शनिवार, 1 मई 2021

सूतांजली, मई २०२१

 सूतांजली

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वर्ष : ०४ * अंक : १०                       (🔊२२.४५)                           मई  * २०२१

एक सेव में कितने बीज हैं, यह जानने का बहुत सरल उपाय है;

लेकिन हम में से कौन, कभी यह बता पायेगा कि

एक बीज में कितने सेव हैं?  

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मालिक से गुलाम तक का सफर (🔉००.००-०६.२८)

समुद्र तट पर बिखरे कण रेत का सम्मान पाते हैं, लेकिन वही रेत हमारे घर के अंदर में धूल बन तिरस्कार का भागी बनती है। जब रेत, समुद्र तट से वाहनों पर लद कर बाजार की तरफ बढ़ती है तब माल कहलाती है। मिश्रण कारखाने (मिक्सिंग प्लांट) में कच्चा माल (रॉ मैटिरियल) और फिर सीमेंट के साथ मिल कर कंक्रीट बन जाती है और बड़े-बड़े निर्माण करती है। यह पूरा खेल केवल स्थान और साथी का है।

 

भीड़ भरे बाजार में किसी अनजाने को ठोकर लग जाती है और हम अपराध बोध से मुझे क्षमा करें (आइ एम सोर्री) कह उठते हैं। हाथ से छिटक कर कुछ समान जमीन पर गिर पड़ता है और कोई अनजान उसे उठा कर हमारे हाथ में पकड़ा देता है। हम कृतज्ञ भाव से धन्यवाद (थैंक यू) बोल उठते हैं। लेकिन जब यही घटना हमारे अपने किसी परिचित के बीच, भाई-भाई के बीच, पति-पत्नी के बीच, माँ-बाप-बेटे-बेटी के बीच या दोस्तों के बीच होती है तब हम यह शिष्टाचार निभाने की जिददो-जहद नहीं करते। इसे हम अपना अधिकार या कर्त्तव्य मानते हैं। हमारी इस आदत के कारण पढ़े-लिखे लोग, पश्चिमी सभ्यता में गुने लोग इसे अनपढ़-गँवार-अशिष्ट  होना मानते हैं।

ओशो 
ओशो कहते हैं, हम यह मानते हैं कि शिष्टाचार का निर्वाह उन दो लोगों के बीच आवश्यक है जहाँ वे एक दूसरे से अपरिचित हैं। उन अपरिचित व्यक्तियों को एक-दूसरे की जानकारी नहीं है। हो सकता है, अनजाने में लगी ठोकर के कारण दूसरे का मिजाज चढ़ गया हो और वह उसका प्रत्युत्तर देने की तैयारी कर रहा हो? हो सकता है, वहाँ, अपनी भूल का इजहार बढ़ती दुर्घटना और वैमनस्य पर लगाम लगा दे और इसके उलट आभार के शब्द एक नया परिचय तैयार कर दे। लेकिन जहां वे दोनों परिचित हों, जानते हों, ऐसी मार-पीट या नये परिचय के लिए जगह नहीं होती, और परिचित होने के कारण हमें अपने कर्त्तव्य और अधिकार का भान होता है। यहाँ हमारा आपसी प्रेम ही सर्वोपरि होता है जिसके बीच ऐसे शिष्टाचारों के लिए स्थान नहीं होता। यह न हमारा गँवारपन है, और न ही अशिष्टता।  यह है हमारा अपनत्व, प्रेम  और स्नेह। ये शिष्टाचार दो व्यक्तियों के मध्य चिकनाई (लुब्रिकैंट) का काम करती हैं। प्रेम की चिकनाई सर्वोच्च है

 

हमारी जीवन शैली संयुक्त परिवार की रही है, जहां पर हम साथ-साथ रहे-खेले-पढ़े-बड़े हुए। फिर अचानक भूचाल आया वैश्वीकरण का, उपभोक्तावाद का और संचार-तकनीक की क्रांति का। इसने हमें बुरी तरह झकझोर कर रख दिया।  परिवर्तन की गति इतने तेज थी / है कि हम अपने आप को न तो उस गति से बदल सके और न ही समझने, परखने का समय मिला। अनेक परिवर्तनों को सुविधा के नाम पर ज्यों-का-त्यों स्वीकार कर लिया गया। पीढ़ी को तैयार करना परिवार की जिम्मेदारी थी लेकिन अब स्वतंत्र, एकल और निरंकुश जीवन शैली ही मान्य हो गई है। बच्चा छुटपन से ही पारिवारिक व्यापार से जुड़ कर वयस्क होने तक निपुण हो जाता था। अब अपने पैतृक व्यवसाय से जुड़ नहीं पाता और जो परिवार काम देनेवाला था काम खोजने वाला बन गया। जो कभी मालिक हुआ करता था, अब गुलाम बन गया।

 

भारत का अपना इतिहास रहा है, संस्कृति रही है, परम्पराएँ रही हैं। ज्ञान-निपुणता पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती हैं। पिछली पीढ़ी के अनुभव नई पीढ़ी के व्यवसाय, गृहस्थी और सामाजिक जीवन में काम आती हैं। हर पुत्र पिता से आगे निकलता है। कहा ही जाता है कि बालक मानव का पिता है (चाइल्ड इस फादर ऑफ द मैन) । पिता का शिखर ही बच्चे का पहला पड़ाव होता है। लेकिन, पढ़े-लिखे, मोटा वेतन पाने वाले नौकरीपेशा लोगों को इसका प्रभाव नजर नहीं आता। लेकिन इसका दूरगामी प्रभाव पड़ रहा है। इंसान मालिक बनने के बजाय गुलाम बनता जा रहा है। तन ही नहीं, मन से भी। मालिक की स्वतन्त्रता के बजाय गुलामी की सोने की जंजीरें हीं अब ज्यादा पसंद आ रही हैं। उसे जंजीर नहीं  सोना ही दिख रहा है। यह बात समझाने की कोई विगत भी नजर नहीं आती।

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जापान – श्री माँ की दृष्टि में(🔉०६.२८-१५.५०)

(जापान में दिया गया श्री माँ का भाषण, माँ की गहरी दृष्टि और भाषा का प्रवाह, देखने और समझने योग्य है।)

आपने जापान के बारे में मेरे विचार माँगे हैं। जापान के बारे में लिखना एक कठिन काम है। वहाँ के बारे में इतनी सारी चीजें लिखी जा चुकी हैं, बहुत सी उट-पटांग चीजें भी...... लेकिन ये ज्यादातर देश नहीं, देशवासियों के बारे में हैं। वह देश एक अद्भुत, सुरम्य, बहुमुखी, मनोहर, अप्रत्याशित, जंगली या मधुर है। वह देखने में - उत्तरध्रुवीय ठंडे प्रदेशों से लेकर उष्ण कटि-प्रदेशीय तक – दुनिया भर के सभी देशों का समन्वय लगता है। किसी कलाकार की आँख उसकी ओर से उदासीन नहीं रह सकती। मेरा खयाल है कि जापान के बहुत से सुन्दर वर्णन किये जा चुके हैं। मैं उनमें से एक और नहीं बढ़ा रही, मेरा वर्णन निश्चित रूप से उनकी अपेक्षा बहुत कम रोचक होगा। लेकिन आमतौर पर जापानियों को गलत समझा गया है और गलत रूप से पेश किया गया है और इस विषय पर कहने लायक कुछ कहा जा सकता है।

श्री माँ

 
अधिकतर विदेशी लोग जापानियों के उस भाग के सम्पर्क में आते हैं जो विदेशियों के संसर्ग से बिगड़ चुका है – ये पैसा कमाने वाले, पश्चिम की नकल करने वाले जापानी हैं। वे नकल करने में बहुत चतुर हैं और उनमें ऐसी काफी सारी चीजें हैं जिनसे पश्चिम के लोग घृणा करते हैं। अगर हम केवल राजनेताओं, राजनीतिज्ञों और व्यापारियों के जापान को देखें तो यही लगेगा कि यह यूरोप के शक्तिशाली देशों से बहुत ज्यादा मिलता जुलता देश है, लेकिन उसमें ऐसे देश की जीवनी शक्ति और घनीभूत ऊर्जा भरी है जो अभी तक अपनी पराकाष्ठा पर नहीं पहुंचा है। 

 

यह ऊर्जा जापान की एक बहुत मजेदार विशेषता है। वह हर जगह, हर एक बूढ़े, बच्चे, मर्द, औरत, विद्यार्थी, मजदूर सभी के अन्दर दिखाई देती है। शायद “नये अमीरों” को छोड़ कर सभी के जीवन में अद्भुत घनीभूत ऊर्जा का भंडार दिखाई देता है। प्रकृति और सौंदर्य के आदर्श प्रेम के साथ साथ यह संचित शक्ति भी जापानियों की विशिष्ट और सबसे अधिक व्यापक विशेषता है। उदयाचल के उस प्रदेश में पाँव रखते ही आप इस चीज को देख सकते हैं, जहाँ इतने सारे लोग और इतनी निधियाँ एक छोटे से टापू में जमा हैं।

 

यदि आपको उन जापानियों से मिलने का सुअवसर मिले, जैसा कि हमें मिला था, जिनमें अभी तक प्राचीन सामुराई का शौर्य और अभिजात्य अछूता है तो आप समझ सकते हैं कि सच्चा जापान क्या है, आप उनकी शक्ति और रहस्य को पा सकते हैं। वे चुप रहना जानते हैं और यद्यपि उनमें बहुत अधिक तीव्र संवेदनशीलता होती है, लेकिन मैं जिन लोगों से मिली हूँ उनमें ये सबसे कम इसका प्रदर्शन करने वाले लोग हैं। यहाँ एक मित्र तुम्हारे प्राण बचाने के लिए बड़ी ही सरलता से अपनी जान दे सकता है; लेकिन वह कभी तुम्हारे सामने यह न कहेगा कि उसे तुम्हारे लिए इतना गहरा और नि:स्वार्थ प्रेम है। वह इतना तक भी नहीं कहेगा कि वह तुमसे प्रेम करता है। और अगर तुम बाहरी आभासों के पीछे छिपे हुए हृदय को न पढ़ सको तो तुम्हें बहुत अच्छे बाह्य शिष्टाचार के सिवाय कुछ न दिखाई देगा जिसमें सहज भावों के लिए कोई स्थान नहीं होता। फिर भी भाव होते हैं और बाहर अभिव्यक्त न होने के कारण और भी ज्यादा प्रबल होते हैं और कभी मौका आ जाए तो उनके किसी काम द्वारा अचानक प्रेम की गहराई का पता चलता है, वह भी विनयशील और कई बार छिपा हुआ। यह जापानी विशेषता है। संसार के जातियों में सच्चे जापानी, जो पश्चिम के प्रभाव में नहीं आए है, शायद सबसे कम स्वार्थी होते हैं। और यह नि:स्वार्थता पढ़े-लिखे, विद्वान या धार्मिक लोगों की ही विशेषता नहीं है। यह समाज के सभी स्तरों में पायी जाती है। यहाँ कुछ लोकप्रिय और अत्यन्त मनोहर उत्सवों को छोड़ कर धर्म रूढ़ि या सम्प्रदाय नाम की चीज नहीं है। यह उनके दैनिक जीवन में आत्म-त्याग, आज्ञा-पालन और आत्म-समर्पण के रूप में दिखाई देता है।  

 

जापानियों को बचपन से ही सिखाया जाता है कि जीवन कर्त्तव्य है, सुख नहीं है। वे उस कर्त्तव्य को  स्वीकार करते हैं। प्राय: कठोर और कष्टकर कर्त्तव्य को सहनशील आत्म-समर्पण के साथ स्वीकार करते हैं। वे अपने आप को सुखी बनाने के विचार से परेशान नहीं करते। यह सारे देश के जीवन को आनन्द और मुक्त अभिव्यक्ति नहीं, एक असाधारण आत्म-नियंत्रण प्रदान करता है। यह तनाव, प्रयास और मानसिक तथा स्नायविक दबाव का वातावरण पैदा करता है, उस तरह की आत्मिक शांति नहीं देता जैसी, उदाहरण के लिए, भारत में अनुभव की जा सकती है। वास्तव में, जापान में ऐसी कोई चीज नहीं है जिसकी तुलना भारत में व्याप्त शुद्ध भागवत वातावरण से की जा सके। यह वातावरण ही भारत देश को ऐसा अनोखा और बहुमूल्य बनाता है। जापान के मंदिरों में, वहाँ के पवित्र दुर्गम मठों में जो कभी कभी ऊंचे पर्वत की चोटी पर बने होते हैं, बड़े बड़े देवदार के पेड़ों से ढके होते हैं, जो नीचे की दुनिया से बहुत दूर हैं, उनमें भी यह वातावरण नहीं है। वहाँ बाहरी नीरवता है, विश्राम और निश्चलता है, लेकिन शाश्वत का वह आनंदमय संवेदन नहीं है जो एकमेव की जीवन सन्निधि से आता है। यह सच है कि यहाँ सब कुछ एकता के मन और आँखों को सम्बोधित करता है – मनुष्य की भगवान से एकता, प्रकृति की मनुष्य से एकता और मनुष्य मनुष्य की एकता से। लेकिन यह एकता कम ही अनुभव की जाती है या जीवन में उतारी जाती है। निश्चय ही जापानियों में उदार आतिथ्य, पारस्परिक सहायता, पारस्परिक अवलम्ब की भावना बहुत विकसित है। लेकिन अपने संवेदनों, विचारों और सामान्य क्रियाओं में यह सबसे अधिक व्यक्तिवादी और पृथकतावादी जाति है। इन लोगों के लिए रूप प्रधान है, रूप आकर्षक है। वह अभिव्यंजक भी होता है। वह किसी अधिक गहरे सामंजस्य या सत्य, प्रकृति या जीवन के किसी विधान की कहानी कहता है।  प्रत्येक रूप, प्रत्येक क्रिया, बगीचे की व्यवस्था से लेकर प्रसिद्ध चाय समारोह तक, प्रतिकात्मक है, और कभी-कभी एक बहुत ही सादी और सामान्य चीज में गहरा, अलंकृत, इच्छित प्रतीक मिल जाता है जिसे अधिकतर लोग जानते और समझते हैं। लेकिन यह जानना और समझना केवल बाहरी और परम्परागत होता है। वह आध्यात्मिक अनुभवों से आने वाला जीवंत सत्य नहीं होता जो दिल और दिमाग को प्रबुद्ध करे। जापान मौलिक रूप में संवेदनों का देश है। वह अपनी आँखों के द्वारा जीता है। उस पर सौंदर्य का एकछत्र राज्य है और उसका वातावरण मानसिक और प्राणिक क्रिया-कलाप, अध्ययन, निरीक्षण, प्रगति और प्रयास को उत्तेजित करता है, लेकिन शांत, आनंदमय चिंतन मनन को नहीं। लेकिन इस सारे क्रिया कलाप के पीछे एक उच्च अभीप्सा उपस्थित है जिसे उस जाति का भविष्य ही व्यक्त करेगा। 

(श्री अरविंद सोसाइटी की अग्निशिखा में प्रकाशित)

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छेद(🔉१५.५०-१७.३६)

एक लड़के को बहुत गुस्सा आता था। एक दिन उसके पिता ने उसे एक कीलों से भरा बैग दिया और कहा कि जब भी उसे गुस्सा आये, वह चारदीवारी में पीछे की तरफ एक कील जरूर ठोंक दे। पहले दिन उस लड़के ने 37 कीलें दीवार में गाड़ दीं। अगले हफ्ते तक वह अपने गुस्से पर काबू करना सीख चुका था। गाड़ने वाली कीलों का क्रम कम हो गया। उसने दीवार में गड़ी कीलों को देखकर सोचा, अपने गुस्से को रोकने का यह सबसे आसान तरीका है। धीरे-धीरे उस लड़के ने अपने गुस्से पर पूरी तरह से काबू पा लिया। जब उसने अपने पिता को यह बताया तो उन्होने यह सलाह दी कि अब वह जिस दिन उसे एक बार भी गुस्सा नहीं आये, दीवार से एक कील बाहर निकाले। जब उसने सारी कीलें निकाल लीं तो वह अपने पिता के पास पहुंचा। उन्होंने लड़के का हाथ पकड़ा और उसे उस दीवार के पास ले गए और बोले, तुमने बहुत अच्छा काम किया है बेटे, लेकिन उस दीवार के छेदों  की तरफ देखो। अब यह दीवार पहले जैसी कभी नहीं हो सकती। इसी तरह से जब तुम गुस्से में कुछ कहते हो तो घाव भी किसी के हृदय में इसी तरह लगता है। तुम कितनी बार भी माफी मांग लो, निशान हमेशा रहता है।

गुस्से में कही बात का कोई हर्जाना नहीं होता, इसलिए गुस्से पर काबू रखिये।

(उजाले के गाँव में से)

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कारावास की कहानी – श्री अरविंद की जुबानी(🔉१७.३६-२२.४५)

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। अग्निशिखा में इसके रोचक अंश प्रकाशित हुए थे। इसे हम जनवरी माह से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसका पाँचवा अंश है।)

(५)

लपसी – महात्म्य 

अगले दिन सवेरे सवा चार बजे जेल की घंटी बजी। कैदियों को जगाने के लिए यह पहली घंटी थी। कुछ मिनट बाद दूसरी बजती, इसके बाद कैदी पंक्तिबद्ध हो बाहर आ हाथ-मुंह धो, लपसी खा दिन-भर की मशक्कत में लग जाते। इतनी घण्टियों के बजते सोना असंभव जान मैं भी उठ जाता। कुछ देर बाद मेरे दरवाजे पर लपसी हाजिर हुई किन्तु उस दिन उसे खाया नहीं, केवल चाक्षुष परिचय हुआ। इसके कुछ दिन बाद पहली बार इस परमान्न का भोग लगाया। लपसी, अर्थात मांड-सहित उबला भात, यही थी कैदियों की छोटी हाजरी। लपसी की त्रिमूर्ति या तीन अवस्थाएँ हैं। पहले दिन लपसी का प्रज्ञा भाव, अमिश्रित मूल पदार्थ, शुद्ध शिव शुभ्र-मूर्ति। दूसरे दिन लपसी का हरिण्यगर्भ रूप, दाल के साथ सीजा हुआ खिचड़ी के नाम से अभिहित, पीतवर्ण, नाना धर्मसंकुल। तीसरे दिन थोड़े से गुड़ में मिश्रित लपसी की विराट मूर्ति, धूसर वर्ण, कुछ परिणाम में मनुष्य के व्यवहार योग्य। प्राज्ञ और हरिण्यगर्भ का सेवन साधारण मर्त्य मनुष्य के बूते से बाहर मान मैंने उसे त्याग दिया था। कभी कभार विराट के दो ग्रास उदरस्थ कर ब्रिटिश राज्य के नाना सद्गुण और पाश्चात्य सभ्यता के उच्च दर्जे के लोकहितवाद (humanitarianism) के बारे में सोच-सोच कर आनंदमग्न होता रहता था। कहना  चाहिए कि लपसी ही था बंगाली कैदियों का एकमात्र पुष्टिकर आहार, बाकी सब था सारशून्य। वह होने से भी क्या होगा? उसका जैसा स्वाद था, वह केवल भूख से सताये जाने पर ही खाया जा सकता है, वह भी ज़ोर-जबर्दस्ती, मन को बहुत समझा-बुझाकर।

 

उस दिन साढ़े ग्यारह बजे स्नान किया। घर से जो पहन कर आया था, पहले चार-पाँच दिन वही पहने रहना पड़ा। नहाते समय गोहालघर के जो वृद्ध कैदी वौर्डर मेरी देखरेख के लिए नियुक्त हुए थे उन्होंने कहीं से डेढ़ हाथ चौड़ा एंडी का कपड़ा जुटा दिया था, अपने एकमात्र कपड़े सूखने तक वही पहने बैठा रहता। मुझे कपड़े धोने और बर्तन माँजने नहीं पड़ते थे, गोहालघर का एक कैदी यह कर देता था। ग्यारह बजे खाना। कमरे की छितनी के सान्निध्य से बचने के लिए ग्रीष्म की धूप सहते हुए प्राय: ही आँगन में खाया करता। संतरी भी इसमें बाधा नहीं देते। शाम का खाना होता पाँच-साढ़े पाँच बजे। उसके बाद लौह-द्वार का खुलना निषिद्ध था। सात बजे शाम का घंटा बजता। मुख्य जमादार वौर्डरों को इकट्ठा कर उच्च स्वर में नाम पढ़ते जाते थे, उसके बाद सब अपनी अपनी जगह चले जाते। श्रांत निद्रा की शरण ले जेल के इस एकमात्र सुख का अनुभव करते। इस समय दुर्बलचेता अपने दुर्भाग्य  या भावी जेल-सुख की चिंता कर रोया करते। भगवद-भक्त नीरव रात्री में ईश्वर का सान्निध्य अनुभव कर प्रार्थना या ध्यान में आनंद लूटते। रात को इन अभागे, पतित, समाज-पीड़ित तीन सहस्त्र ईश्वरसृष्ट प्राणियों का यह अलीपुर जेल, प्रकांड यंत्रणा-गृह विशाल नीरवता में डूब जाता। ...                                                                                                (क्रमश:, आगे अगले अंक में)

यू ट्यूब लिंक : https://youtu.be/KvbryTiWlvg

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गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

सूतांजली अप्रैल २०२१

 सूतांजली

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वर्ष : ०४ * अंक : ०९                 🔊(२२.३५)                                              अप्रैल  * २०२१

नव संवत्सर २०७८ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा

तदनुसार मंगलवार १३ अप्रैल २०२१

पर हार्दिक शुभकामनाएँ

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नववर्ष का चमत्कार (🔉००.००-६.०३)

आज ऑफिस का रूप-रंग देखने लायक है। ऑफिस का हर कर्मचारी उत्साहित और प्रफुल्लित है। सबों में अतिरिक्त जोश और उमंग है। आज ऑफिस में नव-वर्ष का समारोह है जिसे एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। आज के दिन ऑफिस बंद नहीं रहती लेकिन कोई काम भी नहीं होता। होता है, केवल खाना-पीना (दारू नहीं), नाचना-गाना, हंसी-मजाक। सारे दिन यही चलता है और ऑफिस का हर कर्मचारी – चपरासी से लेकर मालिक तक – सब एक साथ कंधे से कंधा मिला कर साथ-साथ इसमें भाग लेते हैं।

लेकिन इस  पूरे कार्यक्रम में सबसे ज्यादा आकर्षण रहता है नव-वर्ष के चमत्कार का। कार्यक्रम का पटाक्षेप इसी चमत्कार से होता है। दरअसल यह, नव-वर्ष का उत्सव, पिछले कुछ वर्षों से मनाया जाता है। नहीं, आप गलत समझ रहे हैं। आज पहली जनवरी नहीं है। आज है चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, जिसे नवसंवत्सर भी कहते हैं। दर असल मेरी ऑफिस के मालिक नव-वर्ष चैत्र की शुक्ल प्रतिपदा को मनाने के पक्ष में थे। लेकिन यह किसी भी प्रकार नहीं हो रहा था। अत: उन्होंने यह नायाब तरीका ढूंढ निकाला और तब से ऑफिस के लिए यही नूतन वर्ष बन गया। हाँ, तो मैं बात कर रहा था चमत्कार की। दरअसल यह एक ऑफिस लॉंटरी है। ऑफिस का हर कर्मचारी एक सौ रुपये देता है। लगभग तीन सौ कर्मचारी हैं; तीस हजार रुपए जमा हो जाते हैं। एक बड़ी मेज  पर दो बक्से रखे जाते हैं। एक बक्से में हर कर्मचारी रुपए डालता है और दूसरे में वहीं पड़े कागज के चिट में अपना नाम लिख कर डालता है। कार्यक्रम के अंत में मालिक सब के सामने बक्से में से एक चिट निकालते हैं और जिसका भी नाम आता है पूरे रुपए उसे एक मुश्त दे दिये जाते हैं। जिसे मिलता है उसके लिए चमत्कार होने के कारण ही इसे लॉंटरी न कह कर चमत्कार कहते हैं। इस प्रकार इस का नामकरण हुआ नव-वर्ष का चमत्कार


पूरी ऑफिस उमंग में है, लेकिन मैं तनाव में हूँ। समझ नहीं आ रहा है कि क्या करूँ? ऑफिस की  सफाई करने वाली का बेटा बेहद बीमार है। उसे रुपयों की सख्त जरूरत है। आज का चमत्कार कैसे उसके नाम से निकले, समझ नहीं पा रहा हूँ। लड़खड़ाते कदमों से चलता हुआ बक्से के पास पहुंचता हूँ। पॉकेट से सौ का एक नोट निकाल कर डालता हूँ। एक चिट उठाता हूँ और दूसरों की  नजर बचाकर उस पर अपना नाम न लिखकर उस सफाई करने वाली का नाम लिख कर डाल देता हूँ। धीरे-धीरे घड़ी की सूई टिक-टिक कर आगे बढ़ रही है। मुझे लगता है यह टिक-टिक नहीं धक-धक कर रही है। और आखिर, वह क्षण भी आ पहुंचा। मालिक आ गए हैं। वे कुछ कह रहे हैं, लेकिन मुझे कुछ भी नहीं सुन रहा। मैं हाथ जोड़ प्रार्थना कर रहा हूँ हे ईश्वर! आज सचमुच कोई चमत्कार कर दे। मुझे मालूम है कि मैं नाउम्मीद की उम्मीद लगाए बैठा हूँ। तनाव अपनी चरम पर है, लग रहा है कि मेरा सर फट जाएगा, धड़कन बंद हो जाएगी। तभी नाम की घोषणा होती है। अरे यह क्या? मुझे विश्वास नहीं हुआ। वाकई चमत्कार हो गया। उसी के नाम की घोषणा हुई। कुछ क्षणों के लिए स्तबद्धता छा गई और फिर गगनभेदी शोर। हर कोई ऐसे नाच रहा था, जैसे उसी का नाम पढ़ा गया हो।  मैं उठा, धीरे-धीरे चलता हुआ बक्से के पास पहुंचा। उसमें डाले गए चिट देखने लगा। एक-दो, दस-बीस, मैं पागल हो गया। सब पर उसी का नाम लिखा था। यानि केवल मैंने ही नहीं,  हर किसी ने उसी का नाम लिखा था।

हाँ, ऐसा चमत्कार ईश्वर ही करते हैं। लेकिन उनके चमत्कार को धरती पर उतारने के लिए चमत्कारी व्यक्तियों की अवश्यकता होती है। बिना किसी और का इंतजार किए, बिना किसी और का मुंह जोहे, चमत्कारी व्यक्ति बनिए। देखिये आपको भी जीवन में चमत्कार दिखने लगेंगे।

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अपने अंदर एंटिवाइरस हमें लगाना है  (🔉०६.०३-१३.४४)

एक बार हम, जो हमारे अंदर घटित होता है उन पर विचार करें। जब भी हमारे दिमाग में कोई विचार प्रवेश करता है तब वह विचार हमारे अंदर एक अनुभूति उत्पन्न करता है। यह अनुभूति पैदा करती है हमारी मनोवृत्ति को। और फिर हमारा कार्य हमारी इस मनोवृत्ति पर निर्भर करता है। और जो कार्य हम बार बार करते हैं हमें उसकी आदत पड़ जाती है। यही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करती है। और हमारा यह व्यक्तित्व ही हमारा भाग्य बन जाता है। यह है हमारे मन में आये विचार से लेकर हमारे भाग्य तक का सफर। हम यह साफ महसूस कर सकते हैं कि हमारा भाग्य कोई और नहीं लिखता बल्कि हम खुद अपने भाग्य के निर्माता हैं। यह साफ जाहिर है, हमारा हर विचार बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन वह क्या है जो हमारे विचारों का निर्माण करता है? हम सब सकारात्मक सोच की, निर्माण की बात करते हैं लेकिन तब नकारात्मकता,विध्वंस क्यों हमारे अंदर अनजाने स्वाभाविक रूप में प्रवेश कर जाती है?

हमारे अपने अनुभवों  से हमारे विचार प्रभावित होते हैं। विशेष कर सुबह उठते ही और रात को ठीक सोने के पहले हमने जो पढ़ा-सुना उसका सबसे ज्यादा असर होता है। किसी समय सुबह उठ कर अखबार पढ़ना और सोने के पहले समाचार देखना सही होता रहा होगा। अब नहीं। इससे बचें।

इन दो के अलावा वह तीसरी बात जिसका सबसे ज्यादा महत्व है वह है हमारी अपनी मान्यता, हमारा अपना विश्वास और जीवन शैली। हमारा शरीर एक कम्प्युटर है जिसमें हमारी आत्मा इस कम्प्युटर पर कार्य करने वाला ऑपरेटर है और विश्वास इसका ऑपरेटिंग सिस्टम। कौनसा सॉफ्टवेर इस पर काम करेगा और कैसे करेगा यह पूरी तरह इस ऑपरेटिंग सिस्टम पर ही निर्भर करता है। हम यह जानते हैं और बताते रहते हैं कि कौनसा सॉफ्टवेर किस ऑपरेटिंग सिस्टम पर काम करेगा और कौनसा नहीं। यह मशीन महत्वपूर्ण है और उसे चलाने वाला भी लेकिन ऑपरेटिंग सिस्टम उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है; कम्प्युटर से उत्पादन उसी के अनुसार होता है। यह शरीर और हमारी आत्मा प्रमुख है लेकिन हमारी अपनी मान्यताएँ हमारा विश्वास उससे भी ज्यादा प्रमुख है और वही हमारे भाग्य का निर्माण करता है। लेकिन इसमें एक और सॉफ्टवेयर अपना कार्य करता है और वह है वाइरस। जैसे  ऑपरेटिंग सिस्टम में एक छोटा सा वाइरस कम्प्युटर की पूरी कार्यप्रणाली को बदल देता है उसी प्रकार एक छोटा सा दूषित विचार हमारी कार्यप्रणाली और हमारे भाग्य को बदल देता  है। कम्प्युटर में जिस प्रकार वाइरस से बचने के लिए एंटिवाइरस लगाते हैं वैसे ही आध्यात्म मानव के लिए एंटिवाइरस है जो हमें दुश्विचारों के प्रदूषण से बचाता है। जिस प्रकार कम्प्युटर में अगर एंटिवाइरस न लगाया जाय तो कम्प्युटर बार बार बंद हो जाता है, सॉफ्टवेर ठीक से काम नहीं करते, डाटा खराब हो जाते हैं ठीक उसी प्रकार मानव में आध्यात्म की कमी  उसे अपने मार्ग से भटका देती है।

शिबानी बेन 
लेकिन इतना कुछ कर के हम शांति से नहीं बैठ सकते। हमें सतत सजग रहना पड़ता है। कम्प्युटर पर काम करते करते हमें ऐसे संकेत मिलते रहते हैं कि अब ऑपरेटिंग सिस्टम को अपडेट करना है, एंटिवाइरस का नवीनीकरण (renewal) करना है, हार्ड डिस्क की सफाई करनी है। वैसे ही हमें जीवन में भी यह संकेत मिलते रहते हैं, जब क्रोध ज्यादा आने लगता है, कष्ट-दु:ख-दर्द के आक्रमण बढ़ने लगते हैं तो हमें समझ लेना चाहिए कि विचारों में कहीं न कहीं विकृति आ रही है। हमें तुरंत सजग होना पड़ता है। हो सकता है कि ये वाइरस कोई व्यक्ति विशेष से आ रहा हो, लेकिन एंटीवाइरस लगाना तो हमारा ही उत्तरदायित्व है, हमारे लिए कोई दूसरा तो नहीं लगाएगा! समय बहुत बदल गया है, हमारे सामने अनेक चुनौतियाँ हैं। यही नहीं लोगों का व्यवहार भी अप्रत्याशित रूप से बदल जाता है। उसका व्यवहार वैसा नहीं होता जैसा हर समय था। एक खुशमिज़ाज़ व्यक्ति, संकट के दौर में, अचानक ही बदल जाता है। वह जहां पहले दिल खोल कर बातें करता था, मिलनसार था लेकिन अब कटा कटा रहने लगा, उसके दिल के दरवाजे बंद रहने लगे। यह हमें समझना चाहिए। सतत सजग रहते हुए समय से कार्यवाही करनी आवश्यक है।

ऐसी अवस्था में हमारा सबसे पहला कर्तव्य है अपने आप को बचाना। एक स्वस्थ्य व्यक्ति ही दूसरे की सहायता कर सकता है। हवाई जहाज के उड़ान भरने के पहले बताया जाता है कि आपद अवस्था में ऑक्सीज़न का मास्क पहले अपने नाक-मुंह पर लगाएँ, फिर अपने बच्चे की सहायता करें। अपने आप को स्वस्थ्य रखना पहली आवश्यकता है। हम तभी दूसरों की सहायता कर सकते हैं। अगर किसी के व्यवहार से हमें कष्ट हुआ, उसने हमारे पास वाइरस भेजा तो पहले हमें अपने एंटिवाइरस से उसे निरस्त करना है। इसके बाद ही उसकी जांच पड़ताल करनी है। हो सकता है कि उसके इस  व्यवहार का कारण उस पर हुए किसी अन्य व्यक्ति के वाइरस के कारण हुआ हो। अगर हम खुद स्वस्थ्य नहीं हों, तो हो सकता है उसका दर्द दूर न कर हम अपनी तरफ से एक वाइरस उसकी तरफ भेज दें। हमारे चारों तरफ रहने वालों का व्यवहार, उनकी स्वीकृति और रजामंदी हमारे लिए महत्वपूर्ण है। हम पर उनका प्रभाव पड़ता है; हाँ इस प्रभाव की तीव्रता कम-ज्यादा हो सकती है लेकिन हमें इसका ध्यान रखना ही पड़ता है। इसलिए हम किन और कैसे लोगों के बीच रहते हैं यह बहुत महत्वपूर्ण है।

(टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित, शिवानी बेन एवं सुरेश ओबेरॉय के मध्य हुई बात के आधार पर)

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पहचान (🔉१३.४४-१५.०६)

एक युवक ईश्वर से मिलना चाहता था। उसने प्रार्थना की, ईश्वर मुझसे बात करो। तभी एक चिड़िया चहचहाई, लेकिन युवक ने नहीं सुना। उसने फिर ईश्वर से कहा, मुझसे बात करो। तब आकाश में तूफानी गर्जन हुई। युवक ने फिर ध्यान नहीं दिया। उसने फिर कहा, ईश्वर मैं आपको देखना चाहता हूँ। तभी आकाश में एक सितारा चमका, लेकिन युवक का ध्यान दूसरी ओर था। अब युवक  चिल्लाया, ईश्वर मुझे कोई चमत्कार दिखाइये। तभी अचानक उसके सामने एक गिलहरी आई, लेकिन  वह इस बात को नहीं जान पाया। अब वह रोते रोते कहने लगा, भगवान मुझे छूएँ ताकि मुझे पता लगे कि आप यहाँ हैं। तब ईश्वर नीचे पहुंचे और उन्होंने  युवक को छुआ, लेकिन युवक ने हाथ पर बैठी तितली को हटाया और अपने रास्त चल दिया।

ईश्वर अलग-अलग रूप में सामने आते हैं, हम ही उन्हें पहचान नहीं पाते। 

(उजाले के गाँव में से)

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कारावास की कहानी – श्री अरविंद की जुबानी (🔉१५.०६-२२.३४)

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। अग्निशिखा में इसके रोचक अंश प्रकाशित हुए थे। इसे हम जनवरी माह से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसका चौथा अंश है।)

(४)

निर्जन कारावास का सुख

कंबल, थाली-कटोरी का प्रबंध कर जेलर के चले जाने पर कंबल पर बैठ मैं जेल का दृश्य देखने लगा। लालबजार की हवालात की अपेक्षा यह निर्जन कारावास अधिक अच्छा लगा। वहाँ उस विशाल कमरे की निर्जनता मानों अपनी विशाल काया को विस्तारित करने का अवकाश पा निर्जनता को और भी गहन कर दे रही थी। यहाँ छोटे से कमरे की दीवारें मानों बंधु-रूप में पास आ, ब्रह्ममय हो, आलिंगन में भर लेने को तैयार थीं। वहाँ दो तल्ले के कमरे की ऊँची-ऊँची खिड़कियों से बाहर का आकाश भी नहीं दिखता था, इस संसार में पेड़-पत्ते, मनुष्य, पशु-पक्षी, घर-द्वार भी कुछ हैं, बहुत बार उसकी कल्पना करना भी कठिन हो जाता था। यहाँ आँगन का दरवाजा खुला होने पर, सरियों के पास बैठने से बाहर जेल की खुली जगह और कैदियों का आना-जाना देखा जा सकता है। आँगन की दीवार से सटा वृक्ष था, उसकी नयनरंजन निलिमा से प्राण जुड़ जाते। छह डिक्री के छह कमरों के सामने जो संतरी घूमता रहता उसका चेहरा और पदचाप बहुत बार परिचित बंधु के चलने-फिरने की तरह प्रिय लगती। कोठरी के पार्श्ववर्ती गोहालघर के कैदी कोठरी के सामने से गौएँ चरने ले जाया करते। गौ और गोपाल थे प्रतिदिन के प्रिय दृश्य। अलीपुर के निर्जन कारावास में अपूर्व प्रेम की शिक्षा पायी। यहाँ आने से पहले मनुष्यों के साथ मेरा व्यक्तिगत प्रेम अतिशय छोटे घेरे में घिरा था और पशु-पक्षियों पर रुद्ध प्रेम-स्त्रोत तो बहता ही नहीं था। याद आता है, रवि बाबू की एक कविता में भैंसे के प्रति एक ग्राम्य बालक का गंभीर प्रेम बहुत सुंदर ढंग से वर्णित हुआ है। पहली बार पढ़ने पर वह जरा भी हृदयंगम नहीं हुई थी, भाव-वर्णन में अतिशयोक्ति और अस्वाभाविकता का दोष देखा था। अब पढ़ने पर उसे दूसरी दृष्टि से देखता। अलीपुर में रहकर समझ सका कि सब तरह के जीव, मनुष्य के प्राणों में कितना गंभीर स्नेह स्थान पा सकते हैं। गौ, पक्षी, चींटी तक को देख कितने तीव्र आनंद के स्फुरण में  मनुष्य का प्राण अस्थिर हो सकता है।

अद्भुत भोजन और कुशल-क्षेम

कारावास का पहला दिन शांति से कट गया। सभी कुछ नया था, इससे मन में स्फूर्ति जगी। लालबजार की हवालात से तुलना करने पर इस अवस्था में भी प्रसन्नता हुई और भगवान पर निर्भर था इसलिए यहाँ की निर्जनता भी भारी नहीं पड़ी। जेल के खाने की अद्भुत सूरत देख कर भी इस भाव में कोई आघात नहीं पड़ा। मोटा भात, उसमें भूसी, कंकड़, कीड़ा, बाल आदि कितने तरह के मसालों से पूर्ण – स्वादहीन दाल में जल का अंश ही अधिक, तरकारी में निरा घास-पात का साग। मनुष्य का खाना इतना स्वादहीन और निस्सार हो सकता है यह पहले नहीं जानता था। साग की यह विषण्ण गाढ़ी कृष्ण मूर्ति देख कर ही डर गया, दो ग्राम खा उसे भक्तिपूर्ण नमस्कार कर, एक ओर सरका दिया। सब कैदियों के भाग्य में  एक ही तरकारी बदी थी, और एक बार कोई  तरकारी शुरू हो जाए तो अनंत काल तक वही चलती थी। उस समय साग का राज्य था। दिन बीते, पखवारे बीते, माह बीते किन्तु दोनों समय वही साग, वही दाल, वही भात। चीज़ें तो क्या बदलनी थीं, रूप में भी कतई परिवर्तन नहीं होता था। उसका वही नित्य, सनातन, अनाद्यनन्त, अपरिणामातीत अद्वितीय रूप। दो दिन में ही कैदियों में इस नश्वर माया-जगत के स्थायित्व पर विश्वास जनमने लगेगा। इसमें भी अन्य कैदियों की अपेक्षा मैं भाग्यशाली रहा, यह भी डाक्टर बाबू की दया से। उन्होंने अस्पताल से मेरे लिए दूध की व्यवस्था की थी, इससे कुछ दिन के लिए साग-दर्शन से मुक्ति मिली।

उस रात जल्दी सो गया। किन्तु निश्चिंत निद्रा निर्जन कारावास का नियम नहीं है, उससे कैदियों की सुखप्रियता जग सकती है। इसीलिए नियम है कि जितनी बार पहरा बदले उतनी बार कैदी को हाँक मार कर उठाया जाता है और हुंकारा न भरने तक छोड़ते नहीं। जो-जो छ्ह डिक्री का पहरा देते थे उनमें से बहुत-से इस कर्तव्य-पालन से विमुख थे। सिपाहियों में प्राय: ही कठोर कर्तव्य-ज्ञान की अपेक्षा दया और सहानुभूति अधिक थी, विशेषत: हिंदुस्तानियों के स्वभाव में। किन्तु कुछ लोगों ने नहीं बख्शा।  वे हमें इस तरह जगा यह कुशल संवाद पूछते : “बाबू, ठीक हैं तो?” यह असमय का हँसी-मज़ाक सदा नहीं सुहाता पर समझ गया कि जो ऐसा करते हैं वे सरल भाव से नियम वश ही हमें उठाते हैं। कई दिन, विरक्त होते हुए भी, इसे सह गया। अन्तत:, निद्रा की रक्षा के लिए धमकी देनी पड़ी। दो-चार बार धमकाने के बाद देखा कि रात को कुशल-क्षेम पूछने की प्रथा अपने-आप ही उठ गयी।                                           (क्रमश:, आगे अगले अंक में)

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सोमवार, 1 मार्च 2021

सूतांजली मार्च 2021

सूतांजली

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वर्ष : ०४ * अंक : ०८                   🔊(00.00-19.35)                        मार्च  * २०२१

क्या आप ईश्वर में विश्वास करते हैं?”

“नहीं, मैं ईश्वर में विश्वास नहीं करता।

मैं जानता हूँ  कि ईश्वर है.”

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कैसा जीवन चाहिये? गुलाम का या मालिक का? (🔉00.00-04.37)

कैसा जीवन खोजते हैं आप? – एक गुलाम जैसा या एक मालिक जैसा! बड़ा बेहूदा सा प्रश्न प्रतीत होता है। यह भी कोई पूछने वाली बात है! गुलामी का जीवन भी कोई जीवन है? गुलामी में तो जीवन केवल जाता है, आता नहीं। गुलामी का जीवन बस एक आभास होता है, सपना होता है, आशा रहती है, मिलेगा लेकिन मिलता कुछ नहीं। तब फिर इस प्रश्न का क्या औचित्य है? आप का जीवन मालिक का है या गुलाम का? कैसा भी हो,  आप मालिक हैं–किसके, गुलाम हैं-किसके? यह आपको ही समझना है, आपको ही निर्णय लेना है।

मालिक से अर्थ है, ऐसे जीना जैसे जीवन अभी और यहीं है। कल पर छोड़कर नहीं, आशा में नहीं। मालिक के जीवन का अर्थ है, मन गुलाम हो, चेतना मालिक हो। होश मालिक हो, वृत्तियाँ मालिक न हो। विचारों का उपयोग किया जाये, विचार हमारा उपयोग न करें। विचारों को हम काम में लगा सकें, विचार हमें काम में न लगा दे। जीवन की लगाम हमारे हाथ में हो। जीवन वहीं जाये जहां हम उसे ले जाना चाहें। हमें अपने मन के पीछे घसीटना न पड़े।

गुलाम का जीवन बेहोशी का जीवन है। जैसे सारथी नशे में हो, लगाम ढीली पड़ी हो, घोड़ों की जहां मर्जी हो ले जायें। खड्डे में डालें, दु:ख-दर्द में डालें, रास्ते से भटक जायें और सारथी बेहोश पड़ा हो।

महाभारत में बड़ा अच्छा उदाहरण है। कुरुक्षेत्र के मैदान में कृष्ण सारथी हैं। कृष्ण को  सारथी देखकर बड़ा अजीब सा लगता है। जब चैतन्य सारथी हो, जब हमारा जो श्रेष्ठतम है उसके हाथ में लगाम हो तब रथ सही दिशा में, सही रास्ते पर है। अर्जुन रथ पर बैठा है और कृष्ण सारथी हैं। अर्जुन कुछ नहीं है, कृष्ण सब कुछ हैं। उदाहरण सरल और समझने योग्य है। कौन है मालिक कौन है गुलाम? यही समझना है। हमारे अंदर जो कुछ नहीं है, कहीं वो सारथी नहीं बन जाये। हमारे अंदर जो सब कुछ है, वही सारथी बने।

ऊपरी तौर पर लगता है कि अर्जुन मालिक है और कृष्ण गुलाम। हमारी हालत उल्टी है, या गीता उल्टी है? हमें लगता है हम मालिक हैं, हमारी गीता सही है। लेकिन विचार करो। व्यास की गीता ही सही है। मन रथ में बैठा हो तो कोई हर्ज़ नहीं, अगर, ध्यान सारथी हो। तब मालिकपना आता है, तब हम मालिक बनते हैं, नहीं तो गुलाम ही हैं।

आप मालिक हैं या गुलाम? आप को ही मालूम है। आप को क्या बनना है - मालिक या गुलाम? निर्णय आपको ही लेना है। 

हमारे देश में सन्यासी को स्वामी कहते हैं। स्वामी का अर्थ मालिक, यानि जिसकी गीता सही है। अर्जुन रथ में बैठा है और कृष्ण सारथी हैं – वही स्वामी है।

-       (ओशो के प्रवचन पर आधारित)

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सुखी जीवन, आपकी मुट्ठी में (🔉04.37-12.10)

एक बड़ी कंपनी में कार्यरत महिला लिखती हैं:

उस वर्ष कंपनी में अनेक उठा-पटक हुए। अब कंपनी के कर्मचारियों का वार्षिक मूल्यांकन चल रहा था। सभी बेहद तनाव में थे। चाय पर, भोजन पर, गलियारों में, आते-जाते सब केवल इसी की चर्चा कर रहे थे। कौन रहेगा, कौन जाएगा, किसकी तरक्की होगी, किसकी अवनति होगी? जितनी मुंह उतनी बातें। मैं उस तनाव को झेल नहीं पा रही थी। अत: हरिद्वार एक आश्रम में  ध्यान-शिविर में चली गई। दोपहर 1-2 बजे एक लड़का कमरा साफ करने आया और बताया कि वह इसके पहले नहीं आ सकता क्योंकि उसे 50 कमरे साफ करने होते हैं। मेरे चहरे पर आए भाव को पढ़ते हुए उसने आगे कहा कि यह उतनी खराब अवस्था नहीं है जितना मैं समझ रही हूँ। उसने यह भी  बताया कि उसे यह काम करते अभी 3 दिन ही हुए हैं। इसके पहले वह एक गाड़ी मरम्मत गराज़ में काम करता था जहां उसे मासिक 5000 रुपए मिला करते थे। वहाँ से उसकी छुट्टी हो गई। मुझे झटका सा लगा। लेकिन वह सामान्य बना आगे कहता रहा, इसमें चिंता की क्या बात है! यह होना था तो हुआ। मैं अभी युवा हूँ और मेहनत कर सकता हूं। देर-सबेर कोई न कोई अच्छी नौकरी मिल ही जाएगी। लेकिन मैंने कहा कि 5000 रुपए महिना कम नहीं होते। वह हंसने लगा, रुपयों का क्या, वे तो ऐसे ही आते – जाते रहते हैं। मैं सोचने लगी, यह अनपढ़-अशिक्षित एकदम बे-फिक्र, आनंदमग्न और मैं पढ़ी-लिखी चिंता को न झेल पाने के कारण भाग आई?

खुशी की परिभाषा व्यक्ति-व्यक्ति के लिए अलग-अलग है। जब एक पाश्चात्य पत्रकार ने गांधी से उनकी खुशी का कारण पूछा तो उन्होंने ईशा उपनिषद के पहले श्लोक का हवाला देते हुआ कहा त्याग और आनंद (renounce and enjoy)। त्याग में ही असली आनंद है। त्याग भौतिक वस्तुओं का, कामनाओं का, इच्छाओं का। लेकिन जब यही बात एक गणितज्ञ से पूछी गई तो उसने गणितीय भाषा में ही जवाब दिया – खुशी = साधन / आवश्यकता। जैसे जैसे हमारे साधन बढ़ते जाते हैं हमारी खुशी थोड़ी-थोड़ी बढ़ती जाती है लेकिन जैसे जैसे हमारी आवश्यकता कम होने लगती है, खुशी तेजी से बढ़ती है। और अगर आवश्यकता 0 हो जाए, जो असंभव सी है, तो खुशी अनंत हो जाती है। यही प्रश्न जब एक दार्शनिक से किया गया तो उसने कहा, जब हम अपने जीवन और वस्तुओं की तुलना दूसरों से करना बंद कर देते हैं हमारी खुशी में इजाफा होने लगता है। हमें ईश्वर का प्रसाद तीन तरह से मिलता है – प्रसन्नता, आनंद और सुख। भौतिक इंद्रियों से प्रसन्नता मिलती है, अच्छे लोगों से संबंध होने से आनंद की प्राप्ति होती है, लेकिन सच्चा सुख जब हमारा संबंध ईश्वर से स्थापित होता है तब मिलता है।  प्रसन्नता-आनंद-सुख वक्ताओं के शब्द हैं, इनके गोरख-धंधे में न पड़ कर भावार्थ पर ही ध्यान दें। इन तीनों ही अवस्थाओं में खुशी की मात्रा उस व्यक्ति के हाथ में ही है।

गोपिकाएं यमुना में पानी से भरी भारी मटकियों को बड़ी कठिनाई से सर पर उठा रही थीं। कृष्ण दूर से देख रहे थे लेकिन उन्होंने उनकी सहायता करने का कोई प्रयास नहीं किया। लेकिन थोड़ी ही देर बाद जब वे उसे उतारने लगीं, तब कृष्ण उनकी सहायता के लिए उठ खड़े हुए। कृष्ण के इस व्यवहार से गोपियों को बड़ा आश्चर्य हुआ। कृष्ण ने कहा मेरा कार्य मानव का बोझ बढ़ाना नहीं, उनका बोझ उतारना है। हम ईश्वर से प्राय: वे वस्तुएँ - नाम, दाम, काम - मांगते हैं जो वे हमें देना नहीं चाहते क्योंकि वे हमारा बोझ बढ़ाती हैं, हमें सुख नहीं देतीं। सत्यसाईं बाबा कहा करते थे कम सामान, ज्यादा आराम, सुहाना सफर। जिंदगी के इस सफर में हमारे पास आवश्यकता जितनी कम होगी सफर उतना ही ज्यादा आरामदायक होगा। असली त्याग धन-संपत्ति का दान नहीं; इच्छाओं एवं कामनाओं को छोड़ना ही असली त्याग है। यह हमारे हाथ में ही है।

मानवीय चेतना की तीन विशेषताएँ हैं – भला दिखना, भला अनुभव करना और भला होना। हम सब अपनी अपनी सोच के मुताबिक इनमें से कुछ भी अपना सकते हैं। लेकिन तीनों में बड़ा फर्क है और ये हमें तीन अलग अलग गंतव्यों तक पहुँचातेहैं। भला दिखना यानि भौतिक एवं वैचारिक स्तर पर। वैश्विक बाजार को हमारे दिखना में ही ज्यादा रुचि है। इसमें कोई बुराई नहीं है। भला  दिखने की कोशिश में हम स्वत: इससे आगे बढ़ जाते हैं – अनुभव और होने की क्रिया की तरफ। लेकिन बहुत बार तो दिखने की चिंता या अंधी दौड़ में हम अपना जीवन दुखों से भर लेते हैं। उसी प्रकार भला अनुभव करना भी होने की तरफ ही अग्रसर होना चाहिए; अन्यथा: यह हमारी भौतिक  क्रिया ही बन कर रह जाए, हमें नशे की आदत डाल दे। नशा किसी का भी हो सकता है – दारू का, नशीली पदार्थ का, धन का, नाम का, शक्ति का। लेकिन जब हम दिखना और अनुभव से आगे चल कर होना की परिस्थिति में आ जाते हैं तब हमें परम सुख की अनुभूति होने लगती है और इस की सुगंध भी चारों दिशा में फैलने लगती है, दूसरों को भी प्रभावित करती है, उन्हें भी सुख की प्रतीति होती है।

गहराई से विचार करें तो समझ आती है सुख कहें या शांति, आनंद कहें या खुशी, या कोई और भी नाम दें, ये सब हमारे अंदर ही है, हमारे हाथ में ही है। न तो यह बाहर है और न ही किसी दूसरे के बस में। जो भी करना है हमें करना है। दूसरे मंजिल दिखा सकते हैं, उस पर चलना तो हमें ही होगा।

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गुरु पर भरोसा (🔉12.10-14.42)

भयानक कार दुर्घटना में अपना बायाँ हाथ खो चुकने के बाद भी १० वर्षीय जतिन की जूडो सीखने की तीव्र इच्छा थी। एक दिन वह एक बूढ़े जापानी जूडो गुरु के पास पहुंचा। साहस जुटाकर उसने उनसे जूडो सीखाने का आग्रह किया। गुरु ने उसे अपने शिष्यों में शामिल कर लिया। अगले दिन से वह नियमित अभ्यास में शामिल होने लगा। वह खूब मन लगाकर अच्छी तरह से सीख रहा था। लेकिन उसे समझ नहीं आ रहा था कि पिछले तीन महीने से वह एक ही पैंतरा क्यों सीख रहा है? एक दिन उसने अपने गुरु से पूछ ही लिया, क्या मुझे और पैंतरे नहीं सीखने चाहिए”?

“सिर्फ यही एक पैंतरा है जिसे तुम जानते हो और यही वह पैंतरा है जिसे तुम्हें जानना चाहिए”, गुरु ने जवाब दिया।

उसे बात समझ नहीं आई, लेकिन अपने गुरु पर विश्वास करते हुए उसने उस एक पैंतरे का अभ्यास जारी रखा। कुछ महीनों बाद, गुरु जतिन को एक प्रतियोगिता में ले गया। जतिन ने पहले दौर में जीत हासिल कर ली। दूसरे दौर को भी जतिन ने आसानी से जीत लिया। तीसरे दौर में उसका मुक़ाबला एक वरिष्ठ, मजबूत और अनुभवी खिलाड़ी से होना था। जतिन उसकी तुलना में छोटा था और अपरिपक्व भी। उसे चोट न लग जाए इसलिए रेफरी ने खेल को रोकने का आदेश दिया। गुरु ने बीच में टोकते हुए कहा, नहीं, उसे खेलने दीजिये। जल्दी ही, रिंग में दूसरा खिलाड़ी हारने लगा। अंत में  उसने प्रतियोगिता जीत ली। घर लौटते समय लड़के ने जिज्ञासा से अपने गुरु से पूछा, गुरुजी, मैं सिर्फ एक ही पैंतरा से प्रतियोगिता कैसे जीत गया’? गुरु ने जवाब दिया, तुम दो कारणों से जीते। पहला, तुमने जूडो के सबसे कठिन पैंतरे में माहरत हासिल की। और दूसरा यह कि तुम्हारे उस पैंतरे से बचने के लिए प्रतिद्वंदी को तुम्हारा बायाँ हाथ पकड़ना पड़ता है।   

सही शिक्षा हर कमजोरी को ताकत में बदलने की क्षमता रखती है।

(उजाले के गाँव में से)

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कारावास की कहानी -श्री अरविंद की जुबानी(🔉14.42-19.35)

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक वर्णन किया है। अग्निशिखा में इसके रोचक अंश प्रकाशित हुए थे। इसे हम जनवरी माह से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसका तीसरा अंश है।)

(3)

पानी की व्यवस्था

नहाने की व्यवस्था से पीने के पानी की व्यवस्था और भी निराली थी। गर्मी का मौसम, मेरे छोटे-से कमरे में हवा का प्रवेश लगभग निषिद्ध था। किंतु मई महीने की उग्र और प्रखर धूप बेरोक-टोक घुस आती थी । कमरा जलती भट्टी-सा हो उठता था । इस भट्टी में तपते हुए अदम्य जलतृष्णा  को कम करने का उपाय था वही टीन की बाल्टी का अर्घ-उष्ण जल । बार-बार वही पीता था, प्यास तो नहीं ही बुझती थी वरन् पसीना छूटता और कुछ देर में फिर से प्यास लग आती थी । पर हां, किसी-किसी के आंगन में मिट्टी की सुराही रखी होती, वे अपने पूर्वजन्म की तपस्या का स्मरण कर अपने को धन्य मानते । घोर पुरुषार्थवादी को भी भाग्य में विश्वास करने को बाध्य होना पड़ता था, किसी के भाग्य में ठण्डा पानी बदा था तो किसी के भाग्य में प्यास, सब था भाग्य का फेर । अधिकारीगण, पूर्ण पक्षपात-रहित हो कलसी या बाल्टी वितरण करते थे । इस यदृच्छा-लाभ से मेरे संतुष्ट होने या न होने से भी मेरा जल-कष्ट जेल के सुहृदय डाक्टर बाबू को असह्य हो उठा । वे कलसी जुटाने में लगे किंतु क्योंकि इस बंदोबस्त में उनका हाथ नहीं था इसलिये बहुत दिन तक इसमें सफल नहीं हुए, अंत में उनके ही कहने से मुख्य जमादार ने कहीं से कलसी का आविष्कार किया । उससे पहले ही तृषा के साथ अनेक दिन के घोर संग्राम से मैं पिपासा-मुक्त हो चला था ।

शयन सुख

इस तप्त कमरे में बिस्तर के नाम को थे दो जेल के बने मोटे कम्बल । तकिया नदारद, एक कम्बल को नीचे बिछा लेता और दूसरे की तह करके तकिया बना सोता । जब गर्मी असह्य हो उठती और बिस्तर पर न रहा जाता तब मिट्टी में लोट लगा, बदन ठण्डा कर आराम पाता था । माता वसुन्धरा  की शीतल गोद के स्पर्श का क्या सुख है यह तभी जाना । फिर भी, जेल में उस गोद का स्पर्श बहुत कोमल नहीं होता, उससे निद्रा के आगमन में बाधा आती अतः कम्बल की शरण लेनी पड़ती । जिस दिन वर्षा होती वह दिन भारी आनंद का दिन होता । इसमें भी एक असुविधा यह थी कि झड़ी-झंझा होते ही धूल, पत्ते और तिनकों से भरे प्रभंजन के ताण्डव नृत्य के बाद मेरे पिंजरे के अंदर बाढ़-सी आ जाती । ऐसे में रात को भीगा कम्बल ले कमरे के एक कोने में दुबकने के सिवा कोई चारा न रहता । प्रकृति की इस विशिष्ट लीला के समाप्त होने पर भी  जलप्लावित धरती जबतक सूख नहीं जाती थी तबतक निद्रादेवी की आशा छोड़ विचारों का दामन पकड़ना पड़ता था । एकमात्र सूखी जगह थी शौच के आसपास किंतु  वहां कम्बल बिछाने की प्रवृत्ति न होती । इन सब असुविधाओं के होते हुए भी झड़ी-झंझा के दिन भीतर खूब हवा आती और कमरे की जलती भट्टी का ताप दूर हो जाता इसलिये झड़ी-झंझा का सादर स्वागत करता।

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