रविवार, 1 दिसंबर 2024

सूतांजली दिसम्बर 2024


 

स्वतंत्र विचारक वे लोग हैं जो बिना पक्षपात और पूर्वाग्रह के सोच सकते हैं और जिनमें उन चीजों को भी समझने का साहस होता है जिनकी

उनके अपने रीति-रिवाजों, विशेषाधिकारों के साथ टकराहट होती है।

सही चिंतन कर सकने के लिये यह बहुत आवश्यक है।

लियो टोल्स्तोय

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बाज़ारवाद का महाजाल



साहित्य से रिक्त समाज, संवेदनहीन मानवों का हुजूम होता है। वह अर्थपिशाचों का समाज होता है। जिसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य पैसा कमाना होता है – पैसा! पैसा!! पैसा!!!  वैश्वीकरण के वेश में हमारी लक्ष्मण रेखाओं के भीतर आ घुसा अमेरिका-यूरोप पोषित बाज़ारवाद इस पैशाचिक वृत्ति को हवा दे रहा है। आज यदि शिक्षा और भौतिक विकास के साथ-साथ समाज में भ्रष्टाचार और अपराध भी बढ़ रहे हैं तो इसका एक महत्वपूर्ण कारण उदारीकरण के जबरदस्त दबाव में भारतीय समाज का अपनी धरती के भाषा-साहित्य से, अपनी लोक सम्पदा से, अपनी सांस्कृतिक विरासत से कट जाना है। चीनी कहावत याद आती है कि यदि छात्र हत्यारा बन जाता है तो उसके शिक्षक को मार डालो। भारतीय परिवेश में किसको मारें? शिक्षक को या अभिभावक को या मीडिया को या...! यह समझ में नहीं आता क्योंकि ये सब बाज़ारवाद के महाजाल में फंसे छटपटा रहे हैं।

बुद्धिनाथ मिश्र

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सबसे शक्तिशाली

          एक पिता ने अपने बेटे की बहुत अच्छी तरह से परवरिश की। उसे अच्छी तरह से पढ़ाया, लिखाया और एक सफल इंसान बनाया। बेटा एक बड़ा अधिकारी बन गया। हजारों लोग उसके अधीन काम करने लगे। एक दिन पिता बेटे से मिलने उसकी ऑफिस गये। बेटे के चेंबर में जाकर उसके कंधे पर हाथ रखकर अपने बेटे से पूछा, इस दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान कौन है?’  बेटे ने पिता को बड़े प्यार से हंसते हुए कहा, मेरे अलावा कौन हो सकता है पिताजी।

       

पिता को इस जवाब की आशा नहीं थी, उसे विश्वास था कि उसका बेटा गर्व से कहेगा पिताजी इस दुनिया के सब से शक्तिशाली इंसान आप हैं, जिन्होंने मुझे इतना योग्य बनाया। बेटे का जवाब सुनकर पिता की आंखें भर आयीं। वे चेंबर के गेट को खोल कर बाहर निकलने लगे। उन्होंने एक बार पीछे मुड़ कर पुनः बेटे से पूछा, एक बार फिर बताओ इस दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान कौन है?’

          पुत्र ने इस बार कहा, पिताजी आप हैं, इस दुनिया के सबसे शक्तिशाली इंसान। पिता ये सुनकर आश्चर्यचकित हो गये। उन्होंने कहा, अभी तो तुम अपने आप को इस दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान बता रहे थे, अब तुम मुझे बता रहे हो?’

          बेटे ने हंसते हुए उन्हें अपने सामने बिठाते हुए कहा, पिताजी उस समय आप का हाथ मेरे कंधे पर था, जिस पुत्र के कंधे पर पिता का हाथ हो वो तो दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान ही होगा  ना।

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लाजवाब जीवन यात्रा                                                   मेरे विचार

(शीत-ऋतु और पिकनिक का तो जैसे चोली-दमन का साथ था। इस दौरान न जाने कितने पिकनिक आयोजित होते थे जिनमें हम बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। आज की तरह की सुविधाएं मौजूद नहीं थीं लेकिन आनंद हर्सो-उल्लास आज से कहीं ज्यादा थे। सब आपस में घुल-मिल जाते और मिल कर सारी व्यवस्था करते। इवैंट मैनेजर नहीं थे, जो भी था परिवार या दोस्तों का समूह, उसी में ही कोई ज़िम्मेदारी लेता और सब मिलकर करते। बच्चे-तो-बच्चे बड़े-बूढ़े भी बच्चे बन जाते। स्कूल के समय पकड़े हुए क्रिकेट और बैडमिंटन के बैट फिर से एक बार हाथ में पकड़ अपना जौहर दिखाने बड़े शौक से मैदान में उतर जाते थे, यह एक अलग बात है कि शाम को पैर-कंधे-हाथ विद्रोह कर बैठते थे। पॉण्डिचेरी आश्रम का वार्षिक पिकनिक तो इनसे अलग था। वंदना जी का लिखा उस पिकनिक यात्रा का विवरण पढ़ा तो लगा की यह तो मानव की जीवन यात्रा है। पढ़िये शायद आपको भी इसमें उसकी खुशबू मिल जाये।

          दक्षिण में, पॉण्डिचेरी के पास जिंजी-दुर्ग है जो आज भी - खण्डहर बता रहे हैं इमारत बुलन्द थी' को चरितार्थ करता है। छत्रपति शिवाजी का यह दुर्ग बहुत मायने रखता है और अंग्रेजों ने तो इसे 'Troy of East’ का दर्जा दे दिया था। आज यह एक राष्ट्रीय स्मारक है और पुरातात्त्विक विरासत के संरक्षकों के रख-रखाव में है, अतः एक अच्छा-खासा पर्यटक स्थल बन गया है। लेकिन आज से करीब ५० वर्ष पहले इसका इतना नाम नहीं था, हाँ एक पिकनिक स्थल जरूर था, जहां सैलानी,आश्रमवासी, विद्यालय के छात्र छात्राएं इत्यादि शीत ऋतु में पिकनिक पर यहाँ चले जाते थे, तब चहल-पहल से यह क्षेत्र गूंज उठता था। चलें चलते हैं आज से लगभग 50 वर्ष पूर्व ऐसी ही एक पिकनिक उर्फ जीवन यात्रा में।)

          "पिकनिक' नाम सुन कर किस की बांछे नहीं खिल जाती? भई, मेरे जैसों का न केवल मुखमण्डल बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि सर्वांग खिल उठता है। और फिर वार्षिक 'पिकनिक'! वह ठहरी लाजवाब। लेकिन इस बार दिल में हलकी धुकधुकी हो रही थी, कारण भी था - पिकनिक के साथ-साथ पैर तुड़ाई थी, यानी पॉण्डिचेरी से जिंजी- ७३ कि.मी. का रास्ता पैदल तय करना था। यह तो हर साल का कार्यक्रम है। हाँ, फ़र्क बस इतना था कि इस साल पैदल चलने वालों की संख्या कुछ तगड़ी थी - ९० बच्चे-बड़े-युवा जब एकत्र हुए तो ऐसा लगा मानों किसी राजा की छोटी-मोटी टुकड़ी कूच की तैयारी में हो। इनमें जो पहली दफा इस यात्रा में भाग ले रहे थे उनकी आँखों में एक तरह की शंका, कुछ भय पढ़ा जा सकता था, कुछ की बत्तीसी खिली जा रही थी, आँखों से आत्मविश्वास फूट रहा था। लम्बे अन्तराल के बाद पैदल यात्रा में हिस्सा लेने वालों में न आत्मविश्वास का अतिरेक था न थी भय से सर्वथा मुक्ति।

          आरम्भ में चारों तरफ़ उत्साह ही उत्साह उफन रहा था - नियत स्थल 'कॉर्नर हाउस' से  ज्यों ही हम बाहर आये कि शुभ कामनाओं से लदा-फैदा बन्धु-बान्धवों का बड़ा सा काफिला इन्तजार करता दिखा। ज़ोर-ज़ोर से बतियाते हँसते चहकते समूह को देख हर रास्ते चलते की आँखों में कुछ आश्चर्य, कुछ प्रश्न-सा उभरता, लेकिन हम इन सबसे बेख़बर बायें-दायें  बायें-दायें की लय में आगे बढ़ते चले जा रहे थे।

          अब हम छह घण्टे निरन्तर चल चुके हैं, यानी रात के नौ बजे हैं। दृश्य काफ़ी बदल गया है। सबसे पहले जिंजी पहुंचने का निश्चय लिये दो चार युवकों के उत्साह के साथ-साथ दूसरे कई उस धारा में उनके साथ हो लिये हैं। जो पीछे रह गये हैं उनके भी उपदल बन गये हैं और अन्त में मुख्य कप्तान के साथ चल रहे हैं कुछ ऐसे जिन्होंने चाय पीने के स्थान - 'माइलम' के बाद, मन-ही-मन, जिंजी तक बस में जाने का निश्चय कर लिया है।

          प्यास के मारे हलक सूखा जा रहा है लेकिन कप्तान है कि पानी की एक घूंट तक पीने की अनुमति नहीं दे रहे। इस समय उनका आदर्श वाक्य बन गया है- 'चलते रहो, बढ़ते रहो। आखिर एक-एक सन्तरा सबको बाँटा गया, लगा रेगिस्तान में पानी मिल गया, लेकिन ज़रा-सा सन्तरा, ऊंट के मुँह में जीरा वाली कहावत चरितार्थ कर बैठा।

          लीजिये, तय कर लिया आधा सफ़र गरम-गरम चाय और जैम लगी डबलरोटी खाकर सबने तृप्ति की साँस ली-तभी कप्तान का स्वर सुनायी दिया जो थक गये हैं उन्हें वापस पॉण्डिचेरी ले जाने के लिए बस खड़ी है, लेकिन यहाँ से चल पड़ने के बाद हम जिंजी पहुँच कर ही दम लेंगे। चारों तरफ़ खुसुर-पुसुर चलने लगी, यहाँ तो पासा पलटा जा रहा है। जिंजी की बजाय वापस पॉण्डिचेरी। थकान से चूर-चूर होने की शिकायत करने वालों ने सिर खुजाया, कप्तान को दबी ज़बान से कोसा, उनसे बस से जिंजी जाने की अनुनय-विनय तक की, लेकिन उन्हें टस-से-मस होते न देख कर आख़िर मन मसोस कर हरएक अपने-अपने कपड़े झाड़ आगे बढ़ने के लिए प्रस्तुत हो गया।

          घनी नहीं फिर भी अँधेरी रात, तन से थका, लेकिन मन में एक बार फिर उत्साह का रंग लिये आगे की ओर बढ़ता दल, कोई थकान शब्द के काले बादल को मन के इर्द-गिर्द से भगाने के लिए जोर जोर से गीत ही गाने लगा है, कुछ अधिक शर्मीले उसके साथ-साथ गुनगुनाने लगे हैं तो किसी दल के लोग आपस में पहेलियाँ बुझा रहे हैं। उधर पिछड़े दल को कप्तान बायें-दायें बायें-दायें के स्पष्ट बोलों पर बाक़ायदा कवायद करवाये लिये चले आ रहे हैं। अभी तो चाय नाश्ता हुआ, लेकिन दो घण्टों के बाद ही चारों तरफ से भूख-भूख की गुहार मचने लगी। लो, यह कप्तान भी लाजवाब हैं, जो आधे रास्ते तक हमें दाने-दाने को तरसा रहे थे अब उन्होंने खाने की बात मुँह से निकलते-न-निकलते सरस खीरे और पक्के-पक्के केले झटपट निकाल कर दे दिये।

        

रात के साथ-साथ धीरे-धीरे हमारा दल भी आगे बढ़ रहा है। रात के तीसरे पहर के साथ ठण्डी-ठण्डी बयार भी बहनी शुरू हो गयी है। हवा में हलकी-सी खुनकी, रात्रि की निस्तब्धता, आकाश से आशीर्वाद की तरह हम पर छिटकता शीतल प्रकाश-समाँ कुछ ऐसा बंध गया कि सब धीरे-धीरे शान्त से होने लगे। उस दिन साक्षात् नींद को आँखों में उतरते महसूस किया। पलकों की चिक अनायास आँखों पर ढलने-ढलने को है और हम हैं कि नींद को भरसक खदेड़ने के प्रयत्न में लगे हैं। कैसी विडम्बना है, दूसरी रातें अपने नरम बिस्तरों में दुबक कर पलकें बिछाये आप निंदिया रानी की बाट जोहते-जोहते करवटों-पर-करवटें बदलते रह जायें और आज ये बिन बुलाये मेहमान की तरह कैसी  दनदनाती हुई घुसी चली आ रही हैं।

          नींद-नींद का राग अलापते, शराबियों की तरह इधर से उधर झटके खाते हम किसी तरह आगे बढ़ रहे हैं, यह कहना ज़्यादा सच होगा कि हमें आगे बढ़ाया जा रहा है। जी नहीं, सब को नहीं, एक दल जो शुरू से आगे निकल गया है वह तो अब तक अपने गन्तव्य स्थान पर शायद पहुँच गया होगा। कुछ पर नींद ऐसी हावी हो गयी है कि वहीं चलती सड़क पर लेट जाने के लिए मचल रहे हैं, दृश्य कुछ ऐसा अलबेला है कि कप्तान एक को उठायें तो दूसरा बैठने को प्रस्तुत, दूसरे को उठायें तो तीसरा लम्बलेट हो जाने को तैयार। अन्त में ऐसे लोगों के लिए कप्तान ने दूसरों को आदेश दे दिया कि जो कोई यूं बीच राह में  बैठ जाये उसे उसके साथी जबरदस्ती उठा कर दौड़ायें। लो, कप्तान के साथ-साथ अब साथियों की भी गलियाँ सुननी पड़ रही है। कोई बात नहीं, चार-पाँच मील का सफर बाकी है तब तक या तो कानों में रूई ठूंस लो या चिकना घड़ा बन जाओ।

          धीरे-धीरे आकाश के तारे धुंधले होकर विलीन हो रहे हैं, प्राची में रंगोत्सव की तैयारी चल रही है। सवेरे के साथ-साथ रात की खुमारी भी आँखों से छिटक कर दूर जा गिरी ७० कि.मी. मंजिल पार कर ली बाकी है अन्तिम तीन कि.मी.। काम पर जाते पुरुष, कुँए पर जाती पनिहारिनें – सब रुक-रुक कर हमारे लंगड़दीन दल को फटी-फटी निगाहों से देखे जा रहे हैं। कोई सलाह दे रहा है अगली बार बस करके आना, ज्यादा पैसे नहीं लगते बस में! दूसरे के दिमाग में किसी तरह यह बात नहीं बैठ पा रही कि बिना किसी मकसद के ये लोग यूँ अपने ऊपर अत्याचार क्यों कर रहे हैं भला? स्त्रियों का कोई दल हमें निरा बावरा समझ, दाँतों में पल्लू दाबे खी खी खी हंसा चला जा रहा है। लेकिन अब हमें किसी के उपहास की रत्ती भर परवाह नहीं - लक्ष्य जो करीब है।

          लीजिये आ गया जिंजी।  पहले पहुंचे साथियों की तेल मालिश चल रही है, हम भी निश्चिन्त होकर पसर गये हैं आकर।  बस से आया दल हमारी आवभगत में कोई कसर नहीं छोड़ रहा - हाथ के इशारे-भर की देर है गरमागरम चाय और नाश्ते से सजी तश्तरियाँ हाज़िर हैं। थकान से चूर-चूर होने पर भी सब की आँखों से प्रसन्नता फूट रही है। रास्ते में कप्तान को सबसे ज्यादा दुःखी करने वाले, उन्हें रास्ते भर कोसने वाले अब मंजिल पर पहुंच जाने के बाद उन्हें धन्यवाद देते-देते नहीं अघाते। इतना ही नहीं, अगली बार फिर से आने का वादा भी कर रहे हैं।

          जो थक कर बैठ गया वह रह गया, लेकिन जो हिम्मत नहीं हारे उन्हें मंजिल मिल गई।

जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह शाम

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शुक्रवार, 1 नवंबर 2024

सूतांजली नवंबर 2024

 



मानवता में कुछ गिने चुने, थोड़े से व्यक्ति

शुद्ध सोने में बदलने

के लिए तैयार हैं और

ये बिना हिंसा के शक्ति को,

बिना विनाश के वीरता को और

बिना विध्वंस के साहस को

अभिव्यक्त कर सकेंगे। 

श्री मां 

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द्विवेदी जी की शर्त

आज हम एक विकट समस्या से जूझ रहे हैं। चिंतन-मनन करने वाले लोग लुप्त होते जा रहे हैं और इनकी जगह ले रहे हैं अपने मुंह मिट्ठू मियां। कहीं  से भी किसी भी प्रकार उपाधियाँ जमा कर लिये, डॉक्टरेट की उपाधियाँ और सम्मान खरीद लिये और सर तान कर निकल पड़े बड़े-बड़े दावे ठोंकने। खुद तो आईना देखते ही नहीं हैं, आईना दिखाने वाले लोग भी नहीं रहे। घिरे रहते हैं चापलूसों से। एक बार सोहन लाल द्विवेदी जी भी फंसे इनके बीच। तब बड़ी होशियारी से उन्हें आईना दिखा ऐसे खिसक लिये –

सन् 81-82 की बात है। बस्ती एक छोटा शहर था, प्रायः सभी प्रमुख लोग एक-दूसरे की गतिविधियों से परिचित थे। एक बार एक स्थानीय पत्रकार अपना एक साप्ताहिक पत्र निकालना चाहते थे और चाहते थे कि उसका लोकार्पण 'चल पड़े जिधर दो पग डग-मग में ...' जैसी प्रसिद्ध कविता के रचयिता पंडित सोहनलाल द्विवेदी जी के हाथों से हो। वे अपने एक मित्र, राजेंद्र परदेशी जी से अपनी इच्छा व्यक्त की। राजेन्द्र जी के अनुरोध पर पंडित सोहन लाल द्विवेदी आये और उन्हीं के निवास पर ठहरे। साप्ताहिक पत्र का लोकार्पण-कार्यक्रम दस बजे रात्रि से प्रारम्भ होना निश्चित था पंडित सोहनलाल द्विवेदी जी के आगमन की सूचना स्थानीय एवं बाहर से आये सभी कवियों को मिल चुकी थी। इस कारण अनेक कविगण उनसे मिलने घर पर आ गये।

          पंडित सोहनलाल द्विवेदी के सम्मुख होते ही आगंतुक कवियों ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। फिर कुछ कवियों ने अपनी-अपनी कवितायें उन्हें सुनाने की इच्छा व्यक्त की साथ ही अपने ही मुख से अपनी कविताओं के बारे में यह भी दावा ठोक दिया कि उन्होंने अपनी रचनाओं में बिलकुल नया प्रयोग किया है। आगंतुक कवियों की बात सुनने के बाद पंडित जी ने उनकी कविताएं सुनने के लिए एक शर्त लगा दीउनकी शर्त थी कि जो कवि अपनी कविताएं उन्हें सुनाना चाहता हो, वह अपनी कविता से  पहले पंत, निराला या महादेवी वर्मा की कोई एक कविता सुनाये, फिर अपनी।

          आगंतुक कवि घंटों बैठे रहे इधर-उधर की बातें करते रहे, पर किसी ने अपनी कविता नहीं सुनायी। कवियों से कविता सुनाने के लिए पंडित सोहनलाल द्विवेदी जी की शर्त राजेंद्र परदेशी को  ठीक नहीं लगी थी।

          साप्ताहिक पत्र का लोकार्पण कार्यक्रम सम्पन्न होने के पश्चात् उपस्थित जनसमुदाय के अनुरोध पर पंडित जी ने अपनी कवितायें भी सुनायीं फिर राजेंद्र जी के साथ घर लौट आये। रात भोजन के उपरांत बोले, 'शाम को तुम्हारे यहां आये कवियों की कविता सुनने के लिए मैंने जो शर्त रखी थी उसके बाद किसी ने मुझे अपनी कविता नहीं सुनाई। तुम्हें तो यह अच्छा नहीं लगा होगा, पर जानते हो मैने यह शर्त क्यों रखी थी, क्योंकि आजकल लोग पढ़ते तो हैं नहीं, कि उनके पूर्व के लोगों ने क्या लिखा है और यह दावा करने चले आते हैं कि उन्होंने जो लिखा है, वैसा अभी तक किसी ने नहीं लिखा। किस आधार पर यह डींग हांकते हैं, तुम तो विज्ञान के विद्यार्थी थे। क्या विज्ञान में कोई वैज्ञानिक बिना किसी सिद्धांत को जाने नये सिद्धांत की खोज करने का दावा कर सकता है। फिर कवि ही ऐसा क्यों कर रहे थे?'

          राजेंद्र परदेशी  जी का मौन आक्रोश शांत हो गया था। जो बूंद स्वयं ही सागर होने का भ्रम अपने मन में पाल लेता है, वह सागर की गहराई का अनुमान कैसे लगायेगा।

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संन्यास और त्याग

          गीता में अर्जुन प्रश्न करते हैं कि श्री कृष्ण को कौन ज्यादा प्रिय है सन्यासी या गृहस्थ? श्री कृष्ण मुसकुराते हुए कहते हैं कि उन्हें दोनों ही प्रिय हैं। जिनका चित्त सन्यास में है उसे सन्यासी बनना चाहिये और जिनका झुकाव गृहस्थी की तरफ है उसे त्याग की भावना के साथ गृहस्थ बनना चाहिये। प्रस्तुत प्रसंग कृष्ण के इसी कथन को स्पष्ट करता है। भगवद्गीता में आंतरिक वैराग्य, 'त्याग' और बाहरी त्याग 'संन्यास' के बीच किये गये अंतर के महत्व को बड़ी सरलता से सामने लाती है।

          दो घनिष्ठ मित्रों, निर्मल  और केशव में गहरी आध्यात्मिक आकांक्षा थी। एक दिन, चिंतन-मनन के बाद उन्होंने दुनिया त्याग कर संन्यासी बनने का फैसला लिया। कुछ समय साथ-साथ घूमने और विचार करने के बाद उन्होंने अलग-अलग  अकेले ही आगे बढ़ने का फैसला किया।



          निर्मल ने अपना नया नामकरण किया, निर्मलानंद और लंबे समय के पश्चात भिक्षाटन  करता किसी अमीर आदमी के द्वार पर पहुंचा। जब घर का मालिक खाना लेकर बाहर आये, तो निर्मलानंद को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वह अमीर आदमी उनका पुराना दोस्त केशव ही था। अमीर केशव, अपने संन्यासी दोस्त निर्मलानन्द को देखकर खुश हुआ और उससे कुछ दिनों के लिए अपने घर में रहने का अनुरोध किया। लेकिन निर्मलानंद अपने मित्र की वर्तमान स्थिति से खुश नहीं था। उसे लगा कि केशव का पतन हो गया है। निर्मलानंद ने तिरस्कार और दुखी होकर पूछा, "केशव तुम्हें यह क्या हुआ? संन्यास का पवित्र व्रत लेने के बाद तुम संसार के इस सागर में क्यों गिर गये!"

          केशव ने अपनी कथा सुनाई, "अपने अलग होने के बाद, मेरी मुलाक़ात एक संत से हुई। उन्होंने कुछ देर तक मेरी आँखों में  झाँका और कहा, 'युवा संन्यासी, इस जन्म में तुम्हारे कर्म संन्यासी जीवन के लिए नहीं हैं। आध्यात्मिक जीवन में प्रगति के लिए दुनिया पर विजय प्राप्त करने की कोई आवश्यकता नहीं है। अपने घर वापस जाओ और गृहस्थ बनो। कुरूक्षेत्र के दिव्य सारथी द्वारा दिखाये गए मार्ग का अनुसरण करो।'  मुझे महसूस हुआ मानो भगवान स्वयं उनके माध्यम से बात कर रहे हों। मैं अपने घर वापस चला गया। मैं नौकरी में लग गया और एक अमीर व्यवसायी व्यक्ति की इकलौती बेटी से विवाह कर लिया। एक दिन एक दुखद दुर्घटना में उनकी अचानक मृत्यु हो गई और मुझे उनके विशाल व्यापारिक साम्राज्य की देखभाल करनी पड़ी। लेकिन, जैसा कि ऋषि ने मुझसे कहा था, मैं अपने जीवन को, गीता के कर्म योग की भावना से आंतरिक वैराग्य के साथ संचालित करने की पूरी कोशिश कर रहा हूं।"

          निर्मलानंद ने व्यंग्यपूर्ण मुस्कान के साथ अपने मित्र की ओर देखा और कहा, "केशव तुम अपने आप को धोखा दे रहे हो। तुम धन और स्त्री की अपनी इच्छा पर काबू नहीं पा रहे हो और जब उस छद्म साधु ने तुम्हारी दबी हुई इच्छाओं के अनुकूल कुछ कहा, तो तुम्हें गिरने का औचित्य मिल गया और अपनी इच्छायें  पूरी करने उसी संसार में चले गये। तुम कहते हो कि तुम इसे आंतरिक वैराग्य के साथ कर रहे हो! क्या तुम अभी अपनी सारी संपत्ति, पत्नी और बच्चों को त्याग कर फिर से संन्यासी बन सकते हो?” केशव ने कहा, "हां, चलो चलें।" और तुरंत केशव सब कुछ त्याग कर संन्यासी बन निर्मलानंद के साथ चल दिये। दोनों पुराने दोस्त कुछ समय फिर साथ-साथ घूमे लेकिन और फिर अलग हो गए। जाते समय, निर्मलानंद ने केशव से कहा, "संन्यास के अपने महान और पवित्र जीवन के प्रति वफादार रहना और संसार में वापस न आना।"

          कई वर्षों बाद निर्मलानंद, एक राजकुमार द्वारा संन्यासियों के लिए बनवाई गई एक धर्मशाला में भोजन कर रहे थे। जब वह जाने ही वाले थे, एक लंबा युवा राजकुमार निर्मलानंद के पास आया और कहा, "श्रद्धेय महाशय, मैंने अपने गुरु के निर्देशन में आप जैसे संन्यासियों के लिए यह धर्मशाला बनवाई है। मेरे गुरु आपसे मिलना चाहते हैं। उन्होंने कहा है कि वे आपको जानते हैं। क्या आप कृपया मेरे साथ आ सकते हैं?" यह सोचकर कि वह कौन हो सकता है, निर्मलानंद उन के  साथ चल पड़े। राजकुमार उसे एक बड़े भव्य कमरे के द्वार पर ले गया। राजकुमार ने कहा, "मेरे गुरु इस कमरे में आराम कर रहे हैं। आप अंदर जा सकते हैं।"

          जैसे ही निर्मलानंद कमरे में दाखिल हुए और गुरु के सामने खड़े हुए, उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि यह उनका दोस्त केशव है, जो एक नरम बिस्तर पर आराम से लेटा हुआ है। उसके पास एक बड़ी मेज पर कई प्रकार के फल, पेय और मिठाइयाँ रखी हुई हैं। केशव अपने बिस्तर से उठे और गर्मजोशी से निर्मलानंद को गले लगाया और नरम कोमल आवाज में कहा, "मेरे प्यारे दोस्त, तुम कैसे हो? मैं संन्यास की अग्नि में शुद्ध आपके शरीर के स्पर्श से पवित्र महसूस कर रहा हूं।"

          लेकिन निर्मलानंद ने उसे जोर से धक्का दिया और कठोर स्वर में कहा, "मुझे मत छूओ, पाखंडी। तुमने मुझे क्यों बुलाया? संन्यास के पवित्र व्रत को तुमने फिर अपवित्र किया है। तुम्हें यह समझना चाहिए कि संन्यास केवल एक पीला वस्त्र नहीं है, जिसे तुम अपनी इच्छानुसार पहन सकते हो या फेंक सकते हो।"

          केशव ने शांत भाव से उत्तर दिया, "मैं देख रहा हूं कि तुम मुझसे बहुत नाराज हो। मैं तुम्हारे साथ कुछ दिन बिताना चाहता हूं। तुम कृपया मेरी आगे की कहानी सुनो।  हमारे अलग होने के कुछ महीने बाद मैं एक पेड़ के नीचे बैठा था और त्याग, आंतरिक वैराग्य और संन्यास, बाहरी त्याग के बीच गीता में बताये  गये अंतर पर विचार कर रहा था। उसी समय, यह युवा राजकुमार आया और उसने कर्म योग पर गीता के बारे में कई प्रश्न पूछे। हमने इस विषय पर लंबी चर्चा की। मैंने इस विषय पर उनके सभी संदेहों का समाधान किया। इसके अंत में उन्होंने पूछा, 'स्वामीजी, क्या आप वास्तव में सोचते हैं कि हम शक्ति और धन के मध्य रहते हुए पूर्ण आंतरिक वैराग्य की स्थिति में रह सकते हैं?' मैंने अनुभव से उत्पन्न एक निश्चित आंतरिक विश्वास के साथ कहा, "हां, मुझे लगता है कि यह संभव है", राजकुमार ने कहा, 'आप एक संन्यासी हैं जिसने दुनिया को त्याग दिया है, लेकिन आप आंतरिक वैराग्य पर विश्वास के साथ बात करते हैं। आपके विश्वास का आधार क्या है? क्या आपका का कोई आंतरिक अनुभव है?' मैंने उन्हें अपना पिछले सन्यास का इतिहास सुनाया।”

          उसने ध्यान से सुना और मुस्कुराते हुए कहा, 'स्वामीजी, मुझे लगता है कि आप ही वह व्यक्ति हैं जिसकी मैं तलाश कर रहा हूं और उन्होंने बताया कि वे कौन थे और अपने परिवार के बारे में बताया; वह एक राजघराने का राजकुमार था। उनके पिता और परिवार के अधिकांश सदस्य आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। वे एक कुल-गुरु की तलाश में थे जो उनकी आध्यात्मिक खोज में उनका मार्गदर्शन कर सके। कुछ दिन पहले, उन्हें एक सपना आया जिसमें कुलदेवता-परिवार की देवी ने उन्हें एक युवा संन्यासी की तलाश करने के लिए कहा, जिसके पास सांसारिक अनुभव हो और उसे अपने कुलगुरु के रूप में स्वीकार करने कहा। आपमें हमारे कुलदेवता द्वारा बताये गए सभी लक्षण और हमारे कुलगुरु बनने के लिए आवश्यक सभी गुण हैं' राजकुमार ने कहा और पूछा 'क्या आप हमारे गुरु बनेंगे और हमें चेतना की उस स्थिति को प्राप्त करने में मदद करेंगे जो आपने हासिल की है?'

          "मुझे लगा कि इसके पीछे भगवान की इच्छा है और मैंने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया। लेकिन मैं इन चीजों से जुड़ा नहीं हूं, जिनका मैं अभी आनंद ले रहा हूं। यदि आप मुझे फिर से आपके साथ आने और तीसरी बार संन्यासी बनने के लिए कहें, तो मैं ऐसा कर सकता हूं। बिना ज़रा भी झिझक और बिना पीछे मुड़े तुम्हारे साथ इस महल से बाहर चल सकता हूँ।”



 

    निर्मलानन्द विचारमग्न हो गये। कुछ मिनटों की चुप्पी के बाद, उन्होंने कहा, "मुझे विश्वास है कि तुम जो कह रहे हो वैसा कर सकते हो। तुम्हारा कर्म त्याग के लिए है, संन्यास के लिए नहीं। तुमने पूर्ण त्याग प्राप्त कर लिया है, तुम ही सच्चे संन्यासी हो, जो धन और विलासिता के बीच भी आंतरिक रूप से स्वतंत्र और अनासक्त रह सकते हो, जब वे अपने जीवन के दौरान या अपने कर्म के हिस्से के रूप में उसके पास आते हैं तो उनका आनंद लेते हो और जब वे जाते हैं तो उन्हें उसी आंतरिक वैराग्य के साथ से जाने देते हो। तुम धन्य हो।“

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मंगलवार, 1 अक्टूबर 2024

सूतांजली अक्तूबर 2024

 


असहयोग और कुछ नहीं,

शासकों के पशुबल को हटाने का कर्त्तव्य है

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युद्ध और गांधी

युद्ध

महाभारत

कौरव – पांडव

ऐसा कोई आयुध न बचा जिसका प्रयोग न हुआ हो।

युद्ध की सभी विधाओं का प्रयोग हुआ।

हाथी, घोड़े, ऊंट, पैदल, रथ हर प्रकार की सेना थी।   

एक ऐसा भयानक युद्ध जिसमें सम्पूर्ण आर्यावर्त के राज्य अपनी-अपनी सेना के साथ लड़े-कटे-मरे।

द्वारकाधीश श्री कृष्ण ने भी यादवों की अपराजेय चतुरंगिणी सेना के साथ युद्ध में भाग लिया।

18 दिन के इस भयानक रक्तपात के बाद युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करवा श्रीकृष्ण अपने स्वर्ण जड़ित गरुड़ध्वज से सुशोभित रथ में द्वारका वापस चले।

            क्या श्री कृष्ण अपनी मृदु-मुस्कान के साथ द्वारका में प्रवेश किए होंगे? क्या उनमें विजय की प्रसन्नता रही होगी? उनकी चतुरंगिणी सेना किस हालत में वापस द्वारका आई होगी? द्वारका के द्वार पर जन सैलाब तो जमा होगा, लेकिन क्या उनकी आँखें विजयी श्रीकृष्ण को खोज रही थीं या उनको जो अब तक नहीं लौटे थे और अब कभी वापस लौट कर नहीं आने वाले थे? श्रीकृष्ण के कानों में मंगल गान पड़ रहे होंगे या रोने की, आर्तनाद की, चीख-पुकार की मार्मिक आवाजें आ रही होंगी?

            युद्ध का कारण कुछ भी हो, परिणाम कुछ भी हो, किसी भी पक्ष की विजय हो सत्य तो यही है कि दोनों ही पक्ष पराजित होते हैं। विजयी पक्ष भी बहुत कुछ हार जाता है। अपरिमित  जन-धन की क्षति होती है जिसकी पूर्ति असंभव है। दिल में लगने वाले घाव कभी नहीं भरते।

            जब द्वितीय विश्व युद्ध के बादल मंडरा रहे थे, देशों के बीच तना-तानी चल रही थी, गांधी ने शांति बनाये  रखने की गुजारिश की थी और युद्ध के अन्य विकल्पों पर कार्य करने की सलाह दी थी। लेकिन न हिटलर और न ही मित्र देशों को उनका सुझाव रुचा। उन्होंने अहिंसक प्रतिरोध करने का सुझाव दिया था। अहंकार में सराबोर दोनों ही पक्षों को यह नागवार लगा। यह तो आत्मसमर्पण है, अपमान है?

            4 वर्षों तक चले इस प्रलयंकारी युद्ध का समापन अणुबम के विस्फोट से हुआ। युद्ध की समाप्ति के बाद विदेशी पत्रकारों का एक दल गांधीजी से मिलने यह बताने पहुंचा कि युद्ध में मित्र देशों की विजय हुई और  हिटलर मारा गया। गांधी ने पूछा कि उस युद्ध में कुल कितने जन-धन का नुकसान हुआ? पत्रकारों ने एक दूसरे को देख गांधी को संख्या बताई और कहा यह अभी तक के अनुमानित आंकड़े है। गांधी का अगला सवाल था कि अगर उनकी बात मानी जाती तो नुकसान इससे कम होता या ज्यादा? कुछ देर की चुप्पी के बाद उत्तर आया, शायद इससे कम होता लेकिन ...... । गांधी ने बीच में ही रोक दिया और हिंसा पर अहिंसा का राज होता। अभी, हिंसा पर हिंसा की ही विजय हुई है, इसके दूरगामी परिणाम होंगे।

कालांतर में, भविष्य में युद्ध रोकने के लिए बने वैश्विक संगठन शक्तिहीन हो गये। अनेक समझौते हुए, संयुक्त राष्ट्र संघ भी बना। विश्व दो गुटों में विभक्त हो गया। हर समय, कहीं-न-कहीं बम के गोले, टैंकों की गरगराहट, गोलियों की आवाज चलती ही रहती है। युद्ध थमने का नाम ही नहीं ले रहे। पूरा विश्व बारूद की ढेर पर है, कब कहाँ धमाका होगा पता नहीं। इन आमने-सामने के युद्ध के अलावा गुमनाम और अब खुल्लम-खुल्ला आतंकवाद के निरंतर युद्ध से पूरी दुनिया खौफ में है। यह मत सोचिये जब हम युद्ध की बात कर रहे हैं तब केवल दो देशों के मध्य युद्ध की चर्चा कर रहे हैं। हर देश, कौम, जाति, धर्म और तो और हर इंसान भी दूसरे इंसान से युद्ध कर रहा है।

जब तक यह नफरत की आग समाप्त नहीं होगी युद्ध समाप्त नहीं होंगे। शांति का एकमात्र उपाय प्रेम, मुहब्बत, सौहार्द, सद्भावना ही है।  

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असहयोग

(काँग्रेस की बैठक में अपने असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव को स्वीकृत कराने के लिए गांधी ने बड़ी मेहनत की और बड़े ज़ोरदार और तार्किक ढंग से अपनी बात रखी। गांधी-मार्ग पत्रिका ने इतिहास में गोता लगाकर सामग्री एकत्र कर  उसे प्रकाशित किया, इससे गांधी को समझा जा सकता है। उसी के कुछ अंश।)

            गांधी की इतनी छवियां गढ़ दी गई हैं कि गांधी कहीं खो ही गये हैं! हमारे हाथ बचे हैं या तो 'सुविधा के गांधी' या 'दुविधा के गांधी' गांधी इन दोनों से दूर, काल की दूरियों को पार कर हर उस जगह खड़े मिलते हैं जहां स्वतंत्रता-समता का संघर्ष हैउनके तरकश में सत्य है, तो सत्याग्रह भी है; सहमति की आतुरता है तो असहमति की दृढ़ता भी है; सबको साथ लेने का धीरज है तो सबको छोड़ अकेले निकल पड़ने की तीव्रता भी है, वे सबके साथ, सब तरह का सहयोग करने को तत्पर मिलते हैं तो असहयोग का ब्रह्मास्त्र चला कर सबको घुटनों पर भी ला देते हैंयह योद्धा गांधी आज की जरूरत है

            1920 का काल था1915 में भारत लौटे 46 वर्ष के गांधी ने केवल पांच सालों में भारत के सार्वजनिक जीवन को अपनी मुट्ठी में कर लिया था, और असहयोग आंदोलन की व्यापक योजना कांग्रेस के सामने रख दी थी। काँग्रेस का हृदय गांधी के साथ था, दिमाग कुछ दूसरा कह रहा थासर्वश्री विपिन चंद्र पाल, मुहम्मद अली जिन्ना, एनी बीसेंट, मदनमोहन मालवीय, जमनादास द्वारकादास आदि सबने गांधी के असहयोग से सहयोग करने से इंकार करते हुए, उनके प्रस्ताव पर हर तरह की आपत्तियां उठाई थीं... गांधी ने दृढ़ता से एक-एक आपत्ति का जवाब देते हुए उनकी निरर्थकता ही उजागर नहीं कर दी बल्कि यह भी संकेत दे दिया कि अब देश रुकने-थमने को तैयार नहीं है- "हम, जो भारत का नेतृत्व करते हैं उनमें भी वे गुण नहीं हैं, तो भारत को कभी स्वराज्य नहीं मिलेगा" मैं अच्छी तरह जानता हूं कि इस महान सम्मेलन के समक्ष यह प्रस्ताव रखने का जो अवसर मुझे दिया गया है, उससे मेरे कंधों पर कितनी गंभीर जिम्मेवारी आ पड़ी हैमैं यह भी समझता हूं कि आप यह प्रस्ताव मंजूर कर लेंगे तो मेरी अपनी और आपकी भी मुश्किलों में कितनी वृद्धि हो जाएगीमेरा प्रस्ताव मंजूर करें तो इसका अर्थ होगा कि अब तक जनता अपने हक और सम्मान की रक्षा के लिए जो नीति अपनाती रही, उसे हम बिलकुल बदल रहे हैंमैं पूरी तरह जानता हूं कि हमारे बहुत से नेता इसके विरुद्ध हैं - ऐसे नेता, जिन्होंने मातृभूमि की सेवा में मेरी अपेक्षा कहीं अधिक समय और शक्ति लगाई हैयह सब पूरी तरह समझकर मैं आपके सामने खड़ा हुआ हूंमैं यह प्रस्ताव परमेश्वर से डरते हुए और स्वदेश के प्रति अपने धर्म के भासे प्रेरित होकर पेश कर रहा हूंमैं चाहता हूं कि आप उसका स्वागत करेंआप घड़ी भर के लिए मुझे भूल जाइये। मुझ पर यह आरोप है कि मैं बड़ा 'महात्मा' हूं और तानाशाही चलाना चाहता हूंमैं साहसपूर्वक कहता हूं कि मैं आपके पास 'महात्मा' बनकर या हुकूमत करने की आकांक्षा से नहीं आया हूंमैं तो आपके सामने अनेक वर्षों के अपने आचरण में असहयोग के जो अनुभव मुझे हुए, उसे उपस्थित करने खड़ा हुआ हूंमैं इस बात को मानने से इनकार करता हूं कि असहयोग देश के लिए बिलकुल नयी चीज हैहजारों की भीड़ वाली, सैकड़ों सभाओं ने असहयोग को स्वीकार किया हैमैं फिर आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप इस महत्व के प्रश्न पर विचार करने में धीरज और शांति से प्रस्ताव के गुण-दोषों पर अपना मत निश्चित कीजिये।

सहनशक्ति की तालीम : प्रस्ताव को महज मंजूर कर लेने से आप छूट नहीं जाएंगेजो धारा जहां लागू होती हो, वहां उस पर अमल शुरू कर देना पड़ेगामेरा अनुरोध है कि आप धीरज रखकर मेरा कहना सुन लीजिये, तालियां भी न बजाइये और आवाज-कशी भी मत कीजिये, तालियों से विचारों का प्रवाह रुकता है और आवाज-कशी करने से बोलने और सुनने वालों के बीच जुड़ा हुआ तार टूट जाता हैअसहयोग में तो अनुशासन और त्याग की साधना की बात हैविरोधी के मत को धीरज और शांति से समझ लेना असहयोग का लक्षण हैबिलकुल ही विरुद्ध विचारों को भी सह लेने की वृत्ति जब तक हम पैदा नहीं कर लेंगे, तब तक असहयोग असंभव हैक्रोध के वातावरण में असहयोग चल ही नहीं सकता। मैं वे अनुभव से एक बहुत महत्वपूर्ण पाठ सीखा हूं कि क्रोध को दबा दिया जाये तो जैसे दबाकर रखी गई उष्णता में से शक्ति उत्पन्न होती है वैसे ही संयम में रखे गए क्रोध से भी ऐसा बल पैदा किया जा सकता है कि सारे संसार में हलचल मचा देहम मत-विरोध के बावजूद एक-दूसरे को सहन करना सीख लें तो इससे अधिक अनुशासन और क्या हो सकता है?

कांग्रेस और अल्पमत : मुझसे कहा गया है कि मैं तो बस विनाश का ही कार्य करता रहता हूंअपने प्रस्ताव से मैं देश के राजनीतिक जीवन में दरार डाल रहा हूंकांग्रेस किसी खास दल की संस्था नहीं हैसंख्या थोड़ी है, इसीलिये  किसी दल को कांग्रेस छोड़कर जाने की जरूरत नहींउन्हें समय पाकर देश के लिए अपना मत रुचिकर बनाकर अपना ही बहुमत बना लेने की आशा रखनी चाहिएहां, कांग्रेस द्वारा निंदित किसी भी नीति को कांग्रेस के नाम से कोई अख्तियार नहीं कर सकताआप मेरा ढंग नापसंद करेंगे तो मैं कोई कांग्रेस छोड़कर नहीं चला जाऊंगाआज मेरे विचारों का अल्पमत हो, तो जब तक वह बदलकर बहुमत नहीं बन जायेगा तब तक मैं कांग्रेस को समझाता ही रहूंगा

असहयोग एकमात्र उपाय : पंजाब पर सितम ढाये गए और यह समझ लीजिए कि जिस दिन एक भी पंजाबी को पेट के बल चलना पड़ा, उस दिन सारा भारत पेट के बल चलायदि हम भारत की योग्य संतान हैं तो हमें यह कलंक का टीका मिटा ही डालना होगाइन जुल्मों का न्याय कराने के लिए हम महीनों से जूझ रहे हैं, परंतु अभी तक हम ब्रिटिश सरकार को रास्ते पर नहीं ला सकेक्या लोग अब तक, इतना सब कुछ करने के बाद, इतना जोश और लगाव प्रकट करने के बाद, केवल अपनी क्रोध की भावना का थोथा प्रदर्शन करके ही बैठे रहना पसंद करेंगे? अगर कांग्रेस अनिच्छुक अधिकारियों को न्याय करने के लिए विवश नहीं कर पाती तो फिर वह अपने अस्तित्व की सार्थकता कैसे सिद्ध करेगी? अपने सम्मान की रक्षा कैसे करेगी? और उनके खून से सने हाथों से कोई मेहरबानी स्वीकार करने से पहले यदि वह उनसे अपने किये पर पश्चाताप नहीं प्रकट करा पाती तो यह कैसे कहा जा सकता है कि उसने न्याय प्राप्त कर लिया या अपने सम्मान की रक्षा कर ली?

असहयोग की सर्वोत्तम योजना : इसी कारण मैं असहयोग की अपनी योजना पके सामने रख रहा हूंमैं आपसे यह इसलिये नहीं कहता कि मुझे अपनी योजना का आग्रह हैमेरे कहने का मतलब यह है कि आप मेरी योजना को जब खूब विचार करके देख लेने पर दूसरी कोई योजना आपको इससे बढ़कर मालूम न हो, तभी मंजूर कीजिये । मैं यह दावा करता हूं कि इस योजना को लोगों का काफी समर्थन मिला है लेकिन मैं आपसे फिर यह कहने की हिम्मत करता हूं कि इस पर अमल करें तो एक ही वर्ष में स्वराज्य ले सकते हैंयह विराट समाज इस प्रस्ताव को केवल पास कर दे, इतना ही काफी नहीं हैदेश की मौजूदा हालत को ध्यान में रखकर दिन-दिन अधिक जोश के साथ लोग उस पर अमल करें, तभी वह फलदायी हो सकता है

त्याग और अनुशासन असहयोग के सिवा एक और मार्ग लोगों के सामने था और वह था तलवार उठाने का, परंतु भारत के पास इस समय तलवार नहीं हैयदि उसके पास तलवार होती तो मैं जानता हूं कि वह असहयोग की इस सलाह को सुनता तक नहीं, परंतु मैं तो आपको यह बता देना चाहता हूं कि आप अनिच्छुक शासकों के हाथों रक्तपात के मार्ग द्वारा जबरन न्याय प्राप्त करना चाहते हों, तो उस मार्ग में भी आवश्यक अनुशासन और त्याग के बिना आपका काम नहीं चलेगामैंने आज तक नहीं सुना कि जिसमें कोई तालमेल न हो ऐसी किसी भीड़ ने कभी लड़ाई जीती होकवायदी सेना को लड़ाई जीतते मैंने और आपने भी देखा हैब्रिटिश सरकार या यूरोप की सम्मिलित ताकत से लोहा लेना हो तो हमें अनुशासन और त्याग पैदा करना ही होगामैं लोगों को उस अनुशासन और त्याग की स्थिति में पहुंचा हुआ देखने का उत्सुक हूंउस स्थिति को देखने को मैं उतावला हूंबुद्धिबल में हम पिछड़े हुए नहीं हैं, परंतु मैं देखता हूं कि राष्ट्रीय पैमाने पर अभी तक हममें त्याग और अनुशासन नहीं आया है कौटुंबिक क्षेत्र में तो हमने अनुशासन और त्याग का जितना विकास किया है उतना संसार के और किसी राष्ट्र ने नहीं किया। उसी वृत्ती को राष्ट्रीय व्यवहार में भी दिखाने का इस समय मैं आपसे अनुरोध कर रहा हूं

            अंततः काँग्रेस ने गांधी का असहयोग प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था।

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