रहे हैं। हम दोहरी जिंदगी जीते हैं। स्वयं को छोड़ बाकी पूरी दुनिया ईमानदार हो, सत्यवादी हो। स्वयं के लिए झूठ बोलना, बेईमानी करना व्यावहारिक होना है, दूसरों के लिए नहीं। घूस ले कर काम करवाने में बड़ा आनंद आता है लेकिन जब देना पड़ता है तब खीज होती है। हम जब इस द्वंद्व से निकल जाएंगे, तब बस एक ही रह जाएगा।

गांधी ने जिसे सही जाना, उसे ही माना, वही किया और वही करने को कहा। और बस यहीं गांधी से विरोध शुरू हो गया।

अंत में गीता के १८वें अध्याय का ६७वां श्लोक :

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।

न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥

तुझे यह गीता रूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तप रहित मनुष्य से कहना चाहिये, न भक्ति रहित और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिये; तथा जो मुझमें दोष दृष्टि रखता है उससे भी नहीं कहना चाहिये।  

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गुरुवार, 1 सितंबर 2022

सूतांजली सितंबर 2022

 सूतांजली

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वर्ष : 06 * अंक : 02                                                                सितंबर  * 2022

दूसरे को नीचा दिखाने में नहीं.....

खुद को ऊंचा उठाने में समय लगाइये।

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चलें, मिलें फोर्ड के जनरल मैनेजर से...                                            मैंने पढ़ा  

लगभग एक शताब्दी हो चुके हैं इस घटना के। जाहिर है उस समय न तो हिन्दुस्तान आजाद हुआ था, न पाकिस्तान बना था और लाहौर हमारे देश का ही एक अंग था। वहाँ स्कूल जाने वाले एक १७ वर्षीय बच्चे ने एक दिन सड़क पर एक गाड़ी को जाते हुए देखा। वह उसे देखता ही रह गया; उसे यह भी पता नहीं था कि यह क्या है? इसके पहले उसने न तो इसे देखा था और न ही ऐसी किसी चीज के बारे में  सुना था। जब दूसरे दिन भी उसे वहीं वह दिखाई दी, तब उससे रहा नहीं गया और पूरी ताकत तो उसके पीछे दौड़ पड़ा। आखिरकार उसने उस गाड़ी को पकड़ ही लिया। उसने देखा उस गाड़ी पर लिखा था फोर्ड और उसमें ५-६ गोरे बैठे थे। उसने उत्सुकता पूर्वक उनसे पूछा कि यह क्या है? अपने प्रश्नों के उत्तर से उसे पता चला कि इसे मोटर गाड़ी कहते हैं, इसे श्रीमान फोर्ड ने बनाया है, और वे एक दिन में ऐसी कई गाड़ियाँ बनाते हैं। उसे यह भी पता चला कि श्रीमान फोर्ड अमेरिका में रहते हैं। उस बच्चे का मुंह आश्चर्य से खुला रहा गया। उसे कुछ समझ नहीं आया कि इतनी भारी-भरकम चीज क्यों बनाई गई, श्रीमान फोर्ड एक दिन में ऐसी कई मोटर गाड़ी  कैसे बना लेते हैं और तो और ये अमेरिका क्या है और कहाँ है?  

          इसी उधेड़-बुन में वह स्कूल पहुँच गया। उसने अपने अध्यापक से पूछा कि यह अमेरिका क्या होता है और कहाँ है? अध्यापक ने उसे समझाने का बहुत प्रयत्न किया, लेकिन उसे समझ नहीं आया। उसके भूगोल के अध्यापक ने उसे बताया कि ग्लोब की उल्टी-दिशा में अमेरिका है और जैसे हिन्दुस्तान है वैसे ही अमेरिका है लेकिन अमेरिका और हिन्दुस्तान में बहुत फर्क है। यह सुनकर बच्चे की उलझन और भी ज्यादा बढ़ गई। अगर, अमेरिका ग्लोब की उल्टी दिशा में है तो वहाँ लोग क्या सिर के बल खड़े रहते हैं, क्या वे गिरते नहीं, वे कैसी खड़े होते होंगे? और इससे भी ज्यादा वह परेशान हुआ इस बात से कि अमेरिका हिन्दुस्तान जैसा है लेकिन दोनों में बहुत फर्क है। एक जैसा भी है और बहुत फर्क भी है, ये दोनों बातें एक साथ कैसे हो सकती है? खैर उसने उसी समय निश्चय किया कि उसे अमेरिका जा कर उस मोटर गाड़ी  को बनाने वाले श्रीमान फोर्ड से मिलना है।

          दिन-भर वह इसी उधेड़-बुन में रहता। उसके पिता मासिक ३० रुपए पाते थे। उसे पता था कि घर वाले कभी भी न तो सहमत होंगे और न ही उसे अमेरिका भेज सकेंगे। आखिरकार उसने चुपचाप भाग कर ही अपने सपने को साकार करने का निश्चय किया। एक दिन मौका देख कर उसने अपने पिता के कोट में हाथ डाला। उसे २९ रुपए मिले। उसके लिए यह एक बहुत बड़ी रकम थी। बिना किसी को बताये, चुपचाप लाहौर स्टेशन से ट्रेन पकड़ वह बंबई पहुँच गया।

          बंबई तक का सफर तो आसान था। अब उसे अमेरिका जाना था। उसने सुना था पूछ-पूछ कर विलायत जाया जा सकता है। बस, उसने लोगों से पूछना शुरू किया अमेरिका कहाँ है और कैसे जाएँ’? लोग बच्चे की बात सुनकर हँसते, उस पर ध्यान नहीं देते। बल्कि कई तो पूछते कि यह अमेरिका क्या होता है?

          उस बच्चे के लिए तो लाहौर ही सब कुछ था। उसके बाहर एक दिल्ली नाम की जगह भी थी और उसके बाद केवल बस मद्रास ही मद्रास। हाँ, एक और जगह थी जहां पानी के जहाज से जाते हैं, और वह जगह है विलायत। अब वह कैसे बताता कि अमेरिका कहाँ है। लेकिन सोचने पर एक बात समझ आई कि अमेरिका जाना तो पानी के जहाज से ही पड़ेगा। अतः  अब उसने अपना प्रश्न बदल लिया। अब वह पूछ रहा था, समुद्र में जाने के लिए पानी का जहाज कहाँ मिलेगा’? अब लोग समझने लगे और उसे रास्ता बताने लगे। जीवन में हमारे साथ भी यही होता है। हमें अपना प्रश्न सही ढंग से करना नहीं आता, अतः उत्तर भी सही ढंग से नहीं मिलते। जब तक हम अपने प्रश्न ध्यान से नहीं करते हमें उसके उत्तर भी ज्ञान से नहीं मिलते। कुछ ही समय में वह बंबई के बन्दरगाह पर पहुँच गया।

          लेकिन अब एक नयी समस्या! जहाज पर कैसे चढ़े और किस जहाज पर चढ़े। उसने फिर पूछना शुरू किया। लेकिन, न कोई बताने वाला और न ही उसकी बात को सुनने वाला। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। वह सबसे पूछता रहा। तभी उसने देखा कुछ लोग विशेष पोशाक पहने जहाज की तरफ जा रहे हैं। उसे लगा ये जरूर जहाज के कर्मचारी होंगे। उसने उन्हें भी पूछा, लेकिन उन्होंने बच्चे की बात पर ध्यान ही नहीं दिया। तब तक एक अफसर-सा आता दिखा। उसने उसे पकड़ा। दैवयोग से वह उसी जहाज का कप्तान था और उसने उसकी पूरी बात सुनी। उसने संक्षेप में पूरी बात बताई। उस बच्चे के जज़्बात से वह अभिभूत हो गया। कैप्टन के कहने पर वह जहाज पर उसके बताये काम, जहाज के इंजिन में कोयला डालना, के लिए तैयार हो गया।

          उस बच्चे का जहाज से अमेरिका सफर प्रारम्भ हुआ। काम न रहने पर वह जहाज के डेक आदि जगह पर घूमता और कैप्टेन के निजी कार्य करता। इन सब के बाद भी उसके पास काफी समय बचता। अतः उसने उसे और भी कुछ काम देने की याचना की। कैप्टन ने उसे जहाज के रेस्तरां में बैरे का काम करने का प्रस्ताव दिया जिसे बच्चे ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। अब वह अलग-अलग देश, संस्कृति, भाषा के अनेक लोगों से मिलने लगा, उनके केबिन में भी जाने लगा। यह क्रम लगभग तीन महीने तक चला।

          जहाज अमेरिका के बन्दरगाह पर लग गया। सब लोग झटपट उतरने की तैयारी करने लगे, यह बच्चा सब की नजर बचा जहाज से उतर गया और वहाँ की भीड़ में मिल कर २-३ मील तक भाग खड़ा हुआ। उसे अचानक कुछ पगड़ी धारी पंजाबी दिखे। वे पंजाबी में ही बातें कर रहे थे। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा और तुरंत उनसे मिला। वे इसकी पूरी बात सुन उसे अपने घर ले आए। उस मुहल्ले में अनेक पंजाबी थे, उसे तो ऐसा लगा कि वह अमेरिका नहीं पंजाब में  ही है। बच्चे को पता चला कि वे सब पंजाब से ही हैं और कई पीढ़ियों से हैं, खेती करते हैं। वहाँ के सब लोगों ने उसकी बहुत आवभगत की, उसे अच्छे से रखा और उसे प्रस्ताव दिया कि अब वह उन्हीं के साथ वहीं रह जाये। लेकिन बच्चा तैयार नहीं हुआ। वह तो वहाँ श्रीमान फोर्ड से मिलने आया था। जिस प्रकार यम ने नचिकेता को अनेक प्रलोभन दिये थे ठीक वैसे ही बिरादरी वालों ने बच्चे को अनेक प्रलोभन दिये – तुम्हें घर देंगे, खेत देंगे, खेती सीखा देंगे, स्कूल-कॉलेज में आगे पढ़ा देंगे, और तो और एक सुंदर अच्छी सी लड़की से तुम्हारी शादी भी करा देंगे – तुम यहीं रह जाओ। लेकिन इन सब प्रलोभनों को दरकिनार कर बच्चा अपने निश्चय पर अडिग रहा। एक निर्णय लेना और फिर उस पर अडिग रहना साधारण जज्बा नहीं है, जो उस बच्चे में था। आखिरकार उन्होंने भारी दिल से उसे विदा किया।

          अब वह फोर्ड के कारखाने के दरवाजे पर खड़ा था। वहाँ घुसने में उसे कोई विशेष कठिनाई नहीं हुई। लेकिन फिर, एक के बाद एक कई दरवाजे मिलते गए और उसकी मुसीबत बढ़ती गई। आखिरकार वह एक अफसर के सम्मुख खड़ा था। उसने उसकी पूरी बात सुनी और बोला कि वह उसके हिम्मत की कद्र करता है और उसकी ख़्वाहिश पूरी की जाएगी। उसने उसे कंपनी के अतिथिगृह में भेज दिया। थका हुआ बच्चा गहरी नींद में सो गया। कर्मचारी उसकी खिदमत में खड़े थे। दूसरे दिन उसे कारखाने के उस भाग में ले गए जहां मोटर गाड़ी  के कलपुर्जे बनते थे। एक-एक चीज उसे ठीक से दिखाई और समझाई गई। उसे भी बड़ा अच्छा लग रहा था। लेकिन इसी प्रकार एक के बाद दूसरे, दूसरे के बाद तीसरे कारखाने में जाते-जाते कई दिन बीत गए। फिर दिन सप्ताह में बदलने लगे। वह अब बेचैन हो उठा। बार-बार पूछने लगा उसकी मुलाक़ात श्रीमान फोर्ड से कब होगी। आखिरकार वह एक ऐसी जगह पहुंचा, जहां उसने पूरी चमचमाती, चलने को तैयार मोटर गाड़ी  देखी। वह बहुत खुश हुआ, लेकिन फिर उसने वही सवाल किया श्रीमान फोर्ड कहाँ हैं’?

          बच्चा अब फिर एक और नये उच्चाधिकारी के सामने बैठा था। उसे बताया गया कि फोर्ड से उसकी मुलाक़ात  कल होनी तय है। नियत समय पर वह तैयार था। जब वह फोर्ड के कमरे में पहुंचा तो उसे विश्वास नहीं हुआ कि वह इस धरा पर है या स्वर्ग में। उस सुसज्जित, विशालकाय, कमरे में फोर्ड ने खुद खड़े होकर उस लड़के का स्वागत किया। फोर्ड ने बहुत ही विनम्र भाषा में उससे भारत की भाषा-संस्कृति, रीति-रिवाज, रहन-सहन, खान-पान, प्रदेश, लोग, नदी-नाले-पहाड़ और तो और गांधी के बाबत भी प्रश्न किये। उनकी यह बात, जिसमें फोर्ड ने भारत में अपनी दिलचस्पी दिखाई लगभग ४-५ घंटे चली। बच्चे ने भी अपनी जानकारी के अनुसार सब प्रश्नों के उत्तर दिये। अब वह बच्चा अपने उद्देश्य पर आया, मैं कई दिनों से आपके कारखानों में घूम रहा हूँ। अनेक लोगों को देखा, उनसे मिला। वे सब साधारण वेश-भूषा में थे, अनेक के कपड़ों पर तो तेल वगैरह के दाग भी थे। मैंने आपको वहाँ कहीं नहीं देखा। आप तो इस कमरे में बेशकीमती स्वच्छ चमचमाते सूट में बैठे हैं। तब आप मोटर गाड़ी  कब बनाते हैं?” श्रीमान फोर्ड हंस पड़े, “मैंने एक जनरल मैनेजर नियुक्त कर रखा है। पूरा काम वही करता है”। बच्चे के सिर पर तो जैसे घड़ों पानी फिर गया, लगभग चीखते हुए कहा, “मुझे तो बताया गया कि आप ही गाड़ी बनाते हैं। इसीलिए मैं आप से मिलना चाहता था, लेकिन अगर यह काम आप नहीं आपका मैनेजर करता है तब मैं आप से नहीं आपके मैनेजर से मिलना चाहता हूँ। कृपया मुझे आप उनके पास भिजवायें या उन्हें यहाँ बुलवायें”। बच्चे को अपना ध्येय स्पष्ट था कि उसे मोटर गाड़ी  बनाने वाले से मिलना है। अपने ध्येय की स्पष्टता ही हमें सफल बनती है। फोर्ड का नाम तो वह इसीलिए ले रहा था क्योंकि उसे उस मोटर गाड़ी  के निर्माता के रूप में फोर्ड का ही नाम बताया गया था। अपने लक्ष्य को समझने में उसने जरा भी भूल नहीं की और उसी की लगन लगाए रखा।

          श्रीमान फोर्ड ने एक ठहाका लगाया, “वह मैनेजर तो यहीं है, आप के सामने, हर कहीं है, हर जगह है, हर समय है, सर्व शक्तिमान, परम ब्रह्म ईश्वर। वही इस ब्रह्मांड का शिल्पकार, निर्माता और रचनाकार है। यह वही है जो मेरे कारखाने को चलाता और गाड़ियाँ बनाता है। उसके हाथ अपना पूरा काम सौंप में निश्चिन्त हूँ। बच्चा मंत्र मुग्ध सा फोर्ड की बातें सुनता रहा। उसकी बातें उसके कानों में गूंजने लगीं। उसका जीवन बदल गया। उसे एक नयी रह मिल गई।

( सुरेन्द्र नाथ जौहर – जीवनी, लेखन और विचार से अनुदित)

(अगर आपका जीवन नहीं बदला, अगर आपके कानों में फोर्ड की बात नहीं गूंज रही है इसका मतलब यह है कि आप समझ नहीं पाये हैं, आपको इसे दुबारा पढ़ना है।

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ईश्वर                                                                      लघु बातें   - जो सिखाती हैं जीना

एक दिन मैंने ईश्वर से पूछा कि तुमने सब कुछ खोल कर रख दिया है। पहाड़- समुद्र, वन-उपवन, धरती-आकाश, सूरज-चाँद, सितारे-नक्षत्र, नदी-नाले, समुद्र-ताल, विभिन्न धातुओं का विशाल भंडार, अनगिनत वनस्पतियाँ, अनेक भांति और प्रकार के पशु-पक्षी, अनेकों प्रकार के मानव और भी न जाने क्या-क्या। लेकिन फिर तुमने अपने आप को क्यों छिपा कर रखा है? तुम क्यों नहीं दिखते?

          ईश्वर ने जवाब दिया, मैंने यह सब मानव के हित के लिए, उसके विकास के लिए ही रचा है। सृष्टि के विकास के लिए ही यह सब किया था। परंतु मनुष्य ने तो इस सब को बाजार में बदल दिया। बाजार ही क्यों सुपर बाजार बना दिया। मेरी बनाई गई और मनुष्य को बिना विशेष श्रम के उपलब्ध हर रचना को खरीदने-बेचने लगा! वनस्पति, पशु-पक्षी, खनिज और-तो-और ज्ञान भी बाजार तक पहुँच गया। प्रचुर मात्र में होने के बावजूद मनुष्य ने ऐसी व्यवस्था बना ली कि अनेकों के पास इनका अभाव है। मैं तो डर गया, अगर मैं भी प्रगट हो जाऊँ तो मैं भी बाजार में बिकने लगूँगा। इसीलिए मैंने अपने को छिपाकर रखा हुआ है। लेकिन क्या भरोसा! मुझे भी ढूंढ कर निकाल लें, मैंने मनुष्य को ऐसी संभावनाएं तो दे ही रखी हैं कि वह मुझे ढूंढ ले। यदि मेरा आदर-सम्मान हो और मेरा सही इस्तेमाल हो तो मैं प्रकट हो जाऊँ।

(वंदना खन्ना)

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सूतांजली, अगस्त द्वितीय 2026, आकर्षक घर की कुंजी

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