बुधवार, 1 फ़रवरी 2023

सूतांजली फरवरी 2023

 सूतांजली

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वर्ष : 06 * अंक : 07                                                                फरवरी * 2023

जो काम साधारण आदमी को असंभव जान पड़ता है,

उसे प्रतिभाशाली संभव मानता है।

प्रतिभाशाली को भी जो असंभव जान पड़ता है,

उसे जो कर दिखाये,

वह है विभूति

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अगर्चे आज गांधी होते तो................?                          मेरे विचार

जितना आसान है यह कहना :

अगर गांधी होते तो ........           अगर गांधी नहीं होते तो.........

उतना ही कठिन है इसका अर्थ समझना।

          अगर कोई प्रश्न / उत्तर  सबसे ज्यादा भ्रम पैदा करता है तो वह यही हैइनके उत्तर सबसे ज्यादा अविश्वास, संदेह और अनास्था पैदा करते  हैं। यह कथन यह खोखला दावा करता है कि हम उनके समकक्ष हैं, हमने उन परिस्थितियों को जीया है।  सच्चाई यही है कि न हम वैसे हैं,हमने उन परिस्थितियों का सामना किया है। इतना ही नहीं, हम उन्हें हटा कर एक रिक्त स्थान पैदा करते  हैं, यह विचार नहीं करते कि उस रिक्त स्थान को भरने कोई और होता या कोई नहीं होता या कुछ और होता, तब क्या होता, हम उसका आकलन नहीं कर सकते। न हमारे पास उस व्यक्ति की सी समझ होती है, न दूरदर्शिता, न ऊंचाई। न हम उस परिस्थिति का वैसा विश्लेषण करते हैं और न ही उस पर उतना विचार। हम केवल अपनी बातें, अपने विचार  उस व्यक्ति के नाम से कहते हैं। और ऐसे वक्तव्यों का एक ही लक्ष्य होता है - अपनी मनोवांछित बात, अपनी मनोकामना को थोपना। जो नहीं है उसे दिखाना और जो है उसे छुपाना।  

मैं तो यही समझता हूँ कि शायद गांधी आज होते तो अपने जीवन का सबसे बड़ा दुख झेल रहे होते। शायद देश के बँटवारे से ज्यादा और सांप्रदायिक दंगो से गहरा। इसके लिए यह समझना होगा कि सबसे बड़ा दुख किसे कहेंगे? सुख के बारे में यह किवंदन्ती है कि मनुष्य अपने सुख में उतना सुखी नहीं होता जितना पड़ोसी के दुख में।  लेकिन फिलहाल मेरा ध्यान सुख पर नहीं दुख पर केन्द्रित है। व्यक्ति सबसे दुखी कब होता है?

अपने प्रियजन के बिछ्ड़ने से? या

अपने बनाए आशियाने को बिखरते देख कर? या

अपने बनाए आशियाने को विरोधियों द्वारा तोड़े जाने पर? या

अपने आशियाने को अपने समर्थकों द्वारा तोड़े जाने पर?

जूलियस सीज़र को सबसे ज्यादा दर्द तब होता है जब वह अपने जिगरी दोस्त ब्रूस को भी अपने हत्यारों से मिला हुआ देखता है। यानि अपने समर्थक, अपने अनुयायी, अपने प्रियजन को ही जब अपना आशियाना बिगाड़ते देखते हैं तब बड़ी पीड़ा होती है। 

मुझे लगता है कि अगर्चे गांधी आज होते तो उन्हें यही दर्द सहना पड़ता। गांधी ने तो दिन दहाड़े, सबके समक्ष, छाती पर गोली खाई। जीते जी, सत्य और अहिंसा का संग्राम लड़ते रहे और कभी घुटने नहीं टेके। लेकिन जब गांधी देखते कि उन्हीं के नाम पर बनाई गई संस्थाएं, उनकी नीति के प्रवर्तक, उनके समर्थक, उनके उत्तराधिकारी ही उनकी पीठ पर गोली चला रहे हैं, लेकिन फिर भी सीना फुलाए घूमते हैं, मालाएँ पहनते हैं, गांधीवादी कहलाते हैं, तो उन्हे कैसा लगता? क्या किया हमने गांधी के साथ। अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं :

पहला – विश्वास की हत्या

गांधी का राजनीतिक जीवन दक्षिण अफ्रीका में प्रारम्भ हुआ। उनका विरोध था वहाँ की ब्रितानी सरकार की नीतियों से, वहाँ के प्रशासन से। बागडोर थी जनरल स्मट के हाथ में। गांधी की पहली बड़ी मुठभेड़ सीसे हुई। गांधी ने दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास में लिखा है कि लोगों ने गांधी को बार बार समझाया, चेताया कि स्मट विश्वसनीय नहीं है। स्मट चालक और धूर्त है। वह अपनी बात को पलटने में, अपनी बात का दूसरा ही नहीं तीसरा अर्थ निकालने में माहिर है। अत: उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। लेकिन गांधी ने उनकी बातें सिरे दर्जे से खारिज कर दी। गांधी ने साफ-साफ कहा कि हमें उस की बातों पर, उसके वादे पर विश्वास करना ही होगा। हमें उसे, अपने वादे पर काम करने के लिए समय देना ही होगा। इस पुस्तक में वे लिखते हैं, “आप लोग जिसे मेरा भोलापन कहते हैं, वह तो मेरा अभिन्न अंग बन गया है। वह भोलापन नहीं किन्तु विश्वास है। और मैं मानता हूँ कि अपने मानव-बंधुओं पर विश्वास रखना मेरा और आपका भी कर्तव्य है

          ध्यान देने वाली बात यह है कि गांधी स्मट सरकार की नीतियों और कानून का विरोध कर रहे थे। उधर स्मट भी गांधी का विरोध कर रहे थे। दोनों एक दूसरे के आमने-सामने खड़े थे। गांधी के सहयोगी गांधी को स्मट के वादों पर विश्वास करने से मना कर रहे थे। लेकिन इन सब के बावजूद गांधी ने स्मट पर भरोसा और विश्वास किया। लेकिन इन सब बातों को दर किनार करते हुए हमने अपने ही देश के, अपनी ही जनता द्वारा चुनी हुई सरकार की हर बात पर, हर वादे पर, हर कार्य पर हमने  अविश्वास किया, भ्रम फैलते रहे, जनता को बार बार सरकार पर भरोसा न करने की सलाह देते रहे, उसे झूठा और चोर कहते रहे। हम उनके साथ खड़े थे जिनका कार्य केवल और केवल विरोध करना था, अपने खुद के हितों के लिए। हम उनके साथ खड़े थे जो देश में हताशा, अविश्वास और संदेह का वातावरण पैदा कर रहे थे।

          जनता और देश ऐसे लोग खोज रहा था जिससे उनमें आशा और विश्वास का संचार हो। सरकार द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठाए गए हर कदम का विरोध कर हम त्रस्त जनता का विरोध और सम्पन्न लोगों का समर्थन कर रहे थे। आम जनता द्वारा दर्शाये गए हर्ष पर हमने यही टिप्पणी की दूसरे का दुख उन्हे सुख पहुंचा रहा है। हम चीख-चीख कर कह रहे थे कि यह अब तक कि सबसे बड़ी सरकारी लूट है। लेकिन यह नहीं बता पाये कि यह सरकार है कौन? और उस सरकार ने उस लूट के पैसे का क्या किया? गरीब-त्रस्त जनता के साथ न खड़े होकर हम अमीर-सम्पन्न लोगों के साथ खड़े थे।

क्या दावे के साथ कहा जा सकता है कि अगर्चे आज गांधी होते तो......  क्या करते

 

दूसरा  – पक्ष और विपक्ष

गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत आते हैं। उद्देश्य है भारत के लोगों और यहाँ की सरकार को दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की परिस्थिति से अवगत कराना। वहाँ की सरकार द्वारा भारतीयों पर लगाए जाने वाले अमानवीय करों  के प्रावधानों को रद्द करवाना / रुकवाना भी उनकी यात्रा का एक प्रमुख अंग था। अपनी बात लोगों तक पहुँचाने के लिए उन्होने ने एक  पंफ्लेट भी छपवाया जो हरे रंग का था। उनका यह पंफ्लेट “The Green Pamphlet” के नाम से विख्यात हुआ। गांधी के साथ दक्षिण अफ्रीका की सरकार का कोई प्रतिनिधि नहीं था। अत: गांधी ने जब भी अपना पक्ष रखा उसके साथ उस विषय पर वहाँ की  सरकार का पक्ष भी बड़ी सिद्दत और सच्चाई के साथ रखा। सरकार के पक्ष को जस-का-तस, बिना किसी काट-छाँट के, बिना कुछ जोड़े-घटाये बताया। उद्देश्य था पक्ष और विपक्ष दोनों के मतों को लोगों के सामने रखना, ताकि लोग निष्पक्ष मत बना सकें, सरकार सही फैसला कर सके।   क्या हमारे पास विरोधियों की, सही हो या गलत, आलोचना के अतिरिक्त और कुछ है?

क्या दावे के साथ कहा जा सकता है कि अगर्चे आज गांधी होते तो......   क्या करते

 

तीसरा  – स्वच्छता का मखौल

सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान की नींव डाली। हमें यह बात अच्छी तरह समझनी चाहिए कि  स्वच्छता का पहला कदम गंदगी न करना है। हम अपना घर भी सिर्फ इस कारण साफ रख पाते हैं क्योकि उसे गंदा नहीं  करते। विदेशों में भी गंदगी न करने का अभ्यास ही स्वच्छता बनाए रखता है। यानि स्वच्छता रखने के लिए यह आवश्यक है कि गंदगी न की जाये। इसके लिए आवश्यक है कि जनता का सहयोग मिले और वे गंदंगी न फैलाये। यह कोई कठिन कार्य भी नहीं है केवल जागरूकता की अवश्यकता है। सरकार के आवाहन पर केवल विद्यार्थी और युवा ही नहीं, अच्छे घरों की महिलाएं भी संगठन बना कर इस कार्य में जुटी हुई थीं। वे जुलूस नहीं निकाल रही थीं बल्कि लोगों में पास जा कर उन्हे गंदगी न करने का संदेश दे रही थी। जनता भी उत्साहित और सहयोगी थी। जनता द्वारा सरकार को दिया जाने वाला सहयोग विपक्ष को तो नहीं रुचा, यह बात तो समझ आती है। लेकिन बुद्धिजीवियों और गांधी वादी संस्थाओं को भी इसमें बू आई और इस अभियान का व्यापक रूप से मखौल उड़ाया गया। जनता में फैल रही जागरूकता ठिठक गई। जनता ने सरकार का साथ देना बंद कर दिया और वापस अपने दबड़े में घुस गई और गंदगी फैलाओ अभियान में फिर से जुट गई। मैं आज तक समझ नहीं पाया कि हम इस अभियान से क्यों नहीं जुड़ पाये। इस प्रकार जनता को बरगला कर हमने गांधी का कौन सा धर्म निभाया? क्या लाभ हुआ?

क्या दावे के साथ कहा जा सकता है कि अगर्चे आज गांधी होते तो......  क्या करते

 

चौथा  – निष्पक्षता का लोप

यह झिड़की गांधी ने दी थी समाचार पत्रों के संपादकों को, “आप अपना समय और शक्ति बाल की खाल निकालने में, दोष-दर्शन में और छिद्रान्वेषण में बर्बाद करते हैं। आपको थोड़ी सी भी त्रुटि मिल जाती है – फिर वह वास्तविक हो या काल्पनिक – आप अच्छी तरह जांच किए बिना ही सत्तारूड़ सरकार के विरुद्ध प्रचार करने और अप्रीति फैलाने में उसका दुरुपयोग करते हैं मालूम होता है कि यह आपका धंधा बन गया है। क्या वर्तमान सरकार की कोई प्रवृत्ति ऐसी नहीं है, जो आपके सहयोग की पात्र हो?”

          गांधी का ध्यान सही और गलत पर था लेकिन हमारा ध्यान व्यक्ति पर है। गांधी मानते थे कि गलत व्यक्ति भी सही हो सकता है और सही व्यक्ति भी गलत। गलत और सही व्यक्ति नहीं उसका कार्य होता है। पाप से घृणा, ‘पापी से नहीं। समीक्षा कार्य की होनी चाहिए। लेकिन हम यह मानते हैं कि सही व्यक्ति हर समय सही है और गलत व्यक्ति हर समय गलत। इतना ही नहीं, यह आकलन करते समय हमारा अपना स्वार्थ भी इससे जुड़ जाता है। हम कभी भी किसी भी अंगुलीमाल को कभी भी वाल्मीकि नहीं बनने देंगे।  हम क्यों निष्पक्ष होकर निर्णय नहीं ले पाते?

क्या दावे के साथ कहा जा सकता है कि अगर्चे आज गांधी होते तो......  क्या करते?

 

अगर विश्लेषण करें तो पन्ने के पन्ने रंगे जा सकते हैं। प्रश्न है खुले मन बातों को समझना। सही और गलत का सही आकलन करना। गलत का विरोध जितना जरूरी है, सही का समर्थन भी उतना ही आवश्यक है। विरोध करने के जिद में हम आकलन करने की शक्ति खो देते हैं और गलत राह पर चल पड़ते हैं। गलत के बजाय सही का विरोध ज्यादा जोश से करने लगते हैं। सही का समर्थन करना हमारे अहम को ठेस पहुंचाने लगता है। यह नितांत आवश्यक है कि हम निरंतर अपने को कसौटी पर कसते रहें।

          पनी भूल को स्वीकार करने में अहम न रखें। अगर कदम गलत राह पर निकल पड़े हों तो उसे वापस खींच कर सही दिशा में मोड़ने में संकोच अनुभव न करें। इस बात की परवाह न करें कि दूसरा क्या कर रहा है। दूसरे के बुराई हम तुरंत अपना लेते हैं लेकिन उसकी अच्छाई की तरफ नज़र उठा कर भी नहीं देखते। अपनी अच्छाई बरकरार रखें और दूसरों की अच्छाई को अपनायें। ऐसा करें तो शायद हम गांधी के रास्ते पर कुछ कदम तो चल ही पड़ेंगे!

          गांधी के नाम पर अपनी बात कह कर, भ्रामक बातें फैला कर, बे-बुनियाद और अनर्गल प्रश्न कर गांधी को बदनाम न करें, उनको समझने का प्रयत्न करें, कठिन है लेकिन हो सके तो उनकी तरह सत्य और अहिंसा का मार्ग अपनाएं।

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उपकार मानो, एहसान नहीं                               संस्मरण  - जो सिखाती है जीना

भूदेव बाबू, कोलकाता के जाने–माने समाजसेवी थे। वे भगवान शंकर के परम भक्त थे। गरीबों-असहायों की भरपूर सहायता किया करते थे। साथ ही विद्वानों तथा ब्राह्मणों का सम्मान करना वे अपना सर्वोपरि धर्म मानते थे। उनकी सेवा का कोई मौका वे हाथ से नहीं जाने देते थे। वे अक्सर कहा करते – सरस्वती पुत्र, शिक्षक तथा ब्राह्मण प्राय: अधिक संकट में रहते हैं। उनकी सेवा-सहायता करके उन्हें शिक्षा एवं सदविचारों के प्रचार में लगे रहने की दिशा में प्रोत्साहन दिया जाना चाहिये। उन्होंने विद्वानों की सहायता के लिये अलग से बाबा विश्वनाथ सहायता कोश की स्थापना की। वे प्रतिभाशाली विद्वानों एवं विरक्त ब्राह्मणों की उस कोश से सहायता किया करते थे।

          उनके मुनीम ने वर्ष के अंत में एक सूची उनके सामने प्रस्तुत की, जिसमें लिखा था, ‘इस वर्ष जिन-जिन अध्यापकों एवं विद्वानों को विश्वनाथ-वृत्ति प्रदान की गयी है, उनकी नामावली। सूची देखते ही भूदेव बाबू ने नाराजगी प्रकट करते हुए कहा, ‘मुनीमजी! उस सूची के ऊपर लिखो कि इस वर्ष जिन माननीय अध्यापकों और विद्वानों ने विश्वनाथ-वृत्ति स्वीकार करने की कृपा की, उनकी नामावली

          वे कहा करते थे कि जो विद्वान हमारी सहायता स्वीकार करते हैं, हमें उनका उपकार मानना चाहिये, न कि उनपर एहसान जताना चाहिये

(कल्याण, गीतप्रेस गोरखपुर से)



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रविवार, 1 जनवरी 2023

सूतांजली जनवरी 2023

 सूतांजली

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वर्ष : 06 * अंक : 06                                                                जनवरी * 2023

नव-वर्ष 2023 पर हार्दिक शुभ कामनाएँ

 

सद्गुण एक प्रकार की बुद्धि है जिसे सिखाया नहीं जा सकता और इसलिए यह ज्ञान नहीं है।

जो लोग यह दावा करते हैं कि यह एक ज्ञान है और इसे सिखाया जा सकता है,

वे यह भूल जाते हैं कि उनके अच्छे काम का परिणाम ज्ञान नहीं

बल्कि उनके सच्चे विचारों की देन है। 

(प्लूटो)

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सद्गुणों के उत्सव में                                                       मैंने पढ़ा

एक समय की बात है। एक भव्य महल था, जिसके बीचों बीच एक मंदिर था। किन्तु आज तक उसकी देहली भी किसी ने पार नहीं की थी। और तो और, उसकी बाहरी चहारदीवारी तक भी पहुंचना मर्त्य प्राणियों के लिए प्रायः असंभव था, क्योंकि महल ऊंचे बादलों पर खड़ा था और आदिकाल से बिरले ही वहाँ का मार्ग ढूँढने में समर्थ हुए थे। यह था सत्य का महल।

          एक दिन वहाँ उत्सव का आयोजन हुआ, मनुष्यों के लिए नहीं, बल्कि उनसे अत्यंत भिन्न प्रकार की सत्ताओं के लिए। इसमें वे छोटे-बड़े देवी-देवता आमंत्रित थे जो इस पृथ्वी पर सद्गुणों के नाम से पूजे जाते हैं।

          उस महल के बाहरी भाग में एक बहुत बड़ा कक्ष था। उसकी दीवारें, फर्श और छत स्वयं प्रकाशित थीं, वे हजारों अग्नि-स्फुलिंग से और भी जगमगा रही थीं। यह था बुद्धि का महाकक्षयहाँ फर्श के पास प्रकाश बहुत हल्का था, नीलमणि के रंग का अति सुंदर गहरा नीला रंग छत की ओर अधिकाधिक तेज़ होता गया था। छत में हीरों के शमादान झाड-फ़ानूसों की तरह लटक हुए थे। उनके हजारों मुखों से आँखों को चौंधियाने वाली किरणें चारों ओर फूट रही थीं।

          सद्गुण अलग-अलग आये पर शीघ्र ही अपनी-अपनी रुचि के अनुसार टोलियाँ बना कर बैठ गये। सब प्रसन्न थे कि आज ऐसा दिन आया जब वे एक बार इकट्ठे हो सके। वे साधारणतः इस जगत में और अन्य जगतों में बिखरे रहते हैं, परायों की भीड़ में छितरे रहते हैं। इस उत्सव की अध्यक्षता की दिल की सच्चाई  ने जिसका वेश जल के समान निर्मल था, उसके हाथों में एक घनाकार, अति विशुद्ध स्फटिक था। उस स्फटिक से वस्तुएँ वैसी दिखलाई देती थीं जैसी वे वस्ताव में होती थीं, जैसी वे साधारणतया प्रतीत होती हैं उससे सचमुच बहुत ही भिन्न, क्योंकि उसमें वस्तुएँ हूबहू, बिना किसी विकृति के प्रतिबिम्बित होती थीं।

          उसके पास ही दो मूर्तियाँ विश्वस्त अंगरक्षकों की तरह खड़ी थीं; एक थी विनम्रता, उसका भाव आदरपूर्ण और साथ ही गर्वीला था, और दूसरी ओर उन्नत ललाट, उज्ज्वल चक्षु, दृड़ हास्यपूर्ण अधर, प्रशांत, निश्चिंत भंगिमावाला साहस  था। साहस के समीप, उसके हाथ में हाथ डाले, बुरके में लिपटी एक नारी खड़ी थी। केवल उसकी तीक्ष्ण आँखें ही घूँघट को भेद कर चमकती हुई दीख पड़ती थी। वह थी सावधानता

          सबके बीच एक दूसरे के पास आती-जाती, फिर भी हर समय सब के निकट दीखती थी उदारता – एक ही साथ सतर्क एवं शांत, कर्मरत एवं विवेकपूर्ण। उस समूह में वह जिधर निकल जाती उधर ही अपने पीछे उज्ज्वल मृदु प्रकाश की रेखा छोड़ती जाती थी। यह प्रकाश जो उससे छिटक कर विकिरण हो रहा था वास्तव में उसे अपनी श्रेष्ठ सखी, चिर सहचरी और जुड़वाँ बहन न्यायपरता से मिल रहा था, किन्तु वह उसके पास सूक्ष्म रूप में, अधिकतर दृष्टियों से ओझल रह कर आ रहा था। दया, धैर्य, सौम्यता’, अनुकम्पा और ऐसे अनेकों की उज्ज्वल सेना उदारता को घेरे हुए थी। 

          सभी आ चुके थे। कम-से-कम सब की ऐसी धारणा थी।

          किन्तु यह लो, वह कौन है? स्वर्ण-द्वार पर हठात एक नवागंतुक! द्वार पर नियुक्त द्वारपालों ने बड़ी कठिनाई से उसे अंदर आने दिया था। न तो उन्होंने उसे पहले देखा था और न ही उसकी आकृति में उन्हें कोई प्रभावशाली चीज लगी। सचमुच बहुत कम उम्र की थी, उसकी देह दुबली-पतली और सफ़ेद पोशाक साधारण, बल्कि गरीब जैसी थी। वह डरती-सी, झिझकती-सी कुछ कदम आगे बढ़ी। पर स्पष्ट ही वह अपने को ऐसी वैभवशाली उज्ज्वल भीड़ के बीच पाकर खो-सी गयी। वह ठिठक गयी, उसे पता न था कि किसकी ओर जाये।

          उधर सावधानता अपने साथियों से कुछ परामर्श करके उनके अनुरोध पर अनजाने मेहमान की ओर बढ़ी। वह जरा गला साफ करके, जैसा कि दुविधा में पड़े लोग थोड़ा सोचने के लिए करते हैं, उसकी ओर अभिमुख होकर बोली, “हम सब जो इस महल में इकट्ठे हुए हैं एक-दूसरे के नाम और गुण जानते हैं। आपको आते देख कर हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा है। आप हमें विदेशी-सी प्रतीत हो रही हैं। कम-से-कम ऐसा नहीं लगता कि आपको पहले कभी देखा हो। क्या आप बताने की कृपा करेंगी कि आप कौन हैं?

          नवगता ने लम्बी साँस लेते हुए उत्तर दिया, “हाय! मुझे आश्चर्य नहीं कि मुझे इस प्रसाद में विदेशी माना जा रहा है, क्योंकि मैं कदाचित ही कहीं आमंत्रित होती हूँ।

          “मेरा नाम है कृतज्ञता’”

(श्री अरविंद सोसाइटी से प्रकाशित पत्रिका अग्निशिखा से)

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ययाति आख्यान                                                         मेरे विचार

ययाति, पांडवों के वंश में सम्राट नहुष का पुत्र था, पराक्रमी और न्यायप्रिय। दैवयोग से असुरों के गुरु शुक्राचार्य के श्राप से ग्रस्त अ-समय में वृद्धावस्था को प्राप्त हुआ। सांसारिक भोगों को भोग कर ययाति की तृप्ति नहीं हुई थी अतः उन्होंने क्षमा याचना करते हुए ऋषि की स्तुति की और अपने श्राप को वापस लेने की प्रार्थना की। शुक्राचार्य ने अपने क्रोध को वश में कर बताया कि वे श्राप को पूर्णतया वापस नहीं ले सकते लेकिन उन्होंने एक विकल्प दिया –अगर कोई तुम्हारे बुढ़ापे के बदले अपनी जवानी देने को तैयार हो तो इस बुढ़ापे से जवानी की अदला-बदली हो सकती है। राजा को यह विकल्प बहुत सहज लगा और प्रसन्न मन वापस आ गए और सुपात्र खोजने लगे। लेकिन अकथ परिश्रम और आधे राज्य तक का प्रलोभन देने पर भी कोई भी व्यक्ति इस अदला-बदली के लिए तैयार नहीं हुआ। आखिर उन्होंने अपने बेटे से इसकी चर्चा की और उससे अपनी जवानी देकर पिता का बुढ़ापा लेने का प्रस्ताव रखा। लेकिन एक-एक कर सब बेटों ने भी इंकार कर दिया। आखिर वे अपने सबसे छोटे पुत्र, पुरू, से भी याचना की। पुरू ने कहा कि वह उनके प्रस्ताव पर विचार करेगा।

          पिता के इस प्रस्ताव पर विचार कर पुरू अपने पिता के पास आता है और कहता है कि वह इस अदला-बदली के लिए तैयार है लेकिन वह अपने पिता को बताना चाहता है कि उसे यह प्रस्ताव क्यों स्वीकार है।  पिता की स्वीकृति पर वह कहता है-

          पिताजी, मैं आपके बुढ़ापे के बदले जवानी देने को तैयार हूँ लेकिन मैं आपके इस प्रस्ताव को “पुत्र कर्तव्य” बोध से नहीं कर रहा हूँ। इस प्रस्ताव को स्वीकार करने का कारण यह नहीं है कि मैं इसे अपने पिता की आज्ञा मान रहा हूँ। न ही मैं यह विचार कर रहा हूँ कि पिता की प्रसन्नता ही पुत्र का कर्तव्य  है। और न ही मैं यह इस लिए कर रहा हूँ कि इससे मुझे पुण्य मिलेगा और मुझे मोक्ष की प्राप्ति होगी। ये तीनों ही कारण नहीं है। तब और क्या कारण हो सकता है?

          “मुझे लगता है कि अपने वंश में कहीं कोई दोष हुआ है, जिसके कारण इतना भोग-विलास करने के बाद भी आपको संतुष्टि नहीं हुई और आप अभी और भोग की कामना रखते हैं। आपको लगता है कि और कुछ समय भोग भोगने से संतुष्टि मिल जाएगी लेकिन यह यथार्थ से परे है। समय आने पर, शायद मैं भी अपने पुत्र के सामने ऐसा ही प्रस्ताव रखूँ और कालांतर में मेरा पुत्र अपने पुत्र से ऐसी अपेक्षा रखे। तब, यह कब-कैसे समाप्त होगा। मेरे विचार से हमें जीवन में लगी गांठों को खोलने का प्रयत्न करना चाहिए, न कि नई गांठें लगाने का। हमें ऐसा कोई भी सूत्र, बात, आज्ञा का पालन नहीं करना चाहिए जो जीवन में गांठों को खोलने के बजाए नई गांठें लगाए। अपने वंश के विकार को मैं यहीं समाप्त कर देना चाहता हूँ, जवानी और भोग के महत्व को मैं यहीं समाप्त कर देना चाहता हूँ। अतः मैंने विचार किया है कि मैं इसे यहीं समाप्त कर दूँ ताकि यह न तो परंपरा बने और न ही उदाहरण। इस असत परंपरा को निर्मूल बनाने के उद्देश्य से मुझे आपका प्रस्ताव मंजूर है।”

(हमारा एक गलत कार्य, हमारा एक गलत निर्णय  हमारे परिवार-वंश में एक गलत परंपरा पैदा करती है, एक अच्छी परंपरा को नष्ट कर देती है। यह शनैः-शनैः हमारा सर्वनाश कर देती है। परम्पराओं को हटाना बड़ा आसान है लेकिन उन्हें बनाना उतना ही कठिन। बिना समझे उन्हें छोड़ना अपने वंश को नष्ट करना है और इन्हें बचाना अपने वंश को बचाए रखना है। इसका असर कई बार पीढ़ियों के बाद महसूस होता है। रोज़मर्रा के जीवन में कई परिवार बड़े सुसंस्कृत और बंधे-बंधे नजर आते हैं तो कई बिखरे-बिखरे और असभ्य। इनके मूल में जाकर देखें। क्या हटाना है और किसे मजबूत करना है, इसका निर्णय सुविधा-असुविधा पर मत छोड़िए। गलत कार्य छोटा-बड़ा नहीं होता, बस गलत ही होता है। एक छोटा कंकड़ भी अपनी गति से विनाश कर सकता है। हमारे कर्म का उद्देश्य यही होना चाहिए कि हम जीवन की गांठें खोलें और आगे के जीवन में कोई गांठ लेकर न जाएँ। अनेक अनजानी-अनबूझी परम्पराओं का कार्य बस इतना ही होता है कि नई गांठें न बने और बनी हुई गाँठे खुल जाये। हमारे जीवन में गांठें नहीं हैं, वे प्रकृति के नियमानुसार चलता रहता है यह हमारी समझ और बुद्धि है जो जीवन में गांठें पैदा करती हैं, हमें उनका ही ध्यान रखना है।)

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बड़े लोग, छोटे लोग                                           लघु कहानी - जो सिखाती हैं जीना

मीता के बेटे को बुखार था और वह कार्टून कैरेक्टर्स के चित्रों की जिद लगा बैठा था। उसे दादी के पास रहने की हिदायत देकर मीता बाजार के लिये निकल पड़ी और फुटपाथ पर स्टिकर और पोस्टर बेचने वाले एक बच्चे के पास रुकी। मीता ने मिकी माऊस पसंद किया। साथ ही उसका ध्यान इस बात की तरफ भी गया कि उसके साथ मोटू-पतलू का भी एक पोस्टर चिपका हुआ है। पर वह चुप रही। पोस्टर हाथ में ही लिये हुए उसने दाम पूछे। बच्चे ने २० रुपये बताये। उसने कहा, मैं १० ही दूँगी। वो उदास हो गया। मीता आगे बढ़ने को हुई कि उसने कहा, ठीक है मैडम जी ले जाओ। वैसे ही खाने के लाले हैं, जो मिल जाये वही ठीक है

          घर आकर उसने बच्चे को बताया कि किस तरह उसने एक पोस्टर का दाम आधा करवा लिया और मिकी माऊस के साथ मोटू-पतलू का एक एक्सट्रा पोस्टर भी ले आई। बच्चा आश्चर्य से मम्मी को देख रहा था। वो बोला मम्मा! आपने ही तो सिखाया है कि कभी झूठ नहीं बोलना चाहिये, चीटिंग नहीं करनी चाहिये। आपने उस बच्चे के साथ अच्छा नहीं किया। कहकर वह उदास हो गया। जब मीता ने उसे दवा देने की कोशिश की तो उसने मना कर दिया। कहा, जब तक उस बच्चे को इन पोस्टरों की पूरी कीमत देकर नहीं आयेंगी मैं दवाई नहीं लूँगा।

          मीता वहाँ पहुंची तो देखा वह बच्चा वहाँ नहीं था। पास बैठी बूढ़ी अम्मा से, जो सब्जी बेच रही थी, पूछा तो उसने कहा, वो बाजार के पीछे कच्ची बस्ती में रहता है। मीता तुरंत कच्ची बस्ती की तरफ गई। किसी से पूछा - वो पोस्टर बेचने वाला बच्चा कहाँ रहता है? उसने सामने झोपड़ीनुमा कमरे की तरफ इशारा किया। अंदर प्रवेश करने वाली ही थी कि माँ-बेटे की बातचीत सुनकर ठिठक गई। लड़का कह रहा था, माँ, देखो मैं बिस्कुट लेकर आया हूँ। तुम जल्दी से खाकर दवाई ले लो। माँ को दवाई देकर वह बाहर आया। बाहर मीता को खड़ी देखकर ठिठक गया। मीता ने कहा – बेटा! मैं  एक के बदले दो पोस्टर ले गई थी। ये लो १०० रुपये। लड़का बोला, मैडम जी, दो स्टीकर के ४० रुपये ही होते हैं, आप उतने ही दीजिये।

          मीता नि:शब्द थी। घर आकार बच्चे को सारी बात बताई। बच्चा आराम से दवा लेकर सो गया। मीता सोच रही थी कि कभी-कभी बच्चे भी जिंदगी का महत्वपूर्ण पाठ पढ़ा देते हैं।

(वे सद्गुण जिन्हें आप अपने बच्चों में देखना चाहते हैं, पहले खुद उन्हें अपनाइये।)

                                                                                                                                    (अलका जैन) 

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यू ट्यूब पर सुनें : à

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गुरुवार, 1 दिसंबर 2022

सूतांजली दिसम्बर 2022

सूतांजली

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वर्ष : 06 * अंक : 05                                                                दिसम्बर   * 2022

श्रद्धा, प्रसन्नता, अंतिम विजय में विश्वास,

ये चीजें हैं जो सहायता देती हैं और

प्रगति को ज्यादा आसान और तेज़ बनाती हैं।

तुम्हें जो अच्छी अनुभूतियाँ होती हैं उन्हें ज्यादा महत्व दो।

                                                                                                                        श्रीमाँ

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बड़ी-बड़ी छोटी-छोटी बातें                                               मेरे विचार  

(कई दशक पहले)

सेव क्या भाव?  20 रुपए

और नारंगी? 15 रुपये

मौसमी? 15 रुपये

सफेदा (चीकू)? 18 रुपए

अंगूर? 25 रुपये

सब 2-2 किलो तौल दो।

फल-वाला बहन जी को देखता रह गया। असमंजस में पड़ा फलवाले ने सब तौल दिये, बहन जी,  किलो के हिसाब से रुपए पकड़ा कर चल दी। फलवाला कुछ देर तक अंगुलियों के बीच रुपए को दबाये बहन जी की तरफ देखता रहा इस आशा से कि बहन जी शायद कुछ कहेंगी। लेकिन बहन जी तो थैला उठा कर जा चुकी थी। बात यह थी कि बहन जी की खरीद-दारी में कुछ के भाव किलो के थे तो कुछ के दर्जन के। बहन जी को इसकी जानकारी नहीं थी। यह जानकारी थी उसकी माँ-सासू माँ को जो अब बाजार जाने लायक नहीं रह गई थीं। धीरे-धीरे ऐसे बहनों की संख्या बढ़ती गई और दर्जन भी किलो में परिवर्तित हो गया। यह भी सही है कि कुछ समय बाद भाव भी किलो के हिसाब से ही व्यवस्थित हो गया।  परिवार के बुजुर्गों को इसकी जानकारी है। प्रारम्भ में यह परिवर्तन धीरे-धीरे ही हुआ होगा लेकिन फिर अचानक एक विस्फोट सा हुआ, (धमाका नहीं) – अचानक लगा कि सब जगह यही हो रहा है और आप भी उसका ही हिस्सा बन गए।

          घर पर मरम्मत के काम के लिए बालू, सीमेंट और स्टोन चिप्स चाहिए थे। घर के पास ही दुकान पर सब समान लिखा दिया और बताया कि सामान ऊपर छत पर चढ़ाना है। पूछने पर बताया कि छत तीन तल्ले पर है। उसके चेहरे पर असमंजस के भाव आ गए, कहा, ‘आपका तो मकान पुराना है चार तल्ले के बराबर की ऊंचाई है। मैंने विरोध किया और बताया कि कोरोना के बाद भी छत का काम हुआ था और तब भी इसको लेकर कोई बात ही नहीं थी। लेकिन मोंटू सहमत होता नहीं दिख रहा था, उसने पेन छोड़ दिया और एक निःश्वास छोड़ता हुआ बोला, ‘समय बदल गया है। उसने पैसे नहीं लिए, बोला मजूरा (मजदूर) को भेज कर पता लगाने के बाद ही हिसाब करेगा, पैसे माल पहुँचने के बाद ले लेगा। मैं समझ नहीं पाया कि यह क्या हो रहा है। खैर, पूरा सामान लिखवा कर वापस चला आया। सामान दूसरे दिन सुबह आना था।

          सुबह की सैर पर था कि फोन की घंटी बजी, पता चला की मजदूर समान लेकर आ गए हैं। उधर से मजदूर की आवाज आई, ‘आपनादेर बाड़ी तो तीन तौलार, छत तो चार तौलाते। (आपका मकान तो तीन तल्ले का है और छत चार तल्ले पर है)। वह स्थानीय भाषा बंगला में बोल रहा था। मैं बात तुरंत समझ गया। मैंने बंगला में जवाब न देकर हिन्दी में बोला, ‘नहीं मेरा मकान दो तल्ले का है और छत तीन तल्ले पर है।  माल चढ़ाने के पहले खुद जा कर देख लो फिर चढ़ाना। सैर से लौट कर आया तब तक पूरा माल तीन तल्ले पर चढ़ चुका था। उसने मेरी बात मान ली थी। राहत की सांस ली।

          यहाँ यह बताता चलूँ कि यह पूरा खेल भाषा का हुआ। बात यह है कि अँग्रेजी में ग्राउंड फ्लोर के बाद 1-2-3 फ्लोर शुरू होते हैं। हमारी हिन्दी में ग्राउंड फ्लोर का कोई, बोलचाल का शब्द नहीं है लेकिन हिन्दी में भी नीचे के तल्ले को छोड़ कर ही 1-2-3 तल्ले शुरू होते हैं। भारत की अन्य भाषा में क्या है मुझे जानकारी नहीं लेकिन बंगला में ग्राउंड फ्लोर एक तल्ला है, यानि सब मकानों के ऊंचाई एक-एक तल्ला बढ़ जाती है। विचार करने पर मुझे लगा कि कहीं पर मजूरी जोड़ते समय इस बंगला के हिसाब से ऊंचाई जोड़ कर पैसे लिए और दिये गए। किसी ने विरोध नहीं किया और फिर एक तल्ले की मजूरी फाऊ में मजदूरों को मिलने लगी। किसी ने विरोध किया तो मान लिया नहीं तो .....  क्या पता कल मजदूर इस बात पर अड़ जाए और मजदूरी एक तल्ले की ज्यादा देनी पड़े।

          ये तो हमारी दिनचर्या की छोटी-छोटी बातें हैं जो हमारे देखते-देखते बदल जाती हैं। पहले कुछ लोग करते हैं और फिर देखा-देखी सब वैसे ही हो जाते हैं। हमारा भी इसी प्रकार क्रमिक विकास हुआ। वैज्ञानिक खोज के अनुसार बंदर का विकास होकर मानव बना। लेकिन एक बार यह विकास हो जाने के बाद अब कोई बंदर मानव नहीं बन रहा है और न ही कोई मानव बंदर। यानी विकास होता है पतन नहीं। और ऐसे क्रमिक विकास का विस्फोट सा होता है, यानी पहले धीरे-धीरे और फिर अचानक सर्वत्र फैल जाता है।

          विज्ञान यही मानता है कि ब्रह्मांड में सब परिवर्तन – स्वरूप हो या भाव या चिंतन – ऐसे ही होता है। विश्व के किसी एक कोने में अचानक कुछ परिवर्तन होता है, धीरे-धीरे वे परिवर्तन बढ़ते जाते हैं और जब एक निश्चित प्रतिशत या मात्रा में यह परिवर्तन हो जाता है तब अचानक एक विस्फोट सा होता है और सारा विश्व उसकी चपेट में आ जाता है। इसका इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि ये परिवर्तन अच्छे हैं या बुरे, सात्विक हैं या तामसिक, दैवी हैं आसुरी – इसका सरोकार होता है केवल संख्या से, अनुपात से।

          शायद यही कारण है कि सामूहिकता पर ज़ोर दिया जाता है – संख्या बल बढ़ाने के लिए। लेकिन इस संख्या का प्रभाव तभी होता है जब सब प्रक्रिया से जुड़ें, केवल उपस्थित होना नाकाफी है। दुर्जन मन से जुड़ते हैं और सज्जनों में अलगाव रहता है, मन का जुड़ाव नहीं होता है। राम-कृष्ण की कथा में शायद आपने पढ़ा-सुना होगा कि जब भी अवतार आए कभी अकेले नहीं आए, अपने सभी गणों को उन्होंने भेजा। क्यों? क्या वे समर्थ नहीं थे? कारण केवल एक था दुर्भावना को कमजोर करना और सद्भावना को सुदृड़ करना। अगर भावना पवित्र हो जाए तब फिर अंजाम देना सहज होता है और उसका प्रभाव भी लंबे समय तक रहता है।

          आज की वर्तमान घटना अमेरिक-रूस-यूक्रेन और कुछ ही वर्ष पहले की घटना अमेरिका-उत्तर कोरिया के घटनाक्रम पर दृष्टिपात करें। रूस-यूक्रेन में बम-गोली-मिसाइल, मौतें-विध्वंस, जान-माल की हानि के बाद भी कोई परिणाम नहीं निकला है, और अमेरिका-उत्तर कोरिया बिना एक गोली छोड़े, बिना कोई बम-मिसाइल दागे, बिना किसी जान-माल की हानि के सब कुछ सहजता से सम्पन्न हो गया। आज की, रूस-यूक्रेन की, घटना की हम लंबी चर्चा करते हैं, अनवरत। अमेरिका-उत्तर कोरिया को हमने नजरंदाज किया। चर्चा करनी ही है तो शांति और अहिंसा की कीजिये, अशांति और हिंसा की नहीं। जिसकी चर्चा ज्यादा होगी, उसी की बढ़ोतरी होगी।

          हमें खुद को विचार करना है हम क्या चाहते हैं, कैसे चाहते हैं और उसके लिए क्या कर रहे हैं। यह कभी मत सोचिए कि आप अकेले क्या कर सकते हैं, आप न तो अकेले हैं और न ही कमजोर। एक अकेले में भीड़ से ज्यादा ताकत होती है।

          सकारत्मकता में विश्व को बदलने की क्षमता है। इन बड़ी-बड़ी छोटी-छोटी बातों में आणुविक ऊर्जा होती है, इन्हें नजरंदाज मत कीजिये। इनसे जुड़िये। लोग अपने आप जुड़ेंगे। दुनिया बदल जाएगी।

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परमात्मा यानी क्या ?                                                        मैंने पढ़ा

परमात्मा - जो समझ में नहीं आता है, उसी का नाम परमात्मा है। जो समझ में आ जाता है, उसका नाम संसार है। जो समझ में नहीं आता, वह भी है। समझ पर ही अस्तित्व की परिसमाप्ति नहीं है। समझ के पार भी अस्तित्व फैला हुआ है, इस बात की उद्घोषणा ही परमात्मा है। परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं है।

          इसलिए जो परमात्मा को व्यक्ति मानकर खोजने चलेंगे, व्यर्थ ही भटकेंगे, कहीं न पहुंचेंगे। परमात्मा तो अज्ञात का नाम है। अज्ञात का ही नहीं वरन अज्ञेय का। जिसे जानो तो जान न पाओगे, जिसे जितना जानने की चेष्टा करोगे, उतना ही पाओगे कि अनजाना हो गया। लेकिन फिर भी एक और द्वार से परमात्मा में प्रवेश होता है, उस द्वार का नाम ही प्रेम है। जानने से नहीं जाना जाता, लेकिन प्रीति से जाना जाता है, प्रेम से जाना जाता है।

          जानना ही अगर जानने का एकमात्र ढंग होता तो परमात्मा से संबंधित होने का कोई उपाय न था लेकिन एक और ढंग भी है। बुद्धि ही नहीं है तुम्हारे भीतर सब कुछ, हृदय का भी स्मरण करो।  सोच-विचार ही सब कुछ नहीं है तुम्हारे भीतर, भाव की आर्द्रता को भी थोड़ा अनुभव करो। आँखें सिर्फ कंकड़-पत्थर ही नहीं देखती है, उनसे प्रीति के आंसू भी झरते हैं। अगर विचार पर ही ठहरे रहे तो परमात्मा नहीं है। इसलिए नहीं कि परमात्मा नहीं है, बल्कि इसलिए कि विचार की क्षमता नहीं है परमात्मा को जानना।

          बुद्धि पदार्थ को जान सकती है परमात्मा को नहीं। हृदय परमात्मा को जान सकता है, पदार्थ को नहीं। कान संगीत सुन सकते हैं, रोशनी नहीं देख सकते। आँखें रोशनी देख सकती हैं, गंध का अनुभव नहीं कर सकते। प्रत्येक अनुभूति का अपना द्वार है और प्रत्येक अनुभूति केवल अपने ही द्वार से उपलब्ध होती है। 

          इस जीवन का सब कुछ तो हम विचार से सुलझा लेते हैं। और इसलिए एक भ्रांति पैदा होती है कि जब विचार से सब कुछ सुलझ जाता है, गणित सुलझ जाता है, भाषा सुलझ जाती है, तर्क सुलझ जाता है, दर्शन सुलझ जाता है, भूगोल, इतिहास, राजनीति, विज्ञान सब बुद्धि से सुलझ जाता है  - तो एक आशा बंधती है कि इस बुद्धि से हम परमात्मा को भी सुलझा लें। और इसी आशा में उपद्रव हो जाता है। इसी आशा में हमारी निराशा के बीज हैं। इसी आशा में हमारी विफलता है। और विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक तुम्हें बुद्धि की शिक्षा दी जाती है। इस जगत में कहीं भी तो कोई स्थान नहीं है जहां हृदय का प्रशिक्षण होता है। इसलिए मैं कहता हूं, यह जगत मंदिरों, मस्जिदों, गिरजा घरों  से भरा है, फिर भी ये सब इस जगत से समाप्त हो गये हैं। क्योंकि ये हैं वह जगह, जहां हृदय का प्रशिक्षण मिलना चाहिए।

          तुम्हारे मंदिर भी बुद्धि से भर गये हैं। वे भी पाठशालाएं हैं। वहां धर्मशास्त्र समझाया जा रहा है। तुम्हारे मंदिर भी मस्तिष्क के ही आवास हो गये हैं। अब वहां हृदय नहीं नाचता, अब वहां प्रेम की बांसुरी नहीं बजती, अब तो वहां भी तर्क के जाल फैलाये जा रहे हैं। हिन्दू है, वह मुसलमान के खण्डन में लगा है, मुसलमान है, वह हिन्दू के खण्डन में लगा है। आर्यसमाजी सनातनी का खण्डन कर रहा है, सनातनी आर्यसमाजी का खण्डन कर रहा है। मंदिरों में भी खण्डन-मण्डन हो रहा है। प्रीति का फूल खिले तो खिले कहाँ? मस्जिदों में भी प्रेम की शराब नहीं ढाली जा रही है, वहाँ भी तर्क और तर्क के सहारे ही जितना दूर तक जाया जा सकता है, उतनी दूर तक जाने की कोशिश की जा रही है।

          तर्क तो ऐसा जैसे अंधे के हाथ में लकड़ी। थोड़ा टटोल लेता है। और अंधे के हाथ में लकड़ी फिर भी थोड़ा काम आती है। एकदम व्यर्थ है, ऐसा मैंने कहा भी नहीं, ऐसा मैं कहूंगा भी नहीं उसकी अपनी सार्थकता है। अंधा आदमी है तो लकड़ी से टटोलकर अपने घर आ जाता है, दरवाजा खोज लेता है, अपने जूते तलाश कर लेता है, टकराता नहीं। मगर अंधे की लकड़ी उसकी आंख नहीं बनती, और न आँख बन सकती है। और अगर आंख मिल जाए तो लकड़ी को तत्क्षण छोड़ देना होगा। फिर कौन चिन्ता करता है लकड़ी की!

          इसलिए जिन्होंने हृदय को थोड़ा खुलने का अवसर दिया, हृदय की कली को फूल बनने दिया, उन्होंने फिर तर्क की बकवास छोड़ दी। फिर वे परमात्मा में जीने लगे। वे परमात्मा के  लिए प्रमाण नहीं देते फिर वे स्वयं परमात्मा के प्रमाण हो जाते हैं। उनका उठना, उनका बैठना, उनका बोलना --सब परमात्मा की अभिव्यक्ति हो जाती है उनका सारा जीवन परमात्मा का एक गीत हो जाता है। उनके जीवन से एक सुवास उठती है।

          तुम्हारे जीवन में भी वैसी सुवास उठ सकती है। हकदार तुम भी हो। उतने ही मालिक हो तुम, जितना कोई बुद्ध, जितना कोई कृष्ण, जितना कोई क्राइस्ट। उतने ही मालिक हो तुम, जितने महावीर, जितने मुहम्मद, जितनी मीरा । तुम्हारी मिल्कियत जरा भी कम नहीं है। मगर, अगर तुम दीवाल से निकलने की चेष्टा करोगे और न निकल पाओ, तो अपने भाग्य को कसूर मत देना। दरवाजा है तो दीवाल से निकलने की चेष्टा क्यों कर रहे हो? क्यों दीवाल पर सिर मार रहे हो? और सिर से जितने भी काम होते हैं, बस वे दीवाल से सिर मारने जैसे हैं।

          तुम्हारे भीतर एक और भी अंतरंग जगत है। तुम्हारे भीतर भाव का भी एक लोक है। बहुत कोमल, बहुत नाजुक। और चूंकि कोमल है, नाजुक है, इसलिए बहुत छिपाकर रखा गया है। जितनी बहुमूल्य चीज होती है, उतना ही तो गहरा हम खोदकर जमीन में उसे गाड़ देते हैं! कि चोरी न हो जाए। बुद्धि तो ऊपर-ऊपर है, क्योंकि कचरा है। हृदय बहुत गहरे में है, क्योंकि वहीं तुम्हारी संपदा है, वहीं  तुम्हारी समाधि छिपी है, और वहीं तुम्हारे समाधान हैं। बुद्धि कामचलाऊ है; बाजारू है, सस्ती है। हृदय तुम्हारे जीवन का मूल आधार है।

ओशो

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