शनिवार, 1 अक्टूबर 2022

सूतांजली अक्तूबर 2022

 सूतांजली

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वर्ष : 06 * अंक : 03                                                                अक्तूबर  * 2022

मुट्ठीभर संकल्पवान लोग,

जिनकी अपने लक्ष्य में दृड़ आस्था है,

इतिहास की धारा बदल सकते हैं

महात्मा गांधी

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पहली सीढ़ी...... शिक्षा का दायित्व....... वसंत                        मैंने पढ़ा

अभी-अभी दो कहानियाँ पढ़ीं, नवनीत में। दो नहीं बल्कि तीन। तीनों को एक साथ मिला कर पढ़ा, तीनों को एक दूसरे के साथ जोड़ कर पढ़ा। बहुत कुछ कहती हैं ये कहानियाँ-संस्मरण-घटनाएँ। मुझे लगता है आप भी समझ जाएंगे।

         पहली सीढ़ी

“एक राजकुमार जेन गुरु के पास शिक्षा प्राप्त करने पहुंचा और उन्हें प्रणाम कर बैठ गया और बोला - 'मुझे ज्ञान चाहिए और तुरंत' गुरु ने कहा- 'ठीक है कुछ प्रबंध करते हैं। पूछने पर पता चला कि राजकुमार को एक ही काम अच्छी तरह करना आता है और वह है शतरंज खेलना। जेन गुरू राजकुमार और अपने एक शिष्य, जिसे शतरंज का थोड़ा-बहुत ज्ञान था, के बीच एक बाजी का प्रस्ताव रखते हैं। शर्त यह होगी कि जो हारेगा उसका गला काट दिया जायेगा। खेल शुरू हुआ। राजकुमार शुरूआत से ही अपने प्रतिद्वंद्वी पर हावी हो गया। पर थोड़ी ही देर बाद उसके मन में विचार आया कि मेरे कारण इस बेचारे शिष्य को अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा। उसे एक तरकीब सूझी कि वह जान-बूझकर गलत चालें चलेगा। लेकिन खराब खेलना उसने सीखा नहीं था। अतः खराब खेलने के लिए उसे बहुत एकाग्रता की ज़रूरत पड़ी। उस एकाग्रता के कारण वह पसीने से तर-बतर हो गया। जेन गुरु ने यह सब देखा तो खेल रुकवा दिया और बोले 'आज का पाठ समाप्त हुआ। आज तुमने दो महत्त्वपूर्ण बातें सीखीं - करुणा और एकाग्रता - यह शिक्षा की पहली सीढ़ी है।”

शिक्षा एक अमोघ शक्ति है जिसका प्रयोग विद्यार्थी अपनी क्षमता के अनुसार करता है। अतः उसके हाथ को मजबूत करने के पहले उसको साधना आवश्यक होता है, अन्यथा उस शिक्षा का प्रयोग निर्माण के बदले  विध्वंस के लिए होता है। हमने योग को योगा बना कर अधूरे ज्ञान को पूरे विश्व में फैला दिया। योग (अष्टांग योग) के आठ चरण हैं। पहला चरण है यम और दूसरा नियम। यम यानि अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। नियम यानि शौच (शुद्धता), संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान।  इन दो के बाद आता है तीसरा आसन और चौथा प्राणायाम। लेकिन इसके प्रथम दो मूल पाठ यम-नियम को छोड़ हम सीधे तीसरे और चौथे अध्याय आसन-प्राणायाम पर पहुँच गए।

यम-नियम से मरहूम विद्यार्थी को हमने सीधे आसन और प्राणायाम का पाठ पढ़ाना प्रारम्भ  कर दिया। फलस्वरूप शिक्षार्थी इस शक्ति का प्रयोग विध्वंस के लिए भी कर रहे हैं।  

अभी अपने पढ़ा जेन गुरु ने शिक्षा की शुरुआत कैसे की। और अब:

         शिक्षा का दायित्व

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद एक नाज़ी यातना शिविर में एक पत्र पाया गया था। पत्र में लिखा था, 'प्रिय अध्यापकों, मैं यातना-शिविर में बच जाने वालों में से एक हूँ। मेरी आंखों ने वह देखा है जो किसी को नहीं देखना चाहिए। पढ़े-लिखे इंजीनियरों ने गैस चैम्बर बनाये, उच्च शिक्षा प्राप्त डॉक्टरों ने बच्चों को ज़हर दिया, नवजात शिशुओं को मारने वाली नर्सें ही थीं। औरतों-बच्चों को मारने वाले स्नातक और स्नातकोत्तर थे। इसलिए मैं शिक्षा पर संदेह करता हूं। मेरी प्रार्थना है, अपने विद्यार्थियों को मनुष्य बनना सिखाइए। आपके प्रयास पढ़े-लिखे राक्षसों के निर्माण के लिए नहीं होने चाहिए। शिक्षा तभी महत्वपूर्ण है जब वह हमारे बच्चों को बेहतर इंसान बनाये।

शिक्षा के साथ-साथ शिक्षा का दायित्व बताना आवश्यक है। केवल अधिकार ही नहीं कर्तव्य का पाठ भी पढ़ना जरूरी है। क्या आप एटम बम बनाने की विधि हर किसी को बताएँगे? पश्चिमी विचारों के प्रवाह में पड़कर हमने इतना तो याद कर लिया कि सब को पढ़ना-लिखना सिखा देना चाहिए, पर उसके हानि लाभ का विचार नहीं करते। गांधी ने इसीलिए शिक्षा का विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि शिक्षित करने के पहले हमें शिक्षित करने का उद्देश्य निश्चित करना होगा, यह जानना होगा कि किसे, क्या और क्यों पढ़ना है। पढ़े-लिखे दानव पैदा करने के बजाय अनपढ़ मानव बेहतर हैं।

यह सोच गलत है कि आज की शिक्षा से नम्रता-करुणा-दया-एकाग्रता अपने आप आ जाती है। हाँ, ये हर मनुष्य में हैं लेकिन इन्हें जाग्रत करना पड़ता है, इन्हें लाना पड़ता है। बसंत भी अपने आप नहीं आता, लाना पड़ता है। गलत कह रहा हूँ, तो अब तीसरी बात पढ़िये :

        वसंत को लाना पड़ता है

एक विरोधाभास-सा है, बाहर की दुनिया और भीतर कहीं उमंगे उत्साह में। मन मुस्काने का कर रहा है और कहीं कुछ है जो उसे रोक रहा है। भीतर, कहीं से एक आवाज़ सी उठती है यह कहती हुई कि वसंत आता कब है, उसे तो लाना पड़ता है। यह सही है कि ऋतुओं के क्रम में वसंत की अपनी जगह है। ऋतु के अनुरूप ही पत्ते भी चहकते हैं, फूल भी खिलते हैं। हवा भी महकती है। हां, यह सब दिख रहा है। पर वसंत तो तब उतरता है जीवन में, जब मन चहके, भीतर कहीं जीवन के प्रति उत्साह उमड़े और बहती हवा गाल थपथपाते हुए कहे..... कि दशाश्वमेध घाट का आखिरी पत्थर कुछ और मुलायम हो गया है, सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आंखों में एक अजीब सी चमक है, राह चलता हर व्यक्ति मुसकुराता सा प्रतीत होता है, यह चराचर में वसंत के उमड़ने की स्थिति है।

.....वसंत के बीज को हवा और पानी देने की आवश्यकता है, खाद देने की आवश्यकता है। यह हवा, यह पानी, यह खाद उस जिजीविषा का नाम हैं जो ज़िंदा होने और ज़िंदा रहने के अंतर को समझाती है। सांस तो आदमी लेता रहेगा, पर यह सांस सार्थक तब बनेगी जब सांस में आदमी उस गरमाहट को महसूस कर सकेगा जो मां की गोद में मिलती है। एक सुरक्षा का अहसास देती है यह गर्मी और आश्वासन भी कि जीवन को बेहतर बनाया जा सकता।

..... धूप, हवा, पानी, यह सब तो प्रकृति देती है हमें, पर जो जादुई और रासायनिक क्रिया इन्हें जीवन का संबल बना देती है, उसे सक्रिय करना हमारे अपने हाथ में है। सच बात तो यह है इस सक्रियता का रहस्य इस बात को समझने में है कि जीवन ऋतुओं का इंद्रधनुष है। इस इंद्रधनुष के रंग अपने समय पर चहकते-महकते तो हैं पर इस प्रक्रिया का अनुभव करना पड़ता है- कोशिश करनी पड़ती है। इस अनुभव को जीने की। यह अनुभव तब होता है जब हम जीवन को वसंत-मय बनाने के प्रति सजग होते हैं। विपरीत परिस्थितियां एक चुनौती हैं इस सजगता के लिए। इस चुनौती को स्वीकार करना ही जीना कहलाता है। जब हम इसे स्वीकार करते हैं तब जीवन में वसंत खिलता है। आता नहीं है वसंत, जीवन में उसे लाना पड़ता है

तब साहब, वसंत आता नहीं है लाया जाता है। समयानुसार प्रकृति तो वसंत में सज जाती है लेकिन  हाँ उसके साथ समरस नहीं हुए तो वसंत नहीं आता। पिछले दो वर्षों में महामारी के चलते वसंत आया तो सही लेकिन पता ही नहीं चला। शिक्षा हासिल कर ली तो शैक्षिक उपाधि तो मिली लेकिन अगर हृदय समरस नहीं हुआ, निर्माण का उत्साह नहीं बना, तो शिक्षित नहीं हो पाये।

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....वाद पर विवाद                                                        मेरे विचार

 वाद!.... न जाने कितने और कैसे-कैसे। और-तो-और  वाद पर विवाद भी। व्यक्ति-वाद, समाज-वाद, राष्ट्र-वाद, साहित्य-वाद, विचार-वाद! पूरब, पश्चिम और मध्य वाद; पूर्व-मध्य, मध्य-पूर्व, पश्चिम-मध्य, मध्य-पश्चिम वाद भी हैं। अपने दस दिशाएँ मानते हैं। तीन पर कब्जा हो चुका है, सात अभी भी उपलब्ध हैं। देर-सवेर वे भी शायद किसी-न-किसी की संपत्ति हो जायेंगी। कोई एक को मानता है तो कोई दूसरे को। इन में कट्टर-वादी और नरम-वादी भी हैं। इनमें तीखी बहसें भी होती हैं, और जब बहस में उतरते हैं तब न अच्छा-अच्छा रहता है और न बुरा-बुरा। न यह ध्यान रहता है कि तर्क है या कुतर्क।  क्या सही है और क्या गलत की अनदेखी कर, बस एक ही मुद्दा रहता है सामने वाले को गलत और अपने को सही सिद्ध करना। एक को केवल अच्छाई-ही-अच्छाई दिखती है तो दूसरे को केवल बुराई-ही-बुराई। इस तथ्य का विस्मरण हो जाता है कि हर किसी में अच्छाई और बुराई साथ-साथ होती है। दूसरे की अच्छाई को स्वीकार करने में हीनता और अपनी बुराई मनाने में अपमान का अनुभव होता है।

          नित्शे का कहना है, आत्मा हमारी चेतना से कहती है – यह कष्ट है; इसे महसूस करो, और हम यातना महसूस करने लगते हैं। वह कहती है – यह सुख है और हमें वह सुख लगने लगता है  लेकिन फसाद की जड़ तो यह है कि एक की आत्मा को जिसमें सुख दिखता है, दूसरे की आत्मा को उसी में दुःख नजर आता है। बस फिर वे दोनों आत्मा-यें बिना विचार किए आपस में भीड़  जाती हैं।

          गाँधी कइयों को बड़ा सुख देते हैं तो बहुतों को कष्ट। दोनों तरफ कट्टर-वादियों को कमी भी नहीं है। गाहे-बगाहे, उनके बीच वाद-विवाद होते ही रहते हैं। दुःख की बात तो यह है कि इनमें से अधिकतर तो ऐसे लोग हैं जिन्हें गांधी के बारे में जो भी थोड़ी-बहुत जानकारी है वह सिर्फ व्हाट्सप्प और सोशल मीडिया से मिली विकृत जानकारी है। मेरे अपने अनेक दोस्त, मित्र और परिचित हैं। वे मेरे वाद से परिचित हैं। जब भी मौका मिलता है मुझे उकसाते हैं, मैं कुछ बोलूँ, बहस करूँ। लेकिन मैं चुप-चाप सुन लेता हूँ। कुछ देर में समझ जाते हैं कि मैं उनके साथ बहस नहीं करूंगा, कुछ नहीं बोलूँगा। और हम मुसकुराते हुए अन्य विषयों पर मुड़ जाते हैं। 

          एक बार गाँधी बंगाल के किसी प्रांत में एक सभा को संबोधित कर रहे थे। तभी उस सभा-स्थल के नजदीक से मार्क्सवादियों का एक जुलूस निकला। नारे लगा रहा था – गाँधी-वाद मुर्दाबाद’, गाँधी-वाद का नाश हो। गाँधी वहीं सभा स्थल से ही बोले, ठहरो, ठहरो मैं भी आता हूँ। मैं भी तुम्हारे साथ हूँ क्योंकि गाँधी-वाद जैसी न कोई विचार-धारा है न ही कोई वाद

          गांधी कहते हैं, न मैंने कोई नई बात कही है और न ही ऐसे किसी वाद का समर्थक या प्रचारक हूँ। सत्य, अहिंसा, सौहार्द, अपरिग्रह.... जैसी बातें मेरी नहीं हैं। ये सदियों से चली आ रही हैं। विश्व के विभिन्न धर्मों से ही मैंने ये बातें सीखी हैं और मैं इन पर अमल करता हूँ। अपने अनुभव से जो समझा हूँ, सीखा हूँ वही करता हूँ, कहता हूँ। इतना ही नहीं, मैं यह भी कहता कि मैंने जो कहा वह अंतिम नहीं है। मैं रोज-रोज सीख रहा हूँ। इस कारण मेरे कहे में विरोधाभास भी मिलेगा। मैं यही कहता हूँ कि मैंने जो बात अंत में कही है उसे ही सही मानी जाए। क्योंकि जैसे-जैसे मैं  सीखता गया, जानता गया, समझता गया, मेरे विचरों को भी नई दिशा मिलती गई। और अंत में जो कहा वह भी अंतिम सत्य नहीं है। मैं यहीं तक पहुंचा हूँ, तुम्हें यहाँ रुकना नहीं है, आगे बढ़ना है और इसके आगे का सत्य जानना है। इस अवस्था में  क्या गाँधी-वाद जैसे किसी वाद का स्थान है? गाँधी-वादी तो वे हैं जो वहीं रुक गए। उसे ही अंतिम सत्य मान लिया। उन्होंने सत्य के प्रयोग को आगे बढ़ाया ही नहीं।  

          अभी कुछ समय पहले एक मैनेजमेंट गुरु का वीडियो काफी प्रचलित हुआ जिसमें उन्होंने अपने किसी इंटरव्यू की चर्चा की। उनसे पूछा गया कि क्या वे गाँधी-वादी हैं? उन्होंने प्रति-प्रश्न किया कि गाँधी-वाद क्या है? अब, जब प्रति-प्रश्न किया गया और बात आगे बढ़ानी भी है, तो जो है ही नहीं, उसके व्याख्या कर दी गई। गुरु ने उस व्याख्या को पकड़ कर यह घोषणा कर दी कि न राम  गाँधी-वादी थे, न कृष्ण और न मैं गाँधी-वादी हूँ। वे न गांधी को समझ सके, न कृष्ण को न राम को।

          क्या आप मुझे बताएँगे कि कौन से धर्म में सत्य, अहिंसा, सौहार्द, अपरिग्रह.... नहीं है? कौन सा समुदाय, संप्रदाय, सभ्यता, संस्कृति इनसे इंकार करेगी? हाँ, यह जरूर है कि अपने-अपने देश-काल के अनुसार किसी ने सत्य पर ज़ोर दिया तो किसी ने अहिंसा पर, किसी ने किसी और पर। लेकिन सब में कम या ज्यादा इन सब का संपुट है।

हम गाँधी से प्रश्न करते हैं, उन्हें उलाहना देते हैं:

अहिंसा तो कमजोरों के लिए हैं, इसने तो हमें निपुंसक बना दिया।

सत्य से क्या फायदा, आज के जुग में यह नहीं चलता।

सौहार्द भाई चारा अतीत की बातें हैं, हम मिट जाएंगे।

“अगर तुम्हारे गाल पर एक थप्पड़ मारे तो तुम अपना दूसरा गाल आगे बढ़ा दो।

इनमें से एक भी गाँधी की देन नहीं हैं। उन्हें गांधी ने गीता से, बाइबिल से, कुरान से, ग्रंथ साहिब से तथा अन्य धर्मों से ही लिया है।  फिर प्रश्न गांधी से ही क्यों करते हैं? सीधी सी बात है – धर्म पर सीधे प्रश्न करने से डर लगता है, भयभीत हो जाते हैं। साहस की ओट में दुर्बल लोग हैं ये। 

हर धर्म कहता है इनका पालन करो, इन्हें अपनाओ, इन्हें मानो। ये सब केवल प्रवचन दे कर ही अपने दायित्व का निर्वाह मान लेते हैं। और हम भी एक कान से सुन कर दूसरे से निःसंकोच निकाल देते हैं। सभा में सब सुन कर उसे वहीं छोड़ कर चले आते हैं। लेकिन गाँधी कहने पर रुके नहीं, इन्हें माना, अपनाया। यहाँ तक तो शायद ठीक था, वे इससे एक कदम आगे बढ़ जाते हैं और  दूसरों को यथासंभव इसे मानने और अपनाने के लिए बाध्य किया। यहीं से एक बड़े तबके ने उन्हें सिर-माथे पर बैठाया और दूसरे ने उनका विरोध किया।

          मानव का मनोविज्ञान कहता है – हम जिसे सही जानते हैं, उसे सही मानते नहीं। हम जिसका आदर करते हैं, उसकी सुनते नहीं। हम मानते कुछ हैं, चाहते कुछ और। हम हर पल इस द्वंद्व में जी रहे हैं। हम दोहरी जिंदगी जीते हैं। स्वयं को छोड़ बाकी पूरी दुनिया ईमानदार हो, सत्यवादी हो। स्वयं के लिए झूठ बोलना, बेईमानी करना व्यावहारिक होना है, दूसरों के लिए नहीं। घूस ले कर काम करवाने में बड़ा आनंद आता है लेकिन जब देना पड़ता है तब खीज होती है। हम जब इस द्वंद्व से निकल जाएंगे, तब बस एक ही रह जाएगा।

गांधी ने जिसे सही जाना, उसे ही माना, वही किया और वही करने को कहा। और बस यहीं गांधी से विरोध शुरू हो गया।

अंत में गीता के १८वें अध्याय का ६७वां श्लोक :

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।

न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥

तुझे यह गीता रूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तप रहित मनुष्य से कहना चाहिये, न भक्ति रहित और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिये; तथा जो मुझमें दोष दृष्टि रखता है उससे भी नहीं कहना चाहिये।  

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गुरुवार, 1 सितंबर 2022

सूतांजली सितंबर 2022

 सूतांजली

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वर्ष : 06 * अंक : 02                                                                सितंबर  * 2022

दूसरे को नीचा दिखाने में नहीं.....

खुद को ऊंचा उठाने में समय लगाइये।

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चलें, मिलें फोर्ड के जनरल मैनेजर से...                                            मैंने पढ़ा  

लगभग एक शताब्दी हो चुके हैं इस घटना के। जाहिर है उस समय न तो हिन्दुस्तान आजाद हुआ था, न पाकिस्तान बना था और लाहौर हमारे देश का ही एक अंग था। वहाँ स्कूल जाने वाले एक १७ वर्षीय बच्चे ने एक दिन सड़क पर एक गाड़ी को जाते हुए देखा। वह उसे देखता ही रह गया; उसे यह भी पता नहीं था कि यह क्या है? इसके पहले उसने न तो इसे देखा था और न ही ऐसी किसी चीज के बारे में  सुना था। जब दूसरे दिन भी उसे वहीं वह दिखाई दी, तब उससे रहा नहीं गया और पूरी ताकत तो उसके पीछे दौड़ पड़ा। आखिरकार उसने उस गाड़ी को पकड़ ही लिया। उसने देखा उस गाड़ी पर लिखा था फोर्ड और उसमें ५-६ गोरे बैठे थे। उसने उत्सुकता पूर्वक उनसे पूछा कि यह क्या है? अपने प्रश्नों के उत्तर से उसे पता चला कि इसे मोटर गाड़ी कहते हैं, इसे श्रीमान फोर्ड ने बनाया है, और वे एक दिन में ऐसी कई गाड़ियाँ बनाते हैं। उसे यह भी पता चला कि श्रीमान फोर्ड अमेरिका में रहते हैं। उस बच्चे का मुंह आश्चर्य से खुला रहा गया। उसे कुछ समझ नहीं आया कि इतनी भारी-भरकम चीज क्यों बनाई गई, श्रीमान फोर्ड एक दिन में ऐसी कई मोटर गाड़ी  कैसे बना लेते हैं और तो और ये अमेरिका क्या है और कहाँ है?  

          इसी उधेड़-बुन में वह स्कूल पहुँच गया। उसने अपने अध्यापक से पूछा कि यह अमेरिका क्या होता है और कहाँ है? अध्यापक ने उसे समझाने का बहुत प्रयत्न किया, लेकिन उसे समझ नहीं आया। उसके भूगोल के अध्यापक ने उसे बताया कि ग्लोब की उल्टी-दिशा में अमेरिका है और जैसे हिन्दुस्तान है वैसे ही अमेरिका है लेकिन अमेरिका और हिन्दुस्तान में बहुत फर्क है। यह सुनकर बच्चे की उलझन और भी ज्यादा बढ़ गई। अगर, अमेरिका ग्लोब की उल्टी दिशा में है तो वहाँ लोग क्या सिर के बल खड़े रहते हैं, क्या वे गिरते नहीं, वे कैसी खड़े होते होंगे? और इससे भी ज्यादा वह परेशान हुआ इस बात से कि अमेरिका हिन्दुस्तान जैसा है लेकिन दोनों में बहुत फर्क है। एक जैसा भी है और बहुत फर्क भी है, ये दोनों बातें एक साथ कैसे हो सकती है? खैर उसने उसी समय निश्चय किया कि उसे अमेरिका जा कर उस मोटर गाड़ी  को बनाने वाले श्रीमान फोर्ड से मिलना है।

          दिन-भर वह इसी उधेड़-बुन में रहता। उसके पिता मासिक ३० रुपए पाते थे। उसे पता था कि घर वाले कभी भी न तो सहमत होंगे और न ही उसे अमेरिका भेज सकेंगे। आखिरकार उसने चुपचाप भाग कर ही अपने सपने को साकार करने का निश्चय किया। एक दिन मौका देख कर उसने अपने पिता के कोट में हाथ डाला। उसे २९ रुपए मिले। उसके लिए यह एक बहुत बड़ी रकम थी। बिना किसी को बताये, चुपचाप लाहौर स्टेशन से ट्रेन पकड़ वह बंबई पहुँच गया।

          बंबई तक का सफर तो आसान था। अब उसे अमेरिका जाना था। उसने सुना था पूछ-पूछ कर विलायत जाया जा सकता है। बस, उसने लोगों से पूछना शुरू किया अमेरिका कहाँ है और कैसे जाएँ’? लोग बच्चे की बात सुनकर हँसते, उस पर ध्यान नहीं देते। बल्कि कई तो पूछते कि यह अमेरिका क्या होता है?

          उस बच्चे के लिए तो लाहौर ही सब कुछ था। उसके बाहर एक दिल्ली नाम की जगह भी थी और उसके बाद केवल बस मद्रास ही मद्रास। हाँ, एक और जगह थी जहां पानी के जहाज से जाते हैं, और वह जगह है विलायत। अब वह कैसे बताता कि अमेरिका कहाँ है। लेकिन सोचने पर एक बात समझ आई कि अमेरिका जाना तो पानी के जहाज से ही पड़ेगा। अतः  अब उसने अपना प्रश्न बदल लिया। अब वह पूछ रहा था, समुद्र में जाने के लिए पानी का जहाज कहाँ मिलेगा’? अब लोग समझने लगे और उसे रास्ता बताने लगे। जीवन में हमारे साथ भी यही होता है। हमें अपना प्रश्न सही ढंग से करना नहीं आता, अतः उत्तर भी सही ढंग से नहीं मिलते। जब तक हम अपने प्रश्न ध्यान से नहीं करते हमें उसके उत्तर भी ज्ञान से नहीं मिलते। कुछ ही समय में वह बंबई के बन्दरगाह पर पहुँच गया।

          लेकिन अब एक नयी समस्या! जहाज पर कैसे चढ़े और किस जहाज पर चढ़े। उसने फिर पूछना शुरू किया। लेकिन, न कोई बताने वाला और न ही उसकी बात को सुनने वाला। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। वह सबसे पूछता रहा। तभी उसने देखा कुछ लोग विशेष पोशाक पहने जहाज की तरफ जा रहे हैं। उसे लगा ये जरूर जहाज के कर्मचारी होंगे। उसने उन्हें भी पूछा, लेकिन उन्होंने बच्चे की बात पर ध्यान ही नहीं दिया। तब तक एक अफसर-सा आता दिखा। उसने उसे पकड़ा। दैवयोग से वह उसी जहाज का कप्तान था और उसने उसकी पूरी बात सुनी। उसने संक्षेप में पूरी बात बताई। उस बच्चे के जज़्बात से वह अभिभूत हो गया। कैप्टन के कहने पर वह जहाज पर उसके बताये काम, जहाज के इंजिन में कोयला डालना, के लिए तैयार हो गया।

          उस बच्चे का जहाज से अमेरिका सफर प्रारम्भ हुआ। काम न रहने पर वह जहाज के डेक आदि जगह पर घूमता और कैप्टेन के निजी कार्य करता। इन सब के बाद भी उसके पास काफी समय बचता। अतः उसने उसे और भी कुछ काम देने की याचना की। कैप्टन ने उसे जहाज के रेस्तरां में बैरे का काम करने का प्रस्ताव दिया जिसे बच्चे ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। अब वह अलग-अलग देश, संस्कृति, भाषा के अनेक लोगों से मिलने लगा, उनके केबिन में भी जाने लगा। यह क्रम लगभग तीन महीने तक चला।

          जहाज अमेरिका के बन्दरगाह पर लग गया। सब लोग झटपट उतरने की तैयारी करने लगे, यह बच्चा सब की नजर बचा जहाज से उतर गया और वहाँ की भीड़ में मिल कर २-३ मील तक भाग खड़ा हुआ। उसे अचानक कुछ पगड़ी धारी पंजाबी दिखे। वे पंजाबी में ही बातें कर रहे थे। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा और तुरंत उनसे मिला। वे इसकी पूरी बात सुन उसे अपने घर ले आए। उस मुहल्ले में अनेक पंजाबी थे, उसे तो ऐसा लगा कि वह अमेरिका नहीं पंजाब में  ही है। बच्चे को पता चला कि वे सब पंजाब से ही हैं और कई पीढ़ियों से हैं, खेती करते हैं। वहाँ के सब लोगों ने उसकी बहुत आवभगत की, उसे अच्छे से रखा और उसे प्रस्ताव दिया कि अब वह उन्हीं के साथ वहीं रह जाये। लेकिन बच्चा तैयार नहीं हुआ। वह तो वहाँ श्रीमान फोर्ड से मिलने आया था। जिस प्रकार यम ने नचिकेता को अनेक प्रलोभन दिये थे ठीक वैसे ही बिरादरी वालों ने बच्चे को अनेक प्रलोभन दिये – तुम्हें घर देंगे, खेत देंगे, खेती सीखा देंगे, स्कूल-कॉलेज में आगे पढ़ा देंगे, और तो और एक सुंदर अच्छी सी लड़की से तुम्हारी शादी भी करा देंगे – तुम यहीं रह जाओ। लेकिन इन सब प्रलोभनों को दरकिनार कर बच्चा अपने निश्चय पर अडिग रहा। एक निर्णय लेना और फिर उस पर अडिग रहना साधारण जज्बा नहीं है, जो उस बच्चे में था। आखिरकार उन्होंने भारी दिल से उसे विदा किया।

          अब वह फोर्ड के कारखाने के दरवाजे पर खड़ा था। वहाँ घुसने में उसे कोई विशेष कठिनाई नहीं हुई। लेकिन फिर, एक के बाद एक कई दरवाजे मिलते गए और उसकी मुसीबत बढ़ती गई। आखिरकार वह एक अफसर के सम्मुख खड़ा था। उसने उसकी पूरी बात सुनी और बोला कि वह उसके हिम्मत की कद्र करता है और उसकी ख़्वाहिश पूरी की जाएगी। उसने उसे कंपनी के अतिथिगृह में भेज दिया। थका हुआ बच्चा गहरी नींद में सो गया। कर्मचारी उसकी खिदमत में खड़े थे। दूसरे दिन उसे कारखाने के उस भाग में ले गए जहां मोटर गाड़ी  के कलपुर्जे बनते थे। एक-एक चीज उसे ठीक से दिखाई और समझाई गई। उसे भी बड़ा अच्छा लग रहा था। लेकिन इसी प्रकार एक के बाद दूसरे, दूसरे के बाद तीसरे कारखाने में जाते-जाते कई दिन बीत गए। फिर दिन सप्ताह में बदलने लगे। वह अब बेचैन हो उठा। बार-बार पूछने लगा उसकी मुलाक़ात श्रीमान फोर्ड से कब होगी। आखिरकार वह एक ऐसी जगह पहुंचा, जहां उसने पूरी चमचमाती, चलने को तैयार मोटर गाड़ी  देखी। वह बहुत खुश हुआ, लेकिन फिर उसने वही सवाल किया श्रीमान फोर्ड कहाँ हैं’?

          बच्चा अब फिर एक और नये उच्चाधिकारी के सामने बैठा था। उसे बताया गया कि फोर्ड से उसकी मुलाक़ात  कल होनी तय है। नियत समय पर वह तैयार था। जब वह फोर्ड के कमरे में पहुंचा तो उसे विश्वास नहीं हुआ कि वह इस धरा पर है या स्वर्ग में। उस सुसज्जित, विशालकाय, कमरे में फोर्ड ने खुद खड़े होकर उस लड़के का स्वागत किया। फोर्ड ने बहुत ही विनम्र भाषा में उससे भारत की भाषा-संस्कृति, रीति-रिवाज, रहन-सहन, खान-पान, प्रदेश, लोग, नदी-नाले-पहाड़ और तो और गांधी के बाबत भी प्रश्न किये। उनकी यह बात, जिसमें फोर्ड ने भारत में अपनी दिलचस्पी दिखाई लगभग ४-५ घंटे चली। बच्चे ने भी अपनी जानकारी के अनुसार सब प्रश्नों के उत्तर दिये। अब वह बच्चा अपने उद्देश्य पर आया, मैं कई दिनों से आपके कारखानों में घूम रहा हूँ। अनेक लोगों को देखा, उनसे मिला। वे सब साधारण वेश-भूषा में थे, अनेक के कपड़ों पर तो तेल वगैरह के दाग भी थे। मैंने आपको वहाँ कहीं नहीं देखा। आप तो इस कमरे में बेशकीमती स्वच्छ चमचमाते सूट में बैठे हैं। तब आप मोटर गाड़ी  कब बनाते हैं?” श्रीमान फोर्ड हंस पड़े, “मैंने एक जनरल मैनेजर नियुक्त कर रखा है। पूरा काम वही करता है”। बच्चे के सिर पर तो जैसे घड़ों पानी फिर गया, लगभग चीखते हुए कहा, “मुझे तो बताया गया कि आप ही गाड़ी बनाते हैं। इसीलिए मैं आप से मिलना चाहता था, लेकिन अगर यह काम आप नहीं आपका मैनेजर करता है तब मैं आप से नहीं आपके मैनेजर से मिलना चाहता हूँ। कृपया मुझे आप उनके पास भिजवायें या उन्हें यहाँ बुलवायें”। बच्चे को अपना ध्येय स्पष्ट था कि उसे मोटर गाड़ी  बनाने वाले से मिलना है। अपने ध्येय की स्पष्टता ही हमें सफल बनती है। फोर्ड का नाम तो वह इसीलिए ले रहा था क्योंकि उसे उस मोटर गाड़ी  के निर्माता के रूप में फोर्ड का ही नाम बताया गया था। अपने लक्ष्य को समझने में उसने जरा भी भूल नहीं की और उसी की लगन लगाए रखा।

          श्रीमान फोर्ड ने एक ठहाका लगाया, “वह मैनेजर तो यहीं है, आप के सामने, हर कहीं है, हर जगह है, हर समय है, सर्व शक्तिमान, परम ब्रह्म ईश्वर। वही इस ब्रह्मांड का शिल्पकार, निर्माता और रचनाकार है। यह वही है जो मेरे कारखाने को चलाता और गाड़ियाँ बनाता है। उसके हाथ अपना पूरा काम सौंप में निश्चिन्त हूँ। बच्चा मंत्र मुग्ध सा फोर्ड की बातें सुनता रहा। उसकी बातें उसके कानों में गूंजने लगीं। उसका जीवन बदल गया। उसे एक नयी रह मिल गई।

( सुरेन्द्र नाथ जौहर – जीवनी, लेखन और विचार से अनुदित)

(अगर आपका जीवन नहीं बदला, अगर आपके कानों में फोर्ड की बात नहीं गूंज रही है इसका मतलब यह है कि आप समझ नहीं पाये हैं, आपको इसे दुबारा पढ़ना है।

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ईश्वर                                                                      लघु बातें   - जो सिखाती हैं जीना

एक दिन मैंने ईश्वर से पूछा कि तुमने सब कुछ खोल कर रख दिया है। पहाड़- समुद्र, वन-उपवन, धरती-आकाश, सूरज-चाँद, सितारे-नक्षत्र, नदी-नाले, समुद्र-ताल, विभिन्न धातुओं का विशाल भंडार, अनगिनत वनस्पतियाँ, अनेक भांति और प्रकार के पशु-पक्षी, अनेकों प्रकार के मानव और भी न जाने क्या-क्या। लेकिन फिर तुमने अपने आप को क्यों छिपा कर रखा है? तुम क्यों नहीं दिखते?

          ईश्वर ने जवाब दिया, मैंने यह सब मानव के हित के लिए, उसके विकास के लिए ही रचा है। सृष्टि के विकास के लिए ही यह सब किया था। परंतु मनुष्य ने तो इस सब को बाजार में बदल दिया। बाजार ही क्यों सुपर बाजार बना दिया। मेरी बनाई गई और मनुष्य को बिना विशेष श्रम के उपलब्ध हर रचना को खरीदने-बेचने लगा! वनस्पति, पशु-पक्षी, खनिज और-तो-और ज्ञान भी बाजार तक पहुँच गया। प्रचुर मात्र में होने के बावजूद मनुष्य ने ऐसी व्यवस्था बना ली कि अनेकों के पास इनका अभाव है। मैं तो डर गया, अगर मैं भी प्रगट हो जाऊँ तो मैं भी बाजार में बिकने लगूँगा। इसीलिए मैंने अपने को छिपाकर रखा हुआ है। लेकिन क्या भरोसा! मुझे भी ढूंढ कर निकाल लें, मैंने मनुष्य को ऐसी संभावनाएं तो दे ही रखी हैं कि वह मुझे ढूंढ ले। यदि मेरा आदर-सम्मान हो और मेरा सही इस्तेमाल हो तो मैं प्रकट हो जाऊँ।

(वंदना खन्ना)

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सोमवार, 1 अगस्त 2022

सूतांजली अगस्त 2022

 सूतांजली

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वर्ष : 06 * अंक : 01                                                                अगस्त   * 2022

आजादी के अमृत महोत्सव  एवं श्रीअरविंद की 150वीं जयंती पर शुभ कामनाएँ - बधाई

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धन्यवाद

इस माह हम पाँच वर्ष पूर्ण कर छठे वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। यह आपके स्नेह और सुझावों के कारण ही संभव  हो सका है। आप से एक ही अनुरोध है, मेल,  ब्लॉग या  व्हाट्सएप्प पर संपर्क बनाए रखें और अपने सुझावों से हमारा मार्गदर्शन करते रहें।

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स्वाधीनता पाना आसान है लेकिन

उसे बनाये रखना उतना आसान नहीं है।

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मौलिक विचारों की आवश्यकता                                           मैंने पढ़ा

(श्रीअरविंद को हम एक महान योगी के रूप में  जानते हैं। कुछ लोग जानते हैं कि योगी बनने के पूर्व वे एक जुझारू क्रांतिकारी भी थे जिन्होंने अपनी लेखनी से भारत के युवा वर्ग को झकझोर उन्हें जाग्रत और उनका पथ-प्रदर्शन किया। अंग्रेज़ सरकार उनसे परेशान थी और निरंतर उन्हें जेल में ठूँसने के लिए प्रयत्नशील थी। इसके बावजूद श्रीअरविंद निरंतर लिखते रहे। उन्होंने अपनी सशक्त लेखनी, अपने संवादों, अपने भाषणों से कायरता को वीरता में, निराशा को आशा में और निष्क्रियता को सक्रियता में परिणित कर दिया। वैसे ही लेखों की एक बानगी।)

हमारी सबसे ज्यादा एवम् पीड़ादायक बेबसी यह है कि हाल  में युरोप द्वारा हमारे पर  नई शर्तें और नया ज्ञान  थोपा जा रहा है । हमने इसे आत्मसात करने, हमने इसे नकारने, हमने इसे चुनने की कोशिश की परन्तु हम इसमें से किसी भी बात को सफलतापूर्वक नहीं कर पाये। इसे सफलतापूर्वक आत्मसात करने के लिए दक्षता की आवश्यकता है; लेकिन हम यूरोपियन परिस्थिति और ज्ञान में कौशल हासिल नहीं कर पाये, और हम उनके द्वारा जब्त, अधीन और गुलाम बना लिए गए। किसी भी बात को सफलतापूर्वक अस्वीकार करना इस बात पर निर्भर करता है कि हम कितनी समझदारी से यह समझ पाएँ कि हमें क्या अपनाना है। हमारी अस्वीकृति भी कुशलता पूर्वक होनी चाहिये,  हमें कोई बात समझ कर अस्वीकार करनी चाहिए बजाय इसके कि  हम समझने में असमर्थ रहें।

          लेकिन हमारा हिन्दु धर्म और हमारी पुरातन संस्कृति, हमारी वह धरोहर जिसे हमने न्यूनतम बुद्धिमत्ता से सँजोया; हमने जिंदगी भर वह सब कुछ बिना सोचे-समझे-विचारे किया, हमने विश्वास किया, बिना सोचे कि हम इस पर क्यों विश्वास कर रहे हैं, हम दृड़तापूर्वक यह इसलिये करते हैं कि कहीं-किसी किताबों में ऐसा लिखा है,  या किसी  ब्राह्मण ने ऐसा  कहा है, क्योंकि शंकर  ऐसा सोचते  हैं, या फिर ऐसा इसलिए करते हैं कि किसी ने इस बात का यह मतलब निकाला है कि हमारे मूल ग्रंथ या हमारा धर्म ऐसा कहता हैहमारा कुछ भी नहीं है और न ही हमारी बुद्धि में ऐसा व्याप्त है। जो कुछ भी हमारे पास है वह हमने कहीं से प्राप्त किया है। हमने नये ज्ञान के बारे में बहुत थोड़ा सा जाना है, हमने सिर्फ यही समझा है, जिसे यूरोपियन ने हमें  उनके और उनकी नवीन सभ्यता के बारे में समझाया है। अंग्रेजी सभ्यता – अगर उसे हम सभ्यता कहें तो – पर हमारी निर्भरता 10 गुना बढ़ी है बजाय का निदान करने के।

          इससे भी ज्यादा, सफलतापूर्वक चुनाव में हमारी बुद्धि का स्वावलंबी होना आवश्यक है। यदि हमारे पास सिर्फ नये विचार या नई व्यव्स्था उसी तरह से आते हैं जिस तरह से वे प्रस्तुत किये जा रहे हैं तब हम बजाय चुनने के उसकी नकल करें तो यह एक  मूर्खतापूर्ण और  अनुपयुक्त कदम  होगा। यदि हमें यह ज्ञान हमारे पूर्व ज्ञान के आधार पर है जो कि कई बार शुन्य था, हम उसको बिना समझे, मूर्खतापूर्वक अस्वीकर कर देंगें। चुनाव का तात्पर्य यह है कि हमें वस्तुओं को स तरह नहीं देखना चाहिये, जिस तरह से विदेशी देखते हैं या फिर हमारे रूढ़िवादी पंडित जैसे देखते हैं, बल्कि में इनको उसी तरह से देखना चाहिये जिस तरह से वे हैं। लेकिन हमने उनको अंधाधुंध या बेतरतीब तरीके से आत्मसात कर लिया है या फिर अस्वीकार कर दिया है, हमें यह पता ही नहीं कि कैसे आत्मसात या अस्वीकृत करना चाहिए।  फलस्वरुप, हम युरोपियन प्रभाव से पीड़ित हो जाते हैं और इस प्रकार हम कई मुद्दों पर हार जाते हैं या मूर्खतापूर्वक उसका विरोध करते हैं, अपने परिवेश के गुलाम बन जाते हैं और फिर हम न तो नष्ट होते हैं और न ही अस्तित्व बचा पाते हैं।   हम वास्तव में कुछ सरलता और सूक्ष्मता को सँभाल पाते हैं,  हम कुछ चमक के साथ खूबसूरत नकल कर लेते हैं, हम उसको प्रशंसा के साथ शानदार ढंग से उस विषय की बारीकता के साथ ग्रहण कर सकते हैं, लेकिन हम प्रायः सोचने में असफल हो जाते हैं और हम अपने जीवन और हृदय को नियंत्रित करने में असफल हो जाते हैं जबकि हम जीवन और हृदय पर नियंत्रण करके ही आशा रख सकते हैं और एक राष्ट्र के रूप बच सकते हैं।

          हम अपने खोये हुए ज्ञान की स्वतन्त्रता और लोच को किस तरह से पुनः प्राप्त कर सकते हैं? हम, भले ही कुछ समय के लिए, से जिस तरह से खोया है उसके विपरीत जाकर, या फिर सब विषयों में अपने विचारों को मुक्त कर, दासत्व से अधिकार की सोच अपनाकर ऐसा कर सकते हैं।  वह यह नहीं है कि सुधारक या शब्दों का अंग्रेजीकरण करने वाले हम से क्या चाहते हैं। इनका कहना है कि हमें सत्ताधारी पर ध्यान नहीं देना है और अन्धविश्वास और रीति रिवाजों के विरुद्ध विद्रोह कर के ऐसा कर सकते हैं और  अपने मस्तिष्क को इन बन्धनों से मुक्त कर सकते हैं। “इनका कहना है” से तात्पर्य है कि हमें त्यागना है मैक्स मुलर के अधिकार के लिए सायना के अधिकार को भी, शंकर के एकतावाद या अद्वैतवाद या फिर दार्शनिक हैकल के द्वैतवाद को भी, या फिर जो शास्त्रों के अनुसार है या फिर जो युरोप के अलिखित शास्त्रों के अनुसार है, या फिर ब्राह्मण के खिलाफ या फिर युरोप के वैज्ञानिकों और विचारकों या विद्वानों के हठधर्मी सुझावों को भी। दासता के ऐसे मूर्खतापूर्ण  कार्य को किसी भी प्रकार का आत्मसम्मान नहीं मिलता है। हमें वह कड़ी तोड़नी है, चाहे वो कितनी भी सम्मानित क्यों न हो, परन्तु यह सब स्वतंत्र रुप से होनी चाहिये, लेकिन यह होना चाहिए सत्य के लिए, यूरोप के नाम पर नहीं।  यह एक अच्छा सौदा नहीं होगा यदि हम अपने पुराने अलंकरण चाहे वो हमारे लिए कितने भी पुराने क्यों न हो गये हों, को युरोपियन शिक्षा के लिए आदान प्रदान करें या फिर हमारे हिंदुओं के लोकप्रिय अन्धविश्वास या मत को विज्ञान के भौतिकतावाद के अंधविश्वास से परिवर्तित करें।

          हमारी  पहली अवश्यकता है, अगर हमें अपना अस्तित्व बनाए रखना है तब, हमें विश्व में हमारे  नियत कार्य को पूरा करना है और वह यह है कि भारत के युवा सभी विषयों पर स्वतंत्रतापूर्वक अपने विचार व्यक्त करना सीखें ताकि हर विषय पर लाभदायक तरीके से उसकी जड़ तक जायें, न की सतह तक ही सीमित रह जायें, पक्षपात से रहित हों, कुतर्क और दुर्भावना से प्रेरित न हों, और तेज धार की एक तलवार की तरह सभी प्रकार के  दकियानूसी अंधकारवादी विचारधारा को काट दें, भीम की गदा की तरह प्रहार करना चाहिए। हम नहीं चाहते हैं कि हमारा मस्तिष्क युरोप के शिशुओं की तरह हो जाये, उनकी तरह कपड़े में लपेटे हुए नहीं रहें,  हमारे युवा ईश्वरीय प्रदत्त स्वतंत्र और अवरोध रहित गतिवान रहें, भारत की केवल सूक्ष्म ही नहीं बल्कि स्वाभाविक रूप से प्राप्त व्यापक और संप्रभुता को पुनः प्राप्त करें और अपने मूल्य को खुद समझें।  यदि हम अपनी पुरानी बेड़ीयों को पूरी तरह से हटा नहीं सकते हैं तो फिर बाल कृष्ण की तरह छकड़े को घसीटते हुए आगे बढ़ें और दो पेड़ों को, जो दो धारायें और अड़चनें आ रही हैं,  मध्यकाल का अंधापन, दुर्भावनायें, हठधर्मिता और आधुनिकता की स्वाभिमानता को, उखाड़ फेंके।  पुरानी नींव टूट चुकी है और  हम इस भयंकर उथल-पुथल और बदलाव की नदी में इधर-से-उधर बह रहे हैं। भूतकाल की बर्फ की चट्टानों के साथ चिपके रहने का कोअर्थ नहीं है, ये तुरंत पिघल जाएंगे और  वे उन सब शरण लेने वालों को भयंकर खतरनाक पानी में गोते लगाने के लिए छोड़ देंगे। हमें इस कमजोर दलदल में फँसने की जरुरत नहीं है, न तो समुंदर में और न ही इस सूखी धरती पर जिसका सम्बन्ध उधार ली हुई युरोप की सभ्यता से है। वहाँ पर हमारा निश्चित ही दुः भरा एवम् बुरा अंत होगा। अब हमें तैरना सीखना है ताकि हम जीवन के उस जहाज तक पहुँच जायें जहाँ पर सत्य कभी भी परिवर्तित नहीं होता है। इस प्रकार हम वापस उस अतिप्राचीन सुदृड़ चट्टान तक पहुंचे।

          हमें अपना चुनाव अंधाधुंद तरीके से बिना सोच विचार के  हीं करना है और न ही कोई खिचड़ी पकानी है और बाद में यह घोषणा करें कि यह पूर्व और पश्चिम का समावेश है। हमको शुरुसे ही, चाहे जो कुछ भी स्त्रोत हो, उस पर विश्वास करके स्वीकार नहीं करना चाहिए, बल्कि खुद सब पर प्रश्न कर अपनी राय खुद बना कर स्वीकार करना चाहिए। हमें इस बात से डरना नहीं है कि हम भारतीय नहीं कहलायेंगे या फिर इस खतरे में पड़ जायेंगे कि हम हिन्दू नहीं रहेंगे। यदि वास्तव में  अपने बारे में इस तरह सोचते हैं तो ऐसा कभी नहीं होगा कि भारत कभी भारत नहीं होगा या फिर हिन्दू हिन्दू नहीं रहेंगे। यह तभी सम्भव है जब हम स्वयं यह मान लें कि हम युरोप की नकल हैं तथा हमारा सारा कार्य  मूर्खतापूर्वक होता है। हमें कभी भी पक्षपात नहीं करना है, और हमें कोई निर्णय लेने के पहले इसकी जानकारी होनी चाहिए। मूलरुप से हमें यह सोचना होगा कि किसी भी बात को बिना कोई प्रश्न किये स्वीकार नहीं करना है।  इस तरह हमें अपनी पुरानी और नई, उन सभी राय से जिसका हमने परिक्षण नहीं किया है, हमारे हमेशा के पारंपरिक संस्कार और पहले से ही सोचे हुए निर्णय से छुटकारा पाना है।

श्रीअरविंद, CWSA Vol 12 पृष्ठ 39-41

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माई जी की भारत-माता

हिन्दी साहित्यकार श्री धर्मवीर भारती का नाम अपने अवश्य सुना होगा। उन्होंने अनेक छोटे-छोटे यात्रा-वृतांत भी लिखे हैं। ये बहुत ही मर्मस्पर्शी हैं। हमें आईना दिखती हैं कि हम क्या थे और क्या हो गये।

          भारतीजी  जब इन्डोनेशिया पहुंचे वहाँ सैनिक कार्यवाही से सत्ता पलट का वातावरण था। शहर तनाव ग्रस्त था, कर्फ़्यू लगा था, भय का वातावरण था। उनकी मेजबान थीं माई जी। वे किसी से नहीं मिलती थीं। भारतीजी से भी नहीं मिलीं। लेकिन दूसरे दिन सुबह माईजी के बाशिंदे ने खबर दी की माईजी उनसे मिलने के लिए आना चाहती हैं। भारतीजी को बड़ा आश्चर्य हुआ, माईजी के घर वालों को तो होना ही था। खैर वे आईं और उनके साथ बड़ी लंबी वार्तालाप हुई। तब भारती जी को पता चला के वे उनसे मिलने क्यों आईं? क्योंकि भारत की आजादी के बाद भारतीजी उनके पहले मेहमान थे जो रात 9 बजे सो गए, शुद्ध शाकाहारी थे, शराब नहीं पीते थे और भारतीय भाषा में बात करते थे। इससे भारतीजी का कुतूहल शांत नहीं हुआ। माईजी ने बताया कि उनका बड़ा बेटा, सुभाष (सुभाष चंद्र बोस को वे अपना बड़ा बेटा मानती थीं) जब वहाँ आया तब माई जी ने अपने सब गहने और पैसे उनके पास भेजे लेकिन सुभाष ने सब लौटा दिये और बोले, नहीं मां, मुझे सिपाहियों की ज़रूरत है। अपना बेटा देगी? बोल?’ हंसकर बेटे को भेज मां, रोकर नहीं।मैं कैसे मना करती। मैंने भेज दिया। वो रोने को मना किया था। मैं उसके सामने नहीं रोयी, घर जाकर बहुत रोयी। लेकिन ...

लेकिन पर आकार माईजी अटक गई। भारतीजी इंतजार करते रहे लेकिन जब वे कुछ नहीं बोलीं तब...

लेकीन क्या' मैंने पूछा।

लेकिन क्या बेटा, सब लेकिन ही लेकिन है। मैं कितनी खुश थी कि मेरे दोनों बेटों का सपना पूरा हुआ। गोरे चले गये मैंने कहा, मैं अपने गांव एक बार जाऊंगी, हैदराबाद सक्खर के पास मेरा गांव है। तो सब लोग बोले- वहां तो मारकाट मची है। वह तो अब पाकिस्तान में है।  मेरा तो जी धक से हो गया ऐसी कैसी आज़ादी आयी कि देस परदेस हो गया। मैं मैके के गांव भी नहीं जा सकती? मुझे अच्छी तरह मालूम है कि वह है भारत है फिर ये लोग मुझे औरत समझकर बहका रहे हैं। पाकिस्तान में कैसे हुआ मेरा गांव? मैं समझ गयी, मेरा बेटा है नहीं, ये लोग डरते हैं कि मायके जाकर मैं अपने मायके वालों को सब ज़मीन-जायदाद दे आऊंगी।

 

बात यहाँ समाप्त नहीं हुई, असली सदमा तो तब लगा जब ...

गांधी ने कहा था, सुदेशी कपड़ा पहनो।  कई साल बाद बांबे शहर से कई मेहमान आये। यहां से मेरी दुकान से कितना कितना जापानी माल, कपड़ा सब ले गये, वहां बेचकर साढ़े तीन हज़ार रुपया मुझे भेजा, सब बिलेक में बेचा। उस दिन मैं फिर रोयी हे भगवान भारत माता तो आज़ादी हो गयीं, तब यह कैसे हो रहा है? फिर यहां इस देश में सोने की बहुत कमी हो गयी, तो कई लोग आये भारत से सोना छिपा कर लाये। चौगुने पचगुने दाम पर बेचा। मैं तो देखती रह गयी। गुलाम थे, तो गोरे भारत का सोना ले जा रहे थे लूटकर, पर ये तो गोरे नहीं हैं। ये भारत का सोना क्यों ला रहे हैं? अरे क्या भारत माता इनकी माता नहीं हैं, कोई मां का सोना गहना बिलेक में बेचता है क्या? मुझे बहुत गुस्सा आया। उस दिन मैं बड़े बेटे से खूब लड़ी।

 

ये लड़के आये एक बंबई से है, एक ही कठियावाड़ से, एक जयपुर से सब आज़ादी में के बाद के हैं छोकड़े। खूब सड़ाब पीते हैं, गोरों की तरह गिटपिट बोलते हैं, गोरों की भाषा में। फिर एक बार कोई दिल्ली शहर से आया। इसी कमरे में टिका। खद्दर पहने था। लेकिन बातचीत, खानपान सब गोरों का। उस दिन मैंने छोटे बेटे से जाकर कहा पूजाघर में, बेटा, अब तुम सचमुच मर गये। पर तुम्हें सोचना तो चाहिए था कि विधवा मां को अकेला छोड़कर तुम किसके लिए मरने चले गये थे।  इन लोगों के लिए? फिर मैं चुप हो गयी। क्या फायदा बेटे का दिल दुखाने से? मैंने बहुत दिलासा दिया उसे, घबराओ मत बेटा, सब ठीक हो जाएगा। पर कहां ठीक हो रहा है। तुम तो सच्चे साई हो,  सच-सच बताना क्या ठीक हो रहा है?

मैं चुप बैठा रहा, क्या बोलता?

क्या आपके पास कोई उत्तर है। हम तुरंत कह देते हैं –

सब करते हैं’, हम तो व्यापारी हैं, जिस काम में दो पैसा मिलता है हम वही करते हैं, नहीं करें तो क्या खुद खाएं क्या परिवार को खिलाएँ

तो क्या हम पैसे के लिए अपनी माँ को ..... भारत माँ को बेच देंगे?

जमशेदजी टाटा का भी एक वाकिया है। यह भी पढ़ लीजिये-

वर्ष की समाप्ति के बाद उनके सामने खाता-बही रखा गया। उन्होंने एक नजर डाली और उन्हें लगा कि टैक्स का हिसाब गलत है। उन्होंने अपने चार्टर्ड अकाउंटेंट को बुलाया, और अपने टैक्स का हिसाब पूछा। अकाउंटेंट ने पूरी जानकारी दी। जमशेदजी ने पूछा, क्या यह कानूनी रूप से सही है। अकाउंटेंट ने पूरे आत्मविश्वास से कहा कि यह पूरी तरह से कानून सम्मत है और इस प्रकार से टैक्स के बहुत बड़े रुपये बच जायेंगे। जमशेदजी को बात समझ आ रही थी और यह सलाह उनके गले के नीचे नहीं उतर रही थी। कुछ विचार करने के बाद उन्होंने और एक प्रश्न  किया, क्या यह नैतिकता के दृष्टिकोण से सही है?’ अकाउंटेंट हकबका गया, उसे कोई जवाब नहीं सुझा। जमशेदजी ने तुरंत कहा, नहीं हमें टैक्स की चोरी नहीं करनी है, पूरा टैक्स दीजिये जमशेदजी उठ खड़े हुए, वार्ता समाप्त हो गई।

प्रजा गलत हो तो राजा ठीक करता है, राजा गलत हो तो प्रजा ठीक करती है, और अगर दोनों गलत हों तो कौन ठीक करे......

देश हो, व्यापार हो, संगठन हो, समाज हो, परिवार हो ये बनते हैं उनमें रहने वाले नागरिकों से, सदस्यों से, व्यक्तियों से।

हमारा देश वैसा ही होगा जैसे हम हैं।

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सूतांजली, अगस्त द्वितीय 2026, आकर्षक घर की कुंजी

  २कोई ऐसा अक्षर नहीं है, जिसका प्रयोग मंत्र-रचना में न हो सके , कोई ऐसा वृक्ष नहीं है, जो किसी न किसी व्याधि की औषधि न हो , कोई ऐसा...