बुधवार, 1 मार्च 2023

सूतांजली मार्च 2023

 सूतांजली

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वर्ष : 06 * अंक : 08                                                                मार्च * 2023

पशुता क्या है?

अपने सुख से सुखी होना और अपने दुःख से दुःखी होना;

 मनुष्यता क्या  है?

दूसरे के सुख़ से सुखी होना और दूसरे के दुःख से दुःखी होना ।

स्वामी श्री रामसुखदासजी महाराज

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नैतिक दृष्टिकोण और आध्यात्मिक दृष्टि                                  मैंने पढ़ा

जीवन में घटने वाली घटनाओं को लोग अपनी-अपनी दृष्टि से देखते हैं। यही नहीं हम स्वयं भी अलग-अलग समय, स्थान पर घटनाओं को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखते हैं। हमारा निर्णय और हमारे ऊपर प्रभाव भी इन्हीं दृष्टिकोण के अनुरूप पड़ता है। हम घटनाओं को भावुक, नैतिक, आध्यात्मिक, व्यक्तिगत, सामाजिक और अब राजनीतिक दृष्टिकोणों से भी देखते हैं। श्री एम.एस.श्रीनिवासन ने महाभारत के एक प्रसंग से इसे समझने में बड़ा आसान कर दिया है। यहाँ एक संवाद महाभारत के प्रसंग से है, जो नैतिक दिमाग के सीमित दृष्टिकोण और आध्यात्मिक चेतना की गहरी-व्यापक दृष्टि के बीच के अंतर को दर्शाता है।

महाभारत में कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद का एक प्रसंग है। धर्मराज युद्ध के कारण हुए अपार विनाश और जान-माल के नुकसान से निराश और पीड़ित  थे। उन्होंने महसूस किया कि वे किसी-न-किसी  तरह से व्यक्तिगत रूप से युद्ध के लिए जिम्मेदार हैं। इसलिए, व्यक्तिगत अपराध बोध और दुःख की भावना से आहत, दुनिया को त्यागने और तपस्या करने के लिए वन जाने का फैसला किया। श्रीकृष्ण उनसे मिलते हैं और यहाँ भगवान कृष्ण और धर्मराज के बीच संवाद है:

श्रीकृष्ण : धर्मराज, जो मैं सुन रहा हूं क्या वह सच है? तुम्हारे भाइयों ने मुझसे कहा कि तुमने संसार छोड़कर वन जाने का निश्चय कर लिया है?

धर्मराज : हाँ, यह सही है, यह मेरा निर्णय है।

श्रीकृष्ण : आपको ऐसा कठोर निर्णय लेने की प्रेरणा क्यों हुई?

धर्मराज : मुझे पछतावा हो रहा है, मैं प्रायश्चित करना चाहता हूँ।

श्रीकृष्ण : किस बात का पछतावा?

धर्मराज : युद्ध के कारण।

श्रीकृष्ण : युद्ध के लिए? मुझे समझ नहीं आया।

धर्मराज : श्री कृष्ण, मुझे लगता है कि इस युद्ध, विनाश और रक्तपात के लिए मैं जिम्मेदार हूं। इसलिए मैंने वन में तपस्या करने का निर्णय लिया है।

श्री कृष्ण : मुझे नहीं लगता कि यह बहुत बुद्धिमानी भरा फैसला है। मैं चाहूंगा कि आप इस पर पुनर्विचार करें।

धर्मराज : नहीं श्रीकृष्ण, यह मेरी अंतरात्मा से प्रेरित निर्णय है। मैं इसे बदल नहीं सकता।

श्रीकृष्ण : धर्मराज! आपका निर्णय  नैतिकता पूर्ण और  विवेक के सबसे गहरे और उच्चतम सत्य तथा कर्तव्य-परायणता के अनुरूप नहीं है।  यह निर्णय आपके विवेक पूर्ण दिमाग और सामाजिक नैतिकता के अनुरूप है जो आपकी शिक्षा, संस्कृति, सामाजिक वातावरण और वंश परम्परा से प्रभावित है। विवेक आपके व्यक्तिगत नैतिक स्वभाव की एक सहज और तत्क्षण प्रतिक्रिया है। अकसर अंतरात्मा की प्रेरणा अत्यधिक व्यक्तिगत और नैतिक भावना का परिणाम होती है।

धर्मराज : लेकिन श्रीकृष्ण, मेरे पास अपनी अंतरात्मा से ऊंचा और बेहतर कुछ नहीं है।

श्रीकृष्ण : आपके पास है। आपको अपनी मानसिक और नैतिक प्रकृति से परे और गहराई में उतरना होगा और अपने दिव्य स्व के संपर्क में आना होगा।

धर्मराज : लेकिन श्रीकृष्ण मैं इस समय बहुत दुःख और अवसाद से भरा हुआ हूँ कि मैं इतने  गहन चिंतन के योग्य नहीं हूँ।

श्री कृष्ण : फिर एक व्यापक दृष्टिकोण लें। आप एक राजा हैं। क्या आपके द्वारा अध्ययन किए  गए सभी अर्थ शास्त्र आपको यह नहीं बताते हैं कि एक राजा को सभी व्यक्तिगत विचारों से परे उठना चाहिए और उसे केवल धर्म और समुदाय की भलाई के लिए काम करना चाहिए? क्या आपने कुछ सोचा है कि वर्तमान में आपका धर्म क्या है? आप व्यक्तिगत अपराध बोध की पीड़ा से तड़प रहे हैं। लेकिन क्या आप युद्ध से प्रभावित अपने लोगों का दर्द महसूस करते हैं? क्या आप जानते हैं कि युद्ध से वे कितने शारीरिक और मानसिक रूप से घायल हुए हैं? उनका जीवन युद्ध से पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया है; उनमें से अधिकांश ने युद्ध में अपने स्वजनों को खो दिया है; आप की प्रजा के दिल में गहरा दुःख छा गया है। एक राजा के रूप में यह आपका धर्म है कि आप उनके दुःखों को दूर करें और उन्हें अपने सामान्य जीवन में वापस लाने में मदद करें। यदि आप प्रायश्चित करना चाहते हैं, तो इसे करने का यही सही तरीका है न कि भागकर जंगल की ओर जाना।

          यहाँ तो श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर को दिशा दिखने हाजिर हो गए, लेकिन हमारा मार्ग दर्शन कौन करेगा? गांधी यहाँ हमारी सहायता करते हैं –

मैं तुम्हें एक जन्तर देता हूं। जब भी तुम्हें संदेह हो या तुम्हारा अहम् तुम पर हावी होने लगे, तब यह  कसौटी आजमाओ : जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शकल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा। क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा? क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू पा सकेगा?   क्या उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है? यानी तब तुम देखोगे कि तुम्हारा संदेह मिट रहा है और अहम् समाप्त होता जा रहा है।

मैं नहीं, हम। स्व नहीं सर्व। 

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सच्चिदानंद स्वरूप                                                       मेरे विचार

कहते हैं परमात्मा सच्चिदानंद – सत, चित, आनंद स्वरूप हैं। संत, महात्मा, कथा वाचक बार-बार यही कहते हैं। लेकिन न तो ऐसा दिखता है और न ही ऐसा अनुभव होता है। तब क्या यह केवल कहने की बात है या सत्य में ऐसा है?

          पढ़ाई में एकाग्र विद्यार्थी को, साधना-पूजा-पाठ में डूबे भक्त को, पुस्तक पढ़ने में तल्लीन पाठक को बाहर की आवाज सुनाई नहीं देती। गली से बैंड-बाजे के साथ गुजरती बारात का उसे भान नहीं होता। इसका यह तात्पर्य नहीं है कि बारात वहाँ से गुजरी ही नहीं, या वह बहरा है। किसी को सुनी, किसी को नहीं। आवाज हमारे कानों तक भी पहुंची, दिमाग तक प्रेषित भी हुई, लेकिन फिर भी सुनाई नहीं पड़ी। मस्तिष्क कहीं और व्यस्त था। भीड़ भरे इलाके में भी हम अभ्यास द्वारा अपने आप को ऐसा एकाग्र कर सकते हैं कि वे अनचाही आवाजें हमारे दिमाग तक न पहुंचे।

          चिन्मय विभूती, कोलवान के पास के गांवों में  कभी-कभी रात्री जागरणअन्य सामाजिक, आध्यात्मिक या फिर मनोरंजन का कार्यक्रम होता है। तब रात भर संगीत-भजन-कीर्तन-गाने-संगीत  चलता है। इसके अलावा भी कभी लोक गीत, तो कभी फिल्मी गीतों का भी कार्यक्रम होता है। इन सभी आयोजनों में लाउड स्पीकर तेज आवाज पर ज़ोरों से चलता है। इनसे आश्रम में  रहने वालों को व्यवधान होता है, प्रवचनों में, चर्चा में, साधना में और निद्रा में भी। एक बार कुछ आश्रमवासी स्वामीजी के पास पहुंचे और इसका कोई उपाय करने का अनुरोध किया।  स्वामीजी ने समझाया कि उन ग्राम वासियों को भी तो दिन भर, सप्ताह भर मेहनत करने के बाद कुछ मनोरंजन चाहिए, पूजा-पाठ-भजन-कीर्तन चाहिए। अपनी सुविधा के लिए हम उन्हें कैसे मना कर सकते हैं। हमें खुद को साधना होगा। कान तो हमारा है, हम जिसे चाहें उसे अंदर जाने दें जिसे न चाहें न जाने दें।

          राम कथा चल रही थी। हनुमान भी बैठे सुन रहे थे। कथा वाचक ने कहा कि  जब हनुमान लंका में  सीता मैया के पास बगीचे में पहुंचे चारों तरफ श्वेत पुष्प  खिले हुए थे। तुरंत हनुमानजी उठ खड़े हुए और कहा नहीं वहाँ श्वेत नहीं रक्तिम पुष्प थे। कथा वाचक ने मानने से इंकार कर दिया, कहा नहीं पुष्प श्वेत ही थे तुम्हें रक्तिम प्रतीत हुए। बात बढ़ गई। हनुमान मानने को तैयार नहीं, ‘वहाँ तो मैं था, मैंने देखा, तुम कैसे सही हो सकते हो। आखिर फैसले के लिए  दोनों सीता मैया के पास जा पहुंचे। सीता ही उस समय उस वन में थीं। सीता ने कहा, प्रिय हनुमान पुष्प श्वेत ही थे। उस समय क्रोध के कारण तुम्हारी आँखों में रक्त उतर आया था अतः तुम्हें रक्तिम प्रतीत हुए। हमें वही और वैसा ही दिखता है जैसी हमारी प्रवृत्ति होती है। दिख कर भी नहीं दिखता या कुछ और ही दिखता है। कई बार तो हमें वही दिखता है जो हम देखना चाहते हैं वह नहीं दिखता जो होता है।

          कहा जाता है दिखे तो विश्वास हो लेकिन कई बार इसका उलट भी होता है, यानी विश्वास हो तो दिखेहमें दिखता तो है, अनुभव भी होता है लेकिन हम अन्य अनेक सांसारिक उलझनों में ऐसे उलझे रहते हैं कि हमें सच्चिदानंद स्वरूप दिख कर भी नहीं दिखता, सुन कर भी नहीं सुनता।

          एक दिन राज्य के सेनापति, संत से मिलने आये। जनरल, एक बड़ा आदमी, उसकी कमर से  एक लंबी तलवार लटकी हुई थी। उस ने संत से गर्व पूर्वक पूछा, "नरक और स्वर्ग कहाँ है?"

संत ने अध-मुँदी आँखों से जनरल की ओर देखा और एक शरारती मुस्कान के साथ कहा, "पहले मुझे बताओ बड़े आदमी कि तुम कौन हो"। उसने गर्व से कहा, "मैं इस राज्य का सेनापति हूं"। संत जोर से हँसे और कहा, "भगवान हमारे राज्य को बचाओ! तुम एक मोटे से गैंडे की तरह दिखते हो, तुम्हें किसने सेनापति बनाया।"

          क्रोध से लाल हुए सेनापति ने अपनी तलवार खींच ली और संत पर चिल्लाया, "तुमने मेरा अपमान करने की हिम्मत कैसे की।" संत फिर हँसे, "ओह, तुम्हारे पास तलवार  भी है! मुझे ऐसा लगता है कि तुम्हारी तलवार चूहे को भी नहीं मार सकती, यह इस राज्य को कैसे बचा सकती है"। जनरल ने क्रोध से क्रोधित होकर, स्वामी के गले पर  तलवार रख दी और चिल्लाया "यदि आप आगे मेरा अपमान करते हैं, तो मैं आपको टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा"। संत ने शांति से सामान्य नजरों से देखा और धीरे-धीरे और जानबूझकर प्रत्येक शब्द पर जोर देते हुए कहा: "समझो, मेरे प्यारे बड़े आदमी, तुम अब नर्क में हो।"

          गुरु के शब्द अचानक प्रकाश के साथ सेनापति के मन और हृदय में प्रवेश कर गए। सेनापति ने अपनी तलवार जमीन पर गिरा दी। गुरु के सामने अपना सिर झुकाते हुए, जनरल ने कहा, "मैं पवित्र व्यक्ति को समझता हूं। कृपया मुझे मेरे मूर्खतापूर्ण व्यवहार के लिए क्षमा करें"। मास्टर ने मुस्कुराते हुए कहा, "समझो, मेरे प्यारे बड़े आदमी, तुम अब स्वर्ग में हो।"

         हमारे पास इंद्रियाँ तो हैं, लेकिन उनसे हमें उसका स्वरूप दिखता नहीं। साधना द्वारा, भक्ति द्वारा, श्रद्धा द्वारा गुरु कृपा से हमें उस सत-चित-आनंद स्वरूप के दर्शन हो जाते हैं।

          मेरे एक मित्र बल्कि कहूँ तो सहपाठी है। ईश्वर के प्रति विशेष आस्था नहीं हैं। एक दिन आपबीती बता रहा था। कोलकाता में कॉलेज स्ट्रीट के पास हेदुया तालाब के नजदीक अपने किसी मित्र के साथ जा रहा था। अचानक वहाँ के स्थानीय लड़कों के साथ किसी बात पर उस मित्र की तू-तू मैं-मैं हो गई। बात बढ़ गई। मेरे मित्र ने बताया की उसे बचाने वह भी बीच में कूद पड़ा। हाथापाई की नौबत आ गई। ये दोनों बाहर के थे और वे स्थानीय, उनके अनेक साथी जमा हो गए। बिगड़ती परिस्थिति को देखते उसका मित्र तो भाग खड़ा हुआ। मेरा मित्र फंस गया। उसे जमीन पर पटक कर सब मारने लगे। मेरे मित्र ने बताया कि उसे लगा की आज तो हाथ-पाँव टूटेंगे। तभी अचानक कहीं से एक औरत आई, बीच में कूदी सब को भगाया, मेरे दोस्त को छुड़ाया और चली गई। उसका कहना है कि उसने न इसके पहले और न इसके बाद कभी उसे देखा। 

          उसे किसी के दर्शन नहीं हुए, क्या आपको सच्चिदानन्द के दर्शन हुए!

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छोटों से भी सलाह लें                                    संस्मरण, जो सिखाती है जीना

हमारे जीवन में अनेक समस्याएँ आती हैं। उनका समाधान हम स्वयं  के विचारों से कर लेते हैं। कठिन समस्याओं को अपने समाज के विभिन्न व्यक्तियों की सलाह-सीख से हल करते हैं। समाज के विभिन्न व्यक्तियों में अपने तथा दूसरों के परिवार के सभी छोटे-बड़े सदस्य सम्मिलित हैं। कभी-कभी बड़ों से प्राप्त सलाह से अधिक उपयोगी सीख अपने से छोटों से मिल जाती है। श्री लालबहादुर शास्त्री हमारे देश के चिरस्मरणीय एवं माननीय प्रधानमन्त्री रहे हैं। उन्हें अपने से छोटों से तथा घर के सेवकों - (माली, रसोइया आदि) से भी अपनी समस्याओं पर विचार-विमर्श करने की आदत थी। सलाह लेने वाले व्यक्ति के सम्मुख ही वे अपने सेवकों से सलाह लेने लग जाते—'क्यों भाई! तुम्हारी इसपर क्या राय है, क्या ख्याल है?" और पहले अपनी सलाह नहीं देते। एक बार ऐसी स्थिति पर सलाह लेने वाले उनके एक मित्र ने कह दिया— 'शास्त्रीजी! मुझे आपका यह व्यवहार आज तक समझ में नहीं आया। मैं आपसे इस विषय पर चर्चा कर रहा हूँ और आप अपने सेवक से सलाह माँग रहे हैं।'

          शास्त्रीजी ने अपने मित्र को बताया कि कभी-कभी अच्छी सलाह छोटे व्यक्ति से भी मिल जाती है। नि:सन्देह कभी-कभी छोटे आदमी भी बड़े काम की बात सुझा देते हैं।

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बुधवार, 1 फ़रवरी 2023

सूतांजली फरवरी 2023

 सूतांजली

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वर्ष : 06 * अंक : 07                                                                फरवरी * 2023

जो काम साधारण आदमी को असंभव जान पड़ता है,

उसे प्रतिभाशाली संभव मानता है।

प्रतिभाशाली को भी जो असंभव जान पड़ता है,

उसे जो कर दिखाये,

वह है विभूति

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अगर्चे आज गांधी होते तो................?                          मेरे विचार

जितना आसान है यह कहना :

अगर गांधी होते तो ........           अगर गांधी नहीं होते तो.........

उतना ही कठिन है इसका अर्थ समझना।

          अगर कोई प्रश्न / उत्तर  सबसे ज्यादा भ्रम पैदा करता है तो वह यही हैइनके उत्तर सबसे ज्यादा अविश्वास, संदेह और अनास्था पैदा करते  हैं। यह कथन यह खोखला दावा करता है कि हम उनके समकक्ष हैं, हमने उन परिस्थितियों को जीया है।  सच्चाई यही है कि न हम वैसे हैं,हमने उन परिस्थितियों का सामना किया है। इतना ही नहीं, हम उन्हें हटा कर एक रिक्त स्थान पैदा करते  हैं, यह विचार नहीं करते कि उस रिक्त स्थान को भरने कोई और होता या कोई नहीं होता या कुछ और होता, तब क्या होता, हम उसका आकलन नहीं कर सकते। न हमारे पास उस व्यक्ति की सी समझ होती है, न दूरदर्शिता, न ऊंचाई। न हम उस परिस्थिति का वैसा विश्लेषण करते हैं और न ही उस पर उतना विचार। हम केवल अपनी बातें, अपने विचार  उस व्यक्ति के नाम से कहते हैं। और ऐसे वक्तव्यों का एक ही लक्ष्य होता है - अपनी मनोवांछित बात, अपनी मनोकामना को थोपना। जो नहीं है उसे दिखाना और जो है उसे छुपाना।  

मैं तो यही समझता हूँ कि शायद गांधी आज होते तो अपने जीवन का सबसे बड़ा दुख झेल रहे होते। शायद देश के बँटवारे से ज्यादा और सांप्रदायिक दंगो से गहरा। इसके लिए यह समझना होगा कि सबसे बड़ा दुख किसे कहेंगे? सुख के बारे में यह किवंदन्ती है कि मनुष्य अपने सुख में उतना सुखी नहीं होता जितना पड़ोसी के दुख में।  लेकिन फिलहाल मेरा ध्यान सुख पर नहीं दुख पर केन्द्रित है। व्यक्ति सबसे दुखी कब होता है?

अपने प्रियजन के बिछ्ड़ने से? या

अपने बनाए आशियाने को बिखरते देख कर? या

अपने बनाए आशियाने को विरोधियों द्वारा तोड़े जाने पर? या

अपने आशियाने को अपने समर्थकों द्वारा तोड़े जाने पर?

जूलियस सीज़र को सबसे ज्यादा दर्द तब होता है जब वह अपने जिगरी दोस्त ब्रूस को भी अपने हत्यारों से मिला हुआ देखता है। यानि अपने समर्थक, अपने अनुयायी, अपने प्रियजन को ही जब अपना आशियाना बिगाड़ते देखते हैं तब बड़ी पीड़ा होती है। 

मुझे लगता है कि अगर्चे गांधी आज होते तो उन्हें यही दर्द सहना पड़ता। गांधी ने तो दिन दहाड़े, सबके समक्ष, छाती पर गोली खाई। जीते जी, सत्य और अहिंसा का संग्राम लड़ते रहे और कभी घुटने नहीं टेके। लेकिन जब गांधी देखते कि उन्हीं के नाम पर बनाई गई संस्थाएं, उनकी नीति के प्रवर्तक, उनके समर्थक, उनके उत्तराधिकारी ही उनकी पीठ पर गोली चला रहे हैं, लेकिन फिर भी सीना फुलाए घूमते हैं, मालाएँ पहनते हैं, गांधीवादी कहलाते हैं, तो उन्हे कैसा लगता? क्या किया हमने गांधी के साथ। अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं :

पहला – विश्वास की हत्या

गांधी का राजनीतिक जीवन दक्षिण अफ्रीका में प्रारम्भ हुआ। उनका विरोध था वहाँ की ब्रितानी सरकार की नीतियों से, वहाँ के प्रशासन से। बागडोर थी जनरल स्मट के हाथ में। गांधी की पहली बड़ी मुठभेड़ सीसे हुई। गांधी ने दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास में लिखा है कि लोगों ने गांधी को बार बार समझाया, चेताया कि स्मट विश्वसनीय नहीं है। स्मट चालक और धूर्त है। वह अपनी बात को पलटने में, अपनी बात का दूसरा ही नहीं तीसरा अर्थ निकालने में माहिर है। अत: उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। लेकिन गांधी ने उनकी बातें सिरे दर्जे से खारिज कर दी। गांधी ने साफ-साफ कहा कि हमें उस की बातों पर, उसके वादे पर विश्वास करना ही होगा। हमें उसे, अपने वादे पर काम करने के लिए समय देना ही होगा। इस पुस्तक में वे लिखते हैं, “आप लोग जिसे मेरा भोलापन कहते हैं, वह तो मेरा अभिन्न अंग बन गया है। वह भोलापन नहीं किन्तु विश्वास है। और मैं मानता हूँ कि अपने मानव-बंधुओं पर विश्वास रखना मेरा और आपका भी कर्तव्य है

          ध्यान देने वाली बात यह है कि गांधी स्मट सरकार की नीतियों और कानून का विरोध कर रहे थे। उधर स्मट भी गांधी का विरोध कर रहे थे। दोनों एक दूसरे के आमने-सामने खड़े थे। गांधी के सहयोगी गांधी को स्मट के वादों पर विश्वास करने से मना कर रहे थे। लेकिन इन सब के बावजूद गांधी ने स्मट पर भरोसा और विश्वास किया। लेकिन इन सब बातों को दर किनार करते हुए हमने अपने ही देश के, अपनी ही जनता द्वारा चुनी हुई सरकार की हर बात पर, हर वादे पर, हर कार्य पर हमने  अविश्वास किया, भ्रम फैलते रहे, जनता को बार बार सरकार पर भरोसा न करने की सलाह देते रहे, उसे झूठा और चोर कहते रहे। हम उनके साथ खड़े थे जिनका कार्य केवल और केवल विरोध करना था, अपने खुद के हितों के लिए। हम उनके साथ खड़े थे जो देश में हताशा, अविश्वास और संदेह का वातावरण पैदा कर रहे थे।

          जनता और देश ऐसे लोग खोज रहा था जिससे उनमें आशा और विश्वास का संचार हो। सरकार द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठाए गए हर कदम का विरोध कर हम त्रस्त जनता का विरोध और सम्पन्न लोगों का समर्थन कर रहे थे। आम जनता द्वारा दर्शाये गए हर्ष पर हमने यही टिप्पणी की दूसरे का दुख उन्हे सुख पहुंचा रहा है। हम चीख-चीख कर कह रहे थे कि यह अब तक कि सबसे बड़ी सरकारी लूट है। लेकिन यह नहीं बता पाये कि यह सरकार है कौन? और उस सरकार ने उस लूट के पैसे का क्या किया? गरीब-त्रस्त जनता के साथ न खड़े होकर हम अमीर-सम्पन्न लोगों के साथ खड़े थे।

क्या दावे के साथ कहा जा सकता है कि अगर्चे आज गांधी होते तो......  क्या करते

 

दूसरा  – पक्ष और विपक्ष

गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत आते हैं। उद्देश्य है भारत के लोगों और यहाँ की सरकार को दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की परिस्थिति से अवगत कराना। वहाँ की सरकार द्वारा भारतीयों पर लगाए जाने वाले अमानवीय करों  के प्रावधानों को रद्द करवाना / रुकवाना भी उनकी यात्रा का एक प्रमुख अंग था। अपनी बात लोगों तक पहुँचाने के लिए उन्होने ने एक  पंफ्लेट भी छपवाया जो हरे रंग का था। उनका यह पंफ्लेट “The Green Pamphlet” के नाम से विख्यात हुआ। गांधी के साथ दक्षिण अफ्रीका की सरकार का कोई प्रतिनिधि नहीं था। अत: गांधी ने जब भी अपना पक्ष रखा उसके साथ उस विषय पर वहाँ की  सरकार का पक्ष भी बड़ी सिद्दत और सच्चाई के साथ रखा। सरकार के पक्ष को जस-का-तस, बिना किसी काट-छाँट के, बिना कुछ जोड़े-घटाये बताया। उद्देश्य था पक्ष और विपक्ष दोनों के मतों को लोगों के सामने रखना, ताकि लोग निष्पक्ष मत बना सकें, सरकार सही फैसला कर सके।   क्या हमारे पास विरोधियों की, सही हो या गलत, आलोचना के अतिरिक्त और कुछ है?

क्या दावे के साथ कहा जा सकता है कि अगर्चे आज गांधी होते तो......   क्या करते

 

तीसरा  – स्वच्छता का मखौल

सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान की नींव डाली। हमें यह बात अच्छी तरह समझनी चाहिए कि  स्वच्छता का पहला कदम गंदगी न करना है। हम अपना घर भी सिर्फ इस कारण साफ रख पाते हैं क्योकि उसे गंदा नहीं  करते। विदेशों में भी गंदगी न करने का अभ्यास ही स्वच्छता बनाए रखता है। यानि स्वच्छता रखने के लिए यह आवश्यक है कि गंदगी न की जाये। इसके लिए आवश्यक है कि जनता का सहयोग मिले और वे गंदंगी न फैलाये। यह कोई कठिन कार्य भी नहीं है केवल जागरूकता की अवश्यकता है। सरकार के आवाहन पर केवल विद्यार्थी और युवा ही नहीं, अच्छे घरों की महिलाएं भी संगठन बना कर इस कार्य में जुटी हुई थीं। वे जुलूस नहीं निकाल रही थीं बल्कि लोगों में पास जा कर उन्हे गंदगी न करने का संदेश दे रही थी। जनता भी उत्साहित और सहयोगी थी। जनता द्वारा सरकार को दिया जाने वाला सहयोग विपक्ष को तो नहीं रुचा, यह बात तो समझ आती है। लेकिन बुद्धिजीवियों और गांधी वादी संस्थाओं को भी इसमें बू आई और इस अभियान का व्यापक रूप से मखौल उड़ाया गया। जनता में फैल रही जागरूकता ठिठक गई। जनता ने सरकार का साथ देना बंद कर दिया और वापस अपने दबड़े में घुस गई और गंदगी फैलाओ अभियान में फिर से जुट गई। मैं आज तक समझ नहीं पाया कि हम इस अभियान से क्यों नहीं जुड़ पाये। इस प्रकार जनता को बरगला कर हमने गांधी का कौन सा धर्म निभाया? क्या लाभ हुआ?

क्या दावे के साथ कहा जा सकता है कि अगर्चे आज गांधी होते तो......  क्या करते

 

चौथा  – निष्पक्षता का लोप

यह झिड़की गांधी ने दी थी समाचार पत्रों के संपादकों को, “आप अपना समय और शक्ति बाल की खाल निकालने में, दोष-दर्शन में और छिद्रान्वेषण में बर्बाद करते हैं। आपको थोड़ी सी भी त्रुटि मिल जाती है – फिर वह वास्तविक हो या काल्पनिक – आप अच्छी तरह जांच किए बिना ही सत्तारूड़ सरकार के विरुद्ध प्रचार करने और अप्रीति फैलाने में उसका दुरुपयोग करते हैं मालूम होता है कि यह आपका धंधा बन गया है। क्या वर्तमान सरकार की कोई प्रवृत्ति ऐसी नहीं है, जो आपके सहयोग की पात्र हो?”

          गांधी का ध्यान सही और गलत पर था लेकिन हमारा ध्यान व्यक्ति पर है। गांधी मानते थे कि गलत व्यक्ति भी सही हो सकता है और सही व्यक्ति भी गलत। गलत और सही व्यक्ति नहीं उसका कार्य होता है। पाप से घृणा, ‘पापी से नहीं। समीक्षा कार्य की होनी चाहिए। लेकिन हम यह मानते हैं कि सही व्यक्ति हर समय सही है और गलत व्यक्ति हर समय गलत। इतना ही नहीं, यह आकलन करते समय हमारा अपना स्वार्थ भी इससे जुड़ जाता है। हम कभी भी किसी भी अंगुलीमाल को कभी भी वाल्मीकि नहीं बनने देंगे।  हम क्यों निष्पक्ष होकर निर्णय नहीं ले पाते?

क्या दावे के साथ कहा जा सकता है कि अगर्चे आज गांधी होते तो......  क्या करते?

 

अगर विश्लेषण करें तो पन्ने के पन्ने रंगे जा सकते हैं। प्रश्न है खुले मन बातों को समझना। सही और गलत का सही आकलन करना। गलत का विरोध जितना जरूरी है, सही का समर्थन भी उतना ही आवश्यक है। विरोध करने के जिद में हम आकलन करने की शक्ति खो देते हैं और गलत राह पर चल पड़ते हैं। गलत के बजाय सही का विरोध ज्यादा जोश से करने लगते हैं। सही का समर्थन करना हमारे अहम को ठेस पहुंचाने लगता है। यह नितांत आवश्यक है कि हम निरंतर अपने को कसौटी पर कसते रहें।

          पनी भूल को स्वीकार करने में अहम न रखें। अगर कदम गलत राह पर निकल पड़े हों तो उसे वापस खींच कर सही दिशा में मोड़ने में संकोच अनुभव न करें। इस बात की परवाह न करें कि दूसरा क्या कर रहा है। दूसरे के बुराई हम तुरंत अपना लेते हैं लेकिन उसकी अच्छाई की तरफ नज़र उठा कर भी नहीं देखते। अपनी अच्छाई बरकरार रखें और दूसरों की अच्छाई को अपनायें। ऐसा करें तो शायद हम गांधी के रास्ते पर कुछ कदम तो चल ही पड़ेंगे!

          गांधी के नाम पर अपनी बात कह कर, भ्रामक बातें फैला कर, बे-बुनियाद और अनर्गल प्रश्न कर गांधी को बदनाम न करें, उनको समझने का प्रयत्न करें, कठिन है लेकिन हो सके तो उनकी तरह सत्य और अहिंसा का मार्ग अपनाएं।

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उपकार मानो, एहसान नहीं                               संस्मरण  - जो सिखाती है जीना

भूदेव बाबू, कोलकाता के जाने–माने समाजसेवी थे। वे भगवान शंकर के परम भक्त थे। गरीबों-असहायों की भरपूर सहायता किया करते थे। साथ ही विद्वानों तथा ब्राह्मणों का सम्मान करना वे अपना सर्वोपरि धर्म मानते थे। उनकी सेवा का कोई मौका वे हाथ से नहीं जाने देते थे। वे अक्सर कहा करते – सरस्वती पुत्र, शिक्षक तथा ब्राह्मण प्राय: अधिक संकट में रहते हैं। उनकी सेवा-सहायता करके उन्हें शिक्षा एवं सदविचारों के प्रचार में लगे रहने की दिशा में प्रोत्साहन दिया जाना चाहिये। उन्होंने विद्वानों की सहायता के लिये अलग से बाबा विश्वनाथ सहायता कोश की स्थापना की। वे प्रतिभाशाली विद्वानों एवं विरक्त ब्राह्मणों की उस कोश से सहायता किया करते थे।

          उनके मुनीम ने वर्ष के अंत में एक सूची उनके सामने प्रस्तुत की, जिसमें लिखा था, ‘इस वर्ष जिन-जिन अध्यापकों एवं विद्वानों को विश्वनाथ-वृत्ति प्रदान की गयी है, उनकी नामावली। सूची देखते ही भूदेव बाबू ने नाराजगी प्रकट करते हुए कहा, ‘मुनीमजी! उस सूची के ऊपर लिखो कि इस वर्ष जिन माननीय अध्यापकों और विद्वानों ने विश्वनाथ-वृत्ति स्वीकार करने की कृपा की, उनकी नामावली

          वे कहा करते थे कि जो विद्वान हमारी सहायता स्वीकार करते हैं, हमें उनका उपकार मानना चाहिये, न कि उनपर एहसान जताना चाहिये

(कल्याण, गीतप्रेस गोरखपुर से)



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सूतांजली, अगस्त द्वितीय 2026, आकर्षक घर की कुंजी

  २कोई ऐसा अक्षर नहीं है, जिसका प्रयोग मंत्र-रचना में न हो सके , कोई ऐसा वृक्ष नहीं है, जो किसी न किसी व्याधि की औषधि न हो , कोई ऐसा...