मंगलवार, 1 मार्च 2022

सूतांजली मार्च 2022

 सूतांजली

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वर्ष : ०५ * अंक : ०८                                   🔊 (25.13)                                     मार्च   * २०२२

संवाद की सबसे बड़ी समस्या यह है कि

हम समझने के लिए नहीं सुनते,

हम उत्तर देने के लिए सुनते हैं।

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दिखे, तब विश्वास हो – विश्वास हो, तब दिखे                            मैंने पढ़ा

थोड़ा सा समय निकाल कर आप अपने जीवन की कुछ घटनाओं को याद करें। क्या कभी ऐसा हुआ कि फ्लाइट पकड़ने के लिए  सुबह 4 बजे उठना था, यह सोचते-सोचते सो गये और जब नींद खुली तो 4 ही बजे थे? किसी को याद किया और उसी समय उसका फोन आ गया, किसी पुस्तक को ढूंढ रहे थे और अचानक वही पुस्तक किसी दोस्त के मेज पर या किताब की दुकान पर या पुस्तकालय में दिख गई, मन में कोई विचार चल रहा था और अचानक उसी के बारे में सुनने या पढ़ने को मिला। कमोबेश संसार के हर व्यक्ति के जीवन में ऐसी घटनाएँ घटी हैं।

          हमने देखा है; एक बच्चा चल रहा है, उसके पीछे-पीछे गाड़ी चल रही है, एक रस्सी गाड़ी से बंधी है और उस रस्सी का दूसरा सिरा उस बच्चे के हाथ में है। यहाँ हम साफ तौर पर उस गाड़ी और बच्चे के बीच रस्सी के सम्बंध को देख रहे हैं और इस घटना पर पूरा यकीन कर रहे हैं। देखा और विश्वास हुआ। दीवाल पर लगी स्विच को हम दबाते हैं और छत पर लगी बत्ती जल उठती है। उस स्विच और बत्ती के बीच हम कोई सम्बंध नहीं देख रहे हैं, फिर भी हमें यह विश्वास है कि उस स्विच से लेकर बत्ती तक तार गया हुआ है। हमें नहीं दिखा लेकिन फिर भी विश्वास हुआ। आज उस बच्चे के हाथ  में कोई रस्सी नहीं है बल्कि एक रिमोट है और उससे दूर एक गाड़ी उसके इशारों पर आगे-पीछे हो रही है, बाएँ-दायें मुड़ रही है। उस रिमोट और गाड़ी के मध्य कोई सम्बंध हमें नहीं दिख रहा।  लेकिन हम यह विश्वास करते हैं कि कहीं कुछ है जो इन दोनों के बीच कोई सम्बंध बना रहा है। यह क्यों और कैसे है इसकी हमें जरा भी जानकारी नहीं है, लेकिन हम इस पर विश्वास करते हैं। अब तो इन दोनों, रिमोट और गाड़ी, के बीच की दूरी भी कुछ मीटर, किलोमीटर तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि हजारों ही नहीं लाखों किलोमीटर दूरी पर भी बिना किसी सम्बंध के एक कहता है दूसरा सुनता है (रेडियो), एक भेजता है दूसरे को मिलता है (टीवी), एक आज्ञा देता है दूसरा उसके अनुसार कार्य करता है (अन्तरिक्ष यान)। हमें उनके बीच कोई सम्बंध नहीं दिखता लेकिन हम विश्वास करते हैं। 

          माँ और उसके बच्चे के बीच दूरी है। एक दूसरे की आवाज नहीं सुन सकते। लेकिन माँ को बच्चे के रोने की आवाज सुन जाती है, बच्चे को भूख लगने से माँ के स्तनों में दूध आता है। कभी-कभी, कोई स्वतः कहीं कुछ कहता है और हम उसे साफ-साफ सुन लेते हैं। हम दोनों के बीच कोई सम्बंध नहीं है, हमें कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। लेकिन हम यह जन्म से देखते-सुनते आए हैं, इसलिए  हमारे मन में कभी यह प्रश्न नहीं उठा कि दिखता नहीं इसलिए मैं मानता नहीं, हम इस पर विश्वास करते हैं।

          एक नर्तक / नर्तकी नृत्य कर रही है, उसका पूरा शरीर, चेहरा, मनोभाव उस में रमा हुआ है और उसका एक-एक अंग-प्रत्यंग स्वत: संचालित हो रहा है। बज रही धुन जैसे ही बदलती है उसका पूरा नृत्य भी उसके अनुरूप तुरंत बदल जाता है। एक रचनाकार, लेखक-कवि-चित्रकार-संगीतकार, रचना प्रारम्भ करता है और विचारों की कड़ी एक के बाद एक जुड़ती चली जाती है और एक नई रचना तैयार हो जाती है। हमारे विचार हमारे अंग-प्रत्यंग से वार्तालाप करते हैं। हमारा शरीर हमारे विचारों से बात कर रहा होता है। इन सबों के पीछे कोई सम्बंध हमें दिखाई नहीं देता है, हमारी दृष्टि के परे है, लेकिन हम इस पर विश्वास करते हैं।

          विश्व प्रसिद्ध खिलाड़ियों के प्रशिक्षक अपने छात्र से कहते हैं, जीतने के लिए केवल सबसे अच्छा खेलना काफी नहीं है। तब और क्या चाहिए? विरोधी खिलाड़ी के दिमाग को पढ़ो। जीतना है तो गोल, गोल पोस्ट पर नहीं, गोलकीपर के दिमाग पर करो तुम जीत जाओगे। क्या सम्बंध है इन दो खिलाड़ियों के विचारों के बीच? साक्षात्कार (इंटरव्यू) में उत्तर का सही होना काफी नहीं होता, उत्तर प्रश्नकर्ता के विचारों के अनुकूल या उसे अपने विचारों के अनुकूल बनाना अहम होता है। यहाँ विचारों का आदान-प्रदान कैसे होता है? इन दोनों के बीच हमें कोई सम्बंध नहीं दिखता लेकिन हम इस पर विश्वास करते है।  यही नहीं अगर हम ऐसे अनुभवों पर, घटनाओं पर विश्वास करने लगें, उनकी सुनने लगें, तो ऐसे अनुभव ज्यादा होने लगेंगे, उसकी बातें साफ-साफ सुनने लगेगी।

          क्या आप बता सकते हैं कि एक अखरोट के खोल में कितनी चवन्नी आ सकती है? हाँ कोई भी एक संख्या बताइये जो आपकी समझ में आती हो – 10, 15, 20, 50। हमारे दिमाग या ब्रेन की बनावट और आकार एक अखरोट से मिलती जुलती है। क्या आप बता सकते हैं कि हमारे दिमाग में कितनी यादें या विचार आ सकते हैं?  बड़ा बेहूदा सा सवाल है? विचार, जिसका कोई  आकार नहीं, कोई माप-जोख नहीं, दिखता नहीं वह कैसे एक आकार वाले बर्तन में समा सकता है? दिमाग तो एक आकार वाला हमारे शरीर का ही एक अंग है। और हमारी यादें क्या है? हमारे विचारों का ही एक रूप है। तब ये निराकार यादें कहाँ रहती हैं? आप में से बहुत यही कहेंगे हमारे दिमाग में। लेकिन दिमाग तो एक आकार वाला बर्तन या अंग ही है। फिर एक निराकार एक आकार में कैसे रह सकता है? तब हमारी  ये यादें कहाँ रहती हैं, कहाँ से आती हैं और कहाँ जाती हैं? ठहरिए, इससे आगे और एक प्रश्न है – हम जन्म के पहले कहाँ थे और मृत्यु के बाद कहाँ जाएंगे? घबड़ाइए मत, मैं न गीता की बात कर रहा हूँ, आध्यात्मिक की तरफ मुड़ रहा हूँ। और एक प्रश्न करूँ – आप सब ने सपने देखे हैं। क्या आप बता सकते हैं सपनों में आप ने जो भी देखा वे कहाँ से आए थे और कहाँ गए?  अलग-अलग सपनों में अलग-अलग लोग अलग-अलग भूमिका में भी दिखे, कुछ ऐसे लोग जो थे उन्हें हमने पहचाना क्योंकि हमने उन्हें पहले देखा था और कुछ ऐसे अंजान लोग भी दिखे जिन्हें हम नहीं पहचानते क्योंकि उन्हें पहले कभी नहीं देखा था। हो सकता है आने वाले समय में दिखें?

          तब हमारे ये निराकार विचार, यादें कहाँ रहती हैं, कहाँ से आती हैं और कहाँ जाती हैं? क्या हम इसकी कल्पना कर सकते हैं? जब तक हम एक आकार में हैं और एक आकार के बारे में ही सोचते हैं हम इस निराकार के बारे में न सोच सकते हैं न समझ सकते हैं। इसके लिए यह आवश्यक है कि हम एक ऐसे विचारों में जाएँ जहां न प्रारम्भ है, न अंत है और न ही रुकने की जगह। हमें अपनी सोच बदलनी पड़ेगी, एक निराकार के स्वरूप की भांति विचार करना पड़ेगा। हम अपने इस निराकार स्वरूप को कोई भी नाम दे सकते हैं अध्यात्म, चेतना (consciousness) या उच्च चेतना, आंतरिक ज्ञान, ज्ञानोदय, आलोक, चेतना का बदला स्वरूप या और कुछ। लेकिन सहजता के लिए हम इसे केवल अपने विचार ही मान लेते हैं। विचार हम सब जानते हैं, समझते हैं, परिचित हैं। हम अपने विचार ही हैं, विचार ही हम हैं। अपने जीवन का 75% हिस्सा हम अपने इन्हीं विचारों में व्यतीत करते हैं। एक निराकार को हम आकार नहीं दे सकते। कहीं न कहीं कुछ न कुछ छूट ही जाएगा। और अगर कुछ छूट गया तो अधूरा ही रहा गया। हम लिख कर या बातों से मीठे-कड़ुए-नमकीन-तीखे का स्वाद नहीं बता सकते, लाल-नीला-काला-पीला-हरा रंग नहीं समझा सकते।

          हमने देखा हमारी यादें, हमारे विचार हमारे दिमाग में नहीं रहती हैं। हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि हमारे विचार हमारे दिमाग के बाहर ही कहीं रहते हैं। हमने यह भी देखा कि दिखने वाले तो आकारों (बच्चा और गाड़ी) के बीच आकार (रस्सी) का सम्बंध है, दिखने वाले आकारों (स्विच और बत्ती) के बीच अदृश्य सम्बंध है, दो दिखने वाले आकारों (गाड़ी और रिमोट कंट्रोलर) के बीच अदृश्य सम्बंध है, दो जीवों के बीच (आवाज के माध्यम से) अदृश्य सम्बंध है, हमारे निराकार विचारों का हमारे शरीर से (नर्तक, खिलाड़ी) अदृश्य सम्बंध है, हमारे निराकार विचारों का दूसरे आकार जीव से (बच्चे का रोना, स्तन में दूध आना) अदृश्य सम्बंध है, हमारे अपने निराकार विचारों का अपने खुद के निराकार विचारों से (रचनाकर) अदृश्य सम्बंध है।

          तब फिर मेरे निराकार विचारों का किसी अन्य जीव के निराकार विचारों के बीच अदृश्य सम्बंध क्यों नहीं हो सकता?  मैं अपने विचारों से आपके विचारों से अदृश्य सम्बंध क्यों नहीं बना सकता? गुरुत्वाकर्षण शक्ति न्यूटन के पहले भी थी, सापेक्षता का सिद्धान्त (theory of relativity) आइन्स्टाइन के पहले भी था। इनके आविष्कार के बाद हम इन सिद्धांतों का प्रयोग निर्माण के लिए कर सके। मेरे और आपके विचारों का आपसी सम्बंध है, यह मान लें तो हम इसका प्रयोग जैविक कल्याण के लिए अनेक निर्माण के लिए कर सकते हैं। लेकिन हमें यह तभी दिखेगा जब हम इस पर विश्वास करेंगे।

(मेरा यह लेख मनोवैज्ञानिक डॉ.वायेन डायर की पुस्तक यू विल सी इट व्हेन यू बिलिव इट पर आधारित है। मुझे ऐसा लगता है कि डॉ.वायेन वही कह रहे हैं जो उपनिषद कह रही है। हाँ, एक बहुत बड़ा फर्क है, उपनिषद मूल पुस्तक (टेक्स्ट बूक) है और डॉ. की पुस्तक कुंजी (की बूक) है। एप्लिकेशन सिद्धांतों से ही निकल कर आता है। “हमने” सिद्धांतों को हेय दृष्टि से देखा और “समझदारों” ने उन्हीं सिद्धांतों पर पूरे एप्लिकेशन तैयार कर लिए।) 

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बुद्धि या हृदय, चरित्र या शील                                          मेरे विचार

(यह उद्धरण ओशो के प्रवचनों में से लिया गया है।)

जब तुम सोचते हो और निर्णय लेते हो, बुद्धि सक्रीय हो जाती है। जब तुम मात्र देखते हो, तब हृदय का फूल खिलता है। जैसे ही तुमने निर्णय लेना शुरू किया, बुद्धि बीच में आ गई। क्योंकि निर्णय विचार का काम है। जैसे ही तुमने तौला, तराजू आया। तराजू बुद्धि का प्रतीक है। तुमने नहीं तौला, बस देखते रहे, तो बुद्धि को बीच में आने की जरूरत ही नहीं रही। मात्र देखने की अवस्था में, साक्षीभाव में, बुद्धि हट जाती है। और जीवन के जो गहरे रहस्य हैं उन्हें हृदय जानता है।

                    अक्ल को क्यों बताएं इश्क का राज़, गैर को राज़दां नहीं करते।

और हृदय ने कोई राज प्रेम का, परमात्मा को नहीं बताया। पराये को कहीं कोई भेद की बातें बताता है? बुद्धि पराई है, उधार है। हृदय तुम्हारा है।

          इसे थोड़ा समझो। जब तुम पैदा हुए, तो हृदय लेकर पैदा हुए थे। बुद्धि समाज देता है, संस्कार देता है, शिक्षा देती है, घर, परिवार, सभ्यता देती है। तो हिन्दू के पास एक तरह की बुद्धि होती है। मुसलमान के पास दूसरे तरह की बुद्धि होती है। जैन के पास तीसरे तरह की बुद्धि होती है।  तीनों के संस्कार अलग, शास्त्र अलग, सिद्धान्त अलग। लेकिन तीनों के पास दिल एक ही होता है। दिल परमात्मा का है। बुद्धियाँ समाज की हैं।

          रूस में कोई पैदा होता है, तो उसके पास कम्यूनिस्ट बुद्धि होगी। ईसाई घर में कोई पैदा होता है, तो उसके पास ईसाई बुद्धि होगी। बुद्धि तो धूल है बाहर की इकट्ठी की हुई। जैसे हृदय के दर्पण पर धूल जम जाए। दर्पण तो तुम लेकर आते हो, धूल तुम्हें मिलती है।  इस धूल को झाड़ देना जरूरी है। समस्त धर्म की गहनतम प्रक्रिया धूल को झाड़ने की प्रक्रिया है, कि दर्पण फिर स्वच्छ हो जाए, तुम फिर से बालक हो जाओ, तुम फिर हृदय में जीने लगो। तुम फिर वहीं से देखने लगो जहां से तुमने पहली बार देखा था, जब तुमने आंखे खोली थी। तब बीच में कोई बुद्धि न खड़ी थी। तब तुमने सिर्फ देखा था। वह था अवलोकन।

                              अक्ल के बंदे जिस दिन दिल की ज्योति जला कर देखेंगे

                                                  होश के बंदे समझेंगे क्या गफलत है क्या होशियारी

“शील की सुगंध सर्वोत्तम है”। क्योंकि वस्तुत: वह परमात्मा की सुगंध है। शील का क्या अर्थ है? शील का अर्थ चरित्र नहीं है। इस भेद को समझ लेना जरूरी है, तो ही बुद्धि की व्याख्या में तुम उतार सकोगे।

          चरित्र का अर्थ है, ऊपर से थोपा गया अनुशासन। शील का अर्थ है भीतर से आई गंगा। चरित्र का अर्थ है, आदमी के द्वारा बनाई गई नहर। शील का अर्थ है, परमात्मा के द्वार से उतरी गंगा। चरित्र का अर्थ है, जिसका तुम आयोजन करते हो, जिसे तुम सम्हालते हो। सिद्धांत, समाज, शास्त्र, तुम्हें एक दृष्टि देते हैं – ऐसे उठो, ऐसे बैठो, ऐसे जियो, ऐसे करो। तुम्हें भी पक्का पता नहीं है कि तुम जो कर रहे हो वह ठीक है या गलत। अगर तुम गैर-मांसाहारी घर में पैदा हुए तो तुम मांस नहीं खाते, अगर तुम मांसाहारी घर में पैदा हुए तो मांस खाते हो। क्योंकि जो घर की धारणा है, वही तुम्हारा चरित्र बन जाता है। आगे तुम रूस में पैदा हुए तो तुम मंदिर नहीं जाओगे, मस्जिद नहीं जाओगे। तुम कहोगे परमात्मा, कहाँ है परमात्मा? राहुल सांकृत्यायन 1936 में रूस गए। और उन्होने एक प्राइमरी स्कूल में एक छोटे बच्चे से जाकर पूछ, ईश्वर है? उस बच्चे ने कहा, हुआ करता था, अब नहीं है। यूज्ड टू  बी, बट नो मोर। ऐसा हुआ करता था, जब लोग अज्ञानी थे – क्रांति के पहले – 1917 के पहले हुआ करता था। अब नहीं है। ईश्वर मर चुका है। आदमी जब अज्ञानी था, तब हुआ करता था।  

          जो हम सुनते हैं, वह मान लेते हैं। संस्कार हमारा चरित्र बन जाता है। पश्चिम में शराब पीना कोई दुश्चरित्रता नहीं है। छोटे-छोटे बच्चे भी पी लेते हैं। सहज है। पूरब में दुश्चरित्रता है। धारणा की बात  है। 

          शील क्या है? शील है, जब तुम्हारे मन से सब विचार समाप्त हो जाते हैं और निर्विचार दशा उपलब्ध होती है, शून्यभाव बनता है, ध्यान लगता है, उस ध्यान की दशा में तुम्हें जो ठीक मालूम  होता है, वही करना शील है। और वैसा शील सारे जगत में एक सा होगा। उसमें कोई संस्कार के भेद नहीं होंगे, समझ के भेद नहीं होंगे।

          चरित्र हिन्दू का अलग होगा, मुसलमान का अलग होगा, ईसाई का अलग होगा, जैन का अलग होगा, सिक्ख का अलग होगा। शील सभी का एक होगा। शील वहाँ से आता है जहां न हिन्दू जाता है, न मुसलमान जाता है, न ईसाई जाता है। तुम्हारी  गहनतम गहराई से, अछूती कुंवारी गहराई से, जहां किसी ने कभी कोई स्पर्श नहीं किया, जहां तुम अभी भी परमात्मा हो, वहाँ से शील आता है।

          जैसे अगर तुम थोड़ी सी जमीन खोदो तो ऊपर-ऊपर जो पानी मिलेगा वह तो पास की सड़कों से बहती हुई नालियों का पानी होगा, जो जमीन ने सोख लिया है – चरित्र। चरित्र होगा वह। फिर तुम गहरा खोदो, इतना गहरा खोदो, इतना गहरा कुआँ खोदो जहां तक नालियों का पानी नहीं जा सकता, तब तुम्हें जलस्त्रोत मिलेंगे, वे सागर के हैं। तब तुम्हें शुद्ध जल मिलेगा। अपने भीतर इतनी खुदाई करनी है कि विचार समाप्त हो जाएँ, निर्विचार का तल मिल जाए। वहाँ से तुम्हारे जीवन को जो ज्योति मिलेगी वह शील की है।

          अगर शील का जन्म हो जाए, तो उसका अर्थ है, तुमने वहाँ पाया अब, जो जन्म के पहले था, जब तुम पैदा भी न हुए थे। उस शुद्ध चैतन्य से आ रहा है। अब मृत्यु के आगे भी ले जा सकोगे। जो जन्म के पहले है, वह मृत्यु के बाद भी साथ जाएगा। शील को उपलब्ध कर लेना इस जगत की सबसे बड़ी क्रांति है। 

                    न जाने कौन है गुमराह कौन आगाहे1-मंजिल है

                              हजारों कारवां हैं जिंदगी की शाहराहों2 में।

1 – सजग, 2 – राजमार्ग

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कारावास की कहानी-श्री अरविंद की जुबानी                                        धारावाहिक

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। इसके रोचक अंश हम जनवरी २०२१ से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसकी पंद्रहवीं किश्त है।)

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आसामियों की पहचान - 2

मेदिनीपुर के एक साक्षी - मेदिनीपुर के आसामियों से पता लगा कि वे भी गोयन्दा हैं- बोले कि उन्होंने श्रीहट्ट के हेमचन्द्र सेन को तमलुक में वक्तृता देते देखा था। किन्तु हेमचन्द्र ने अपनी स्थूल आँखों से कभी तमलुक नहीं देखा, तो भी उनके छायामय शरीर ने श्रीहट्ट से सुदूर तमलुक जाकर तेजस्वी और राजद्रोहपूर्ण स्वदेशी व्याख्यान दे गोयन्दा महाशय की चक्षुतृप्ति और कर्णतृप्ति की थी। किन्तु चन्दननगर के चारुचन्द्र राय के छायामय शरीर ने मानिकतल्ला में उपस्थित हो इससे भी ज़्यादा रहस्यमय काण्ड मचाया था। पुलिस के दो कर्मचारियों ने शपथ खाकर कहा था कि उन्होंने अमुक दिन अमुक समय चारु बाबू को श्याम बाज़ार में देखा था, वे श्याम बाज़ार से एक षड्यंत्रकारी के साथ मानिकतल्ला बागान तक पैदल गये थे, उन्होंने भी वहाँ तक उनका पीछा किया था और बहुत पास से देखा था, अतः भूल होने की गुंजाईश नहीं। वकील की जिरह से दोनों साक्षी टस से मस न हुए। व्यासस्य वचनं सत्यम्, पुलिस की गवाही भी अन्यथा नहीं हो सकती। दिन और समय के सम्बन्ध में भी उनकी भूल होने की कोई बात नहीं, क्योंकि ठीक उसी दिन, उसी समय चारु बाबू कॉलेज से छुट्टी ले कलकत्ते में उपस्थित थे, चन्दननगर के डुप्ले कॉलेज के अध्यक्ष की गवाही से यह प्रमाणित हुआ था। किन्तु आश्चर्य! ठीक उसी दिन, उसी समय चारु बाबू हावड़ा स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर चन्दननगर के मेयर तार्दिवाल, तार्दिवाल की पत्नी, चन्दननगर के गवर्नर और अन्यान्य सम्भ्रान्त यूरोपीय सज्जनों के साथ बातें करते-करते टहल रहे थे। ये सब इसी बात को याद कर चारु बाबू के पक्ष में गवाही देने के लिए राज़ी हुए थे। फ्रेंच गवर्नमेंट की चेष्टा से पुलिस द्वारा चारु बाबू को छोड़ दिये जाने पर विचारालय में इस रहस्य का उद्घाटन नहीं हुआ। किन्तु चारु बाबू को मैं यह परामर्श देता हूँ कि वे ये प्रमाण Psychical Research Society को भेज मनुष्य जाति के ज्ञान संचय में सहायता करें। पुलिस की गवाहियाँ मिथ्या नहीं हो सकतीं - विशेषकर सी.आई.डी. की - अतएव थियोसोफ़ी के आश्रय के अलावा हमारे लिए और कोई चारा नहीं। सौ बात की एक बात, ब्रिटिश क़ानून प्रणाली में कितनी आसानी से निर्दोषों को जेल, कालापानी और फाँसी तक हो सकती है इसका दृष्टान्त इस मुक़द्दमे में पग-पग पर पाया। कठघरे में खड़े न होने तक पाश्चात्य विचार प्रणाली की मायावी असत्यता हृदयंगम नहीं की जा सकती। यूरोप की यह प्रणाली है जुए का एक खास खेल; मनुष्य की स्वाधीनता, मनुष्य का सुख-दुःख, उसकी और उसके परिवार एवं आत्मीय बंधु की जीवनव्यापी यंत्रणा, अपमान और जीवंत मृत्यु को ले जूए का खेल। इससे कितने दोषी बच जाते हैं और कितने निर्दोष मर जाते हैं इसकी कोई गिनती नहीं। यूरोप में समाजवाद (Socialism) और अराजकता वाद (Anarchism) का कितना प्रचार और प्रभाव हुआ है वह इस जुए में एक बार फंसने पर, इस निष्ठुर निर्विचार समाज रक्षक षड़यंत्र में एक बार पड़ने पर पहली दृष्टि में ही समझ में आ जाता है। ऐसी अवस्था में यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि अनेक उदार-चेता दयालु जन कहने लग गये हैं कि इस समाज को तोड़ दो, चूर-मार कर दो; इतने पाप, इतने दुःख, इतने निर्दोषों के तप्त निःश्वास और हृदय के खून से यदि समाज की रक्षा करनी हो तो बेकार है वह रक्षा।

(क्रमशः, आगे अगले अंक में)

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https://youtu.be/b64tXWiAEX8



मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022

सूतांजली, फ़रवरी 2022

 सूतांजली

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वर्ष : ०५ * अंक : ०७              🔊(26.13)                                                 फरवरी    * २०२२

जब कोई दिल दुखाता है तो चुप रहिये;

किसी भी जवाब से बेहतर

वक्त का जवाब होगा।

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विकास, प्रगति और सफलता (Growth, Progress and Success)   मैंने सुना

(आदरणीय भक्तवत्सलजी के वक्तव्य पर आधारित)

सामान्यतः हमलोगों में विकास-प्रगति-सफलता, इन तीन शब्दों, के बारे में एक भ्रम है, गलतफहमी है। जैसे-जैसे हमारे व्यापार की बिक्री बढ़ने लगती है, 50 करोड़ से 100 करोड़, 100 करोड़ से 500 करोड़ दुनिया कहने लगती है कि हमें सफलता मिल रही है। हमें भी इस बात की गलतफहमी होने लगती है कि हम सफल हो रहे हैं। क्यों ऐसा है कि नहीं? हाँ या नहीं? नहीं! ..... नहीं!!...... नहीं!!! विकास, प्रगति और सफलता में बहुत बड़ा फर्क है, जिसे समझने की जरूरत है। जब हमारे व्यापार की  बिक्री बढ़ती है 50 करोड़ से 100 करोड़, 100 करोड़ से 500 करोड़ यह हमारा सिर्फ विकास (growth) है। यह हमारी सफलता नहीं है। हमारी भौतिक संपत्ति में बढ़ोतरी हमारे विकास का मापदंड है। अगर यह विकास नीतिगत (ethics) यानी इसकी प्राप्ति अनुशासन, ईमानदारी से नियमों के पालन आदि के साथ हुआ है तब यह हमारी प्रगति (progress) है। नीति के साथ विकास हमारी प्रगति है। और इस प्रगति में मानवता, नैतिकता और आध्यात्मिकता का तड़का लगने पर मिलती है सफलता (success)।

          यह हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण है, अतः मैं एक बार फिर कहना चाहूँगा, अगर हमारे व्यापार की बिक्री 50 करोड़ से 100 करोड़ और 100 करोड़ से 500 करोड़ होती है तब यह हमारी सफलता नहीं है। यह हमारा विकास (growth) है। जब यह विकास नीतिगत है तब यह प्रगति (progress) कहलाती है। और जब इस प्रगति में मानवता, नैतिकता और आध्यात्मिकता का समावेश होता है तब होती है सफलता (success)। यह समझना बहुत ही आसान है। अपने बैंक में हजारों करोड़ रुपये होने के बाद भी हमें आंतरिक प्रसन्नता नहीं मिलती क्योंकि हमें सफलता नहीं मिली।  सफलता वह अवस्था है जिसमें स्थायित्व, प्रसन्नता और शांति तीनों खुद-ब-खुद प्राप्त हो जाती है। सफलता में हमारा विकास और प्रगति दोनों छिपे हुवे हैं। अब इस पर विचार कर आप अपने नए लक्ष्य खुद निर्धारित कीजिये की आप को क्या चाहिए? आप को केवल विकास (ग्रोथ) चाहिए, या प्रगति (प्रोग्रैस) चाहिए या सफलता (सक्सेस) चाहिए।

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श्रीमद्भगवद्गीता   अनेकार्थी क्यों?                                       मैंने सुना

(चिन्मय मिशन द्वारा, जनवरी 2018 चिन्मय विभूति’, पूना  में आयोजित 21 दिन व्यापी गीता ज्ञान यज्ञ में पूज्य स्वामी तेजोमयानंद ने 79 घंटों में श्रीमद्भगवद्गीता की व्याख्या की थी। व्याख्या प्रारम्भ करने के पूर्व स्वामीजी ने इस बात की चर्चा की कि यह पुस्तक तो पतली सी है (मात्र 700 श्लोक) लेकिन इस पर लिखे गए भाष्यों की संख्या अनगिनत हैं और प्रायः उनके आकार भी  वृहद हैं। इसके शब्दों, श्लोकों के अनेक अर्थ (अनर्थ भी) निकले गए हैं। ऐसे में एक साधारण व्यक्ति भ्रमित हो जाता है। स्वामीजी ने इस भ्रम को दूर किया और अनेकार्थी होने का कारण भी बताया। प्रस्तुत है उन्हीं के आख्यान पर आधारित यह निबंध – संपादक) 

श्रीमद्भगवद्गीता भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया हुआ उपदेश है। इसमें 700 श्लोक हैं 18 अध्याय हैं। लेकिन इस श्रीमद्भगवद्गीता  पर न जाने कितने लोगों ने भाष्य लिखे हैं। इसका विवेचन करने के लिए यह जानना आवश्यक है कि ये भाष्य करने वाले कौन लोग हैं? उनके बारे में थोड़ी जानकारी लेते हैं।


          एक है आचार्य परम्परा। जैसे भगवान शंकराचार्य जी, जो अद्वैत मत के प्रतिष्ठाता हुए हैं, विशिष्ट अद्वैत के। द्वैत के रामानुजाचार्य जी हुए हैं। ये ऐसे आचार्य हुए जिनका उद्देश्य था यह सिद्ध करना कि उनके संप्रदायों के सिद्धांत उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता, ब्रह्म सूत्र सम्मत हैं। इस कारण ये आचार्य जिस मत के प्रतिष्ठाता थे उन्हें वैसे ही अर्थ दिखाई दिये और उन्होंने वही अर्थ बताए और कहा की श्रीमद्भगवद्गीता हमारे मत का समर्थन करती है। दूसरे वे भक्त थे, जैसे संत ज्ञानेश्वर महाराज। ऐसे भक्त किसी प्रकार के बंधन में  नहीं रहे और उन्होंने अपने तरह से एक अलग व्याख्या की। तीसरे फिर अनेक विद्वान हैं, उन्होंने भी इस की व्याख्या की। फिर समाज में कार्य करने वाले लोग, राजनीति में काम करने वाले लोग भी आए और उन्होंने भी इस पर भाष्य लिखा। तिलक जी की गीता-रहस्य विख्यात है, महात्मा गाँधी ने भी लिखा, विनोबा ने भी लिखा। किसी ने विस्तार से लिखा, किसी ने संक्षेप में। फिर, अनेक भाषाओं में भी इसके अनुवाद हुए और भाष्य लिखे गए। इनके अलावा एक सन्यासी वर्ग भी है, स्वामी भी हैं। फिर गृहस्थों ने भी लिखा। कहने का तात्पर्य यह है कि हर वर्ग के हर प्रकार के लोगों ने लिखा। सब ने अपनी-अपनी दृष्टि से इसे देखा और उन्हें जैसा दिखा वैसा ही लिखा।

          अब प्रश्न यह उठता है कि इनमें कौन-सा सही है? किसे प्रामाणिक मानें और किसे पढ़ें? तब ऐसे लोग भी सामने आए जिन्होंने कहा कि मैं बताऊँगा कि सही क्या है?’ – और उन्होंने भी लिख डाला। एक उक्ति है शब्दों पर कोई बोझ नहीं होता। तात्पर्य यह कि किसी व्यक्ति के सर पर, चाहे वह कितना ही मजबूत क्यों न हो, वजन डालते जाएँ तो एक समय ऐसा आयेगा कि वह भी उस वजन को उठाने में असमर्थ होगा और शोर मचाने लगेगा। लेकिन वाक्य पर कोई बोझ नहीं होता। उनपर कितना ही बोझ डालते जाओ यानी अर्थ करते जाओ उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। कितने ही और कैसे ही अर्थ डालते जाओ, लेता जाएगा। आपको अच्छा लगे या नहीं, सही लगे या नहीं, वह लेता जाएगा। शब्द के अर्थ लोग निकालते रहते हैं लेकिन शब्द कभी नहीं कहता कि बस अब रुक जाओ मैं और अर्थ सहने में सक्षम नहीं हूँ। शब्दों के, वाक्यों के, श्लोकों के, मंत्रों के अर्थ-पर-अर्थ निकलते रहते हैं – निकालते जाओ। इस कारण इस श्रीमद्भगवद्गीता पर इतने भाष्य, टीक, व्याख्या आईं जिनकी गिनती ही नहीं की जा सकती।

          एक बार तो एक व्यक्ति मुझसे मिला और बोला कि उसने भी श्रीमद्भगवद्गीता पर लिखा है जिसमें उसने श्रीकृष्ण की हर बात को काट दिया है।  ऐसे लोग भी बहुत हैं। मैंने कहा-  बहुत अच्छी बात है, मुझे एक नमूना तो बताइये, मुझे भी ज्ञान हो। उसने कहा- मैं मार्क्स की विचारधारा का आदमी हूँ। यह श्रीमद्भगवद्गीता तो पूरी तरह पूंजी वाद का समर्थन करती है और वही पढ़ाती है। मैंने कहा अच्छा! कहाँ लिखा है श्रीमद्भगवद्गीता में, मुझे भी बताओ। उसने बताया लिखा तो है उसमें, तुम लोगों का जो प्रसिद्ध श्लोक है  कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ...... बड़ी-बड़ी कंपनी के लोग अपने कर्मचारियों से कहते हैं कि तुम लोगों का अधिकार केवल कर्म में है, उसके फल पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है उस पर पूरा अधिकार हमारा है। ऐसा अर्थ निकालने वाले लोग भी हैं, कैसे-कैसे अर्थ निकाल लेते हैं, अब उन्हें कौन बताए कि यह श्लोक केवल कर्मचारी के लिए नहीं मालिक के लिए भी है, उसका भी अधिकार केवल कर्म पर है फल पर नहीं। अब, जब ऐसे-ऐसे अर्थ निकालने वाले लोग हैं, अनेक मत-मतांतर हैं, विचारधारा के लोग हैं तब अर्थ और अनर्थ के साथ अनेक भाष्य और अर्थ तो होंगे ही।

          तब कठिनाई यह है कि हम, साधारण जन कौन-सा अर्थ लगाएँ और किसे पढ़ें? जो अर्थ योग सम्मत है, शास्त्र सम्मत है, गुरु परम्परा सम्मत है वही ग्रहणीय है। और यह समझने का एक ही सिद्धान्त है। जब हम श्रीमद्भगवद्गीता को पढ़ेंगे-समझेंगे तब हम कौन-सी मुख्य बात ध्यान में रखें? श्रीमद्भगवद्गीता का एक संदेश सब के लिए है, चाहे जिस विचारधारा के हों, और वह है उद्धरे दात्मना आत्मानम नात्मनमवसादयेत ......। इसको हम ध्यान में रखें। भगवान कहते हैं –अपना उद्धार तुम्हें स्वयं करना चाहिए। आप अपना पतन मत कराओ। यह ध्यान रखो कि तुम तुम्हारे सबसे बड़े मित्र हो और तुम ही  तुम्हारे सबसे बड़े शत्रु भी हो। यह सिद्धान्त हम अपने सामने रखकर पढ़ें, श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश इस सिद्धान्त के अनुसार हो, तत्व ज्ञान की दृष्टि से और व्यवहार की दृष्टि से और हमारा उद्धार कैसे होगा इस दृष्टि से। हमें इस  बात पर ध्यान रखना है। इसमें हमारे उद्धार का एक मार्ग होता है तत्व ज्ञान से, यह तत्व ज्ञान स्पष्ट होना चाहिए। यह तत्व ज्ञान केवल किताबों में, पुस्तकों में, ग्रन्थों में, पुस्तकालय में नहीं होना चाहिए, यह हमारे प्रत्यक्ष जीवन में होना चाहिए। यह श्रीमद्भगवद्गीता साक्षात तत्व ज्ञान है क्योंकि यह सारे उपनिषदों का सार है लेकिन इसके साथ ही जीवन जीने की कला की एक निर्देशिका भी है। यह श्रीमद्भगवद्गीता की पहली  विशेषता है कि इसमें तत्व ज्ञान है और इसमें व्यवहारिकता भी है कि हम अपने जीवन में कैसे ऊँचे उठें? 

          दूसरी बात, श्रीमद्भगवद्गीता सब को निमंत्रण देती है कि आप इसमें आओ। जो जिस स्तर पर है उसे उसी स्तर पर साधना का उपदेश दिया गया है और आगे का मार्ग बताया गया है। सब को एक ही प्रकार का उपदेश नहीं दिया जा सकता। यह श्रीमद्भगवद्गीता की विशेषता है। श्रीमद्भगवद्गीता उपनिषदों का सार होते हुए भी एक बहुत बड़ा फर्क है। उपनिषद, जिनका पठन-पाठन हुआ वे किसी शांत वातावरण, गंगा के किनारे, हिमालय की कन्दराओं में नहीं हुआ। आश्रम में गुरु बैठे हैं – शिष्य आ रहे हैं, जा रहे है, पठन-पाठन कर रहे हैं, ऐसे शिष्य जिन्होंने जीवन को देख लिया है, परम विरक्त है, केवल ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं केवल वही है - श्रीमद्भगवद्गीता की पृष्ठभूमि यह नहीं है। तब श्रीमद्भगवद्गीता की पृष्ठभूमि क्या है? युद्ध का मैदान, दोनों ओर सेनाएँ खड़ी हैं, हलचल मची है, अनेक प्रकार की  आशाएँ, अपेक्षाएँ, निराशा, भय, चिंता सब कुछ है, जैसा एक युद्ध के वातावरण में होता है। ऐसे वातावरण के बीच अर्जुन को मोह हो रहा है, यह कोई विरक्त शिष्य नहीं है, वह तो मोहग्रस्त है, शोकग्रस्त है, भ्रमित है, और इस समय भगवान श्री कृष्ण उसे सीखा रहे हैं।   इस कारण श्रीमद्भगवद्गीता के साथ हमारी कुछ एकात्मता हो जाती है, क्योंकि हम भी दिन-रात युद्ध के मैदान में ही खड़े हैं। हम भी मोहित, भ्रमित, शोकग्रस्त,  चिंतित, भयभीत होते रहते हैं, प्रतिदिन, क्षण-क्षण। इस कारण श्रीमद्भगवद्गीता हमें अपने पास की लगती है। अतः हमें  किसी प्रकार का आग्रह-दुराग्रह नहीं रखना है। और तत्व ज्ञान, व्यावहारिक जीवन, कर्मयोग जो भक्ति की मिठास से ओतप्रोत है उसी-से हमें अपना उद्धार करना है इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमें श्रीमद्भगवद्गीता को समझना है।

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उपयोगी                                                                 मेरे विचार 

पहले यह समझ लेना चाहिये कि मनुष्य किसे उपयोगी मानता है; उपयोगी किसके लिये? किसके प्रति? किसलिये?

          उत्तरोत्तर, वे जातियाँ जो अपने को सभ्य समझती हैं, उसी चीज को उपयोगी कहती हैं जो धन ला सके, धन कमा सके या धन पैदा कर सके। सब का निर्णय और मूल्यांकन उसी एक आर्थिक दृष्टिकोण से किया जाता है। इसे ही उपयोगितावाद कहते हैं। यह रोग बहुत ही संक्रामक है। बड़े-बूढ़ों-जवानों के बाद यह युवाओं को डंसने में लगा है और इसका प्रकोप बच्चों में भी दिखने लगा है।  बच्चे भी इससे अछूते नहीं रहने वाले।

          इस उम्र में, जब कि सुन्दरता, भव्यता और पूर्णता के सपने संजोये जाने चाहिये, ऐसे सपने जो शायद सामान्य अर्थों से कहीं अधिक उदात्त होते हैं, निश्चय ही कुण्ठित और सामान्य बुद्धि से उच्चतर हैं, लेकिन इसके विपरीत आजकल बच्चे पैसे के सपने देखते हैं और उसे कमाने के साधनों के बारे में चिन्तातुर रहते हैं। इसी तरह, जब वे अपनी पढ़ाई के बारे में सोचते हैं, तो उस सब पर विचार करते हैं जो आगे चलकर उनके लिये उपयोगी हो सके, ताकि जब वे बड़े हों तो बहुत-सा धन कमा सकें। और परीक्षाओं में सफल होने के लिये तैयारी करना उनके लिये बहुत महत्वपूर्ण बन गया है, क्योंकि डिप्लोमा, सर्टिफिकेट और उपाधि ही उन्हें उच्च पद प्राप्त करा सकते हैं। इनकी सहायता से धन भी खूब कमा सकते हैं। उनके लिये पढ़ाई का न कोई और उद्देश्य है, न महत्व।

          ज्ञान के लिये सीखना, प्रकृति और जीवन के रहस्यों को जानने के लिये पढ़ना, चेतना को विकसित करने के लिये अपने-आपको शिक्षित करना, आत्म प्रभुत्व पाने के लिये स्वयं को अनुशासित करना, अपनी दुर्बलताओं, अक्षमताओं और अज्ञताओं को अतिक्रम करने के लिये पढ़ना, जीवन में अधिक उच्च, विशाल, उदार और सच्चे उद्देश्य की ओर बढ़ने के लिये अपने आपको तैयार करना... यह तो वे सोच ही नहीं सकते, इसे तो वे कपोल-कल्पना ही मानते हैं। बस, एक ही चीज महत्वपूर्ण है - व्यावहारिक होना, धन कमाना सीखना और उसके लिये अपने को तैयार करना। यही सीख रहे हैं, यही सीखा रहे हैं।

          लेकिन इसके लिए बच्चों या युवा पीढ़ी को दोष देना अपने आप को दोषमुक्त का प्रमाण पत्र देना है।  यह बात उनके जेहन में हम ही कूट-कूट कर भरते हैं। जब बच्चा इन सबसे अंजान अधिक उच्च, विशाल, उदार और सच्चे उद्देश्य की ओर बढ़ने के लिये अपने आपको तैयार कर रहा होता है, ये हम ही हैं जो उन्हें अपनी करनी और बरनी से समझाते हैं कि जीवन में सब-कुछ धन कमाना ही है, सब निर्णय का आधार धन का आना ही है, उपयोगीता की एकमात्र कसौटी धन ही है। ऐसे बच्चे तो परिवर में कष्ट, कलह, अशांति लाकर उसे अपूर्ण और अनुपयोगी ही बनाएँगे।  

          क्या बच्चों में ऐसे संस्कार नहीं डाले जा सकते हैं जो उनमें एक उच्चतर और श्रेष्ठतर जीवन की अभीप्सा पैदा करें, जिनमें ज्ञान और पूर्णता की प्यास हो, जो एक पूर्णतर सच्चे भविष्य की ओर उत्कटता से निहारें! क्या ये एक परिवार को अधिक पूर्ण, अधिक सुखमय, अधिक शांतिमय, अधिक खुशहाल और अधिक उपयोगी नहीं बनाएँगे?

(श्रीमाँ के कथन पर आधारित)

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बस बहुत हुआ                                           लघु कहानी - जो सिखाती है जीना

पैंतीस वर्षों की छोटी सी उम्र में वह सब हासिल कर लेना जिसकी चाहत हर दिल में होती है,  दुनिया जिसे सफलता (सक्सेस) कहती है,  एक उपलब्धि है। एक संस्था (कंपनी) में सीईओ, लाखों का वेतन, अपनी मर्जी से जिंदगी को जीने की पूरी छूट। खूबसूरत बीवी, बच्चा, नाम, शोहरत......कुछ और सोचने का वक्त ही कहाँ था। सब कुछ तो ठीक ही चल रहा था कि एक दिन जब पार्टी में उस लड़की ने उसे पहचानने से इन्कार करते हुए पूछा कि “वह कौन है?” उसकी जिंदगी मानों उसी सवाल में ठहर गई।

          वह कौन है? अपने चेहरे पर उग आए सवाल को मिटाना चाहा तो हर बार कोई रिश्ता, कोई उम्मीद, कोई लक्ष्य सामने आ जाता। इस सब में वह खुद कहाँ छूट गया! कब का वह भूल ही चुका था कि उसके शौक (हौब्बीज) क्या हैं? अब तो कॉर्पोरेट सैक्टर की पार्टियां और प्रोजेक्शन ही उसकी हॉबीज़ होकर रह गई हैं। फेस बुक से लेकर ट्विटर तक दोस्तों की संख्या हजारों में है, लेकिन एक कंधा ऐसा नहीं जिस पर अपने मन का अकेलापन बिता सके। अपने ही भीतर छुपी इस तलाश को वो समझ ही नहीं पाया। कितनी आसानी से हमने जिंदगी जीते-जीते जीवन के अर्थ ही गुमा दिये। हमारे सीने में बची रह गई बस कुछ साँसे, कुछ रिश्ते, कुछ लोगों की उम्मीदें और हम बन गए उन्हें पूरा करने की मशीन। बहुत हुआ, अब मैं सचमुच जीना चाहता हूँ। कितना मन था कि बच्चों का एक ऐसा स्कूल खोलूंगा, जिसमें किसी बच्चे को कोई फीस नहीं देनी होगी। जहाँ उसकी पसंद के सारे काम उन्हें सिखाये जा सकेंगे। ऐसे बच्चे जिनकी  दूसरी दुनिया में कोई जगह नहीं है। खिलखिलाहटों के बीच दुनिया को रोशन करने का ख्याल कितना लुभावना था उसे के लिए, लेकिन सफलता (सक्सेस) की  दौड़ में न जाने कहाँ छूट गए सारे ख्वाब। अनजाने ही धूल खाये गिटार पर हाथ चला गया था। 

(उजाले के गाँव में से)

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कारावास की कहानी-श्री अरविंद की जुबानी                                        धारावाहिक

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। इसके रोचक अंश हम जनवरी २०२१ से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसकी चौदहवीं किश्त है।)

 

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आसामियों की पहचान - 1

आसामियों को पहचानने की व्यवस्था भी बड़ी रहस्यमय थी। पहले साक्षी से पूछा जाता, तुम इनमें से किसी को पहचान सकोगे? साक्षी यदि कहते, हाँ, पहचान सकता हूँ तो नॉर्टन साहब हर्षोत्फुल्ल हो तुरंत कठघरे में Identification parade (पहचान-परेड) की व्यवस्था करा वहाँ उन्हें अपनी स्मरणशक्ति को चरितार्थ करने का आदेश देते। यदि वे कहते, पता नहीं, शायद पहचान भी लूँ, तो ज़रा नाराज़गी से कहते, अच्छा, जाओ, चेष्टा करो। यदि कोई कहता, नहीं, नहीं कर सकूँगा, मैंने उन्हें नहीं देखा या ध्यान नहीं दिया तो भी नॉर्टन साहब उन्हें न छोड़ते। शायद इतने चेहरे देख पूर्वजन्म की कोई स्मृति ही जाग्रत् हो जाये इसलिए उसे परीक्षा करने को भेज देते। साक्षी में वैसी योगशक्ति नहीं थी, शायद पूर्वजन्मवाद में आस्था भी नहीं, वे आसामियों की दीर्घ दो पंक्तियों के बीच सार्जेंटों के नेतृत्व में, शुरू से अन्त तक गम्भीर भाव से कूच करते हुए, हमारे चेहरों को बिना देखे ही सिर हिला कर कहते नहीं, नहीं पहचानता। निराश हृदय नॉर्टन इस मत्स्यशून्य जीवन्त जाल को समेट लेते। मनुष्य की स्मरणशक्ति कितनी प्रखर और अभ्रान्त हो सकती है इसका अपूर्व प्रमाण मिला इस मुक़द्दमे में। तीस-चालीस आदमी खड़े हैं, उनका नाम नहीं पता, किसी भी जन्म में एक बार भी उनके साथ बातचीत नहीं हुई, फिर भी दो मास पहले किसे देखा है, किसे नहीं देखा, अमुक को अमुक तीन जगह देखा, अमुक दो जगह नहीं; एक बार उसे दाँत माँजते हुए देखा था इसलिए उसका चेहरा जन्म-जन्मान्तर के लिए मेरे मन में अंकित रह गया है। इन्हें कब देखा, क्या कर रहे थे, कौन साथ थे, या एकाकी थे, कुछ भी याद नहीं, फिर भी उनका चेहरा मेरे मन में जन्म-जन्मान्तर के लिए अंकित है; हरि को दस बार देखा है इसलिए उन्हें भूलने की कोई सम्भावना नहीं, श्याम को एक बार सिर्फ आधे मिनट के लिए देखा लेकिन उसे भी मरते दम तक नहीं भूल सकूँगा, भूल-चूक होने की कोई सम्भावना नहीं, ऐसी स्मरण  शक्ति इस अपूर्ण मानव प्रकृति में इस तमोभिभूत मर्त्य धाम में साधारणतः नहीं मिलती। एक नहीं, दो नहीं, प्रत्येक पुलिस पुंगव में ऐसी विचित्र निर्भूल, अभ्रान्त स्मरणशक्ति देखने को मिली। इससे सी.आई.डी. पर हमारी श्रद्धा भक्ति दिन-दिन प्रगाढ़ होने लगी। अफ़सोस है, सेशन्स कोर्ट में वह भक्ति कम करनी पड़ी थी। मजिस्ट्रेट को कोर्ट में दो-एक बार सन्देह न हुआ हो ऐसी बात नहीं। जब यह लिखित गवाही देखी कि शिशिर घोष अप्रैल में बम्बई में थे और ठीक उसी समय कुछ एक पुलिस पुंगवों ने उन्हें स्कॉट्स लेन और हैरिसन रोड पर भी देखा तब थोड़ा-सा सन्देह तो हुआ ही था। जब श्रीहट्टवासी वीरेन्द्रचन्द्र सेन स्थूल शरीर से बनियागंज में पितृभवन में रहते हुए भी बागान में और स्कॉट्स लेन में- जिस स्कॉट्स लेन का पता वीरेन्द्र नहीं जानते थे, इसका अकाट्य प्रमाण लिखित साक्ष्य में मिला था- उनका सूक्ष्म शरीर सी.आई.डी. की सूक्ष्म दृष्टि ने देखा था, तब और भी सन्देह हुआ था। विशेषकर जिन्होंने स्कॉट्स लेन में कभी भी पदार्पण नहीं किया, उन्होंने जब सुना कि पुलिस ने उन्हें वहाँ कई बार देखा है, तब सन्देह का उद्रेक होना कुछ अस्वाभाविक नहीं।                                                                               (क्रमशः आगे अगले अंक में)

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शनिवार, 1 जनवरी 2022

सूतांजली जनवरी 2022

 सूतांजली

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वर्ष : ०५ * अंक : ०६                      🔊(२३.१४)                                          जनवरी    * २०२२

परिवर्तन के कारण नये युग का आना,

पुराने युग की अवहेलना नहीं है,

पुराने युग का विस्तार है नया युग। 

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नया सवेरा                                                                  मैंने पढ़ा



द्वाभा ने समुद्र के पीछे से झाँक कर प्रातः को निहारा, आलसी बादलों को देखा, नीचे खिले पुष्पों पर टकटकी बांधी, हरीतिमा की मन-ही-मन प्रशंसा की और अंत में पवन को धन्यवाद दिया जो सब  को बाहों में लिये झूला झुला रहा था। सब मस्ती में सो रहे थे, बाँस के पेड़ तो खर्राटे तक भर रहे थे। सब को गहरी नींद में देख वह मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुई और चुपके से बिना पदचाप किये समुद्र के पीछे से होती हुई आकाश तक आ गयी। यहाँ  विराजमान होने के पहले उसने अपनी वही शैतानी दोहरायी। साथ लाये हुए गुलाल को पहले निकटवर्ती बादलों पर छिड़का और फिर जिधर दृष्टि घूमी वहीं गुलाल की वर्षा कर दी।

          पवन ने देखा कि द्वाभा ने अपना कार्य कर लिया तो उसने अपनी गति जरा मंद करके ऊपर ताका। चारों तरफ गुलाल-ही-गुलाल बिखरा हुआ। यह देख पवन का भी सीना जरा तन गया और उसने सोचा: अगर मैं प्रकृति को झूला झुला कर न सुला देता तो भला द्वाभा अपनी शैतानी किस तरह कर पाती ?"

          इधर सूर्य भी गुलाल की छटा को देख मुस्कुरा उठा। उसकी एक मुस्कान ने बहुत से गुलाल को इस तरह समेट लिया जैसे धूप के आते ही ओस की बूंदें उसमें सिमट जाती हैं। आलसी बादलों ने धीरे से आँखें खोलीं। अपने ऊपर गुलाल देख उन्होंने द्वाभा को फिर से मन-ही-मन कोसा और एक भीगे हुए विहंग की भांति अपने पंखों को झाड़ते हुए गुलाल निकालने का प्रयत्न करने लगे। लेकिन वह साधारण गुलाल तो था नहीं जो यूँ साफ हो जाता। हारकर, अपने पंखों को समेट वे सूर्य के अधरों की ओर ताकने लगे जो एक ही मुस्कान में सारे गुलाल को समेट लेते हैं।

          धरती ने भी आँखें खोलीं और अपनी क्रोड में सोये फूल-पत्तों को जगाया। अपने ऊपर बिखरी लालिमा देख संपूर्ण धरती हर्ष से पुलकित हो उठी, उसके लिये तो यह श्रीमाँ का स्पर्श और आशीर्वाद था। चिड़िया अपने-अपने घोंसलों से निकल कर उस दिव्य शक्ति का स्वागत गान करती इधर से उधर नाचने लगीं। नीरव पुष्प अभीप्सा की अंजलि लिये ऊपर की ओर टकटकी लगाये उस महान् शक्ति का आवाहन करने में लग गये। नेत्रों को सुख देनेवाली हरीतिमा मानों पर खोलते हुए पक्षी की तरह पत्ते खोलकर उड़ने के लिये उद्यत हो रही थी।

प्रत्येक प्राणी में से, प्रत्येक वस्तु के अंदर से एक अभीप्सा उठ रही थी। ऐसा लगता था कि संपूर्ण पृथ्वी से एक सामूहिक, शांत, नीरव प्रार्थना का मधुर गुंजन उठ रहा हो। समस्त वातावरण होमाग्नि की जिह्वाओं की भांति ऊपर की ओर उठ रहा था। यह सारा दृश्य देख मेरा मन अधीर हो उठा।....

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... अंदर प्रवेश करते ही माँ भगवती के साक्षात् दर्शन हुए। बादल का ही एक ऊँचा उठा हिस्सा उनका सिंहासन था। उनके आस-पास कोई भौतिक वस्तु न थी। उनके पास पहुँचते ही मैंने संपूर्ण श्रद्धा भाव से अपने आपको श्रीमाँ के चरणों में सौंप दिया। मुझे आशीर्वाद देते हुए उन्होंने मुझे अपने बिलकुल पास बैठा लिया। कुछ पलों तक वे मुझे केवल देखती रहीं, फिर अचानक बोलीं: "तुमने भी निर्वाण ले लेने की ठानी है?"

          माँ ने जब देखा कि मैं उनके प्रश्न को ठीक तरह से समझ नहीं पायी तो वे फिर बोलीं: "जानती हो निर्वाण किसे कहते हैं? यह वह अवस्था है जिसमें मनुष्य धरती की सब वस्तुओं को छोड़-छाड़ कर अपनी इच्छाओं पर विजय पाकर धरती के कोलाहल से दूर हो जाता है। वह स्वयं तो ऊपर आ जाता है लेकिन अपने पीछे वालों को उसी अंधेरे कुएँ में पड़ा रहने देता है।"

          "हाँ, मैं भी .... वगैरह किसी का ख्याल किये बिना अकेली ही आ गयी थी। उन्हें तो उस समय मैं ऐसे भूल गयी मानों कभी जाना ही न हो। हाँ, मेरा कर्तव्य यही होगा कि पुनः धरती पर जाकर अपनी सभी सखियों को बदल कर उनके साथ आऊँ। लेकिन क्या सब यहाँ आने को सहमत होंगी?" मैंने मन में सोचा।

          "नहीं, पहले उनके अंदर तुम्हें वह अभीप्सा जगानी होगी जिसके आगे संसार के सब सुख नगण्य लगने लगें। तब तुम रहस्य को पाने के लिये तैयार हो जाओगी और तुम्हें यहाँ आने की जरूरत न होगी। तुम्हारी सच्ची पुकार सुनकर मुझे ही धरती पर दौड़ते हुए आना पड़ेगा। जाओ, मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ हैं, मेरी सच्ची सेविका बनकर कार्य करना। मैं तुम्हारे भीतर इतनी शक्ति दे रही हूँ कि बिना धागे के आकाश में आजादी से विचर कर मेरा संदेश सुना सको। अब तुम किसी बंधन में न रहोगी।...

                              “मैं हूँ पतंगे कागजी, डोर है उसके हाथ में,

                                        चाहा इधर घटा दिया, चाहा उधर बढ़ा दिया।”

(वंदनाजी, श्रीअरविंद की साधिका हैं और वर्तमान में श्रीअरविंद सोसाइटी से निकलने वाली पत्रिका अग्निशिखा की संपादिका हैं। यहाँ उनके लेख का प्रारम्भिक और अंतिम अंश दिया गया है। स्व का चिंतन हमें अकेले को स्वर्ग में ले जाता है लेकिन जब हम सर्व का चिंतन करते हैं तब स्वर्ग ही धरा पर अवतरित हो जाती है। श्रीअरविंद ने कहा था कि अगर कहीं स्वर्ग है तो मै उसे धरा पर ही लाऊँगा, मुझे स्वर्ग यहीं चाहिए – सं.।)

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निर्भीक



निर्विवाद रूप से अगर हम भरत के निर्भीक व्यक्तियों की सूची बनाएँ तो जनरल बिपिन रावत, चीफ़ ऑफ डीफ़्फेंस स्टाफ, का नाम अग्रणी नामों में होगा। यह नाम उनके कुछ कार्यों या कुछ वक्तव्यों के कारण नहीं बल्कि जिस तरह उन्होंने एक निर्भीक व्यक्तितत्व का जीवन जिया उसके लिए होगा। राहुल सिंह और शिव अरूर की पुस्तक इंडियाज मोस्ट फियरलेस्स  पुस्तक में उनके द्वारा लिखी हुई प्रस्तावना अभी कुछ दिन पहले 

व्हाट्सएप्प में मुझे प्राप्त हुई। मैं उसे यहाँ छापने  से अपने आप को नहीं रोक पा रहा हूँ। जनरल ने निर्भीकता का अर्थ समझाने के लिए महात्मा गाँधी की उक्ति उद्धृत की है,

निर्भीकता आध्यात्मिकता की पहली शर्त है। डरपोकों की कोई नैतिकता नहीं होती।

प्रश्न है क्या हम जनरल रावत से ज्यादा बहादुर, निर्भीक और समझदार हैं?

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बापू की कमी खलती है

 (गाँधी को याद करने वालों की कमी नहीं... और समय के साथ उनको याद करने वालों की संख्या में भी लगातार वृद्धि हो रही है। लेकिन जैसा और जिस प्रकार मयंक सक्सेना याद करते हैं वैसा कितने लोग याद करते है...? अगर आप गाँधी को याद करने वालों में नहीं हैं तो पहले खुद अपनी निगाहों से उसको जानिये।)

मैं खाँटी वामपंथी हूँ बापू, लेकिन न मालूम क्यों सालों से हर रोज तुम्हें महसूस करता हूँ... कम्यूनिस्ट हो जाने के बाद और शिद्दत से... और हिन्द स्वराज के कुछ हिस्सों में उतर जाने के बाद  मिशनरी तरीके मैं तुम्हारे बारे में जिद करता हूँ... मैं सोचता हूँ कि तुम होते तो आज एफडीआई को लेकर क्या कहते... मैं पूछता हूँ कि क्या तुम दुबारा गुजरात में ही पैदा होना चाहते... क्या तुम नरोडा में  जाकर उपवास करने लगते... 

          लेकिन बापू वे तुमको बताते हैं मजबूरी का नाम, क्या मजबूरी थी तुम्हारी बापू, मोहनदास होने के बावजूद तुम जाकर बैठ गए थे जलते हुए नोआखाली में... तब जब पूरा मुल्क तुम्हारा दिल्ली में इंतजार करता था। बापू जब तुम्हारी वह पार्टी, जिसे तुमने भंग कर देने की सिफ़ारिश की थी, दिल्ली में आजादी का जश्न मना रही थी... तुम उपवास कर रहे थे कि नोआखाली में दंगे रुक जाएँ, लोग अपना ही खून बहाना बंद करें... कभी तुम्हारे जिस रास्ते में फूल फेंके जाते थे, वहाँ काँच की बोतलें फेंकी जा रही थीं और तुम बता रहे थे कि दरअसल महात्मा होना क्या होता है... तुम चाहते तो जा सकते थे दिल्ली, लेकिन आखिर क्यों किस मजबूरी के तहत तुम वहाँ जान जोखिम में डाल कर बैठे रहे, तुम दिल्ली नहीं लौटे... लौटे तो शांति स्थापित करवाकर... इंसान से दरिंदा बने वे लोग फिर से इंसान बन गए थे, क्या इसी को करिश्मा कहते हैं... हम वामपंथी ईश्वर को नहीं मानते, लेकिन इस करिश्मा को करिश्मा जरूर मानते हैं... बापू शायद तुम्हारे राम कोई और थे, वे कहानियों वाले राम तो नहीं थे।

          कहानी वाले राम से बापू बड़ा डर लगता है... लेकिन बापू तुमने जो चंपारण में किया... नोआखाली में किया... हम वामपंथी न सिंगूर में, नंदीग्राम में कर पाये... और न ही कर पाये गुजरात में, ये तो हमारा ही काम था दरअसल... और मालूम है, जिन्होंने तुमको मारा था, उन्होंने ही इस बार भी तुमको मारा, फिर से कत्ल कर दिया... फर्क बस ये था कि इस बार वे  हे राम के नारे लगा रहे थे... लेकिन हम सोचते हैं कि अगर तुम होते तो क्या करते बापू... क्या नरसंहार के दोषियों के  हाथों अपने आश्रम का जीर्णोद्धार करवाते... क्या तुम अभी भी काँग्रेस को राजनीति में बने रहने देते... बापू क्या कहते तुम जो गुवाहाटी में हुआ उस पर... क्या  तुम चाहते कि लोग टोपियों पर तुम्हारा नाम लिख कर उछालते रहते... बापू हमारा काम तुमने किया... हम अपना काम करना अभी तक सीख नहीं पाये हैं... ।

          बापू तुम्हारी बहुत याद आती है, जब इंसान को मजहब में बंटा देखता हूँ... मैं तुम्हारे राम को नहीं मानता, लेकिन यह जरूर मानता हूँ कि उसके नाम पर कत्ल भी नहीं होने चाहिये... मैं भी चाहता  हूँ कि तुम होते तो शायद आज भी गरीबों के... किसानों के साथ खड़े होते... भले ही अपने लोगों के खिलाफ खड़ा होना पड़ता... तुम्हारा पहला आंदोलन भी किसानों के लिए ही था न, वो चंपारण वाला... तुम कहते थे न कि मशीनों को इंसानों का रोजगार छीनने की छूट नहीं होनी चाहिये, बापू अगर तुम बदल सकते हो तो आ जाओ... और नहीं बदल सकते ... तो मेरे जेहन में भी आना छोड़ दो...  

          बापू तुम्हारी पार्टी और साथी एफडीआई के साथ होते, तो क्या तुम भी उनके साथ खड़े हो जाते... क्या तुम किसानों की जमीन छीनकर विकास करने के सपने से सहमत हो जाते... जल, जंग और जमीन की लड़ाई के सत्याग्रह पर किसी भी वामपंथी से पहला हक क्या तुम्हारा नहीं होता बापू... बापू तुम्हारी कमी बेहद खलती है, खासकर तब, जब गाँधी के नाम से लेकर लेनिन और मार्क्स तक का नाम लेने वाले ये सब भूल गये हैं कि उनको दरअसल करना क्या है... बापू पूरे देश के गाँव चंपारण हो गये हैं और न जाने कितने इलाके नोआखाली बन चुके हैं... बापू क्या तुम देखना चाहते थे ऐसा आजाद भारत, जो आगे बढ़ते-बढ़ते फिर से मध्य युग में पहुँच जाये...

          तुम हिन्द स्वराज को लेकर नेहरू और पटेल सबसे बहस करते थे न बापू, लेकिन अब उस किताब पर कोई बहस नहीं होती... वो लाइब्रेरी के उदास कोनों में धूल खाती है... स्वराज एक उपेक्षित शब्द है... ठीक महात्मा की तरह... और हाँ अब तुम मजबूर भी नहीं रहे... तुम्हें शायद पता नहीं हो, लेकिन हाल ही में क्षेत्र और धर्म की राजनीति करने वाले एक शख्स को इस देश का नया महापुरुष घोषित किया गया... बताया भी गया कि उनके देहांत पर बापू के देहांत से ज्यादा लोग जुटे... बापू हिंसा, अलगाव और सरकारी दमन इस देश का नया धर्म है... परम धर्म... अहिंसा, एक टूटा हुआ सपना है... जिसे हमारी सरकार ने साबरमती आश्रम और डाक टिकटों में हिफाजत से सहेज दिया है...

          आज भी साम्यवादी के तौर पर १०० में से ९० बार मेरी तुमसे मुठभेड़ होती है, और चाहता हूँ कि झूठ बोल दूँ पर ८० बार तुम जीतते हो बापू... ८० बार... तुम्हारी ही बात को मैं अपने शब्दों में कहता हूँ हर जगह कहता हूँ कि १०० में से ९९ रास्ते अहिंसा के हैं एक आखिरी रास्ता हिंसा का है... लेकिन वो आखिरी है... और दुनिया के ९९ मसले पहले ९९ रास्तों से हल हो सकते हैं...

          बापू मैं तुम्हें अक्सर देख भी पाता हूँ... कभी दशरथ मांझी में कभी इरोम शर्मिला में... और अभी हाल ही में मैंने हरदा और खंडवा में १०० से ज्यादा गाँधी देखे थे... बापू तुमने सच कहा था... और मालूम है मैं ही यह नहीं मानता, भगत सिंह भी मानते थे... लेनिन भी... और बाकी सब भी...                             ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

असली पूंजी                                       लघु कहानी (संस्मरण) - जो सिखाती है जीना

गाँधीजी देश भर में भ्रमण कर चरखा संघ के लिए धन इकट्ठा कर रहे थे। अपने दौरों के दौरान वे उड़ीसा में  एक सभा को संबोधित करने पहुँचे। उनके भाषण के बाद एक बूढ़ी गरीब महिला खड़ी हुई, उसके बाल सफ़ेद हो चुके थे, कपड़े फटे थे और वह कमर से झुक कर चल रही थी, किसी तरह वह भीड़ से होते हुए गाँधीजी के पास पहुँची।

मुझे गाँधी को देखना है’, उसने आग्रह किया और उन तक पहुँच कर उनके पैर छूए।

फिर उसने अपनी साड़ी के पल्लू में बंधा एक ताँबे का सिक्का निकाला और गाँधीजी के चरणों में रख दिया। गाँधीजी ने सावधानी से सिक्का उठाया और अपने पास रख लिया। उस समय चरखा संघ का कोश जमनालाल बजाज संभाल रहे थे। उन्होंने गाँधीजी से वह सिक्का माँगा, लेकिन गाँधीजी ने उसे देने से मना कर दिया।

मैं चरखा संघ के लिए हजारों रुपए के चेक / नगद संभालता हूँ,’ जमनालालजी ने हँसते हुए कहा, फिर भी आप मुझ पर इस सिक्के को ले के यकीन नहीं कर रहे हैं?’

यह ताँबे का सिक्का उन हजारों से कहीं अधिक कीमती है गाँधीजी बोले, यदि किसी के पास लाखों है और वह हजार-दो हजार दे देता है तो उसे कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन ये सिक्का शायद उस औरत की कुल जमा-पूंजी थी। उसने अपना सारा संसार दान दे दिया। कितनी उदारता दिखाई उसने। कितना बड़ा बलिदान दिया उसने!!! इसलिए इस ताँबे के सिक्के का मूल्य मेरे लिए एक करोड़ से भी अधिक है

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कारावास की कहानी-श्री अरविंद की जुबानी                                        धारावाहिक

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। इसके रोचक अंश हम जनवरी २०२१ से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसकी तेरहवीं किश्त है।)

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गवाहों की श्रेणियाँ

जो गवाही देने आये थे उन्हें तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है। पुलिस और गोयन्दा, पुलिस के प्रेम में आबद्ध निम्न श्रेणी के लोग और सज्जन, और तीसरे अपने दोषवश पुलिस-प्रेम से वञ्चित, अनिच्छा से आये हुए गवाह । हर श्रेणी का गवाही देने का ढंग था अलग-अलग। पुलिस महोदय प्रफुल्ल भाव से, अम्लान वदन अपने पूर्व ज्ञात वक्तव्यों को मनमाने ढंग से बोल जाते, जिसे पहचानना होता पहचान लेते-कोई सन्देह नहीं, दुविधा नहीं, भूल-चूक नहीं। पुलिस के संगी-साथी अतिशय आग्रह के साथ गवाही देते, जिसे पहचानना होता उसे भी पहचान लेते और जिसे नहीं पहचानना होता उसे भी बहुत बार अतिशय उत्सुकतावश पहचान लेते। अनिच्छा से आये गवाह जो कुछ जानते होते वही कहते, लेकिन वह बहुत थोड़ा होता; नॉर्टन साहब उससे असन्तुष्ट हो और यह सोच कर कि साक्षी के पेट में अपार मूल्यवान् और सन्देहनाशक प्रमाण हैं, जिरह के बल पर उसका पेट चीर उन्हें बाहर निकालने की भरपूर चेष्टा करते । इससे साक्षी महाविपद् में पड़ जाते। एक ओर नॉर्टन साहब की गर्जना और बर्ली साहब की लाल-लाल आँखें, दूसरी ओर झूठी गवाही दे देशवासियों को कालेपानी भेजने का महापाप। गवाहों के सामने एक गुरुतर प्रश्न उठ खड़ा होता, नॉर्टन और बर्ली को खुश करें या भगवान् को। एक तरफ़ क्षणस्थायी विपत्ति- मनुष्यों का कोप, दूसरी ओर पाप का दण्ड-नरक और परजन्म में दुःख। लेकिन वे सोचते, नरक और परजन्म तो दूर की बातें हैं, मनुष्यकृत विपद् तो उन्हें अगले क्षण ही ग्रस सकती है। बहुतों के मन में यह डर था कि मिथ्या साक्ष्य देने के लिए राजी न होने पर भी मिथ्या साक्ष्य के अपराध में पकड़े जायेंगे, क्योंकि ऐसे स्थलों पर परिणाम के दृष्टान्त विरल नहीं। अतएव इस श्रेणी के साक्षियों को जो समय साक्षी के कठघरे में अतिवाहित करना पड़ता वह उनके लिए विलक्षण भीति और यन्त्रणा का समय होता। जिरह शेष होने पर उनके अर्द्ध-निर्गत प्राण फिर से देह में लौट उन्हें यन्त्रणामुक्त करते। कुछ एक साहस के साथ गवाही देते, नॉर्टन की गर्जना की परवाह न करते, अंगरेज परामर्शदाता भी यह देख जातीय प्रथा का अनुसरण कर नरम पड़ जाते। इस तरह कितने ही साक्षी आये, कितनी तरह की गवाहियाँ दे गये, किन्तु एक ने भी पुलिस के लिए उल्लेखनीय कोई सुविधा नहीं की। एक ने साफ़ कहा- मैं कुछ नहीं जानता, समझ नहीं आता क्यों पुलिस मुझे ज़बरदस्ती खींच लायी है! इस तरह का मुक़द्दमा चलाना शायद भारत में ही सम्भव है, दूसरे देशों में जज इससे झुंझला उठते और पुलिस का गंजन कर अच्छा सबक सिखाते। बिना अनुसन्धान किये दोषी निर्दोष का विचार न कर कठघरे में खड़ा करना, अन्दाज़ से सौ-सौ साक्षी खड़े कर देश का पैसा बहाना और आसामियों को निरर्थक लम्बे समय तक कारा- यन्त्रणा में रखना इस देश की पुलिस को ही शोभा देता है। लेकिन बेचारी पुलिस क्या करे? वह तो नाम की गोयन्दा थी, उसमें जब वह क्षमता ही नहीं थी तो ऐसे साक्षियों के लिए एक विशाल जाल फेंक कर अन्दाज़ से उत्तम, मध्यम और अधम साक्षी फँसा कठघरे में खड़ा करना ही था एकमात्र उपाय। क्या मालूम शायद वे कुछ जानते हों, कुछ प्रमाण दे भी दें ?                                                   (क्रमशः आगे अगले अंक में)

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सूतांजली, अगस्त द्वितीय 2026, आकर्षक घर की कुंजी

  २कोई ऐसा अक्षर नहीं है, जिसका प्रयोग मंत्र-रचना में न हो सके , कोई ऐसा वृक्ष नहीं है, जो किसी न किसी व्याधि की औषधि न हो , कोई ऐसा...