शनिवार, 1 जुलाई 2023

सूतांजली जुलाई 2023

 


खुद को बेहतर बनाना ही

बेहतर गाँव, बेहतर शहर, बेहतर देश और बेहतर दुनिया

बनाने की ओर पहला कदम होता है।

पहला कदम उठाइये।

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आध्यात्मिक जीवन - लौकिक जीवन                                              एक चिंतन

हम जब आध्यात्मिक और लौकिक जीवन की चर्चा करते हैं तो प्रायः हमारे खयाल में  यही आता है कि ये एक-दूसरे से पृथक जीवन हैं। लौकिक जीवन हम अपने जीवन की रोज़मर्रा की क्रियाओं को मानते हैं और आध्यात्मिक जीवन में आध्यात्मिक गतिविधि, चर्चा, पठन-पाठन को मानते हैं। लेकिन थोड़ा विचार करें तो समझ आता है कि हमारी यह अवधारणा त्रुटिपूर्ण है और मूलतः  हमारे अज्ञान पर आधारित है।  वास्तव में आध्यात्मिकता हमारे श्वास की भांति पूर्णतः एक स्वाभाविक, सामान्य और दैनिक जीवन का कार्यकलाप ही है।

क्या हमारे ऋषियों, मुनियों, साधुओं ने केवल आध्यात्मिक जीवन जिया? क्या उनके जीवन में लौकिक जगत नहीं था? इनमें से कोई भी हिमालय की कन्दराओं या गुफाओं के निवासी नहीं थे, ये  प्रायः एक सामान्य गृहस्थी थे। उनका अपना एक भरा-पूरा परिवार था। हाँ, तपस्या आदि के लिए एकांतवास करते थे, ठीक वैसे ही जैसा हम आज शिक्षा, व्यापार के लिए दूर-दराज जाते हैं।  ये ऋषि-मुनि जीवन के हर पहलू पर ग्रन्थों की  रचना करते थे तथा गुरुकुल में छात्रों को जीवनोपयोगी अनेक विषयों की शिक्षा देते थे जिनमें अध्यात्म भी एक विषय हुआ करता था। इन सब गुरुकुलों में प्रायः रहने-खाने की सुविधा उपलब्ध रहती थी और आज ही की तरह ये प्रायः शहरों से दूर हुआ करते थे। छात्रों और उनके परिवार से वे गुरु-दक्षिणा के रूप में धन या अन्य सामग्री के अलावा अनुदान भी लिया करते थे।

अब आगे बढ़ने के पूर्व हम यह समझने की कोशिश करें कि हम किसे अध्यात्म जीवन मानते हैं? हम सब की अलग-अलग मान्यता हो सकती है, विचार हो सकते हैं। हमारे लिए इसे परिभाषित करना भी एक कठिन कार्य है। हमारे मन में इसकी एक धुंधली सी तस्वीर भी हो सकती है, जो सब के लिए अलग-अलग है। अतः बजाय यह बताने के कि आध्यात्मिकता क्या है? मैं कुछ प्रश्न करता हूँ, आप इनके उत्तर दें – केवल हाँ या ना में, शायद आपकी तस्वीर कुछ स्पष्ट  हो जाए।

क्या पूजा और उपवास ही आध्यात्मिकता है?                                           हाँ / ना

क्या मंदिर जाना और अनुष्ठान करवाना ही आध्यात्मिकता है?                      हाँ / ना

केवल भगवत चर्चा करना ही आध्यात्मिकता है?                                       हाँ / ना

क्या जरूरतमंदों की मदद करना आध्यात्मिकता है?                                   हाँ / ना

क्या बुरे इरादे रखना आध्यात्मिकता है?                                                 हाँ / ना

क्या स्वार्थी होना आध्यात्मिकता है?                                                      हाँ / ना

क्या स्वार्थ पूर्ति के लिए बेईमानी करना, झूठ बोलना आध्यात्मिकता है?         हाँ / ना

क्या मन का कलुषित होना आध्यात्मिकता है?                                          हाँ / ना

क्या ईमानदार होना आध्यात्मिकता है?                                                  हाँ / ना

क्या प्रेमभाव रखना आध्यात्मिकता है?                                                   हाँ / ना

इसी प्रकार के अपने प्रश्न तैयार करते जाइए और सच्चाई से इनके जवाब देते जाइए। आध्यात्मिक जीवन की तस्वीर साफ होने लगेगी। 

          किसी समय लौकिक जीवन के कार्यकलापों को आध्यात्मिक जीवन के कार्यकलापों से अलग नहीं माना जाता था। ये दोनों आपस में गूँथे हुए थे, माला में मोती और धागे की तरह। लेकिन कालांतर में हमने इन्हें अलग-अलग ही नहीं किया बल्कि यह धारणा भी धारण कर ली कि किसी भी मानव का जीवन या तो आध्यात्मिक है या लौकिक है। इस कारण से हमारा और हमारे देश का पराभव हुआ। हमने लौकिक जीवन से आध्यात्मिक जीवन को अलग कर दिया। यह कब-कहाँ हुआ इसका सटीक ज्ञान नहीं है लेकिन कइयों का यह मानना है कि इसका प्रथम उदाहरण, जिसका व्यापक प्रभाव पड़ा, वह है पृथ्वीराज चौहान के समय जयचंद। इसके बाद से हमारे लौकिक जीवन से अध्यात्म का लोप होना प्रारम्भ हुआ और हमारा अधोपतन होता रहा।

          शनैः-शनैः हम इस मनः स्थिति में पहुँच गए हैं जहाँ हमारे लौकिक में अनैतिकता का प्रवेश ही नहीं हुआ बल्कि मान्यता भी प्राप्त हो गई। एक साधारण व्यक्ति भी गाहे-बगाहे अनैतिकता का सहारा लेता है, यह सर्व-मान्य है,  इसमें हमें कोई दोष भी नहीं दिखता और इसका ठीकरा हम सरकार के सिर पर फोड़ देते हैं। ऐसे नियम-कानून हैं, शासन-प्रशासन हैं कि दैनिक व्यवहार में बिना अनैतिकता के हम रह ही नहीं सकते!

          यह सरकार कौन है? शासक-प्रशासक-विधायक? यह हम खुद ही हैं? अमूल के जनक स्वर्गीय वर्गीज़ कुरियन का नाम तो आपने सुना ही होगा। प्रधान मंत्रियों से उनके अच्छे संबंध थे। बिना किसी विशेष रोक-टोक के वे उनसे मिलने उनके कार्यालय में पहुँच जाते थे। इसके बावजूद उनकी फाइल, योजनाएँ, आवेदन पर विचार कर निर्णय लेने में अप्रत्याशित समय लगता था। अपनी आत्मकथा में वे लिखते हैं कि एक बार इस विलंब के कारण वे बुरी तरह झुँझला गए और खुद अपने आवेदन की फ़ाइल लेकर संबन्धित अधिकारी के पास जा पहुंचे। अधिकारी ने पूरे मनोयोग से उनकी फ़ाइल देखी, उनकी पूरी बात सुनी और फिर अंत में कहा, आप यह फ़ाइल छोड़ जाइए, सरकार इस पर विचार करेगी। कुरियन साहब भरे हुए तो थे उन्होंने तपाक से प्रश्न किया, यह सरकार कौन है?’ अधिकारी एक बार तो सकपका गए लेकिन फिर धीरे से उच्च-अधिकारी की ओर इंगित किया। उन्होंने भी पूरी बात सुनने के बाद इस पर सरकार विचार करेगी का जुमला उछाल दिया। कुरियन साहब भी कहाँ मनाने वाले थे। उनके प्रश्न पर उस उच्च-अधिकारी ने भी उन्हें आगे भेज दिया। उस प्रकार अधिकारियों, विभागों, मंत्रियों के चक्कर लगाते-लगाते आखिर वे प्रधान मंत्री के सम्मुख पहुँच गए।  उन्होंने उनका स्वागत किया, उनकी पूरी बात सुनी लेकिन अंत में उन्होंने भी यही कहा आप यह फ़ाइल छोड़ जाइए, सरकार इस पर विचार करेगी। कुरियन साहब को आश्चर्य हुआ और बोले, पिछले छ: महीने से मैं सरकार को खोज रहा हूँ। मैंने सोचा था कि मैं अब सरकार के पास पहुँच गया। लेकिन आप भी सरकार नहीं है? आखिर यह सरकार है कौन? दरअसल यह सरकार और कोई नहीं खुद हम ही हैं।  जिस दिन हम यह समझ जाएंगे, उस दिन हम, हमारा देश बदलने लगेगा।

          लौकिक जीवन हमें स्व की तरफ मोड़ता है और आध्यात्मिक जीवन सर्व की तरफ। सैद्धांतिक रूप में हमें आध्यात्मिकता का विचार आकर्षित करता है लेकिन व्यावहारिक रूप में हम उसे अमल में नहीं लाते। अगर हमारे जीवन में आध्यात्मिकता का समावेश केवल सैद्धान्तिक रूप में है तो ऐसी आध्यात्मिकता निरुद्देश्य है।  लौकिक और आध्यात्मिक जीवन एक दूसरे के पूरक हैं। एक को अपनाने का अर्थ दूसरे को छोड़ना नहीं है।

          विशेषकर, युवाओं के जीवन में आध्यात्मिकता का विकास महत्वपूर्ण है, सिद्धांत रूप में नहीं, व्यावहारिक रूप में  जीवन में निर्दिष्ट लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु प्रयास आवश्यक है। स्वामी विवेकानंद सेवा की पवित्र भावना से प्रेरित थे। स्वामीजी मानते थे कि मानव सेवा ही सच्ची सेवा है। मानव के प्रति निश्छल प्रेम से यदि आपका हृदय परिपूर्ण है तो वही ईश्वर की सच्ची पूजा है। प्रेम अपने आप में पूर्ण है, यह महत्वपूर्ण नहीं है कि इसका स्रोत क्या है। अगर आप अपने आप को बदलना चाहते हैं, अपने परिवार को बदलना चाहते हैं, अपने समाज को बदलना चाहते है, अपने देश को बदलना चाहते हैं तो अपने लौकिक जीवन में आध्यात्मिकता, सैद्धान्तिक रूप में नहीं, व्यावहारिक रूप में अपनाइये। शुरुआत अपने से कीजिये, दूसरों की प्रतीक्षा मत कीजिये।

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स्वयं से संवाद

          किंवदंती है, एक अच्छा श्रोता ही एक अच्छा वक्ता बन सकता है। अगर हम ध्यान से सुन नहीं सकते, समझ नहीं  सकते तब हम अपनी बात भी दूसरों तक नहीं पहुंचा सकते। प्रायः यह देखने में आता है  कि हम आतुर हैं, बोलने के लिए, अपने बारे में। बिना यह सोचे समझे कि सामने वाला मुझ में कितना रुचि रखता है। इसके बजाय अगर हम सामने वाले के बारे में बात करें तो उसके दो अद्भुत लाभ होंगे। हम अहंकार से मुक्त होंगे और सामने वाला भी यह जान कर प्रसन्न होगा कि हम उसके बारे में जानना चाहते हैं, हमें उसकी चिंता है। उसके लिए हम उसके शुभचिंतकों की श्रेणी में आ जाएंगे। वह हमारी प्रशंसा करने लगेगा। अगर हमारी प्रशंसा कोई दूसरा करता है तो उसका कोई अर्थ भी होता है। अपने मियां मिट्ठू बनने का तो कोई अर्थ नहीं और नकारात्मक भी है।  इस पद्धति से हमारे मित्रों की संख्या भी बढ़ेगी।  यही नहीं जानकारी और सूचना देने के बजाय, मिलने लगेगी।

          व्यक्तित्व निर्माण का यह बहुत महत्वपूर्ण पहलू है कि हम किसे ज्यादा महत्व देते हैं – स्वयं को या अन्य को। यही स्वभाव हमारे बोलने का ढंग तय करती है और समाज में हमारा स्थान तय करती है। हम क्या हैं, यह हम तय नहीं करते, समाज तय करता है। सब अच्छे कार्य मैंने किए और  सब गलत कार्यों का ठीकड़ा किसी और के सर पर फोड़ने वाला अपने आप के प्रति ईमानदार नहीं हो सकता। और जो स्वयं के प्रति ईमानदार नहीं वह दूसरों के प्रति ईमानदार कैसे हो सकता है? अपनी गलतियों को मान लेने का अर्थ है, अपने सुधार का मार्ग खुला रखना। इससे अपने सुधरने की  संभावना हर समय बनी रहती है।

          हम अपने जीवन क्रम में बहुत व्यस्त हैं। सुख की तलाश में, जीवन भर दौड़ते-भागते रहते हैं, परेशान रहते है। इसी भाग दौड़ में पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं। क्या इस भाग दौड़ से हमें वह सुख मिला जिसके लिए हम परेशान रहे? या फिर हमें पता ही नहीं चला, हम कब सुख को पीछे छोड़, दुख के पीछे ही भागने लगे? इस संदेह का निराकरण जरूरी है। जो मिल रहा है उसका आकलन करना आवश्यक है। और जो नहीं मिल रहा है – क्या नहीं मिल रहा है और वह कैसे मिलेगा – का चिंतन-मनन करना भी आवश्यक है। साधारण भाषा में इसे ही हम “स्वयं से संवाद” भी कह सकते हैं।

          स्वयं से वार्तालाप बहुत ही आसान और सहज है। लेकिन फिर भी हम इससे बचते हैं, कतराते हैं। क्योंकि अपने से बात करने में सबसे बड़ी असहजता है “हम दुनिया से झूठ बोल सकते हैं, स्वयं से नहीं बोल पाते दुनिया से भाग लेते हैं, लेकिन खुद से भाग नहीं पाते। सत्य को देख कर हम चौंक जाते हैं, हमारा परिचय बदल जाता है। हमारी हमसे मुलाक़ात होती है, और हम जैसे हैं वैसे अपने को देखना नहीं चाहते। अपने परिचय को सही करने के लिए दृड़ता पूर्वक संकल्प लेना पड़ता है।   हमारा सारा दिन दूसरों की बातें करने में गुजरता है, वैश्विक व्यापार-राजनीति, गुण-अवगुण, की बातें करने और उन पर नज़र रखने में गुजर जाता है। दूसरा क्या कर रहा है, इसको लेकर हम ज्यादा चिंतित रहते हैं, हमें क्या करना है इसका हमें भान ही नहीं होता। जब हम स्वयं से बातचीत करते हैं तब हमें एक ही शरीर में दो अलग-अलग लोग नज़र आते हैं, जिनके बीच संवाद होता है। और तब हमें अपने दायित्व का बोध होता है, क्या किया और क्या नहीं इसका पता चलता है। जो किया कैसे किया, क्या वह सही था? जो रह गया, वह क्यों छूट गया, क्या वह हमारा दायित्व था, उसके लिए कौन जिम्मेदार है, हमारे लक्ष्य प्राप्ति में उसकी क्या भूमिका थी? हमें अपने कार्यों में नीति-अनीति के दर्शन होते हैं, उन्हें बदलने और सही करने की प्रेरणा भी मिलती है। ये सब प्रश्न हम अपने आप से करते हैं, और इसके उत्तर भी हम ही देते हैं।

          इस प्रकार के निरंतर चिंतन से हमारा परिचय बदल जायेगा। रात्री सोने से पहले, आज क्या किया इस पर विचार करें। प्रातः उठने पर बिस्तर छोड़ने के पहले, आज क्या करना है इस पर विचार करें। रात की बातों को याद करें, अपने लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए अपने संकल्प को दोहराएँ। हाँ शुरू- शुरू में बड़ी दिक्कत होगी, बार-बार छोड़ कर भागने की इच्छा होगी। लेकिन दृड़ता से बने रहें।  याद करें बालपन में दो पैरों पर खड़ा होना कितना कष्ट साध्य लगा होगा, पढ़ना कितना खराब लगा होगा, गाड़ी चलाने में रक्तचाप बढ़ा होगा, घुड़सवारी में गिर कर हड्डियाँ तोड़ी होंगी, माँ-बाप-शिक्षक से मार-डांट पड़ी होगी। लेकिन इन सब बाधाओं को पार कर हम आज यहाँ तक पहुँच गए। अब अगर हम एक और बाधा पर कर लें, अपने से बातचीत करने लगें तब हम उस सुख का, उस शांति का, उस चैन का रसास्वादन कर लेंगे जिसके लिए हमने अपनी नींदें हराम की।

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गुरुवार, 1 जून 2023

सूतांजली जून 2023

 


अपने आप कुछ नहीं होता,

कर्म करना पड़ता है।

अपने आप हम सिर्फ वृद्ध होते हैं या

मृत्यु को प्राप्त होते हैं।

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परिश्रम के देवता                                                        मैंने पढ़ा

          हमारे यहाँ देवी-देवताओं की कमी नहीं। जितने चाहो उतने मिलते हैं, किस्म-किस्म के, हर रूप-आकृति और अनेकों कर्म के भी। पहले इनकी संख्या  33 कोटि (करोड़) थी, लेकिन अब शिक्षा और विज्ञान ने इनकी संख्या 33 कोटि (वर्ग, किस्म) तक सीमित कर दी है। लेकिन, अगर मैं आप से पूछूं श्रम के देवता कौन हैं? तो आप एक बार तो बगलें झाँकने लगेंगे। कोई एक नाम आपके दिमाग में नहीं आयेगा।  यह एक अलग बात है कि श्रम का महत्व हम सब समझते हैं लेकिन वहीं, यह बात भी छिपी नहीं है कि हम शारीरिक श्रम को हेय दृष्टि से देखते हैं। वंदना जी की लिखी यह कहानी श्रम के बारे में ही है।

          एक बार की बात है, स्वर्ग में देवता निष्क्रिय से दिख रहे थे। उनके जीवन में कहाँ दुःख और कहाँ कष्ट? वह तो धरती वासियों की प्रार्थना, आर्तनाद, पुकार आदि ही उनके लोक में हलचल पैदा करते हैं, क्योंकि अगर कोई सच्ची निष्ठा के साथ देवता को पुकारता है तो वे धरती पर उतरने के लिए तैयार हो जाते हैं; इसी कारण निरन्तर देवताओं का आवागमन होता ही रहता है। लेकिन कुछ दिनों से स्वर्ग में न तो आर्तनाद आ रहे थे, न प्रार्थनाओं की टेर सुनायी दे रही थी। देवता भी आश्चर्य में पड़ गये और सोचने लगे कि आखिर मामला क्या है ? अन्त में सब ने मिल कर निश्चय किया कि इस बार अ-निमन्त्रित ही धरती पर जाकर वहाँ के लोगों की हालत देखेंगे।

          अगले ही दिन देवता सूक्ष्म रूप धारण कर धरती पर उतरे। वहाँ पहुँच कर सभी आश्चर्य में पड़ गये, क्षण-भर के बाद नारद बोले- 'ओह! यह हमारी सुपरिचित दीन-हीन, लावण्य रहित पृथ्वी नहीं है।" उनकी आँखों के सामने झूम रही थी हरी-भरी वसुन्धरा। उसका अपूर्व सौन्दर्य देख वरुण देव तो आनन्द से उन्मत्त हो उठे। वे तो यहां अधिकतर किसानों की हृदय-भेदी करुण प्रार्थना सुन कर सूखी धरती के हृदय की प्यास बुझाने आया करते थे। आज तो सारी धरती, उसके प्राणी, पेड़-पौधे, चर-अचर - सभी रूपान्तरित से दिख रहे थे। नदियाँ मस्ती से बह रही थीं, किसान खेतों में, नगरवासी नगरों में, बालक विद्यालयों में, पशु वनों में, पक्षी नीड़ों में, अर्थात् सभी अपने-अपने उचित स्थान पर आनन्दपूर्वक, उत्साह के साथ काम में लगे हुए थे।

          धरती का यह परिवर्तन देख सभी देवता आश्चर्य में डूबे हुए थे। अचानक उन्होंने एक सुदर्शन पुरुष को इधर-उधर विचरते देखा। उस युवक ने भी देवताओं को देख दूर से ही सादर प्रणाम किया। देवताओं ने सोचा – अरे! हमारे जैसा यह कौन है? पहले तो हमने इसे कभी यहाँ नहीं देखा। हमारे जैसा दिखने पर भी हमसे अपरिचित !!

          नारद ने घोषणा कर दी - “हम सब उस पुरुष के पास जाकर स्वयं उसका परिचय प्राप्त करें।" अगले ही क्षण देवता वहाँ उपस्थित थे। देवताओं ने पूछा-" हे सुदर्शन युवक कौन हो तुम, देवजाति के लगते हो, लेकिन सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि स्वर्ग में तुम्हारे दर्शन कभी नहीं हुए।"

          उस पुरुष ने कहा- "देवगण ! मैं आप लोगों की कोटि का स्वर्ग में रहने वाला देवता नहीं हूँ, धरती माता की कोख में मेरा वास है। जब-जब धरती वासी मुझे पुकारते हैं मैं उपस्थित हो जाता हूँ। हरे-भरे लहराते खेतों में, फलों से लदे वृक्षों में, भव्य प्रसादों में, कुटीरों में, ग्रन्थों में, काव्यों में, सृजन के प्रत्येक कार्य में मेरा ही वास है, लेकिन मेरा सौन्दर्य सबसे अधिक निखरता है पसीने की बूँदों में, मैं हूँ परिश्रम।"

          परिश्रम-देवता को नमस्कार कर देवताओं ने कहा- "तुम ही सचमुच पृथ्वीवासियों के देवाधिराज हो। तुम्हारे बिना लोग अकर्मण्य, निष्प्राण होते हैं, तुम साथ रहो तो वे सर्वसमर्थ बन जाते हैं। तुम्हीं सचमुच पृथ्वीवासियों के सच्चे लावण्य, पारसमणि हो।"

          "हे देवगण! तब तो मुझे वर दीजिये कि धरतीवासी अपने सच्चे सौन्दर्य को भुला न दें, यह कभी न भूलें कि वे इस परिश्रम-रूपी पारस के अधिकारी हैं जिसके स्पर्श से सीसा हीरे में, लोहा सोने में बदल जाता है।” उद्यम देवता ने सिर झुका कर निवेदन किया।

          और सभी देवताओं के वरद हस्त तथास्तु में उठ गये।

(पृथ्वी को स्वर्ग बनाने का एकमात्र उपाय परिश्रम ही है)

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दैवी सम्पदा                                                                  चिंतन

          कई ऐसे गुण हैं जिन्हें अपने जीवन में धारण करने से मानव देव बन जाता है, इन्हें दैवीय सम्पदा (गुण) कहते हैं। ऐसा कोई मानव नहीं जिनमें केवल गुण हों और हर प्रकार के दुर्गुण से मुक्त हो। वैसे ही ऐसा कोई देव नहीं जिसमें कोई दुर्गुण न हो, ऐसा कोई असुर नहीं जिसमें कोई दैवीय गुण न हो। देश-काल के प्रभाव से इनका अनुपात निरंतर बदलता रहता है। साधारणतया इन गुण-दोष की मात्रा ही इस बात का निर्धारण करती है कि कौन है देव और कौन असुर।

          इन संपदाओं को जानना जितना आसान है, उतना कठिन है अपने जीवन में उतारना। एक है जीवन मूल्य(वैल्यूज) और दूसरा सद्गुण (विर्च्युज) जैसे अहिंसा, सत्य आदि। ये जीवन मूल्य हैं जिनका हम सम्मान तो करते हैं लेकिन अपने जीवन में नहीं उतारते। अतः ये दैवीय सम्पदा हमारे गुण में परिवर्तित  नहीं होते। जब हम इन जीवन मूल्यों को, दैवीय सम्पदा को अपने जीवन में उतारते हैं तब ये सद्गुण हमारे जीवन में दिखने लगते हैं। इस प्रकार दैवीय संपप्ति को बटोरने वाले को ही देव कहा जाता है।

          जैसे गुण-दोष हैं वैसे ही कर्म भी श्रेय और प्रेय होते हैं। श्रेष्ठ कार्य श्रेय और प्रिय कार्य प्रेय कहलाता है। हर मानव जानता है कि श्रेय क्या है और यह मानता भी है कि यह श्रेय है। लेकिन अनेक प्रकार की शक्तियाँ हैं जो उन्हें श्रेय के बदले प्रेय कार्य में प्रवृत्त करती हैं। यही है, हर मानव के दो विपरीत रूप (dual personality), कहना कुछ, करना कुछ, कथनी और करनी में भेद।  

          विडम्बना यही नहीं है, बल्कि इससे ज्यादा गंभीर है। हर गुण को जानना एक बात है और उन्हें समझना दूसरी। इन्हें गहराई में जाकर समझने की आवश्यकता है। गीता के सोलहवें अध्याय में श्री कृष्ण ने दैवीय सम्पदा की चर्चा की है और उन संपदाओं को गिनाया है। वे इस प्रकार हैं :

निर्भीकता                  निर्मलता                            ज्ञान और योग में निष्ठा           दान

इंद्रिय दमन                यज्ञ                                    स्वाध्याय                            तप

सरलता                    अहिंसा                               सत्य                                  अ-क्रोध

त्याग                       शांति                                 निंदा का त्याग                      दया

लोभ का त्याग            कोमलता                             लज्जा                                 अ-चपलता

तेज                         क्षमा                                  धैर्य                                    पवित्रता द्रोह का अभाव                   अभिमान का न होना

          इनमें से कोई भी सम्पदा ऐसी नहीं है जिसे हम नहीं जानते हैं। ये सब हमने बार-बार  सुना है और इनका अर्थ जानते हैं। इन सम्पदाओं में  एक है स्वाध्याय यानी खुद का अध्ययन, चिंतन। क्या इन दैवी संपदाओं पर हमने अपना अध्ययन किया है? क्या हम इन संपदाओं का सटीक अर्थ जानते हैं? हम इनके शाब्दिक अर्थ जानते हैं। और उसी के आधार पर हम कहते हैं की हाँ-हाँ जानते हैं, बहुत सुना है, फिर से उपदेश मत शुरू करो। अगर आप इसी समुदाय में हैं तो जरा ठहरिए और कुछ एक सम्पदा पर चर्चा, स्वाध्याय कीजिये

निर्भीकता – रावण-कंस, आतंकवादी-डकैत-गुंडे तो बड़े निर्भीक हैं, क्या यह उनका दैवीय गुण है? नहीं, अधर्म के मार्ग पर निडर होकर बढ़ना दैवीय सम्पदा नहीं है। जब हम  धर्म के मार्ग पर, ज्ञान के मार्ग पर, भक्ति के मार्ग पर निडर होकर चलते हैं तब वह हुई निर्भीकता। उस समय हमें डर नहीं लगना चाहिये। कौन क्या कहेगा? क्या होगा? कोई तो नहीं चलता? धर्म मार्ग पर चलने से कैसे होगा? अरे वाह! व्यावहारिक जगत में तो हम स्वीकार करते हैं प्यार किया तो डरना क्या’, भगवान से प्यार किया तो क्यों डर रहे हो? साँच को आंच क्या! आसक्ति होती है तब डर लगता है। धर्म के मार्ग पर, भक्ति के मार्ग पर, सत्य के मार्ग पर  अभय से, निर्भीकता से बढ़ना ही दैवीय सम्पदा है।   

दान – ईश्वर ने हमें जो कुछ भी दिया है उसे केवल खुद के भोग के लिए नहीं दिया है, उसका उदारता पूर्ण वितरण होना चाहिए। अगर सब खुद जमा करते रहेंगे तो कुछ लोगों के पास अनावश्यक जमा हो जायेगा और कई अभाव में रह जायेंगे। प्रकृति, हमारी समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति करती है, लेकिन हमारे लालच की नहीं। जो प्राप्त है उसका उदारता पूर्वक वितरण करना, चाहे धन हो, ज्ञान हो, वस्त्र हो, अन्न हो, भूमि हो, जिसके पास जो है, उसी का दान करना। इस बात का स्मरण रखिए जो भी देते हैं वह उसी रूप में आपके पास लौट कर आता है – कहीं भी, कभी भी, किसी से भी। दान देते समय सुपात्र-कुपात्र का ध्यान रखना भी आवश्यक है। लापरवाही से और कुपात्र को दान देना दान नहीं है। दान किसे दे रहे हैं – जोड़ने वाले को या तोड़ने वाले को? निर्माण के लिए या विध्वंस के लिए? साधु को या ठग को? इसका ध्यान रखें।

स्वाध्यायस्वाध्याय का अर्थ ईश्वर का जप या मंत्र या शास्त्र के पाठ तक सीमित नहीं है, स्वयं का अध्ययन, चिंतन, मनन भी आवश्यक है। श्रेष्ठ ग्रन्थों का अध्ययन करने से हमें जीवन के प्रति ज्ञान प्राप्त होता है और स्व-ध्ययन करने से वह ज्ञान हमारे जीवन में उतरता है और अपनी कमियों का परिचय होता है। गुरु केवल इशारा करता है, उस मार्ग पर चलना तो हमें ही पड़ता है। सनातन यानी शाश्वत। शाश्वत तो तभी हो सकता है जब देश-काल के अनुसार उसमें परिवर्तन-उत्थान होता रहे। अगर जो है केवल उसे ही पढ़ते रहे तो उत्थान कैसे होगा? पठन-पाठन, चिंतन-मनन इसी का अंग है। अतः स्वाध्याय, खुद का अध्ययन आवश्यक है।

तप, सरलता, अहिंसा  ये तीनों कर्मणा-वाचा-मनसा (कर्म, वाणी और चिंतन) तीनों स्तर पर होना चाहिए।

तप का अर्थ जंगल-पहाड़ों में जाकर आँख बंद कर बैठना नहीं है। हम जैसा बनना चाहते हैं, अपने महान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कठोर परिश्रम करना ही तप है।

कहा कुछ, किया कुछ और विचार कुछ, तब सरलता नहीं आ सकती, सरलता के लिए इन तीनों में कोई भेद नहीं होना चाहिये।

अहिंसा का अर्थ समझना और अपनाना कठिन कार्य है। लोग इसके शाब्दिक अर्थ को पकड़ कर बैठ जाते हैं। उससे आगे बढ़िए और इस पर चिंतन-मनन कीजिये।

सत्य – प्रमाण से जो ज्ञान प्राप्त हुआ वही बोलना। कहीं से, कुछ भी सुन-पढ़ कर नहीं बोलना। बोलने के पहले यह जांच करना कि क्या यह सत्य है? जब तक खुद आश्वस्त न हो नहीं बोलना। अगर कोई वचन (शब्द) दिया है तो उसका पालन करना। वचन का अर्थ प्रॉमिस नहीं है। जो कहा, वो किया है।

अ-क्रोध – क्रोध बिलकुल आये ही नहीं यह तो बड़ा ही कठिन है। लेकिन उस पर हमारा शासन होना चाहिए, संयम से वश में कर उसे शांत करने की शक्ति होनी चाहिए, उठे हुए हाथ को रोकने की शक्ति होनी चाहिये, जिव्हा पर आए शब्द बाहर नहीं निकलने चाहिये, क्रोध प्रकट न हो  

त्यागत्याग का अर्थ सन्यास भी है। अपने ममत्व-राग-द्वेष का त्याग, अहंकार का त्याग ही सबसे बड़ा त्याग है।

निंदा का त्याग – हम इसमें बहुत माहिर हैं। पीठ पीछे बुराई करना ही निंदा है। चुगली से बचना।

दया लोग दया दिखाते हैं दुष्टों के प्रति, अधमों के प्रति, अवाञ्छ्नीयों के प्रति, असफल और असफलताओं के प्रति – वास्तव में इससे दुष्टता और असफलता को एक प्रकार का बढ़ावा मिलता है।  इसके विपरीत अगर हम  सम्पूर्ण सच्चाई के साथ, समझने वाले और मूल्य आँकने वाले हृदय की स्वाभाविक कृतज्ञता के साथ दयावान हों तो जगत में चीजें बड़ी तेजी से बदलने लगे, उन्हें ईश्वरीय शक्ति की उपस्थिती का आभास होने लगेगा।

लज्जा -  न करने योग्य कार्य करने में, धर्म विरोधी कार्य करने में लज्जा आनी चाहिए। इतना ही नहीं करने योग्य कार्य न करने से भी लज्जा की अनुभूति होनी चाहिए।

क्षमा -  इसका भी प्रायः गलत अर्थ लगाया जाता है। अपने प्रति किए गए अपराध को इस प्रकार भूल जाना जैसे वह हुआ ही नहीं हो, क्षमा है। उसी प्रकार राष्ट्र, समाज के प्रति किए गए अपराध क्षम्य नहीं हैं। क्षमा योग्य कृत्य ही क्षम्य हैं, अन्यथा दंडनीय ही हैं।

          अपने स्वाध्याय से इस सभी तथा अन्य संपदाओं पर गंभीरता से निरंतर मनन कीजिये। इनके अर्थ बदल जाएंगे, क्या करना है और क्या नहीं, इसकी समझ आने लगेगी। आपकी ये संपदाएँ आभूषण के रूप में, अलंकार के रूप में लोगों को दिखने लगेंगे। आप जितनी गहराई में जाएंगे इसके तल को नहीं पाएंगे, उसकी गहराई निरंतर बढ़ती जाएगी।

          यह भी सत्य है कि अगर हम किसी भी एक सम्पदा को पकड़ लें और यह निश्चय कर लें कि हर अवस्था में, मैं इसका त्याग नहीं करूंगा, इस पथ पर दृड़ता पूर्वक चलूँगा, तब एक-एक कर बाकी सम्पदा भी स्वतः प्राप्त होने लगती है।

किसी एक सम्पदा को ही अपनाइये और उसे दृड़ता पूर्वक पकड़ कर रखिए, और देखिये कैसे

जीवन बदल गया, लोग बदल गये, दुनिया बदल गई,

सुख, शांति, आनंद का साम्राज्य हो गया।

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सोमवार, 1 मई 2023

सूतांजली मई 2023

 

परमात्मा को चाहा नहीं जा सकता ।

जब कोई चाह नहीं होती,

तब जो शेष रह जाता है,

वह परमात्मा है।

                                                                           ओशो

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धर्मसंस्थापनार्थाय                                                      मेरे विचार

                   

गीता के चौथे अध्याय के दो श्लोक अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन श्लोकों में श्रीकृष्ण यह घोषणा करते हैं कि वे कब और क्यों पृथ्वी पर प्रकट होते हैं :

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।७||
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।८||

हे भरतवंशी अर्जुन! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ। साधुजनों (भक्तों) की रक्षा करने के लिए, पापकर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की भली भाँति स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ।

          इस श्लोक में “धर्मसंस्थापनार्थाय” शब्द और इसमें भी धर्म शब्द अनेक महत्व का है। क्या अर्थ है धर्म का? जब श्री कृष्ण धर्म की रक्षा की, स्थापना की बात कर रहे हैं, वे किस धर्म की बात कर रहे हैं? हिन्दू धर्म की? सनातन धर्म की? क्या हमारे श्री कृष्ण और हमारी गीता इतनी संकीर्ण है जिसमें धर्म का अर्थ सनातन धर्मतक ही सीमित है? सबसे पहली बात तो यह कि हम भली भाँति जानते हैं कि धर्म का अर्थ पंथ या मत नहीं है। धर्म वह नहीं है जिसका प्रायः अँग्रेजी में रिलीजन अनुवाद कर दिया जाता है। धर्म इनसे सबसे अलग है, इन सबसे कहीं बेहद ऊंचाई पर है। तब क्या है धर्म?

          वैसे तो महात्माओं, विद्वानों, टीकाकारों, साधुओं ने अपने-अपने ढंग से इसका अर्थ समझाया है, इसकी व्याख्या की है, लेकिन अगर हम इसे एक साधारण मानव के लिए सीधे-सादे शब्दों में कहना या समझना चाहें तो कह सकते हैं – “धर्म वह है जो हमें आंतरिक सुख, शांति और आनंद प्रदान करता है। वे सब सद्गुण जो हम दूसरों में देखना चाहते हैं उनका निचोड़ धर्म है।” एक इंटरव्यू के दौरान जमशेदजी टाटा को कहा गया कि भविष्य में भारत एक वृहद आर्थिक रूप से शक्तिशाली देश के रूप में उभरेगा। जमशेदजी ने बीच में टोकते हुए कहा कि भारत को आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनाने में उनका कोई प्रयोजन नहीं है वे तो यह चाहते  हैं कि भारत एक सुखी देश के रूप में उभरे। सब कुछ रहे लेकिन सुख-शांति न रहे तब सब कुछ निष्प्रयोजन ही है। धर्म वह है जिससे हर प्रकार के लौकिक सुविधा के साथ-साथ आंतरिक सुख और शांति की प्राप्ति होती है।

          हमें सम्पूर्ण बाह्य जगत में एक लय, एक तारतम्य दिखाई पड़ता है और इसीलिए हम सब काम कर पाते हैं। हम वैज्ञानिक प्रगति की बात करते हैं, लेकिन उसकी उन्नति केवल इसलिए हो रही है क्योंकि प्रकृति के सब नियम सुचरू रूप से चल रहे हैं। अगर एक व्यक्ति, परिवार, समाज में सब कुछ सुचारु रूप से चल रहा है तब इसका अर्थ यही है कि सब अपना-अपना कार्य कर रहे हैं। जिसके कारण यह लय, यह तारतम्य बना रहता है। सम्पूर्ण सृष्टि में, समाज में, सुख शांति बनी रहती है, वही धर्म का अभ्युदय है।  इसके विपरीत, यानी इस तारतम्य का बिगड़ना, जोड़ने के बजाय टूटना, निर्माण के बजाय विध्वंस का होना, मतलब अधर्म हो गया।

          वह क्या है जो सब को जोड़ कर रखती है? यह देखने लायक बात है कि इस लय को तोड़ने वाला आदमी ही होता है। पशु-पक्षी, पेड़-पौधे-वनस्पति, प्रकृति तो बराबर अपने नियम के अनुसार चल रहे हैं। बल्कि यह तो मनुष्य ही है जो उनके तारतम्य को छिन्न-भिन्न करता है और इसके कारण आने वाली आपदा को भी उसे ही भोगना पड़ता है। लेकिन इतना कह-सुन लेने के बाद बात वहीं-की-वहीं रह गई। धर्म की बहुत बड़ी-बड़ी व्याख्याएँ हैं, लेकिन सरल शब्दों में जिसे आम आदमी समझ सके और उसके अनुसार धर्म मार्ग पर चल सके, ऐसी भी कोई व्याख्या है? परिभाषा है? हाँ है, क्यों नहीं है वे सभी सद्गुण जिन्हें आदमी दूसरों में देखना चाहता है, अगर उन सभी सद्गुणों को मिला दिया जाए तो वही धर्म है। दिक्कत यह है कि ये सद्गुण हम दूसरों में देखना चाहते हैं, खुद अपनाना नहीं चाहते। कैसे सद्गुण? जैसे :

सत्यनिष्ठ                   धार्मिक                     निष्ठावान                  ईमानदार                 

विनम्र                      उदार                       प्रेमी                         मिलनसार      

क्षमाशील                  अहिंसक                    ज्ञानी                       कृतज्ञ

निष्कपट                   आनंदित                   कर्तव्यनिष्ठ                 सेवा भाव       

शांतचित्त                  दयावान                   अ-परिग्रही                धैर्यशील         

सौम्य            

 

          ये सब और ऐसी सब चीजों की एक तालिका बनाई जाए तो जो तैयार होगी वह होगी जीवन मूल्य और गुण (वैल्यूज अँड वर्च्युज ऑफ लाइफ) की पूरी तालिका और यही है धर्म, जहाँ सब के लिए सत्य है, प्रेम है, दया है, शांति है, सुख है। अगर मानव इसके अनुरूप चले तो उन्नति है, नहीं तो अवनति है। ऐसे मानव हैं तब धर्म की स्थापना है।

          ऐसा नहीं है की ईश्वर का प्राकट्य समय-समय पर ही होता है। जब भी पृथ्वी पर, समाज में, परिवार में और अपने अंदर इन सद्गुणों का प्रभाव बढ़ रहा हो और दुर्गुणों का अभाव हो रहा हो तब  समझ लेना चाहिए कि ईश्वर का अवतार हो रहा है। जब-जब अवतार हो रहा हो उसकी आराधना कीजिये, गुणगान कीजिये, स्तुति कीजिये। उस क्षण का भरपूर आनंद लीजिये और उसका बार-बार आह्वान कीजिये। ईश्वरीय अवतार का अनुभव कीजिये। धर्म की स्थापना कीजिये।

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पेड़ की आत्मा                                                           मैंने पढ़ा

 

          कविवर रवीन्द्र द्वारा स्थापित शांतिनिकेतन का परिसर। महान भारतीय कलाकार नंदलाल बोस उद्यान में बैठे अपने छात्रों और उनकी चित्रकला की देखरेख कर रहे थे। उनमें से एक, एक बड़े पेड़ के सामने बैठा था और उसे रंगने की कोशिश कर रहा था। नंदलाल उनके पास जाते हैं और पूछते हैं, "कनाई, क्या तुमने पेड़ देखा है"। इस प्रश्न से परेशान और नाराज, कनाई कहते हैं, "सर, मैं अंधा नहीं हूं"।

          नंदलाल कहते हैं, "बेशक भौतिक रूप से तुम अंधे नहीं हो, लेकिन क्या तुम भीतर जागे हुए हो? क्या तुमने पेड़ की आत्मा को देखा है"। कुछ मिनटों के मौन के बाद, अपने गुरु के अर्थ, शब्द छात्र के दिमाग में छा गए और कनाई कहता है "नहीं सर"। नंदलाल ने धीरे से कनाई के कंधों पर हाथ रखा और कहा:

"पेड़ को रंगने से पहले, न केवल अपने शरीर की आँखों से, बल्कि अपने हृदय की आँखों से, न केवल पेड़ के बाहरी रूप को बल्कि पेड़ को जीवित करने वाली जीवित आत्मा को भी देखो। इसे एक जीव  के रूप में, एक आत्मा के रूप में देखो  जैसे मैं और तुम। इसे सूर्योदय से पहले देखो, इसे देखो जब सूरज उगता है और पेड़ पर अपनी सुनहरी किरणें डालता है, दोपहर में इसे सूर्य की तेज रोशनी में देखो, इसे शाम के गोधूलि में देखो, रात के अँधेरे में चाँद की कोमल रोशनी में देखो, बारिश, हवा और तूफान में देखो। देखो, देखो और देखो और एक दिन पेड़ की आत्मा तुम्हारे पास आएगी और कहेगी "मैं यहाँ हूँ" और फिर चित्र बनाओ, तुम्हारी कला जीवंत और भावपूर्ण होगी"।

यह भारतीय कला की विशेषता है। ग्रीक कला में, यदि आप वेनस देखते हैं, तो सब कुछ सही है, नाक एकदम सही है, आँखें समान दूरी पर हैं। लेकिन भारतीय छवियों में, गणेश को देखें - बड़ा पेट, लंबे दांत, झूलता सूंड, क्या भारतीय इससे अधिक सुंदर रूपों के बारे में नहीं सोच सकते? क्यों? क्यों नहीं? क्योंकि अगर रूप अपने आप में सुंदर है, तो आपकी दृष्टि वहीं रुक जाती है। भगवान का रूप कुछ और इंगित करने वाला द्वार है; रूप के पीछे किसी चीज का प्रतीक है यह। इस रूप का उद्देश्य आपका ध्यान आकर्षित करना नहीं है, आपके ध्यान को वहीं रोकना नहीं है। आत्मा महत्वपूर्ण है, उपस्थिति महत्वपूर्ण है।

       रूप या प्रतीक में सुंदरता भी हो सकती है, लेकिन उसका उद्देश्य उसके पीछे छिपे अर्थ को उजागर करना है। दृष्टि उस छिपे अर्थ पर पड़नी चाहिए। आंखों को उस अर्थ को समझने का अभ्यास होना चाहिए।

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साक्षी भाव                                                लघु कहानी - जो सिखाती है जीना

 

एक बूढ़ा किसान था, जो वर्षों से खेती कर रहा था। एक दिन उसका घोड़ा भाग गया। यह खबर सुनकर पड़ोसी किसान के पास पहुंचे और सहानुभूति पूर्वक बोलने लगे, “यह बहुत बुरा हुआ”। किसान ने कहा, “शायद ऐसा हुआ हो”। अगले दिन उसका घोड़ा वापस आ गया, उसके साथ और  तीन जंगली घोड़े थे। पड़ोसी फिर आए और कहने लगे यह तो बहुत आश्चर्यजनक है। किसान ने फिर कहा, शायद हो सकता है, ऐसा ही हुआ हो। उसी दिन किसान के बेटे ने उनमें से एक घोड़े पर सवारी करने की कोशिश की, लेकिन घोड़े ने उसे गिरा दिया और उसकी एक टांग टूट गई। पड़ोसी फिर जमा हो गए और कहने लगे की यह तो बहुत बुरा हुआ। बूढ़े किसान ने फिर वही बात दोहरा दी, शायद ऐसा ही हो सकता है। उसी दिन सेना के अधिकारी गाँव में किसान के बेटे को जबरन सेना में भर्ती करने आ धमके। लेकिन किसान के बेटे की टूटी टांग देख कर वापस चले गए। पड़ोसी फिर आए और बोले कि आखिर सब अच्छा ही हुआ। किसान ने फिर वही बात दोहरा दी, शायद ऐसा ही हो सकता है

कहने का तात्पर्य यह कि हमें अपने साथ होने वाली अच्छी या बुरी घटनाओं को बहुत उत्साह या बहुत दु:ख से देखने के बजाय एक तटस्थ नजरिये से देखना चाहिए। हम इसे साक्षी भाव भी कह सकते हैं। अगर हमारे पास साक्षी भाव है तो हमारी मानसिकता और मन दोनों को कोई उद्वेलित नहीं कर सकता। हम शांत-चित्त रह सकते हैं।

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