शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2021

सूतांजली, अक्तूबर 2021

सूतांजली

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वर्ष : ०५ * अंक : ०३                     🔊(२६.३२)                                                  अक्तूबर   * २०२१

हमें महापुरुषों के गुणों को ही ग्रहण करना चाहिए,

उनके दोष नहीं देखना चाहिए; क्योंकि

पहाड़ का गड्ढा भी

मैदान से बहुत ऊँचा होता है।

(स्वामी विवेकानंद)

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क्या गाँधी से दूर रहा जा सकता है? 🔉 (६.१२)                                   मैंने पढ़ा

(किसी भी वाद-विवाद का कोई अंत नहीं होता। अत: जब कभी कहीं कोई गाँधी की आलोचना करता, मेरे पास चुप रहने के अलावा और कोई चारा नहीं रहता। मैं जानता हूँ कि वह गाँधी के बारे में नहीं जानता। सोनाली के लेख को पढ़ने से संतोष हुआ, ऐसा सोचने वाला मैं अकेला नहीं हूँ, और भी हैं। किसी की आलोचना करनी है, जरूर कीजिये लेकिन उसे जानने के बाद, समझने के बाद, पढ़ने का बाद। आधे-अधूरे ज्ञान से नहीं, सुनी-सुनाई बातों से नहीं। प्रस्तुत भावुक आलेख की लेखिका हैं सोनाली जोशी जिसका अनुवाद किया है उपमा ने।)



मेरा छोटा सा मस्तिष्क, कभी भी समाज की बड़ी-बड़ी धारणाओं, वादों, आदर्शों, समूहों और शाखाओं को नहीं समझ सका। मुझे वे सारी चीजें बहुत उलझी हुई लगीं। मेरा मानना है कि सरलता वो है जिसे सहज ही समझा सके। और इसी तरह मैंने बापू को समझा। गाँधीजी के विचारों की  शुद्धता और सरलता बड़ी असाधारण थी। गाँधी को समझने के लिए मुझे किताबी ज्ञान की जरूरत महसूस नहीं हुई। उनका संदेश खुद उनका जीवन था। उन्होंने वही सिखाया, जिसका उन्होंने अनुकरण किया।

साबरमती आश्रम में एक सूक्ति ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। यह सूक्ति मार्टिन लूथर किंग की थी – “बौद्धिक और नैतिक संतुष्टि जो बेंथम और मिल के उपयोगितावाद में, मार्क्स और लेनिन के क्रांतिकारी सिद्धांतों में, होब्स के सामाजिक समझौते के सिद्धान्त में, रूसो के प्रकृति की ओर लौटो वाले आशावाद में, नित्शे के अतिमानवीय दर्शन में नहीं मिल सकी, उसे मैंने गाँधी के अहिंसावादी दर्शन में पा लिया।”

यकीनन गाँधीजी चर्चा का सार्वभौमिक विषय है। दुनिया में दो तरह के लोग हैं, एक वे जो सचमुच गाँधी की नीतियों और उनके बताए रस्तों पर चर्चा करना चाहते हैं और दूसरे वे जो सिर्फ उनकी आलोचना करना चाहते हैं। ये आलोचक बड़े पढे-लिखे लोग हैं। विश्वविख्यात हैं, वे देश के पिछड़े और शोषित इलाकों की दशा सुधारने के लिए विदेशों में घूमते हैं। ऊँचे ओहदों पर बैठे हैं। इनमें से कुछ तो ऐसे भी हैं, जो सकारात्मक और नकारात्मक आलोचना में अन्तर तक नहीं कर पाते हैं। तारीख का हवाला देते हुए कहते हैं, १९२० में गाँधी ने इस मसले पर ऐसा कहा, वैसा कहा

पहले मैं भी ऐसी चर्चाओं को बढ़ाने की कोशिश करती थी, लेकिन अब ये सब खत्म कर दिया है। जब कभी उन की आलोचना सुनती हूँ तो मैं बहस से किनारा कर लेती हूँ। क्योंकि मुझे पता है ये लोग नहीं जानते कि गाँधी क्या थे? वे अकेले ऐसे थे, जो जिंदगी और मानवता के प्रति अपने प्रयोगों और समझ के द्वारा हर दिन विकसित होते थे। वे हर दिन सीखते थे। हर दिन बढ़ते थे। हर दिन उन्नति करते और हर दिन जागते थे। वे स्वयं को जिंदगी के हर क्षण सुधारते थे। फिर चाहे वो व्यक्तिगत जीवन हो या वैवाहिक जीवन। सामाजिक जीवन हो या राजनीतिक जीवन। इसीलिए ८०-९० साल पहले गाँधी के कहे गए शब्दों को उनके आखरी शब्द मान लेना गाँधी नहीं, स्वयं अपनी बौद्धिक क्षमता को सीमित करने जैसा होगा।  वस्तुत: गाँधी को असामाजिक घोषित करने के प्रयास उन्हें और अधिक सामाजिक बनाते हैं। शांति की आवश्यकता और तलाश हमें गाँधी के और निकट ले जाती है। गाँधी अंत तक सामाजिक थे, सामाजिक हैं और सामाजिक रहेंगे। डॉ. किंग की सूक्ति के साथ अपनी बात खत्म करना चाहूंगी, यदि मानवता, विकास के लिए है, तो गाँधी से दूर नहीं रहा जा सकता। वे विश्व शांति और सद्भाव से भरी मानवीय दृष्टि से प्रेरित थे। इसी भाव से वे सोचते थे और कार्य करते थे। हम केवल अपनी रिस्क पर ही उन्हें अनदेखा कर सकते हैं

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मैंने शायरी को देखा है    🔉(६.५८)                                              मेरे अनुभव

आपने शायरी सुनी होगी, आपने शायरी पढ़ी भी होगी, हो सकता है अपने शायरी लिखी भी हो। लेकिन जनाब, क्या अपने कभी शायरी देखी भी है? हाँ, मैंने देखी है। अकस्मात, हठात, अनजाने में, शायरी झूमते हुए मेरे सामने आई और मेरे दिल, दिमाग को हतप्रभ कर निकल गई। शायद आप जानते होंगे, आँखें देखने का काम नहीं करती। आँखें तो खिड़की मात्र हैं, वे तो सिर्फ  चंद लकीरों को, कुछ रौशनी को हमारे मस्तिष्क तक भेजती हैं। यह तो हमारा मस्तिष्क है जो इन्हें पढ़ता है। साक्षर मस्तिष्क उन लकीरों को शब्दों  में परिवर्तित कर उन्हें पढ़ लेते हैं, लेकिन  शिक्षित मस्तिष्क ही उनका विश्लेषण कर इसका अर्थ निकाल पाते हैं। जब खुदा इन सबका संयोग बैठाता है तब जाकर शायरी के दर्शन होते हैं। दैव-योग से हमें यह अमूल्य योग प्राप्त हुआ और हमें शायरी के साक्षात दर्शन हुए।  

          हुआ यूँ कि लंबे समय से इंतज़ार के पश्चात हम श्रीअरविंद आश्रम – दिल्ली पहुंचे और अचानक फिर से एक संयोग बना और दो दिन की यात्रा पर इंदौर पहुँच गए। वहाँ जाने का मकसद था अपने एक निकट के अति वरिष्ठ नागरिक से मिलना। अपने जीवन के 90 से ज्यादा शरद देख चुके थे। केवल उन्हीं से मिलना था इसलिए एक ही दिन का कार्यक्रम था। लेकिन आश्रम की दीदी’, जिनसे मैं जितना स्नेह रखता हूँ उससे ज्यादा उनका सम्मान करता हूँ, ने एक आज्ञा दी, “तुम्हें एक सप्ताह के लिए जाना है”। मैं दुविधा में पड़ गया। न मैं इतने दिन के लिए जाना चाहता था न ही उनकी आज्ञा का उल्लंघन करना चाहता था। रात भर नींद नहीं आई, दुविधा में पड़ा रहा। असमंजस में टिकिट भी नहीं करवाई। सुबह-सुबह उनके दरबार में पहुंचा, दरख्वास्त की, “कृपया अपनी आज्ञा में थोड़ा परिवर्तन करें, तब मैं टिकट बनवाऊँ।” सुनवाई हुई और उन्होंने मुझे पूरी छूट दे दी, “जैसा आपलोग चाहते हैं वैसा ही कर लीजिये।” राहत की साँस ली और अपने कार्यक्रम को 1 से बढ़ा कर 2 दिन का कर लिया।


       
पहला दिन तो सबों से मिलने में निकल गया। दूसरे दिन क्या करूँ? दीदी ने एक नंबर दिया था और कहा था कि समय मिले तो इनसे मिल लीजिएगा नहीं तो कम-से-कम बात तो जरूर कर लीजिएगा। मैंने भी कहा तो यही कि अगर समय मिला और हमारे नजदीक ही होंगी तो मिल लूँगा। फोन मिलाया, बात हुई। बात हुई, तो मिलने कि इच्छा भी हुई। कहाँ है, कितनी दूर है, यह समझ न सका तो पता-ठिकाना पूछा और बाद में फिर फोन करता हूँ कह कर बात समाप्त कर दी। पूछ-ताछ की तो बताया गया कि पास ही है’, कोई दिक्कत नहीं है। बाद में पता चला कि दूर ही नहीं भीड़ भरे इलाके में भी है। जिन्होंने बताया था वे आधे रास्ते तक ही छोड़ने को तैयार हुए। लेकिन तब तक कार्यक्रम बन चुका था, पीछे हटना संभव नहीं था। पूछने पर बताया आधी-पौन घंटे से ज्यादा नहीं लगेगी’,  क्या मालूम था कि समय ज्यादा लगना था, विधाता को तो मुझे शायरी के दर्शन कराने थे।

          औपचारिकता निभाने के बाद मैंने दिल्ली आश्रम का संदेश निवेदित किया और तत्पश्चात बोला, अब आज्ञा दें”। बोलते ही एक झिड़की सी मिली, “अरे! अभी कैसे!” और फिर! एक-के-बाद-एक परतें खुलने लगीं। जैसे-जैसे परतें उतरने लगीं – रोमांचित होना, रोंगटों का खड़ा होना और अश्रुपात – इधर भी उधर भी - होने लगे। न वे बोल रही थीं, न हम सुन रहे थे। विधाता ही बोल रहा था, विधाता ही सुन रहा था।

          हमारे सामने दो टेलीग्राम रखे गए। वाणी बोलने लगी,

“एक विशेष कार्यक्रम में ’, पांडिचेरी से एक अतिविशिष्ट सज्जन का आना तय हुआ। उनकी रजामंदी भी आ गई। उसी अनुसार सबों को सूचित भी किया गया।  कार्यक्रम, कार्यक्रम न रह  उत्सव बन गया। सबों के पैरों में जैसे घुँघरू बंध गए। बिना किसी थकावट की अनुभूति के कार्यक्रम  की तैयारी होने लगी। लेकिन, अचानक, दो दिन पहले, उनका टेलीग्राम आया मैं नहीं आ सकूँगा - न। ऐसा लगा जैसे बिजली गिरी। किंकर्त्यव-विमूढ़ सी बैठी रह गई। आँखों से अविरल धारा बह चली। फरियाद की माँ, तूने ये क्या किया? सब कुछ तुझ पर है, जैसे तेरी इच्छा। और किसी को कुछ नहीं कहा। लोग यह समझ रहे थे कुछ हुआ है लेकिन क्या? किसी में पूछने का साहस नहीं जुट रहा था। सब माँ से प्रार्थना कर रहे थे। दूसरे दिन और एक टेलीग्राम आया, लिखा था “’ जा रहा है – माँ”। मैं सुन्न हो गई। आँखें बंद हो गईं। गालों से आँसू लुढ़कने लगे। कुछ ही देर बाद और एक टेलीग्राम आया! सहमते हुए लेकिन पूरे आत्म-विश्वास के साथ उसे खोला। मैं पहुँच रहा हूँ - न

खुदी को कर बुलंद इतना, कि हर तकदीर से पहले,

                                      खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है।

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सज्जनता   🔉(३.०६)                                               लघु कहानी - जो सिखाती है जीना

सेना के एक अधिकारी लड़ाई के समय शिविर के कुछ सैनिकों के साथ घोड़ों के लिये घास एकत्र करने निकले। एक गाँव के किसान को उन्होंने आदेश दिया, “चल कर बताओ कि इस गाँव में किस खेत की फसल सबसे अच्छी है”। विवश होकर किसान को उन सैनिकों के साथ जाना पड़ा। खेत खड़ी फसल से लहलहा रहे थे। बहुत उत्तम फसल थी। सैनिक चाहते थे कि उन लहलहाते खेतों की  फसल काट लें, लेकिन किसान कहता चला जा रहा था, “जी यहाँ नहीं, कुछ और आगे चलिये, इससे भी अच्छी फसल आपको दिखलाऊंगा”। धीरे-धीरे किसान सैनिकों को गाँव की सीमा के खेत तक ले गया। वहाँ का खेत दिखला कर बोला, “महाशय, इस गाँव में इस खेत की फसल सबसे अच्छी है”। सैनिकों ने उस खेत की पूरी फसल उखाड़ कर, गट्ठे बाँध, घोड़ों पर लाद दी। सैनिक अधिकारी ने वह फसल देख, डपट कर किसान से कहाँ, “बेकार में तुम हमें इतनी दूर ले आया, इससे अच्छी-अच्छी फसलें तो हम पीछे छोड़ आए और तुम उत्तम बता कर हमें बेवकूफ बना रहा है। बता, इस चाल के पीछे तेरी मंशा क्या है”?

किसान ने हाथ जोड़ कर, विनीत लेकिन स्पष्ट स्वर में कहा, “जी, सच बात तो यह है कि मैं जानता था कि आप खेत के मालिक की फसल का मूल्य तो देंगे नहीं। मैं किसी दूसरे का खेत दिखला कर उस बेचारे की हानि कैसे करवाता। पहली बात तो यह है कि यह खेत मेरा है और दूसरी यह कि आप भी मानेंगे कि मेरे लिए तो अपने खेत की फसल ही सबसे सबसे अच्छी है”।

किसान की बात सुन कर वह सैनिक अधिकारी लज्जित हो उठा। उसका किसान के प्रति मनोभाव तुरंत बदल गया। घोड़े से उतर कर उसने अपनी जेब से एक थैली निकाली, किसान के हाथों में थमाता हुआ बोला,आज अचानक सज्जनता का यह पाठ पढ़ा कर तुमने मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया भाई। युद्ध के इस नारकीय दलदल में  फँसे हुए मुझको हाथ देकर उबरने की कीमत तो नहीं चुका पाऊँगा, लेकिन तुम्हारी फसल की भरपाई के लिए मेरी इस छोटी-सी भेंट को कहीं अस्वीकार न कर देना..........”

(अग्निशिखा से)

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मेरी नहीं सबकी माँ      🔉 ३.०५)                                             मैंने पढ़ा                         

यह कैसी माँ है?

मैंने समझा मेरी माँ है। परंतु जो मिलता है, कहता है – मेरी माँ है, मेरी माँ है। यह भी कोई बात हुई?

यदि इस तरह लाखों-करोड़ों की माँ हुई तो मेरे हिस्से में क्या आयेगा? टॉफी का सारा डिब्बा खुलने पर बस एक टॉफी! गुस्सा भी आता है, पर कुछ बन नहीं पाता।

मैं ने एक दिन ठानी कि माँ से पूछ ही लूँ -  तू मेरी माँ है कि सबकी माँ है? जब गया तो जाते ही जो चाहता था वह मिल गया और पूछना भूल गया। अच्छा! मैं ने सोचा अबकी बार पूछूँगा। अबकी बार अवश्य पूछूंगा। पर जाऊँ तो जो माँगू मिल जाए। जो चाहूँ मिल जाए।

          बरसों बीत गए और बात धरी-की-धरी रह गई। जब देखूँ लाइन लगी हुई है। क्यू में लोग जा रहे हैं और ओठों पर – माँ रटन लगी है। और वापस आएं तो ऐसे प्रसन्न – संतुष्ट जैसे सब कुछ मिल गया। यह देख-देख कर मेरा खून रोजाना इतना बनता नहीं था जितना सूख जाता था। बरसों फिर बीत गए। अबकी बार सोचा कि चाहे कुछ मिल जाये फिर भी पूछ कर ही छोड़ूँगा। रुमाल में गाँठ  बाँध ली और लाल-पीला होकर जीने पर चढ़ा। रुमाल की गाँठ तो जेब में ही रह गई। गुस्से ने प्राणों में जगह ले ली।

माँ ने पूछ बेटा क्या चाहिए’?

मैंने भुनभुनाकर जवाब दिया, मुझे कुछ नहीं चाहिए

माँ ने मुस्कुराकर पूछा, तब तो तुम्हें सब कुछ मिल गया

मैं ने भुनभुनाकर पूछा, पर तुम दूसरों की माँ क्यों बनती हो?’

माँ प्यार से बोली, ताकि उनको भी तुम्हारी तरह सब कुछ मिल सके और तुमसे छीना-झपटी न करें

          जब मैं वापस आया तो सोचने लगा कि कहीं ठगा तो नहीं गया। जब मुझे सब-कुछ मिल गया तो दूसरों को भी सब-कुछ मिल गया, ठीक है। सब प्रसन्न होंगे तभी तो मैं भी प्रसन्न रह सकूँगा।

वाह री  माँ।

तू तो माँ ही माँ है।

मेरी नहीं, सबकी माँ है!









(आप माँ को अपनी श्रद्धा से चाहे जिस रूप में देख सकते हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द ने काली के रूप में देखा तो श्री सुरेन्द्र नाथ जौहर ने श्रीमाँ के रूप में। श्री अरविंद आश्रम-दिल्ली शाखा से प्रकाशित पत्रिका कर्मधारा से।)

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कारावास की कहानी-श्री अरविंद की जुबानी   🔉 (६.५९)                     धारावाहिक

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। इसके रोचक अंश हम जनवरी २०२१ से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसकी दसवीं किश्त है।)

 


(१०)

हमारे नाटक के शेक्सपीयर 

हमारे नाटक के शेक्सपीयर थे नॉर्टन साहब। किन्तु शेक्सपीयर और नॉर्टन साहब में मैंने एक प्रभेद देखा। संगृहीत उपादान का कुछ अंश शेक्सपीयर कहीं-कहीं छोड़ भी देते थे, पर नॉर्टन साहब अच्छा-बुरा, सत्य-मिथ्या, संलग्न-असंलग्न, अनोर्णियान महतो माहियान जो पाते, एक भी न छोड़ते, तिस पर निजी कल्पनासृष्ट प्रचुर सुझाव, अनुमान, परिकल्पना जुटा उन्होंने इतना सुंदर कथानक रचा कि शेक्सपीयर, डेफ़ो इत्यादि सर्वश्रेष्ठ कवि और उपन्यासकार इस महाप्रभु के आगे मात खा गए। आलोचक कह सकते हैं कि जैसे फ़ौलस्टाफ के होटल के बिल में एक आने की रोटी और असंख्य गैलन शराब का समावेश था उसी तरह नॉर्टन साहब के प्लॉट में एक रत्ती प्रमाण के साथ दस मन अनुमान और सुझाव थे। किन्तु आलोचक भी प्लॉट की परिपाटी और रचना-कौशल की प्रशंसा करने को बाध्य होगा। नॉर्टन साहब ने इस नाटक के नायक  के रूप में मुझे ही पसंद किया, यह देख मैं समधिक प्रसन्न हुआ। जिसे मिल्टन के “Paradise Lost” का शैतान, वैसे ही मैं था नॉर्टन साहब के प्लॉट का कल्पनाप्रभूत महाविद्रोह का केंद्र स्वरूप, असाधारण तीक्ष्णबुद्धि-सम्पन्न, क्षमतावान और प्रतापशील ढीठ बुरा आदमी (बोल्ड बैड मैन)। मैं ही था राष्ट्रीय आंदोलन का आदि और अंत, स्रष्टा और त्राता, ब्रिटिश साम्राज्य का संहार-प्रयासी। उत्कृष्ट और तेजस्वी अँग्रेजी लेख देखते ही नॉर्टन साहब उछल पड़ते और उच्च स्वर में  कहते – अरविंद घोष। आंदोलन के जितने भी वैध, अवैध, सुशृंखलित अंग या अप्रत्याशित फल – वे सभी अरविंद घोष की सृष्टि हैं, और क्योंकि वे अरविंद की सृष्टि हैं इसलिये वैध होने पर भी उसमें अवैध अभिसंधि गुप्त रूप से निहित है। शायद उनका यह विश्वास था कि अगर मैं न पकड़ा गया तो दो साल के अंदर-अंदर अंग्रेजों के भारतीय साम्राज्य का ध्वंस हो जाएगा। किसी फटे कागज के टुकड़े पर मेरा नाम पाते ही नॉर्टन साहब खूब खुश होते और इस परम मूल्यवान प्रमाण को मैजिस्ट्रेट के श्री चरणों में सादर समर्पित करते। अफसोस है, कि मैं अवतार बन कर नहीं जन्मा, नहीं तो मेरे प्रति उस समय की उनकी इतनी भक्ति और मेरे अनवरत ध्यान से नॉर्टन साहब निश्चित ही उस समय मुक्ति पा जाते जिससे हमारी कारावास की अवधि और गवर्नमेंट का अर्थव्यय दोनों की ही बचत होती। सेशन्स अदालत द्वारा मुझे निर्दोष प्रमाणित किये जाने से  नॉर्टन-रचित प्लॉट की सब श्री और गौरव नष्ट हो गया। बेरसिक बीचक्राफ्ट हैमलेट नाटक से हैमलेट को अलग करके बीसवीं सदी के श्रेष्ठ काव्य की हतश्री  कर गए। समालोचक को यदि काव्य-परिवर्तन का अधिकार दे दिया जाए तो भला क्यों न होगी ऐसी दुर्दशा? नॉर्टन साहब को एक और दु:ख था, कुछ गवाह भी ऐसे बेरसिक थे की उन्होंने भी उनके रचित प्लॉट के अनुसार गवाही देने से साफ इंकार कर दिया। नॉर्टन साहब गुस्से से लाल पीले हो जाते, सिंह गर्जना से उनके प्राण कंपा उन्हें धमकाते। जिसे कवि को स्वरचित शब्द के अन्यथा प्रकाशन पर और सूत्रधार को अपने दिये गए निर्देशों के विरुद्ध अभिनेता की आवृत्ति, स्वर या अंगभंगिमा पर न्यायसंगत और अदमनीय क्रोध आता, वैसा ही क्रोध आता था नॉर्टन साहब को। बैरिस्टर भुवन चटर्जी के साथ हुए संघर्ष का कारण यही सात्विक क्रोध ही था। चटर्जी महाशय के जितना रसायनभिज्ञ पुरुष तो कोई नहीं देखा। उन्हें रत्ती भर भी समय-असमय का ज्ञान नहीं था। नॉर्टन साहब जब संलग्न-असंलग्न का विचार न कर केवल कवित्व की खातिर जिस-तिस प्रमाण को घुसेड़ते, तब चटर्जी महाशय खड़े हो असंलग्न या अमान्य कह आपत्ति करते। वे समझ न सके कि ये साक्षी इसलिए नहीं पेश किये जा रहे हैं कि ये संलग्न या कानून-सम्मत हैं वरन इसलिये कि नॉर्टनकृत नाटक में शायद उपयोगी हों। इस असंगत व्यवहार से नॉर्टन ही क्यों बर्ली  साहब तक झुँझला उठते। एक बार बर्ली साहब ने चटर्जी साहब को बड़े करुण शब्दों में कहा था, “श्रीमान चटर्जी, आपके आने से पहले हम निर्विघ्न मुकदमा चला रहे थे। सच तो यह है, नाटक की रचना के समय बात-बात पर आपत्ति उठाने से नाटक भी आगे नहीं बढ़ता और दर्शकों को भी मजा नहीं आता।

(क्रमश:, आगे अगले अंक में)

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बुधवार, 1 सितंबर 2021

सूतांजली, सितंबर 2021

सूतांजली

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वर्ष : ०५ * अंक : ०२                   🔊(२५.०५)                                  सितंबर  * २०२१

हमेशा त्रुटियों और गलत प्रवृत्तियों को ही देखने से अवसाद आता है, और

श्रद्धा की हिम्मत टूट जाती है। अभी के अंधेरे की ओर कम देखो,

अपनी आँखें ज्यादातर आने वाले प्रकाश की ओर रखो।

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क्यों हो जाते हैं हम निराश? 🔉 (६.४२)                                  

निराशा के गहनतम अंधकार में भी कहीं-न-कहीं कोई-न-कोई आशा की रौशनी रहती है जो प्राणी को कर्म में लगाये रखती है। हमारी इच्छा-शक्ति ही इस आशा की किरण को प्रज्वलित रखती है और हमें लगातार आशान्वित करती रहती है। इस कारण हम ज्ञान प्राप्ति में लग जाते हैं जो हमारी आशाओं को फलीभूत करती है। हमारी ये आशाएँ कहाँ से और कैसे जन्म लेती हैं? इनका बीजारोपण हमारे पूर्वजन्म में होता है जहाँ से हम संस्कार लेकर ही इस जगत में आते हैं। और फिर परिवार, समाज, वातावरण, श्रवण, पठन-पाठन हमारी इन इच्छाओं को और मजबूत करता है और एक स्वरूप प्रदान करता है।  

हमारी ये इच्छाएँ ही हमें सदैव कर्म के लिए प्रेरित करती हैं। ऐसा नहीं है कि आशा केवल हम मानव में ही होती है, यह विश्व के हर प्राणी में होती है। एक खूंक्खार जानवर अपनी माँद से इसी आशा में निकलता है कि कोई-न-कोई जानवर उसके शिकंजे में आ ही जाएगा, तो वहीं हिरण को यह आशा रहती है कि आज भी वह शेर के पंजों से बच जाएगा। खेल के मैदान में हर खिलाड़ी को इस बात की  आशा रहती है कि अंत में वही जीतेगा। वैसे ही व्यापारी हो या संन्यासी, राजनीतिज्ञ हो या शिक्षाविद, संगीतज्ञ हो या चित्रकार सब को यही आशा रहती है कि वह सफल होगा। और जो इस आशा को बनाए रखता है वह सफल भी होता है। अगर यह आशा ही हमारे प्राण हैं और इसी के कारण हमारा अस्तित्व है तो फिर ऐसा क्या होता है कि हम निराश हो जाते हैं, आशा का लोप हो जाता है? इसके कई कारण हैं: यथा,

1.     हम क्या और कैसी आशा रखते हैं? कई बार हमारी आशा निरर्थक, अविवेकपूर्ण, अनुचित या अन्यायपूर्ण होती हैं। हमारी आशा हमारी क्षमताओं के तुलना में बहुत ज्यादा होती है। कई बार तो हम अपनी आशाओं को ठीक ढंग से रूपायित ही नहीं कर पाते हैं। इन के कारण हम हताश और निराश हो जाते हैं। अपनी आशाएँ सार्थक, विवेकपूर्ण, उचित, न्यायपूर्ण, क्षमतानुसार  एवं स्पष्ट होनी चाहिए। अगर हम इन बातों का ख्याल रखें, तब हमें ऐसी स्थिति का समाना नहीं करना पड़े।

2.     बचपन से ही हम यह पढ़ते-सुनते आए हैं कि हमारे जीवन का एक लक्ष्य होना चाहिए। लेकिन हम इसे गंभीरता से नहीं लेते। सही मायने में हमारे सामने एक नहीं अलग-अलग कई लक्ष्य होने चाहिये -  क) पारिवारिक एवं घरेलू, ख) स्वास्थ्य - शारीरिक एवं मानसिक, ग) शिक्षा, घ) आध्यात्म एवं नैतिक, और च) आर्थिक एवं व्यवसायिक या जीविका। इन सबों का अलग-अलग लक्ष्य होना चाहिए। इन दूरगामी लक्ष्यों को फिर छोटे छोटे अल्पकालीन लक्ष्यों में विभाजित करना और बार-बार इनका पुनर्वालोकन करते रहना भी आवश्यक है। ये हमारी स्वधर्म को परिभाषित करती हैं और हमें जड़ता और निराशा में जाने से बचाती हैं।

3.   हमारी इस यात्रा में  अनेक कठिनाइयाँ और रोड़े आते हैं। हमें हारने-विफल होने का डर सताने लगता है। ऐसी अवस्थाओं में हम प्राय: अपने लक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए अपनी आशाओं को घटा देते हैं और जोखिम को आवश्यकता से ज्यादा महत्व दे देते हैं। होने वाले लाभ के बदले जोखिम हमें भारी लगने लगता है और इस प्रक्रिया में लाभ का मूल्यांकन कम और जोखिम को ज्यादा आँकने की गलती कर बैठते हैं। सही मूल्यांकन करें, लक्ष्य को घटाने पर नहीं रोडों को हटाने पर ध्यान केन्द्रित करें।

4.     होने वाले लाभ को कमतर और जोखिम को अधिक आँकने का कारण हमारा अज्ञान ही होता है। अपनी क्षमताओं का सही आकलन करने और अपने आप पर पूरा भरोसा रखने के लिए ज्ञान आवश्यक है। अभी वर्तमान समय में कोविड टीकाकरण के दौरान टीका लगवाने में हिचकिचाहट एक बहुत ही ज्वलंत और प्रत्यक्ष उदाहरण हमारे सामने है। अपने अज्ञान के कारण ही प्रारम्भ में टीका लगवाने में हिचकिचाहट हो रही थी। हमारा अज्ञान और अहंकार ही इसके लिये उत्तरदायी है जिसका निराकरण ज्ञान से ही होता है

5.   परम सत्य और सापेक्ष सत्य को न समझने तथा इनमें विश्वास न होने पर भी आशा क्षीण होती है।  सापेक्ष सत्य हमारे वर्तमान अल्पकालीन लक्ष्य को हासिल करने के लिए सही हो सकता है लेकिन इसके सहारे परम सत्य को समझना और वहाँ तक पहुँचना आशा को सबल करती है।  

अगर इन बातों पर अपनी नजर बनाये रखें तो आशा का लोप नहीं होता है, निराशा प्रवेश नहीं करती है।

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एक भावपूर्ण प्रार्थना और दृढ़ विश्वास  🔉(३.०२)                               मैंने पढ़ा

संत रामदासजी जब प्रार्थना करते थे तो कभी उनके होंठ नहीं हिलते थे।

शिष्यों ने पूछा, हम प्रार्थना करते हैं तो होंठ हिलते हैं। आपके होंठ नहीं हिलते? आप पत्थर की मूर्ति की तरह खड़े हो जाते हैं। आप कहते क्या हैं अंदर से? क्योंकि, आप अंदर से भी कुछ कहेंगे, तो होंठ पर थोड़ा कंपन आ ही जाता है। चेहरे पर बोलने का भाव आ जाता है।



यह सुनकर संत रामदसजी ने कहा, मैं एक बार राजधानी से गुजरा और राजमहल के  सामने द्वार पर मैंने सम्राट को खड़े देखा, और वहीं एक भिखारी को भी खड़े देखा। वह भिखारी बस खड़ा था। फटे-चिथड़े थे उसके शरीर पर। जीर्ण-जर्जर देह थी, जैसे बहुत दिनों से भोजन न किया हो, शरीर सूख कर काँटा हो गया था। बस आँखें ही दिये की तरह जगमगा रही थीं। बाकी जीवन जैसे सब तरफ से विलीन हो गया हो। वह कैसे खड़ा था यह भी आश्चर्य था? लगता था अब गिरा-तब गिरा!

सम्राट उससे पूछा – बोलो क्या चाहते हो?

उस भिखारी ने कहा – “अगर आपके द्वार पर खड़े होने से मेरी मांग का पता नहीं चलता, तो कहने की कोई जरूरत नहीं। क्या कहना है? मैं द्वार पर खड़ा हूँ, मुझे देख लो मेरा होना ही मेरी प्रार्थना है।  

संत रामदसजी ने कहा, उसी दिन से मैंने प्रार्थना बंद कर दी। मैं परमात्मा के द्वार पर खड़ा हूँ। वह देख लेंगे। मैं क्या कहूँ? अगर मेरी परिस्थिति कुछ नहीं कह सकती, तो मेरे शब्द क्या कह सकेंगे? अगर वे मेरी परिस्थिति नहीं समझ सकते, तो मेरे शब्द को क्या समझेंगे?’

अत: सच्चे भाव और दृड़ विश्वास ही परमात्मा की याद के लक्षण हैं, यहाँ कुछ मांगना शेष नहीं रहता? आपका प्रार्थना में होना ही पर्याप्त है।

(जब हम अपना जीवन एक अंजान डॉक्टर के हाथ में देने से नहीं हिचकिचाते तब हमें क्या चाहिए और हमारे लिए क्या श्रेष्ठ है; क्या यह हम परमात्मा से ज्यादा अच्छा समझते हैं? अगर नहीं, तो निर्णय उसी पर क्यों नहीं छोड़ सकते? श्री अरविंद आश्रम-दिल्ली शाखा से प्रकाशित पत्रिका कर्मधारा से। )

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जन्मदिन 🔉 (६.२४)                                                                             मेरे विचार

आज माधव बहुत प्रसन्न है। मुस्कुराहट उसके चेहरे पर बार-बार दिखाई दे रही है। उसे नींद भी नहीं आ रही है। आज की रात कितनी लंबी है, खत्म ही नहीं हो रही है। कल उसका जन्मदिन है, अरे नहीं हैप्पी बिर्थडे है। सबों कों चहक-चहक कर बता रहा है। सब दोस्तों को बार-बार याद दिलाया है, कहीं कोई भूल नहीं जाये। सपनों में देख रहा है कि उसके लिये कौन क्या गिफ्ट लाया है। उसके लिये जन्मदिन, उपहार लेने का दिन है, दोस्तों के साथ मस्ती करने का दिन है, केक काटने का दिन है, लोगों से जन्मदिन की बधाई लेने और उन्हें धन्यवाद देने का दिन है। यह सोचते और देखते कब आँख लग गई उसे पता ही नहीं चला।  

माँ ने जगाया तो हड़बड़ा कर उठा। माँ ने उसे जन्मदिन के ढेर सारे आशीर्वाद दिये और जल्दी तैयार होने के लिये कहा, क्यों? अभी तो देर है, पार्टी तो शाम को है’, उसने सोचा। माँ ने बताया कि उसे अभी कई नए लोगों के पास जाना है और उन्हें जन्मदिन के गिफ्ट देने हैं। माधव को यह बड़ा अजीब सा लगा। जन्मदिन पर तो गिफ्ट मिलते हैं, लेकिन माँ गिफ्ट देने की बात कर रही है! माँ ने समझाया, ऐसे बहुत से लोग हैं जो न गिफ्ट लेने आते हैं और न ही देने। लेकिन वे हमें जानते हैं और हम उनको। ऐसे भी लोग हैं जिन्हें उसके जन्मदिन का पता नहीं है और हम उन्हें बुलाते भी नहीं। क्या माधव उन्हें गिफ्ट नहीं देगा? उन्हें नहीं बताएगा कि आज उसका जन्मदिन है? माधव खुश हो गया, तब तो बहुत मजा आयेगा। जल्दी जल्दी नहा धोकर, दूध पीकर तैयार है। माँ ने बताया, उन पड़ोसियों का नाम जिनके यहाँ उनका आना-जाना नहीं के बराबर है, उन कर्मचारियों के नाम, जैसे दरवान, मासी, दूध वाला, अखबार वाला, सफाई वाला....., पास पड़ोस के उन दूकानदारों के नाम जिनके सामने से रोज गुजरते हैं उनसे कभी कुछ खरीदते हैं कभी देखते भी नहीं, घर के दरवाजे के पास खड़ा रिक्शावाला, टैक्सीवाला, गाड़ी धोने वाला, पास पड़ोस के ड्राईवर और भी न जाने कितने लोगों के बारे में उसने बताया। यह सुनकर माधव ने भी मुहल्ले के कई बच्चों के नाम जोड़ दिये। लेकिन उसे जाना थोड़ा अजीब सा लगा और संकोच भी हो रहा था। माँ ने कहा शुरू के कुछ लोगों के पास वह भी साथ चलेगी।  माधव चल पड़ा जन्मदिन मनाने, गिफ्ट लेने के बजाय गिफ्ट देने के लिये। जब वह किसी को गिफ्ट देता, लेने वाले की आँखों की खुशी और चेहरे के आश्चर्य से वह अछूता नहीं रहा सका। कई लोगों ने तो उसे गिफ्ट के बदले गिफ्ट दिये भी। उसे शाम की पार्टी के बजाय सुबह की यह पार्टी ज्यादा रोचक और रोमांचकारी लगने लगी। वह अब समझ गया कि जन्मदिन गिफ्ट लेने का नहीं गिफ्ट देने का दिन होता है। यह सिलसिला कई वर्षों से चल रहा है। दूर-दराज के लोग उसे जानने लगे। वह अब माँ-बाप के बेटे के रूप में नहीं बल्कि उसके माँ-बाप की पहचान उससे होने लगी। 

एक मशहूर अमेरिकन फिल्म अभिनेत्री बताती हैं कि उनका बचपन गरीबी में गुजरा। उसे सर्कस देखने का बड़ा शौक था लेकिन उसके पिता के लिए सर्कस के टिकट खरीदना मुश्किल था। एक वर्ष उसने अपने जन्मदिन के तोहफे के रूप में सर्कस देखने की तमन्ना बताई। उस वर्ष से उसके पिता हर वर्ष उसे उसके जन्मदिन पर उसे सर्कस ले जाने लगे। उसे इस दिन का बड़ा इंतजार रहता। एक वर्ष इसी प्रकार वे सर्कस देखने के लिए टिकट की लाइन में खड़े थे। उनके आगे हर उम्र के आठ बच्चे अपने माँ-बाप के साथ खड़े थे। बच्चे बेहद खुश थे। उनकी बातों से साफ जाहीर था कि यह उनके जीवन का पहला सर्कस है। आखिर उनके पिता टिकट खिड़की पर पहुँच गए। उन्होने बताया कि उन्हें आठ बच्चों की और दो माँ-बाप की टिकट चाहिए। टिकट की रकम सुन कर उनके चेहर पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। उनके पास उतने पैसे नहीं थे, बच्चों को क्या कहें यह भी समझ नहीं आ रहा था। अभिनेत्री के पिता ने पूरी बात भाँप ली। उन्होंने झट अपने पॉकेट से बीस डॉलर का एक नोट नीचे गिरा दिया और फिर उसे उठा कर उस सज्जन को देते हुए बोले, यह नोट शायद आपके पॉकेट से गिरा है। दंपत्ति को बात समझते देर नहीं लगी, लेकिन उन्होंने देखा कैसे उनके आत्मसम्मान की रक्षा की गई है, उनके आँखों में आँसू आ गए। काँपते हाथों से उन्होंने वह नोट ले लिया। फिल्म तरीका आगे लिखती हैं कि अब उसके पिता ने उसकी तरफ देखा। उसे बात समझ आ गई। उसने खुशी-खुशी सर्कस न देखने का निर्णय लिया, और वे बिना सर्कस देखे लौट आये। वे कहती हैं कि उन्हें बस सिर्फ यही एक जन्मदिन याद है, इससे बड़ा तोहफा उसने न कभी दिया न कभी उसे मिला।  

दूसरों के आत्म सम्मान की रक्षा करते हुए उनकी सहायता करें, बच्चों को लेना नहीं, देना सिखाएँ।

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कर्म   🔉(२.१३)                                                लघु कहानी - जो सिखाती है जीना

वह एक तूफानी संध्या थी। बस्ती को तूफान ने घेर रखा था। बस्ती के रहने वाले अपने-अपने घरों में छुपे बैठे अपने पापों से तौबा कर रहे थे। बस्ती के धर्म-स्थल का धर्माध्यक्ष बस्ती वालों की मुक्ति के लिये दुआ मांग रहा था। ऐसे समय में धर्म-स्थल के द्वार पर दस्तक हुई और अध्यक्ष की अनुमति पाकर एक ऐसी स्त्री अंदर आई, जो उस बस्ती  में रहती थी, परंतु उसका धर्म बस्ती वालों से भिन्न था। भयंकर तूफान ने उस स्त्री को भयभीत कर दिया था। वह काँपते हुए कदमों से आगे आई। फिर उसने अध्यक्ष के चरणों में गिरकर कहा कि, श्रीमान मैं आपके धर्म से भिन्न धर्म को मानने वाली हूँ। यह बताइये कि क्या मेरे लिए इस तूफानी संध्या में आपके यहाँ स्थान है 

धर्माध्यक्ष ने उपेक्षा से उस स्त्री की ओर देखा और चीखकर कहा, “ऐ दुष्टा, यहाँ से चली जा। क्या तू नहीं जानती कि मुक्ति का मार्ग केवल उनके लिए है, जो मेरा धर्म मानते हैं। मेरे धर्म से किनारा करने वालों के लिए ही यह तूफान भड़का हुआ है।” स्त्री काँपती हुई वापस जाने के लिए मुड़ी और ऐन उसी क्षण भयानक गरज के साथ बादलों में बिजली कौंधी और लहराती हुई धर्म-स्थल पर गिरी। बस्ती के लोग जब उसकी आग बुझाने के लिये भागे हुए आए, तो उन्होंने देखा कि पवित्र धर्माध्यक्ष जलकर राख़ हो चुका था और उनकी बस्ती की दूसरे धर्म को मानने वाली स्त्री जंग लगी बाल्टी हाथ में लिए रोती जाती है और उस स्थान की आग बुझाती फिर रही है।

(उजाले के गाँव में से)

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कारावास की कहानी-श्री अरविंद की जुबानी  🔉(५.३६)                          धारावाहिक

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। इसके रोचक अंश हम जनवरी २०२१ से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसकी नौवीं किश्त है।)  

(९)

मुकदमे के विचित्र जीव

मुकदमे का स्वरूप कुछ विचित्र था। मैजिस्ट्रेट, परामर्शदाता, साक्षी, साक्ष्य, साक्ष्य-सामग्री (exhibits), आसामी सभी विचित्र। दिन-पर-दिन उन्हीं गवाहों और साक्षी-सामग्री का अविराम प्रवाह, उसी परामर्शदाता का नाटकोचित अभिनय, उसी बालक-स्वभाव मैजिस्ट्रेट की बालकोचित चपलता और लघुता। इस अपूर्व दृश्य को देखते-देखते बहुत बार मन में यह कल्पना उठती कि हम ब्रिटिश विचारालय में न बैठ किसी नटकगृह के रंगमंच पर या किसी कल्पनापूर्ण औपन्यासिक राज्य में बैठे हैं। अब उस राज्य के सब विचित्र जीवों का संक्षिप्त वर्णन करता हूँ।   

इस नाटक के प्रधान अभिनेता थे सरकार बहादुर के परामर्शदाता नॉर्टन साहब। प्रधान अभिनेता ही क्यों, इस नाटक के रचयिता, सूत्रधार और साक्षी-स्मारक भी थे, - ऐसी वैचित्रमयी प्रतिभा जगत में विरल है। परामर्शदाता नॉर्टन थे मद्रासी साहब, इसीलिए शायद थे बंगाली बैरिस्टर-मंडली की प्रचलित नीति और भद्रता से अनभ्यस्त एवं अनिभज्ञ। वे कभी राष्ट्रीय महासभा के नेता रहे थे, शायद इसीलिए विरोध और प्रतिवाद सह नहीं सकते 

थे और विरोध को शासित करने के आदी थे। ऐसी प्रकृति को लोग कहते हैं हिंस्रस्वभाव। नॉर्टन साहब कभी मद्रास कार्पोरेशन के सिंह रहे की नहीं, नहीं कह सकता पर हाँ, अलीपुर कोर्ट के सिंह तो थे ही। उनकी कानूनी अभिज्ञता की पैठ पर मुग्ध होना कठिन है – वह थी मानों ग्रीष्मकाल की शीत। किन्तु वक्तृता के अनर्गल प्रवाह में, बात की चोट से राई को पहाड़ बनाने की अद्भुत क्षमता में, निराधार या आधार लिए हुए कथनों को कहने की दु:साहसकिता में, साक्षी और जूनियर बैरिस्टर की भर्त्सना में और सफ़ेद को काला करने की मनमोहिनी शक्ति में नॉर्टन की अतुलनीय प्रतिभा देख मुग्ध होना ही पड़ता था। श्रेष्ठ परामर्शदाताओं की तीन श्रेणीयाँ हैं – जो कानून के पाण्डित्य से और यथार्थ व्याख्या के साथ साक्षी से सच्ची बात उगलवा और मुकदमे-संबंधी घटनाओं और विवेच्य विषय का दक्षता के साथ प्रदर्शन कर जज या जूरी का मन अपनी ओर आकर्षित कर सकते हैं; और जो ऊँची आवज में, धमकियों से, वक्तृता के प्रवाह से साक्षी को हतबुद्ध कर, मुकदमे से विषय को चमत्कारी ढंग से तोड़-मरोड़, गले के ज़ोर से जज या जूरी की बुद्धि भरमा मुकदमे जीत सकते हैं। नॉर्टन साहब थे तीसरी श्रेणी में अग्रगण्य। यह कोई दोष की बात नहीं। वे ठहरे परामर्शदाता व्यवसायी आदमी, पैसा लेने वाले, जो पैसा दे सके उसका अभीप्सित उद्देश्य सिद्ध करना है उनका कर्त्तव्य-कर्म। आजकल ब्रिटिश कानून प्रणाली में सच्ची बात बाहर निकालना वादी या प्रतिवादी का असल उद्देश्य नहीं, किसी भी तरह मुकदमा जीतना ही है उद्देश्य। अतएव, परामर्शदाता वैसी ही चेष्टा करेंगे, नहीं तो उन्हें धर्मच्युत होना होगा। भगवान द्वारा अन्य गुण न दिये जाने पर जो गुण हैं उनके बल पर ही मुकदमा जीतना होगा, अत: नॉर्टन साहब स्वधर्म पालन ही कर रहे हैं। सरकार बहादुर उन्हें हर रोज हजार रुपए देती थी। यह अर्थ व्यवस्था वृथा जाने से  सरकार बहादुर की क्षति होती, यह क्षति न हो इसके लिए नॉर्टन साहब ने प्राणपन से चेष्टा की थी। पर राजनीतिक मुकदमे में आसामी को विशेष उदारता के साथ सुविधा देना और संदेहजनक एवं अनिश्चित प्रमाण पर ज़ोर न देना ब्रिटिश कानून पद्धति का नियम है। नॉर्टन साहब इस नियम को सदा याद रखते, तो मेरे खयाल में, उनके केस की कोई हानि नहीं होती। ...

(क्रमश:, आगे अगले अंक में)

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