शनिवार, 1 फ़रवरी 2025

सूतांजली फरवरी 2025


 

                  बस अंत नहीं, बसंत है यह, गूँजे दिक-दिगंत यह,

                              वनदेवी आज शृंगार करे, हम मिल कर यह निनाद करें

माँ अज्ञान हमारा दूर करे।

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हे धरती माँ

 (श्री विजय दत्त श्रीधर के लेख पर आधारित)

          हमारे पुराने संस्कृत ग्रन्थों में कहाँ, क्या और कितना दबा पड़ा है शायद हमें इसकी कोई जानकारी नहीं है। जल-शुद्धि की एक संगोष्ठी में उपस्थित समुदाय संस्कृत-साहित्य में भारत की प्राचीन परंपरा और तकनीकों की चर्चा कर रहे थे। तभी एक वैज्ञानिक ने कहा - पुराना सोच पोंगा पंथ है, अनर्गल है, दकियानूसी है।  इतनी सी खरोंच भर करने से जो अमृत छलका वह जानने योग्य है। एक बुजुर्ग ने प्रत्युत्तर में 'भविष्य पुराण' से एक श्लोक पढ़ा जिसका अर्थ है-

'दस कुओं के बराबर एक बावड़ी, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष।'

और - रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून। पानी गये न ऊबरे मोती मानुष चून ।।

      दोनों उद्धरण निरुत्तर कर देने वाले हैं। वे पोंगापंथी नहीं हैं, सिद्ध विज्ञान हैं और लोक शिक्षण का चरम ज्ञान इनमें निहित है।

ऋषि मनीषा ने कहा है- (वृहदधर्म  पुराण, 54, 45-47)

'भाद्र कृष्ण चतुर्दशी को जितनी दूर तक गंगा का फैलाव रहता है उतनी दूर तक दोनों तटों का भू-भाग 'गर्भ' है। उसके बाद 150 हाथ की दूरी का भू-भाग 'तीर' है। तीर से एक गव्यूति (दो हजार धनुष, जो एक कोस या दो मील के बराबर होता है) पर्यंत का भू-भाग क्षेत्र कहलाता है। इस विस्तार में पाप कर्मों का निषेध है।'  व्यवहार में इसका अर्थ है कि जल स्त्रोत के तट से पर्याप्त दूरी तक निवास-वाणिज्य-व्यापार-कल-कारखाने समेत ऐसी किसी भी गतिविधि की इजाज़त नहीं है।

          ताज्जुब है, सैकड़ों साल पहले ऋषि मनीषा को यह ज्ञान-विवेक था!

          'मत्स्य पुराण' में तड़ाग भेदक (तालाब तोड़ने वाले) के लिए जल में डुबो कर मृत्यु दंड देने का प्रावधान है। 'अग्नि पुराण' में भी ऐसा मिलता है। चाणक्य नीति में भी ऐसे दंड का विधान है। लेकिन आज़ादी के बाद सरकारी निकायों द्वारा बनवायी जा रही जल संरचनाएं भ्रष्टाचार के गारे से इतनी बदहाल है कि तड़ाग भेदन के अपराध की नींव पर ही खड़ी होती हैं।

          राजा भोज का भोजताल एक हजार साल से कायम है। परंतु, हजारों करोड़ रुपये की लागत और आधुनिक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के प्रयोग से बनने वाले बांध की एक हज़ार तो क्या, एक सौ साल की गारंटी कोई नहीं दे सकता है।

          बुंदेलखंड, बघेलखंड, मालवा अंचल में नवजात शिशु के जन्म के सवा महीने बाद सद्य-प्रसूता मां घर से बाहर पहला कदम कुएं की ओर रखती है। इस रस्म को कुआं पूजन कहते हैं। निमाड़ में इसका रूप जलवायु पूजन का है। सनातन धर्म को मानने वालों के प्रमुख आराध्य देव हैं विष्णु, शिव, गणेश तथा देवियों में दुर्गा-लक्ष्मी-सरस्वती। इन्हीं की सबसे ज़्यादा पूजा होती है। तब गृह लक्ष्मी का पहला कदम मंदिर की ओर क्यों नहीं? पहली पूजा के लिए जल (कुआं) को सर्वोपरि महत्व क्यों? सवाल  कठिन है लेकिन जवाब सरल है। हमारे पुरखों को जीवन के लिए जल के महत्व की पहचान थी। वे जानते थे कि जल है तो जीवन है और जो जीवनदाता है वही देवता है। वाचिक परम्परा वाली भारतीय संस्कृति में ऐसे लोक-विज्ञान के लिए शोध-पत्र नहीं रचे गये। पेटेण्ट की होड़ नहीं लगी बस, संस्कारों के अनुशासन में वर्जना और प्रोत्साहन को ढाल दिया गया पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनका अनुपालन-अनुकरण होता रहा। मर्म की समझ जहां कमज़ोर पड़ी वहीं विकारों ने डेरा डाल लिया।

    

इलाहाबाद के अंग्रेज़ कमिश्नर हॉकिन्स ने कोई एक शताब्दी पहले फरमान निकाला-शहर की गंदगी गंगा में बहा दी जाये। बाद के वर्षों में गुलाम मानसिकता ने इसे देशभर के लिए कानून मान लिया। इससे शहर तो साफ़ नहीं हुए, नदियां ज़रूर मौत के मुंह में समाने लगीं। धर्म के ठेकेदारों के लिए भी यह निहायत शर्मनाक है, जो नदियों को देवी मां की तरह पूजते और आरती के आडम्बर तो रचते हैं, परंतु उनकी शुद्धि के लिए न तो सचेष्ट हैं, न जागरूक हैं और न ही समाज की चेतना को जाग्रत करने का दायित्व निभा रहे हैं। प्रकृति-चिंतक अमृतलाल वेगड़ कितना सही कहते हैं, 'जब मनुष्य असभ्य था तब नदियां स्वच्छ थीं। आज जब मनुष्य सभ्य हो गया है तब नदियां मलिन और विषाक्त हो गयी हैं..। ज्यों-ज्यों औद्योगिक सभ्यता का दबदबा बढ़ता गया पानी के बुरे दिन शुरू हो गये।'

          इसके विपरीत, औद्योगिक सभ्यता के कई सौ बरस पहले भारतीय ऋषि मनीषा ने जल स्रोतों के साथ मनुष्य के बरताव की लक्ष्मण-रेखा खींच दी थी। उस पर अमल भी किया जाता रहा।

मनुस्मृति, (4-56) में लिखा है - पानी में मल, मूत्र, थूक, रक्त या विष का विसर्जन न करें।  

'नारायणोपनिषद' में कहा गया है-  'जल ही विश्व में सर्वभूत है, जल ही प्राण है, जल ही पशु है, जल ही ब्रहा है, जल ही अमृत है, जल ही स्वराज है, जल ही वेद है, जल ही आकाश है, जल ही सत्य है और जल ही तीनों लोक हैं।' जल और प्रकृति की ऐसी समझ लोक- ज्ञान का चरम है।

          न केवल मानव जीवन बल्कि समूची सृष्टि के लिए शुद्ध जल की अनिवार्यता से अवगत वैदिक ऋषि कामना करता है- (अधर्ववेद, भूमि-सूक्त, 12/1/30)

जो जल संपूर्ण जगत के प्राणियों में जीवन का संचार करने वाला है वह जल स्वयं शिव है। इसलिये जल की पूजा यानि उपयोग करना जानी चाहिये न कि अपव्यय।

          सन् 1732 ईस्वी की घटना है। राजस्थान की जोधपुर रियासत में खेजड़ी वृक्षों की रक्षा करते हुए विश्नोई समाज की 69 महिलाओं और 294 पुरुषों ने प्राण न्योछावर कर दिये थे। इस कुर्बानी ने राजसत्ता के कुल्हाड़ों को वृक्ष-संहार बंद करने पर विवश कर दिया था। राजस्थान में उक्ति प्रचलित है- 'सीस कट्या रूख बचे तो भी सस्ता जाण।' तात्पर्य यह कि जान देकर भी पेड़ बच जाए तो सौदा घाटे का नहीं।

          लोक व्यवहार में पीपल का वृक्ष काटना और उसकी लकड़ियां जलाना वर्जित किया गया है। लोक की आस्था को इससे जोड़ दिया गया। पीपल में विष्णु और वट (बरगद) में शिव का वास माना गया। दोनों दीर्घायु और विशालकाय वृक्ष होते हैं। वातावरण को शुद्ध करने की अपार क्षमता होने के कारण ही ऐसे वृक्ष में देवत्व का वास माना गया। पीपल, वट कटने से बच गये।

          औषधीय गुणों के कारण ही नीम में शीतला माता का वास माना गया। वट-सावित्री व्रत का विधान किया गया। एक व्रत आंवला नवमी का होता है। अशोक का भी औषधीय महत्व है। फलदार-फूलदार पेड़-पौधों को आस्था के लोकाचार और वर्जना के निषेध के साथ जोड़कर संरक्षित किया गया। बचपन में हमें सिखाया जाता था कि शाम होने के बाद पौधों को हाथ नहीं लगाना चाहिए, वे सो जाते हैं। जड़ी-बूटियां चमत्कारी औषधीय गुणों से सम्पन्न हैं। वनवासी समाज बड़ी सूझबूझ और कौशल के साथ इनका प्रयोग उपचार और आरोग्य के लिए सदियों से करता आ रहा है।

          अथर्ववेद का भूमि सूक्त वस्तुतः भारतीय संस्कृति की पर्यावरण चेतना का उद्घोष है। वैदिक ऋषि प्रकृति के समस्त उपादानों से अनुकूल रहने की प्रार्थना करते हुए कहता है- (अथर्ववेद, 1, 3, 15)  सभी नदियां हमारे अनुकूल बहें, वायु हमारे अनुकूल बहे, पक्षी भी हमारे अनुकूल हों।

          अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में कहा गया है- 'हे धरती मां! जो कुछ मैं तुझसे लूंगा वह उतना ही होगा जिसे तू पुनः पैदा कर सके। तेरे मर्मस्थल पर या तेरी जीवन शक्ति पर कभी आघात नहीं करूंगा।' वास्तव में यह सोच मनुष्य के पशु-पक्षी, नदी-पर्वत, जड़-चेतन के साथ सह-अस्तित्व के रिश्ते की है। वृक्ष हमें  प्राणवायु देते हैं और कार्बन डाइ ऑक्साइड सोख लेते हैं। यही वृक्षों का शिवत्व है, महत्व है।

          ... आधुनिक विज्ञान की दुधारी स्थिति है। उसे भी वरदान और अभिशाप की कसौटी पर परखा जाना अभीष्ट है। परमाणु शक्ति की सृजन और विनाश के सामर्थ्य को पहचानें। इससे ऊर्जा पायी जा सकती है तो नागासाकी-हिरोशिमा जैसे भीषण विध्वंस भी रचे गये हैं। चिकित्सा के वरदानों पर तालियां बजाइये तो घातक शस्त्रों पर लानत भेजिये, ध्वनि तरंगों से सूचना-संवादों का संचार कीजिये, तो दंगे-फसाद भी भड़काए जाते हैं।  रासायनिक खाद कीटाणुनाशक खेती में सहायक हो सकते हैं तो उनका अतिरेक मिट्टी की उर्वरा शक्ति को निगल भी सकता है; कैंसर जैसी व्याधियां फैला सकता है। जल-प्रदूषण, कार्बन उत्सर्जन, वनों का विनाश, तपती धरती, सूखती नदियां, यमुना ग्लेशियरों पर मंडराता पिघल जाने का खतरा, बंजर होते खेत, मौत के मुंह में धकेलते रसायन और इस पर भी संयम को मुंह चिढ़ाती हुई लालच की मार..। यही तो इस समय के विकट सवाल हैं जिन्हें आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने पैदा किया है, पनपाया है।

          गांधी जी ने पश्चिम की औद्योगिक सभ्यता को राक्षसी सभ्यता कहा है। असंयमी उपभोक्तावाद और लालची बाज़ारवाद ने सृष्टि विनाश की नींव रखी। भारत का परम्परागत संयमी जीवन-दर्शन ही त्रासद भविष्य से बचाव का मार्ग सुझाता है। समाज में वैज्ञानिक चेतना का प्रसार ज़रूरी है। परम्परागत ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय एवं संतुलन ज़रूरी है। इसके लिए हमें लोक संस्कृति, लोक संस्कार और लोक परम्पराओं के पास लौटना होगा। हमारे सामने एक ही मार्ग है; जो प्रकृति सम्मत है वही ग्राह्य है और जो सृष्टि के विनाश का सरंजाम जुटाता है वह अग्राह्य है, अस्वीकार्य है। पृथ्वी का भविष्य इसी बात पर टिका है कि हम अस्वीकार्य के खिलाफ़ खड़े होंगे। पृथ्वी को मां समझकर ही हम जीवन के भविष्य की कोई सार्थक कल्पना कर सकते हैं।

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नारी - पुरुष

युगों से पुरुष अपने-आपको नारी से बड़ा समझता है तथा अपना प्रभुत्व जमाना चाहता है। उधर नारी अपने-आपको उत्पीड़ित अनुभव करती है और फिर परोक्ष या अपरोक्ष रूप में विद्रोह करती है। इन दोनों का यह झगड़ा युगों से चला आ रहा है;  मूल में यह एक ही है, पर यह अनगिनत रूप-रंगों में प्रकट होता है। यह स्थिति सिर्फ भारत या एशिया या और किसी समूह की या भौगोलिक प्रदेश की नहीं बल्कि पूरे विश्व की है।

          यह तो मानी हुई बात है कि पुरुष सारा दोष नारी पर थोपता है और नारी सारा दोष पुरुष पर। पर, वास्तव में, दोष समान रूप से दोनों का है और दोनों में से किसी को भी अपने-आपको दूसरे से बड़ा मानने का गर्व नहीं करना चाहिये। जब तक प्रधानता और हीनता का यह विचार दूर नहीं कर दिया जायेगा, तब तक कोई भी व्यक्ति इस भ्रान्ति को दूर नहीं कर सकेगा जो मानव जाति को दो विरोधी शिविरों में बांट देती है, और तब तक समस्या का कोई समाधान नहीं हो पायेगा।...

          अपने पारस्परिक सम्बन्ध में पुरुष और स्त्री एक दूसरे के पूरी तरह निरंकुश स्वामी और साथ ही कुछ दयनीय दास भी होते हैं। हां, सचमुच दास; क्योंकि जब तक मनुष्य में इच्छाएं हैं, अभिरुचियां और आसक्तियां हैं, तब तक वह इन वस्तुओं का और उन व्यक्तियों का भी दास है जिन पर वह इन इच्छाओं की पूर्ति के लिए निर्भर रहता है। अतएव, स्त्री, पुरुष की दासी इसलिए है कि वह पुरुष और उसके बल के प्रति आकर्षण अनुभव करती है, उसके अन्दर घर बसाने की इच्छा होती है, वह घर से प्राप्त होने वाली सुरक्षा को चाहती है, और अन्त में उसके अन्दर मातृत्व के प्रति मोह भी होता है। इधर पुरुष भी स्त्री का दास है, अधिकार भावना के कारण, शक्ति और प्रभुत्व की तृष्णा के कारण, काम-वासना की तृप्ति की इच्छा तथा विवाहित जीवन की छोटी-मोटी सुख-सुविधाओं के प्रति आसक्ति के कारण।

          इसलिये कोई भी कानून स्त्री को तब तक बन्धनमुक्त नहीं कर सकता जब तक वह स्वयं ही बन्धन-मुक्त न हो जाये। इसी प्रकार पुरुष भी अधिकार जमाने की आदतों के होते हुए तब तक दासता से मुक्त नहीं हो सकता जब तक वह अपने अन्दर की सारी दासता से मुक्त न हो जाये।...

          जब तक समस्या का सुखद और आमूल समाधान नहीं हो जाता, भारतवर्ष और बातों की भांति इस बात में भी उन प्रचण्ड विरोधात्मक भेदों का देश रहेगा। वस्तुतः, क्या भारतवर्ष में ही उस परमा जननी की अत्यधिक तीव्र भक्ति और पूर्ण उपासना नहीं की जाती जो विश्व को बनाने वाली और शत्रुओं पर विजय पाने वाली है, जो समस्त देवताओं और समस्त जगतों की माता है, सकल वरदायिनी है?  और क्या भारत में ही हम स्त्री-तत्त्व, 'प्रकृति', अर्थात्, 'माया' की अत्यन्त आमूल रूप में निन्दा और उसके प्रति अत्यधिक घृणा प्रदर्शित होते नहीं देखते?

          भारतवर्ष का सारा जीवन ही इस विरोध से सराबोर है, वह अपने मन और हृदय, दोनों में इससे पीड़ित है।... जो भी हो, जब तक एक ऐसी नयी जाति को, जिसे प्रजनन की आवश्यकता के अधीन होने की जरूरत न हो और जो सत्ता के दो पूरक लिगों में विभाजित होने के लिए बाध्य न हो, उत्पन्न करने के लिए प्रकृति को प्रेरित करने वाला नया विचार एवं नयी चेतना प्रकट नहीं हो जाते, तब तक वर्तमान मानवजाति की उन्नति के लिए अधिक-से-अधिक यही किया जा सकता है कि पुरुष और स्त्री दोनों के साथ पूर्ण समानता का व्यवहार किया जाये, दोनों को एक ही शिक्षा तथा प्रशिक्षा दी जाये तथा दिव्य वास्तविकता के साथ, जो कि समस्त लिंग भेदों से ऊपर है, सतत सम्पर्क स्थापित करके समस्त सम्भावनाओं और समस्त समस्वरताओं के उद्‌गम को प्राप्त किया जाये।

          और तब शायद भारतवर्ष, जो विषमताओं का देश है, नयी उपलब्धियों का देश बन जायेगा।

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यू ट्यूब पर सुनें :

https://youtu.be/V8blI9vNYjw

बुधवार, 1 जनवरी 2025

सूतांजली जनवरी 2025


 

मनुष्य की महानता इसमें नहीं है कि वह क्या है,

बल्कि इसमें है कि वह किसे सम्भव बनाता है।

श्रीअरविंद

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नववर्ष 2025 के आगमन पर हार्दिक बधाई

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आदर्श नागरिक 

          विश्व की कुछ एक प्राचीन सभ्यताओं में एक ग्रीक सभ्यता का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। ग्रीक सभ्यता, यूनान और उसके आस-पास के इलाकों में लगभग 1,200 सालों तक रही। ग्रीक सभ्यता ने कई खोजें कीं जिनका आज भी हमारे जीवन पर असर है। उनका भाषा, राजनीति, शिक्षा, दर्शन, विज्ञान, और कला के क्षेत्रों में बहुत अहम योगदान रहा। ग्रीक विद्वानों में कुछ-एक जिनके नाम से हम परिचित हैं वे हैं होमर, हेरोडोटस, प्लेटो, अरस्तू इरेटोस्थनीज़, हिपार्कस, पोसिडोनियस, थेल्स, हिकेटियस आदि। इस सभ्यता की देन आज भी हमारा मार्ग दर्शन करती हैं।

       ग्रीक के प्रख्यात समाजशास्त्रियों ने मानव के व्यवहार और आचार-विचार के गहन अध्ययन के आधार पर यह बताया कि समाज में तीन प्रकार के लोग होते हैं। इसका सर्वप्रथम उल्लेख जनतंत्र की अवधारणा और समर्थन करने वाले विद्वानों द्वारा प्राचीन ग्रीस में मिलता है। उनके अनुसार किसी भी आधुनिक समाज में तीन प्रकार के लोग होते हैं:

१.      इडियट्स (idiots) – ग्रीक भाषा में इडियट शब्द का मतलब है, “अपना” या “निजी”। इसी से “आम आदमी” और बाद में “अज्ञानी व्यक्ति” का अर्थ आया। 'Idiots' का हिन्दी में अर्थ है - बेवकूफ़, मूर्ख, जड़ बुद्धि, जड़ मति, पागल, मंदबुद्धि व्यक्ति। इडियट शब्द का मूल अर्थ 'अज्ञानी व्यक्ति' था। हालांकि, आजकल इसका इस्तेमाल ज़्यादातर ऐसे व्यक्ति के लिये किया जाता है जिसके पास शिक्षा की कमी है और बुनियादी बुद्धि या सामान्य ज्ञान की कमी है। ग्रीक विद्वानों के अनुसार इडियट्स का अर्थ मूर्ख, जड़, मंद-बुद्धि या पागल नहीं, बल्कि उनके अनुसार ये वे लोग हैं जो पूरी तरह निजी, आत्म-केन्द्रित और स्वार्थी होते हैं। ये लोग सिर्फ-और-सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं, इन्हें अपने भले और सुख की ही परवाह होती है। वे इस संकीर्ण दायरे से बाहर नहीं निकलते। उन्हें समझ और सामाजिकता का जरा भी ज्ञान नहीं होता और वे इसकी कोई परवाह भी नहीं करते। इनमें किसी प्रकार का कोई कौशल नहीं होता, नैतिकता नहीं होती, चरित्र नहीं होता, गुण नहीं होता और वे समाज से कट कर रहने वाले लोग हैं। वे समाज को किसी भी प्रकार का कोई योग दान नहीं देते। अपने निजी विलास, सुख और सुविधा के अलावा और कहीं उनका ध्यान नहीं होता। ग्रीक समाजशास्त्रियों ने इन्हें जंगली लोगों का थोड़ा परिवर्तित और संवर्धित रूप बताया।

 

२.     ट्राइब्स (Tribes) – इसका मतलब है जनजातीय या आदिवासी। जनजाति से जुड़ी चीज़ों या उनके संगठित होने के तरीके का वर्णन करने के लिए ट्राइबल शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। जनजाति ऐसे लोगों का एक समूह होता है जो एक साथ रहते हैं और एक ही भाषा, संस्कृति, और इतिहास साझा करते हैं। यह वह सामाजिक समुदाय होता है जो राज्य के विकास से पहले अस्तित्व में था और आज भी हैं और राज्यों के बाहर ही रहते हैं। ग्रीक विद्वानों का तात्पर्य कोई विशेष जाति या प्रजाति से नहीं था बल्कि ये वे लोग हैं जिनकी सोच जनजाति / कबीले के लोगों की तरह होती है। वे अपने छोटे से संसार में ही रहते हैं जिसका एक छोटा सा समाज होता है, थोड़े से लोग होते हैं। उनका अपना पूर्व निर्धारित क्षेत्र होता है और वे उसी में रहते, विचरते और उससे चिपके रहते हैं, उसके बाहर नहीं निकलते। उनके अपने देवता ही उनके सर्वशक्तिमान ईश्वर स्वरूप होते हैं। वे किसी भी प्रकार की अलग, नयी चीजों और सोच से घबड़ाते हैं। उनके अपने समाज से बाहर के लोग उनके लिए दूसरी ग्रह के लोग हैं। वे उन्हें शक की नजरों से देखते हैं और वे हर समय इस प्रकार के नए लोगों को पूरी ताकत, उग्रता और हिंसा से प्रत्युत्तर देते हैं। ग्रीक विद्वानों ने यह भी बताया कि युद्ध करना इन्हें प्रिय होता है। ये अपने समाज की दुनिया से बाहर नहीं निकलते, अलग-थलग रहते  हैं, बाहर के सभ्य समाज से न कोई इनका सरोकार होता है और न ही कोई संपर्क।


 

३.     सिटिज़न (Citizen)  – सिटीजन का मतलब है नागरिक यानि किसी देश का कानूनी रूप से संबंधित व्यक्ति। नागरिक शब्द के अन्य अर्थ हैं निवासी, नगरवासी, स्थानीय-निवासी, आदि।

 

 ग्रीक विद्वानों ने नागरिक शब्द का इस्तेमाल उस व्यक्ति के लिए किया जो किसी देश के प्रति निष्ठा रखता है और उसके संरक्षण का हकदार है। उसे अपने समाज, नगर, देश की तरफ़ से कुछ अधिकार मिलते हैं उसे अपने कर्तव्य निभाने का एहसास होता है। वह अपने अधिकारों का प्रयोग उन कर्तव्यों को निभाने के लिये करता है। इस संदर्भ में नागरिक का अर्थ कानूनी या राजनीतिक नागरिक से नहीं है। ये आदर्श व्यक्ति होते हैं। ये आदर्श व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में नागरिक हैं।

 

नागरिक का अर्थ कानून या राजनीतिक नागरिक नहीं बल्कि विचारों से नागरिक होना है। ये नागरिक वे व्यक्ति हैं जिनमें सार्वजनिक तौर पर रहने का ज्ञान और समझ होती है। वे यह जानते हैं कि वे समाज के एक सदस्य हैं और इसलिये वे सबों की भलाई के लिए जीते हैं। वे अपने अधिकार ही नहीं दूसरों के अधिकार और पसंद को भी समझते हैं। वे जैसे अपने अधिकारों के प्रति सजग होते हैं वैसे ही अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को भी समझते और उनका भी भली भांति निर्वाह करते हैं। अपने पड़ोसियों का और अल्पसंख्यकों का भी ख्याल रखते हैं। वे अपने आपसी मतभेदों को भी सभ्य तरीके से निपटा लेते हैं। ये ही वे लोग हैं जो एक सभ्य समाज का निर्माण और संरक्षण करते हैं। वे एक ऐसे समाज का निर्माण करते हैं जिसे सही अर्थों में एक सभ्य समाज कहा जाता है। एक ऐसा समाज जहां सब एक दूसरे के परिचित होते हैं, मित्र होते हैं उनमें मित्रता होती है।

       प्राचीन ग्रीक विद्वानों ने इंसान को इन तीन अलग-अलग समूहों में बांटा। जाने-अनजाने हर एक मानव यह निर्णय लेता है कि वह इन तीन समूहों में से किस समूह का इंसान है।

१.      केवल अपने  बारे में सोचने वाले मंद बुद्धि का समूह,

२.     ट्राइब्स की तरह ज्यादा सोच-विचार करने की क्षमता से हीन सिर्फ और सिर्फ अपने समूह में और उसी दायरे में रहना, या

३.     एक सभ्य समाज में विश्व में माने जाने वाले सभ्य नागरिक की तरह। 

हमें भी यह निर्णय लेना है कि इन तीनों में हम कैसा समाज, कैसा शहर, और कैसा देश चाहते हैं? और क्या हम वैसे बन रहे हैं? 

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असहयोग

(तत्कालीन काँग्रेस की बैठक में अपने असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव को स्वीकृत कराने के लिए गांधी ने बड़ी मेहनत की और प्रस्ताव को बड़े ज़ोरदार और तार्किक ढंग से पेश किया। गांधी-मार्ग पत्रिका ने उनके प्रस्तावों, तर्कों और शंका समाधानों को इतिहास से इकट्ठा कर प्रकाशित किया था। उसी के कुछ अंश आप तक पहुंचा रहा हूँ। इसकी पहली कड़ी अक्तूबर 2024 में थी, यहाँ उसकी दूसरी कड़ी प्रस्तुत है।)

विजय के मूलाक्षर : मैं भारत के एक सिरे से दूसरे सिरे तक इसी बात का पता लगाता घूम रहा हूं कि लोगों में सच्ची राष्ट्रीय भावना आई है या नहीं, लोग राष्ट्र की वेदी पर अपना सर्वस्व बलिदान करने को तैयार हैं या नहीं? और यदि कुछ लोग भी बिना कुछ बचाये रखे अपना सब कुछ होम देने को तैयार हों तो इसी क्षण मैं स्वराज्य आपके हाथ में रखवा देने को तैयार हूंइतना त्याग करने को लोग तैयार हैं? पदवीधारी अपनी पदवियां और सम्मान के पदों को छोड़ देने को तैयार हैं? मां-बाप देश की लड़ाई लड़ने के लिए अपने बच्चों की किताबी शिक्षा का बलिदान करने को तैयार हैं? मैं तो कहता हूं कि जब तक हम यह मानते रहेंगे कि जो स्कूल-कॉलेज सरकार के लिए क्लर्क बनाने के कारखाने मात्र हैं, उनमें बच्चों को न भेजने से हम बच्चों की शिक्षा की बलि करते हैं, तब तक स्वराज्य हमसे सैकड़ों कोस दूर हैअन्य राष्ट्रों के हाथों दबी हुई कोई भी जनता एक तरफ उसकी मेहरबानी स्वीकार करती रहे और दूसरी ओर शासक जनता पर जो बोझ और जिम्मेदारी डाले उन्हें वह हटाती रहे, यह नहीं हो सकताविजेताओं की तरफ से होने वाली कोई मेहरबानी विजित जाति के कल्याण के लिए नहीं, परंतु शासकों के लाभ के लिए ही होती है, यह बात जिस क्षण किसी भी पराधीन जाति को समझ आ जाती है, उसी क्षण वह जाति शासकों को हर प्रकार की स्वेच्छापूर्ण सहायता देना बंद कर देती है और किसी प्रकार की सहायता लेने से साफ इनकार कर देती हैहमारी आजादी के लड़ाई की जीत के ये मूलाक्षर हैं



इज्जत-आबरू के लिए : मैं चाहता हूं कि मेरे देश-बंधु मेरी यह बात अच्छी तरह समझ लें, और यदि यह बात उनके गले न उतरी हो तो मेरा प्रस्ताव नामंजूर कर देना ही उनका कर्त्तव्य होगाएक तरफ पंजाब और सारे भारत की इज्जत और दूसरी ओर भारत में कुछ समय तक अंधेर, लड़कों की शिक्षा की बरबादी, अदालतों और धारासभाओं की बंदी और ब्रिटिश संबंध का त्याग - इनके बीच चुनाव करना पड़े, तो भी पंजाब और भारत का सम्मान और उसके साथ आने वाली अराजकता और स्कूलों, अदालतों वगैरह के बंद होने और इनके साथ जुड़ी हुई तमाम व्यवस्था का जरा भी आनाकानी किए बिना स्वागत करूंगा। आपका जी भी उतना ही जल रहा हो, आप भी इस्लाम की इज्जत अक्षुण्ण रखने को मेरे जितने ही उत्सुक हों, पंजाब की इज्जत निष्कलंक करने को तड़प रहे हों तो बिना संकोच के आपको यह प्रस्ताव मंजूर कर लेना चाहिये।

धारासभाओं का बहिष्कार : परंतु इतना ही काफी नहीं हैमुद्दे की असल बात पर तो अभी तक मैं आया ही नहीं। वह बात यह है कि उम्मीदवार तथा मतदाता धारासभाओं का पूर्ण बहिष्कार करें इस समय यही मुद्दे का प्रश्न हो गया हैधारासभाओं द्वारा स्वराज्य मिलेगा या धारासमाओं का त्याग करके मिलेगा? क्या सचमुच धारासभाओं द्वारा स्वराज्य लेने की बात में लोगों को विश्वास है?

स्वदेशी: मैं अवश्य चाहता हूं कि लोग विदेशी माल का बहिष्कार करें, परंतु मैं यह भी जानता हूं कि इस समय यह बात नहीं हो सकतीजब तक हमें सूई-कांटे के लिए भी विदेशों का मुंह ताकना पड़ता है, तब तक विदेशी माल का बहिष्कार असंभव हैपरंतु यदि आप लक्ष्य तक पहुंचने को अधीर हो गए हों और कोई भी कुर्बानी करने को तैयार हों, तो मैं स्वीकार करता हूं कि विदेशी माल का बहिष्कार करते ही पलक मारते भारत अपनी आजादी प्राप्त कर सकता हैइसलिए मैंने आनाकानी किए बिना अपने प्रस्ताव में किया गया संशोधन स्वीकार कर लियामुझे तो लोगों के आगे व्यावहारिक कार्यक्रम रखना है और मैं सहज ही स्वीकार कर लेता हूं कि यदि हमसे विदेशी माल का बहिष्कार हो सके तो वह जबरदस्त चीज हैऐसा बहिष्कार और स्वराज्य दोनों आपको पसंद हों तो प्रस्ताव के अंतिम पैरे में उनका उल्लेख किया है

मैं आपसे इस मामले पर खूब गहरा विचार करके मत देने का अनुरोध करता हूंउसमें आप मेरा ख्याल न करेंमैंने देश की सेवाएं की हों तो उनका ख्याल बीच में न आने दीजिएयहां उनका मूल्य नहीं हो सकतामेरा यह जरा भी दावा नहीं है कि मैं जो कार्यक्रम देश के सामने रखूं, वह भूल रहित ही होगामैं इतना ही दावा करता हूं कि मैंने यह कार्यक्रम तैयार करने में बहुत मेहनत की है, खूब विचार किया है और इस निश्चय पर पहुंचा हूं कि जो व्यावहारिक हो वही कार्यक्रम तैयार किया जाएइन दो बातें का आप अवश्य ध्यान रखेंआपके पास काम करने वाली संस्था भी मौजूद हैफिलहाल यह तरीका तय करते हुए, विचार करने के लिए ही सही, कार्यक्रम को प्रत्यक्ष स्वीकार करने वाले हजारों अनुयायी आपके साथ खड़े हैं(नवजीवन, 19.09.1920)

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बुझते दीपक का सन्देश



दीपक का तेल चुक गया था। केवल रूई की बाती जल कर मन्द-मन्द प्रकाश बिखेर रही थी। उसके अन्तिम समय को निकट आया देख कर एक गृहस्थ ने पूछ ही लिया- 'तुम जीवन-भर आलोक बिखेर कर दूसरों का पथ-प्रदर्शन करते रहते हो, संसार के साथ इतनी भलाई करते रहते हो, फिर भी तुम्हारा इस प्रकार दुःखद अन्त देख कर मेरा हृदय विदीर्ण हुआ जा रहा है।'

बुझते दीपक ने पूर्ण शक्ति के साथ अन्तिम बार अपनी आभा बिखेरते हुए कहा- 'भाई ! इस भौतिक जगत् में जिसका जन्म होता है, उसका अन्त भी होता है। हम प्रयास करने पर भी उससे बच नहीं सकते। हाँ, इतना अवश्य कर सकते हैं कि अपने जीवन की मूल्यवान् घड़ियों को व्यर्थ ही नष्ट न होने दें।'

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रविवार, 1 दिसंबर 2024

सूतांजली दिसम्बर 2024


 

स्वतंत्र विचारक वे लोग हैं जो बिना पक्षपात और पूर्वाग्रह के सोच सकते हैं और जिनमें उन चीजों को भी समझने का साहस होता है जिनकी

उनके अपने रीति-रिवाजों, विशेषाधिकारों के साथ टकराहट होती है।

सही चिंतन कर सकने के लिये यह बहुत आवश्यक है।

लियो टोल्स्तोय

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बाज़ारवाद का महाजाल



साहित्य से रिक्त समाज, संवेदनहीन मानवों का हुजूम होता है। वह अर्थपिशाचों का समाज होता है। जिसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य पैसा कमाना होता है – पैसा! पैसा!! पैसा!!!  वैश्वीकरण के वेश में हमारी लक्ष्मण रेखाओं के भीतर आ घुसा अमेरिका-यूरोप पोषित बाज़ारवाद इस पैशाचिक वृत्ति को हवा दे रहा है। आज यदि शिक्षा और भौतिक विकास के साथ-साथ समाज में भ्रष्टाचार और अपराध भी बढ़ रहे हैं तो इसका एक महत्वपूर्ण कारण उदारीकरण के जबरदस्त दबाव में भारतीय समाज का अपनी धरती के भाषा-साहित्य से, अपनी लोक सम्पदा से, अपनी सांस्कृतिक विरासत से कट जाना है। चीनी कहावत याद आती है कि यदि छात्र हत्यारा बन जाता है तो उसके शिक्षक को मार डालो। भारतीय परिवेश में किसको मारें? शिक्षक को या अभिभावक को या मीडिया को या...! यह समझ में नहीं आता क्योंकि ये सब बाज़ारवाद के महाजाल में फंसे छटपटा रहे हैं।

बुद्धिनाथ मिश्र

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सबसे शक्तिशाली

          एक पिता ने अपने बेटे की बहुत अच्छी तरह से परवरिश की। उसे अच्छी तरह से पढ़ाया, लिखाया और एक सफल इंसान बनाया। बेटा एक बड़ा अधिकारी बन गया। हजारों लोग उसके अधीन काम करने लगे। एक दिन पिता बेटे से मिलने उसकी ऑफिस गये। बेटे के चेंबर में जाकर उसके कंधे पर हाथ रखकर अपने बेटे से पूछा, इस दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान कौन है?’  बेटे ने पिता को बड़े प्यार से हंसते हुए कहा, मेरे अलावा कौन हो सकता है पिताजी।

       

पिता को इस जवाब की आशा नहीं थी, उसे विश्वास था कि उसका बेटा गर्व से कहेगा पिताजी इस दुनिया के सब से शक्तिशाली इंसान आप हैं, जिन्होंने मुझे इतना योग्य बनाया। बेटे का जवाब सुनकर पिता की आंखें भर आयीं। वे चेंबर के गेट को खोल कर बाहर निकलने लगे। उन्होंने एक बार पीछे मुड़ कर पुनः बेटे से पूछा, एक बार फिर बताओ इस दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान कौन है?’

          पुत्र ने इस बार कहा, पिताजी आप हैं, इस दुनिया के सबसे शक्तिशाली इंसान। पिता ये सुनकर आश्चर्यचकित हो गये। उन्होंने कहा, अभी तो तुम अपने आप को इस दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान बता रहे थे, अब तुम मुझे बता रहे हो?’

          बेटे ने हंसते हुए उन्हें अपने सामने बिठाते हुए कहा, पिताजी उस समय आप का हाथ मेरे कंधे पर था, जिस पुत्र के कंधे पर पिता का हाथ हो वो तो दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान ही होगा  ना।

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लाजवाब जीवन यात्रा                                                   मेरे विचार

(शीत-ऋतु और पिकनिक का तो जैसे चोली-दमन का साथ था। इस दौरान न जाने कितने पिकनिक आयोजित होते थे जिनमें हम बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। आज की तरह की सुविधाएं मौजूद नहीं थीं लेकिन आनंद हर्सो-उल्लास आज से कहीं ज्यादा थे। सब आपस में घुल-मिल जाते और मिल कर सारी व्यवस्था करते। इवैंट मैनेजर नहीं थे, जो भी था परिवार या दोस्तों का समूह, उसी में ही कोई ज़िम्मेदारी लेता और सब मिलकर करते। बच्चे-तो-बच्चे बड़े-बूढ़े भी बच्चे बन जाते। स्कूल के समय पकड़े हुए क्रिकेट और बैडमिंटन के बैट फिर से एक बार हाथ में पकड़ अपना जौहर दिखाने बड़े शौक से मैदान में उतर जाते थे, यह एक अलग बात है कि शाम को पैर-कंधे-हाथ विद्रोह कर बैठते थे। पॉण्डिचेरी आश्रम का वार्षिक पिकनिक तो इनसे अलग था। वंदना जी का लिखा उस पिकनिक यात्रा का विवरण पढ़ा तो लगा की यह तो मानव की जीवन यात्रा है। पढ़िये शायद आपको भी इसमें उसकी खुशबू मिल जाये।

          दक्षिण में, पॉण्डिचेरी के पास जिंजी-दुर्ग है जो आज भी - खण्डहर बता रहे हैं इमारत बुलन्द थी' को चरितार्थ करता है। छत्रपति शिवाजी का यह दुर्ग बहुत मायने रखता है और अंग्रेजों ने तो इसे 'Troy of East’ का दर्जा दे दिया था। आज यह एक राष्ट्रीय स्मारक है और पुरातात्त्विक विरासत के संरक्षकों के रख-रखाव में है, अतः एक अच्छा-खासा पर्यटक स्थल बन गया है। लेकिन आज से करीब ५० वर्ष पहले इसका इतना नाम नहीं था, हाँ एक पिकनिक स्थल जरूर था, जहां सैलानी,आश्रमवासी, विद्यालय के छात्र छात्राएं इत्यादि शीत ऋतु में पिकनिक पर यहाँ चले जाते थे, तब चहल-पहल से यह क्षेत्र गूंज उठता था। चलें चलते हैं आज से लगभग 50 वर्ष पूर्व ऐसी ही एक पिकनिक उर्फ जीवन यात्रा में।)

          "पिकनिक' नाम सुन कर किस की बांछे नहीं खिल जाती? भई, मेरे जैसों का न केवल मुखमण्डल बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि सर्वांग खिल उठता है। और फिर वार्षिक 'पिकनिक'! वह ठहरी लाजवाब। लेकिन इस बार दिल में हलकी धुकधुकी हो रही थी, कारण भी था - पिकनिक के साथ-साथ पैर तुड़ाई थी, यानी पॉण्डिचेरी से जिंजी- ७३ कि.मी. का रास्ता पैदल तय करना था। यह तो हर साल का कार्यक्रम है। हाँ, फ़र्क बस इतना था कि इस साल पैदल चलने वालों की संख्या कुछ तगड़ी थी - ९० बच्चे-बड़े-युवा जब एकत्र हुए तो ऐसा लगा मानों किसी राजा की छोटी-मोटी टुकड़ी कूच की तैयारी में हो। इनमें जो पहली दफा इस यात्रा में भाग ले रहे थे उनकी आँखों में एक तरह की शंका, कुछ भय पढ़ा जा सकता था, कुछ की बत्तीसी खिली जा रही थी, आँखों से आत्मविश्वास फूट रहा था। लम्बे अन्तराल के बाद पैदल यात्रा में हिस्सा लेने वालों में न आत्मविश्वास का अतिरेक था न थी भय से सर्वथा मुक्ति।

          आरम्भ में चारों तरफ़ उत्साह ही उत्साह उफन रहा था - नियत स्थल 'कॉर्नर हाउस' से  ज्यों ही हम बाहर आये कि शुभ कामनाओं से लदा-फैदा बन्धु-बान्धवों का बड़ा सा काफिला इन्तजार करता दिखा। ज़ोर-ज़ोर से बतियाते हँसते चहकते समूह को देख हर रास्ते चलते की आँखों में कुछ आश्चर्य, कुछ प्रश्न-सा उभरता, लेकिन हम इन सबसे बेख़बर बायें-दायें  बायें-दायें की लय में आगे बढ़ते चले जा रहे थे।

          अब हम छह घण्टे निरन्तर चल चुके हैं, यानी रात के नौ बजे हैं। दृश्य काफ़ी बदल गया है। सबसे पहले जिंजी पहुंचने का निश्चय लिये दो चार युवकों के उत्साह के साथ-साथ दूसरे कई उस धारा में उनके साथ हो लिये हैं। जो पीछे रह गये हैं उनके भी उपदल बन गये हैं और अन्त में मुख्य कप्तान के साथ चल रहे हैं कुछ ऐसे जिन्होंने चाय पीने के स्थान - 'माइलम' के बाद, मन-ही-मन, जिंजी तक बस में जाने का निश्चय कर लिया है।

          प्यास के मारे हलक सूखा जा रहा है लेकिन कप्तान है कि पानी की एक घूंट तक पीने की अनुमति नहीं दे रहे। इस समय उनका आदर्श वाक्य बन गया है- 'चलते रहो, बढ़ते रहो। आखिर एक-एक सन्तरा सबको बाँटा गया, लगा रेगिस्तान में पानी मिल गया, लेकिन ज़रा-सा सन्तरा, ऊंट के मुँह में जीरा वाली कहावत चरितार्थ कर बैठा।

          लीजिये, तय कर लिया आधा सफ़र गरम-गरम चाय और जैम लगी डबलरोटी खाकर सबने तृप्ति की साँस ली-तभी कप्तान का स्वर सुनायी दिया जो थक गये हैं उन्हें वापस पॉण्डिचेरी ले जाने के लिए बस खड़ी है, लेकिन यहाँ से चल पड़ने के बाद हम जिंजी पहुँच कर ही दम लेंगे। चारों तरफ़ खुसुर-पुसुर चलने लगी, यहाँ तो पासा पलटा जा रहा है। जिंजी की बजाय वापस पॉण्डिचेरी। थकान से चूर-चूर होने की शिकायत करने वालों ने सिर खुजाया, कप्तान को दबी ज़बान से कोसा, उनसे बस से जिंजी जाने की अनुनय-विनय तक की, लेकिन उन्हें टस-से-मस होते न देख कर आख़िर मन मसोस कर हरएक अपने-अपने कपड़े झाड़ आगे बढ़ने के लिए प्रस्तुत हो गया।

          घनी नहीं फिर भी अँधेरी रात, तन से थका, लेकिन मन में एक बार फिर उत्साह का रंग लिये आगे की ओर बढ़ता दल, कोई थकान शब्द के काले बादल को मन के इर्द-गिर्द से भगाने के लिए जोर जोर से गीत ही गाने लगा है, कुछ अधिक शर्मीले उसके साथ-साथ गुनगुनाने लगे हैं तो किसी दल के लोग आपस में पहेलियाँ बुझा रहे हैं। उधर पिछड़े दल को कप्तान बायें-दायें बायें-दायें के स्पष्ट बोलों पर बाक़ायदा कवायद करवाये लिये चले आ रहे हैं। अभी तो चाय नाश्ता हुआ, लेकिन दो घण्टों के बाद ही चारों तरफ से भूख-भूख की गुहार मचने लगी। लो, यह कप्तान भी लाजवाब हैं, जो आधे रास्ते तक हमें दाने-दाने को तरसा रहे थे अब उन्होंने खाने की बात मुँह से निकलते-न-निकलते सरस खीरे और पक्के-पक्के केले झटपट निकाल कर दे दिये।

        

रात के साथ-साथ धीरे-धीरे हमारा दल भी आगे बढ़ रहा है। रात के तीसरे पहर के साथ ठण्डी-ठण्डी बयार भी बहनी शुरू हो गयी है। हवा में हलकी-सी खुनकी, रात्रि की निस्तब्धता, आकाश से आशीर्वाद की तरह हम पर छिटकता शीतल प्रकाश-समाँ कुछ ऐसा बंध गया कि सब धीरे-धीरे शान्त से होने लगे। उस दिन साक्षात् नींद को आँखों में उतरते महसूस किया। पलकों की चिक अनायास आँखों पर ढलने-ढलने को है और हम हैं कि नींद को भरसक खदेड़ने के प्रयत्न में लगे हैं। कैसी विडम्बना है, दूसरी रातें अपने नरम बिस्तरों में दुबक कर पलकें बिछाये आप निंदिया रानी की बाट जोहते-जोहते करवटों-पर-करवटें बदलते रह जायें और आज ये बिन बुलाये मेहमान की तरह कैसी  दनदनाती हुई घुसी चली आ रही हैं।

          नींद-नींद का राग अलापते, शराबियों की तरह इधर से उधर झटके खाते हम किसी तरह आगे बढ़ रहे हैं, यह कहना ज़्यादा सच होगा कि हमें आगे बढ़ाया जा रहा है। जी नहीं, सब को नहीं, एक दल जो शुरू से आगे निकल गया है वह तो अब तक अपने गन्तव्य स्थान पर शायद पहुँच गया होगा। कुछ पर नींद ऐसी हावी हो गयी है कि वहीं चलती सड़क पर लेट जाने के लिए मचल रहे हैं, दृश्य कुछ ऐसा अलबेला है कि कप्तान एक को उठायें तो दूसरा बैठने को प्रस्तुत, दूसरे को उठायें तो तीसरा लम्बलेट हो जाने को तैयार। अन्त में ऐसे लोगों के लिए कप्तान ने दूसरों को आदेश दे दिया कि जो कोई यूं बीच राह में  बैठ जाये उसे उसके साथी जबरदस्ती उठा कर दौड़ायें। लो, कप्तान के साथ-साथ अब साथियों की भी गलियाँ सुननी पड़ रही है। कोई बात नहीं, चार-पाँच मील का सफर बाकी है तब तक या तो कानों में रूई ठूंस लो या चिकना घड़ा बन जाओ।

          धीरे-धीरे आकाश के तारे धुंधले होकर विलीन हो रहे हैं, प्राची में रंगोत्सव की तैयारी चल रही है। सवेरे के साथ-साथ रात की खुमारी भी आँखों से छिटक कर दूर जा गिरी ७० कि.मी. मंजिल पार कर ली बाकी है अन्तिम तीन कि.मी.। काम पर जाते पुरुष, कुँए पर जाती पनिहारिनें – सब रुक-रुक कर हमारे लंगड़दीन दल को फटी-फटी निगाहों से देखे जा रहे हैं। कोई सलाह दे रहा है अगली बार बस करके आना, ज्यादा पैसे नहीं लगते बस में! दूसरे के दिमाग में किसी तरह यह बात नहीं बैठ पा रही कि बिना किसी मकसद के ये लोग यूँ अपने ऊपर अत्याचार क्यों कर रहे हैं भला? स्त्रियों का कोई दल हमें निरा बावरा समझ, दाँतों में पल्लू दाबे खी खी खी हंसा चला जा रहा है। लेकिन अब हमें किसी के उपहास की रत्ती भर परवाह नहीं - लक्ष्य जो करीब है।

          लीजिये आ गया जिंजी।  पहले पहुंचे साथियों की तेल मालिश चल रही है, हम भी निश्चिन्त होकर पसर गये हैं आकर।  बस से आया दल हमारी आवभगत में कोई कसर नहीं छोड़ रहा - हाथ के इशारे-भर की देर है गरमागरम चाय और नाश्ते से सजी तश्तरियाँ हाज़िर हैं। थकान से चूर-चूर होने पर भी सब की आँखों से प्रसन्नता फूट रही है। रास्ते में कप्तान को सबसे ज्यादा दुःखी करने वाले, उन्हें रास्ते भर कोसने वाले अब मंजिल पर पहुंच जाने के बाद उन्हें धन्यवाद देते-देते नहीं अघाते। इतना ही नहीं, अगली बार फिर से आने का वादा भी कर रहे हैं।

          जो थक कर बैठ गया वह रह गया, लेकिन जो हिम्मत नहीं हारे उन्हें मंजिल मिल गई।

जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह शाम

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