मंगलवार, 1 अक्टूबर 2024

सूतांजली अक्तूबर 2024

 


असहयोग और कुछ नहीं,

शासकों के पशुबल को हटाने का कर्त्तव्य है

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युद्ध और गांधी

युद्ध

महाभारत

कौरव – पांडव

ऐसा कोई आयुध न बचा जिसका प्रयोग न हुआ हो।

युद्ध की सभी विधाओं का प्रयोग हुआ।

हाथी, घोड़े, ऊंट, पैदल, रथ हर प्रकार की सेना थी।   

एक ऐसा भयानक युद्ध जिसमें सम्पूर्ण आर्यावर्त के राज्य अपनी-अपनी सेना के साथ लड़े-कटे-मरे।

द्वारकाधीश श्री कृष्ण ने भी यादवों की अपराजेय चतुरंगिणी सेना के साथ युद्ध में भाग लिया।

18 दिन के इस भयानक रक्तपात के बाद युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करवा श्रीकृष्ण अपने स्वर्ण जड़ित गरुड़ध्वज से सुशोभित रथ में द्वारका वापस चले।

            क्या श्री कृष्ण अपनी मृदु-मुस्कान के साथ द्वारका में प्रवेश किए होंगे? क्या उनमें विजय की प्रसन्नता रही होगी? उनकी चतुरंगिणी सेना किस हालत में वापस द्वारका आई होगी? द्वारका के द्वार पर जन सैलाब तो जमा होगा, लेकिन क्या उनकी आँखें विजयी श्रीकृष्ण को खोज रही थीं या उनको जो अब तक नहीं लौटे थे और अब कभी वापस लौट कर नहीं आने वाले थे? श्रीकृष्ण के कानों में मंगल गान पड़ रहे होंगे या रोने की, आर्तनाद की, चीख-पुकार की मार्मिक आवाजें आ रही होंगी?

            युद्ध का कारण कुछ भी हो, परिणाम कुछ भी हो, किसी भी पक्ष की विजय हो सत्य तो यही है कि दोनों ही पक्ष पराजित होते हैं। विजयी पक्ष भी बहुत कुछ हार जाता है। अपरिमित  जन-धन की क्षति होती है जिसकी पूर्ति असंभव है। दिल में लगने वाले घाव कभी नहीं भरते।

            जब द्वितीय विश्व युद्ध के बादल मंडरा रहे थे, देशों के बीच तना-तानी चल रही थी, गांधी ने शांति बनाये  रखने की गुजारिश की थी और युद्ध के अन्य विकल्पों पर कार्य करने की सलाह दी थी। लेकिन न हिटलर और न ही मित्र देशों को उनका सुझाव रुचा। उन्होंने अहिंसक प्रतिरोध करने का सुझाव दिया था। अहंकार में सराबोर दोनों ही पक्षों को यह नागवार लगा। यह तो आत्मसमर्पण है, अपमान है?

            4 वर्षों तक चले इस प्रलयंकारी युद्ध का समापन अणुबम के विस्फोट से हुआ। युद्ध की समाप्ति के बाद विदेशी पत्रकारों का एक दल गांधीजी से मिलने यह बताने पहुंचा कि युद्ध में मित्र देशों की विजय हुई और  हिटलर मारा गया। गांधी ने पूछा कि उस युद्ध में कुल कितने जन-धन का नुकसान हुआ? पत्रकारों ने एक दूसरे को देख गांधी को संख्या बताई और कहा यह अभी तक के अनुमानित आंकड़े है। गांधी का अगला सवाल था कि अगर उनकी बात मानी जाती तो नुकसान इससे कम होता या ज्यादा? कुछ देर की चुप्पी के बाद उत्तर आया, शायद इससे कम होता लेकिन ...... । गांधी ने बीच में ही रोक दिया और हिंसा पर अहिंसा का राज होता। अभी, हिंसा पर हिंसा की ही विजय हुई है, इसके दूरगामी परिणाम होंगे।

कालांतर में, भविष्य में युद्ध रोकने के लिए बने वैश्विक संगठन शक्तिहीन हो गये। अनेक समझौते हुए, संयुक्त राष्ट्र संघ भी बना। विश्व दो गुटों में विभक्त हो गया। हर समय, कहीं-न-कहीं बम के गोले, टैंकों की गरगराहट, गोलियों की आवाज चलती ही रहती है। युद्ध थमने का नाम ही नहीं ले रहे। पूरा विश्व बारूद की ढेर पर है, कब कहाँ धमाका होगा पता नहीं। इन आमने-सामने के युद्ध के अलावा गुमनाम और अब खुल्लम-खुल्ला आतंकवाद के निरंतर युद्ध से पूरी दुनिया खौफ में है। यह मत सोचिये जब हम युद्ध की बात कर रहे हैं तब केवल दो देशों के मध्य युद्ध की चर्चा कर रहे हैं। हर देश, कौम, जाति, धर्म और तो और हर इंसान भी दूसरे इंसान से युद्ध कर रहा है।

जब तक यह नफरत की आग समाप्त नहीं होगी युद्ध समाप्त नहीं होंगे। शांति का एकमात्र उपाय प्रेम, मुहब्बत, सौहार्द, सद्भावना ही है।  

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असहयोग

(काँग्रेस की बैठक में अपने असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव को स्वीकृत कराने के लिए गांधी ने बड़ी मेहनत की और बड़े ज़ोरदार और तार्किक ढंग से अपनी बात रखी। गांधी-मार्ग पत्रिका ने इतिहास में गोता लगाकर सामग्री एकत्र कर  उसे प्रकाशित किया, इससे गांधी को समझा जा सकता है। उसी के कुछ अंश।)

            गांधी की इतनी छवियां गढ़ दी गई हैं कि गांधी कहीं खो ही गये हैं! हमारे हाथ बचे हैं या तो 'सुविधा के गांधी' या 'दुविधा के गांधी' गांधी इन दोनों से दूर, काल की दूरियों को पार कर हर उस जगह खड़े मिलते हैं जहां स्वतंत्रता-समता का संघर्ष हैउनके तरकश में सत्य है, तो सत्याग्रह भी है; सहमति की आतुरता है तो असहमति की दृढ़ता भी है; सबको साथ लेने का धीरज है तो सबको छोड़ अकेले निकल पड़ने की तीव्रता भी है, वे सबके साथ, सब तरह का सहयोग करने को तत्पर मिलते हैं तो असहयोग का ब्रह्मास्त्र चला कर सबको घुटनों पर भी ला देते हैंयह योद्धा गांधी आज की जरूरत है

            1920 का काल था1915 में भारत लौटे 46 वर्ष के गांधी ने केवल पांच सालों में भारत के सार्वजनिक जीवन को अपनी मुट्ठी में कर लिया था, और असहयोग आंदोलन की व्यापक योजना कांग्रेस के सामने रख दी थी। काँग्रेस का हृदय गांधी के साथ था, दिमाग कुछ दूसरा कह रहा थासर्वश्री विपिन चंद्र पाल, मुहम्मद अली जिन्ना, एनी बीसेंट, मदनमोहन मालवीय, जमनादास द्वारकादास आदि सबने गांधी के असहयोग से सहयोग करने से इंकार करते हुए, उनके प्रस्ताव पर हर तरह की आपत्तियां उठाई थीं... गांधी ने दृढ़ता से एक-एक आपत्ति का जवाब देते हुए उनकी निरर्थकता ही उजागर नहीं कर दी बल्कि यह भी संकेत दे दिया कि अब देश रुकने-थमने को तैयार नहीं है- "हम, जो भारत का नेतृत्व करते हैं उनमें भी वे गुण नहीं हैं, तो भारत को कभी स्वराज्य नहीं मिलेगा" मैं अच्छी तरह जानता हूं कि इस महान सम्मेलन के समक्ष यह प्रस्ताव रखने का जो अवसर मुझे दिया गया है, उससे मेरे कंधों पर कितनी गंभीर जिम्मेवारी आ पड़ी हैमैं यह भी समझता हूं कि आप यह प्रस्ताव मंजूर कर लेंगे तो मेरी अपनी और आपकी भी मुश्किलों में कितनी वृद्धि हो जाएगीमेरा प्रस्ताव मंजूर करें तो इसका अर्थ होगा कि अब तक जनता अपने हक और सम्मान की रक्षा के लिए जो नीति अपनाती रही, उसे हम बिलकुल बदल रहे हैंमैं पूरी तरह जानता हूं कि हमारे बहुत से नेता इसके विरुद्ध हैं - ऐसे नेता, जिन्होंने मातृभूमि की सेवा में मेरी अपेक्षा कहीं अधिक समय और शक्ति लगाई हैयह सब पूरी तरह समझकर मैं आपके सामने खड़ा हुआ हूंमैं यह प्रस्ताव परमेश्वर से डरते हुए और स्वदेश के प्रति अपने धर्म के भासे प्रेरित होकर पेश कर रहा हूंमैं चाहता हूं कि आप उसका स्वागत करेंआप घड़ी भर के लिए मुझे भूल जाइये। मुझ पर यह आरोप है कि मैं बड़ा 'महात्मा' हूं और तानाशाही चलाना चाहता हूंमैं साहसपूर्वक कहता हूं कि मैं आपके पास 'महात्मा' बनकर या हुकूमत करने की आकांक्षा से नहीं आया हूंमैं तो आपके सामने अनेक वर्षों के अपने आचरण में असहयोग के जो अनुभव मुझे हुए, उसे उपस्थित करने खड़ा हुआ हूंमैं इस बात को मानने से इनकार करता हूं कि असहयोग देश के लिए बिलकुल नयी चीज हैहजारों की भीड़ वाली, सैकड़ों सभाओं ने असहयोग को स्वीकार किया हैमैं फिर आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप इस महत्व के प्रश्न पर विचार करने में धीरज और शांति से प्रस्ताव के गुण-दोषों पर अपना मत निश्चित कीजिये।

सहनशक्ति की तालीम : प्रस्ताव को महज मंजूर कर लेने से आप छूट नहीं जाएंगेजो धारा जहां लागू होती हो, वहां उस पर अमल शुरू कर देना पड़ेगामेरा अनुरोध है कि आप धीरज रखकर मेरा कहना सुन लीजिये, तालियां भी न बजाइये और आवाज-कशी भी मत कीजिये, तालियों से विचारों का प्रवाह रुकता है और आवाज-कशी करने से बोलने और सुनने वालों के बीच जुड़ा हुआ तार टूट जाता हैअसहयोग में तो अनुशासन और त्याग की साधना की बात हैविरोधी के मत को धीरज और शांति से समझ लेना असहयोग का लक्षण हैबिलकुल ही विरुद्ध विचारों को भी सह लेने की वृत्ति जब तक हम पैदा नहीं कर लेंगे, तब तक असहयोग असंभव हैक्रोध के वातावरण में असहयोग चल ही नहीं सकता। मैं वे अनुभव से एक बहुत महत्वपूर्ण पाठ सीखा हूं कि क्रोध को दबा दिया जाये तो जैसे दबाकर रखी गई उष्णता में से शक्ति उत्पन्न होती है वैसे ही संयम में रखे गए क्रोध से भी ऐसा बल पैदा किया जा सकता है कि सारे संसार में हलचल मचा देहम मत-विरोध के बावजूद एक-दूसरे को सहन करना सीख लें तो इससे अधिक अनुशासन और क्या हो सकता है?

कांग्रेस और अल्पमत : मुझसे कहा गया है कि मैं तो बस विनाश का ही कार्य करता रहता हूंअपने प्रस्ताव से मैं देश के राजनीतिक जीवन में दरार डाल रहा हूंकांग्रेस किसी खास दल की संस्था नहीं हैसंख्या थोड़ी है, इसीलिये  किसी दल को कांग्रेस छोड़कर जाने की जरूरत नहींउन्हें समय पाकर देश के लिए अपना मत रुचिकर बनाकर अपना ही बहुमत बना लेने की आशा रखनी चाहिएहां, कांग्रेस द्वारा निंदित किसी भी नीति को कांग्रेस के नाम से कोई अख्तियार नहीं कर सकताआप मेरा ढंग नापसंद करेंगे तो मैं कोई कांग्रेस छोड़कर नहीं चला जाऊंगाआज मेरे विचारों का अल्पमत हो, तो जब तक वह बदलकर बहुमत नहीं बन जायेगा तब तक मैं कांग्रेस को समझाता ही रहूंगा

असहयोग एकमात्र उपाय : पंजाब पर सितम ढाये गए और यह समझ लीजिए कि जिस दिन एक भी पंजाबी को पेट के बल चलना पड़ा, उस दिन सारा भारत पेट के बल चलायदि हम भारत की योग्य संतान हैं तो हमें यह कलंक का टीका मिटा ही डालना होगाइन जुल्मों का न्याय कराने के लिए हम महीनों से जूझ रहे हैं, परंतु अभी तक हम ब्रिटिश सरकार को रास्ते पर नहीं ला सकेक्या लोग अब तक, इतना सब कुछ करने के बाद, इतना जोश और लगाव प्रकट करने के बाद, केवल अपनी क्रोध की भावना का थोथा प्रदर्शन करके ही बैठे रहना पसंद करेंगे? अगर कांग्रेस अनिच्छुक अधिकारियों को न्याय करने के लिए विवश नहीं कर पाती तो फिर वह अपने अस्तित्व की सार्थकता कैसे सिद्ध करेगी? अपने सम्मान की रक्षा कैसे करेगी? और उनके खून से सने हाथों से कोई मेहरबानी स्वीकार करने से पहले यदि वह उनसे अपने किये पर पश्चाताप नहीं प्रकट करा पाती तो यह कैसे कहा जा सकता है कि उसने न्याय प्राप्त कर लिया या अपने सम्मान की रक्षा कर ली?

असहयोग की सर्वोत्तम योजना : इसी कारण मैं असहयोग की अपनी योजना पके सामने रख रहा हूंमैं आपसे यह इसलिये नहीं कहता कि मुझे अपनी योजना का आग्रह हैमेरे कहने का मतलब यह है कि आप मेरी योजना को जब खूब विचार करके देख लेने पर दूसरी कोई योजना आपको इससे बढ़कर मालूम न हो, तभी मंजूर कीजिये । मैं यह दावा करता हूं कि इस योजना को लोगों का काफी समर्थन मिला है लेकिन मैं आपसे फिर यह कहने की हिम्मत करता हूं कि इस पर अमल करें तो एक ही वर्ष में स्वराज्य ले सकते हैंयह विराट समाज इस प्रस्ताव को केवल पास कर दे, इतना ही काफी नहीं हैदेश की मौजूदा हालत को ध्यान में रखकर दिन-दिन अधिक जोश के साथ लोग उस पर अमल करें, तभी वह फलदायी हो सकता है

त्याग और अनुशासन असहयोग के सिवा एक और मार्ग लोगों के सामने था और वह था तलवार उठाने का, परंतु भारत के पास इस समय तलवार नहीं हैयदि उसके पास तलवार होती तो मैं जानता हूं कि वह असहयोग की इस सलाह को सुनता तक नहीं, परंतु मैं तो आपको यह बता देना चाहता हूं कि आप अनिच्छुक शासकों के हाथों रक्तपात के मार्ग द्वारा जबरन न्याय प्राप्त करना चाहते हों, तो उस मार्ग में भी आवश्यक अनुशासन और त्याग के बिना आपका काम नहीं चलेगामैंने आज तक नहीं सुना कि जिसमें कोई तालमेल न हो ऐसी किसी भीड़ ने कभी लड़ाई जीती होकवायदी सेना को लड़ाई जीतते मैंने और आपने भी देखा हैब्रिटिश सरकार या यूरोप की सम्मिलित ताकत से लोहा लेना हो तो हमें अनुशासन और त्याग पैदा करना ही होगामैं लोगों को उस अनुशासन और त्याग की स्थिति में पहुंचा हुआ देखने का उत्सुक हूंउस स्थिति को देखने को मैं उतावला हूंबुद्धिबल में हम पिछड़े हुए नहीं हैं, परंतु मैं देखता हूं कि राष्ट्रीय पैमाने पर अभी तक हममें त्याग और अनुशासन नहीं आया है कौटुंबिक क्षेत्र में तो हमने अनुशासन और त्याग का जितना विकास किया है उतना संसार के और किसी राष्ट्र ने नहीं किया। उसी वृत्ती को राष्ट्रीय व्यवहार में भी दिखाने का इस समय मैं आपसे अनुरोध कर रहा हूं

            अंततः काँग्रेस ने गांधी का असहयोग प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था।

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रविवार, 1 सितंबर 2024

सूतांजली सितंबर 2024


 

स्वयं को भेड़ बना लोगे

तो भेड़िये आकर तुम्हें खा जायेंगे।

-        जर्मन

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बुद्धि : आत्मा का दीपक

 

          ईश्वर ने हमें बुद्धि प्रदान की है उसका प्रयोग करने के लिये। यह हमारा शृंगार नहीं है, यह हमारी शक्ति  है जिसका प्रयोग कर हम पशुत्व से ईश्वरत्व की तरफ बढ़ सकते हैं। ईश्वर के प्रति हमारा यह कर्त्तव्य है कि हम अपने जीवन का उपयोग बुद्धिमत्तापूर्वक करें, उसे बुद्धिमत्तापूर्वक चलायें। मूढ़ से भी मूढ़ व्यक्ति को भी ईश्वर उसके लिये आवश्यक बुद्धि अवश्य देता है, पर दुर्भाग्यवश हम प्राप्त बुद्धि के बहुत थोड़े अंश का उपयोग करते हैं। जीवन के प्रत्येक कार्य में, प्रत्येक क्षण बुद्धि का उपयोग किया जाना चाहिये, पर हम बुद्धि से काम कहीं-कहीं ही लेते हैं।

 

          एक बार हम अपने आप से आज यह प्रश्न करें कि क्या हम अपने जीवन का उपयोग सचमुच बुद्धिमत्तापूर्वक कर रहे हैं? क्या हम अपने खान-पान में अपनी बुद्धि का उपयोग करते हैं? क्या अपनी खाद्य साम्रगी बुद्धिमत्तापूर्वक चुनते हैं? अपने धन का खर्च बुद्धिमत्तापूर्वक करते हैं? अपने शब्द-बल का प्रयोग लोगों में उस आशा और उत्साह का संचार करने के लिए करते हैं जिन्हें हम जीवन का अमृत समझते हैं? सबसे आवश्यक प्रश्न तो यह है कि क्या हम विचार करते समय अपनी बुद्धि से काम लेते हैं? क्या जिन बातों को हम सुनते हैं उन्हें अपनी कसौटी पर कसते हैं? अपने दैनिक कार्यों के करने में, वे छोटे हों या बड़े, क्या हम अपनी बुद्धि का उपयोग करते हैं? जब-जब हमारे सामने कोई नयी समस्या खड़ी होती है तो हम उसे क्या भावुकता, भौतिकता, स्वार्थ के बजाय बुद्धि से सुलझाते हैं?

          क्या हमने अपने भविष्य के लिये कोई कार्यक्रम बुद्धिमत्तापूर्वक बनाया है? क्या हम जानते हैं कि भविष्य में हम क्या बनना चाहते है और क्या करना चाहते हैं? यदि नहीं तो क्या यह बुद्धिमानी नहीं होगी कि हम जो कुछ करें और जो हम करना चाहते हैं उसको प्राप्त करने के लिए एक कार्यक्रम निश्चित करें? कब तक, कितना और कैसे चाहिये?

          आज संसार को जिस वस्तु की अधिक-से-अधिक आवश्यकता है, वह है बुद्धि। संसार में सदिच्छा और सद्भावना की कमी नहीं है, पर चूंकि हमलोग बुद्धि का उपयोग नहीं करते, हम अपने को हर जगह कठिनाई में पाते हैं।

          आज के संसार की समस्या का समाधान इसीमें है कि प्रत्येक देश, संप्रदाय, धर्म के लोग अंधविश्वास और अंधपरंपरा का त्याग करके सभी राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक  समस्याओं का सामूहिक हल बुद्धि से निकालें। पर जबतक ऐसा नहीं होता हम में से प्रत्येक व्यक्तिगत रूप में बुद्धि का उपयोग कर ही सकता है।

          बुद्धि ईश्वर प्रदत्त आत्मा का दीपक है। इस दीपक का प्रकाश धुंधला न होने दें, न इस प्रकाश की परिधि से दूर जायँ । अपनी बुद्धि का उपयोग करें। बुद्धि का प्रयोग कर अन्य नकारात्मक अकर्षणों से बचें। बुद्धि के प्रयोग का-सा आनंदप्रद खेल दुनिया में दूसरा नहीं है।

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जंगली कौन? 

          एक मिशनरी ने एक बार किसी देश के मूल निवासियों के एक समूह को अपने पवित्र धर्म की सच्चाइयों की शिक्षा देने का बीड़ा उठाया। उसने उन्हें छह दिनों में पृथ्वी के निर्माण और एक सेब खाने से हमारे प्रथम  माता-पिता के पतन के बारे में बताया।

          विनम्र मूल निवासियों ने ध्यान से उनकी बात सुनी, सुनने के बाद उन्होंने उसे धन्यवाद दिया और फिर एक ने मक्के की उत्पत्ति के संबंध में एक बहुत प्राचीन परंपरा बताई। लेकिन मिशनरी ने स्पष्ट रूप से अपनी घृणा का प्रदर्शन किया, उनकी बात पर अविश्वास दिखाया और क्रोधपूर्वक कहा, "जो कुछ मैं ने तुम्हें सुनाया वह पवित्र सत्य था, परन्तु जो कुछ तुम मुझ से कह रहे हो, वह कोरी काल्पनिक कहानी और झूठ है!"

          "मेरे भाई" मूल निवासी ने नाराज होकर लेकिन गंभीरता से उत्तर दिया, "ऐसा लगता है कि अभी आपको सभ्यता के  नियमों की अच्छी जानकारी नहीं हैं। आपने देखा कि हम, जो इन नियमों का पालन करते हैं यह मानते हैं कि ये सत्य हैं, उनकी श्रद्धा करते हैं और पवित्र भी मानते हैं, लेकिन फिर भी हम आपका आदर करते हैं और आपकी कहानियों पर विश्वास करते हैं; तो फिर, आप हमारी बातों को समझने से इनकार क्यों करते हैं?"

          ईसाई मिशनरी शायद अपने को अन्य से श्रेष्ठ समझ रहा था। शायद वह यह सोच रहा था, "मैं इन जंगली मूल निवासियों को ईश्वर और मनुष्य के पवित्र सत्य के प्रति जागृत करने की कोशिश कर रहा हूं। लेकिन ये जंगली लोग मक्के जैसी सांसारिक चीज़ के बारे में कुछ बचकानी दंतकथाएं गढ़ रहे हैं।" लेकिन वह यह नहीं समझ रहा था कि मूल अमेरिकियों के लिए, मक्का सांसारिक नहीं है बल्कि भगवान के समान पवित्र है क्योंकि यह प्रकृति का हिस्सा है। महान आत्मा जिसने दुनिया को बनाया है वह इसमें निवास करती है और इसे एक अद्वितीय उद्देश्य से भर देती है। मूल अमेरिकी दृष्टिकोण में, जो आंतरिक रूप से पारिस्थितिक है, मक्का की उत्पत्ति की कहानी मनुष्य के निर्माण की कहानी जितनी ही पवित्र है, क्योंकि मनुष्य और मक्का प्रकृति के समान, परस्पर जुड़े हुए और अन्योन्याश्रित हिस्से हैं। मूल अमेरिकी जनजातियाँ पौधों का सम्मान करती थीं, कीड़े, सरीसृप, पशु और पक्षी "वस्तुओं" के रूप में नहीं बल्कि "सामान्य इंसान" के रूप में।

          ये जंगली निवासी जिन्हें हम अनपढ़, गंवार, असभ्य, रूढ़िवादी मानते हैं शायद किसी हद तक हम पढ़े-लिखे, समझदार, सभ्य और आधुनिक लोगों से ज्यादा अच्छे इंसान हैं। वे हमारी तुलना में सभ्यता के नियमों को ज्यादा अच्छी तरह समझते हैं।

          हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री नरेंद्र कोहली सागर मंथन में लिखते हैं - ... “व्यक्ति जिस समाज में रहता है, उसी के रीति-रिवाज और प्रचलन के अनुसार उसे चलना पड़ता है। अमेरिका में रहने वाला भारतीय अमरीका में रह रहा है या अमरीकी समाज में? देश अलग है, वहाँ के लोग अलग हैं; किन्तु वह उनका समाज नहीं है। उनका अपना समाज तो भारतीय समाज ही है, चाहे भारत में रहें, या अमरीका में”।

          ... और क्या यह सही है? और अगर सही है तो वह कब तक भारतीय समाज है, पहली पीढ़ी तक, या दूसरी पीढ़ी तक या उसके बाद और कितनी पीढ़ी तक! क्या उसके साथ हर समय भारतीय मूल की पूंछ नहीं लगी रहेगी? वह अपने को तो अमरीकी समाज का हिस्सा मानता है लेकिन क्या अमेरिकी समाज भी उसे अपना हिस्सा मानती है?

          विदेश में रहने वाला बेटा स्वयं अपनी माँ को सूचना दे रहा है कि वह अपनी एक कैनेडियन गर्लफ्रेंड के साथ रह रहा है। विवाह के बिना ही दोनों साथ रह रहे हैं – लिव इन। इसलिए वह लड़की न उनको अपना सास-ससुर मानती है और न उनसे कोई सम्बन्ध रखना चाहती है। उन्होंने कई बार उन लोगों को घर आने को कहा, किन्तु वे नहीं माने। मित्र ने स्वयं उनके घर जाने की अनुमति माँगी तो उस लड़की ने पूछा, "वाय दिस ओल्डमैन वांट्स टू कम टू आवर हाउस।" (यह वृद्ध इंसान क्यों हमारे घर आना चाहता है? वे उसके ससुर नहीं थे। बस एक ओल्डमैन थे।

          माँ ने बेटे को समझाया कि तुम्हें वह लड़की पसन्द है और वह तुम्हें पसन्द करती है, इतने समय से साथ रह रहे हो, तो विवाह क्यों नहीं कर लेते?

बेटे का उत्तर था, "वाय स्पॉयल दि फन।" (आनंद को क्यों बर्बाद किया जाये)

"क्या मतलब?"

"अरे हम दोनों अपनी-अपनी जरूरत से साथ रह रहे हैं। पत्नी बन गयी तो छाती पर बैठ कर मूँग दलेगी। हुकुम चलायेगी। अपनी माँगों की सूची बढ़ाएगी। दंगा-फसाद करेगी। पुलिस और कोर्ट-कचहरी की धमकी देगी। उससे तो हम ऐसे ही भले। रहती है, रहे। जाती है, जाये...। उसका मुझ पर कोई कानूनी अधिकार नहीं, मेरा उस पर कोई कानूनी हक नहीं।"

          तो यह सारा भय कानूनी अधिकार का है; प्यार का कोई सम्बन्ध नहीं है। आवश्यकताओं के कारण एक साथ रह रहे हैं। आवश्यकता भी केवल यौन सम्बन्धों की है।... दोनों अपने-अपने पैसों का अलग हिसाब रखते हैं। यह पति-पत्नी का सम्बन्ध नहीं है। सुख का साथ है। न दायित्व का साथ है। न दुख का साथ है।..... और यह शायद केवल युवावस्था का ही साथ है। प्रौढ़ होंगे, वृद्ध होंगे तो जाने क्या होगा। .....” लिव-इन का यही उद्देश्य है। जैसा उद्देश्य है फल भी उसके अनुरूप ही है। समाज और लोग भी वैसे ही हैं।

          हम, असभ्य से सभ्य बनने वाले और हमें असभ्य से सभ्य बनाने वाले लोगों के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें जानना आवश्यक है। विदेशियों ने असभ्य को सभ्य बनाने और हम निरीह भारतीयों पर शासन के नाम पर क्या-क्या अत्याचार किये थे? जो लोग हमारे लिए आक्रमणकारी, लुटेरे और हत्यारे थे, उनके लिए वे सन्त थे। जब वास्को डी गामा यहाँ आया था तो उसे हिन्दुओं और ईसाइयों में कोई विशेष अन्तर दिखायी नहीं दिया था। उसने अपने राजा को यही सूचना दी थी कि यहाँ के लोग भी ईसाई ही हैं, किन्तु दूसरे ईसाइयों और इनमें कुछ अन्तर है। किन्तु पुर्तगालियों ने  अधिक दिन इस को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने विदेशी आक्रमणकारियों और शासकों के रूप में अपने कानून बनाने आरम्भ किये। पहला महत्वपूर्ण कानून था - संपत्ति पर अधिकार केवल ईसाइयों का है। (गोवा इंक्वीसीशन पृ. 50,51,56,57,23,24)

          1543 में एक नव-धर्म-परिवर्तित भारतीय ने  अपने मित्रों के साथ हल्के-फुल्के वार्तालाप में कुछ टिप्पणियों की जो कैथोलिक धर्म के अनुकूल नहीं थीं। परिणाम स्वरूप उसे जिंदा जला का राख में परिवर्तित करने का दंड सुनाया गया।

मेरे1 (नरेंद्र कोहली के) सामने विकीपीडिया की पंक्तियाँ थीं -

        "अनेक ईसाई प्रचारक, विशेष रूप से कट्टरपन्थी ईसाई, हिन्दू देवी- देवताओं को उनकी निन्दा कर, उन्हें दुष्ट और राक्षसी घोषित कर रहे थे। कैथोलिक ईसाइयों द्वारा सन्त माने जाने वाले फ्रांसिस जेवियर, हिन्दुओं को भूत-प्रेत की पूजा करने वाले और आध्यात्मिकता से शून्य प्रचारित कर रहे थे। हिन्दू सिद्धान्तों को वे घृणित और विकृत बता रहे थे। ...

        "फ्रांसिस जेवियर ने ही 1545 ई. में पुर्तगाली शासकों से इनक्विजिशन आरम्भ करने की माँग की थी। गोवा में पुर्तगाली शासन-काल में सहस्त्रों हिन्दुओं को ईसाई धर्म स्वीकार करने के लिए बाध्य किया गया। ऐसे कानून बनाये गये कि हिन्दुओं का अपने धर्म का पालन करना तो दूर जीवित रहना भी कठिन हो गया। उन्हें झूठे मुकदमे चला कर, छोटी-छोटी शिकायतें कर, उनका जीना दूभर कर दिया गया। ... कहा जाता है कि 1560 से आरम्भ कर गोवा धर्माधिकरण के काल में सहस्रों हिन्दुओं की हत्या की गयी। इस धर्माधिकरण का प्रस्ताव फ्रांसिस जेवियर ने रखा था।' 2

... ईसाई प्रचारकों की ये गतिविधियाँ 1544 में सन्त फ्रांसिस जेवियर के भारत आगमन के साथ आरम्भ हुईं। ... फ्रांसिस जेवियर ने लिखा : जब सबका बपतिस्मा हो जायेगा, मैं उनके मिथ्या देवताओं की प्रतिमाओं को भंग कर, मन्दिरों को ध्वस्त करने का आदेश दूँगा। इस कल्पना से ही मैं आनन्द में झूमने लगता हूँ।"3

          अजीब त्रासदी है। जिस देश के ये लोग थे, जिस धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए इन्होंने यह सब किया उस देश के लोग, उस धर्म के लोग अगर इन्हें संत मानते हैं, इन्हें पूजते हैं, इनके दर्शन को पवित्र मानते हैं, उन्हें महान मानते हैं, तो इसमें न तो कोई आश्चर्य है न ही अटपटा। लेकिन यह कैसी विडम्बना है कि हम भारतीयों को इसकी कोई जानकारी नहीं और जिन्हें इसकी जानकारी है उन्होंने इसे बताने की जहमत नहीं उठाई बल्कि हमें अंधेरे में रखा। जिसके प्रति  हम भारतीयों और हिंदुओं का खून खौल उठना चाहिए था, जिसके प्रति कोई सम्मान नहीं होना चाहिए था,  न उसे संत मानना चाहिए था, जो हमारे धर्म और देश का शत्रु था, हम भी उसका वैसे ही महिमा-मंडन करते हैं, पूजते हैं, संत मानते हैं, पवित्र मानते हैं।

          मैं तो यही कहूँगा -

जागते रहो!   जागते रहो!!   जागते रहो!!!

1 सागर मंथन पृ 31 से 35, 2 विकीपीडीया,  3 फ़्रीडम अँड रिलीजन

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गुरुवार, 1 अगस्त 2024

सूतांजली अगस्त 2024

 



जो स्वाभाविक है वही सहज है,

                                                जो सहज है वही सरल है,

                                                                      जो सरल है वही निर्मल है

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भारतीयता क्या है?

(यहां कुछ धारणाएं हैं जो भारत की वर्तमान वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं हो सकती हैं। यह भारत के गहरे और आंतरिक अस्तित्व के बारे में हमारी अवधारणा है जिसमें उसकी अद्वितीय प्रतिभा और उसकी उच्च संभावनाएं समाहित हैं, और हमें इस बात का विश्वास है कि हम इसे पुनः प्राप्त कर लेंगे।)

          हम प्रायः भारत के संदर्भ में भारतीयता की भी चर्चा सुनते हैं। लेकिन क्या भारतीयता जैसी कोई चीज़ है? और अगर है तो वह क्या है? श्रीअरविंद ने इस संदर्भ में कहा है - 

       “राष्ट्र केवल एक भौगोलिक या भौतिक इकाई नहीं है। वह शरीर, प्राण, मन, आत्मा और अद्वितीय स्वभाव तथा प्रतिभा वाली एक जीवित प्राणी है।”

          इस परिप्रेक्ष्य में भारतीय होने का अर्थ है सचेतन या अचेतन रूप से भारत की आत्मा और मस्तिष्क के प्रति ग्रहणशील होना और उसके अनुरूप होना। लेकिन व्यक्तिगत और राष्ट्रीय चरित्र, स्वभाव, गुणों और मूल्यों के संदर्भ में इसका क्या अर्थ है?

         सर्व प्रथम, एक भारतीय मानता है कि राष्ट्र मात्र एक भौगोलिक अवधारणा नहीं है। उसका मानना ​​है कि भारत एक जीवित दैवीय शक्ति, एक महान देवी और सार्वभौमिक माता का स्वरूप है। एक भारतीय के अनुसार देशभक्ति का अर्थ राष्ट्र की इस दिव्य आत्मा के प्रति सचेत होना और माँ के रूप में उसकी पूजा करना और उसकी सेवा करना है। एक भारतीय, राष्ट्र के भूगोल में माँ के भौतिक स्वरूप के दर्शन करता है; राष्ट्र के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन में माँ की जीवन शक्ति को पाता है; और उसके मन और आत्मा में राष्ट्र की संस्कृति और धर्म, कला और साहित्य, विज्ञान और दर्शन, निवास करती है। एक भारतीय भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत में, भारत की आत्मा की अद्वितीय आध्यात्मिक प्रतिभा और उसकी नियति के दर्शन करता है।

       द्वितीय, भारतीय स्वयं को ईमानदारी से सत्य की निरंतर खोज के रूप में व्यक्त कर सकता है। लेकिन भारतीय मन कानून, प्रक्रिया और घटना के बाहरी सत्य से संतुष्ट नहीं है। इसका आग्रह चीजों की सबसे गहरी उत्पत्ति और सार के लिए है। उदाहरण के लिये, यदि वह एक वैज्ञानिक है तो वह पदार्थ के बाहरी रूप के नियमों और प्रक्रिया को जानने से संतुष्ट नहीं है; वह उस पदार्थ की आध्यात्मिक उत्पत्ति और उसके सार तत्व की भी खोज करता है। यदि वह धार्मिक स्वभाव का है तो उसकी सहज आस्था उसमें वास करने वाली दिव्यता में होती है। वह बाहरी स्वरूप के बजाय आंतरिक देवत्व की खोज करता है। लेकिन बाह्य रूप के उपासकों के प्रति उनके मन में कोई अभिजात्यवादी अवमानना ​​नहीं है। उनका मानना ​​है कि सर्वव्यापी परमात्मा किसी भी बाहरी रूप या प्रतीक में प्रकट हो सकता है।

          भारतीय के इस धार्मिक स्वभाव की तीसरी विशेषता है दैवीय वास्तविकता के प्रति उसका गैर-हठधर्मी और सार्वभौमिक दृष्टिकोण। भारतीय मानस की यह सर्वोच्च सहिष्णुता नास्तिकता को भी एक धर्म और ईश्वर प्राप्ति का मार्ग मानती है। भारत के तीन महानतम योगियों, बुद्ध, महावीर और पतंजलि ने गैर आस्तिक आध्यात्मिकता का प्रचार किया और माना कि आध्यात्मिक मुक्ति के लिए रचनात्मक ईश्वर या व्यक्तिगत ईश्वर में विश्वास आवश्यक नहीं है। इन तीनों को भारतीय धार्मिक मानस द्वारा महान आध्यात्मिक विभूतियों के रूप में स्वीकार और सम्मानित किया गया, क्योंकि भारतीय मानते हैं कि सत्य की ईमानदार और निस्वार्थ खोज, चाहे किसी भी क्षेत्र में हो, उतनी ही धार्मिक या आध्यात्मिक दृष्टिकोण है जितना कि ईश्वर के प्रति प्रबल आस्था और भक्ति।      

          भारतीय स्वभाव का चौथा महत्वपूर्ण गुण मानवीय और नैतिक मूल्य-प्रणाली है। भारतीय मानते हैं कि "कर्म करने वाले व्यक्ति से विचारक बड़ा है, और विचारक से आध्यात्मिक व्यक्ति बड़ा है"। भारतीय मनोविज्ञान में, आध्यात्मिकता बुद्धि से अधिक महान है और बुद्धि संवेदना और क्रिया की गतिशील क्षमताओं से अधिक महान है।

          भारतीय स्वभाव का पाँचवाँ महत्वपूर्ण गुण उसकी आंतरिकता है। वह स्वभाव से चिंतनशील और दार्शनिक है। वह न केवल ध्यान के दौरान बल्कि जाग्रत जीवन और क्रिया के दौरान भी अंदर जीने की इच्छा रखता है। भारतीय मन मानव जीवन की प्रत्येक गतिविधि, अर्थशास्त्र, राजनीति, शिक्षा, कला, वाणिज्य, व्यवसाय, विज्ञान, प्रौद्योगिकी में इस आंतरिक सत्य और नियम की खोज करता है। उदाहरण के लिए, नैतिकता में, भारतीय मन बाहरी कार्य की अच्छाई के बजाय मन, हृदय और आत्मा की आंतरिक अच्छाई, निःस्वार्थता और उदारता पर जोर देगा; कला में भारतीय सौंदर्यवादी स्वभाव बाहरी रूप के पीछे छिपे आंतरिक सत्य और सौंदर्य को देखने, महसूस करने और व्यक्त करने की आकांक्षा रखता है।

          यह भारत के मूल वैदिक मन की अभिन्न दृष्टि है, जिसने भारतीय संस्कृति और सभ्यता का निर्माण किया। वैदिक ऋषियों ने इसे मानवता के भविष्य के विकास के लिए लागू किया। इसे बाद में दर्शन को नकारने वाली विशिष्टतावादी दुनिया द्वारा कमजोर और विकृत कर दिया गया। सच्चा भारतीय मन इस मूल अभिन्न दृष्टि को पुनः प्राप्त करने का प्रयास करेगा

          एक मानव के ये विशेष गुण ही उसे भारतीय बनाते हैं और यही है भारतीयता।

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कैसे करें निर्णय?

 

जो कम जानता है वह मानता है कि वह बहुत जानता है, लेकिन जो बहुत जानता है वह मानता है कि वह बहुत कम जानता है। श्रीमदभगवतगीता ऐसा ही एक ज्ञान है, जिन्होंने इसे नहीं जाना, नहीं पढ़ा, नहीं सुना वे मानते हैं कि वे इसे जानते हैं। लेकिन जिन संतों ने, विद्वानों ने इसे जाना उन्होंने इसकी अलग-अलग व्याख्या की। उनमें मतभेद हैं लेकिन विरोध नहीं। वे उन सभी व्याख्याओं को स्वीकार करते हैं।

          शंकराचार्य अद्वैतवादी थे। उनका कहना था कि जगत् मिथ्या है, ब्रह्म ही सत् है, आत्मा भी मूलतः ब्रह्म है, उन्होंने ज्ञान योग पर बल दिया। रामानुजाचार्य विशिष्टाद्वैतवादी थे, उन्होंने भक्ति योग की चर्चा की। लोकमान्य तिलक ने कर्म योग कर ज़ोर दिया, श्री अरविंद ने इन तीनों योग के महत्व को स्वीकार करते हुए, तीनों का योग कर दिव्यकर्म या पूर्ण योग की चर्चा की। महात्मा गांधी ने माना कि गीता से हमें मार्ग-दर्शन प्राप्त होता है।

          एक साधारण पाठक-साधक भ्रमित हो जाता है – ज्ञान योग, भक्ति योग, कर्म योग, दिव्य कर्म, मार्ग-दर्शन... क्या करे, क्या न करे? कोई मोक्ष की बात करता है, कोई एकांत साधना की, कोई हिमालय की ऊचाइयों पर गुफाओं में बैठ कर तपस्या करने की। कोई कहता है मोक्ष ही अंतिम लक्ष्य है तो कोई बताता है कि यह अंत नहीं है यह तो प्रारम्भ है। हमें मोक्ष प्राप्त करना है, इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें कहीं जाना है बल्कि हमें मोक्ष अपने अंदर उतारना है, अपने दैनिक जीवन में इसे उतारना है, यह दिखना चाहिये, इसका अहसास होना चाहिये। प्रश्न है कि हम, तुम, वह, सब इसे अपने जीवन में कैसे उतारें? सही बात तो यह है कि यहाँ कोई हम, तुम, वह, सब हैं ही नहीं जो है वह बस है। यानी हमें कुछ करना नहीं है हमें बस सिर्फ होना है। 

          पूरी गीता में श्रीकृष्ण मैं और मेरा की भाषा में बात करते हैं तो लगता है कि यह तो बड़ा अहंकारी है। लेकिन फिर बात समझ आती है अहम ब्रह्मास्मि’, हम उसी एक ब्रह्म के ही अंश है। हमने जीवन को अपनी सोच, अपने विश्वास, अपने घमंड, अपनी धारणा, अपने पूर्वाग्रह  के अनुसार गढ़ लिया है। गिलास आधा भरा है या आधा खाली का उदाहरण हम जानते हैं। इसका उत्तर हमारा अपना है, वही हमारी दुनिया है। यह वह दुनिया नहीं है जो बाहर है। यह दुनिया हमारी अपनी तामसिक, राजसिक और सात्विक गुणों की दुनिया है जिसका निर्माण हमने खुद कर लिया है।

          अर्जुन बड़े सीधे और सपाट प्रश्न करता है लेकिन उसके उत्तर श्रीकृष्ण बड़े कूटनीतिज्ञ की तरह देते हैं। आप कभी कर्म की बात करते हैं कभी ज्ञान की’, कभी कर्मों से सन्यास की तो कभी कर्मयोग की’, कभी द्वैत की कभी अद्वैत की’, कभी सगुण तो कभी निर्गुण उपासकों की’, सन्यास और त्याग में क्या फर्क है। श्रीकृष्ण इन सब के उत्तर देते हैं, विस्तृत उत्तर देते हैं। समझने के लिये चिंतन-मनन करना पड़ता है।

          यह ठीक वही परिस्थिति है। चार अंधे हाथी देखने निकले – किसी के हाथ हाथी का पैर आया किसी के हाथ आया सूंड, तो किसी के पोंछ, किसी के कान, किसी के पेट। जिसको जैसे हाथ लगा उसने वैसा ही समझा। एक ने उस सब को जोड़ कर व्याख्या कर दी। लेकिन तब भी, हाथी इससे कहीं ज्यादा था। कोई गलत नहीं था लेकिन कोई पूर्ण सत्य भी नहीं।

          तब, क्या करें। न इसकी चिंता करें न फिकर, लेकिन यह स्वीकार करें कि अभी बहुत थोड़ा जाना है और अभी बहुत जानना बाकी है। लेकिन वहाँ रुकें नहीं आगे बढ़ते रहें। जितना जानते हैं उसके सहारे ही आगे बढ़ते चलें।  जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगे द्वार खुलते जाएंगे प्रकाश उज्ज्वल से उज्ज्वलतर होता जायेगा, बादल छाँट जाएंगे। लेकिन जैसे-जैसे जानते जायें उसे जीना शुरू करें, जब जीने लगें तब होना शुरू करें।

जानना अच्छा है, जीना बेहतर है लेकिन होना सर्वोत्तम है।

          ज्ञान केवल जमा करते रहें तो उसका कोई अर्थ नहीं है, आवश्यक है उस ज्ञान को कार्य रूप में परिणीत करना, उस पर आचरण करना, उसे अपने जीवन में उतरना। सब होने के बाद अगर वैसा हो नहीं सके तो सब बेकार है। लेकिन यह होना ही सबसे कठिन है। इसमें सबसे बड़ी बाधा है हम स्वयं, हमारा अभिमान, हमारा ईगो। जाने-अनजाने यह हमें रोकता है। हमें कुछ पसंद है और कुछ नहीं। जो पसंद है उसे सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं जो नापसंद है उसे खारिज कर देते हैं। और यह पसंद-नापसंद हमारी अपनी  निर्मित धारणाओं पर होता है। केवल ज्ञान जमा करना, भजन करना, मंदिर जाना, तीर्थों में जाना, प्रवचन सुनना पर्याप्त नहीं है। अगर हमने उसे जीवन में नहीं उतारा, तो हम वैसे हो नहीं  सके। कथनी होकर रह गई, करनी में परिणत नहीं हो सकी। हमें प्रतिस्पर्द्धा के बजाय सहयोग का रास्ता चुनना होगा।  हमने अपने साँचे (मौल्ड्स) बना रखें हैं, काट-छांट कर, तोड़-मरोड़ कर सब उसी में ढालते हैं। और अगर नहीं ढलते हैं तो उन्हें अस्वीकार कर देते हैं। अगर कोई सिद्धान्त का पक्का होता है तो वह सपने देखने वालों को, अलग-अलग प्रयोग करने वालों को स्वीकार नहीं कर पाता। वह जो छोटी-छोटी बातों को भी महत्व देता है वह सिद्धांतवादी को स्वीकार नहीं कर पाता और उनकी परवाह नहीं करता। चाहे उनमें और दूसरे सद्गुण हों उसका तिरस्कार कर देता है। यही है मानव का स्वभाव। उससे बाहर निकलना होगा। जो जैसा है उसे ही स्वीकार करना सीखना होगा।  

          दिक्कत यही है कि हमें पता ही नहीं चलता है कि हमारा निर्णय किस पर आधारित है। हमारा अभिमान इतने सूक्ष्म तरीके से हमारे निर्णयों को प्रभावित करता है कि न तो हम समझ पाते हैं न ही सहमत कि यह निर्णय किसी अभिमान पर, किसी पूर्वाग्रह पर आधारित है। अपने विचारों को, निर्णयों को अपने अभिमान की दृष्टि से न देख कर दैवीय दृष्टि दे देखें। अपनी अभिमान से बने फिल्टर्स  (छलनियों) से न छान कर इन दैवीय फिल्टर्स से छानें - हमारा निर्णय सच्चाई और निष्कपटता से आ रहा है या इसमें झूठ और कपटता है, विनम्रता है या कठोरता है, कृतज्ञता है या कृपणता है, साहस है या डर है, प्रगति है या अवनति है, ग्रहणशीलता है या तिरस्कार है, अभिप्सा है या अनिच्छा है, अच्छाई है या बुराई है, उदारता है या कृपणता है, शांति है या कलह है, समानता है या असमानता है, मेहनत है या आलस्य है, यह हमारे लिए अच्छा है या फायदेमंद है। यह बड़ा कठिन प्रतीत होता है लेकिन एक बार इस पर काम करने लगें तो शीघ्र ही महसूस करेंगे कि यह बड़ा आसान है और निरंतर अभ्यास से स्वतः होने लगेगा। हाँ कहीं से प्रारम्भ तो करना ही होगा। एक बार इन फिल्टर्स का प्रयोग करने लगेंगे तो दिखने लगेगा कि हम अपने निर्णयों में किसकी मिलावट कर रहें हैं, यह कहाँ से आ रहा है। इसमें क्या है, क्या रखना है क्या छोड़ना है। यह हमारे जीवन में, आचार-विचारों में, रहन-सहन में, रंग-ढंग में, चाल-ढाल में, लहजे में साफ-साफ परिलक्षित होने लगेगा। यही है वह संपत्ति जिसे हमने अपने पुरखों से, सभ्यता और संस्कृत से मिली है और इसे ही आगे आने वाली पीढ़ी को देनी है।

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