रविवार, 1 जनवरी 2023

सूतांजली जनवरी 2023

 सूतांजली

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वर्ष : 06 * अंक : 06                                                                जनवरी * 2023

नव-वर्ष 2023 पर हार्दिक शुभ कामनाएँ

 

सद्गुण एक प्रकार की बुद्धि है जिसे सिखाया नहीं जा सकता और इसलिए यह ज्ञान नहीं है।

जो लोग यह दावा करते हैं कि यह एक ज्ञान है और इसे सिखाया जा सकता है,

वे यह भूल जाते हैं कि उनके अच्छे काम का परिणाम ज्ञान नहीं

बल्कि उनके सच्चे विचारों की देन है। 

(प्लूटो)

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सद्गुणों के उत्सव में                                                       मैंने पढ़ा

एक समय की बात है। एक भव्य महल था, जिसके बीचों बीच एक मंदिर था। किन्तु आज तक उसकी देहली भी किसी ने पार नहीं की थी। और तो और, उसकी बाहरी चहारदीवारी तक भी पहुंचना मर्त्य प्राणियों के लिए प्रायः असंभव था, क्योंकि महल ऊंचे बादलों पर खड़ा था और आदिकाल से बिरले ही वहाँ का मार्ग ढूँढने में समर्थ हुए थे। यह था सत्य का महल।

          एक दिन वहाँ उत्सव का आयोजन हुआ, मनुष्यों के लिए नहीं, बल्कि उनसे अत्यंत भिन्न प्रकार की सत्ताओं के लिए। इसमें वे छोटे-बड़े देवी-देवता आमंत्रित थे जो इस पृथ्वी पर सद्गुणों के नाम से पूजे जाते हैं।

          उस महल के बाहरी भाग में एक बहुत बड़ा कक्ष था। उसकी दीवारें, फर्श और छत स्वयं प्रकाशित थीं, वे हजारों अग्नि-स्फुलिंग से और भी जगमगा रही थीं। यह था बुद्धि का महाकक्षयहाँ फर्श के पास प्रकाश बहुत हल्का था, नीलमणि के रंग का अति सुंदर गहरा नीला रंग छत की ओर अधिकाधिक तेज़ होता गया था। छत में हीरों के शमादान झाड-फ़ानूसों की तरह लटक हुए थे। उनके हजारों मुखों से आँखों को चौंधियाने वाली किरणें चारों ओर फूट रही थीं।

          सद्गुण अलग-अलग आये पर शीघ्र ही अपनी-अपनी रुचि के अनुसार टोलियाँ बना कर बैठ गये। सब प्रसन्न थे कि आज ऐसा दिन आया जब वे एक बार इकट्ठे हो सके। वे साधारणतः इस जगत में और अन्य जगतों में बिखरे रहते हैं, परायों की भीड़ में छितरे रहते हैं। इस उत्सव की अध्यक्षता की दिल की सच्चाई  ने जिसका वेश जल के समान निर्मल था, उसके हाथों में एक घनाकार, अति विशुद्ध स्फटिक था। उस स्फटिक से वस्तुएँ वैसी दिखलाई देती थीं जैसी वे वस्ताव में होती थीं, जैसी वे साधारणतया प्रतीत होती हैं उससे सचमुच बहुत ही भिन्न, क्योंकि उसमें वस्तुएँ हूबहू, बिना किसी विकृति के प्रतिबिम्बित होती थीं।

          उसके पास ही दो मूर्तियाँ विश्वस्त अंगरक्षकों की तरह खड़ी थीं; एक थी विनम्रता, उसका भाव आदरपूर्ण और साथ ही गर्वीला था, और दूसरी ओर उन्नत ललाट, उज्ज्वल चक्षु, दृड़ हास्यपूर्ण अधर, प्रशांत, निश्चिंत भंगिमावाला साहस  था। साहस के समीप, उसके हाथ में हाथ डाले, बुरके में लिपटी एक नारी खड़ी थी। केवल उसकी तीक्ष्ण आँखें ही घूँघट को भेद कर चमकती हुई दीख पड़ती थी। वह थी सावधानता

          सबके बीच एक दूसरे के पास आती-जाती, फिर भी हर समय सब के निकट दीखती थी उदारता – एक ही साथ सतर्क एवं शांत, कर्मरत एवं विवेकपूर्ण। उस समूह में वह जिधर निकल जाती उधर ही अपने पीछे उज्ज्वल मृदु प्रकाश की रेखा छोड़ती जाती थी। यह प्रकाश जो उससे छिटक कर विकिरण हो रहा था वास्तव में उसे अपनी श्रेष्ठ सखी, चिर सहचरी और जुड़वाँ बहन न्यायपरता से मिल रहा था, किन्तु वह उसके पास सूक्ष्म रूप में, अधिकतर दृष्टियों से ओझल रह कर आ रहा था। दया, धैर्य, सौम्यता’, अनुकम्पा और ऐसे अनेकों की उज्ज्वल सेना उदारता को घेरे हुए थी। 

          सभी आ चुके थे। कम-से-कम सब की ऐसी धारणा थी।

          किन्तु यह लो, वह कौन है? स्वर्ण-द्वार पर हठात एक नवागंतुक! द्वार पर नियुक्त द्वारपालों ने बड़ी कठिनाई से उसे अंदर आने दिया था। न तो उन्होंने उसे पहले देखा था और न ही उसकी आकृति में उन्हें कोई प्रभावशाली चीज लगी। सचमुच बहुत कम उम्र की थी, उसकी देह दुबली-पतली और सफ़ेद पोशाक साधारण, बल्कि गरीब जैसी थी। वह डरती-सी, झिझकती-सी कुछ कदम आगे बढ़ी। पर स्पष्ट ही वह अपने को ऐसी वैभवशाली उज्ज्वल भीड़ के बीच पाकर खो-सी गयी। वह ठिठक गयी, उसे पता न था कि किसकी ओर जाये।

          उधर सावधानता अपने साथियों से कुछ परामर्श करके उनके अनुरोध पर अनजाने मेहमान की ओर बढ़ी। वह जरा गला साफ करके, जैसा कि दुविधा में पड़े लोग थोड़ा सोचने के लिए करते हैं, उसकी ओर अभिमुख होकर बोली, “हम सब जो इस महल में इकट्ठे हुए हैं एक-दूसरे के नाम और गुण जानते हैं। आपको आते देख कर हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा है। आप हमें विदेशी-सी प्रतीत हो रही हैं। कम-से-कम ऐसा नहीं लगता कि आपको पहले कभी देखा हो। क्या आप बताने की कृपा करेंगी कि आप कौन हैं?

          नवगता ने लम्बी साँस लेते हुए उत्तर दिया, “हाय! मुझे आश्चर्य नहीं कि मुझे इस प्रसाद में विदेशी माना जा रहा है, क्योंकि मैं कदाचित ही कहीं आमंत्रित होती हूँ।

          “मेरा नाम है कृतज्ञता’”

(श्री अरविंद सोसाइटी से प्रकाशित पत्रिका अग्निशिखा से)

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ययाति आख्यान                                                         मेरे विचार

ययाति, पांडवों के वंश में सम्राट नहुष का पुत्र था, पराक्रमी और न्यायप्रिय। दैवयोग से असुरों के गुरु शुक्राचार्य के श्राप से ग्रस्त अ-समय में वृद्धावस्था को प्राप्त हुआ। सांसारिक भोगों को भोग कर ययाति की तृप्ति नहीं हुई थी अतः उन्होंने क्षमा याचना करते हुए ऋषि की स्तुति की और अपने श्राप को वापस लेने की प्रार्थना की। शुक्राचार्य ने अपने क्रोध को वश में कर बताया कि वे श्राप को पूर्णतया वापस नहीं ले सकते लेकिन उन्होंने एक विकल्प दिया –अगर कोई तुम्हारे बुढ़ापे के बदले अपनी जवानी देने को तैयार हो तो इस बुढ़ापे से जवानी की अदला-बदली हो सकती है। राजा को यह विकल्प बहुत सहज लगा और प्रसन्न मन वापस आ गए और सुपात्र खोजने लगे। लेकिन अकथ परिश्रम और आधे राज्य तक का प्रलोभन देने पर भी कोई भी व्यक्ति इस अदला-बदली के लिए तैयार नहीं हुआ। आखिर उन्होंने अपने बेटे से इसकी चर्चा की और उससे अपनी जवानी देकर पिता का बुढ़ापा लेने का प्रस्ताव रखा। लेकिन एक-एक कर सब बेटों ने भी इंकार कर दिया। आखिर वे अपने सबसे छोटे पुत्र, पुरू, से भी याचना की। पुरू ने कहा कि वह उनके प्रस्ताव पर विचार करेगा।

          पिता के इस प्रस्ताव पर विचार कर पुरू अपने पिता के पास आता है और कहता है कि वह इस अदला-बदली के लिए तैयार है लेकिन वह अपने पिता को बताना चाहता है कि उसे यह प्रस्ताव क्यों स्वीकार है।  पिता की स्वीकृति पर वह कहता है-

          पिताजी, मैं आपके बुढ़ापे के बदले जवानी देने को तैयार हूँ लेकिन मैं आपके इस प्रस्ताव को “पुत्र कर्तव्य” बोध से नहीं कर रहा हूँ। इस प्रस्ताव को स्वीकार करने का कारण यह नहीं है कि मैं इसे अपने पिता की आज्ञा मान रहा हूँ। न ही मैं यह विचार कर रहा हूँ कि पिता की प्रसन्नता ही पुत्र का कर्तव्य  है। और न ही मैं यह इस लिए कर रहा हूँ कि इससे मुझे पुण्य मिलेगा और मुझे मोक्ष की प्राप्ति होगी। ये तीनों ही कारण नहीं है। तब और क्या कारण हो सकता है?

          “मुझे लगता है कि अपने वंश में कहीं कोई दोष हुआ है, जिसके कारण इतना भोग-विलास करने के बाद भी आपको संतुष्टि नहीं हुई और आप अभी और भोग की कामना रखते हैं। आपको लगता है कि और कुछ समय भोग भोगने से संतुष्टि मिल जाएगी लेकिन यह यथार्थ से परे है। समय आने पर, शायद मैं भी अपने पुत्र के सामने ऐसा ही प्रस्ताव रखूँ और कालांतर में मेरा पुत्र अपने पुत्र से ऐसी अपेक्षा रखे। तब, यह कब-कैसे समाप्त होगा। मेरे विचार से हमें जीवन में लगी गांठों को खोलने का प्रयत्न करना चाहिए, न कि नई गांठें लगाने का। हमें ऐसा कोई भी सूत्र, बात, आज्ञा का पालन नहीं करना चाहिए जो जीवन में गांठों को खोलने के बजाए नई गांठें लगाए। अपने वंश के विकार को मैं यहीं समाप्त कर देना चाहता हूँ, जवानी और भोग के महत्व को मैं यहीं समाप्त कर देना चाहता हूँ। अतः मैंने विचार किया है कि मैं इसे यहीं समाप्त कर दूँ ताकि यह न तो परंपरा बने और न ही उदाहरण। इस असत परंपरा को निर्मूल बनाने के उद्देश्य से मुझे आपका प्रस्ताव मंजूर है।”

(हमारा एक गलत कार्य, हमारा एक गलत निर्णय  हमारे परिवार-वंश में एक गलत परंपरा पैदा करती है, एक अच्छी परंपरा को नष्ट कर देती है। यह शनैः-शनैः हमारा सर्वनाश कर देती है। परम्पराओं को हटाना बड़ा आसान है लेकिन उन्हें बनाना उतना ही कठिन। बिना समझे उन्हें छोड़ना अपने वंश को नष्ट करना है और इन्हें बचाना अपने वंश को बचाए रखना है। इसका असर कई बार पीढ़ियों के बाद महसूस होता है। रोज़मर्रा के जीवन में कई परिवार बड़े सुसंस्कृत और बंधे-बंधे नजर आते हैं तो कई बिखरे-बिखरे और असभ्य। इनके मूल में जाकर देखें। क्या हटाना है और किसे मजबूत करना है, इसका निर्णय सुविधा-असुविधा पर मत छोड़िए। गलत कार्य छोटा-बड़ा नहीं होता, बस गलत ही होता है। एक छोटा कंकड़ भी अपनी गति से विनाश कर सकता है। हमारे कर्म का उद्देश्य यही होना चाहिए कि हम जीवन की गांठें खोलें और आगे के जीवन में कोई गांठ लेकर न जाएँ। अनेक अनजानी-अनबूझी परम्पराओं का कार्य बस इतना ही होता है कि नई गांठें न बने और बनी हुई गाँठे खुल जाये। हमारे जीवन में गांठें नहीं हैं, वे प्रकृति के नियमानुसार चलता रहता है यह हमारी समझ और बुद्धि है जो जीवन में गांठें पैदा करती हैं, हमें उनका ही ध्यान रखना है।)

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बड़े लोग, छोटे लोग                                           लघु कहानी - जो सिखाती हैं जीना

मीता के बेटे को बुखार था और वह कार्टून कैरेक्टर्स के चित्रों की जिद लगा बैठा था। उसे दादी के पास रहने की हिदायत देकर मीता बाजार के लिये निकल पड़ी और फुटपाथ पर स्टिकर और पोस्टर बेचने वाले एक बच्चे के पास रुकी। मीता ने मिकी माऊस पसंद किया। साथ ही उसका ध्यान इस बात की तरफ भी गया कि उसके साथ मोटू-पतलू का भी एक पोस्टर चिपका हुआ है। पर वह चुप रही। पोस्टर हाथ में ही लिये हुए उसने दाम पूछे। बच्चे ने २० रुपये बताये। उसने कहा, मैं १० ही दूँगी। वो उदास हो गया। मीता आगे बढ़ने को हुई कि उसने कहा, ठीक है मैडम जी ले जाओ। वैसे ही खाने के लाले हैं, जो मिल जाये वही ठीक है

          घर आकर उसने बच्चे को बताया कि किस तरह उसने एक पोस्टर का दाम आधा करवा लिया और मिकी माऊस के साथ मोटू-पतलू का एक एक्सट्रा पोस्टर भी ले आई। बच्चा आश्चर्य से मम्मी को देख रहा था। वो बोला मम्मा! आपने ही तो सिखाया है कि कभी झूठ नहीं बोलना चाहिये, चीटिंग नहीं करनी चाहिये। आपने उस बच्चे के साथ अच्छा नहीं किया। कहकर वह उदास हो गया। जब मीता ने उसे दवा देने की कोशिश की तो उसने मना कर दिया। कहा, जब तक उस बच्चे को इन पोस्टरों की पूरी कीमत देकर नहीं आयेंगी मैं दवाई नहीं लूँगा।

          मीता वहाँ पहुंची तो देखा वह बच्चा वहाँ नहीं था। पास बैठी बूढ़ी अम्मा से, जो सब्जी बेच रही थी, पूछा तो उसने कहा, वो बाजार के पीछे कच्ची बस्ती में रहता है। मीता तुरंत कच्ची बस्ती की तरफ गई। किसी से पूछा - वो पोस्टर बेचने वाला बच्चा कहाँ रहता है? उसने सामने झोपड़ीनुमा कमरे की तरफ इशारा किया। अंदर प्रवेश करने वाली ही थी कि माँ-बेटे की बातचीत सुनकर ठिठक गई। लड़का कह रहा था, माँ, देखो मैं बिस्कुट लेकर आया हूँ। तुम जल्दी से खाकर दवाई ले लो। माँ को दवाई देकर वह बाहर आया। बाहर मीता को खड़ी देखकर ठिठक गया। मीता ने कहा – बेटा! मैं  एक के बदले दो पोस्टर ले गई थी। ये लो १०० रुपये। लड़का बोला, मैडम जी, दो स्टीकर के ४० रुपये ही होते हैं, आप उतने ही दीजिये।

          मीता नि:शब्द थी। घर आकार बच्चे को सारी बात बताई। बच्चा आराम से दवा लेकर सो गया। मीता सोच रही थी कि कभी-कभी बच्चे भी जिंदगी का महत्वपूर्ण पाठ पढ़ा देते हैं।

(वे सद्गुण जिन्हें आप अपने बच्चों में देखना चाहते हैं, पहले खुद उन्हें अपनाइये।)

                                                                                                                                    (अलका जैन) 

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गुरुवार, 1 दिसंबर 2022

सूतांजली दिसम्बर 2022

सूतांजली

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वर्ष : 06 * अंक : 05                                                                दिसम्बर   * 2022

श्रद्धा, प्रसन्नता, अंतिम विजय में विश्वास,

ये चीजें हैं जो सहायता देती हैं और

प्रगति को ज्यादा आसान और तेज़ बनाती हैं।

तुम्हें जो अच्छी अनुभूतियाँ होती हैं उन्हें ज्यादा महत्व दो।

                                                                                                                        श्रीमाँ

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बड़ी-बड़ी छोटी-छोटी बातें                                               मेरे विचार  

(कई दशक पहले)

सेव क्या भाव?  20 रुपए

और नारंगी? 15 रुपये

मौसमी? 15 रुपये

सफेदा (चीकू)? 18 रुपए

अंगूर? 25 रुपये

सब 2-2 किलो तौल दो।

फल-वाला बहन जी को देखता रह गया। असमंजस में पड़ा फलवाले ने सब तौल दिये, बहन जी,  किलो के हिसाब से रुपए पकड़ा कर चल दी। फलवाला कुछ देर तक अंगुलियों के बीच रुपए को दबाये बहन जी की तरफ देखता रहा इस आशा से कि बहन जी शायद कुछ कहेंगी। लेकिन बहन जी तो थैला उठा कर जा चुकी थी। बात यह थी कि बहन जी की खरीद-दारी में कुछ के भाव किलो के थे तो कुछ के दर्जन के। बहन जी को इसकी जानकारी नहीं थी। यह जानकारी थी उसकी माँ-सासू माँ को जो अब बाजार जाने लायक नहीं रह गई थीं। धीरे-धीरे ऐसे बहनों की संख्या बढ़ती गई और दर्जन भी किलो में परिवर्तित हो गया। यह भी सही है कि कुछ समय बाद भाव भी किलो के हिसाब से ही व्यवस्थित हो गया।  परिवार के बुजुर्गों को इसकी जानकारी है। प्रारम्भ में यह परिवर्तन धीरे-धीरे ही हुआ होगा लेकिन फिर अचानक एक विस्फोट सा हुआ, (धमाका नहीं) – अचानक लगा कि सब जगह यही हो रहा है और आप भी उसका ही हिस्सा बन गए।

          घर पर मरम्मत के काम के लिए बालू, सीमेंट और स्टोन चिप्स चाहिए थे। घर के पास ही दुकान पर सब समान लिखा दिया और बताया कि सामान ऊपर छत पर चढ़ाना है। पूछने पर बताया कि छत तीन तल्ले पर है। उसके चेहरे पर असमंजस के भाव आ गए, कहा, ‘आपका तो मकान पुराना है चार तल्ले के बराबर की ऊंचाई है। मैंने विरोध किया और बताया कि कोरोना के बाद भी छत का काम हुआ था और तब भी इसको लेकर कोई बात ही नहीं थी। लेकिन मोंटू सहमत होता नहीं दिख रहा था, उसने पेन छोड़ दिया और एक निःश्वास छोड़ता हुआ बोला, ‘समय बदल गया है। उसने पैसे नहीं लिए, बोला मजूरा (मजदूर) को भेज कर पता लगाने के बाद ही हिसाब करेगा, पैसे माल पहुँचने के बाद ले लेगा। मैं समझ नहीं पाया कि यह क्या हो रहा है। खैर, पूरा सामान लिखवा कर वापस चला आया। सामान दूसरे दिन सुबह आना था।

          सुबह की सैर पर था कि फोन की घंटी बजी, पता चला की मजदूर समान लेकर आ गए हैं। उधर से मजदूर की आवाज आई, ‘आपनादेर बाड़ी तो तीन तौलार, छत तो चार तौलाते। (आपका मकान तो तीन तल्ले का है और छत चार तल्ले पर है)। वह स्थानीय भाषा बंगला में बोल रहा था। मैं बात तुरंत समझ गया। मैंने बंगला में जवाब न देकर हिन्दी में बोला, ‘नहीं मेरा मकान दो तल्ले का है और छत तीन तल्ले पर है।  माल चढ़ाने के पहले खुद जा कर देख लो फिर चढ़ाना। सैर से लौट कर आया तब तक पूरा माल तीन तल्ले पर चढ़ चुका था। उसने मेरी बात मान ली थी। राहत की सांस ली।

          यहाँ यह बताता चलूँ कि यह पूरा खेल भाषा का हुआ। बात यह है कि अँग्रेजी में ग्राउंड फ्लोर के बाद 1-2-3 फ्लोर शुरू होते हैं। हमारी हिन्दी में ग्राउंड फ्लोर का कोई, बोलचाल का शब्द नहीं है लेकिन हिन्दी में भी नीचे के तल्ले को छोड़ कर ही 1-2-3 तल्ले शुरू होते हैं। भारत की अन्य भाषा में क्या है मुझे जानकारी नहीं लेकिन बंगला में ग्राउंड फ्लोर एक तल्ला है, यानि सब मकानों के ऊंचाई एक-एक तल्ला बढ़ जाती है। विचार करने पर मुझे लगा कि कहीं पर मजूरी जोड़ते समय इस बंगला के हिसाब से ऊंचाई जोड़ कर पैसे लिए और दिये गए। किसी ने विरोध नहीं किया और फिर एक तल्ले की मजूरी फाऊ में मजदूरों को मिलने लगी। किसी ने विरोध किया तो मान लिया नहीं तो .....  क्या पता कल मजदूर इस बात पर अड़ जाए और मजदूरी एक तल्ले की ज्यादा देनी पड़े।

          ये तो हमारी दिनचर्या की छोटी-छोटी बातें हैं जो हमारे देखते-देखते बदल जाती हैं। पहले कुछ लोग करते हैं और फिर देखा-देखी सब वैसे ही हो जाते हैं। हमारा भी इसी प्रकार क्रमिक विकास हुआ। वैज्ञानिक खोज के अनुसार बंदर का विकास होकर मानव बना। लेकिन एक बार यह विकास हो जाने के बाद अब कोई बंदर मानव नहीं बन रहा है और न ही कोई मानव बंदर। यानी विकास होता है पतन नहीं। और ऐसे क्रमिक विकास का विस्फोट सा होता है, यानी पहले धीरे-धीरे और फिर अचानक सर्वत्र फैल जाता है।

          विज्ञान यही मानता है कि ब्रह्मांड में सब परिवर्तन – स्वरूप हो या भाव या चिंतन – ऐसे ही होता है। विश्व के किसी एक कोने में अचानक कुछ परिवर्तन होता है, धीरे-धीरे वे परिवर्तन बढ़ते जाते हैं और जब एक निश्चित प्रतिशत या मात्रा में यह परिवर्तन हो जाता है तब अचानक एक विस्फोट सा होता है और सारा विश्व उसकी चपेट में आ जाता है। इसका इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि ये परिवर्तन अच्छे हैं या बुरे, सात्विक हैं या तामसिक, दैवी हैं आसुरी – इसका सरोकार होता है केवल संख्या से, अनुपात से।

          शायद यही कारण है कि सामूहिकता पर ज़ोर दिया जाता है – संख्या बल बढ़ाने के लिए। लेकिन इस संख्या का प्रभाव तभी होता है जब सब प्रक्रिया से जुड़ें, केवल उपस्थित होना नाकाफी है। दुर्जन मन से जुड़ते हैं और सज्जनों में अलगाव रहता है, मन का जुड़ाव नहीं होता है। राम-कृष्ण की कथा में शायद आपने पढ़ा-सुना होगा कि जब भी अवतार आए कभी अकेले नहीं आए, अपने सभी गणों को उन्होंने भेजा। क्यों? क्या वे समर्थ नहीं थे? कारण केवल एक था दुर्भावना को कमजोर करना और सद्भावना को सुदृड़ करना। अगर भावना पवित्र हो जाए तब फिर अंजाम देना सहज होता है और उसका प्रभाव भी लंबे समय तक रहता है।

          आज की वर्तमान घटना अमेरिक-रूस-यूक्रेन और कुछ ही वर्ष पहले की घटना अमेरिका-उत्तर कोरिया के घटनाक्रम पर दृष्टिपात करें। रूस-यूक्रेन में बम-गोली-मिसाइल, मौतें-विध्वंस, जान-माल की हानि के बाद भी कोई परिणाम नहीं निकला है, और अमेरिका-उत्तर कोरिया बिना एक गोली छोड़े, बिना कोई बम-मिसाइल दागे, बिना किसी जान-माल की हानि के सब कुछ सहजता से सम्पन्न हो गया। आज की, रूस-यूक्रेन की, घटना की हम लंबी चर्चा करते हैं, अनवरत। अमेरिका-उत्तर कोरिया को हमने नजरंदाज किया। चर्चा करनी ही है तो शांति और अहिंसा की कीजिये, अशांति और हिंसा की नहीं। जिसकी चर्चा ज्यादा होगी, उसी की बढ़ोतरी होगी।

          हमें खुद को विचार करना है हम क्या चाहते हैं, कैसे चाहते हैं और उसके लिए क्या कर रहे हैं। यह कभी मत सोचिए कि आप अकेले क्या कर सकते हैं, आप न तो अकेले हैं और न ही कमजोर। एक अकेले में भीड़ से ज्यादा ताकत होती है।

          सकारत्मकता में विश्व को बदलने की क्षमता है। इन बड़ी-बड़ी छोटी-छोटी बातों में आणुविक ऊर्जा होती है, इन्हें नजरंदाज मत कीजिये। इनसे जुड़िये। लोग अपने आप जुड़ेंगे। दुनिया बदल जाएगी।

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परमात्मा यानी क्या ?                                                        मैंने पढ़ा

परमात्मा - जो समझ में नहीं आता है, उसी का नाम परमात्मा है। जो समझ में आ जाता है, उसका नाम संसार है। जो समझ में नहीं आता, वह भी है। समझ पर ही अस्तित्व की परिसमाप्ति नहीं है। समझ के पार भी अस्तित्व फैला हुआ है, इस बात की उद्घोषणा ही परमात्मा है। परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं है।

          इसलिए जो परमात्मा को व्यक्ति मानकर खोजने चलेंगे, व्यर्थ ही भटकेंगे, कहीं न पहुंचेंगे। परमात्मा तो अज्ञात का नाम है। अज्ञात का ही नहीं वरन अज्ञेय का। जिसे जानो तो जान न पाओगे, जिसे जितना जानने की चेष्टा करोगे, उतना ही पाओगे कि अनजाना हो गया। लेकिन फिर भी एक और द्वार से परमात्मा में प्रवेश होता है, उस द्वार का नाम ही प्रेम है। जानने से नहीं जाना जाता, लेकिन प्रीति से जाना जाता है, प्रेम से जाना जाता है।

          जानना ही अगर जानने का एकमात्र ढंग होता तो परमात्मा से संबंधित होने का कोई उपाय न था लेकिन एक और ढंग भी है। बुद्धि ही नहीं है तुम्हारे भीतर सब कुछ, हृदय का भी स्मरण करो।  सोच-विचार ही सब कुछ नहीं है तुम्हारे भीतर, भाव की आर्द्रता को भी थोड़ा अनुभव करो। आँखें सिर्फ कंकड़-पत्थर ही नहीं देखती है, उनसे प्रीति के आंसू भी झरते हैं। अगर विचार पर ही ठहरे रहे तो परमात्मा नहीं है। इसलिए नहीं कि परमात्मा नहीं है, बल्कि इसलिए कि विचार की क्षमता नहीं है परमात्मा को जानना।

          बुद्धि पदार्थ को जान सकती है परमात्मा को नहीं। हृदय परमात्मा को जान सकता है, पदार्थ को नहीं। कान संगीत सुन सकते हैं, रोशनी नहीं देख सकते। आँखें रोशनी देख सकती हैं, गंध का अनुभव नहीं कर सकते। प्रत्येक अनुभूति का अपना द्वार है और प्रत्येक अनुभूति केवल अपने ही द्वार से उपलब्ध होती है। 

          इस जीवन का सब कुछ तो हम विचार से सुलझा लेते हैं। और इसलिए एक भ्रांति पैदा होती है कि जब विचार से सब कुछ सुलझ जाता है, गणित सुलझ जाता है, भाषा सुलझ जाती है, तर्क सुलझ जाता है, दर्शन सुलझ जाता है, भूगोल, इतिहास, राजनीति, विज्ञान सब बुद्धि से सुलझ जाता है  - तो एक आशा बंधती है कि इस बुद्धि से हम परमात्मा को भी सुलझा लें। और इसी आशा में उपद्रव हो जाता है। इसी आशा में हमारी निराशा के बीज हैं। इसी आशा में हमारी विफलता है। और विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक तुम्हें बुद्धि की शिक्षा दी जाती है। इस जगत में कहीं भी तो कोई स्थान नहीं है जहां हृदय का प्रशिक्षण होता है। इसलिए मैं कहता हूं, यह जगत मंदिरों, मस्जिदों, गिरजा घरों  से भरा है, फिर भी ये सब इस जगत से समाप्त हो गये हैं। क्योंकि ये हैं वह जगह, जहां हृदय का प्रशिक्षण मिलना चाहिए।

          तुम्हारे मंदिर भी बुद्धि से भर गये हैं। वे भी पाठशालाएं हैं। वहां धर्मशास्त्र समझाया जा रहा है। तुम्हारे मंदिर भी मस्तिष्क के ही आवास हो गये हैं। अब वहां हृदय नहीं नाचता, अब वहां प्रेम की बांसुरी नहीं बजती, अब तो वहां भी तर्क के जाल फैलाये जा रहे हैं। हिन्दू है, वह मुसलमान के खण्डन में लगा है, मुसलमान है, वह हिन्दू के खण्डन में लगा है। आर्यसमाजी सनातनी का खण्डन कर रहा है, सनातनी आर्यसमाजी का खण्डन कर रहा है। मंदिरों में भी खण्डन-मण्डन हो रहा है। प्रीति का फूल खिले तो खिले कहाँ? मस्जिदों में भी प्रेम की शराब नहीं ढाली जा रही है, वहाँ भी तर्क और तर्क के सहारे ही जितना दूर तक जाया जा सकता है, उतनी दूर तक जाने की कोशिश की जा रही है।

          तर्क तो ऐसा जैसे अंधे के हाथ में लकड़ी। थोड़ा टटोल लेता है। और अंधे के हाथ में लकड़ी फिर भी थोड़ा काम आती है। एकदम व्यर्थ है, ऐसा मैंने कहा भी नहीं, ऐसा मैं कहूंगा भी नहीं उसकी अपनी सार्थकता है। अंधा आदमी है तो लकड़ी से टटोलकर अपने घर आ जाता है, दरवाजा खोज लेता है, अपने जूते तलाश कर लेता है, टकराता नहीं। मगर अंधे की लकड़ी उसकी आंख नहीं बनती, और न आँख बन सकती है। और अगर आंख मिल जाए तो लकड़ी को तत्क्षण छोड़ देना होगा। फिर कौन चिन्ता करता है लकड़ी की!

          इसलिए जिन्होंने हृदय को थोड़ा खुलने का अवसर दिया, हृदय की कली को फूल बनने दिया, उन्होंने फिर तर्क की बकवास छोड़ दी। फिर वे परमात्मा में जीने लगे। वे परमात्मा के  लिए प्रमाण नहीं देते फिर वे स्वयं परमात्मा के प्रमाण हो जाते हैं। उनका उठना, उनका बैठना, उनका बोलना --सब परमात्मा की अभिव्यक्ति हो जाती है उनका सारा जीवन परमात्मा का एक गीत हो जाता है। उनके जीवन से एक सुवास उठती है।

          तुम्हारे जीवन में भी वैसी सुवास उठ सकती है। हकदार तुम भी हो। उतने ही मालिक हो तुम, जितना कोई बुद्ध, जितना कोई कृष्ण, जितना कोई क्राइस्ट। उतने ही मालिक हो तुम, जितने महावीर, जितने मुहम्मद, जितनी मीरा । तुम्हारी मिल्कियत जरा भी कम नहीं है। मगर, अगर तुम दीवाल से निकलने की चेष्टा करोगे और न निकल पाओ, तो अपने भाग्य को कसूर मत देना। दरवाजा है तो दीवाल से निकलने की चेष्टा क्यों कर रहे हो? क्यों दीवाल पर सिर मार रहे हो? और सिर से जितने भी काम होते हैं, बस वे दीवाल से सिर मारने जैसे हैं।

          तुम्हारे भीतर एक और भी अंतरंग जगत है। तुम्हारे भीतर भाव का भी एक लोक है। बहुत कोमल, बहुत नाजुक। और चूंकि कोमल है, नाजुक है, इसलिए बहुत छिपाकर रखा गया है। जितनी बहुमूल्य चीज होती है, उतना ही तो गहरा हम खोदकर जमीन में उसे गाड़ देते हैं! कि चोरी न हो जाए। बुद्धि तो ऊपर-ऊपर है, क्योंकि कचरा है। हृदय बहुत गहरे में है, क्योंकि वहीं तुम्हारी संपदा है, वहीं  तुम्हारी समाधि छिपी है, और वहीं तुम्हारे समाधान हैं। बुद्धि कामचलाऊ है; बाजारू है, सस्ती है। हृदय तुम्हारे जीवन का मूल आधार है।

ओशो

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मंगलवार, 1 नवंबर 2022

सूतांजली नवंबर 2022

 सूतांजली

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वर्ष : 06 * अंक : 04                                                                नवंबर  * 2022

गलत आस्थाओं से बड़ा 

कोई दैत्य नहीं हो सकता, और

झूठी मर्यादाएं

सबसे ज्यादा भयानक होती हैं

नित्शे

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अस्तित्व                                                                   मेरे विचार

हे मेरे आराध्य, मैं बहुत परेशान हूँ, दुखी हूँ, मेरे पास लोगों के उत्तर नहीं हैं। सब पूछते हैं कि अगर ईश्वर है तो वह कहाँ है? दिखता क्यों नहीं? आता क्यों नहीं? सब इसे मेरी कपोल कल्पना बताते हैं, मेरा ही नहीं तुम्हारा भी मज़ाक उड़ते हैं। एक बार- सिर्फ एक बार तो आ जाओ, सब को दिखा दो कि हाँ तुम हो, तुम दिखते हो, तुम आते हो। कहते हैं कि भगवान भक्तों के तारणहार हैं, भक्तों की सुनते हैं, भगवान से भगवान के भक्त का स्थान  ऊंचा है, तब आ जाओ, एक बार आ जाओ.......

तभी एक मृदुल-कोमल स्वर प्रस्फुटित हुआ, मैं कहाँ नहीं हूँ, कहाँ नहीं दिखता हूँ, कहाँ नहीं आता हूँ? अब अगर देखते हुए भी कहो कि नहीं दिख रहे हो, तो इसमें मेरा क्या दोष?

सेव के बीज में क्या तुम्हें सेव का पेड़ दिखता है? वही मैं हूँ,

अणु और परमाणु दिखते हैं? उसकी ताकत मैं ही तो हूँ।

रेडियो की तरंगों में तैरने वाले शब्द दिखते हैं? वे मैं ही तो हूँ।

पानी में छिपी बिजली कौन है? मैं ही तो हूँ।

यही नहीं बादलों में छिपी गर्जना और बिजली कौन है? मैं ही तो हूँ।

तुम्हारी रसोई में जलने वाली गैस का ताप भी मैं ही तो हूँ।

तुम भले ही मुझे सीधे-सीधे नहीं देख रहे हो लेकिन मेरे हर कार्य को होते हुए तो देख ही रहे हो। तुम मुझे मंदिर, गिरजा, गुरु-द्वारा, चर्च, मस्जिद वगैरह में देख रहे हो, लेकिन मैं तो वहाँ हूँ ही नहीं। तु म मुझे वहाँ देखो जहाँ मैं हूँ। तुम मुझे उन पाँच तत्वों में खोजो, जो इस सृष्टि के अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं। ये हैं:

१. धरती माँ, जिसने इस सृष्टि के निर्माण के लिए सब कुछ दिया और सब सह लेती है,

२. जल, जो हर जीव-जानवर-पेड़ के जड़ में जाकर उन्हें आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है,

३. सूर्य, अपनी गरमी से प्राणी मात्र को विकसित, अंकुरित और परिपक्व करता है,

४. वायु, जीवन के लिए आवश्यक श्वास प्रदान करता है, और

५. आकाश, इस सृष्टि को बनाये रखता है।  

मैं हर किसी को, हर जगह, हर समय बिना किसी भेद भाव के मिलता हूँ। अतः मेरे अस्तित्व को समझ ही नहीं पाते।

अगर मैं हर किसी में हूँ तब तुम मुझे अलग से बाहर क्यों देखना चाहते हो? क्या तुम इतना भी नहीं समझते कि अगर मैं सब में से बाहर आ जाऊँ तो यह पूरी सृष्टि, तुम्हारे समेत नष्ट हो जाएगी?  तब मुझे कौन देखेगा? मुझे देखने के लिए कौन बचेगा?

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प्रकृति की शक्तियाँ                                                       मेरे विचार

हम इस धरा को स्थिर मानते हैं। यह कहा भी जाता है कि धरती की तरह स्थिर रहो, गंभीर रहो। जिस धरातल पर हम खड़े है, बैठे हैं, चल रहे हैं एवं दिन भर अनेक अन्य कार्य कर रहे हैं अगर उसमें जरा भी गति आ जाए तो क्या हम वह सब सुचारु रूप से कर पाएंगे जिन्हें हम निरंतर कर रहे हैं? चलती रेल में, गाड़ी में, हवाई जहाज में, घूमते स्टेज पर हमारा संतुलन बिगड़ जाएगा। हमारा ध्यान-एकाग्रता तिरोहित हो जाएगी।  लेकिन क्या यह धरा स्थिर है? इसकी गति है 1000 मील प्रति घंटा यानी 450 मीटर प्रति सेकेंड। यह तो केवल एक गति है, अपनी धुरी पर घूमने की। इसके अलावा यह सूर्य के भी चारों ओर चक्कर लगाती रहती है, अनवरत। लेकिन इसके बावजूद हमें इसका भान तक नहीं होता। क्यों? इसका कारण है धरती की विशालता। इसकी इस विशालता के कारण हमें यह धरती स्थिर प्रतीत होती है।  हमारे अपने आकार और धरा के आकार की कोई तुलना नहीं की जा सकती और इसी सापेक्षता के कारण हमें इसकी गति का अनुभव नहीं होता।

          कहा जाता है कि प्रकृति की शक्तियाँ अन्धी और उग्र होती हैं। लेकिन बात ऐसी बिलकुल नहीं है। हम अपने सापेक्ष अनुपातों के आधार पर 'प्रकृति के बारे में ऐसा निर्णय कर बैठता है। ज़रा ठहरो, एक उदाहरण लें। जब भूकम्प आता है तो बहुत से टापू पानी में डूब जाते हैं और हजारों आदमी मर जाते हैं। हम कहते हैं: “यह प्रकृति दैत्य है।" मानवीय दृष्टि से यह 'प्रकृति' दैत्य है। उसने किया क्या? वह एक विभीषिका ले आयी। लेकिन ज़रा देखो, ज़रा कूदने या दौड़ने या ऐसा ही कुछ करने में जब हमें अच्छी चोट लग जाये तो हम काले, नीले हो उठते हैं। हमारे कोषाणुओं के लिए यह ऐसी ही चीज़ है जैसे भूकम्प। हम बहुत सारे कोषाणुओं को नष्ट कर देते हैं। यह अनुपात का प्रश्न है। हमारे लिए, हमारी छोटी-सी चेतना के लिए, बहुत ही छोटी चेतना के लिए यह बहुत भयानक चीज़ मालूम होती है, लेकिन आख़िर तो यह धरती पर (विश्व में भी नहीं), किसी जगह अस्त-व्यस्तता ही है। हम केवल धरती की बात कर रहे हैं। यह क्या है? कुछ भी नहीं, विश्व के अन्दर एक ज़रा सा खिलौना। और अगर हम इस विश्व की बात करें तो लोकों का गायब हो जाना भी क्या है? - बस, जरा-सी अस्त व्यस्तता। यह कुछ भी नहीं है। अगर हम अपनी चेतना को जरा सा विकसित करें तब बात तुरंत समझ आ जाती है कि ये प्राकृतिक आपदाएँ धरती की दृष्टिकोण से ही, विश्व दृष्टिकोण न लें तो भी, नगण्य सी हैं, अति साधारण हैं। ठीक ऐसी ही जैसे हाथी पर एक मक्खी बैठ जाए तो हाथी को इसका भान तक नहीं होता। अगर हो सके तो हमें अपनी चेतना को विस्तृत बनाना चाहिये। 

         एक व्यक्ति था जो अपनी चेतना को विस्तृत करना चाहता था। उसने एक तरकीब खोज निकाली थी। वह रात को खुले में लेट जाता और तारों को देखा करता था, उनके साथ तादात्म्य करने की कोशिश करता था और विशाल जगत् की गहराई में चला जाता था और इस तरह अनुपात का भाव पूरी तरह खो देता था। वह धरती और उसकी सभी छोटी-मोटी चीज़ों की व्यवस्था भूल कर आकाश के जैसा विशाल बन जाता था - हम इसे विश्व के जैसा विशाल नहीं कह सकते क्योंकि हम विश्व के एक छोटे-से टुकड़े को ही देखते हैं, लेकिन वह तारों भरे आकाश जैसा विशाल बन जाता था और तब, सामयिक रूप में सभी छोटी-मोटी अ-पवित्रताएँ झड़ जाती हैं और तब हम चीज़ों को एक बड़े पैमाने पर समझ सकते हैं। यह एक बड़ी अच्छी दिमागी कसरत है।

          ये बहुत अच्छी कसरत है, आवश्यक भी। अपनी तुच्छता का अनुभव करने के लिए, अपनी चेतना को विस्तृत करने के लिए। दोनों में तुलना करने की कोशिश करो तब हम देखेंगे - हम एक सड़क पर चल रहे हैं। चींटियों की एक सेना एक बिल से दूसरे बिल की ओर जा रही है (हम किसी से बातें कर रहे हों और नीचे नहीं देखते); बड़ी लापरवाही से एक पैर रखते हैं, फिर दूसरा, और हम जाने बिना ही सैकड़ों चींटियों को मार डालते हैं। अगर हम चींटी होते तो कहते: “क्या ही दुष्ट और पाशविक शक्ति है यह!" हम तो सिर्फ़ चल रहे हैं, धीरे-धीरे, बेखबर, हमने ध्यान नहीं दिया। ऐसी सत्ताएँ भी हैं जिनके लिए हम केवल छोटी-छोटी चींटियों के समान हैं। वे रखती हैं, पहला कदम और फिर दूसरा, और हजारों आदमी मर जाते हैं। उन्हें इसकी ख़बर तक नहीं होती! उन्होंने यह जान-बूझकर नहीं किया है। वे बस चल रही थीं। बस, इतना ही।

          जब हम लड़ते हैं तो इसका मतलब है युद्ध। छोटे युद्ध होते हैं और बड़े युद्ध होते हैं। धरती पर मनुष्यों का यह युद्ध है क्या? अगर उन सत्ताओं की दृष्टि से देखा जाये जिनके लिए मनुष्य चींटी से बढ़ कर नहीं हैं...। जब हम चींटियों का युद्ध देखते हैं तो वह हमें बिलकुल स्वाभाविक लगता है! हम कह सकते हैं, “देखो, चीटियाँ लड़ रही हैं।"  तो विश्व की विशाल शक्तियों के लिए धरती पर युद्ध करते हुए मनुष्य लड़ती हुई चीटियों जैसे हैं, यह कुछ भी नहीं है। हमें चीज़ों का मूल्यांकन मानवीय चेतना के माप से नहीं करना चाहिये...। मनुष्य के लिए प्रकृति विकराल वस्तु है। । वह अत्यन्त विकट है। सभी शक्तियाँ उसकी सेवा में हैं, सभी क्रियाओं की सृष्टि वही करती है। और हम बस उतना ही जानते हैं जो इस धरती पर हो रहा है! हम  प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, एक प्रकार के अनुमानात्मक ज्ञान से यह जानते हैं कि बाक़ी विश्व में क्या हो रहा है। ये मानवीय चेतना के अनुपात में विकट और विकराल शक्तियों की क्रीड़ाएँ और संघर्ष हैं। ये ऐसी चीजें हैं जो मानवीय अवधि की तुलना में अनन्त काल तक रहती हैं। तो ये काल में विशाल हैं, देश में विशाल हैं और मानवीय चेतना के लिए ये लगभग अबोधगम्य हैं। लेकिन इन शक्तियों के लिए मानवीय आकार और गतियों का सचमुच वही अनुपात है (शायद उससे भी कम) जो हमारे लिए चींटियों के झुण्ड का है।

          उदाहरण के लिए, आँधी को लो जो चला करती है। वैज्ञानिक हमसे कहते हैं, “आँधियाँ प्रकृति की शक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं और अमुक-अमुक घटनाओं का परिणाम हैं।” वे गरमी और ठण्ड, ऊँचे और नीचे आदि की बात करेंगे और हमसे कहेंगे: “आँधी चलने का यह कारण है; ये वातावरण में पैदा होने वाली हवा की लहरें हैं।" लेकिन बात ऐसी नहीं है। उनके पीछे सत्ताएँ होती हैं। वे इतनी बड़ी हैं कि उनका रूप हमसे बच निकलता है। यह ऐसा ही होगा जैसे किसी चींटी से कहा जाये कि मनुष्य के रूप का वर्णन करे - वह न कर पायेगी, कर पायेगी क्या? वह अधिक-से-अधिक छोटी उँगली की छोटी-सी पोर को देखती है और पैर पर चलती है—यह एक लम्बी यात्रा है और वह यह न जान पायेगी कि मनुष्य का आकार कैसा होगा। तो यहाँ भी वही चीज़ है। ये शक्तियाँ जो आँधी, मेह, भूकम्प आदि ले आती हैं, अभिव्यक्तियाँ हैं - चाहो तो संकेत कह लो इन्हें—इस प्रकार की सत्ताओं की गतियों की अभिव्यक्तियाँ हैं जो भयावह रूप से भीमकाय हैं। हम मुश्किल से ही उनके पैर का अन्तिम सिरा देखते हैं और उनके विस्तार का अन्दाज़ा नहीं लगा सकते।

          हम जैसे-जैसे अपनी चेतना का विकास करते जाते हैं हमारा दृष्टिकोण भी विशाल होता जाता है। अति महत्वपूर्ण घटनाएँ भी नगण्य और सूक्ष्म प्रतीत होने लगती हैं। हमारा प्रकृति से, उन सत्ताओं से साक्षात्कार होने लगता है, दृष्टि विशाल हो जाती है।

(श्रीमाँ के उत्तरों पर आधारित)

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रहम के देवता                 

ईश्वर प्रेम, आस्था और विश्वास का तालमेल है। यह रहम है, रहमान है। दीनबंधु है, दयानिधि है। अगली बार कभी मन में ईश्वर की तलाश का प्रश्न उभरे तो किसी को माफ करके  देखिएगा......आपको अपनी रहम में ही उस खुदा के दीदार होंगे। किसी रोते हुए के चेहरे पर हंसी की रंगोली बनाकर निहारिए, यक्नीनन जगदीश्वर आपकी आँखों के सामने होंगे। उनका कोई आकार नहीं है। वे कण-कण में व्याप्त हैं.... हर दुखियारे की हंसी में, प्रेम की तलाश में भटकते हृदयों में, स्वयं के पूर्ण होने की यात्रा कर रहे साधकों में, संगीत की झंकार में, गायन की मिठास में...... ।

          एक धर्माचार्य कहते थे – सुहृद के आत्म-बल में ईश्वर विराजते हैं, क्योंकि सद्गुणों के, सतप्रवृत्तियों के, श्रेष्ठताओं के समुच्चय हैं। यह बात राम और कृष्ण के रूप में प्रमाणित भी हो चुकी है। मनुष्य योनि में जन्मे श्री राम और श्री कृष्ण ने अपने गुणों को उस ऊंचाई तक विकसित किया, मानवता की इस तरह से रक्षा की कि ईश्वर माने गए.....सो आप दृढ़ हों तो खुद को भी ईश्वरत्व की ओर ले जा सकते हैं।

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सूतांजली जून द्वितीय 2026

  जो होना है वो होकर रहेगा , जो नहीं होना है वो नहीं होगा। ------------------ 000 ---------------------- सब तय है , फिर... ? हमार...