रविवार, 2 सितंबर 2018

सूतांजली सितंबर २०१८


सूतांजली                            ०२/०२                                    सितंबर २०१८
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क्या सत्य कहा जा सकता है ?

सत्य में कुछ भी काट दिया जाये या कुछ भी बढ़ा दिया जाये तो सत्य न रहे। सत्य बस जितना है उतना ही है। उसमें कुछ भी, थोड़ा भी, जोड़ या घटा दिया जाए, तो सत्य सत्य नहीं रहता।

इसलिए हजारों वर्ष तक ऋषियों ने कोशिश की कि ग्रंथ न लिखे जाएँ। क्योंकि लिखे हुए में वह तो छूट जाएगा, कट जाएगा,  जिसे कहने के लिए यह सब कहा था, यद्यपि इसमें वह कहा नहीं जा सकता। वे खाली रिक्त स्थान तो छूट जाएंगे, और वही थे असली। वेद लिखे गए कोई पाँच हजार वर्ष पहले। लेकिन लिखे जाने के पहले से हजारों वर्षों तक वे अस्तित्व में थे। जो वेद ऐसे विचार को जन्म दे सकते थे, लिखने की कला न खोज पाये हों, यह नासमझी की बात है। वे भाषा न बना पाये हों, लिपि न बना पाये हों, यह पागलपन की बात है।

आग्रह था कि न लिखे जाएँ। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को सीधा ही संक्रमित करता रहे। क्योंकि वह व्यक्ति शब्द भी दे सकेगा और वह शून्य मौजूदगी भी दे सकेगा। किताब जड़ हो जाएगी, शून्य मौजूदगी नहीं दे सकेगी। किताब उनके भी हाथ लगेगी जो कुछ नहीं जानते, अज्ञानी हैं। और किताब अज्ञानी के हाथ लग जाए तो अज्ञानी को इतनी जल्दी ज्ञानी होने का भ्रम पैदा होता है जिसका कोई हिसाब नहीं। अज्ञानी होना बुरा नहीं, अज्ञान में ज्ञान का भ्रम हो जाना बहुत खतरनाक है
ज्ञानी अकर्म से व्यवस्था करता है। उसकी मौजूदगी ही व्यवस्था देती है, उसे कोई कर्म नहीं करना पड़ता। जैसे घर में पिता का आगमन बच्चे को अपने आप व्यवस्थित कर देता है। पिता को कुछ करना नहीं पड़ता। मालिक की मौजूदगी कार्यालय में अनुशासन बनाए रखती है। मालिक को इस के लिए अलग से कुछ करना नहीं पड़ता। ज्ञानी की मौजूदगी सक्रियता है। उसका होना काफी है। जैसे चुंबक हो, तो फिर उसे कुछ करना नहीं पड़ता, लोहे के टुकड़े खींचे चले आते हैं।

आप चाहते हों कि आपके घर में शांति हो, तो उसके लिए कोई नियम मत बनाइये, सिर्फ आप शांत होते चले जाइए। और थोड़े ही दिनों में आप पाएंगे कि घर में अनूठी शांति उतरने लगी है। न मालूम, अन्जान रास्तों से शांति घर में उतरने लगेगी। जिनमें कल तक सब अशांति का उपाय दिखता था, वे भी शांत होते मालूम होने लगेंगे। सिर्फ आप शांत हो जाइए। आपने कहीं कुछ भी नहीं किया, अगर कुछ किया तो सिर्फ अपने भीतर किया।

इस दुनिया में शक्तिहीन ही काम करते हैं, शक्तिशालियों के तो होने से ही काम हो जाता है। जो नहीं जानते, वे ही केवल श्रम करके कुछ कर पाते हैं, जो जानते हैं, वे तो विश्राम से भी कर लेते हैं। जिन्हे पता है, वे तो मौन से भी बोल लेते हैं, और जिन्हे  पता नहीं है, वे लाख लाख शब्दों का उपयोग करके भी कुछ नहीं कह पाते।   
लाओत्से

बोलने से तो सत्य को बोला नहीं जा सकता। और बोलते ही सिद्धान्त विवाद बन जाता है। इसलिए सब सिद्धान्त वाद बन जाते हैं। वाद बनते ही विपरीत वाद निर्मित होता  है। संघर्ष और कलह और संप्रदाय और मत, सारे उपद्रव का जन्म होता है। गांधी ने हर समय कहा गांधीवाद  जैसा कोई वाद नहीं । मेरे पास देने के लिए कोई नया विचार नहीं है, सत्य और अहिंसा उतना ही पुराना है जितना इंसान। गांधी यही कहते थे मेरा जीवन ही मेरा संदेश है

बुद्ध कहते थे कि जो मैं कह सकता था, वह मैंने कहा; लेकिन वह असली बात नहीं है। जो मैं नहीं कह सकता था, वह मैंने नहीं कहा है; वही असली बात है। इसलिए जो मेरे कहने को सुनते रहे हैं वे मुझे नहीं समझ पाएंगे; जिन्होने मेरे न कहने को भी सुना है, वही मुझे समझ सकते हैं। न कहने को जिन्होने सुना है! न कहना भी सुना जा सकता है!

                                                                                        ओशो से प्रेरित
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आदि शंकराचार्य द्वारा आर्यावर्त का गठन

जब सनातन धर्म आडम्बर और कर्मकांड के दल दल में फंसा पाताल में धँसता जा रहा था उसी समय आचार्य शंकराचार्य का, सूर्य के सदृश्य, भारत के क्षितिज पर आगमन होता है। अपने ज्ञान और कौशल से वे सिर्फ सनातन धर्म की पुनर्स्थापना ही नहीं करते बल्कि आर्यावर्त को संगठित कर उसके संचालन की भी व्यवस्था करते हैं। देश के चारों कोनों में चार धाम की स्थापना करते हैं, चार देवी-देवता, चार वेद, चार महा मंत्र तथा चार आचार्यों को प्रतिष्ठित करते हैं और उनके भविष्य में सुचारु रूप से चलते रहने का भी सुप्रबंध करते हैं। 
आदि शंकराचार्य
आचार्य शंकर ने देश को संगठित करने के लिए देश के चारों कोनों में एक-एक मठ की स्थापना की। सबसे पहले उन्होने दक्षिण में तुंगभद्रा नदी के तट पर शृंगेरी मठ की स्थापना की। यहाँ के देवता आदिवाराह, देवी शारदाम्बा, वेद यजुर्वेद और महावाक्य अहं ब्रह्मास्मि’ (मैं ब्रह्म हूँ, बृहदारण्यक उपनिषद १.४.१०, यजुर्वेद) है। सुरेशाचार्य को मठ का अध्यक्ष नियुक्त किया। इसके बाद उन्होने उत्तर दिशा में अलकनंदा नदी के तट पर बदरिकाश्रम (बद्रीनाथ) के पास ज्योतिर्मठ की स्थापना की जिसके देवता श्रीमन्नारायण तथा देवी श्रीपूर्णगिरि हैं। यहाँ के संप्रदाय का नाम आनंदवार, वेद अथर्ववेद तथा महावाक्य अयमात्मा ब्रह्म (आत्मा ब्रह्म है, मांडूक्य उपनिषद १.२ अथर्ववेद), है। मठ का अध्यक्ष तोटकाचार्य को बनाया। पश्चिम में उन्होने द्वारकापुरी में शारदा मठ की स्थापना की जहां के देवता सिद्धेश्वर, देवी भद्रकाली, वेद सामवेद और महावाक्य तत्वमसी (तू वही है, छांदोग्य उपनिषद, ६.८.७, साम वेद) है। इस मठ का अध्यक्ष हस्तमानवाचार्य को बनाया। उधर पूर्व दिशा में जगन्नाथपुरी के पास महानदी के तट पर गोवर्धन मठ की स्थापना की जहां के देवता जगन्नाथ, देवी विशाला, वेद ऋग्वेद और महावाक्य प्रज्ञान ब्रह्म (ज्ञान ब्रह्म है, ऐतरेय उपनिषद ३.३, ऋग वेद) है। यहाँ उन्होने हस्तामलकाचार्य को मठ का अध्यक्ष बनाया। इस प्रकार शंकराचार्य ने अपने सांगठिक कौशल से सम्पूर्ण भारत को धर्म एवं संस्कृति के अटूट बंधन में बांध कर विभिन्न मत-मतांतरों के माध्यम से सामंजस्य स्थापित किया और एक सूत्र में पिरोया।

शुक्रवार, 3 अगस्त 2018

सूतांजली, अगस्त २०१८



सूतांजली                ०२/०१              अगस्त २०१८                                               ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
पहला वर्ष

और देखते ही देखते पहला वर्ष बीत गया। इस माह से हमने दूसरे वर्ष में प्रवेश किया है। जब यात्रा प्रारम्भ की थी, भरोसा नहीं था कि दूसरा वर्ष देख पाएंगे। यह तो आपलोगों का सहयोग एवं उत्साहवर्द्धन ही है कि हम केवल अपना वजूद बनाये रखने में ही सक्षम नहीं रहे बल्कि हमने विस्तार भी पाया है, आगे बढ़ते जा रहे हैं। अब तो आगे बढ़ रहे हैं कहने में भी डर लगता है। जैसे रंगों का, व्यक्तियों का, नारों का, गीतों का, पत्रों का राजनीतिकरण हो चुका है वैसे ही आगे बढ़ रहे हैं भी राजनीतिज्ञों का ही जुमला हो गया है। यही कहना ठीक है, पहला कदम ही महत्वपूर्ण है। कदमों की शृखंला उसके पीछे अपने आप बनने लगती है। गांधी ने जब दांडी यात्रा शुरू की तो उनके साथ तो गिने चुने ही लोग थे। देश तो उनके पीछे अपने आप हो गया।

सूतांजली के संबंध में कई अलग अलग सुझाव मिले। इसके स्वरूप को बड़ा करने का सुझाव भी मिला, लेकिन कइयों का मत था कि इसका वर्तमान स्वरूप ही इसे विशिष्ट पहचान देता है, अत: ऐसा ही रखा जाय। इस माह से हमने केवल इसके अक्षरों का आकार थोड़ा बड़ा किया है। वर्तमान में यह पत्र अंतर्देशीय पत्र में छाप कर भेजा जा रहा है। कुछ लोगों को उनके मेल पर भेजा जाता है।  इस माह से हमने एक नया घर बनाया है - www.sootanjali.blogspot.com हमारे पुराने पत्र यहाँ उपलब्ध हैं। आने वाला हर पत्र भी वहाँ उपलब्ध रहेगा, ज्यादा सामाग्री और लिंक के साथ। आपकी इच्छानुसार सूतांजली पत्र या मेल या दोनों रूपों में आपके पास भेजी जा सकती है। इसमें कोई भी बदलाव चाहते हों तो हमें sootanjali@gmail.com पर मेल करें या ९४३२२९५२५० पर संदेश भेजें। अपना पूरा नाम तथा ठिकाना जरूर से लिखें। और एक बात, अगर आप चाहते हैं कि सूतांजली आपके किसी परिचित को भी भेजी जाय तो हमें उन्हे भी भेजने में खुशी होगी। कृपया उनका विवरण (नाम एवं ठिकाना) भेजें, उपरोक्त मेल या फोन पर।  

सूतांजली के लिए आपके पास कोई भी सामाग्री हो तो अवश्य भेजें। सुझाव हो तो जरूर बताएं। हम उस पर विचार करेंगे। आपके सहयोग के लिए एक बार फिर आभार।                                                           संपादक
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संस्कृति एवं संस्कार

“और संस्कार”?
“क्या होता है ये, आपका संस्कार? किसे कहते हैं संस्कार”?
“वह ज्ञान जिसे हम पूर्वजों से, परिवर से, समाज से, आड़ोस-पड़ोस से, उनकी बातों से, उनके तौर तरीकों से सीखते हैं”?
“बस रहने दीजिये आपका वो परिवार, समाज, पड़ोस। परिवार वाले हमारे लिए खड्डा खोदने मे कोई कसर नहीं छोड़ते, समाज पूरी तरह दक़ियानूसी और रूढ़िग्रस्त है, पड़ोस झाँकने भी नहीं आता। यही है न आपके संस्कार की पाठशाला”?
“मेरी सुनो तो कहूँ”।
“हाँ हाँ, कहिए न, क्या कहना है आपको”?

“मैं इतना कुछ नहीं जानता हूँ। लेकिन हाँ मेरा बेटा विदेश में रहता है। कुछ समय पहले उसने भारत में भारतीय पद्धति से विवाह किया। विवाह के बाद दोनों, बेटा और बहू, विदेश चले गए। लेकिन बहू को उस देश के नियमों के तहत कुछ महीने बाद ही कुछ समय के लिए वापस आना पड़ा। आवश्यक कार्यवाही पूरी होने पर वह वापस चली गई। जाने के पहले सासू माँ के साथ कपड़े खरीदने बाजार गई। विदेशी परिधान के साथ-साथ भारतीय पोशाक भी खरीद रही थी। सास को आश्चर्य हुआ, “क्या ये पोशाकें वहाँ चलती हैं”?
“नहीं, लेकिन जब आप और बाबा वहाँ आएंगे तो आपलोगों के सामने मैं विदेशी पोशाक पहन कर नहीं घूमूंगी”।
“.........”
“तो आपका मतलब यह कि भारतीय पोशाक पहनना ही संस्कार है”?

“कुछ समय पहले स्काइप पर उन्ही बेटे-बहू से कुछ बातें कर रहे थे। कुछ देर में बेटा उठ कर चला गया लेकिन बहू बात करती रही। थोड़ी देर बाद दिखाई पड़ा कि बेटा कहीं बाहर जाने के लिए तैयार हो कर आया। हमने पूछ कहीं बाहर जा रहा है?’ बहू ने बताया कि हमलोगों का मूवी जाने के कार्यक्रम था। हमने तुरंत कहा, था मतलब, कहा क्यों नहीं? जाओ तुम भी जल्दी से तैयार हो जाओ और बात समाप्त कर लाइन काट दी।
“आपसे अपनी बात कहने की हिम्मत न होना ही संस्कार है”?

 “नहीं, इनमें से कोई भी संस्कार नहीं है। लेकिन इन घटनाओं में आपसी सम्बन्धों को जोड़ने वाला वह पतला सा धागा जो न दिखाई पड़ता है न दिखाया जा सकता है, वह भावना जो न बताई जा सकती है न समझाई जा सकती है, वह समझ जो उस धागे को देखने की शक्ति प्रदान करती है वही संस्कार है। यह समझ कि मैं सिर्फ मैं नहीं हूँ, बल्कि मैं से बहुत ज्यादा व्यापक एक परिवार हूँ, समाज हूँ, गाँव-शहर-देश-विश्व-ब्रह्मांड और इन सबसे ऊपर मानव हूँ। यह दृष्टि जो बिना पढ़े, बताए, समझाये मिलती है, उसे संस्कार कहते हैं। संस्कार हमें केवल अपने अधिकारों से नहीं बल्कि अपने उत्तरदायित्वों से रूबरू करवाता है। संस्कार और संस्कृति ज़िम्मेदारी संभालने के लिए है, अधिकार प्राप्त करने के लिए नहीं’”हर समय बदलते रहने में न बदलने वाली चीज संस्कृति है। उसे देखने वाली दृष्टि संस्कार है।   
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ब्लॉग / मेल विशेष

जब बच्चे के विवाह का प्रसंग आता है तो हम कहते हैं हमें तो पढ़ा लिखा लेकिन संस्कारी बच्चा चाहिए। अगर बच्चा ऑक्सफोर्ड-हारवर्ड से पढ़ा लिखा हो, फर्राटे दार अँग्रेजी बोलता हो, स्थानीय भाषा भी बोलता हो, गाड़ी चलाता हो, दफ्तर में काम करता हो, CEO बनने वाला  हो। तो उसका स्टेटस तो बहुत अच्छा है, लेकिन हम तो कह देंगे कि नहीं नहीं हमें तो संस्कारी बच्चा चाहिए। तो क्या उसमें संस्कार नहीं है? क्या वह जंगली है? यही भाषाओं और विचारों का अंतर है। जिसे हम मूल्यवान समझते हैं और संस्कारी मानते हैं। यानि कि जो हमारी परंपरा में रचा-बसा हो, वो जो हमारे परिवार में भी जुड़ सके वह हमारे लिए संस्कारी है। यानि जो अपनी परंपरा से जुड़ा है वह संस्कारी है। वह जो हमारी परंपरा से जरा भी जुड़ा न हो उसे हम अ-संस्कारी तो नहीं लेकिन हाँ आधुनिक कहेंगे।  इन  दोनों में  खाई है और घर्षण भी है। ऐसा नहीं है कि उच्च शिक्षित बच्चा संस्कारी नहीं या संस्कारी बच्चा उच्च शिक्षित नहीं हो सकता। होता यह है कि एक संस्कारी लेकिन साधारण पढ़ा लिखा बच्चा अपने कर्तव्य बोध से दबा रहता है और अपने अधिकारों के प्रति उदासीन। वहीं शिक्षित बच्चा कार्यालय में कार्यरत बॉस के अस्तित्व को स्वीकार करता है, उसके अनुरूप मर्यादा में रहता है, तथा अपने पद के अनुसार अपने अधिकारों के साथ साथ अपने जिम्मेदारियों के प्रति ज्यादा सजग रहता है। अधिकारों का प्रयोग अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में करता है। यही नहीं उत्तरदायित्व को निभाने के लिए जरूरत पड़ने पर अधिकार को छोड़ भी देता है। लेकिन वही बच्चा जब परिवार में आता है तब यह विस्मृत कर देता है कि यहाँ बॉस और कोई है। वह अपने अधिकारों के प्रति तो सजग होता है लेकिन उत्तरदायित्वों के प्रति उदासीन। समुचित ढंग से अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करने पर  अधिकार स्वत: प्राप्त हो जाते हैं। अधिकार और कर्तव्य के बीच सामंजस्य बना रहे तो न कोई विरोध न कोई घर्षण। संस्कार और शिक्षा ३६ नहीं ६३ हैं, बस समझ का फेर है


शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

सूतांजली, जुलाई २०१८


  सूतांजली                           ०१/१२                     जुलाई २०१८                
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क्या हम समझदार हैं?

चंदामामा। न मैं चाँद की बात कर रहा हूँ न मामा की। मैं बात कर रहा हूँ उस पत्रिका की जिसे हमारे मोहल्ले का हर बच्चा बड़े चाव से पढ़ा करता था, अब से करीब ३०-४० वर्ष पूर्व। इसका प्रकाशन देश की अनेक भाषाओं में होता था। पत्रिका हमारे घर में आया करती थी और आने के पहले से हम पत्रिका का आरक्षण करवाते थे। कौन, किस समय और किस दिन पढ़ेगा? ताकि सब, मिल बाँट कर थोड़ा थोड़ा पढ़ सकें। बेहतरीन कागज, उत्तम छपाई, रंगीन चित्र। ऐतिहासिक, नैतिक, सामाजिक, धार्मिक, लघु एवं धारावाहिक कहानियाँ। चंदामामा का प्रत्येक अंक सँभाल कर रखते थे। और फिर, कुछ समय के बाद उसका ऑपरेशन होता था। प्रत्येक पन्ने को बहुत सँभाल कर अलग अलग करते, विषयानुसार एवं धारावाहिक कहानियों को अलग एक साथ कर उन्हे मंढाया जाता। फिर हम बच्चों के पुस्तकालय में  जमा कर लिया जाता था। इसकी सबसे ज्यादा मांग रहती। हम बच्चों को इस चंदामामा ने कितना कुछ दिया – सिखाया इसका आकलन करना आसान नहीं है। दर्द यह है कि यह या ऐसी कोई दूसरी पत्रिका अब उपलब्ध नहीं है।

प्रस्तुत है इसी पत्रिक में पढ़ी एक लघु कहानी। एक गाँव में तीन भाई रहते थे। तीनों वैद्य थे। सबसे बड़ा भाई साधारण वैद्य। उसे गाँव के बाहर कोई नहीं जानता था। मंझला भाई उत्तम वैद्य था। उसे दिखाने आसपास के कई गावों से मरीज  आया करते थे। लेकिन सबसे छोटा भाई श्रेष्ठ वैद्य था। दूर दूर से लोग उससे इलाज कराने आते थे। उसकी ख्याति सुन कर शहर के एक पत्र के संवाददाता उनसे मिलने पहुँच गए। बात-चीत के दौरान उस वैद्य ने बताया कि सही अर्थों में सबसे बड़ा भाई श्रेष्ठ वैद्य है और वह स्वयं एक साधारण वैद्य है। उसकी बात सुन कर संवाददाता हैरान रह गया। छोटे भाई ने समझाया, बड़ा भाई नाड़ी  परीक्षण तथा रोगी के लक्षण देख कर ही आसन्न रोग समझ लेते हैं। अत: आरंभ में ही हलकी-फुलकी औषधि या खान पान में उलट फेर कर उसका निराकरण कर देते हैं।  गाँव में घूमते हुए ही व्यक्ति के लक्षण देख कर बिना पूछे ही उसे सलाह दे, उसके आने वाले रोग को वहीं रोक लेते हैं। मंझले भाई को थोड़ा कम समझ में आता है। जब तक रोग कुछ ज्यादा बढ़ नहीं जाता और उसके लक्षण प्रगट नहीं होते, वह सही निदान नहीं कर पाता है। अत: उसे जड़ी-बूंटियों का लंबे समय तक सेवन करवाना पड़ता है। और मैं तो जब रोग बहुत बढ़ कर असाध्य हो जाता है तभी निदान कर पाता हूँ। इस कारण मुझे कई बार शल्य चिकित्सा का सहारा लेना पड़ता है। लोग इन बातों को समझते नहीं है। लोगों के अज्ञान पर ही मेरी वैद्यगिरी चल रही है नहीं तो कोई मुझे पूछे भी नहीं।

आज के इस आधुनिक युग में क्या हम इन्टरनेट के बिना दुनिया की कल्पना कर सकते हैं? लेकिन इन्टरनेट आया कहाँ से, किसने बनाया, कौन करता है इसका रख रखाव? हमने कभी जानने की कोशिश की? और इस इन्टरनेट के लिए हमें न तो कोई मूल्य देना पड़ता है और न  ही कहीं, कभी कोई पंजीकरण करना पड़ता है। लेकिन फिर भी हमें यह उपलब्ध है २४ X, बिना किसी छुट्टी के। कभी भी रख-रखाव के लिए भी बंद नहीं। ISP (इंटरनेट प्रदान करने वाली कंपनियाँ) हमें इंटरनेट नहीं देतीं वे हमें केवल उससे जोड़ भर देती हैं। बनाने वाले ने बनाया और विश्व को समर्पित कर दिया – बिना नाम एवं दाम के

हम विकिपीडिया का भी प्रयोग करते हैं। इन्टरनेट पर उपलब्ध जानकारी का असीमित भंडार। पूरा इनसाइक्लोपीडिया। लेकिन बिना किसी मूल्य के और फिर वही २४X, बिना किसी छुट्टी के। दुनिया के हर देश में, हर कोने में और अनेक भाषाओं में उपलब्ध है। इतना ही नहीं  निरंतर नई जानकारियाँ जोड़ने का कार्य भी चलता रहता है।  लेकिन इसे किसने बनाया? कौन करता है इसका रख रखाव? इसमें सब जानकारी कौन और कैसे डालता है?  क्या इसके प्रयोग के लिए किसी को भी  कोई मूल्य देना या पंजीकरण कराना पड़ता है? हम बेखबर हैं। इसे भी बनाने वाले ने बनाया और मानव को  समर्पित कर दिया – बिना नाम एवं दाम के

कम्प्युटर का बटन दबाते ही हमें सबसे पहले जो दिखाई पड़ता है वह है विंडो। आप समझ रहे हैं, मैं खिड़की की बात नहीं कर रहा हूँ में उस सॉफ्टवेयर की बात कर रहा हूँ जिसके बिना हमारा कम्प्युटर चल नहीं सकता। यह या तो हमें चोरी करना पड़ता है या खरीदना पड़ता है। बनाने वाले ने इससे बिलियन की कमाई की और उसमें से मिलियन का दान किया है। बनाने वाले को बच्चा बच्चा जानता है। ऐसा कौन सा विश्वविद्यालय है जहां इसकी सफलता की कहानी नहीं पढ़ाई गई हो? बनाने वाले ने बनाया और दुनिया भर में बेचा – नाम और दाम के साथ।

सत्य की गति बड़ी सूक्ष्म है। जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वह समझते नहीं। 

पवित्र-पाप जो सच्चा-पुण्य है

क्या आपने महाभारत पढ़ी है? आसान नहीं है इस ग्रंथ को पढ़ना। विशाल ग्रंथ है। इसे आद्योपांत पढ़ने के लिए समय भी चाहिए और धैर्य भी। ग्रंथ में कई बातें बार बार दोहराई गई हैं, यथा, “धर्म की गति बड़ी सूक्ष्म है”। यानि दैनिक जीवन में क्या धर्म है और क्या अधर्म यह समझना आसान नहीं है। जीवन में कई बार ऐसे प्रसंग आते हैं  जिन्हे ऊपरी तौर पर देखने से अधर्म प्रतीत होता है लेकिन सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर उसमें से धर्म की खुशबू आती है। कई बार हम इसे सूंघ लेते हैं लेकिन कभी भ्रमित भी हो जाते हैं और सही निर्णय नहीं ले पाते कि क्या पाप है और क्या पुण्य।

कभी-कभी किसी काम को करते वक्त मनुष्य एक अजीब-सी दुविधा में पड़ जाता है, सोचता है कि वह जो करने जा रहा है वह पाप है अथवा पुण्य। निर्णय मनुष्य को अपने विवेक से करना पड़ता है। जिसको हम पाप समझते हैं कभी वह भी पवित्र होता है और किसी पुण्य से कम नहीं होता। ऐसा ही एक प्रसंग एक प्रसिद्ध नेता ने सुनाया था। उन्होने बताया कि, कभी-कभी सार्वजनिक अभिनंदन के मौके पर एक व्यक्ति को ढेर सारे लोग सम्मानित करने और माला पहनाने लगते हैं, तब ऐसा भी होता है कि उसे पहले से पहनाई गई माला को दुबारा उठाकर दूसरा व्यक्ति फिर से पहना देता है। हालांकि यह बात साधारण नजर में नहीं आती है, मगर आ जाए तो अच्छा नहीं माना जाता है

वे आगे बोले, चेन्नई के एक प्रसिद्ध मंदिर में रोज हजारों लोग दर्शन करने जाते हैं।  दर्शनार्थियों की भीड़ लगी रहती है। वहाँ एक दिन मेरा भी जाना हुआ। साथ में एक स्थानीय सज्जन भी थे। मंदिर के बाहर फूलों की कई दुकानें थीं, जिनमें रंगीन आकर्षक फूलों की मालाएँ लटक रही थीं। मैंने अपने साथ के सज्जन से कहा कि हमें भी एक अच्छी सी माला लेनी चाहिए। कह कर एक फूल  की बड़ी दुकान की तरफ अपने कदम बढ़ा दिये। 
साथ वाले सज्जन ने मुझे रोका और कहा, यहाँ नहीं, हम उस तरफ फूल माला लेते हैं। कहकर उन्होने अंगुली से एक बुढ़िया की  तरफ इशारा किया जो टोकरी में कुछ मालाएँ लेकर जमीन पर बैठी थी।
मैंने धीरे से एतराज किया, वहाँ क्यों, किसी अच्छी दुकान से माला लेते हैं, भगवान को चढ़ानी है तब पैसे की तरफ नहीं देखना चाहिए
उन सज्जन ने कहा, पैसे की बात नहीं है, कोई और बात है। इन बड़ी दुकानों में नए फूल की माला बिकती है, और यह बुढ़िया मंदिर में से भगवान को चढ़ायी हुई माला ले आती है और उसे बेचती है। यहाँ आने वाले ज़्यादातर लोग इस बात को जानते हैं, और उससे कोई माला नहीं खरीदता है
सुनकर मुझे घोर आश्चर्य हुआ, चंद पैसों के लिए आप ऐसा क्यों करते हैं?’
वे बोले, मैं उस बुढ़िया को भी उतने ही पैसे देता हूँ, जितना बड़ी दुकानों मे लगता है
मगर, भगवान को चढ़ाये हुए फूलों को दुबारा चढ़ने से पाप नहीं लगता है’?
वे सज्जन बोले, “पाप और पुण्य की बात मैं नहीं जानता हूँ, मैं तो बस इतना जानता हूँ कि मेरे जैसे चंद लोग इस बुढ़िया से माला खरीद लेते हैं तब इसकी दो रोटी का इंतजाम हो जाता है। यह बुढ़िया किसी से भी एक पैसा दान नहीं लेती है”।

सुनकर मैं सोचने को मजबूर हो गया कि क्या भगवान को चढ़ाये हुए फूलों को उस बुढ़िया से खरीदना पाप था या कि एक पवित्र-पाप जो सच्चा पुण्य होता है।
रिलीफ़, फरवरी २०१८

बुधवार, 6 जून 2018

सूतांजली जून २०१८


  सूतांजली                              ०१/११                       जून २०१८
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बा का जन्म किस दिन हुआ, यह जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन वे  बापू से एक वर्ष बड़ी थीं। बापू की १५०वीं जयंती हम अगले वर्ष मनाएंगे। मतलब, बा का १५०वां जयंती वर्ष चल रहा  है। बापू महिलाओं को अपने संग्राम में जोड़ना चाहते थे और इसके लिए सबसे बड़ी चुनौती थी बा को मनाना। बा बहुत सरल और कोमल हृदय महिला थीं लेकिन साथ ही अपने इरादों की पक्की। उन्हे मनाना आसान काम नहीं था। बापू ने उन्हे कैसे जोड़ा और वे कैसे जुड़ीं?  बा को समर्पित है श्री विष्णु प्रभाकर का लिखा यह प्रसंग।

दक्षिण अफ्रीका में एक दिन बा रसोईघर में कुछ बना रही थीं। गांधीजी कुछ और काम कर रहे थे। सहसा उन्होने कस्तूरबा से पूछा, “तुझे पता चला या नहीं”?
बा उत्सुक स्वर में बोली, “क्या”?
गांधीजी ने हँसते हुए कहा, “अब तक तू मेरी विवाहिता पत्नी थी, लेकिन अब नहीं रही”।
बा ने चकित होकर उनकी ओर देखा और पूछा, “ऐसा किसने कहा? आप तो रोज नई नई बातें खोज निकालते हैं”।
गांधीजी बोले, “मैं कहाँ खोज निकालता हूँ। वह जनरल स्मट्स कहता है कि ईसाई विवाहों की तरह हमारा विवाह सरकारी अदालत के रजिस्टर में दर्ज नहीं हुआ है, इसलिए वह गैर कानूनी माना जाएगा और तू मेरी विवाहिता पत्नी नहीं, बल्कि रखैल मानी जाएगी”।
बा का चेहरा तमतमा उठा। बोली, “उनका सिर! उस निठल्ले को तो ऐसी ही बातें सूझा करती हैं”।
गांधीजी ने पूछा, “लेकिन अब तुम स्त्रियाँ क्या करोगी”?
बा बोलीं, “आप ही बताइये, हम क्या करें”?
गांधीजी जैसे यही सुनने के लिए तैयार बैठे थे। तुरंत बोले, “हम पुरुष जिस तरह सरकार से लड़ते हैं वैसे ही तुम स्त्रियाँ भी लड़ो। अगर तुम्हें विवाहिता पत्नी बनना हो और अपनी आबरू प्यारी हो तो तुम्हें भी हमरी तरह सत्याग्रह करके जेल जाना चाहिए”।
बा ने अचरज से कहा, “मैं जेल जाऊँ? औरतें भी कभी जेल जा सकती हैं”?
“औरतें जेल क्यों नहीं जा सकती? पुरुष जो सुख दुख भोगेंगे वे स्त्रियाँ क्यों नहीं भोग सकती? राम के साथ सीता, हरिश्चंद्र के साथ तारामती और नल के साथ दमयंती, इन सभी ने वनों मे अपार दुख सहे थे”, गांधी ने कहा।
बा बोली, “वे सब तो देवताओं जैसे थे। उतनी शक्ति हममें कहाँ”?
गांधीजी ने उत्तर दिया, “हम भी उनके जैसे आचरण करें तो देवता बन सकते हैं। मैं राम बन सकता हूँ और तू सीता बन सकती है। सीता राम के साथ न गई होती, तारा हरिश्चंद्र के साथ न बिकी होती और दमयंती ने नल के साथ कष्ट न उठाए होते तो उन्हे कोई भी सती नहीं कहता”।
यह सुनकर बा कुछ देर चुप रही। फिर बोली, “तो फिर आपको मुझे जेल भेजना ही है। जाऊँगी मैं, जेल भी जाऊँगी। लेकिन जेल का खाना क्या मुझे अनुकूल आयेगा?”
गांधीजी बोले, “जेल का खाना अनुकूल न आए तो वहाँ फलों पर रहना”।
बा ने पूछा, “जेल में सरकार मुझे फल खाने देगी”?
गांधीजी ने कहा,  “न दे तो उपवास करना”।
बा हंस पड़ी, “ठीक है, यह आपने मुझे मरने का अच्छा रास्ता बता दिया। अगर मैं जेल गई तो जरूर मर जाऊँगी”।
गांधीजी खिलखिला पड़े और कहा, “हाँ-हाँ। तू जेल में  जाकर मरेगी तो मैं जगदंबा की तरह तेरी पूजा करूंगा”।
बा दृड़ स्वर में बोली, “अच्छा, तब तो मैं जेल जाने को तैयार हूँ”।

उस समय कौन जानता था कि बा-बापू होनी की ही बात कर रहे थे। २२ फरवरी १९४४ को संध्या ७.३५ पर आगाखान महल की कारा में ही बा ने देह त्याग किया।
गांधी अभी हारे नहीं हैं?
बाहुबली का जमाना है। सब अपनी अपनी शक्ति,  शक्ति यानि हथियार या धन, बटोरने में लगे हैं। जिसके पास ज्यादा शक्ति वही सर्वशक्तिमान। उसी की चलती है। जिसकी लाठी उसकी भैंस। सत्य हो या अहिंसा, शिक्षा हो या धर्म सब इसी के सामने घुटने टेकते हैं। गांधी? हाँ, कहने सुनने में भले  ही अच्छा लगता हो, सत्य-अहिंसा, लेकिन अब उसका क्या काम? इन सबसे कुछ होनी जानी नहीं  है। जब तक लाठी नहीं पड़ती अक्ल ठिकाने नहीं लगती। बंदूक कनपट्टी पर रखो या जेब गर्म करो तब सब काम खुद-ब-खुद हो जाते हैं, नहीं तो घिघियाते रहो, हाथ जोड़ते रहो कुछ नहीं होता।

मेदिनीपुर, बंगाल। जन-जाति का शिकार करने का त्योहार। ५००० जन जाति के लोग लाठी, कुल्हाड़ी, तीर-कमान लेकर तैयार खड़े हैं जंगल में घुसने के लिए। उन्हे अपने रीति-रिवाज का पालन करना है। इस त्योहार पर शिकार करना है। उनके सामने खड़े हैं ३०० वन विभाग के अधिकारी और पुलिस। उन्हे शिकार करने से रोकने के लिए। उनका नेतृत्व कर रही हैं, अतिरिक्त जिला वन विभाग अधिकारी (additional divisional forest officer) श्रीमती पूरबी महतो। किसी भी समय लाठी चलाने का हुक्म दिया जा सकता है। और इसके बाद क्या परिस्थिति रहेगी कोई नहीं जानता। क्या इतने से उन्हे रोक पाएंगे? या फिर अश्रु गैस, गोली, गिरफ्तारी, आगजनी का माहौल बनेगा? लेकिन यह क्या? अचानक श्रीमती महतो आगे बढ़ती है और शिकार
टेलीग्राफ में प्रकाशित रिपोर्ट
पर आमादा जन जाति के अगुआ दिनेन हेम्बरम के पैरों पर गिर पड़ती है। उसके पैरों को पकड़ कर उन्हे सब समझाती हैं और फिर पूरे दृड़ निश्चय के साथ कहती हैं कि इन सबके बाद भी अगर आप शिकार करना चाहते हैं तो उसके पहले अपने तीर कमान से उसे मार डालें फिर जाएँ। और देखते ही देखते पूरा दृश्य बदल जाता है। बिना एक लाठी चलाये
, अश्रु गैस छोड़े, गोली दागे ५००० की भीड़  छंट  जाती है। न वन विभाग के इतिहास में ऐसा हुआ और न ही उस जन जाति के इतिहास में। जहां श्रीमती महतो यह कहती हैं कि उनके १७ वर्ष की नौकरी में ऐसा पहली बार हुआ है वहीं दिनेन कहते हैं कि हम पहली बार अपनी मर्जी से वापस लौट रहे हैं।

 कमी है अपने विश्वास की, आत्मबल की। अपना अहंकार हम पर हावी हो जाता है और झुकने से इंकार कर देता है। और तब प्रारम्भ होती है हिंसा। कौन है बाहुबली? हिंसा या अहिंसा!
क्या पढ़ें
प्रदीप भट्टाचार्य का उपन्यास मगरमुंहा
“हमारे अकेले के करने से क्या होगा?” का उत्तर है यह उपन्यास। यह आख्यान है एक ऐसे साधारण युवक शिक्षक की जिसने देश की तीन सबसे ताकतवर वर्ग -  राजनीतिक, धार्मिक और औद्योगिक - से बिना जुड़े समाज एवं शहर में रचनात्मक बदलाव का सफलता पूर्वक आगाज किया।  किसी से सहायता मांगने नहीं गया। सब खुद-ब-खुद सहायक बन गए।
ब्लॉग विशेष
अनुपम भाई, उस गांधीवादी परंपरा के खाँटी वारिस हैं, जिसमें रचनात्मक काम को ज्यादा और विचार-पक्ष को कमतर महत्व का माना गया। गांधी ने अपने काम-धाम में और अपने साथ के लोगों में श्रम-साधना को प्रमुखता दी! कहा कि लोगों के बीच जाओ, शिक्षक बनना बंद करो, ज्ञानी बनना बंद करो, सीखो और काम करो। तो एक काम की दुनिया है और एक ज्ञान की दुनिया है। एक लोक ज्ञान है और एक विशेषज्ञों का ज्ञान है। क्या इस दो दुनियाओं के बीच संवाद सेतु बनाए जा सकते है?

अनुपम भाई के देहावसान पर “गांधी मार्ग” का जनवरी-अप्रैल २०१७ का अंक उन्हें समर्पित था। उसी अंक में पंकज पुष्कर का प्रकाशित लेख “लोकशक्ति को माना लोकबुद्धि को नहीं”। 




गाँधी 150

रविवार, 13 मई 2018

सूतांजली, मई २०१८


 सूतांजली                       ०१/१०                                                            मई, २०१८

४ लाख - करोड़ - अरब की गलीच जिंदगी

अभी कुछ समय पहले मासिक पत्रिका अहा!जिंदगी में ऋतु रिचा की लिखी कहानी गलीच जिंदगी पढ़ी। कहानी कोई खास नहीं है लेकिन लिखी बड़ी प्रभावोत्पेदक ढंग से है और इसलिए प्रभावित करती है।

कहानी तो बस इतनी ही है कि एक बच्चा अपनी सौतेली माँ के व्यवहार से तंग आकर घर छोड़ कर भाग जाता है और शनै: शनै: एक भिखारी बन जाता है। रोज सुबह सुबह उठ कर नियत जगह पर जाकर बैठना और भीख मांगना। दिन भर झींकन, चिड़चिड़ाना, झुञ्झुंलाना और कोसना। मन में तमन्ना कि कुछ रुपये जमा हों तो कुछ अच्छा पहने और खाये। नहीं तो वही चिथड़े पहनना और जूठन खाना। बस ऐसे ही अचानक एक दिन भीख मांगते मांगते वहीं लुढ़क गया और फिर कभी नहीं उठा। पुलिस आई, लाश को ठिकाने लगाई और उसके झोंपड़े की साफई की। वहाँ जमीन में दबी एक थैली मिली, बहुत भारी। खुचरे रुपयों और रेजगारी से भरी। थाने ले जाकर गिना गया तो पूरे ४ लाख रुपए निकले।

पहले पढ़ी या सुनी हुई है न! थैली मिली पढ़ते ही पूरी बात भी शायद समझ गए होंगे। कोई आश्चर्य की बात नहीं है, कुछ नया भी नहीं। बहुत हुआ तो एक बड़ा सा नि:स्वाश, और शायद एक गाली भी, ये ४ लाख का कंगाली!!! 

लेकिन ठहरें, जरा नजर उठा कर अपने समाज को देखें, आड़ोस – पड़ोस को देखें, गाँव-कस्बा- शहर पर नजर डालें। क्या आपको ४ लाख ही नहीं ४ करोड़ और ४ अरब के कंगाली दिखाई पड़ रहे हैं? अकूत धन, लेकिन फिर भी सुबह उठने से रात देर सोने तक दोनों हाथों से बटोरने में लगे लोग दिखे? दिन भर झींकन, चिड़चिड़ाना, झुञ्झुंलाना, कोसना और सोचना कि कुछ रुपए हाथ आ जाए तो .......... करूँ। यूं ही सोचते, कहते, करते अचानक एक दिन लुढ़क जाना। दिखे ऐसे लोग? कहीं आप भी तो उनमें एक नहीं?

खुल कर मुस्कुराएं, प्रसन्न रहें, आशीर्वाद दें, मुक्त हस्त बांटे और उन्मुक्त हो कर जीयें। और फिर जीयें ४ लाख में ४ खरब की खुशहाल जिंदगी।

हाँ, है मुझ में दम

गांधीजी की पुण्य तिथि पर गांधी शांति प्रतिष्ठान में २०१४ में आयोजित एक सभा को सम्बोधित करते हुए श्री गोपाल कृष्ण गांधी ने कहा था, “आज कोई यह नहीं क़हता कि भाई मुझ से गलती हुई है। मैं अपनी गलती कुबूल कर रहा हूँ। आगे मैं अपने आप को सुधारने की कोशिश करूंगा। .... आज हर राजनीतिक हैसियत, राजनीतिक दल और साथ ही वे भी जो अपने को सामाजिक आंदोलन का कर्ता धर्ता मानते हैं – ये सब हिमालय जैसी भूलें कर रहे हैं, पर इनमें से एक भी अपनी गलती मानने को तैयार नहीं”। उन्होने आगे कहा, “गाँधी में चार चीजें ऐसी थीं, जो उन्हे एकदम अनूठा बनाती थीं: उन्हे मृत्यु का भय नहीं था,  पराजय का भय नहीं था,  कहीं कोई उन्हे मूर्ख नहीं मान  ले - इसका उन्हे डर नहीं था और  चौथी बात, सबसे महत्वपूर्ण यह कि उन्हें अपनी गलती स्वीकार करने से डर नहीं था। आज इन चारों बातों को अगर हम मापदंड के तौर  पर लें और पूछें कि कौन है जो इस  मापदंड पर खरा उतरता है तो बहुत कम लोग मिलेंगे। इसी में  हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है”।

मनुष्य से गलती होना स्वाभाविक है। लेकिन अपनी गलती को स्वीकार न करना, अपराध है। यह मानव को पशु तुल्य बनाती है। मुझे  याद है, हमें यही शिक्षा दी जाती थी कि जीवन में गलतियाँ होंगी, लेकिन अपनी गलती को स्वीकार करो और उसके लिए दिल से क्षमा मांगो । लेकिन आज हर जगह घर हो या विद्यालय, प्रबंधन संस्थान हो या व्यापार जगत, राजनीति या सामाजिक क्षेत्र ठीक इसकी उल्टी शिक्षा दी जाती है – कभी अपनी गलती स्वीकार मत करो। इसी का यह परिणाम है कि पहले जिसे गलती समझी जाती थी अब वही व्यवस्था बन गई है। बड़े ठसक के साथ हम नियम, कायदे, कानून का उल्लंघन करते हैं और कभी यह मानने को भी तैयार नहीं होते कि हाँ, हमसे गलती हुई है’, क्षमा मांगना तो बहुत दूर की बात है। बल्कि इतना और जोड़ देंगे कि कौन अपनी गलती मानता है?’ पहले “वे” माने तब मैं सोचूँ। अब उनसे पूछें कि यह “वे” कौन कौन हैं? कौन बताएगा? उस वे ने गलती मानी या नहीं, इसका निर्णय कौन करेगा?

लेकिन, निराश मत होइए! जिस नई पीढ़ी को हम कोसते रहते हैं, जिनसे हम कोई आशा नहीं रखते, उसी पीढ़ी ने बीड़ा उठाया है इस शिक्षा को फिर से पटरी पर लाने का और उदाहरण प्रस्तुत करने का। हम और कुछ नहीं तो कम से कम इन नौजवान बच्चों के हिम्मत की दाद तो दे ही सकते हैं। यह तो कह ही सकते हैं “मेरे बच्चों रखना इसे संभाल के”।

क्रिकेट जगत में आस्ट्रेलिया का  अपना एक स्थान है। इसी आस्ट्रेलिया के जाने माने खिलाड़ी और कप्तान स्टीव स्मिथ ने स्वीकार किया, हाँ, मैंने  गलती की और इसका मुझे दुखहै। अपनी भूल के लिए उन्होने  माफी मांगी। पत्रकार सम्मेलन में स्मिथ का मनोबल बढ़ाने के लिए उसके पिता पीटर उसके साथ खड़े थे। भारतीय क्रिकेटर कपिल देव ने 
दैनिक अखबार टेलीग्राफ की खबर

टिप्पणी की, मेरा आदर उनके प्रति ज्यादा है जो अपनी गलती को स्वीकार करते हैं”। स्टीव स्मिथ २८ वर्ष का युवा है। 

व्यापार एवं उद्योग जगत में फ़ेस बुक के मालिक मार्क जुकेरबर्ग एक जाना पहचाना प्रतिष्ठित नाम है। उनके व्यापारिक साम्राज्य का मूल्य कई हजार करोड़ रुपए है। उन्होने भी सबके सामने अपनी गलती स्वीकार की और क्षमा याचना की। अपने गलत कार्य के कारण सुर्खियों में आने के बाद से उनकी कंपनी का मूल्य लगातार गिरता जा रहा था। लेकिन जूरी के सामने अपनी गलती स्वीकार करते ही उनकी कंपनी के शेयर का मूल्य गिरने के 
सन्मार्ग की रिपोर्ट

टेलीग्राफ की रिपोर्ट

बजाय बढ़ना शुरू हुआ। मार्क जुकेरबर्ग ३३ वर्षीय युवा ही हैं।

इस कड़ी में एक भारतीय भी है। राजनीति से जुड़े, दिल्ली के मुख्य मंत्री, अरविंद केजरीवाल। अपनी गलत बयानी और अशोभनीय टिप्पणियों के कारण हर समय  विवादों में घिरे रहे, मानहानि के मुकदमे लड़ते रहे लेकिन आखिर उन्हे भी समझ आई कि लड़ना नहीं बल्कि गलतियों के लिए माफी मांगना ही असली विजय है। और फिर लिखित में अपनी गलती को स्वीकारा और माफी मांग ली। नतीजा – मानहानि के मुकदमे हटा लिए गए। उनका कद छोटा होने के बजाय बढ़ गया। और स्वत: ही अपनी जबान पर काबू भी पा लिया। ४९ वर्षीय अरविंद को भले ही युवा न समझें लेकिन बुजुर्ग के श्रेणी में तो हरगिज नहीं आते।

२०, ३० और ४० के लोगों ने अपनी भूल सुधारने की कोशिश की और गलती स्वीकार की। आवश्यक  है औरों को आगे बढ़ कर कहने की,हाँ, मुझ से गलती हुई, मुखे दुख है, मैं माफी मांगता हूँ आगे से ध्यान रखूँगा कि मुझसे कोई भूल न हो”। अगर गलती की है तो उस पर अड़े रहने के बजाय उसे सुधारें, भूल स्वीकार करें, सही दिशा की तरफ मुड़ें, लोगों को नई राह दिखाएँ।

हम  युवाओं के प्रति अपनी सोच में परिवर्तन करें। हम और उदाहरण पेश करें, गोपाल कृष्ण गांधी  को बता दें कि हम कमजोर नहीं हैं। महात्मा की तरह निडर बनें। है आप में दम? स्टीव स्मिथ, मार्क जुकेरबर्ग और अरविंद केजरीवाल ने तो कहा,हाँ, है मुझ में दम”।


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