शुक्रवार, 1 मई 2020

सूतांजली, मई २०२०


सूतांजली                            ०३/१०                                                 मई २०२०
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हरिहर काका और मनबोध मउआर

 (हरिहर काका और मनबोध मउआर दोनों मिथिलेश्वर जी की कहानियाँ हैं। हरिहर काका ज्यादा पसंद की गई है। हरिहर काका जैसे पात्र बहुत हैं और उनसे हमें कोई डर-भय भी नहीं लगता। लेकिन मनबोध मउआर लुप्त प्रजाति है और हर किसी को ऐसे पात्रों से डर है, भय है। लेकिन, अगर मनबोध मउआर जैसा एक पात्र भी हर मुहल्ले में हो, तो दुनिया से अमानवीय और अनैतिक कार्य लुप्त हो जाए।)
(मनबोध मउआर कहानी यहाँ पढें 📖 और यहाँ सुनें 🔊)

हरिहर काका, बुजुर्ग हैं, गाँव में रहते हैं। पत्नी गुजर गई है, औलाद नहीं है, लेकिन तीन भाई हैं। सबसे बड़ी बात यह कि उनके पास १५ बीघा जमीन है। जैसा हमने  देखा, सुना और पढ़ा है, इस संपत्ति के कारण ही भाई - भाई का दुश्मन बन जाता है; ठीक वैसे ही, हरिहर काका के भाई उनके दुश्मन बन गए हैं। उनके गाँव में एक ठाकुर बाड़ी भी है। इस कहानी में, यह ठाकुर बाड़ी एक नया मोड़ है, क्योंकि भाई तो भाई, इस ठाकुरबाड़ी का महंत भी उस जमीन को हथियाने के चक्कर में उनका दुश्मन बन गया है। संपत्ति के चलते भाइयों में, बाप-बेटों में, रिश्तेदारों में मन मुटाव, झगड़े और हत्याएं कोई नई बात नहीं। ऐसी कहानियाँ पढ़ी हैं, ऐसे वाकिए सुने हैं; हो सकता है ऐसे लोगों से परिचय भी हो या खुद भुक्त-भोगी हों या हम खुद, ऐसी घटना को अंजाम देने वाले हों। यह सब मर्म स्पर्शी है, दुखदायी है, अनैतिक है, अमानवीय है लेकिन, यह कोई नई घटना नहीं है।
दूसरे व्यक्ति हैं – मनबोध मउआर। मुझे प्रभावित किया इस शख्स ने। ऐसे लोग नहीं मिलते - न देखने को, न पढ़ने को, न सुनने को। ये भी बुजुर्ग हैं। गाँव में रहते थे अब अपने लड़कों के साथ शहर में रहते हैं। इनके पास संपत्ति है या नहीं, पता नहीं, लेकिन जिगरा है। मुहल्ले का कोई ऐसा घर नहीं, जो उसकी वक्रदृष्टि का शिकार नहीं हो। उस अकेले बूढ़े ने सबकी नाकों में दम कर रखा है पहली नजर में गाँव का आदमी नजर आया। लेकिन, पहली ही मुलाक़ात में उसने बताया कि मेरा मकान मालिक आदमी नहीं कसाई है, अपनी छोरियों को बिना इलाज के मार डाला। इस बात पर मेरा तर्क किसी दूसरे के मामले से हमें क्या मतलब उन्हें एकदम पसंद नहीं आया। रात अपनी पत्नी से पता चला कि मेरा मकान मालिक अपने बेटों और बेटियों में अमानवीय सीमा तक फर्क करता है। पूरा मुहल्ला यह जानता है लेकिन सब खामोश – हमें क्या लेना देना। मुहल्ले में ऐसे लोग कम ही थे, जो किसी न किसी अनैतिक और अमानवीय कार्यों में न लगे हों। ऐसा भी नहीं था कि मुहल्ले वालों को इसका पता नहीं था। लेकिन सब खामोश रहते थे – वही हमें क्या लेना देना। लेकिन मनबोध मउआर, ऐसे लोगों के आलोचक थे, उनका भंडाफोड़ करते थे। पीठ  पीछे नहीं, उनके मुंह पर। वे चुप रहने वालों में नहीं थे, इसलिए ऐसे सब लोग उनके विरोधी थे, उनसे कतराते थे। जाहिर है उनके विरोधियों की संख्या अधिक थी।  समर्थ भाई ने अपने कमजोर भाई की हत्या कर दी, लेकिन बात उड़ा दी कि उसकी मृत्यु हो गई। लेकिन मनबोध को यह अमानवीय कार्य सहन नहीं हुआ।  किसी और ने आवाज नहीं उठाई लेकिन वे चुप नहीं रहे, सबों को कहते फिरे। वहीं दूसरी ओर मनबोध ने यह प्रचारित कर दिया कि मुहल्ले में बन रही भव्य कोठी तस्करी के पैसे से बन रही है। तस्कर, बंदूक लेकर उसके घर उन्हे मारने पहुँच गया। ऐसी एक-दो नहीं अनेक घटनाएँ हैं। इतना ही नहीं अपने गाँव से कोई भी इलाज के लिए आता, तो उसे संभालने जाते और हर संभव उसकी सहायता भी करते। क्या ऐसा कोई जीता जागता चरित्र आपकी नजर में है? ऐसे लोग किसी शताब्दी में हुआ करते होंगे, अब तो लोक कथा और आदिम इतिहास के पात्र बन गए हैं। मनबोध मउआर अपनी पीढ़ी के नहीं बल्कि पिछली शताब्दी के अंतिम पात्र हैं

अगर आप पिछली शताब्दी के व्यक्ति हैं, तो जरूर जानते होंगे कि खटमल किस जन्तु का नाम है। जब विकास का दौर आया, तब इस प्रजाति में भी विकास हुआ। रात के अंधेरे के बदले अब ये दिन के उजाले में भी दिखने लगे। चुपके चुपके मानव का खून पीने के बजाय दिन दहाड़े काटने लगे। गणतन्त्र की हवा में संगठित होकर नेतागिरी करने लगे। आरक्षण, जातिवाद की तरह इन्होने भी शासन-प्रशासन में अपनी जगह बना ली। खून पीने के कारण शारीरिक बल तो था ही, संगठित होने के कारण संख्या बल भी मिल गया और पूरे समाज में निडर होकर घूमने और काटने लगे। कभी, किसी समय, खटिया के छिद्रों में छुपे रहते थे, केवल रात को निकलते थे, दिन में दिख जाने पर हाथों हाथ उनकी कब्र खोद दी जाती थी। अब समय बदल चुका है। उनका जमाना है। लोग चुप रहने लगे। मनबोध मउआर, अब भी खटमल से, खटमल की ही तरह बर्ताव करता है। जहां कहीं खटमल दिख जाता है, उसकी जान के पीछे पड़ जाता है। खटमलों ने उनकी टांगे भी तोड़ डाली लेकिन उनके उत्साह में कोई फर्क नहीं आया। इन दो प्रजातियों के मध्य एक और तीसरी प्रजाति बड़ी संख्या में उत्पन्न हो गई है। यह है चुप रहने वालों की। “हमें इससे क्या लेना देना” कह कर इन खटमलों को रक्त दान करने वालों की। क्या हम भी उन्ही में हैं?
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सच की राहों में बिखरी जिंदगी

(से.रा.यात्री की “सच की राहों में बिखरी जिंदगी” यहाँ पढ़ें  📖 और यहाँ सुने 🔊)
यह शीर्षक मेरा दिया हुआ नहीं है। मुझे नहीं पता, यह से.रा.यात्री का दिया हुआ है या अहा! जिंदगी का। हाँ, जून 2011 में अहा! जिंदगी में छपे एक लेख का यही शीर्षक था, जिसके लेखक थे से.रा.यात्री। सच हमेशा सुंदर नहीं होता। उसके कई रूप होते हैं। मैक्सिम गोर्की की आत्मकथा मेरे विश्वविद्यालय में यह बात पूरी तरह चरितार्थ होती है। यह एक ऐसे युवक की कहानी है जिसने मास्को के एक कसाई खाने में होने वाली धांधली की खबर अपने खुशमिजाज़ मालिक को देकर उसके रातों की नींद और दिन का चैन छीन लिया और उसके एवज में उसे अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। अपनी निष्ठा और ईमानदारी का यह अनोखा पुरस्कार एलेक्स को मिला जो सच को लेकर कई सवाल खड़े करता है।  
क्या सच बोलना ही काफी है? सच बोलना आवश्यक है? कई लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि सच बोलना जरूरी नहीं, चुप भी तो रह सकते हैं! हाँ लोगों को यह सीख पसंद आई और ज़्यादातर लोग यही करते हैं। भय से, अपने स्वार्थ के लिए झूठ बोलने में हिचकते नहीं। और जब - जहां सच की जरूरत होती है तब चुप्पी साध कर अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह कर लेते हैं; यही विचार करते हैं कि  हमने झूठ नहीं बोला। इसी चुप्पी के कारण गुनहगार को सजा दिलाने चश्मदीद गवाह नहीं मिलते। हत्यारा निर्भीक घूमता है, भ्रष्टाचारी सम्पन्न बना सामाजिक / राजनीतिक / प्रशासनिक सम्मान पाता है, लोगों की चीख सुन खिड़की बंद कर ली जाती है, घायल को मरने-तड़पता छोड़ दिया जाता है, अबला सड़कों पर सहायता के लिए गुहार लगाती रहती है और सच आँख, मुंह और कान बंद किए बैठा रहता है। मुट्ठी भर लोग सैकड़ों लोगों के बीच बेगुनाह को पीट पीट कर मार देते हैं।  सच, जेल की सलाखों के पीछे दम तोड़ता रहता है और झूठ स्वतंत्र फूलता-फलता रहता है। गांधी की और कोई बात हमने मानी हो या नहीं, लेकिन ऐसे मौकों पर उनकी तीन बंदरों की सीख, थोड़े संशोधन के साथ, हम पूरे मनोयोग से  मानते हैं – न हमने बुरा देखा, न हमने बुरा सुना, न हमने बुरा कहा। न हमें पाप दिखा और न ही पापी। लेकिन जब पासा उल्टा पड़ा तब अकबर इलाहाबादी के शब्दों में चीख उठे, “हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वो कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता”।

हमें सच को छिपाने वालों की जमात नहीं चाहिए, हर मुहल्ले में बस एक मनबोध मउआर जैसे नागरिक चाहिए जो सत्य कहने की हिम्मत रखते हों।
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विशेष सूचना
कोविड-19 की वजह से सूतांजली की छपाई का कार्य बंद है। लेकिन इसकी एलेक्ट्रोनिक प्रति निरंतर और नियमित रूप से निकल रही है। अगस्त माह से सूतांजली की छपाई, पूर्णतया  बंद करने का निश्चय किया गया है। यह पत्र ईमेल से भेजी जाएगी। यह ब्लॉग (http://sootanjali.blogspot.com) पर उपलब्ध रहेगी। ब्लॉग पर इसका औडियो भी होगा, जिसे आप सुन सकेंगे। अत: आपसे निवेदन है कि आप अपना ईमेल sootanjali@gmail.com पर ईमेल से या +91 9432295250 पर व्हाट्स एप्प या मैसेज से हमें सूचित करें। अगर छपा हुआ पत्र आवश्यक हो तो कृपया सूचित करें। आपके लिए समुचित व्यवस्था की जायेगी।
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आपको सूतांजली कैसी लगी – अच्छी लगी हो या नहीं - अपने सुझाव (comments) दें।  नीचे दिये गये एक टिप्पणी भेजें पर क्लिक करके। आप अँग्रेजी में भी लिख सकते हैं।                                                     - संपादक

बुधवार, 1 अप्रैल 2020

सूतांजली, अप्रैल 2020


सूतांजली                    ०३/०९                                          अप्रैल २०२०              ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
कोरोना, एक उज्ज्वल भविष्य की ओर?
विश्व एक अप्रत्याशित महामारी की चपेट में है। हर देश इससे जूझने के लिए प्रयत्नशील है और हर संभव प्रयास में लगा है। दुनिया के समस्त वैज्ञानिक, शोधकर्ता, वैकल्पिक चिकित्सा के जानकार इससे छुटकारा पाने के उपाय ढूँढने में व्यस्त हैं। बहुत से लोग डरे हुए हैं, कुछ आशावान हैं। किसी के अनुसार यह हमारी करनी का फल है तो किसी का मानना है कि प्रकृति संतुलन बनाने में लगी है। ऐसे समय में हमारा यह उत्तरदायित्व भी बनता है और कर्तव्य भी कि हम अपनी सरकार और प्रशासन का साथ दें, उनके लिए मुसीबत खड़ी न करें। वरिष्ठ लोगों की, गरीब जनता की, सेवा कार्य से जुड़े कर्मियों की यथा शक्ति सहायता करें। इस संकट के समय मुनाफाखोरी, जमाखोरी और बेईमानी से दूर रह कर इंसानियत का रास्ता अपनाएं। सुख और प्रसन्नता अपने लिए कैद करने से बचें, इन्हे मुक्तहस्त बांटे

इस दुर्दिन के समय हम एक नई दुनिया भी देख, सुन और अनुभव कर रहे हैं। शायद अब, दुनिया वैसी नहीं रहे जैसी थी। लेकिन यह विश्वास रखना चाहिए कि जैसी भी होगी अभी से बेहतर होगी। हमारा यह विश्वास ही हमें एक बेहतर दुनिया दे सकेगा। साकार वही होगा, जो हम देखेंगे। संकट के समय अपना संतुलन न खोएँ, हताश न होएं, दुखी न होएं, चिंता न करें। खुला आसमान देखें, चिड़ियों का चहकना सुनें, परिचितों से दिल खोल  कर बातें करें, जिन्हें भूल गए थे उन्हें याद करें। हम अनुभव कर रहे हैं कि वातावरण शुद्ध हो रहा है, प्रदूषण कम हो रहा है। हमें क्षितिज पर काली रेखा नहीं दिख रही है। ओज़ोन लेयर की मरम्मत हो रही है। हमारे पास हमारे परिवार के लिए समय है। हमारे पास अपने लिए समय है। नई दुनिया, हमें इनसे कोसों दूर ले आई थी। हम परिवार को, मित्रों को, प्रकृति को, भूल गए थे। अब तो बस फिर से उन्हे याद करना सीख रहे हैं, उन्हे देखना सीख रह हैं, उन्हे सुनना सीख रहे हैं। ज़िंदगी की आपाधापी में हमारे आँख, कान, नाक, बंद हो गए थे अब खुल रहे हैं।

मैंने लोगों से पूछा, उनका क्या मानना है, “क्या दुनिया बदल जाएगी? कैसी होगी वह नई दुनिया”? लोगों की मिश्रित प्रतिक्रिया रही। कइयों का मानना है कि आदमी बदलने वाला नहीं। जैसा है, वैसा ही रहेगा। वहीं  बहुतों का मानना है कि बदलाव तो आयेगा ही। कितना आयेगा और कितनी अवधि तक रहेगा यह तो भविष्य ही बताएगा।  दिक्कत यह है कि बुरे, अच्छों को देख, बुराई छोड़ अच्छे नहीं बनते। लेकिन अच्छे, बुरों को देख, अच्छाई छोड़ बुरे हो जाते हैं। राजीव, कोलकाता, ने कहा ब्रह्मांड प्रकृति द्वारा बनाए गए संयम और अनुशासन के नियम पर चलता है। हमें ईश्वर पर भरोसा रखना चाहिए। नेहा, मुम्बई  ने लिखा बिना भविष्य की चिंता किए मैं यह विश्वास करती हूँ कि जो भी होगा अच्छा होगा। मुझे यह विश्वास है कि मैं अकेली नहीं हूँ। मुझे यह विश्वास है कि हमारे पास संसाधनों का अजस्र स्त्रोत है। मैं शांति में विश्वास रखती हूँ। मैं इंतजार करने में विश्वास रखती हूँ। मैं बिना अपने प्रश्नों के उत्तर पाये जीना सीख रही हूँ। प्रोफेसर मदन मोहन, मुंबई,  ने भी लिखा हम शुभ के कवच में हैं, विश्वास रखें। लेकिन तूलिका, सिडनी,  का मानना है कि कुछ नहीं  बदलेगा क्योंकि इंसान को भूलने की बड़ी अच्छी आदत है। राजनीतिक लोग तोड़-मरोड़ कर इसका फायदा उठाना शुरू कर देंगे तथा प्रकृति की बर्बादी फिर से शुरू हो जाएगी। कमलजी, कोलकाता,  का भी यही मानना है। पीयूष, पाली,   ने लिखा मानव को इस बात का घमंड था कि वह ब्रह्मांड का सबसे ताकतवर प्राणी है। प्रकृति ने एक नजर न आने वाले वायरस से डरा कर सारी दुनिया को कैद में कर लिया है। हम जो कार्य रोज करते थे, हमारे लिए महत्वपूर्ण थे वे सब अनिश्चितकाल के लिए टल गए। हमारी प्राथमिकताएं मिनटों में बदल गईं। अगर हम इसे समझ कर प्रकृति से ताल-मेल बैठा कर चलते हैं तब तो ठीक है वरना इसकी कीमत हमें चुकानी पड़ेगी। उनका विश्वास है कि मानव की आँखें खुल जाएंगी और अब वह सँभल कर चलेगा। सुनीता, दिल्ली,  का मानना है कि सीमित लोगों में ही बदलाव आयेगा। लोग और-और की अन्धाधुंद  दौड़ में लगे हैं। नर नारायण जी, कोलकाता,  का सुझाव है कि विश्व के नेता अपने अनुभव साझा कर एक वैश्विक नियमावली बनाएँ, इससे बचने और इसे रोकने के लिए।  श्रीकिशनजी, दिल्ली,  ने कहा कि बदलाव होते रहना एक शाश्वत सत्य है। देवता और दानव दोनों सृष्टि के आरंभ से ही हैं। ताकत, किसी भी पक्ष में, कम या ज्यादा होना लगा रहता है। अब हम आध्यात्मिक से भौतिक अधिक हो गए हैं। संस्कारों को नष्ट कर चाँद–मंगल पर जाना प्रगति की निशानी बन गई है। हमारी प्रगति के मापदंड अध्यात्म के बदले भौतिक हो गए हैं। प्रगति के मापदण्डों को, कसौटियों को सुधारना होगा। ओम प्रकाश जी, कोलकाता, कहते हैं कि अशिक्षा और मजहबी मानसिकता को छोड़ कर अनुशासन में जीना सीखना होगा। सुंदरजी, कोलकाता,  ने लिखा बदलना प्रकृति का मौलिक स्वभाव है। जैसे मानवों का बाहुल्य होगा, दुनिया भी वैसी ही बनेगी। सुधरना बहुत जरूरी है, निरंतर और सबों को, तभी एक सुंदर दुनिया का निर्माण संभव है । अदितिजी, कोलकाता,  लिखती हैं कि लंबे समय को ध्यान में रखें तो कोई बदलाव नहीं आयेगा। क्योंकि हमारी मानसिकता और सोच संकुचित हो चुकी है। शिव कुमारजी, कोलकाता,  ने लिखा कि जब तक मानव अपने आचार-विचार नहीं बदलेगा कोई परिवर्तन नहीं होगा। प्रमिलाजी , कोलकाता, ने एक शायरी साझा की -

रफ्तार कम करो बचेंगे तो  मिलेंगे, गुलशन न रहेगा तो कहाँ फूल खिलेंगे?
वीरानगी में रह कर खुद से भी मिलेंगे, रह जाएँ सलामत तो गुल खुशियों के खिलेंगे।
अब वक्त आ गया है कायनात का सोचो, ये रूठ गई गर तो ये मौके नहीं मिलेंगे।
जो हो रहा है समझो क्यों हो रहा है, कुदरत के बदन को अब और कितना छिलेंगे।
मौका है अभी देख लो फिर देर ना हो जाए, जो कुदरत को दिये जख्म वो हम कैसे सिलेंगे।
है कोई तो जिसने जहां हिला के रख दिया, लगता था कि हमारे बिना पत्ते ना हिलेंगे।
झाँको दिलों के अंदर क्या करना है सोचो, खाक में वर्ना हम सभी जा के मिलेंगे।

राजेश, कोलकाता, आशावादी हैं और उन्होने बहुत अच्छी बात लिखी। वे लिखते हैं कि जब जिंदगी हमारे कथानक के अनुसार नहीं चल रही है तो यह समझना चाहिए कि अब कथा ऊपर वाले की चल रही है। और उसकी कथा हमारे लिखे कथानक से अच्छी होती है, अत: जो भी होगा अच्छा ही होगा। बनेचन्दजी, कोलकाता,  ने लिखा कि दुनिया सृष्टि के समय से ही बदलती रही है। एक साथ आमूलचूल परिवर्तन नहीं होता। हाँ, वर्तमान झटका बड़ा और अप्रत्याशित है, लेकिन दुनिया फिर अपनी पटरी पर आ जाएगी और बदलाव प्रकृति के नियमों के अनुसार ही होगा। सुधाजी, कोलकाता,  ने लिखा हमें लगता है कि दुनिया बदल रही है या हम दुनिया को बदल रहे हैं। जैसी हमारी सोच होगी वैसी दुनिया होगीमंजू, कोलकाता,  का मानना है कि कुछ बदलाव तो जरूर आयेगा लेकिन कमोबेश दुनिया वैसी ही चलती रहेगी। 

मुझे श्री अरविंद की बात याद आ रही है आज, कल से अच्छा है और कल, आज से अच्छा होगा। हम निरंतर प्रगति कर रहे हैं। हम इस प्रगति को नहीं रोक सकते हैं। यह प्रकृति प्रदत्त है। हाँ, हम अपने प्रयासों और कार्यों से इस प्रगति की गति को धीमा और तेज कर सकते हैं। हमारे वश में सिर्फ इतना ही है

अरुणजी , कोलकाता, ने वैचारिक विज्ञान का सहारा लेते हुए सबों के लिए एक मंत्र दिया है, जिससे हम इस प्रगति की गति को तेज कर सकें। वे चाहते हैं कि हम सभी रात सोने के पहले एक दृश्य आँखों के सामने लाएँ – “हम सब का जीवन पहले जैसा ठीक है, सब खुश हैं, कोरोना समाप्त हो गया है, हम सब उत्सव मना रहे हैं, बच्चे स्कूल जा रहे हैं, परिवार के हर एक लोग स्वस्थ्य हैं, पूरा समाज ठीक है, पूरा शहर व्यवस्थित है, पूरा देश सामान्य हो गया है, हवाई जहाज उड़ रहे हैं, गाड़ियाँ चल रही हैं, जीवन सामान्य हो गया है”। ये सब देखते हुए बिलकुल खुशी और रोमांच से भर जाएँ, होने वाली खुशी का अभी अनुभव करें। हाँ ऐसा वास्तव में सोचना और करना जरूरी है। हमारे सपने साकार हो जाएंगे। हम सब मिलकर, जो हमारे वश में है उसे करें, प्रगति की गति को तेज करें।
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हमें आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहता है। - महेश

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रविवार, 1 मार्च 2020

सूतांजली - मार्च 2020


सूतांजली                            ०३/०८                                                  मार्च २०२०
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उत्सव
          उत्सव यानि त्योहार। त्योहार यानि उमंग, यानि खुशी, यानि चमक, यानि सुगंध, यानि प्रेम, यानि अपनों का साथ। अलग अलग नहीं, सब एक साथ। संक्षेप में कहूँ तो सबों के साथ खुशनुमा बदलाव। इनमें से एक भी छूटा तो उत्सव फीका पड़ा। रोज की दिनचर्या से हट कर कुछ और करने का जज़बा। ये सब सामग्रियाँ किसी भी उत्सव के आवश्यक अंग हैं। इनमें भी अगर आप पूछें सबसे अहम अंग कौन सा है ? तो इसका दिल है अपनों का साथ। सब कुछ हो लेकिन अपनों का साथ न हो तो न उत्सव न त्योहार। समय के साथ साथ हमारे उत्सवों में से एक एक कर ये सामग्रियाँ कम होती गईं और जैसे जैसे ये कम होती गईं हमारे उत्सव फीके पड़ते गए।

          क्या आप बता सकते हैं इन में से वह कौनसी सामग्री है जो सबसे पहले छूटी? हाँ, आपने ठीक पहचाना, अपनों का साथ। ये अपने कौन थे? हमारे रिश्तेदार, हमारे परिचित, हमारे दोस्त और हमारे पड़ोसी। हम ने  अनेक बहाने खोजे, और खोज कर अपनों का दायरा सिकोड़ते चले गए। हम कहते हैं लोग अब रंग नहीं केमिकल-गोबर-गंदगी का प्रयोग करते हैं, गुलाल नहीं धूल लगाते हैं, प्रेम नहीं रहा, समय की बर्बादी है .......। झूठ कहते हैं हम। ये तो केवल बहाने हैं। अपने आँसूओं को छिपाने के। क्या हमें याद है हमने पिछली होली कब, किस के साथ, कहाँ और कैसे खेली थी? अगर वे सब फिर जमा हो जाएँ तो क्या हम फिर वही हुड़दंग किए बिना रहेंगे? हाँ, कई बिछुड़ गए लेकिन नए तो आए हैं? उन्हे मिलाइए, उन्हे जोड़िए। हर उत्सव की जड़ तो वही अपनों का साथ ही है। उनके बिना हर उत्सव वैसा ही है जैसे बिना नमक का व्यंजन, बिना चीनी की मिठाई। जहां जड़ मजबूत हुई ये सब बहाने नदारद हो जाएंगे और फिर से आ जाएगी वही खुशी, उमंग, चमक, सुगंध, त्योहार। जहां ये जमा हुए, उत्सव राग बजने लगेगा।

          बाजार से रंग नहीं फूल लाइये। गुलाल नहीं जड़ी बूटियाँ लाइये। अगर आप के पास समय नहीं है तो बच्चों, दादा, दादी, बुजुर्ग, मित्र, पड़ोसी को साथ लगाइये। अगर उन्हें नहीं आता तो उन्हे बता दीजिये, इंटरनेट में बनाने की विधियां मिल जाएगी। फूलों से प्राकृतिक रंग और जड़ी बूटियों से सुगंधित  गुलाल बनाइये। बच्चों को उत्सव और त्योहार का अर्थ समझ आयेगा और वे उससे जुड़ेंगे। उनके उत्साह और उमंग में खुशी और सुगंध का तड़का लगेगा। मिठाई भले ही बाजार से लाइये, लेकिन कम से कम एक मिठाई घर पर ही बनाइये। रिश्तेदारों को शामिल कीजिये – उन्हे बुलाएँ या उनके पास जाएँ। उनके आमंत्रण का इंतजार मत कीजिये। क्या आप होली खेलने बुलाने पर जाते थे? या बिना बुलाए ही जाते थे? मित्रों और पड़ोसियों के दिलों पर दस्तक दीजिये। देखिये दरवाजे खुलने लगेंगे। उत्सव का संगीत फिर से बजने लगेगा। होली की होली मत जलाइये बल्कि होली मंगलाइए
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जो फल  पावे, मनवांछित बन जावे

          “अरे रामू उ उ उ ..... जरा दौड़ कर बाजार जा और ये सामान जल्दी से ले आ”, मालकिन ने रामू को दैनिक वस्तुओं की एक लिस्ट तथा तदनुसार रुपए देते हुए उसे आवाज लगाई। रामू के निकलते ही ड्राईवर को गाड़ी निकालने का हुक्म सुना दिया ‘मंदिर जाना है’।

          मंदिर में ठाकुर के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गईं, आंखे बंद, ध्यानमग्न लेकिन पूरी तरह से चैतन्य। एक दूसरी लिस्ट निकल गई। इस बार लिखी हुई नहीं है मानसिक रूप से कार्यों की एक लिस्ट उसने ठाकुर को पकड़ा दी - मेरे पैरों को ठीक कर दे, इनकी सुनने की कोई व्यवस्था कर दे, बहू का दिमाग ठीक कर दे, बेटी की सास को उसके गाँव भेज दे नहीं तो किसी भी तीर्थस्थान पर ही भेज दे, पोते को..(अंतहीन).... बाकी जो और तेरे को ठीक लगे। यानि ये सब तो करना ही है लेकिन यह अंतिम मांग नहीं है। अपनी समझ से और भी जोड़ दे। जैसे कि चेतवानी दे रही हों कि अगर तुमने नहीं जोड़ा तो अगली बार मैं कुछ और जोड़ दूँगी। और अपने इन कामनाओं की पूर्ति के बदले, तदनुसार, वे क्या चढ़ाएंगी, क्या  पूजा-पाठ करवाएँगी, कौनसे मंदिर का दर्शन करेंगी आदि आदि का मानसिक संकल्प। साथ ही वादा पूर्ति के लिए कुछ अग्रिम भुगतान भी उन्होने ठाकुर की  थाली में डाल दिये। फिर आरती भी कर ली ‘......मन इच्छा फल पावे, मनवांछित फल पावे......’ और दूसरी-दूसरी  पंक्तियाँ भले ही दो बार गायी हों इस पंक्ति को हिल हिल कर, ताली बजा बजा कर उच्च स्वर में कई बार गायी गईं। निकलते निकलते एक बार फिर से याद करा दिया ‘देखना ध्यान रखना’।

          इस रामू और ठाकुर में कोई फर्क नजर आता है आपको? हाँ, एक फर्क जरूर है, एक चपरासी है और दूसरा अधिकारी। दोनों से कामनाएँ हैं, पद के अनुसार आदेश और अनुग्रह है, आवश्यकता की लिस्ट है और उसके अनुसार भुगतान या विनिमय में नगद या वादे हैं।

          जिस दिन दिल से इसके बदले यह निकले ‘जो फल पावे, मनवांछित बन जावे’ समझ लीजिये आपको मोक्ष मिल गया। जिस दिन धन कमाने के लिए काम ढूँढने के बदले धन ढूँढने लगें काम को पूरा करने के लिए, समझ लीजिये तीसरा नेत्र खुल गया। ठाकुर को लिस्ट देने के बजाय लिस्ट बनाने की ज़िम्मेदारी भी उसे ही सौंप दें! जीवन बदल जाएगा। ठाकुर से सौदेबाजी बंद हो गई। मोक्ष कोई स्थान नहीं, बल्कि वह ज्ञान है जहां हमें यह पता चल जाता है कि इस जन्म के बाद क्या? यह ठीक वैसे ही है जैसे सपने से जागते ही हमारा स्वप्न से कोई सरोकार नहीं रहता और हम यथार्थ के संसार में आ जाते हैं। शेर गायब हो जाता है, जंगल नहीं दीखता और हम अपने बिस्तर पर आ जाते हैं।  स्वप्न और संसार का फर्क समझ आ जाता है। ठीक वैसे ही मोक्ष का ज्ञान प्राप्त होते ही हम देख लेते हैं, अनुभव कर लेते हैं कि यह दुनिया भी एक स्वप्न मात्र ही है। कामनाएँ तब भी रहती हैं लेकिन उस की पूर्ति करना, न करना ठाकुर के हाथ में छोड़ देते हैं। निष्काम कर्म की उत्पत्ति होती है। मिला तो ठीक, न मिला तो ठीक। यह एक अलग ही हलका जीवन बन जाता है। ज्ञान यानि मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। अर्थ और काम को त्याग कर धर्म की तरफ प्रवृत्त तो हुए लेकिन उसके बदले अर्थ और काम की ही इच्छा रही, इन्ही के विनिमय में धार्मिक कृत्य किया तो रहे तो वहीं के वहीं। निचोड़ - हमें करने योग्य कर्म करने हैं बिना उस के फल पर आश्रित हुए। यही है असली मोक्ष।  
 (आचार्य श्रद्धेय श्री नवनीतजी द्वारा श्री औरोबिंदो आश्रम, मधुवान, रामगड़ में जून २०१९ को दिये गए व्याख्यान से संकलित)
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चलते चलते – इन्हे भी जानिए
 हरेकला हजब्बा (Harekala Hajabba) कर्नाटक के नयापड़ापू, मंगलोर के निवासी, अनपढ़ ६४ वर्षीय सड़क पर टोकरी में संतरों के विक्रेता हैं। लगभग २० वर्षों पूर्व इन्हों ने अपनी थोड़ी सी कमाई से बचा बचा का जोड़े हुए  रुपए लगाकर गाँव के बच्चों के लिए एक मदरसे में सार्वजनिक विद्यालय खोला 

जिसे बाद में सरकार की सहायता से जिला पंचायत उच्च प्राथमिक विद्यालय में तब्दील कर दिया गया। इनके पास खुद के रहने के लिए ढंग का मकान नहीं है, खुद कभी स्कूल नहीं गए। उन्हे प्रेरणा मिली एक घटना से। एक बार एक विदेशी ने उनसे अँग्रेजी में संतरे का दाम पूछ। वे समझ नहीं पाये, अत: जवाब नहीं दे पाये। उसी समय यह तय किया कि भले ही वे नहीं पढ़े हों लेकिन गाँव के बच्चों के लिए एक स्कूल खोलूँ जहां वे पढ़ सकें और उन्हे ऐसी स्थिति का सामना नहीं  करना पड़े। जब इन्हे सरकार से 2020 में पद्मश्री मिलने की खबर मिली उस समय वे राशन दुकान की लाइन में खड़े थे। हम तो उनसे ज्यादा सक्षम हैं। फिर .......
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हमें आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहता है। - महेश

शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

सूतांजली, फ़रवरी २०२०


सूतांजली                            ०३/०७                                               फरवरी २०२०
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अर्थ-काम -> धर्म -> मोक्ष
          शाम घिर आई है। सूर्य अस्त होने को है। घनघोर जंगल में भटक गया हूँ। रास्ता नहीं सूझ रहा है। कभी ईधर बढ़ता हूँ कभी उधर। अजीब अजीब पक्षियों और जानवरों की आवाजें आ रही हैं। निपट अकेला हूँ। मन घबरा रहा है। फोन पर न जीपीएस पकड़ रहा है न ही कोई टावर। दिल की धड़कन भी धीरे धीरे बढ़ रही है। तभी जंगली जानवर की दहाड़ सुनाई पड़ती है। चौंक कर नजर घुमाता हूँ। एक शेर धीरे धीरे आगे बढ़ रहा है। मेरे पैर जड़ हो गए। धीरे धीरे पीछे होने लगा। धड़कन और बढ़ गई। पसीने पसीने हो गया। जीभ जैसे तालू से चिपक गई। पूरी ताकत बटोर कर भागना शुरू करता हूँ। बाघ मेरे पीछे है। मुड़ मुड़ कर देख कर भागने के चक्कर में गिर पड़ता हूँ और शेर ने छलांग लगा दी। मेरे मुंह से ज़ोर की चीख निकल पड़ती है और आँख खुल जाती है। अपने को बिस्तर पर पड़ा पाता हूँ। पसीना अभी भी है, धड़कन अभी भी तेज है, लेकिन अब शेर नहीं है। मैं आराम से पड़ा हूँ। डर दूर हो जाता है। धीरे धीरे शांत हो जाता हूँ। समझ लेता हूँ कि “वह सपना था यह यथार्थ है”। मन में यह प्रश्न नहीं उठा क्या यह भी स्वप्न है और यथार्थ कुछ और?
          मेरे गुल्लक में २० रुपये हैं। मेरे लिए २ रुपए का बहुत महत्व है। किसी और के गुल्लक में २०००० रुपए हैं उसके लिए २ रुपयों का कोई महत्व नहीं लेकिन २००० का है। तीसरे के गुल्लक में २० लाख रुपए हैं। उसके लिए २००० का महत्व नहीं लेकिन २ लाख का है। एक ही समय में अलग अलग लोगों के लिए रुपयों का महत्व अलग अलग है। जबकि वे २ हों या २ लाख उन सब का, उस समय, समान मूल्य है। जैसे जैसे हमारी पूंजी बढ़ती जाती है हमारे लिए कम पूंजी का महत्व कम होता जाता है। जैसे जैसे हमारा ज्ञान बढ़ता जाता है हमारा ध्यान छोटे ज्ञान या छोटी बातों से हटता जाता है। जैसे जैसे हमारा ध्यान छोटी बातों से अलग हो जाता है, हममें बड़प्पन आने लगता है। जैसे जैसे पूंजी बढ़ती जाती है काम भी बढ़ता जाता है। वैसे ही जैसे जैसे ज्ञान बढ़ता है मन शांत होने लगता है।
          अर्थ का अर्थ सिर्फ धन नहीं है। हमार पद, हमारी शान, हमारा रुतबा, हमारी शक्ति हमारा अभिमान-स्वाभिमान सब हैं। उसी प्रकार काम का अर्थ सिर्फ काम वासना नहीं बल्कि कामनाएँ हैं। हमारी इन कामनाओं की फेहरिस्त लंबी है, बहुत लंबी। बल्कि यह भी कह सकते हैं अंत हीन हैं। ये लगातार बदलती रहती हैं। जुड़ती रहती हैं। हर अर्थ और हर काम बुरा नहीं है जैसा कि साधारणतया हम समझते हैं।  अ-धार्मिक अर्थ और काम त्याज्य हैं जबकि धर्मयुक्त काम करने योग्य हैं। धर्म का यही कार्य है। हमें अ-धार्मिक से धार्मिक की तरफ प्रवृत्त करना। जब हमें काम चाहिये अर्थोपार्जन के लिए, इसका स्वरूप अधार्मिक हो जाता है। लेकिन जब हमें अर्थ चाहिए काम पूरा करने के लिए तब यह धार्मिक हो जाता है।
          जब हम इस प्रकार धार्मिक कार्यों में प्रवृत्त होने लगते हैं तब प्रश्न उठने लगता है – इसके बाद? मैं कौन हूँ? मैं कहाँ से आया हूँ? कहाँ जाऊंगा?  धर्म का कार्य यही है कि वह ऐसे प्रश्नों को उत्पन्न करने लगता है। सब प्रकार की धार्मिक प्रार्थना, जप, ध्यान, उपासना मन के मैल को साफ कर ऐसे प्रश्नों को जागृत करते हैं। अर्थ और काम से हम मैल जमा करते रहते हैं, ये क्रियाएँ इन्हे साफ करती रहती हैं। जैसे जैसे मैल साफ होता जाता है, तीव्रता गहरी  होती जाती और ऐसे प्रश्न का आना स्वाभाविक होता जाता है। शेर यथार्थ था, या यह बिस्तर? यह बिस्तर यथार्थ है या इसके बाद  भी कुछ और है? ये सब कौन करा रहा है? सृष्टि के बाद क्या? नचिकेता के मन में यही प्रश्न तीव्र था। मरने के बाद क्या होता है? इसे जानने में कई कई जन्म भी लग जाते हैं। हमार ज्ञान बढ़ने लगता है, हमारे अनेक अनुत्तरित प्रश्नों के जवाब हमें मिलने लगते हैं। हमें यह सब दिखने लगता है। २० हजार और २० लाख का फर्क समझ आने लगता है। पूर्व जन्म, वर्तमान जन्म और आगे के जन्म का फर्क समझ आने लगता है। असीम दिख जाने पर छोटा अपने आप छूट जाता है। शेर और बिस्तर का यथार्थ समझ आ जाता है। इस समझ के आने को ही  हम तीसरे नेत्र का खुलना कहते हैं। इसे जानने की इच्छा को ही मोक्ष की इच्छा या मुमुक्षा कहते हैं। इन उत्तरों की खोज एक पुरुषार्थ बन जाता है। उस ज्ञान को प्राप्त करने की इच्छा को ही मोक्ष पुरुषार्थ कहते हैं।
        जीवन के यही चार पुरुषार्थ हैं – अर्थ और काम जिसे धर्म नियंत्रित कर दिशा प्रदान करता है मोक्ष की तरफ।
(आचार्य श्रद्धेय श्री नवनीतजी द्वारा श्री औरोबिंदो आश्रम, मधुवन, रामगड़ में जून २०१९ को दिये गए व्याख्यान पर आधारित)
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श्री अरविंद का दूसरा और तीसरा पागलपन
(पिछले अंक (फरवरी 2020) में श्री अरविंद के तीन पागलपनों की चर्चा की थी, जिसका जिक्र  उन्होने अपनी पत्नी से एक पत्र में किया था। उनका पहला पागलपन था ‘2 आना रखना और 14 आना देना। उनके शेष दो पागलपन, जिसकी चर्चा उन्होने की, वे ये हैं।)
दूसरा पागलपन  - भगवान का साक्षात दर्शन प्राप्त करना
          “दूसरा पागलपन, हाल में ही सिर पर सवार हुआ है वह यह है कि चाहे जैसे भी हो, भगवान का साक्षात दर्शन प्राप्त करना ही होगा। आजकल का धर्म है, बात बात में मुंह से भगवान का नाम लेना, सबके सामने प्रार्थना करना, लोगों को दिखाना कि मैं कितना धार्मिक हूँ। मैं इसे नहीं चाहता। ईश्वर यदि हैं तो उनके अस्तित्व को अनुभव करने का, उनका साक्षात दर्शन प्राप्त करने का कोई न कोई पथ होगा, वह पथ चाहे कितना भी दुर्गम क्यों न हो, उस पथ से जाने का मैंने दृड़ संकल्प कर लिया है। हिन्दूधर्म का कहना है कि अपने शरीर के, अपने भीतर ही वह पथ है। जाने के नियम भी दिखा दिये हैं, उन सबका पालन करना मैंने प्रारम्भ कर दिया है, एक मास के अंदर अनुभव कर सका हूँ कि हिन्दूधर्म की बात झूठी नहीं है, जिन जिन चिन्हों की बात कही गई है उस सबकी उपलब्धि मैं कर रहा हूँ। अब मेरी इच्छा है कि तुम्हें भी उस पथ पर ले चलूँ, ............ उस पथ पर चलने से सिद्धि प्राप्त हो सकती है, किन्तु प्रवेश करना अपनी इच्छा पर निर्भर करता है, कोई तुम्हें पकड़ कर नहीं ले जा सकता.........”

तीसरा पागलपन – मैं स्वदेश को माँ मानता हूँ
          “तीसरा पगलापन यह है कि अन्य लोग स्वदेश को एक जड़ पदार्थ, कुछ मैदान, खेत, वन, पर्वत, नदी-भर समझते हैं, मैं स्वदेश को माँ मानता हूँ।, उसकी भक्ति करता हूँ, पूजा करता हूँ। माँ की छाती पर बैठ कर यदि कोई राक्षस रक्तपान करने के लिए उद्यत हो तो भला बेटा क्या करता है? निश्चिंत हो कर भोजर करने, स्त्री-पुत्र के साथ आमोद-प्रमोद करने के लिए बैठ जाता है या माँ का उद्धार करने के लिए दौड़ पड़ता है? मैं जानता हूँ कि पतित जाति का उद्धार करने का बल मेरे अंदर है, शारीरिक बल नहीं, तलवार या बंदूक लेकर मैं युद्ध करने नहीं जा रहा हूँ, वरन ज्ञान का बल है। क्षात्र तेज एकमात्र तेज नहीं है, ब्रह्म तेज भी एक तेज है, वह तेज ज्ञान के ऊपर प्रतिष्ठित होता है। यह भाव नया नहीं है, आजकल का नहीं है, इस भाव को लेकर ही मैंने जन्म ग्रहण किया है, यह भाव मेरी नस-नस में भरा है, भगवान ने इसी महाव्रत को पूरा करने के लिए मुझे पृथ्वी पर भेजा है। ....  
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चलते चलते – इन्हे भी जानिए
          क्या आपने सुना है ह्यूमेनिटी हॉस्पिटल का नाम? या फिर सुभाषिणी मिस्त्री का नाम? १५००० स्क्वायर फीट में फैला ४५ बिस्तरों वाले इस अस्पताल के प्रेरणा स्त्रोत हैं ये शब्द “अमीर हो या गरीब, बच्चा 
सुभाषिणी मिस्त्री

हो या बूढ़ा, सबों के लिए सस्ते मूल्यों पर चिकित्सा। हम यह सुनिश्चित करते हैं कि सबों को सुलभ दरों पर चिकित्सा उपलब्ध हो”। ये शब्द हैं सुभाषिणी मिस्त्री के - एक अति साधारण सड़क के किनारे तरकारी बेचने वाली महिला के जिसने  इस अस्पताल का सपना देखा और उसे मूर्त रूप दिया। अहा!जिंदगी की इन पर नजर पड़ी जून २०१५ में और सबसे बड़ी बात कि सरकार की भी इस पर नजर पड़ी और २०१८ में पद्मश्री से नवाजा। www.humanityhospital.org पर जाएँ और सामर्थ्य है तो लाल रंग से लिखे DONATE पर जरूर से क्लिक करें। 

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निवेदन
आपलोगों के द्वारा हमारे उत्साहवर्धन के हम आभारी है। आपसे प्रेरणा पा कर हम सूतांजली का स्वरूप बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। आपके सहयोग की आवश्यकता है, यथा स्वरचित या संकलित लेख और कविता, प्रूफ रीडर, डिजाइनर, सुझाव और आपका स्नेह तथा आशीर्वाद। आप जितना और जैसा सहयोग कर सकें आपका स्वागत है।            
                     - महेश
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हमें आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहता है। - महेश

बुधवार, 1 जनवरी 2020

सूतांजली, जनवारी २०२०


सूतांजली                            ०३/०६                                               जनवरी २०२०
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पहला पागलपन – २ आना रखना १४ आना देना
          पागल किसे कहते हैं? जो बनी बनाई लीक पर नहीं चलता, जो अपनी सुख-सुविधा और सुरक्षा की परवाह न करके नए रास्ते बनाने की कोशिश करता है। दुनिया उसे ही तो पागल कहती है। लेकिन जब ऐसे पागल को सफलता मिल जाती है तब हम उसे ही अपना पथ प्रदर्शक मान लेते हैं, उसके आगे सर झुकाते हैं। ऐसे ही एक पागल हैं श्री अरविंद , जिन्हें हमने अपना पथ प्रदर्शक माना और उनके सामने अपना सर झुकाया । अपनी धर्मपत्नी श्रीमती मृणालिनी देवी को लिखे एक पत्र में उन्होने अपने तीन पागलपनों की चर्चा की है। वे लिखते हैं –
श्री अरविंद

          मेरे तीन पागलपन हैं। पहला पागलपन है मेरा यह दृड़ विश्वास कि भगवान ने जो गुण, प्रतिभा, उच्च शिक्षा, विद्या, धन दिया है, वह सब भगवान का है। जो कुछ परिवार के भरण पोषण में  लगता है और नितांत आवश्यक है उसे ही अपने लिए खर्च करने का अधिकार है, उसके बाद जो कुछ बचा रह जाता है उसे भगवान को लौटा देना उचित है। यदि मैं सब अपने लिए, सुख के लिए, विलास के लिए खर्च करूँ तो मैं चोर कहलाऊंगा। हिन्दू शास्त्र कहते हैं कि जो भगवान का धन लेकर भगवान को नहीं लौटाता, वह चोर है। आज तक मैं भगवान को दो आना देकर, चौदह आना, अपने सुख में खर्च कर, हिसाब चुकता कर, सांसारिक सुख में मस्त था। जीवन का अर्धांश वृथा ही गया, पशु भी अपना और अपने परिवार का उदर भर कर कृतार्थ होता है।
          मैं इतने दिनों तक पशुवृत्ति और चौर्यवृत्ति करता आ रहा था – यह मैं समझ गया हूँ। यह जान कर मुझे बड़ा अनुताप और अपने ऊपर घृणा हो रही है; अब नहीं, वह पाप मैंने जीवन भर के लिए छोड़ दिया है। भगवान को देने का अर्थ क्या है?  इसका अर्थ है, धर्म-कार्य में व्यय करना। जो रुपया सरोजिनी (बहन) और उषा को दिया है उसके लिए मुझे कोई अनुताप नहीं, परोपकार करना धर्म है। आश्रित की रक्षा करना महा धर्म है, किन्तु केवल भाई-बहन को देने से हिसाब नहीं चुक जाता। इस दुर्दिन में समस्त देश मेरे द्वार पर आश्रित है, मेरे तीस कोटी भाई-बहन इस देश में हैं, उनमें से बहुतेरे अनाहार से मर रहे हैं, अधिकांश कष्ट और दु:ख से जर्जरित होकर किसी प्रकार बचे हुए हैं, उनका हित करना होगा।
          ......... केवल सामान्य लोगों की तरह खा-पहन कर, ठीक ठीक जिस चीज की जरूरत है उसे ही खरीद कर और सब भगवान को दे दूँगा – यही मेरी इच्छा है। अगर तुम सहमत हो, त्याग स्वीकार करो तो मेरी अभिलाषा पूर्ण हो सकती है। ........” 
(श्री अरविंद सोसाइटी द्वारा प्रकाशित पत्रिका अग्निशिखा से। २रा और ३रा पागलपन अगले अंक में)
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मित्र और मित्रता

प्रश्न – क्या होती है मित्रता और किसे कहते हैं मित्र?
खलीलजिब्रान के उत्तर –
·        हमारा मित्र
-      हमारे अभावों की पूर्ति है।
-      हमारा खेत है जिसमें हम प्रेम का बीज बोते हैं और कृतज्ञता का फल प्राप्त करते हैं।
-      हमारा भोजन है, आवास है, अलाव है – क्योंकि हम उसके पास अपनी भूख लेकर जाते हैं और शांति पाने की इच्छा से उसे खोजते हैं।
·        जब हमारा मित्र अपना दिल खोलकर हमारे सामने रखे तब हम “ना” कहने से डरें नहीं और “हाँ” कहने से हिचकें नहीं।
·        जब मित्र चुप हो जाता है तब भी हमारा हृदय उसके दिल की आवाज सुनना बंद नहीं करता, क्योंकि मित्रता में, शब्दों के बिना ही सारे विचार, कामनाएँ और आशाएँ अव्यक्त ही पैदा होती हैं और संप्रेषित होती हैं।
·        मित्रता में आत्मीयता को और गहरा बनाने के सिवा और कोई प्रयोजन नहीं होता है।

·        हमारी प्रिय से प्रिय वस्तु मित्र के लिए होती है क्योंकि जिसने हमारे जीवन का भाटा देखा है उसे जीवन का ज्वार भी दिखाना है।
·        मित्र ऐसी वस्तु नहीं है जिसे हम समय की हत्या करने के लिए खोजते हैं बल्कि उसे समय को सजीव करने के लिए खोजते हैं।
·        मित्र का कार्य हमारे अभाव की पूर्ति करना नहीं बल्कि हमारे खालीपन को भरना है।
·        हमारी मैत्री के माधुर्य में हास्य का स्फुरण और उल्लास का विनिमय हो।
·        इन्ही सुबह की नन्ही ओस की बूंदों में हृदय प्रभात देखता है और ताजा हो उठता है।
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१०८ ही क्यों?
          संख्या तो महज एक संख्या ही है। क्या ऐसा है? अगर ऐसा है तब कोई संख्या शुभ या अशुभ कैसे हो गई? विश्व के हर देश में, समुदाय में, संप्रदाय में शुभ और अशुभ संख्या है और इस मान्यता के पीछे कोई-न-कोई तर्क भी है। अत: हर संख्या महज एक संख्या नहीं है, उससे ज्यादा है। हम १०८ को अति शुभ मानते हैं। इसके कई कारण हैं। हर कारण का अपना अलग औचित्य है। हर माला में १०८ मनके होते हैं। ये मनके भी अलग अलग बीजों के बने होते हैं यथा चन्दन, तुलसी, मूंगा, रुद्राक्ष आदि। इनका प्रयोग मंत्रों के जाप की गिनती के लिए किया जाता है। इन्हे लोग गले में भी पहनते हैं। इनके अलावा मणि-माणक्य-मोतियों की भी मालाएँ होती हैं। इनके मनकों की संख्या निर्धारित नहीं होती है। मंत्रों के जाप के लिए बनी माला १०८ मनकों की  होती हैं। इसके अलावा एक १०९वां मनका, जिसे सुमेरु कहते हैं, प्रारम्भ और समाप्त होने की जानकारी देने के लिए होता है। इसे लांघते नहीं। १०८ जाप पूरा करने के बाद सुमेरु से माला को पलटकर पुन: जाप प्रारम्भ किया जाता है। प्रश्न है १०८ ही क्यों?
          हमारी पृथ्वी वृत्ताकार है। एक वृत्त ३६०का होता है।  राशियाँ १२ होती हैं। इन १२ राशियों को अँग्रेजी में जोडियक साइन कहते हैं। ये १२ राशियाँ हिन्दी और अँग्रेजी में  हैं – १.मेष (एरिस), २.वृषभ (टोरस), ३.मिथुन (जौमिनी), ४.कर्क (कैंसर), ५.सिंह (लियो), ६.कन्या (वर्गो), ७.तुला (लिब्रा), ८.वृश्चिक (स्कोर्पिओ), ९.धनु (साजीटेरियस), १०.मकर (कैप्रीकोर्न), ११.कुम्भ (एक्वेरियस) और १२.मीन (पाइसेस)। इन्ही १२ राशियों में समाहित हैं २७ नक्षत्र। ये हैं – १.अश्विनी, २. भरिणी, ३.कृतिका, ४.रोहिणी, ५.मृगशिरशा, ६.आर्द्रा, ७.पुनर्वसु, ८.पुष्य, ९.आश्लेषा, १०.मघा, ११.पूर्वाफाल्गुनी, १२. उत्तराफाल्गुनी, १३.हस्त, १४.चित्रा, १५.स्वाति, १६.विशाखा, १७.अनुराधा, १८.ज्येष्ठा, १९.मूला, २०.पूर्वाषाढ़ा, २१.उत्तराषाढ़ा, २२.श्रवणा, २३.धनिष्ठा, २४.शतभिषा, २५.पूर्वाभद्रपद, २६. उत्तराभद्रपद और २७.रेवती। २८वां नक्षत्र  अभिजित है लेकिन इसकी गणना नक्षत्रों में नहीं होती है।   इन २७ चक्रों को ४ चरणों में  विभक्त किया जाता है जिसे पद कहते हैं। इस पूरे चक्र में कितने पद हैं? २७ नक्षत्र X ४ पद = १०८। अत: १०८ बार मंत्र जाप कर प्रार्थना करने से हम हमारी सम्पूर्ण पृथ्वी से प्रार्थना कर रहे हैं।
          अब इसका वैज्ञानिक रूप भी देखें। अगर हम इस १०८ पद का एक ज्यामितीय चित्र बनाएँ और उसे वैज्ञानिकों द्वारा खोजी हुई  गॉड पार्टीकल के चित्र से मिलाएँ तो दोनों में अद्भुद समानता देखने को मिलती है। वैज्ञानिकों का मत है कि हमारी इस सृष्टि का कारण यही गॉड पार्टिकल है।
१०८ पदों का श्री यंत्र



गॉड पार्टिकल 
          









दूसरी ध्यान देने वाली बात यह है कि इस पूरी गणना में अंक को बहुत महत्व दिया गया है। हमारी सृष्टि में ९ गृह हैं, ३६० (३+६+०=९) कोण हैं, १०८ (१+०+८=९) पद हैं और २७ (२+७=९) नक्षत्र हैं। हमारा “श्री यंत्र”, संसार का सबसे रहस्यमय ज्यामतीय पहेली भी ९ त्रिभुजों (ट्रैंगल) से ही बना है। ये सब गणनाएँ इस बात की तरफ इशारा करती हैं कि हम जब भी १०८ बार मंत्रों का जाप करते हैं हम सीधे पूरी सृष्टि से प्रार्थना करते हैं, ९ ग्रहों से प्रार्थना करते हैं,  १२ राशियों से प्रार्थना करते हैं, २७ नक्षत्रों से प्रार्थना करते हैं, निर्गुण निराकार ब्रह्म से प्रार्थना करते हैं 
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ओस की बूंदें

कहते हैं शब्दों में अर्थ, सीप में मोती, आँख में चरित्र, बोली में जन्मक्षेत्र, फूल में खुशबू, और चाल में आत्मबल में छिपा रहता है। देखने को पारखी दृष्टि चाहिए।
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 निवेदन

आपलोगों के उत्साहवर्धन के हम आभारी है। आपसे प्रेरणा पा कर हम सूतांजली का स्वरूप बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। आपके सहयोग की आवश्यकता है, यथा स्वरचित या संकलित लेख और कविता, प्रूफ रीडर, डिजाइनर, सुझाव और आपका स्नेह तथा आशीर्वाद। आप जितना और जैसा सहयोग कर सकें आपका स्वागत है।                                  - महेश


सूतांजली, अगस्त द्वितीय 2026, आकर्षक घर की कुंजी

  २कोई ऐसा अक्षर नहीं है, जिसका प्रयोग मंत्र-रचना में न हो सके , कोई ऐसा वृक्ष नहीं है, जो किसी न किसी व्याधि की औषधि न हो , कोई ऐसा...