रविवार, 1 अक्टूबर 2023

सूतांजली अक्तूबर 2023



खुद को अच्छा बना लीजिये
,

दुनिया से एक बुरा आदमी

कम हो जायेगा

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अर्चना और याचना

 आपने अपने परिवार के बड़े-बुजुर्गों को देखा होगा कि वे किसी भी मंदिर में दर्शन के बाद बाहर सीढ़ी पर, चौकी पर या आँगन में थोड़ी देर बैठते थे या बैठने के लिए कहते थे! क्यों?

          आजकल तो लोग मंदिर की पैड़ी (सीढ़ी) पर-आँगन में बैठकर अपने घर की, व्यापार की, राजनीति की चर्चा करते हैं। परंतु यह प्राचीन परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई। वास्तव में मंदिर की सीढ़ी पर बैठ कर के हमें एक श्लोक बोलना चाहिए। यह श्लोक है :

अनायासेन मरणम, बिना देन्थेन जीवनम् ।

देहान्त तब सानिध्यम्, देहि मे परमेश्वरम्।।

यानी, “बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो और हम कभी भी बीमार होकर बिस्तर पर पड़े-पड़े मृत्यु को प्राप्त न हों, चलते-फिरते ही हमारे प्राण निकलें। जब भी मृत्यु हो तब भगवान के सम्मुख हो, उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले। हे परम, परमेश्वर ऐसा वरदान हमें देना।”

परवशता का जीवन, यानी हमें कभी किसी के सहारे न रहना पड़े। जैसे कि लकवा हो जाने पर व्यक्ति दूसरे पर आश्रित हो जाता है, वैसे परवश या बेबस ना हों, ठाकुर जी की कृपा से बिना भीख के ही जीवन बसर हो सके, दूसरे की सहायता न लेनी पड़े। जैसे भीष्म पितामह की मृत्यु के समय स्वयं ठाकुर जी उनके सम्मुख आकर खड़े हो गए, वैसे ही उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले।

          सबसे बड़ा दुःख परवशता है, और इसकी कामना करनी पड़ती है, ठाकुर से इसके लिए गुहार करनी पड़ती है। संपत्ति, संतान, जीवन साथी, धन, ऐश्वर्य आदि मांगने की जरूरत नहीं है। ये तो सांसारिक लोगों से भी प्राप्त हो सकते हैं। लेकिन  जन्म और मृत्यु ही ऐसे हैं जिन पर हमारा कोई वश नहीं है। कब, कहाँ, कैसे  हमारा जन्म होगा, कोई नहीं जानता। वैसे ही कब, कहाँ और कैसे हमारी मृत्यु होगी कोई नहीं जानता। यह तो भगवान हमारी पात्रता के हिसाब से खुद हमको देते हैं। इसलिये  दर्शन करने के बाद बैठकर यही प्रार्थना करनी चाहिए। यह प्रार्थना है, याचना नहीं है। याचना सांसारिक पदार्थों के लिए होती है। घर, व्यापार, नौकरी, पुत्र, पुत्री, सांसारिक सुख, धन या अन्य बातों के लिए जो मांग की जाती है, वह याचना होती है। इनकी याचना हम ईश्वर के अलावा सांसारिक लोगों से भी करते हैं।

          हम प्रार्थना करते हैं, प्रार्थना का विशेष अर्थ होता है, अर्थात विशिष्ट, श्रेष्ठ, उनके अलावा और कोई हमें यह प्रदान नहीं कर सकता। । अर्चना अर्थात निवेदन।  ठाकुर जी से प्रार्थना करें और प्रार्थना क्या करना है, इस श्लोक का पाठ करना है।

          जब हम मंदिर में दर्शन करने जाते हैं तो खुली आंखों से भगवान को देखना चाहिए, निहारना चाहिए। उनके दर्शन करने चाहिये। आंखें बंद क्यों करना? हम तो दर्शन करने आए हैं। भगवान के स्वरूप का, श्री चरणों का, मुखारविंद का, श्रृंगार का संपूर्णानंद लें। आंखों में भर ले स्वरूप को, दर्शन करें और दर्शन के बाद जब बाहर आकर बैठे तब नेत्र बंद करके जो दर्शन किए हैं उस स्वरूप का ध्यान करें। और अगर ठाकुर जी का स्वरूप ध्यान में नहीं आए तो दोबारा मंदिर में जाएं और भगवान का दर्शन करें और उनके स्वरूप को हृदयंगम कर लें।  नेत्रों को बंद करने के पश्चात, उनका ध्यान करके उपरोक्त श्लोक का पाठ करें।

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गाँधी और गीता                                                 गांधी जयंती पर विशेष

गाँधी के 150वें जन्म वर्ष में मैंने अपने शहर के अनेक विद्यालयों में “कौन जानता गाँधी को?  शीर्षक से प्रश्नोत्तरी (क्विज) का आयोजन किया था। इस दौरान गाँधी को जानने-समझने वाले कई विद्वानों तथा गाँधी संस्थाओं से परिचय हुआ। गाँधी पर बहुत पढ़ना भी पड़ा, इस कारण गाँधी को भी जानने-समझने का अवसर मिला। इसका एक प्रभाव यह भी हुआ कि बहुत से लोग यह मनाने लगे कि मैं “गांधीवादी” हूँ। अब क्या कहूँ? “गाँधीवाद” जैसा न कोई वाद है और न संप्रदाय। गाँधी  ने खुद यह घोषणा की थी कि मेरे नाम से न कोई वाद है और न होगा। मेरी अपनी कोई बात नहीं है, मैं जो कुछ भी कहता हूँ, लिखता हूँ, वह दुनिया के हर कोने के धर्मगुरु, धर्मग्रंथ, विद्वान, चिंतक, लेखक, नेता  की ही बातें हैं, मेरी अपनी नहीं। अब तब फिर कहाँ से यह “गाँधीवाद” पैदा हो गया? लेकिन हाँ, यह सही है कि मैं गाँधी को मानता, उनके प्रति मेरी श्रद्धा है।

          इस कारण जब भी, किसी को भी, गाँधी के विरोध में, उनके पास जितनी भी और जैसी भी जानकारी होती है, सोशल मीडिया में मिलती है, मेसेज में आता है सब मुझे भेज देते हैं, मुझे बताते हैं और उसकी मुझसे चर्चा करते हैं। मैं उसका जवाब नहीं देता। मेरा मौन उन्हें बेचैन कर देता है। वे पूछते हैं, “तुम कुछ कह नहीं रहे हो, तो क्या तुम मानते हो यह सही है?”

“क्यों आपको क्या लगता है, मैं आपकी बात स्वीकार कर रहा हूँ?,” मैं प्रतिप्रश्न करता हूँ।

वे कहते हैं, “नहीं मुझे तो ऐसा नहीं लगता।

“मैं अगर कोई जवाब दूँ तो क्या आप मेरी बात मान लेंगे?, अब मैं प्रश्न करता हूँ।

“....”। उनसे न हाँ कहते बनता है न ना।

मुझे पता है कि वे मुझसे न जानना चाहते हैं न समझना। वे विचार विमर्श नहीं करना चाहते, न ही ज्ञान चर्चा, उनका उद्देश्य केवल या तो मुझे क्षुब्द करना है या मेरे विचारों को बदलना और अपनी बात को मनवाना।

अतः मैं कहता हूँ, “अब अगर हम जानते हैं कि इस मुद्दे पर हम एक दूसरे से सहमत नहीं होंगे तो क्यों इस पर बहस कर आपसी सम्बन्धों में कटुता पैदा करें? लेकिन अब तुमने विषय छेड़ दिया है तो यह जरूर कहूँगा कि अगर तुम्हारे लिए संभव हो तो व्हाट्सएप्प और सोशल मीडिया को छोड़ कर भी गाँधी को पढ़ो, जानो, समझो फिर बात करेंगे।” मेरे इस सुझाव से वे सहमत तो नहीं होते। उनके पास न पढ़ने का समय होता है न ही धैर्य, वे तो बस चलते-फिरते व्हाट्स एप को ही वैश्विक ज्ञान की खान मानते हैं। लेकिन बेबुनियाद बहस समाप्त हो जाती है।

दूसरों की कही बातों को सही न मानकर हमें खुद ही इसका विश्लेषण करना होगा, समझना होगा, गहराई तक जाना होगा तब ही गांधी को समझ पाएंगे। अभी कल की ही बात है, मैं अपने एक जीवन के मार्गदर्शक के पास बैठा था। मैं उनका आदर भी करता हूँ, और उनकी बातों को गंभीरता से भी लेता हूँ। मुझे यह भी पता है कि वे गाँधी के विरोधी नहीं हैं लेकिन उन्हें स्वीकार भी नहीं करते। उन्होंने बताया कि वे गीता के बारे में जानते हैं लेकिन कभी उसे पढ़ा नहीं  है। (दुर्भाग्य से ऐसे अनेक लोग मिलेंगे जिन्होंने गीता न पढ़ी, न समझी, न सुनी लेकिन पंडितों की तरह गीता पर बहस करेंगे।) लेकिन उनकी सुपुत्री, जो अमेरिका में डॉक्टर है, गीता पढ़ रही है और उससे बहुत प्रभावित है। उसने अपने पति को गीता का भाष्य दिया है और वे उसे पढ़ रहे हैं। उन्हें अच्छा लग रहा है। उससे प्रभावित हैं। मेरे लिए यह एक सुखद और आश्चर्यजनक खबर थी, क्योंकि वे अपने विचारों के बड़े कट्टर हैं। फिर उन्होंने कहा-

          “गाँधी ने कहा है कि साधन का भी उतना ही महत्व है जितना साध्य का। अगर साधन सही न हो तो साध्य कहीं-न-कहीं जाकर दूषित हो जाता है। लेकिन गीता के दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि साध्य हासिल करने के लिए साधन की चिंता न कर, उठो खड़े हो जाओ, इन शत्रुओं का संहार करो। इस प्रकार वे साध्य को ही महत्व दे रहे हैं, साधन को नहीं।” 

          मेरे लिए बड़ी विषम परिस्थिति हो गई।  यह बात तो समझ आ गई थी कि वे गीता अभी पढ़ना शुरू किए हैं और तो और दूसरे अध्याय तक ही पहुंचे हैं। गीता और उसके संदर्भ में गांधी पर टिप्पणी कर रहे हैं जिन्होंने  जीवन भर गीता पढ़ी, गुनी और साधी। बहस करना भी उचित नहीं लगा और न ही मौन रहना। मैंने संक्षेप में इतना ही कहा कि गाँधी और गीता जिस ऊंचाई पर हैं, गाँधी की जितनी साधना है, गाँधी का जितना अनुभव है उसकी तुलना में मैं कहीं नहीं हूँ, गीता जितनी सरल है उतनी ही कठिन भी, अपनी जिंदगी में मैं उसे पूरा समझ ही नहीं पाऊँगा, अतः उस पर भी किसी प्रकार की टिप्पणी करने  का दुःसाहस मैं नहीं कर सकता। सौभाग्य से उन्होंने भी बात को घुमा दिया।

          बात को सुलझते हुए देख मैंने भी दो प्रसंग और जोड़ दिये। मशीन के बहिष्कार को लेकर विश्व के अनेक लोग गाँधी से नाराज, मर्माहित और दुःखी थे। प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता और निर्माता चार्ली चैपलीन, जो गाँधी के बड़े हिमायती थे, वे भी बड़े दुःखी हुए। मौका मिलते ही वे गाँधी से मिले और मशीन के बहिष्कार के मुद्दे पर उनसे चर्चा की। एक लम्बी चर्चा के बाद वे वहाँ से पूर्ण तरह गांधी के विचारों से सहमत हो कर निकले और उसके बाद अपनी प्रसिद्ध फिल्म द डिक्टेटर का निर्माण किया। अतः अब आज, जब गाँधी नहीं है तब उनके दृष्टिकोण की व्याख्या कौन करेगा? हम अगर उतनी ऊंचाई पर पहुंचे तथा उनकी जैसी दूरबीनी-दृष्टिकोण हो तभी समझ सकते हैं। अन्यथा उस पर टिप्पणी न कर अपनी अज्ञानता कबूल करना ही उचित है।

         गाँधी ने एक और बात कही थी। 100 में से 99 रास्ते अहिंसा के हैं एक आखिरी रास्ता हिंसा का है... लेकिन वो आखिरी है... और दुनिया के 99 मसले पहले 99 रास्तों से हल हो सकते हैं... कुरुक्षेत्र में युद्ध का शंख फूंकने के पहले श्रीकृष्ण ने अहिंसा से सुलह कराने के अनेक प्रयत्न किए। लेकिन हर प्रयत्न के असफल हो जाने के बाद ही युद्ध का निर्णय लिया गया। और जब यह निर्णय ले लिया गया, शंख फूँक दिये गए, उसके बाद पीछे हटना कायरता ही है। राम ने भी,  युद्ध का डंका फूंकने के पहले बिना युद्ध के मार्ग खोजने का प्रयत्न किया। लेकिन मार्ग न मिलने पर ही हिंसा का मार्ग अपनाया। गाँधी ने भी बार-बार यही कहा है कि अहिंसा कायरों का नहीं बहादुरों का हथियार है।

          गीता भी, जैसे-जैसे हम एक-के-बाद-एक अध्याय के पन्ने पलटते हैं, कई बार भ्रम पैदा करती है कि श्रीकृष्ण तो विरोधी बात कह रहे हैं। लेकिन विश्लेषण करने पर समझ आती है कि नहीं वे विरोधी बातें नहीं कर रहे हैं बल्कि दोनों मार्ग बता कर उनके दोष-गुण की चर्चा कर रहे हैं, सुगम और दुर्गम मार्ग की चर्चा कर रहे हैं। हर इंसान, दूसरे इंसान से अलग है। हर किसी को अपनी प्रकृति और प्रवृत्ति के अनुसार मार्ग का चयन करना चाहिए।  वह खुद अपना मित्र भी है और खुद ही अपना दुश्मन भी। गुरु मार्ग दिखा सकता है लेकिन चलना तो उसे खुद ही पड़ेगा।

          कैसी भी टिप्पणी करने के पहले खुद अपना विश्लेषण करना चाहिए। बिना समुचित अध्ययन और स्वाध्याय के टिप्पणी करना शोभा नहीं देता है।

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भाव और दृढ़ विश्वास                                     संस्मरण जो सिखाती है जीना

रामदासजी जब प्रार्थना करते थे तो कभी उनके होठ नहीं हिलते थे।

शिष्यों ने पूछा- हम प्रार्थना करते हैं तो होंठ हिलते हैं, आपके होंठ नहीं हिलते! आप पत्थर की मूर्ति की तरह खड़े हो जाते हैं। आप कहते क्या हैं अन्दर से? क्योंकि अगर आप अन्दर से भी कुछ कहेंगे तो होठों पर थोड़ा कंपन आ ही जाता है। चेहरे पर बोलने का भाव आ जाता है। लेकिन आपके चेहरे पर वह भाव भी नहीं आता

यह सुनकर सन्त रामदास जी ने कहा –

मैं एक बार राजधानी से गुजराराजमहल के सामने द्वार पर मैंने सम्राट को खड़े देखा और वहाँ एक भिखारी को भी देखा। वह भिखारी बस खड़ा था। फटे कपड़े थे उसके शरीर पर। जीर्ण-जर्जर देह थी, जैसे बहुत दिनों से भोजन न मिला हो, शरीर सूख कर कांटा हो गया। बस आँखें ही दीयों की तरह जगमगा रही थीं। बाकी जीवन जैसे सब तरफ से विलीन हो गया हो। वह कैसे खड़ा था यह भी आश्चर्य था? लगता था अब गिरा-तब गिरा ! सम्राट उससे बोले – बोलो क्या चाहते हो?

उस भिखारी ने कहा अगर आपके द्वार पर खड़े होने से मेरी मांग का पता नहीं चलता, तो कहने की कोई जरूरत नहीं। क्या कहना है? और मैं द्वार पर खड़ा हूँ, मुझे देख लो, मेरा होना ही मेरी प्रार्थना है।"

सन्त रामदास जी ने कहा - उसी दिन से मैंने प्रार्थना बंद कर दी। मैं परमात्मा के द्वार पर खड़ा हूँ।  वह देख लेंगे। मैं क्या कहूँ?

अगर मेरी स्थिति कुछ नहीं कह सकती, तो मेरे शब्द क्या कह सकेंगे अगर वह मेरी स्थिति नहीं समझ सकते तो मेरे शब्दों को क्या समझेंगे?

अतः भाव व दृड विश्वास ही सच्ची परमात्मा की याद के लक्षण है। यहाँ कुछ मांगना शेष नहीं रहता। आपका प्रार्थना में होना ही पर्याप्त है।

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शुक्रवार, 1 सितंबर 2023

सूतांजली सितंबर 2023

इंद्रियों से प्राप्त होने वाले सुख क्षणिक होते हैं,

अत: प्रतीत तो सुख होते हैं,

लेकिन दुख का कारण होते हैं।

सुख उसे कहते हैं, जिसमें दुख समाप्त हो जाता है।

स्वामी तेजोमयानंद

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दु:ख...?  

(दुख क्या है? जब तक हम यह नहीं पूछते, उत्तर जानते हैं, लेकिन जब पूछते हैं तब उत्तर नहीं जानते हैं। यह, वीणा के तारों की तरह, इतना न कसो कि टूट जाए, इतना  ढीला न छोड़ दो कि बज ही न पाए, जैसा मार्ग है। दुख क्या है, यह पूछते ही हम दुख से मुक्ति के उपाय खोजने लगते हैं। विद्वानों ने अनंत काल से कालानुसार अपने-अपने ढंग से इसे प्रतिपादित किया, इसके अनेक उत्तर दिये और अनुत्तरित भी छोड़ दिये। डॉ. देव  ने इनके उत्तरों को अनंत के गर्भ में से निकालने का प्रयास किया, लेकिन क्या ढूंढ पाये? अहा! जिंदगी ने उनके प्रयास को  हम तक पहुंचाया। इसके अंश।)

...मैं दुख का अनुभव अवश्य करता हूँ, समय अधिकांश दुख में ही कटते हैं, लेकिन मैं इसकी कोई परिभाषा नहीं कर सकता। हर किसी की अपनी परिभाषा है। कुछ लोग जो चाहते हैं कि उन्हें परम-बुद्धिमान दार्शनिक या मानव-मन का अध्येता मान लिया जाये, तो वे अवश्य दूसरों के लिये  दुख की परिभाषा अपनी उलझी हुई शब्दावली में करते हैं और उसे श्रवण या प्रकाशित होते देखने के लिये तरह-तरह के ओछे प्रयास भी करते हैं।

...मठों में तो दुख दूर करने का ही कारोबार है। ... हम लोग कभी नहीं पूछते कि दुख क्या है? दुख के संदर्भ में हमेशा हमारा सवाल क्यों और कैसे की शैली में पूछा जाता है और कुछ लोग दुख दूर करने वाले बाजार सजा लेते हैं। कुछ लोग तो केवल दुख दूर करने का उपाय बताते हैं, कुछ तो उपाय कर भी देते हैं। कहने का मतलब कुछ गुरु, गुरु ही रहते हैं, कुछ गुरु ईश्वर के समकक्ष हो जाते हैं। गुरुओं के प्रारूप देश, काल और परिस्थिति के अनुसार बनते हैं। अगर मुझे पता चल जाये कि दुख क्या है तो मैं दुख से मुक्त हो जाऊंगा। हम जिसे जान लेते हैं, उससे मुक्त हो जाते हैं।

... दुख के बारे में उपनिषद कोई साफ बात नहीं कहते, लेकिन दुख क्या है, इसका उत्तर वे देते हैं। वे कहते हैं, अज्ञान ही पाप है। ... पाप से दुख उत्पन्न होता है। आंतरिक जगत में भी और समाज में भी। ऋग्वेद उनके पहले ही कह गया है, पापी नरक-स्थान को उत्पन्न करता है। ... कुल मिलकर अज्ञान ही दुख है। तो फिर, अज्ञान क्या है? अपने को न जानना ही अज्ञान है। अपने को जानते ही मनुष्य दुख से तो मुक्त हो ही जाता है। सुख-दुख से परे अनंत आनंद में भी निवास करने लगता है। दुख को जानना दुख के मूल कारण को जानना है। ...उपनिषदों की दुख की परिभाषा गढ़ने में कोई रुचि नहीं है। उपनिषद कभी हमें खुल कर नहीं बताते कि दुख क्या है? वे केवल आनंद को जानते हैं। वे मनुष्य को मूलतः अनंत आनंद के बारे में बताते हैं। कहा जाये कि वे जीवन मात्र को अनंत आनंद घोषित करते हैं। और श्रावण-मनन-निदिध्यासन की तकनीक से उस अक्षय, अमर, अनंत आनंद में निवास करने की कला सिखाते हैं।...

...उपनिषदों के ऋषि गृहस्थ हैं। वे ब्रह्मचर्य आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने, गृहस्थ आश्रम में परिवार के प्रति कर्तव्य पूरा करने, वानप्रस्थ में समाज सेवा करने और संन्यास में प्रकृति सहित समूचे संसार को समर्पित होने के क्रम को अनिवार्य मानते हैं।... वे संसार का त्याग करना नहीं सिखाते। संसार से जुड़ते हुए वे काल से मुक्त होने की कला में माहिर थे और यही कला सिखाने को कटिबद्ध भी हैं। वे संसार को माया या तृष्णा नहीं मानते। वे नहीं मानते कि हम मायाजाल में फंसे हैं या तृष्णा में पड़कर अनंत बार जन्म-मरण को बाध्य होते हैं। वे अविद्या की बात अवश्य करते हैं। अविद्या के चलते ही हम दुख में होते हैं। विद्या हमें मुक्त करती है। वे जीवन को दुख नहीं मानते, जीवन को आदि-मध्य और अनंत में केवल आनंद ही मानते हैं। वे अनुभववादी हैं।...

          आधुनिक मनुष्य और उपनिषदों के बीच सदियों की पथरीली दीवार खड़ी है। ... उपनिषदों की भाषा हमारी समझ के बाहर हो गई है। तब पलखत पाकर अर्थात पलक झपकने भर का मौका पाकर  बुद्ध लगातार दिमाग के भीतर दस्तक देने लगते हैं। ... जब उन्होंने दुख को पहचाना, तो पाया कि जीवन दुख का ही पर्यायवाची है। ... जो है वह दुख ही है, दुख के अलावा और कुछ है ही नहीं। अस्तित्वमात्र ही दुख है। जीवन और दुख एक ही सत्ता के दो नाम हैं। भौतिक शरीर ग्रहण  करने के साथ अजन्मा, अजर-अमर-अमर्त्य आत्मा भौतिक शरीर में निवास करने लगेगी तो हम दुख से कैसे मुक्त हो पायेंगे। ये उपनिषद वाले तो अनंत जीवन की बात कर रहे हैं। अनंत जीवन केवल दुख के अलावा और कुछ हो ही नहीं सकता, क्योंकि जीवन मात्र दुख के और कुछ हो ही नहीं सकता, क्योंकि जीवन मात्र दुख ही है। जन्म लेना दुख है, रोग दुख है, जरा दुख है, मरण दुख है, प्रिय से विछोह दुख है, अप्रिय से मिलन दुख है, जीवन का हर क्षण दुख है, दुख ही है और कुछ भी नहीं है। वाकई दुख के बारे में बुद्ध से बड़ी अथॉरिटी और कोई नहीं है।...

          ... अर्जुन हमारी ही तरह विषादग्रस्त है, दुख की पराकाष्ठा का अनुभाव कर रहा है। मृत्यु उसे आकर्षक लगने लगी है। वह संन्यास लेने को तत्पर है। इससे निवृत्ति का एकमात्र मार्ग संन्यास ही है। ... अपने धर्म का पालन करो, अपने लिए नियत कर्म करो, लड़ो, उन्हें मारो, ये अधर्म के पक्ष में खड़े हैं’, कृष्ण डांटते हैं। गीता के प्रारम्भ में अर्जुन गाँडीव रख देता है, गीता के अंत में वह धनुष उठा लेता है। अतः गीता का एक ही उपदेश है - अपनी प्रकृति और नियति के अनुसार कर्म करो, कर्म में ही सारा ध्यान झोंक दो, फल के बारे में एक पल के लिए भी विचार मत करो, वह तो शुद्धतः तुम्हारे कर्म का परिणाम होगा। शत-प्रतिशत कर्म, शत-प्रतिशत फल। श्रम का रंच मात्र भी फल-विचार में गया कि फल में उतनी ही कमी रह जाएगी। लेकिन, कर्म हमेशा फल को लक्ष्य में रखकर ही किया जा सकता है। लक्ष्य में फल को रखे बिना हम  अपना स्वधर्म यानि स्वकर्म नियत कर ही नहीं सकते, कर्म क्या करेंगे? कर्म के लिए कृष्ण दो लक्ष्य सामने रखते हैं। आधुनिक मनुष्य को पहला लक्ष्य ईश्वर को सभी कर्मों का समर्पण समझ में नहीं आयेगा। वह अपनी ओर से ईश्वर को समर्पित करेगा, लेकिन उसके कर्म समाज का संचालन करने वाले स्वार्थी सत्ता-केन्द्रों को समर्पित हो जाएंगे। समाज में चारों तरफ बिखरे घड़ियाल उसके फल को गटक जाएंगे। आत्मशुद्धि वाला लक्ष्य भी तब तक समझ में नहीं आएग जब तक वह स्वयं को प्रेम करो जैसे सत्तापक्षीय सिद्धांतों की चपेट में है। 

... जीवन दुख नहीं है। जीवन माया नहीं है। जीवन मृत्यु की ओर बढ़ती नदी नहीं है। जीवन जीने के लायक नहीं है, हम ऐसा इसलिए सोचते हैं क्योंकि हम अविद्या से ग्रस्त हैं। जब हमें विद्या मिलती  है तो हम ब्रह्मांड से एकत्व का अनुभव करने लगते हैं और पाते हैं कि दुख सम्पूर्ण से कटे होने का प्रतिफल है। जीवन तो वस्तुतः आनंद है, अनंत आनंद...सत-चित-आनंद।

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इष्ट देवता – क्या , क्यों और क्या है महत्व

सबसे पहला प्रश्न तो यह है कि यह इष्ट देवता क्या है?

          मोटे तौर पर इष्ट देवता का अर्थ है एक भक्त द्वारा अपनी व्यक्तिगत दृष्टिकोण या भावनात्मक लगाव के अनुसार भक्ति, पूजा और आराधना के लिए चुने गए देवता का नाम और स्वरूप।

अब, इसके तुरंत बाद दूसरा प्रश्न जो हमारे दिमाग में आता है वह है कि इस इष्ट देवता की क्या उपयोगिता है?

          सही तौर पर विचार करें तो इसके भी पहले यह समझना ज्यादा आवश्यक है कि जब और किसी धर्म में किसी देवता की कल्पना नहीं है हमारे धर्म में देवता की कल्पना ही क्यों की गई है?

          इसका सीधा सा कारण है कि जहाँ मनुष्य के लिए अपने भीतर की किसी अनदेखी चीज़ पर विश्वास करना कठिन होता है, वहीं उसके लिए किसी ऐसी अनदेखी चीज़ पर विश्वास करना आसान होता है जिसे वह अपने से बाहर मानता है। अतः अपनी आध्यात्मिक प्रगति के लिए अधिकांश मनुष्य अपने से बाहर अपने विश्वास की किसी वस्तु की मांग करता है। उसे ईश्वर की एक बाहरी छवि या एक मानव प्रतिनिधि की आवश्यकता होती है  - वह अवतार या पैगंबर या गुरु  या दोनों की मांग करता है और उन्हें खोजता है। मानव आत्मा की आवश्यकता के अनुसार भगवान स्वयं को देवता, दिव्य मानव या सरल मानव के रूप में प्रकट करते हैं - इस स्थूल वेश में वे सफलता पूर्वक अपने ईश्वरत्व को छुपा कर ईश्वरत्व के मार्गदर्शन का हस्तांतरण करते हैं।

          हिन्दू का आध्यात्मिक शास्त्र, इष्ट देवता, अवतार और गुरु की धारणाओं द्वारा आत्मा की इस आवश्यकता को पूरा करता है। इष्ट देवता से, एक चुने हुए देवता का अर्थ कोई हीन शक्ति नहीं, बल्कि पारलौकिक और सार्वभौमिक देवत्व का एक नाम और रूप है। ईश्वर सर्व है और सर्व से बढ़कर है। लेकिन वह जो सबसे बढ़कर है, मनुष्य कैसे उसकी कल्पना करेगा, विचार करेगा, सोचेगा? सर्व में ऐसी चीजें हैं जो उसकी समझ के लिए बहुत कठिन है। सीधे तौर पर, वह ईश्वर के रूप में कल्पना नहीं कर सकता है, उस तक नहीं पहुंच सकता है या किसी ऐसी चीज को नहीं पहचान सकता है जो उसकी अज्ञानी या आंशिक धारणाओं के दायरे से बहुत बाहर है। उसके लिए यह आवश्यक है कि वह ईश्वर को अपनी छवि में या किसी ऐसे रूप में देखे जो स्वयं से परे हो लेकिन उसकी उच्चतम प्रवृत्तियों के अनुरूप हो और अपनी भावनाओं या अपनी बुद्धि द्वारा समझ सके और उसे मान सके। अन्यथा उसके लिए परमात्मा के संपर्क और साम्य में आना मुश्किल है।

          एक भारतीय ग्रंथ है, राम भक्त विजयम, जो तुलसीदास की एक पौराणिक जीवनी जैसी प्रतीत होती है। इस ग्रन्थ में तुलसीदास हनुमान से राम के दर्शन कराने का अनुरोध करते हैं। हनुमान कहते हैं, आप राम के दर्शन कैसे कर सकते हैं वे तो निराकार, सार्वभौमिक, सर्वव्यापी हैं, जो हर जगह और हर चीज़ में हैं और सबसे ऊपर हैं, अंतरिक्ष और समय से परे शाश्वत हैं।” तुलसीदास उत्तर देते हैं, “मैं उस परम पुरुष के दर्शन राम के रूप में करना चाहता हूं।” हिंदू धर्म में इष्ट देवता का यही अर्थ है, एक सीमित व्यक्तिगत देवता नहीं, बल्कि पारलौकिक और सार्वभौमिक दिव्यता का एक नाम और रूप।

          गुरु या अवतार भी इष्ट देवता हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में भक्त या शिष्य को अपने गुरु या अवतार को केवल मनुष्य के रूप में नहीं बल्कि स्वयं परमात्मा को मानव रूप में देखना होता है। एक प्रसिद्ध श्लोक है –

गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही शंकर है; गुरु ही साक्षात् परब्रह्म (परमगुरु) है;

उन सद्गुरु को प्रणाम।

          ईश्वर को तीन अवस्थाओं में मानते हैं: पारलौकिक, सार्वभौमिक और वैयक्तिक। राम, कृष्ण, क्राइस्ट और बुद्ध जैसे दिव्य अवतार पारलौकिक और सार्वभौमिक दिव्य के अवतार हैं। प्रत्येक मनुष्य उस वैयक्तिक को परमात्मा के अवतार के रूप में देख सकता है, जो एक दिव्य उद्देश्य के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुआ है। हममें से अधिकांश लोग इसके बारे में या अचेतन अवतार से अवगत नहीं हैं। जो लोग अपने भीतर परमात्मा के बारे में पूरी तरह से जागरूक हो गए हैं और उनके साथ एकजुट हो गए हैं, वे पृथ्वी पर रहने वाले देवता हैं।

          लेकिन यह सिद्धांत पूरी तरह से केवल आत्म-साक्षात्कार या ईश्वर-प्राप्त आत्माओं जैसे श्रीअरविंद, श्री रामकृष्ण या श्री रमण महर्षि आदि पर लागू होता है। लेकिन, ऐसे सैकड़ों गुरु हैं जिन्होंने ईश्वर को महसूस नहीं किया होगा, लेकिन चेतना के कुछ उच्च स्तरों या सामान्य मानव चेतना से परे एक उच्च शक्ति के साथ उनका कुछ आंतरिक संपर्क है, जो शिष्यों को आकर्षित करता है। ऐसे मामलों में भी, यदि शिष्य अपना ध्यान गुरु की ईश्वरीयता पर केंद्रित करता है, गुरु में मानव के दोषों को अनदेखा करता है, तब गुरु में अवस्थित ईश्वर उसे सही रास्ते का मार्गदर्शन करेगा भले ही गुरु में मानवीय खामियां हों। उदाहरण के लिए, एक प्राचीन भारतीय ग्रंथ शिष्य से कहता है, अपने गुरु की खामियों को मत देखो। उनमें से सत्य को लो, और बाकी को छोड़ दो।”

          यदि हमारे एक इष्ट देवता हैं, तो हमारी आंतरिक आकांक्षा को परम ईश्वर के संपर्क में आना होगा और बाहरी रूप के पीछे उनकी उपस्थिति को अनुभव करना होगा।

(दुर्भाग्य से पिछले कुछ समय में कुछ ऐसे गुरुओं की खामियां अपराध के दायरे तक पहुँच गई। जिसका परिणाम उन्हें तो भोगना हो पड़ा हमें भी उसकी तपन महसूस हुई।)

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मंगलवार, 1 अगस्त 2023

सूतांजली, अगस्त 2023



धन्यवाद

इस माह हम छह वर्ष पूर्ण कर सातवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं।

यह आपके स्नेह और सुझावों के कारण ही संभव  हो सका है।

आप से एक ही अनुरोध है, मेल,  ब्लॉग या  व्हाट्सएप्प पर संपर्क बनाए रखें और

अपने सुझावों से हमारा मार्गदर्शन करते रहें।

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गलतियों को मुद्दा बना कर टकराव को बढ़ाने के बजाय

गलतियों का अहसास करवाकर

स्वस्थ्य मिसाल कायम करना ही शुभ होता है।

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सुख की खोज में कोलंबस                                                       चिंतन

          पूरी दुनिया का चक्कर लगाने के बाद कोलंबस इसी नतीजे पर पहुंचा, “सुख पाने के लिए हमें कुछ और नहीं बस सही स्याही चाहिए”। नहीं समझे! जिस सुख को खोजने हम दर-दर भटकते हैं, उसे खोजने बड़ी यात्रा पर जाने की जरूरत नहीं है, वह हमारे इर्द-गिर्द ही है। आइए, समझने का प्रयत्न करते हैं, अलग-अलग माध्यम से। 

          कम्युनिस्ट दौर का एक पुराना किस्सा है। पूर्वी जर्मनी से एक आदमी को साइबेरिया भेजा गया। उसको मालूम था कि उसके पत्र-व्यवहार पर विरोधियों की नजरें रहेगी। इसलिए उसने अपने मित्रों से कहा कि क्यों न एक कोड बना लिया जाये। मैं अपनी चिट्ठी अगर नीली स्याही से लिखूं, तो समझना कि जो कुछ भी मैंने लिखा है, वह सब सच है और अगर काली स्याही से लिखूं, तो समझना कि मेरी लिखी हर बात झूठ है। कुछ समय बाद उसने अपने दोस्त को नीली स्याही से चिट्ठी लिखी, 'यहां हर चीज़ भव्य है। दुकानें, खाने-पीने की उम्दा चीजों से भरी हुईं हैं। सिनेमाहॉलों में बढ़िया फ़िल्में दिखाई जाती हैं। मकान बड़े-बड़े और शानदार हैं और उनमें रहने वाले लोग सहृदय हैं। यहां मुझे कोई असुविधा नहीं है, सिवाय इसके कि लाख चाहूं, तो भी लिखने के लिए काली स्याही नहीं ख़रीद सकता...'

          हमारा समय ऐसा ही है। हमारे पास सत्य, न्याय, नीति, नैतिकता और आदर्शवाद का ढेर है, पर उन्हें लिखने के लिए सही स्याही नहीं है, पढ़ने के लिए सही भाषा नहीं, समझने के लिए सही मस्तिष्क नहीं। अध्यात्म  हमें इस सही स्याही को जुटाने और जीवन की चिट्ठी को एक बार फिर से लिखने का अवसर देता है। देखना यह कि हममें से कितने इस ख़त को लिखने के लिए सही स्याही चुनते हैं, पढ़ने के लिए सही भाषा इस्तेमाल करते हैं और समझने के लिए सही मस्तिष्क रखते हैं।

          चेखव की एक कहानी है – “वार्ड नंबर सिक्स”। इस कहानी के दो प्रमुख पात्र हैं- रेगिन और ग्रोमोव। मेडीकल रिपोट्र्स के मुताबिक़ ग्रोमोव विक्षिप्त है, लेकिन उसकी बातें उसे बुद्धिमान साबित करती हैं। वह अन्याय, झूठ, पिछड़ेपन और आडंबर से घिरे जीवन को लेकर दुख और आक्रोश से भरा है। वह डॉ. रेगिन से कहता है कि देखो, हर ओर कैसी घुटन है। जो सक्षम हैं, वे निष्क्रिय और दुराग्रही हैं। जो कमज़ोर हैं, वे अज्ञान और पाश्विकता से भरे हैं। हम महज कंगाल हैं, क्योंकि भीड़ग्रस्त हैं। पतनशील हैं। नशे में, दिखावे में और झूठ में आवृत्त हैं। फिर भी घरों और सड़कों पर ख़ामोशी है। हजारों लोग हैं, पर इस सब के लिए कोई नहीं चीखता। लोग ख़रीदारी कर रहे हैं, खा रहे हैं, सो रहे हैं, मूर्खतापूर्ण बातें बना रहे हैं, ब्याह शादी रचा रहे हैं, बूढ़े हो रहे हैं। ख़ुद को लगातार क़ब्रों की ओर ढो रहे हैं, पर जीवन की तकलीफ़ों को नहीं सुन पा रहे...। तब रेगिन उससे कहता है कि अगर सुखी रहना चाहते हो, तो हर बुराई को नजरंदाज (इग्नोर) करो। अन्याय को भी और झूठ को भी, पाप को भी। लेकिन उसका यही दर्शन एक रोज ख़ुद उसे वार्ड नंबर सिक्स का मरीज बना देता है। क्या आपको नहीं लगता कि जिसे महत्व देना चाहिए उसे ही नजरंदाज कर रहे हैं?

          न्यूरोसाइंस के मुताबिक़ जीवन की वे सभी बातें जिन्हें हमने अपनी उथली प्रगति और आधुनिकता बोध के कारण अकल्पनीय-सा बना लिया है, अब वक़्त आ गया है कि उन्हें जीवन को लौटाया जाए। अंधेरों की खाई में गिरते जीवन की रक्षा के लिए अब यही एक उपाय है कि हम अपने मनुष्यत्व के खोए हुए अर्थ तलाशें। अपनी सहजता की ओर लौटें। उन छोटी-छोटी चीजों से जुड़ें, जिन्हें बड़ा बनने की आपाधापी में हम झटककर चले आए हैं। न्यूरोसाइंस दरअसल हमें उस चरवाहे की याद दिलाना चाहता है, जो हमारे पुरखों की कहानियों में अब तलक मजे से बांसुरी फूंक रहा है।

एक रोज उस चरवाहे से किसी ने पूछा कि बताओ आज मौसम कैसा रहेगा? सवाल सुनकर चरवाहा मुस्कुरा दिया, मानो यही जवाब हो। पूछने वाले ने दोबारा पूछा, 'हंसो मत ये बताओ आज मौसम कैसा रहेगा?" चरवाहा बंसी में सुर फूंकते-फूंकते रुका और बोला, 'जैसा मैं चाहूंगा, वैसा।'

'मतलब?'

'मतलब ये कि मौसम तो हर हाल में वैसा रहेगा जैसा धरती चाहेगी, पर मेरे मन का मौसम वैसा रहेगा, जैसा मैं तय करूंगा।'

उस दिन पूछने वाले को एक नया सबक मिला कि अगर तुम भीतर का मौसम बदल सको तो बाहर का मौसम अपने आप बदल जाता है

         

          गोर्की ने न्यूयॉर्क को देखकर जिस सोना निगलने वाले एक पीले दैत्य की कल्पना की थी, वह दैत्य भारत के मन में भी आकार ले रहा है। हम एक ऐसा समाज बन रहे हैं, जिसके मन में पूंजी की भूख निरंतर गहरा रही है। लोग धरती, आकाश, समुद्र, हवा, वनस्पति, सब-कुछ को मसलकर पूंजी के ढेर में बदल रहे हैं और जीवन को एक नितांत रूखी, ठंडी, संवेदनहीन चीज में। और सबसे दुखद बात यह है कि हम, प्रगतिशील दुनिया के लोग, यह भी नहीं जानते कि हम चाहते क्या हैं, पर अपनी अनिश्चित मांग को पूरा करने के लिए हमने अपने जीवन को नरक बना रहे हैं।

          इन दिनों जीवन इसलिए जटिल है, क्योंकि अपनी प्रगतिशीलता को हांकने की जल्दबाजी में हमने सच्चाई और सरलता को हाशिए पर रख दिया है। आधुनिक होने की आतुरता में हमने पुरातनता को तो बड़ी तेजी से विस्मृत किया, पर कुछ नया नहीं रच पाए। हमने शिल्प और कलाओं से लेकर प्रकृति और पर्यावरण तक हर चीज का विनाशकारी दोहन किया, पर उनकी नई पौध रोपने की मोहलत नहीं तलाशी। नए समय ने सब के हाथों में मोबाइल तो दे दिया, पर ऐसा कोई आदर्श, कोई मूल्य वह नहीं दे पाया, जिसे सवा अरब आबादी का मन अपना पाता।

          स्टीवेन लेविट अपनी पुस्तक 'फ्रेकोनोमिक्स' में लिखते हैं कि नैतिकता या आदर्श वे चीजें हैं, जिनसे हम समाज को सजा हुआ देखना चाहते हैं, लेकिन आर्थिक जगत उस संसार का चित्र दिखाता है, जैसा हमने इसे बना लिया है। एक ऐसे समाज में जहां हर चीज बिकाऊ है, यह एक बड़ा मुद्दा है कि ज्यादा धन से ज्यादा खुशियां मिलती हैं या खुशियों का अभाव होता है? सरलता आती है या जटिलता आती है?

          अपनी अर्थव्यवस्था को अगर उदात्त अर्थों से भरना चाहते हैं तो उसके लिए हमें एक नया पूंजीवाद चाहिए, जो स्वार्थी नहीं सहृदय हो। आज दुनिया भर के अर्थशास्त्री पूंजी के नए मायने तय कर रहे हैं। उनकी इस नई परिभाषा में सबसे ऊपर है- मानवीय पूंजी यानी मनुष्य। दूसरे नंबर पर है- सामाजिक पूंजी यानी रिश्ते, तीसरे पर है- प्राकृतिक पूंजी यानी पर्यावरण, चौथे पर- मानवनिर्मित पूंजी यानी इंफ्रास्ट्रक्चर और सबसे निचले पायदान पर आर्थिक पूंजी यानी मुद्रा । 2010 में हुए एक शोध में यह निष्कर्ष दिया गया कि किसी भी समाज के सुख का मुख्य कारण वैयक्तिक पूंजी नहीं, सामाजिक जुड़ाव है। पर विडंबना यह है कि हमारी दौड़ इस आख़िरी पायदान, पूंजी पर आकर ठहर गई है।

          महात्मा गांधी ने जब कहा कि यंत्र और उद्योग की परवशता और उससे जन्मी अर्थ पिपासा का इलाज होना चाहिए, तब वे भी हमें विकास, प्रगति और सुख के उन्हीं मायनों पर पुनर्विचार के लिए ही आगाह कर रहे थे जिनके लिए आज विज्ञान कह रहा है। शायद वे समय से काफी आगे चल रहे थे। आदर्श और व्यवहार को दो अलग-अलग चीजें मानकर हम जीवन का खेल यह सोचकर खेले जा रहे हैं कि हम बड़े बुद्धिमान हैं, लेकिन ऐसा करते हुए हम महज वार्ड नंबर सिक्स का विस्तार ही कर रहे हैं।

          अगर हम आदर्श और अर्थ के बीच की खाई (गैप) को भरना चाहते हैं, तो उसके लिए जरूरी है कि हम देना शुरू करें। पूरे दिन को छोटी-छोटी देनों से भर दें। जरूरत पड़ने पर खुद का नुकसान कर के भी दें। पर याद रखें कि दान का सरोकार सिर्फ़ धन से नहीं है। ज्ञान, अनुभव, प्रज्ञा, भावना, कलाएं, पर्व, भाषाएं यहां तक कि समय, स्पर्श, विश्वास और क्षमा भी... जीवन में सब-कुछ लेना-देना ही तो है। पेड़ लगाना भी देना ही है। किसी को सड़क पार करा देना भी। किसी की तक़लीफ़ को सुन लेना भी देना है और मुस्कराना भी...

        

मैं अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा द्वितीय विश्वयुद्ध की एक घटना से। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, लिथुआनिया में एक जापानी राजनयिक चिउनेसुगिहारा तैनात थे। एक सुबह उनकी नींद दूतावास के बाहर जमा हुए हजारों लोगों के शोर से खुली। उन्हें बताया गया कि वे यहूदी थे जो हिटलर के हाथों मौत से बचने 

के लिए पोलैंड से भाग गए थे और जापान जाने के लिए वीज़ा चाहते थे। एक बार में हजारों वीजा देना और वह भी शरणार्थियों को, एक गंभीर मुद्दा था और इसलिए उन्होंने अपनी सरकार से सलाह ली। वे टेलेक्स संदेशों के दिन थे। पहला संदेश, उत्तर था 'नहीं'; दूसरा संदेश, उत्तर 'नहीं' था; तीसरे संदेश में, जैसा कि अपेक्षित था, उत्तर अभी भी 'नहीं' था। उनका आधिकारिक कर्तव्य अपनी सरकार के निर्देशों का पालन करना था। लेकिन उनकी आंतरिक आवाज ने उनसे कहा कि वह अपने पद का उपयोग इन लोगों को मौत से बचने में मदद करने के लिए करें। उन्हें वीज़ा जारी किया गया, जापान वापस बुलाया गया, लेकिन वे हज़ारों लोगों की जान बचाने में सफल रहे। उन्हें जापान में अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्हें जो मिला वह माप से परे था - देने की खुशी, स्थायी मानसिक शांति और संतुष्टि।

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हिसाब, पर्यावरण का                                    लघु कहानी - जो सिखाती है जीना

कस्तूरी सारे शहर में जहां-तहां घूमता रहता था, जैसे कुछ ढूंढ रहा हो। फिर आ गया और बोला, “दुनिया पर मेरा कुछ निकलता है, कोई हिसाब कर दें

          कस्तूरी पागल था, इसलिए कोई उसका हिसाब नहीं करता था। बस खाने-पीने को कुछ दे दिया जाये, तो वह चला जाता। एक दिन मैंने मज़ाक में कहा, कस्तूरी आज मैं तुम्हारा हिसाब करूंगा, बोलो क्या बाकी है दुनिया पर?’ निकालो रुक्का, लालकिला चाहिये, की ताजमहल?’

          वह खुश हो गया और बोला, मेरे पास एक नदी थी, वह कहाँ गई? एक जंगल था। कौन ले गया? मेरे पाखी-परेबा कहाँ गये?’

मैं अकबकया, यह कोई कैसे बताएगा?’

फिर मेरा हिसाब रहने दो’, वह दुखी होकर बोला।

कुछ पल कि चुप्पी के बाद मैंने कहा, अच्छा तुम्हारा घर कहाँ है, कस्तूरी?’

मालूम नहीं भूल गया हूँ।

घर में और लोग थे?’

थे, बहुत लोग थे बाबू।

वे लोग अब कहाँ हैं?’

क्या पता! उसने हाथ हिलाया।

पागल कैसे हो गये?’, मैं असली सवाल पर आया।

दुनिया की चाल से’, उसने कुछ सोचकर कहा।

ठीक कैसे होगे?’

हिसाब मिलने पर।

कस्तूरी एक समय के बाद काफी बूढ़ा हो कर मर गया। वह पागल क्यों हुआ? ठीक-ठीक कोई अनुमान नहीं कर सका। वैसे मुहल्ले के बड़े-बुजुर्ग आज भी यही कहते हैं कस्तूरी की तरह आदमी सोचने लगे तो ...................

(संजय सिंह)

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