शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

सूतांजली, नवंबर २०१९


सूतांजली                            ०३/०४                                               नवंबर  २०१९
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झंझटों से मुक्ति का कठिन उपाय
हाँ, सही पढ़ा है आपने, कठिन उपाय। अब सरल उपाय में क्या धरा है? अब आसान काम हमें आकर्षित नहीं करते। जोखिम भरे काम ही हमें आकर्षित करते हैं।

ताजमहल की भौंडी नकल में अंग्रेजों ने कोलकाता में विक्टोरिया मेमोरियल बनाया। मैं सोचता हूँ अगर यह नहीं होता तो कोलकाता वासियों का क्या होता? सुबह से लेकर शाम तक लोगों का जमावड़ा बना रहता है। सुबह सुबह बुजुर्ग लोग स्वास्थ्य लाभ के लिए आते हैं। दिन में पर्यटक म्यूज़ियम देखने आते हैं। शाम को बच्चों और नव युवक-युवतियों का समय होता है। मैं सुबह घूमने वालों में हूँ। यहाँ एक बुजुर्ग आते हैं। उनका परिचय किसी भी नए शख्स से कराया जाता है तब वे तपाक से २-३ सवाल करते हैं – क्या नाम है? क्या काम है? कौन ग्राहक हैं? इन कतिपय प्रश्नों से वे उस नए मुर्गे के पॉकेट की गहराई नाप लेते हैं। अब अगर उनकी यह आदत है तो है, मुझे अच्छा नहीं लगता तो यह मेरी तकलीफ है।

एक दिन उनके दल के बीच पहुंचा तो पता चला कि वे सज्जन किसी झंझट में हैं और उसी की चर्चा हो रही है। झंझट था, उनके पोते के जन्म का। मैं तुरंत बोला, “झंझट तो है ही? लेकिन इसका पता ७-८ महीने पहले ही चल गया होगा! आपको उसी समय कोई उपाय करना चाहिए था। उस समय चूक गए, कोई बात नहीं तुरंत किसी को गोद देने की व्यवस्था कर लीजिये। लेने वाले मिल जाएंगे। आप कहें तो ऐसी दम्पति खोजने में आपकी मदद करूँ?” सन्नाटा छा गया। भाई साहब जबर्दस्त गरम हो गए। मैंने हाथ  जोड़ कर माफी मांगते हुआ कहा कि मेरा इरादा आपको ठेस पहुँचाने के नहीं था। लोग अक्सर झंझट की चर्चा उससे मुक्ति पाने के उद्देश्य से करते हैं। मैंने उसी इरादे से यह सुझाव दिया। भाई साहब तो नरम नहीं ही पड़े बल्कि उनके मित्रों ने कहा कि बोलचाल की भाषा में हम यही कहते हैं इसका यह अर्थ नहीं होता है जैसा मैंने लगाकर काफी उल्टी सीधी बातें कह दीं। मैंने उनकी बात मनाने से इंकार कर दिया, कहा “जुबान पर वही बात आती है जो हमारे दिमाग में होती है”

अर्थ कमाने की अन्धाधुन्द दौड़ में हमें हमारे सब उत्सव, त्यौहार, खुशी के मौके झंझट लगने लगे हैं। हमें यह पता ही नहीं कि हम क्यों कमा रहे हैं, कितना कमाना है और उस कमाई का क्या करना है? और इसलिए उसमें किसी भी प्रकार का व्यवधान झंझट ही हो गया है। दिवाली-होली-राखी हो या विवाह-जन्म-सालगिरह हो, ये सब झंझट ही हो गए हैं। हम पहले ये मन से मनाते थे अब हम ये धन से मनाते हैं। पहले इनमें हमारा दिल लगता था, अब हमारा दिमाग लगता है। पहले अपने परिवार, परिचित और पास-पड़ोस के साथ और सहयोग से मनाते  थे। अब शुभचिंतक, सहयोगी और मित्रों की टोली रहती है और इवैंट मैनेजमेंट का सहयोग रहता है। इसी कारण ये सब खुशी के मौके झंझट हो गए हैं। झंझट शब्द खुद-ब-खुद होठों पर आ जाता है क्योकि दिल और दिमाग में यही रहता है। हमें हमारे जीवन के सुहावने क्षण अब झंझट सरीखे लगने लगे हैं। अपना रोज-रोज का झंझट सुहावना लगने लगा है और इनके बीच पैदा हुआ सुहावना क्षण, झंझट।

अभी अभी त्योहारों का मौसम गया है, लेकिन आगे आते रहेंगे। कल सुबह जब सैर पर जाएँ या पूजा घर में बैठे हों या रात बिस्तर पर जाएँ  तो थोड़ा सा इस पर विचार कीजिये। उत्सव धन से नहीं मन से मनाइए। दिल खोल कर मनाइए। त्योहार समझ कर मनाइए। और सबसे बड़ी बात परिवार के साथ मनाइए। देखिये झंझट शब्द नहीं आयेगा।  आसान नहीं है, लेकिन उतना कठिन भी नहीं। और मैंने तो पहले ही कह दिया झंझटों से मुक्ति का कठिन उपाय। क्या कहते हैं आप? हाँ, हम कर सकते हैं, करेंगे? होंगे कामयाब?
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समय का उपयोग और सेवा कार्य
दूसरे विश्व युद्ध के समय की बात है। विश्व युद्ध का ऐलान हो चुका था और वाइसराय ने बिना काँग्रेस से सलाह मशवरा किए एक तरफा घोषणा कर दी थी कि भारत मित्र राष्ट्रों के साथ है। यह बात काँग्रेस को पची नहीं और वे नाराज हो गए। इस अवस्था में वाइसराय ने गांधी को चर्चा के लिए आमंत्रित किया। वाइसराय उस समय शिमला में थे अत: गांधी वहीं पहुंचे। कई दिनों की  चर्चा के बाद वाइसराय को बात आगे बढ़ाने के लिए लंदन से निर्देश लेने की आवश्यकता महसूस हुई।  अत: चर्चा में एक सप्ताह का अंतराल आ गया। गांधी एवं उनके साथियों के पास शिमला में कोई दूसरा कार्य नहीं था। उस समय की यातायात की व्यवस्था के अनुसार वहाँ से किसी भी कार्यस्थल तक पहुँचने में कम से कम २ दिनों का समय लगता। यानि आने जाने में ही ४ दिन नष्ट हो जाते, परेशानी और खर्च अलग। अत: गांधी के साथियों को लगा कि अब ७  दिनों की छुट्टी और वे शिमला तथा आस पास की अन्य जगहों में घूमने के कार्यक्रम बनाने लगे। लेकिन गांधी के पास दूसरी योजना तैयार थी। उन्होने वापस सेवाग्राम चलने की घोषणा कर दी। वहाँ मुश्किल से ३ दिन ही रहा जा सकता था। साथी यह नहीं समझ पा रहे थे कि वहाँ ऐसा कौनसा काम है कि भयानक गर्मी में इतनी लंबी यात्रा कर सेवाग्राम जाना और फिर ३ दिन बाद वापस शिमला लौटना। लेकिन गांधी अपनी बात पर अटल रहे। उन्होने कहा, “सेवाग्राम में परचूरे शास्त्री हैं। वे संस्कृत के विद्वान हैं और कुष्ट रोग से पीड़ित होने के कारण उनके परिवार वालों ने उन्हे छोड़ दिया है। उन्हे हमारी सेवा की आवश्यकता है”। गांधी के लिए परचूरे शास्त्री की सेवा करना उतना ही महत्वपूर्ण था जितना शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतिनिधि से दूसरे विश्वयुद्ध में भारत के रुख पर चर्चा करना

समय का सदुपयोग करना और सेवा कार्य को महत्व देना, गांधी के विशेष गुण थे जिसका विश्व के शक्तिशाली सम्राट भी लोहा मानते थे।
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सुख की खोज
सुख!
इसकी खोज में  हम जीवन भर भटकते रहते हैं। दौड़ते रहते हैं। लेकिन यह सुख है कि मृग मिरीचिका कि भांति सामने दिखती तो है लेकिन हाथ नहीं आती।
सबके सुख भी अलग रंग, रूप, आकार और वस्तु की होती है। सुख! किसका सुख? अपना सुख! बस यहीं हम गलत हो जाते हैं।

व्याख्यान चल रहा था। पढ़े लिखे लगभग ५०० वयस्क विद्वान श्रोता जमा थे। अचानक वक्ता ने कहा कि बगल के कमरे में अनेक प्रकार के डब्बे रखे हैं। सब पर एक नाम लिखा है। आपको उस कमरे में जाना है और अपने नाम का डब्बा खोज कर उसे ले आना है। आप के पास इसके लिए ५ मिनट का समय है। कमरे का दरवाजा खुला और भगदड़ मच गई। सब जल्द से जल्द अपना डब्बा खोज कर वापस आना चाहते थे। लोग दौड़ रहे थे, टकरा रहे थे, तनाव में थे। तभी घंटी बजी, समय समाप्त हो चुका था। सब खाली हाथ बाहर निकल आए।

वक्ता ने फिर कहा अब वापस उसी कमरे में जाएँ। समय भी वही ५ मिनट का ही है। लेकिन इस बार आपको अपने नाम का डब्बा नहीं खोजना है, बल्कि आपके हाथ जो डब्बा लगे उस पर लिखे नाम के व्यक्ति को खोज कर वह डब्बा उसे दे देना है। ५ मिनट से कम समय में सब अपने अपने डब्बों के साथ कमरे के बाहर आ गए थे।

वक्ता ने कहा, “ये अलग अलग डब्बे अलग अलग किस्म के आपके सुख हैं। ५ मिनट हमारा जीवन काल है। जब हम अपने सुख को खोजते हैं तब हमें कुछ भी हाथ नहीं लगता, लेकिन जब हम दूसरों को उसका सुख देना शुरू करते हैं सबको उसका सुख मिल जाता है। अपना सुख दूसरों को सुखी बनाने में छिपा है।  
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हमें आपकी प्रतिकृया का इंतजार रहता है। - महेश

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2019

सूतांजली अक्तूबर 2019


सूतांजली                       ०३/०३                                        अक्तूबर २०१९              ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अतिशबाजी और दिवाली
हमारे देश में त्यौहारों का माह प्रारम्भ हो चुका है। हम इन्हें बड़े हर्ष, उल्लास और उमंग से मनाएंगे। इनमें एक प्रमुख त्यौहार दिवाली है। देश के उच्चतम  न्यायालय ने आतिशबाज़ी पर रोक लगा रखी है। शायद यह रोक फिर से दोहराई जाएगी। लेकिन इस प्रतिबन्ध के बावजूद आतिशबाजी होती है। आतिशबाज़ी खुशी जाहिर करने का एक माध्यम है। यह केवल दिवाली पर ही नहीं इसके अलावा अन्य अवसरों पर भी होती है, जैसे विवाह, खेल में जीतने पर, धार्मिक विसर्जन यात्रा पर, अँग्रेजी नव वर्ष आदि पर। जिन कारणों से दिवाली पर आतिशबाज़ी सही नहीं है, ठीक उन्हीं कारणों से इनमें से किसी भी अवसर पर यह सही नहीं है। आतिशबाजी सिर्फ हमारे आनंद व उल्लास को प्रगट करने का एक माध्यम है। इनमें से किसी भी भावना पर लगाम की दरकार नहीं है। लेकिन आतिशबाज़ी आनंद अभिव्यक्त का सही माध्यम नहीं है। इसे रोकने का कार्य कानून से कम समाज सुधार और जन जागरण से ज्यादा अच्छी तरह किया जा सकता है। कानून, भय से सुधार करता है, समाज हृदय परिवर्तन करता है।
गांधीजी से एक बार यह अनुरोध किया गया था कि वे दिवाली पर लोगों को आतिशबाज़ी में रुपए बर्बाद न करने की सलाह दें। 20 अक्तूबर 1928 के यंग इंडिया में गांधीजी लिखते हैं, “मैं इस सुझाव का हृदय से समर्थन करता हूँ”। लेकिन वे यहीं नहीं रुकते। वे इस जोश को एक नई दिशा  देते हैं। वे आतिशबाज़ी बंद करने जरूर कहते हैं लेकिन इसमें लगने वाले पैसे, समय, शक्ति और उत्साह को अवरुद्ध नहीं करते। वे लिखते हैं, “इसमें लगने वाले पैसे, समय और मेहनत को बच्चों के लिए खेल-कूद का आयोजन करने में लगाएँ, पारिवारिक वन-भोजन करें जिसमें  बाजार के पकवानों के बजाय घरेलू पकवानों, फल तथा सूखे फल का प्रयोग किया जाए। अमीर और गरीब का ख्याल छोड़कर बच्चों को खुद अपने हाथों से सफाई करने की शिक्षा एवं ज्ञान दें। इससे बच्चों में शारीरिक श्रम करने का अभ्यास भी होगा और स्वच्छता के प्रति जागरूकता भी बढ़ेगी”।
          यह है असली समाज सुधारक का कार्य। वह प्रवाह को अवरुद्ध नहीं करता बल्कि उसे सही दिशा देता है। वह एक नया मार्ग सुझाता है।
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कहाँ गए अपने उत्सव और त्यौहार
हमारे उत्सव और त्यौहारों के दिन आ गए। इनके साथ याद आए बचपन के वे दिन जब हमें इनका इंतजार होता था। एक तरफ परिवार में नवरात्रि का पाठ और पूजा होती और दूसरी तरफ दुर्गा पूजा में पूरा शहर दुल्हन की तरह सज जाता था। यह एक समय था जब हमें देर रात तक अपने दोस्तों के साथ बाहर रहने की इजाजत मिलती थी। दुर्गापूजा से प्रारम्भ होकर भैयादूज तक जैसे उत्सवों की झड़ी सी लगी रहती थी। दिवाली पर पूरे घर की सफाई के अभियान में भी हम बच्चों का सक्रिय योगदान होता था। दिवाली पर मिट्टी के दीयों  में तेल-बत्ती डाल कर जलाना और उनका ध्यान रखना, दिवाली की शुभकामनाओं के कार्ड तैयार करना और भेजना, एक विशिष्ट कार्य होता था ।
इस शुभकामनाओं के कार्ड को तैयार करने की प्रक्रिया पिछली दिवाली से ही प्रारम्भ हो जाती थी। प्रत्येक प्राप्त हुए कार्ड से नाम, पता और टेलीफ़ोन मिलाना और ठीक करना। उनमें लिखे संदेश का मुआयना कर उनमें से बेहतरीन संदेशों को संभाल कर रखना, फिर एक सुंदर सा सारगर्भित संदेश तैयार करना हमारा काम होता था। इस प्रक्रिया में हमें अपने परिचितों की भी जानकारी मिल जाती थी – कौन हैं और कहाँ रहते हैं। मुझे अच्छी तरह से याद है लोगों को हमारे भेजे हुए संदेश की प्रतीक्षा रहती थी क्योंकि हमारा संदेश विशिष्ट होता था। दरअसल यह पूरी प्रक्रिया हमें इस त्यौहार से जोड़ देती थी।  बच्चन जी ने लिखा भी है “प्यार नहीं पा जाने में है, पाने के अरमानों में”। आनंद और उत्सव न उस पूजा में है, न त्यौहार में, न पटाखों में, न मिठाई में, न जलते दीपक में बल्कि उस पूरी प्रक्रिया में जो हमें सबों से जोड़ती है।
जब भी नई तकनीक आए उसे अपनाना ही चाहिए। लेकिन इस नई तकनीक को अपनाने के चक्कर में कहीं हम गुद्दे को फेंक और छिलके को तो नहीं रख रहे हैं। अब हमारा पारिवारिक शुभकामनाओं का पत्र, हमारा व्यक्तिगत  हो गया है। परिवार के हर सदस्य सबको संदेश भेजते नहीं केवल फॉरवर्ड करते हैं। एक बार नहीं कई कई बार। हाँ, दिखाई देता है कि हम सोशल हो रहे हैं। क्या सचमुच हो रहे हैं?  अगर हो रहे होते तो हमारे संबंध और प्रगाड़ होते, लेकिन ऐसा है नहीं।
श्री अश्विन झाला लिखते हैं “संदेश भेजने के इस सिलसिले में  हम इतने आगे बढ़ गए हैं कि वह अपनी क्षितिज को विस्तारित करते हुए बहुत दूर, सभी सीमाओं से, सभी बंधनों से, सभी नफ़रतों से दूर संदेश फॉरवर्ड करते हैं। इतना कुछ होने के बावजूद भी मानव समुदाय के बीच में दीवारें पहले से क्यों बढ़ी हैं? क्यों हिंसा के कई स्वरूप, शोषण के कई घटक पनप रहे हैं? यह तो विपरीत स्थिति को प्रस्तुत करता है। दरअसल, हम सोशल मीडिया पर तो सक्रिय नजर आते हैं किन्तु वास्तविक जीवन में निष्क्रिय हैं।  जीवन के विशेष दिन पर संदेश को फॉरवर्ड करना ही उस दिन को मनाना हो गया है। मानो संदेश को फॉरवर्ड करने से ही हमने अपनी भावना को व्यक्त कर दिया है। हमें इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि हम कोई शुभकामनाएँ भेज रहे है। हम सिर्फ अंगुली का एक झटका भेज रहे हैं। उसका असर भी एक झटका ही होता है।
इस बार कुछ अलग कीजिये। अपना कुछ लिखिए, रचिए, बनाइये। इस प्रक्रिया में अकेले मत लगिये बल्कि पूरे परिवार को सम्मिलित कीजिये। संदेश में पूरे परिवार का नाम दीजिये। अपनी विशिष्ट पहचान बनाइये। भले ही सजा संवारा न हो, लेकिन लिखा अच्छा हो जो आपके और आपके परिवार की भावनाओं को दर्शाता हो। उस संदेश में अपने परिवार की महक हो। आपके परिवार से यही संदेश सब तक पहुंचे। थोड़ा कठिन है, लेकिन अगर अनुशासन रखें तो यह सम्भव है कि आपके परिवार से एक व्यक्ति के पास एक ही संदेश जाए। संदेश को सजाना संवारना चाहते हैं तो  अपने प्रिंटर को ही कहें एक ई-कार्ड तैयार कर दे, वह आपकी भावना के अनुरूप बना देगा।  लोग मिल जाएंगे जो आपके लिए संदेश लिख भी देंगे और उसे रंग-रोगन, चित्र, संगीत से सजा भी देंगे। जब आप कार्ड प्रिंट करवाते थे, तब भी तो यही करते थे। नई तकनीक आ गई है तो उसका भरपूर प्रयोग करें, शुभकामनाओं को लिखने और भेजने में, उन्हे फॉरवर्ड करने में नहीं। परिवार का जुड़ाव भी होगा और आपके परिवार की एक अलग पहचान भी बनेगी।
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हमें आपकी प्रतिकृया का इंतजार रहता है। - महेश

सोमवार, 2 सितंबर 2019

सूतांजली, सितंबर 2019


सूतांजली                            ०३/०२                                               सितंबर २०१९
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पर्यावरण, पीतरों की याद में
इस माह पितृ पक्ष है। शास्त्रोक्त, पारम्परिक और पारिवारिक विधि से हम पीतरों को  याद करेंगे। तर्पण, ब्राह्मण भोजन, गाय-कीट-पतंग-पक्षी एवं  अन्य पशुओं के लिए भोजन में हिस्सा निकालेंगे। गौशालाओं में दान और गंगा स्नान का भी विधान है, शायद वह भी करें। उनकी बातें याद कर हम आँगन में तुलसी, नीम, पीपल वृक्षों को भी यदा कदा याद कर लेंगे।

डॉ.पी.जोशी बताते हैं कि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के नजदीक शुक्लापुर गाँव के श्मशान घाट पर अपने परिजनों का अंतिम संस्कार करने के बाद, दिवंगत की याद में एक पौधा लगाते हैं और चिता की ठंडी राख़ खाद के रूप में डालते हैं। बिहार के गया जिले में रोशनपुरा ग्राम पंचायत के गाँव भलुआर में भी ऐसा ही होता है। इंदौर में भी इंदौर ईको सोसाइटी ने पूर्वजों की याद में पेड़ लगाने का काम शुरू किया है। पितृ-पर्वत योजना के तहत 400 एकड़ में फैले देवधरम पहाड़ी पर पौधे लगाए गए। स्थानीय लोग नगर-निगम में 250 रुपये जमा कर अपने परिवार के किसी प्रियजन की याद में पेड़ लगा सकते हैं। दिल्ली सरकार ने अपनों की यादें नाम से ऐसी ही पहल की है।    

शहरवासियों के लिए पेड़ लगाना एक समस्या है। कहाँ लगाएँ और कैसे लगाएँ? निराश न हों, आसपास पता लगाएँ कोई-न-कोई हल अवश्य मिलेगा। कोलकाता की “गंगा मिशन के पास भी इसका हल है। 1000 रुपए में 10 नारियल के पेड़ से शुरुआत कर अपनी श्रद्धानुसार अनुदान कर अपने प्रियजन की याद में पेड़ लगवा सकते हैं। एक पंथ दो काज। अपने पीतरों की याद में इस वर्ष कुछ नया करें जो लंबे समय तक चले, अगली पीढ़ी को भी मिले! विस्तृत जानकारी के लिए संपर्क कर सकते हैं श्री प्रह्लाद गोयनका को 9831094640 पर।
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गांधी क्यों?
हम गांधी की चर्चा क्यों करते हैं? कुछ तो रहा होगा उनमें जो हमें बार बार उनकी चर्चा करने पर मजबूर करता है? उनके बिना गुजारा होता नहीं दिखाता? अनबुझी पहेलियों के उत्तर हमें उनके पास ही मिलते हैं? लोगों ने गांधी को अपने अपने ढंग से देखा  और  जैसा दिखा वैसा ही चित्रित किया। लंबे समय तक गांधी के निजी सचिव रहे महादेव देसाई ने भी उन्हे अपनी आँखों से देखा।  उन्हे क्या दिखा?  उनके विचार से गांधी को अद्वितीय और लोकप्रिय नेता बनाने वाली चीज क्या थीं?

एक सम्मोहक नेता के कई असाधारण गुण उनमें नहीं थे। स्नेहपूर्ण आँखों और मुसकुराते चेहरे के अलावा उनमें कुछ भी ऐसा नहीं था जिसे चित्ताकर्षक कहा जाए। प्रसिद्ध कवयित्री सरोजिनी नायडू उन्हे मिकी माउस कहती थीं।   गांधी ने कोई असाधारण विद्वत्ता अर्जित नहीं की थी। भारतीय नेताओं में कई थे जो उनसे ज्यादा जोरदार भाषण दे सकते थे। कई विख्यात व्यक्ति थे जो अपनी तपश्चर्या और शुद्धाचरण के लिए विख्यात थे। फिर वे कौन से गुण थे  जिन्होने गांधी को इतना अद्वितीय बनाया?

महादेव देसाई के खयाल से गांधी को अद्वितीय बनाने में उनके दो गुणों का बड़ा योगदान था। एक, उनकी पूर्ण पारदर्शिता। उनके विचार, वचन और कर्म में कोई भेद या दूरी नहीं थी। भारत की जनता उनके इस गुण को अपने सहज बोध से भी समझती थी और अनुभव से भी। यहाँ एक ऐसा शख्स था, जो अपनी बड़ी से बड़ी गलती को सबके सामने कबूल कर सकता था। यह शख्स उनके भी पापों के लिए प्रायश्चित कर सकता था। उनके निजी व्यवहार और सार्वजनिक जीवन के बीच कोई खाई नहीं थी। उनके जीवन की किताब दूसरों के सामने हमेशा  खुली रही।

उन्हे अद्वितीय बनाने वाला दूसरा गुण था, सभी मनुष्यों की गरिमा को बहाल करने की उनकी उत्कट अभिलाषा। स्वतन्त्रता ले लिए संघर्ष का उनका तरीका बेजोड़ था मगर उसके अपने उतार-चढ़ाव थे। गांधी के सभी सत्याग्रह सफल नहीं हुए। लेकिन उनके विफल सत्याग्रहों समेत हरेक सत्याग्रह ने, इनमें शामिल रहे लोगों के नैतिक स्तर को ऊपर उठाया और उनकी कड़ी नैतिक  परीक्षा ली। यह गांधी की खूबी थी कि  वे अपने लोगों के गुनाहों में खुद को हिस्सेदार मानते थे, और दोष अपने सिर ले लेते तथा श्रेय दूसरों को देते थे

गांधी संत थे, पर दूसरे संतों की तरह उन्होने स्वयं को लोगों से दूर नहीं रखा। गांधी राजनीतिक थे, लेकिन दूसरे राजनेताओं की तरह उन्होने कभी स्वयं को नैतिक उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं समझा।  गांधी के व्यापक दृष्टिकोण का ही परिणाम था कि उनके चरित्र में कई तरह के अद्भुत समन्वय दिखते हैं।
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गणेश, भारत और हम
क्लौडअल्वारेस गोवा के निवासी हैं, ईसाई हैं और देश के अग्रणी पर्यावरण तथा स्वदेशी चिंतक हैं। यहाँ प्रभास परंपरा न्यास की व्याख्यानमाला 2016 के कुछ अंश उद्धृत कर रहे हैं।

... मैं गोवा से हूँ, जहां गणेश देवता का प्रचलन ज्यादा है। गणेश उत्सव के दौरान उनके सम्मान में सभी कुछ बंद हो जाता है, मछली खाना भी! इस छोटे-से राज्य में मछली खाना बंद करना सबसे बड़ा त्याग है। गोवा के सबसे बड़े मेहमान के आगमन और विदाई के उत्सव को मनाने के लिए आर्थिक प्रतिष्ठान से लेकर स्कूल तक, आधुनिक दौर के सभी संस्थानों की दैनिक गतिविधियां बंद हो जाती हैं। शराब, मांस या मछली की न तो इच्छा की जाती है, न ही परोसा जाता है। इस मामले में सख्त अनुशासन का पालन किया जाता है। पाँच या सात दिन के लिए और कभी कभार ग्यारह दिनों के लिए हम अपने ईसाई घरों में कोई भोजन नहीं पकाते। सारा भोजन पड़ोसियों के यहाँ से आता है। गणेश के भीतर यह सब समा जाता है।  ...

... वास्तव में यदि हिन्दू और उनके कार्यों के लिए धर्म का उल्लेख करना बंद करते हैं, तो हम उस तर्कसंगत, तार्किक, भौतिकवादी, व्यवहारिक, नैतिक परंपरा से बच जाते हैं, जहां बुनकर से लेकर संत तक इस उप-महाद्वीप में रहता है और किसी-न-किसी रूप में योगदान करता है। ये परंपरा कभी आध्यात्मिक होती है, कभी नास्तिक। ...

... शिक्षा का उद्देश्य आज और कल के लिए तैयार होने भर से नहीं था, आत्म अनुभूति हासिल करने से था। गुरुकुल गुरु और शिष्य के बीच मजबूत संबंध बनाता था। ... ... जैसे बुनकरों के कामकाज को ठप करने के लिए उनके अंगूठे काटे गए, उसी तरह 19वीं सदी के शुरुआत में आधुनिक बौद्धिक कसरत ने हमारी व्यवस्था और कौशल को बर्बाद कर दिया। ...

... हम बहुत लंबे समय से भारत विचार में आस्था खो चुके हैं। हमें सोचने और मानने की जरूरत है कि भारत एक बेहतरीन विचार है जिसे हम फिर से अस्तित्ववान बना सकते हैं।
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प्रार्थना
मैं सुखी रहूँ। मेरा परिवार सुखी रहे।
                                      मेरा समाज सुखी रहे। मेरा राष्ट्र सुखी रहे।
                                                                                      सारा संसार सुखी रहे ।
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हमें आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहता है। - संपादक

शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

सूतांजली अगस्त २०१९


सूतांजली                 ०३/०१                                   अगस्त २०१९
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सर्व धर्म समभाव

वैसे तो हम गणेश को शुभ कार्य के प्रारम्भ में ही याद करते हैं, लेकिन इसके अलावा, गणेश चतुर्थी, दिवाली या अन्य किसी त्योहार या अनुष्ठान  पर भी याद कर लेते हैं। फिर शिव पुत्र हैं, विवेक के अधिष्ठाता देव हैं, अत: जब चाहें पूरे अधिकार के साथ याद तो कर ही सकते हैं। अभी तो उनको याद करने के दो बहाने भी मिल रहे हैं मुझे। पहला तो यह कि इस माह के साथ हम तीसरे वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। दो वर्ष पूर्व लिया गया यह संकल्प सुचारु रूप से निभा पा  रहा हूँ, इसके लिए गणेश को नमन और आप सबों का आभार। गणेश चतुर्थी भी अब नजदीक ही है। है तो अगले माह में, लेकिन माह के प्रारम्भ में ही है। अत: सोचा कि क्या यह अच्छा न हो कि गणेश की बात चतुर्थी के बाद करने के बजाय चतुर्थी के पहले कर ली जाए?

शायद गणेश के बारे में आप मुझसे ज्यादा ही जानते हों। अत: मैं और कुछ न कह कर केवल पिछले वर्ष की गणेश चतुर्थी की कुछ यादें ताजा करवाना चाहता हूँ। शायद आपको याद होगा स्पेन के बार्सिलोना में गणेश चतुर्थी पर निकाली गई विसर्जन यात्रा का वीडियो यू ट्यूब में बहुत चर्चित हुआ और देखा गया था। शहर के भारतीय मूल के निवासियों ने धूम धाम से गणेश की पूजा की और नियमानुसार अंतिम दिन उनकी शोभा यात्रा निकाली। यह यात्रा वहाँ के एक चर्च के सामने से निकलनी थी। अत: वहाँ के नियमों के अनुसार औपचारिक रूप से चर्च को इसकी इत्तला की गई और यात्रा निकालने की अनुमति मांगी गई। चर्च ने न केवल अनुमति प्रदान की बल्कि आयोजकों से गणेश की प्रतिमा को चर्च के अंदर लाने का अनुरोध भी किया।  इसका वीडियो आज भी यहाँ https://www.youtube.com/watch?v=6g6IyoV76OQ उपलब्ध है। इसे कहते हैं सर्व धर्म समभाव’, सब धर्मों के प्रति एक सी भावना का जीता जागता उदाहरण।


क्या हम इस घटना पर खुश हों, गर्व अनुभव करें? सही कहूँ तो मुझे हीनता का बोध होता है। जिस सर्व धर्म समभाव की चर्चा हम यहाँ भारत में करते हैं, वह तो मुझे यहाँ कहीं दिखता ही नहीं। हमारे देश से हजारों मील दूर ईसाइयों ने दिखाया कि वे भले ही समभाव की चर्चा न करते हों, लेकिन  इस पर  आचरण तो किया! एक चर्च ने हमारे गणेश का सम्मान किया, हमारे स्वर में स्वर मिला कर हमारे देव का आदर किया । हमें इसका प्रत्युत्तर खोजना चाहिए। हमारे कौनसे मंदिर में हमने ईसाइयों को ईसा का जन्म दिन या कोई दूसरा त्योहार मनाने की छूट दी? उनका सत्कार किया? केवल ईसाई ही क्यों और भी तो दूसरे अनेक धर्म हैं। हमने कब कहाँ दूसरे धर्मों के समक्ष ऐसा उदाहरण पेश किया? उदाहरण अपनी कथनी का नहीं अपनी करनी का देना होगा। वेदों, पुराणों और हजारों वर्ष पुरानी घटना का नहीं आज की ताजा घटना का। अपनी महान मान्यताओं की बातें न कर उन पर आचरण करना होगा। हाँ हम कर तो सकते ही हैं। और जब ऐसा करेंगे तब हम होंगे कामयाब एक दिन

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श्री राम की सेना

“उसने तय कर लिया, गाड़ी रुकते ही इंजन के पास की जनरल बोगियों के यात्रियों से ही वह गुहार लगाएगा। वह जानता था, स्लीपर और ए.सी. के यात्रियों से गुहार लगाने से कोई फायदा नहीं। ऐसी घटनाओं पर वे उतरने वाले नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं की आहट पाते ही बाहर के दरवाजे बंद कर अपनी बर्थों पर चिपक जाते हैं। लेकिन जनरल बोगियों में असुविधाओं के बीच यात्रा करने वाले सामान्य लोग उसकी आवाज सुनकर अवश्य नीचे आ जाएंगे।” (एक अकथनीय कथ्य को मिथिलेश्वरजी ने अपनी कहानी गेटमैन गोवर्धन में बड़े सहज ढंग से कह डाला।) और गोवर्धन के देखते देखते रेल से यात्री उतरकर गुंडों पर बेरहमी से पिल पड़े और उस बच्ची को उनकी चंगुल से छुड़ा लिया।  हम पढ़े लिखे शिक्षित लोग, इस सच्चाई को स्वीकार करने से घबराते हैं, कतराते हैं, तर्क देते हैं सफाई देते हैं। लेकिन यह नहीं मानते कि भूखे को रोटी चाहिए, केवल रोटी, भाषण  नहीं।

मुझे तो ऐसा लगता है कि :
१.श्री राम भी ऐसे लोगों के भरोसे ही लंका पर आक्रमण कर सके। राम के पास सेना को देने के लिए हथियार नहीं था। जिसको जो मिला उसे ही हथियार बना दुश्मन से भिड़ गया। कुछ नहीं मिला तो लात, घूंसे और थप्पड़ों से ही रावण की सेना पर पिल पड़े। राम की सेना के पास सत्य  था, धर्म था।  वह अन्याय के विरुद्ध लड़ रही थी। उत्तम ध्येय के कारण उसमें आत्मविश्वास और आत्म बल था। राम की सेना की यही शक्ति थी, जिसके बल बूते पर वह लड़ी। युद्ध जीतने पर भाइयों ने राम का स्वागत किया, राजमहल ले गए और उनका राजतिलक कर दिया।
२. गांधी की सेना में भी पहले दक्षिण अफ्रीका में और फिर भारत में यही आम लोग थे। गांधी के पास भी देने के लिए हथियार नहीं था।  अत: उन्होने आत्मबल, निर्भयता, सत्य  और अहिंसा का हथियार उन्हे पकड़ा दिया। लेकिन गांधी के भाइयों ने उन्हे राजमहल के बाहर उनकी सेना के साथ छोड़ दिया और खुद महलों में घुस कर अपना अपना राजतिलक कर लिया।
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गांधी का टाइम मैनेजमेंट

गांधी अपने से मिलने आने वाले हर शख्स से मिलते थे, बिना किसी भेद भाव के। उनके लिए सब समान थे। और इस कारण उनसे मिलने वालों की भीड़ जुटी रहती थी। गांधीजी को किसी भी प्रकार का रोक-टोक पसंद नहीं था। अत: समय की किल्लत रहती थी। समय की पाबंदी के ख्याल से सेवाग्राम में आश्रम वासियों ने गांधीजी के बैठने की जगह के ठीक पीछे एक तख्ती लगा दी – “शीघ्रता करें, संक्षिप्त कहें, विदा लें”। गांधी के लंबे समय तक रहे सचिव महादेव भाई जब युवा थे तो उन्हे यह बड़ा रूखा व्यहवार प्रतीत हुआ अत: वे कई बार मिलने वाले के पीछे हो लेते और उनसे अपने संक्षिप्त मुलाक़ात की प्रतिक्रिया पूछते।  महादेव भाई लिखते हैं कि उन्हे यह जानकर बड़ा आश्चर्य होता कि प्राय: सब पूरी तरह संतुष्ट होकर लौटते। मिलने वाले कहते “हाँ, यह सही है कि समय बहुत कम था लेकिन वह समय पूरी तरह हमें दिया गया

महादेव भाई आगे लिखते हैं –“जब गांधी सुन रहे होते हैं, तो हर व्यक्ति को वह गरिमा प्रदान करते जो कि मनुष्यमात्र के नाते सामान्यत: उनका हक था। काफी हद तक उनकी अहिंसा के पीछे यही सिद्धान्त था। आगंतुक के धन, ज्ञान, उम्र, स्त्री-पुरुष का ख्याल न कर वे हर एक से उसकी वैयक्तिक और मनुष्य होने की उसकी गरिमा का ध्यान रखते हुए पेश आते”।

मूलमंत्र – जो भी कार्य करें, पूरा ध्यान उसी पर लगाएँ। जितना भी समय दें, वह पूरा समय, शतप्रतिशत उसे ही दें  
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कौन जानता गांधी को
जुलाई  2019 में उत्तर और दक्षिण कोलकाता के विद्यालयों में कौन जानता गांधी को के कार्यक्रम हुए। पहला कार्यक्रम सत्यनारायण पार्क के नजदीक श्री दिगंबर जैन विद्यालय में हुआ।  अगला कार्यक्रम लॉर्ड सिन्हा रोड की श्री शिक्षायतन  स्कूल में आयोजित था। प्रेक्षाग्रह में सर्वश्री राजीव लोचन कानोडिया, नर नारायण हरलालका, PDG लायन गिरधारी चमड़िया भी उपस्थित थे। विद्यालय की प्रधानाध्यापिका  श्रीमती संगीता टंडन  ने अपने धन्यवाद भाषण में कार्यक्रम के संयोजन की प्रशंसा करते हुए बताया कि कार्यक्रम केवल एक साधारण प्रश्नोत्तरी नहीं थी बल्कि प्रश्नोत्तरी के माध्यम से गांधी के जीवन एवं कार्यों की मीमांसा थी। इस कार्यक्रम की रिपोर्ट  http://gandhiquizatkolkataschools.blogspot.com पर देखी जा सकती है।

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हमें आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहता है। - संपादक

सोमवार, 1 जुलाई 2019

सूतांजली जुलाई २०१९


सूतांजली                     ०२/१२                                       जुलाई २०१९
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गांधी प्रासंगिक हैं – इन एक्शन

शक्ति सम्पन्न और अपनी कठोरता के लिए चर्चित सरकार के सामने कमजोर और बार-बार क्रुद्ध तथा अनियंत्रित भीड़ से मार खाने वाले जूनियर डाक्टरों ने अहिंसा की तलवार खींच ली। सरकार ने उन्हे हर प्रकार से डराने धमकाने की कोशिश की। डॉक्टरों को तुरंत हड़ताल समाप्त कर काम पर आने की चेतावनी दी गई, हॉस्टल खाली करवाने की धमकी भी दी गई। इस वाकिए को सांप्रदायिक और राजनीतिक रंग देने का भी प्रयत्न किया गया। लेकिन अहिंसा के हथियार से सुसज्जित डाक्टर बहादुरी से डटे रहे।  राज्य की सरकार ऐसी अवस्थाओं में अपनी हिटलरी विचार के लिए बदनाम रही है। लेकिन इन सब के बावजूद डॉक्टर टस-से-मस नहीं हुए। जल्दी ही माहौल बदलने लगा और पूरा देश जूनियर डॉक्टरों के साथ खड़ा हो गया। कोलकाता में भड़की चिंगारी दूसरे शहरों और राज्यों  में फैलने लगी। सरकार ने न्यायालय के दरवाजे पर दस्तक दी। लेकिन न्यायालय ने भी सरकार को डॉक्टरों से सुलह करने की सलाह दी। आखिर सरकार झुकी और डॉक्टरों से संवाद करने का मन बना लिया। संवाद का नतीजा भी लाभदायक और संतोषजनक निकला। गतिरोध समाप्त हुआ। वातावरण सौहार्दपूर्ण और प्रेममय  हो गया।

क्या यह अहिंसा की हिंसा पर विजय थी? नहीं, महात्मा गांधी की भाषा में कहें तो अहिंसा के संग्राम में कोई नहीं हारता। सब जीतते हैं क्योंकि अहिंसा जीतने में नहीं हृदय परिवर्तन में विश्वास करती  है  डॉक्टरों ने सरकार का हृदय परिवर्तन कर दिया। इस बार तर्कों ने नहीं, बातों ने नहीं कार्य ने फिर सिद्ध किया कि अहिंसा, हिंसा से ज्यादा असरदार है और  गांधी प्रासंगिक हैं। अहिंसा से लड़े संग्राम में किसी प्रकार की कटुता पैदा नहीं होती। अहिंसा बहादुरों का हथियार है, कमजोरों का नहीं।
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क्या कोई मौका आखरी होता है?

गांधीका एक अंक हाथ में है। अभी अभी यह आखिरी मौका है! पढ़ा। भला सा लगा। जाने पहचाने लेखक ने प्रारम्भ में कई बातें लिखीं लेकिन लेख के अंतिम अनुच्छेद में गांधी को छूए बिना नहीं रह सके। जब उन्होने लिखा हमारे यहाँ जो करप्शन (भ्रष्टाचार) है ....... उसे रोकना होगा। हमारे नेताओं की अंतरात्मा तो बेदाग हो। तब उन्होने गांधी की ही बात दोहराई पापी से नहीं पाप से घृणा करो

इस पत्रिका के कई लेखों से, वक्तव्यों से मेरा विरोध रहा है, और अपने विरोध को मैं जाहिर भी करता रहा हूँ। हम बार बार भटक जाते हैं। पाप को छोड़ पापी के पीछे पड़ जाते हैं। कांटे के प्रति इतने सजग हो जाते हैं कि फूल ओझल हो जाते हैं। यह नहीं समझ पाते कि पापी गया और पाप रहा तो पाप नए पापी गढ़ लेगा। इसी बात को रेखांकित करते हुए लेखक लिखते हैं माफ कीजिएगा, हम दूसरों के ऐब बहुत देखते हैं, अपनी भी गलतियाँ देखनी चाहिए। हम तो सेक्युलर थे और इन तथाकथित सेक्युलर पार्टियों की ही हुकूमतें थीं ........ हिन्दू कोड बिल आया, फिर उसमें बदलाव हुए, हिन्दू पर्सनल लॉं आया उसमें भी बदलाव होते रहे फिर मुस्लिम पर्सनल लॉं में ऐसा क्या नायाब था कि हमने उसे छुआ ही नहीं? हम  तो सेक्युलर हैं न, तो हमें तो सबके लिए बराबर होना चाहिए था, बराबर दिखना चाहिए था! आपने ...... इतना भेद भाव क्यों रखा कि उसे छूने से ही डरते-बचते रहे? ..........इसलिए हमें अपने सेक्युलरिस्म को जाँचने और माँजने की जरूरत है......... हम नकली नहीं, असली सेक्युलर बनें”।   असली   सेक्युलरिस्म ऐसा नहीं है। दर असल हमने अपना छोड़ दूसरों का सिद्धान्त अपना लिया है। गांधी ने कहा है सेक्युलरिस्म भारतीय शब्द नहीं है। यह एक पाश्चात्य शब्द है, धर्मनिरपेक्षिता इसका सिर्फ हिन्दी अनुवाद भर है। भारतीय मंत्र सर्व धर्म समभाव है। सब धर्मों के प्रति एक सा भाव।  हमें धर्मनिरपेक्षिता को छोड़ सर्व धर्म समभाव को अपनाना होगा। भारत की आम जनता सब धर्मों को बराबर समझना तो समझ सकती है लेकिन सब धर्मों को छोड़ना नहीं समझ सकती।

क्या अभी की सरकार में केवल कांटे हैं और पिछली सरकार में केवल फूल  था? ऐसा नहीं है। ध्यान देने की बात है तोड़ो और राज करो में एक नया आयाम आ गया है - भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता का। अब दल इस आधार पर हमें बाँट रहे हैं। एक दल भ्रष्टाचार के प्रति निष्क्रिय और सांप्रदायिकता के प्रति सजग है तो दूसरा भ्रष्टाचार के प्रति सजग लेकिन सांप्रदायिकता के मुद्दे पर निष्क्रिय है। क्या दोनों सीमाओं पर सजग रहने की जरूरत नहीं है? क्या ऐसा संभव नहीं है? प्रकारांतर से हमें इन दोनों बुराइयों में से एक को चुनने के लिए विवश क्यों किया जा रहा है? इस आधार पर देश को क्यों बांटा जा रहा है? सांप्रदायिकता हो या भ्रष्टाचार दोनों बुराई हैं, पाप हैं, कांटे हैं। पाप कोई भी कम और ज्यादा नहीं होता।  दोनों ही त्याज्य हैं। दोनों का विरोध करना है। अगर यह सरकार लौटती है तो अनेक कांटे रहेंगे लेकिन उनके साथ उसके फूल भी रहेंगे। वैसे ही दूसरी सरकार आती है तो उसके साथ भी उनके कांटे और फूल दोनों आएंगे। अत: अब, जब हमें राजनीतिक स्वतन्त्रता प्राप्त है तब हमें सरकार के पाप का विरोध और पुण्य का समर्थन दोनों एक साथ करना चाहिए। तभी सरकारों को पता चलेगा कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं। इससे जनता भी समझदार बनेगी कि सरकार चाहे जो भी हो उन्हे सरकार का नहीं पाप का विरोध करना है और पुण्य का समर्थन भी। तब जनता की जुबान खुलने लगेगी। तब जनता भी मूक दर्शक न रह कर वाचाल होगी, सक्रिय होगी, लोकतन्त्र में उनकी सहभागिता होगी। जब ऐसा होगा तभी राम राज्य अवतरित होगा, असली लोकतन्त्र स्थापित होगा। नहीं तो एक का गुंडा-राज या दूसरे का  भ्रष्टाचारी-राज या तीसरे का वंश-राज या चौथे का जाति-राज या पाँचवाँ का (अ)धर्म–राज या छठवें का  .......... यही चलता रहेगा, इन्ही में से किसी को चुनते रहेंगे। और ये सब हमें ठेंगा दिखा कर एक दूसरे को सहयोग करके राजगद्दी पर बे-रोक-टोक कब्जा जमाये रखेंगे। जब इसमें सुधार होगा तब राजनीतिक आजादी से बाद की सामाजिक और आर्थिक आजादी प्राप्त होगी।

अंत एक बात और कोई भी मौका आखिरी नहीं होता है। जब आप अंतिम दरवाजे पर पहुँचते हैं तब आगे का दरवाजा स्वत: खुल जाता है, और हम पाते हैं कि मौके और भी हैं। 
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पढे-लिखे व विशेषज्ञों को हमारे मुद्दे पता ही नहीं

माचनूर, एक छोटा सा गाँव है, तेलंगाना में। इसकी खास बात यह है कि यहाँ की दलित महिला किसानों ने सामुदायिक रेडियो स्थापित कर रखा है। इसका प्रसारण रोज संध्या ७ से ९ तेलुगू में होता है। यह है मन की बात वाला संगम रेडियो।

गाँव, खेती, संस्कृति, तीज-त्योहार और स्वास्थ्य के साथ साथ पर्यावरण और गाँव के समाचार और व्यंजन बनाने के तरीके जैसे कार्यक्रम होते हैं। साक्षात्कार एवं बातचीत भी होती है। पुराने लोकगीतों का बड़ा संग्रह है यहाँ। खेती-किसानी के गीत, बुआई और कटाई के दिन की सूचना के साथ जन्मदिन की शुभकामनाएँ व मवेशी गुम होने की सूचना भी दी जाती है। यह कार्यक्रम १५० गांवों में सुना जा सकता है।

रेडियो से जुड़ी ज़्यादातर महिलाएं कम पढ़ी लिखी हैं। वे कहती हैं “हम पढे-लिखे व विशेषज्ञों की मदद नहीं लेते, क्योंकि उन्हे हमारे मुद्दे पता ही नहीं।“ ये सब महिलाएं खुद किसान हैं और रेडियो से किसानों की मदद कर रही हैं।  
गांधी मार्ग – जनवरी फरवरी २०१९
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कौन जानता गांधी को  - जून २०१९

गर्मी के कहर के बावजूद जून के मध्य में स्कूलें खुलने लगी और इसके साथ ही प्रारम्भ हुआ हमारा गांधी क्विज। पहला क्विज कोलकाता की प्रथम बालिका विद्यालय श्री शिक्षा यतन स्कूल में किया गया। विद्यालय की सेक्रेटेरी जनरल श्रीमती ब्रताती भट्टाचार्य एवं अन्य अधिकारी मौजूद थे। दूसरा कार्यक्रम श्री दिगंबर जैन बालिका विद्यालय में प्रधानाध्यापिका श्रीमती हरप्रीत घोष एवं अन्य अधिकारियों की मौजूदगी में सफलतापूर्वक आयोजित किया गया। क्विज की विस्तृत जानकारी gandhiquizatkolkataschools.blogspot.com पर उपलब्ध है।
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शनिवार, 1 जून 2019

सूतांजली, जून 2019


सूतांजली                ०२/११                                         जून २०१९
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शीत युद्ध और संवाद

कई दशकों से सुबह की सैर के लिए लेक जाता हूँ। अभी पिछले कुछ महीनों से वहाँ एक बुजुर्ग दक्षिण भारतीय दंपत्ति सुबह इडली और ढोसा बेचने आने लगे हैं। कम दाम और बेहतरीन माल होने के कारण उनकी बिक्री बढ़ने लगी और अब तो रोज सुबह उनकी टेबल पर भीड़ जमा रहती है। एक सुबह मैं भी वहाँ उस भीड़ में शामिल हो गया। कुछ ही देर में आगे बढ़ते हुए मैं उसकी टेबल तक पहुँच गया। “मेरा ६ इडली कह कर मैं शांति से प्रतीक्षा करने लगा। तब तक मेरे बगल वाले सज्जन निकल गए और उनका स्थान लिया एक युवती ने मेरा १० इडली युवती ने कहा। लेकिन वह यहीं नहीं रुकी, बार बार मेरा १० दोहराने लगी। मुझे खीज होने लगी।  थोड़ी ही देर में मेरा १० और मेरा ६ की गोलियां चलने लगी। हम दोनों के बीच शीत युद्ध शुरू हो चुका था। मुझे यह भी अनुभव हुआ कि अगर विक्रेता ने उसे पहले दिया तो शायद मैं बर्दास्त नहीं कर पाऊँगा। मुझे कुछ करना चाहिए। संवाद स्थापित करने के उद्देश्य से मैंने कहा यह अपनी भाषा में गिनती कर रहा है। तमिल है या तेलुगू’? कोई जवाब नहीं मिला। लेकिन गोलीबारी एक बार रुक गई। मैंने देखा कि विक्रेता बार बार अपना हाथ झाड़ रहा है। अब मैंने उससे कहा लगता है इडली बहुत गरम है?’ उसने संक्षिप्त सा उत्तर दिया हाँ। मैंने फिर कहा आहिस्ता आहिस्ता, अंगुलिया-हाथ बचा कर। उसके बाद मेरे कानों मे आवाज पड़ी पहले इनका ६ फिर मेरा १०। युद्ध समाप्त हो चुका था। यह किसी की जीत हार नहीं थी। यह युद्ध का संवाद में विलय था। हृदय परिवर्तन।

कुछ दिन बाद वही युवती लेक पर घूमते हुए सामने से आते दिखी। पास आने पर मैंने हाथ जोड़ कर नमस्ते की। वह ठीक मेरे सामने आ कर चुपचाप खड़ी हो गई और आँखों में आँख डाल कर मुझे घूरने लगी। आज के माहौल और समय को देख मैं थोड़ा घबड़ाया लेकिन फिर सधे शब्दों में कहा नमस्कार आपको नहीं आपके भीतर छुपे गुण को, समझ को। अब वह भी मुस्कुराई हाथ जोड़े और हम अपने अपने रास्तों पर आगे बढ़ गए। पापी को नहीं पाप को मारो का मर्म समझ आया। गुणग्राही बनो।
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एकला चलो रे!

सत्याग्रह का प्रवेश द्वार दक्षिण अफ्रीका ही था। उस हथियार को गांधी ने पहली बार वहीं आजमाया और सफल रहे। उस पहले मुक़ाबले की याद करते गांधी लिखते हैं-

मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि इस काम में कोई भारतवासी अपूर्व वीरता प्रकट करेगा अथवा सत्याग्रह का आंदोलन इतना ज़ोर पकड़ेगा। मैंने यह बात उसी क्षण हिंदुस्तानी भाइयों से कही और बहुतेरे सत्याग्रह करने को तैयार हो गए। पहले युद्ध में लोग यह समझ कर सम्मिलित हुए कि थोड़े ही दिनों तक कष्ट सहने से हमारा उद्देश्य सिद्ध हो जाएगा। दूसरे युद्ध के समय आरंभ में थोड़े ही लोग सम्मिलित हुए। पीछे बहुत से लोग आ मिले। बाद में श्री गोखले के वहाँ पहुँचने पर दक्षिण अफ्रीका की सरकार से समझौते का वचन पा कर यह लड़ाई बंद की गई। परंतु सरकार ने फिर दगाबाजी की और अपना वचन पूरा करने से इंकार कर दिया। इस पर तीसरा सत्याग्रह युद्ध आरंभ करना पड़ा। उस समय गोखले ने मुझसे पूछा था कि आंदोलन में कितने आदमी सम्मिलित होंगे? मैंने लिखा कि 30 से 60 आदमी तक सम्मिलित होंगे। परंतु मुझे इतने भी साथी नहीं मिले। हम 16 आदमियों ने ही मुक़ाबला शुरू किया। हमने दृड़ निश्चय कर लिया था कि जब तक सरकार अपने अत्याचारी क़ानूनों को रद्द न करेगी अथवा कोई समाधानकारक समझौता नहीं करेगी, तब तक हम हर एक दंड भुगतेंगे पर सर न झुकाएँगे। हमें इस बात की बिलकुल आशा न थी कि हमें बहुत से साथी मिलेंगे पर एक मनुष्य के भी नि:स्वार्थ पूर्वक सत्य और देशहित के लिए आत्म-समर्पण करने के लिए तैयार होने का परिणाम अवश्य ही होता है। देखते-ही-देखते बीस हजार मनुष्य आंदोलन में सम्मिलित हो गए। जेलों में जगह न रही और समस्त भारत का खून खौलने लगा।

बहुत से लोग कहते हैं कि यदि लॉर्ड हार्डिंग बीच बचाव नहीं करते तो समझौता होना असंभव था। पर ये लोग यह भूल जाते हैं कि लॉर्ड हार्डिंग ने आखिर मध्यस्तथा क्यों की? दक्षिण अफ्रीका की अपेक्षा कनाडा के हिंदुस्तानी कहीं अधिक दुख पा रहे थे। उन्होने वहाँ मध्यस्तथा क्यों नहीं की? जिस स्थान पर हजारों स्त्री-पुरुष का आत्मबल एकत्र हो, जिस स्थान पर असंख्य नर-नारी प्राण हथेली पर लिए हुए हों, वहाँ कौन सी बात असंभव है? मध्यस्तथा करने के सिवा लॉर्ड हार्डिंग के लिए कोई उपाय नहीं था और ऐसा करके उन्होने बुद्धिमत्ता प्रकट की।
गांधी मार्ग, सितंबर-अक्तूबर 2018
1। निर्णय, संख्या बल पर नहीं बल्कि सत्य बल पर आधारित हो तो सफलता अवश्यंभावी है।
2। टिप्पणी करना सहज है लेकिन उसका सही आकलन करना कठिन होता है।
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रावण महान!

रावण का जन्म पुलस्त्य मुनि के वंश में हुआ था। यानि कुल का ब्राह्मण था। महान पराक्रमी और योद्धा था। जनता सुखी और धनवान थी। उसकी राजधानी लंका, सोने की थी। ब्रह्मांड के देवी-देवता उससे काँपते थे। असाधारण शिव भक्त था। तुलसी कृत मानस में तो इसका उल्लेख नहीं है लेकिन अन्यत्र यह उल्लेख मिलता है कि लंका पर आक्रमण करने के पहले जब राम ने शिव पूजन का मन बनाया तब रावण ही उनका पुरोहित बना था। इस प्रकार अपने ही विरुद्ध आक्रमण की  सफलता के लिए शत्रु यजमान का पुरोहित भी बना।

इसके विपरीत राम, क्षत्रिय वंश में थे, न उनकी राजधानी सोने के थी और न ही उनकी प्रजा रावण की तुलना में उतनी सुखी और धनवान थी। तब हम रावण को छोड़ राम का गुणगान क्यों करते हैं?  मैं फिलहाल केवल दो बातों की चर्चा करना चाहूँगा –
१. अंहकर का अभाव - राम ने रावण की तरह कभी किसी भी अन्य राज्य पर आक्रमण नहीं किया। कभी किया भी जैसे किष्किंधा, लंका तब उन राज्यों को अपने राज्य में न मिलाकर वहाँ का राजा वहीं के नागरिक को बनाया। राम से कोई डरता नहीं था। सब उनका आदर करते थे। और तो और उनके शत्रु बाली और रावण को भी उनसे डर नहीं लगता था। यह राम की सहज प्रकृति और दयालु स्वभाव के कारण था। जनता को राजा से डर नहीं लगना चाहिए। जनता का राजा के प्रति आदर भाव होना चाहिए। रावण को उसके घर वाले भी सम्मति देने में घबराते थे वहीं राम के विरुद्ध एक साधारण धोबी को भी अपनी बात कहने में डर नहीं लगा।
२. ध्येय की महत्ता - राम और रावण दोनों शिव भक्त थे। लेकिन शिव किनके भक्त थे? क्यों? राम और रावण की भक्ति का ध्येय अलग था। एक का ध्येय सृजनात्मक था और दूसरे का विध्वंसात्मक। रावण शिव से शक्ति प्राप्त कर तीनों लोकों का राजा बनने का ख्वाब पाल रहा था। सज्जनों-मुनियों  को भयभीत करके रखता था। वहीं राम का ध्येय रावण को परास्त कर सीता को मुक्ति दिलाना था। सज्जनों-मुनियों को भय मुक्त करना था। इसी कारण शिव राम के भक्त थे रावण के नहीं।

दुर्भाग्यवश आज हम तर्क नहीं कुतर्क में दक्ष हैं। ज्ञानी तर्क करता है, शिक्षित कुतर्क। आज शिक्षित ही ज्यादा हैं, ज्ञानी कम। ये शिक्षित वर्ग अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का दुरुपयोग कर जनता में संदेहों और अविश्वासों का बीज बोते हैं। केवल शिक्षित मत बनिए, ज्ञानी भी बनिए
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कौन जानता गांधी को  - मई  2019

मई 2019 के प्रारम्भ होते ही फनी चक्रवात ने पूर्वी भारत को इस प्रकार भयाक्रांत किया कि पश्चिम बंगाल सरकार ने तत्काल सभी विद्यालयों में छुट्टी की घोषणा कर दी।  इस उठा पटक के कारण हम 3 के बजाय केवल एक ही स्कूल, हरियाणा विद्या मंदिर, साल्ट लेक में क्विज कर पाये। खुशी की बात यह है कि प्रदर्शन के समय स्कूल की कार्यकारिणी के कई सदस्य भी उपस्थित थे और सबों ने एक स्वर में हमारे प्रयास की सराहना की।
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सूतांजली, अगस्त द्वितीय 2026, आकर्षक घर की कुंजी

  २कोई ऐसा अक्षर नहीं है, जिसका प्रयोग मंत्र-रचना में न हो सके , कोई ऐसा वृक्ष नहीं है, जो किसी न किसी व्याधि की औषधि न हो , कोई ऐसा...