मंगलवार, 2 अप्रैल 2019

सूतांजली अप्रैल 2019


सूतांजली                            ०२/०९                                                   अप्रैल  २०१९
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प्रश्न पूछने का हक और फर्ज

अभी कुछ दिन पहले एक कहानी पढ़ी। बड़ा सदमा लगा। अभी तक उस सदमे से उबर नहीं पाया हूँ। सोचा आप से साझा करूँ शायद थोड़ी राहत मिले। यूं तो कहानी लम्बी है लेकिन मैं इसे आपके लिए संक्षिप्त में लिख रहा हूँ –

“पति, पत्नी और ननद देर रात मूवी देख कर निकले तो 1 से ज्यादा का समय हो रहा था। गाड़ी के पास पहुंचे तो  पाया कि टायर पंक्चर है। पति जब तक टायर बदली करता तब तक जगह वीरान हो गई। तीन बाईक पर कुछ लोग पहुँचे,  छुरा दिखा ननद को बाईक पर बैठने कहा। पुरुष ने मुंह मांगे रुपये देने की पेश कश की। लेकिन उन्होने पैसे लेने से इंकार कर दिया पैसे हमारे पास हैं लेकिन हमें अच्छी छोकरी नहीं मिलती, उसी के लिए ये सब करते हैं। पुरुष हतप्रभ, परेशान, सोचने लगा क्या करूँ! तभी युवती के मुंह से हठात निकल पड़ा तुम्हें औरत ही तो चाहिए, मेरी बहन बच्ची है उसे  छोड़ दो मैं तुम्हारे साथ चलती हूँ। युवकों ने युवती को घूरा और यह प्रस्ताव स्वीकार कर  लिया। दूसरी रात पत्नी वापस घर पहुँचा दी गई। पूरा परिवार शोकाकुल और सदमे में। पति लगातार पत्नी के साथ रहा और उसे हिम्मत बंधाता रहा। पूरा परिवार पत्नी के साथ खड़ा था और उसे सदमे से निकालने की कोशिश कर रहा था। तभी कहीं से किसी ने एक प्रश्न किया पत्नी ने कहीं अपनी अतृप्त वासना को शांत करने के लिए तो यह नाटक नहीं किया’? पति को, परिवार को बुरा भी लगा, क्रोध भी आया लेकिन शांत रहे।  इन पर कोई असर न होता देख दूसरा प्रश्न आया कहीं पति में कोई कमी तो नहीं? और फिर एक के बाद एक नए नए प्रश्नों और शंकाओं का शोर उठने लगा। धीरे धीरे मुहल्ले और समाज से इतने प्रश्न उठने लगे कि सब चकरा गए। इन प्रश्नों के शोर गुल में घर वालों का विश्वास डगमगा ने लगा। परिवार और युवती के साथ जो खड़े थे वे भी कन्नी काटने लगे। सहानुभूति घृणा या विरक्ति में बदलने लगी। और तो और ननद ने भी मुंह मोड़ लिया। पत्नी ने आत्महत्या कर ली और पति ने दूसरा विवाह। सब सामान्य हो गया।

पत्नी का बलात्कार किसने किया?” गुंडों ने, परिवार ने, समाज ने ........

इस कहानी से मुझे लगे सदमे को क्या आप दूर कर सकते हैं? इसे दूर करने के दो ही उपाय हैं – १ला, कोई ऐसा न्यायालय बताएं जो असली बलात्कारी को सजा दे सके या २रा, ऐसा वकील बताएं है जो किसी भी न्यायालय में बलात्कारी को सजा दिला सके?

हमारे ग्रन्थों में, शास्त्रों में, वेदों में, प्राचीन काल से प्रश्न पूछने का हक ही नहीं दिया गया है बल्कि उसे प्रोत्साहित भी किया है। लेकिन प्रश्नकर्ता के लिये उत्तरदायित्व भी निर्धारित है। प्रश्न पूछने का उद्देश्य क्या है? यह प्रमुख है। प्रश्न सृजनात्मक हो। प्रश्न का उद्देश्य अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान के प्रकाश को फैलाना, भ्रम मिटा कर विश्वास पैदा करना, संदेह हटा कर आस्था के बीज बोना होना चाहिए। लेकिन अगर उद्देश्य इसके विपरीत हो, विध्वंसात्मक हो, अज्ञान फैलाना हो, भ्रम पैदा करना हो, संदेह बोना हो, तब? ऐसे व्यक्ति को कुपात्र कहा गया और उसके लिए प्रश्न पूछने का हक ही नहीं बल्कि ज्ञान प्राप्ति भी वर्जित है। उसे प्रश्न पूछने के अधिकार से वंचित किया गया है। सुपात्र को ही उच्च ज्ञान का अधिकारी बताया गया है। हम जानते हैं, अणु विस्फोट का ज्ञान सबों को नहीं दिया जा सकता।

बेतुके प्रश्न और कुतर्क से बचें। सृजनात्मक दृष्टिकोण अपनाएं।
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चलो तो सही

कई लोग घूमने के बहुत शौकीन होते हैं। वायु मार्ग, रेल मार्ग, सड़क मार्ग या पैदल जैसे भी हो कहीं न कहीं घूमते रहते हैं। लेकिन कई लोग, ज़्यादातर, कहीं नहीं जाते, अपने घर या शहर में ही रहते हैं। वहीं कुछ लोग बस बैठे बैठे हर जगह की कल्पना करते हैं, कार्यक्रम बनाते हैं, ज्ञान अर्जित करते हैं और मानसिक यात्रा करते रहते हैं। किसी से सुन लिया, कहीं पढ़ लिया, कहीं देख लिए और पंडित हो गए। उन्हे शहर से बाहर निकलना जोखिम भरा लगता है।

दो घुमक्कड़ मित्र एक यात्रा पर साथ साथ निकले। एक मोड़ पर आकर रुक गए। किधर जाएँ? पूछने पर किसी ने बाएँ जाने कहा तो किसी ने दाहिने। दोनों ने विचार किया गंतव्य तो एक ही है दोनों अलग अलग रास्ते से चलते हैं और गंतव्य पर मिलते हैं। वहाँ पहुँच कर अपने संस्मरण साझा करेंगे। एक बाएँ मुड़ा और दूसरा दाहिने। 

पहले को रास्ते में बीहड़ जंगल भी मिले, खूबसूरत बगीचे भी। दुर्गम नदियां भी मिलीं शीतल सरोवर भी। शराब घर भी मिले और शांत आश्रम भी। इन सबको पर करता हुआ वह चलता रहा और आखिर अपने गंतव्य स्थान पर पहुंचा। गंतव्य पर पहुँचने का आनंद, सुख और शांति उसे मिली। वहाँ पहुँचने पर उसे समझ आया कि हाँ सब रास्ते एक जैसे ही हैं

दूसरा लोगों को पूछता पूछता आगे बढ़ने लगा।  एक गाँव मिला, गाँव वालों ने उसे अलग अलग रास्ते बताए। वह वहीं ठहर गया। और सब रास्तों का विश्लेषण करने लगा। जिस रास्ते से कोई आता दिखाई पड़ता उससे उस रास्ते के बारे में पूछता और समझता। विचार कर उस पर चलना शुरू करता। कुछ दूर चलने पर उसे लगता दूसरा रास्ता ही ठीक था और वापस मुड़ जाता। रास्ते में कहीं कोई बाधा या असुविधा दिखती उसे लगता यह रास्ता सही नहीं है और वापस लौट कर दूसरे रास्ते पर चलना शुरू करता। उस पर भी थोड़ी दूर चलने के बाद वापस लौट पड़ता। वह उसी गाँव में बस गया। औरों की तरह वह भी आने वालों को रास्ते के बारे में ज्ञान देना शुरू कर दिया। अब वह पथ-प्रदर्शक बन लोगों को रास्तों के बारे में ज्ञान देना शुरू कर दिया।

आज ऐसे विद्वानों की संख्या बहुत हो गई है। वे कहीं नहीं चलते। बैठे बैठे ज्ञान जरूर देते हैं। ये कहते हैं ईसाइयत ठीक है, हिन्दू ठीक है, मुसलमान ठीक है, सिक्ख ठीक है या कोई ठीक नहीं है। ये मानते हैं कि कुरान, बाइबिल, गीता ठीक है, या सब बेकार हैं। ये वे लोग हैं जो चल ही नहीं पाते। क्योंकि सब रास्ते ठीक हैं या खराब हैं, तब पैर उठते ही नहीं। ये एक रास्ते पर चलते हैं तो उन्हे दूसरा रास्ता ठीक लगने लगता है, दूसरे पर चलते हैं तो तीसरा रास्ता ठीक  लगता है। चलने वाले के लिए एक ही रास्ता ठीक है, सोचने वाले के लिए सब रास्ते ठीक हो सकते हैं।  जो पहुँच जाता है वह ही समझ पाता  है कि सब रास्ते ठीक हैं, अगर चलो तो।
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कौन जानता गांधी को

दुर्गा पूजा, नवरात्रि, दिवाली, वार्षिक उत्सव, वार्षिक खेल कूद, बड़ा दिन, क्रिसमस और नव वर्ष, इन सब के पश्चात परीक्षा के दौर के में विद्यालयों की व्यस्तता के कारण कम्प्युटर के हार्ड डिस्क में  बंद पड़ा गांधी प्रश्नोत्तरी कौन जानता गांधी को मार्च के उत्तरार्ध में फिर से बाहर निकल विद्यालयों के दौरे पर चल पड़ा और इसका प्रारम्भ हुआ जे.डी.बिड़ला इंस्टीट्यूट, मैनेजमेंट विभाग से। डाइरेक्टर डॉ.मुखोपाध्याय  की उपस्थिती में छात्र-छात्राओं के मध्य गांधी प्रश्नोत्तरी के  खेल का आयोजन सफलतापूर्वक किया गया।
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शुक्रवार, 1 मार्च 2019

सूतांजली, मार्च २०१९


सूतांजली                            ०२/०८                                                    मार्च  २०१९
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आजा मेरी गाड़ी में....!
मैंने खीज कर कहा, “आजा, मेरी गाड़ी में बैठजा। बैठेगी”?
उसने गाड़ी खोलने की कोशिश की। लेकिन खोल नहीं पाई। उसने मेरे स्वाभिमान को ललकारा बैठती हूँ, हिम्मत है तो दरवाजा खोल”? मेरा स्वाभिमान भी फुफकार उठा और गाड़ी का दरवाजा खोल दिया। बिना देर किए वह तुरंत गाड़ी में बैठ गई, जैसे उसी की गाड़ी हो। तब तक चौराहे की लाल बत्ती हरी हो गई और मैंने गाड़ी आगे बढ़ाई। लेकिन तब तक मेरे मस्तिष्क में भयंकर झंझावात उठ खड़ा हुआ। यह मैंने क्या किया? और अब क्या करूँ?’ मैंने गाड़ी वापस घर की तरफ मोड़ ली। रास्ते भर यही उधेड़-बुन, करूँ तो करूँ क्या? क्या इसके हँसते खेलते शैशव को, उन्मुक्त जीवन को अपने घर की चाहर दीवार में बंद कर नौकरनी बना लूँ, नहीं! इसकी रोटी की व्यवस्था तो हो जाएगी लेकिन पराधीन हो जाएगी। घर पहुँचने के पहले मैंने निश्चय कर लिया। रास्ते से कपड़े, जूते, चप्पल लिये और घर पहुँची। उसे गुसलखाने में धकेल दिया। नहलाया, धुलाया, खिलाया और सुला दिया। घंटों बात सहमी सी उठी। उसे मैंने उसे अपनी बाहों में भर लिया और कहा अब से मैं तुम्हारी माँ हूँ और तू मेरी बेटी।

अब वह एक शिक्षित जिम्मेदार युवती है। सामाजिक उत्सवों में शरीक होती है, मेरे पूरे परिवार में जाती है। उसके लिए समुचित वर खोज रही हूँ। सोच सोच कर आंखे गीली हो जाती है। कल तक चौराहे पर भीख मांग रही थी। अभी मेरे जिगर का टुकड़ा है। कल फिर मेरा हाथ छोड़ किसी और का हाथ पकड़ पराई हो जाएगी।  

भ्रम में मत रहिएगा। यह न कोई कहानी है न कपोल कल्पना है। यह एक सच्ची घटना है ग्रेटर नोएडा की मेरी मुलाक़ात इन माँ-बेटी सी हुई चिन्मय मिशन के एक कैंप में।

हाँ हम  ... गांधी के  हत्यारे
30 जनवरी 1948 संध्या के समय बिड़ला भवन में तीन धमाके हुए और एक इंसान को शांत कर दिया। उस धमाके की गूंज आज तक प्रतिध्वनित हो रही है। हम उस धमाके को शांत नहीं होने देते।  उस धमाके को हमने जिंदा रख रखा है ताकि हमारे धमाके छुपे रहें, नहीं सुने। उन तीन धमाकों ने तो उस नश्वर शरीर को शांत किया जिसे अगर वह नहीं भी करता तो यमराज कभी न कभी करते ही। हमने तो उसकी आत्मा को मारा है और प्रतिपल मार रहे हैं। बेवकूफ था वह युवक जिसने छिप कर नहीं सबके सामने, दिन के उजाले में यह कृत्य किया और फांसी पर चढ़ गया। हम रोज मारते हैं  और गांधीवादी के नाम से इज्जत भी पाते हैं।   

हमने तो गांधी की आत्मा को बहुत पहले से ही मारना शुरू कर दिया था। दिन के उजाले में तो हम  उसके समर्थक हैं, भक्त हैं, अनुयायी हैं। लेकिन रोज रोज उस गांधी को मार रहे हैं, उसे खरोंच रहे हैं, उनके हर विचार को-काम को जड़ से उखाड़ कर फेंक रहे हैं। दिन की रौशनी में हम गांधी की मूर्तियों का अनावरण करते हैं, तस्वीरे टाँगते हैं, 2 अक्तूबर और 30 जनवरी को सूता कातते हैं, महात्मा गांधी अमर रहें के नारे लगाते हैं और अपनी काली देह को सफ़ेद खादी से ढंके रखते हैं। 125 वर्ष की आयु की कामना रखने वाला वह व्यक्ति आसन्न-मृत्यु क्यों खोजने लगा? जब देश की जनता उनकी बात सुन रही थी तब गांधी क्यों बार बार कह रहे थे अब कोई मेरी नहीं सुनता’, मैं विवश हूँ’, ईश्वर से प्रार्थना करने के अलावा मैं और कुछ नहीं कर सकता और मेरा ईश्वर पर पूरा विश्वास है। क्योंकि हमने उसकी आत्मा को छलनी कर दिया था और गांधी मूक दर्शक बना देखता रहा। शायद यही कारण था कि जिस जनता ने उसे अपना मजबूत नायक समझा था उसी जनता ने कहा मजबूरी का नाम महात्मा गांधी

हमने गांधी पर अनेक गोलियां बरसाईं, बम के धमाके किए, ग्रेनेड फोड़े। बहुत मेहनत वाला काम किया और साथ ही साथ नेता, विधायक, शासक, प्रशासक, विशेष वर्ग का कार्य भी बखूबी निभाया। कितनों की चर्चा करूँ तीन गोलियों के जवाब में?  कुछ की ही चर्चा करूँ -

. ब्रिटिश सरकर के ठाटबाट का चयन - गांधी यह चाहते थे कि आजादी के बाद राजकीय कर्मचारी अंग्रेजों की तरह शान शौकत से न रह कर सादा जीवन यापन करें। उन्हे यह शंका थी कि गवर्नर जनरल माउंटबेटन इसके लिए तैयार नहीं होंगे। लेकिन जब उनकी सहर्ष स्वीकृति गांधी को मिली तब उन्हे बड़ा हर्ष और संतोष हुआ। गांधी ने सरकार से इस बाबत पत्र लिखा राजकीय कर्मचारियों के लिए राज प्रसाद के फिजूलखर्ची को बंद कर सादे आवासों की व्यवस्था की जाए। नेहरू ने भी सहमति जताई। लेकिन कोई कार्यवाही न होते देख जब गांधी ने पुन: लिखा, तब  हमने जवाब दे दिया हम काम में इतने व्यस्त हैं कि उपयुक्त स्थान ढूँढना और राजप्रसाद को छोड़ कर दूसरे स्थान में जाने की व्यवस्था करना कठिन हैहमारे ठाट-बाट में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं आई। यह थी वह गोली जिसे हमने गांधी पर चलाई, जिसकी कहीं गूंज नहीं हुई।
२. क्षेत्रीय एवं सत्याग्रही कार्यकर्ताओं की अवहेलना – गांधी ने कहा  भूतकाल से बिलकुल नाता तोड़कर शासन की नीचे से नई रचना खड़ी की जाए। लेकिन हमने इसे भी नहीं माना। ब्रिटिश राज्य में तालीम पाये हुए कर्मचारियों पर ही आधार रखकर शासन चलाने लगे। कल तक जिसकी हम अलोचना करते थे उसकी हम प्रशंसा करने लगे। क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं तथा सत्याग्रहियों की अवहेलना करना और उनके द्वारा की गई अफसरों की आलोचना के प्रति असहिष्णु बन गए। “कल्याण राज” के आकर्षक नाम के तले हमने वही अंग्रेजों का रूप अंगीकार कर लिया। सत्याग्राहियों पर हम पहले अंग्रेजों के कर्मचारी बन कर डंडे चलाये अब वही काम सरकारी कर्मचारी बन कर रहे थे। यह एक और बम था जो गांधी की आत्मा पर हमने चलाया, बिना किसी शोर शराबे के।
३. कांग्रेस की सदस्यता के लिए हाथ कता सूत – खादी के प्रचार-प्रसार तथा सेवा भाव और  शारीरक श्रम को बनाए रखने के उद्देश्य से गांधी ने कहा कांग्रेस की सदस्यता के लिए एक निश्चित राशि के साथ साथ निश्चित मात्र में स्वयं के हाथ का कता सूता भी अवश्यक हो। हमसे सूत कातना संभव नहीं था। लेकिन कॉंग्रेस के बिना राजकीय पद भी नहीं मिल सकता था। हमने गांधी की सलाह को फिर नकार कर उनकी आत्मा पर एक और प्रहार किया। आज हाथ से सूत कातने वाले भूख से मर चुके हैं या मर रहे हैं। और हम .......
४. स्वेच्छा से अपना सर्वस्व देश को चढ़ाने वालों के लिए अब हमें अपना सुख उनके साथ बांटना चाहिए ,गांधी ने कहा, अब तक लाखों की संख्या में ग्रामीण मर गए ताकि  हम स्वतंत्र रहें, अब हमें मरना होगा, ताकि वे लोग जीवित रहें। गांधी ने हमें उनके साथ अपना भोजन बांटने के लिए कहा, लेकिन हमने उनकी यह बात भी नहीं मानी। सत्य का प्रचार किया लेकिन व्यापार असत्य का किया। प्रसार अहिंसा का किया लेकिन हिंसा को प्रोत्साहन देते रहे,  गांधी को बेचते रहे।

सत्य और अहिंसा पर चलना बहादुरी का काम है। मुझे पता है सब इतने बहादुर नहीं, बहुतों के पास खोने के लिए बहुत कुछ है। लेकिन कम से कम उस राह पर चलने वालों को प्रोत्साहित तो कर ही सकते हैं। साथ न दे सकें तो उनका विरोध तो न करें! मुझ पर बालाकोट आक्रमण का बाण मत छोड़िए। अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए कभी कभी यह बताना आवश्यक होता है कि अहिंसा हमारा सिद्धान्त है स्वेच्छा से अपनाया हुआ, हमारी मजबूरी नहीं। पटेल के पूछने पर गांधी ने कहा था तुम्हारे पास कश्मीर में सेना भेजने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है

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शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

सूतांजली फरवरी 2019


सूतांजली                            ०२/०७                                 फरवरी २०१९
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गांधी क्या करते......
और आखिरकार अहिंसा का पुजारी हिंसा का शिकार हो गया। लेकिन क्या, हत्यारे अपने मकसद में सफल हुए? स्थूल रूप से तो यही लगता है, लेकिन सूक्ष्म रूप से देखें तो ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि गांधी व्यक्ति नहीं हैं, वह एक विचार है। यह गांधी आज भी हमारे बीच मौजूद है और पहले से ज्यादा मजबूत है।  जो मारा गया वह व्यक्ति था और जो अमर है वह विचार है।

अगर आज गांधी होते..........????? भारत की अनेक समस्याएँ हैं, अनेक वाद हैं, विवाद हैं, इनके बीच वे क्या करते, इसे किस रूप में देखते? कैसे इनका समाधान करते? यह बताने वालों की कमी नहीं हैं। लेकिन इन्हे छोड़ हम देखें-परखें उनके जीवन को, उनके संदेश को।  विशेष कर तब जब उन्होने कहा मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।  पढ़ें उनके जीवन को। उनके जीवन की कुछ घटनाओं का, बातों का विश्लेषण करें, समझने और सीखने की कोशिश करें। प्रारम्भ करें प्रस्थान से :

1प्राथमिकता का चयन – गांधी ने अपने जीवन में अनेक लड़ाइयाँ लड़ीं। उनमें सबसे महत्वपूर्ण था देश की आजादी। लेकिन जब देश को स्वतन्त्रता मिली और भारत आजादी का जश्न मना रहा था गांधी अपनी प्राथमिकता तय कर रहे थे – स्वतन्त्रता के जश्न में शरीक होना है या कलकत्ता में बैठ कर सांप्रदायिकता की धू धू जलती आग को बुझाना है? उत्सव में शरीक होना है या पीड़ितों के बीच रहना है? किसे महत्व देना है – स्वतन्त्रता या सांप्रदायिकता? सही प्राथमिकता का चुनाव। कहाँ रहना है और क्या करना है इसका सही निर्णय। निर्णय का आधार व्यक्तिगत नहीं सामाजिक हित और मानवीय मूल्यों पर आधारित था।

2क्षेत्रीयता को महत्व - गांधी ने चरखे को अपनाया। चरखा तो केवल एक प्रतीक मात्र था, उद्देश्य था क्षेत्रीयता को स्वीकार करना। चरखा और सूता प्रतिकात्मक हैं। गांधी जिस क्षेत्र से थे वहाँ कपास बहुतायत में होता था। सूत कातना और कपड़े बुनना उस क्षेत्र का कुटीर उद्योग था। इस कारण गांधी ने सूत कातना और चरखा चलाना शुरू किया। इस प्रकार गांधी ने क्षेत्रीयता को महत्व देने की बात रखी। अलग अलग क्षेत्रों की विशिष्टताओं और उनकी समृद्धि के कारणों पर ध्यान देना और उसे स्वीकार करना, प्राथमिकता देना, प्रोत्साहित करना। और यह इस प्रकार होना चाहिए कि हर क्षेत्र का महत्व बना रहे, उसकी विशिष्टता बनी रहे। भारत अगर सोने की चिड़िया था तो उसकी जड़ क्षेत्रीयता ही थी। केवल शहरों पर ध्यान देने का नतीजा यह हुआ कि गाँवों से पलायन प्रारम्भ हो गया, गाँव खाली हो गए और शहर रहने लायक नहीं रहे। यही गाँववासी शहरों में जाकर झोपड़ पट्टी और सड़कों के किनारे बसे। जहां इंसान है वहाँ शुद्ध हवा-पानी नहीं, जहां शुद्ध हवा-पानी है वहाँ इंसान नहीं।

3बुराई को मारो बुरे को नहीं - बुरे को मिटाना टहनी काटना है लेकिन बुराई को मिटाना जड़ काटना है। एक बार एक व्यक्ति एक दुधमुंहे बच्चे को लेकर गांधीजी के पास आया और बोला कि इस बच्चे के पूरे परिवार को मैंने मार डाला है। अब आप बताएं कि मैं इस बच्चे  का क्या करूँ? भारत उस समय सांप्रदायिकता की आग में झुलस रहा था। गांधी ने सुझाव दिया कि वह एक अभिभावक की तरह उस बच्चे का पालन पोषण करे और इस बात का ध्यान रखे कि यह बच्चा बड़ा होकर सच्चा मुसलमान बने। वह व्यक्ति बुरा नहीं था लेकिन उसमें से हिंसा, द्वेष और बदले की भावना को मिटाना था। उद्देश्य उस व्यक्ति को दंडित करना नहीं था बल्कि उस के दिल की बुराई को मिटाना था।

एक व्यक्ति ने कहा कि मुसलमान मेरी बहन को उठा ले गए। आपकी नीति के अनुसार मैं अपनी दूसरी बहन उसको दे दूँ? गांधी ने कहा नहीं मेरी नीति कहती है इसके बदले में उसकी बहन को उठा कर ले आना समाधान नहीं है। बहन किसी की भी हो, उसको उठाना पाप है। पापी के साथ पापी का सा व्यावहार पाप और पापी दोनों को बढ़ाना है।    

4मन की स्वच्छता - गांधी को हम स्वच्छता से जोड़ कर देखते हैं। लेकिन गांधी की यह स्वच्छता केवल परिवेश की नहीं थी बल्कि अपने भीतर मन की स्वच्छता भी थी। उन्होने लिखा है कि अगर हमारे मन में भी कोई विकार आ गया है भले ही वह कार्य रूप में परिणित न हुआ हो तो भी यह मानना चाहिए कि वह विकार हमारे भीतर है।  कहीं कोई गंदगी हमारे भीतर आ गई है। हमें उसे स्वीकार करना चाहिए और उसे दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए। गांधीजी में अनेक कमियाँ थी। उनसे कई गलत कार्य हुए। उन्होने विवादास्पद परीक्षण किए। लेकिन उन कार्यों को, उन बातों को, उन परीक्षण को गांधी ने छिपाया नहीं किया। उसे सब को बताया और उन्हे दूर करने का प्रयत्न किया। हमें अपने आप को अंदर से स्वच्छ रखना है। हम दोहरा जीवन न जीएं। जो भीतर हों वही बाहर हों। हमारे चेहरे पर मुखौटे नहीं होने चाहिए। हमारे भीतर जो भी चल रहा है हम उसे बाहर भी व्यक्त कर सकें। हमें अपनी कमजोरियों पर नजर रखना है और लगातार उसे दूर करने की कोशिश करनी है।  हर मनुष्य में कमी हैं। उसे छिपाएँ नहीं, उसे दूर करने का प्रयत्न करें।

5लोगों को जोड़ना - गांधी एक माहिर संगठन कर्ता थे। उन्होने पूरे देश के लोगों को, स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध, धर्म-जाति-वर्ग, बिना किसी भेद भाव के सबको आपस में जोड़ दिया। और इसके लिए उन्होने लगातार संवाद बनाए रखा, हर विषय पर। केवल राजनीति नहीं, बल्कि सामाजिक, शिक्षा, व्यक्तिगत, पर्यावरण, स्वास्थ, धर्म आदि हर विषय पर संवाद किया। अपने मौन व्रतों के बावजूद गांधी से ज्यादा संवाद करने वाला इंसान मिलना मुश्किल है। उन्होने इसके लिए लगभग पूरे भारत का दौरा किया, तीसरी श्रेणी में, जिसमें भारत सफर करता था। वे रात रात भर जाग कर हर पत्र का उत्तर देते। हर आने वाले से मिलते, अनेक भाषाओं में कई पत्रों का सम्पादन करते और देश भर में घूमते रहते। समय अकेले रहने का नहीं साथ रहने का है। साथ का तात्पर्य वर्ग, जाति, धर्म, लिंग की दीवार गिरा कर आपस में जुड़ कर

6मतभेद हो मनभेद नहीं – अगर हम संवाद करते हैं तो हमारे मध्य मतभेद होना स्वाभाविक है। लेकिन हमारा मतभेद मनभेद नहीं होना चाहिए। दक्षिण अफ्रीका में रहते जनरल स्मट्स से मतभेद रहा, अंग्रेजों से मतभेद रहा। वैसे ही लोकमान्य तिलक, सुभाष चन्द्र बोस, अंबेडकर, जिन्ना और तो और जवाहर लाल नेहरू से भी अनेक मुद्दों पर मतभेद रहा लेकिन किसी से भी मन भेद नहीं रहा। मतभेद वालों से मनभेद करते रहे तो दुनिया छोटी होती जाएगी। हर मत के सब पहलुओं पर विचार करना, अलग अलग दृष्टिकोणों से देखना, सर्वांगीण तरीके से सोचना उनके विशेष गुण थे। दूसरों मे मत का भी आदर करते थे। वैसे तो गांधी सत्य के पुजारी थे लेकिन वे किसी भी सत्य को अंतिम सत्य नहीं मानते थे। अपना कहा हुआ भी अंतिम सत्य नहीं समझते थे। वे यही कहते थे कि अब तक के अनुभव से मुझे यही सत्य लगता है और मैं इस पर कायम हूँ। एक पत्रकार ने जब पूछ कि आप के कई वक्तव्यों में विरोधाभास है तो उन्होने यही कहा कि मेरी बाद वाली बात को ही सही मानना चाहिए। यह उनके सत्य का परिवर्तन नहीं था बल्कि उसका विकास था। गांधी सतत परिवर्तनशील रहे और जो परिवर्तन शील होगा वही विकासशील भी होगा

7समान सिद्धान्त – गांधी में सबों के लिए सद्धांतों में समानता थी। यह सिद्धान्त की समानता वे सब के लिए, हर जगह और हर समय एक ही थी। जो सिद्धान्त दूसरों के लिए था वही अपनों के लिए भी था। जिस प्राकृतिक चिकित्सा की सलाह वे सब को देते थे उसी का प्रयोग उन्होने अपने  बेटे और पत्नी पर भी किया, भले ही इस कारण वे मृत्यु के द्वार तक पहुँच गए। अपने सिद्धान्त पर अडिग रहे। हिंदुओं और मुसलमानों के लिए भी अलग अलग सिद्धान्त प्रतिपादित नहीं किया। नोआखाली हो या कलकत्ता या बिहार या दिल्ली हर जगह वे एक सिद्धान्त पर अडिग रहे, उसमें परिवर्तन नहीं किया। सिद्धान्त की समानता लोगों में विश्वास पैदा करती है। अपने लिए एक पैमाना और दूसरों के लिए दूसरा पैमाना, विश्वास का हनन करता है। गांधी के लिए अपनों का दायरा बहुत बड़ा था, या यूं कहें कि गांधी के अपनों का दायरा इतना विशाल था कि सब उसमें सब समा जाते थे। 

गांधी होते तो क्या करते? इस पर विचार न कर गांधी ने क्या किया, इस पर विचार करें।

रविवार, 6 जनवरी 2019

सूतांजली जनवरी २०१९


सूतांजली                      ०२/०६                                      जनवरी २०१९
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सब कराया धराया मोहन का
             
कल रात मोहन मुझसे मिलने आए। मैं आश्चर्यचकित रह गया और बड़ी हैरानी से बोला बापू मुझे बुला लिया होता। इस सर्दी में आप यहाँ चले आए बिना कोई खबर किए, वो भी एकदम अकेले। बापू ने अपनी चिरपरिचित मुस्कुराहट बिखेरी। उनके हाथ में वही एक डंडा, आँखों पर गोल चश्मा, बदन पर आधी धोती और एक सफ़ेद चद्दर। मुस्कुराते  हुए बैठ गए। और बोलने लगे- “कई दिनों से तुमसे मिलने की इच्छा हो रही थी, लेकिन टालता जा रहा था। आज रहा नहीं गया तो सोचा अभी ही चलूँ नहीं तो फिर टाल दूँगा”। मैं सोचने लगा कि मोहन को मुझसे इतना क्या आवश्यक काम आन पड़ा कि इस प्रकार अकेले, देर रात मिलने चले आए? वे बोलते रहे, “मैंने क्या किया, क्या नहीं, यह सबको पता हैं। मैंने कभी कुछ भी नहीं छिपाया। मैं यही कहता रहा कि मेरा जीवन एक खुली किताब है, जो चाहे पढ़े। मेरा जीवन ही मेरा संदेश है”।
मैंने उन्हे बीच में टोका, “बापू, आप हर समस्या की जड़ तक जाते थे और दूर की सोचते थे.....”
इस बार उन्होने मुझे बीच में टोकते हुए बात आगे बढ़ाई, “मैंने जो सोचा वह तो सबों को पता है, लेकिन क्या तुम्हें यह भी पता है कि मैंने जो नहीं किया वह भी मेरे नाम, जिसका मैंने विरोध क्या वह भी मेरे ही नाम और जो नहीं सोचा वह भी औरों ने सोचकर मेरे ही नाम कर दिया है? लेकिन मैंने देश के लिए जो एक  सबसे बड़ा काम किया इसके बारे में किसी ने भी आज तक कोई चर्चा नहीं की? दरअसल मुझे भी यह पता नहीं था कि मैं इतना बड़ा काम कर रहा हूँ। इसका एहसास मुझे अभी कुछ ही दिनों से हो रहा है”। मेरी आंखे आश्चर्य से फैल गई।
बापू ने आगे पूछा, “अच्छा बताओ, अगर तुम्हें आज खाना पसंद नहीं आया तो उसके लिए दोषी कौन”?
“मेरी पत्नी, क्योंकि उसीने खाना बनाया”।
“लेकिन पत्नी ने क्या कहा?
“उसने मुझे ही दोषी ठहराया और कहा मैंने सब्जी अच्छी नहीं लाई थी”।
“बिलकुल ठीक। अच्छा बताओ, आज ऑफिस में जिस कार्य की चर्चा हो रही थी वह तुम्हारी कंपनी को क्यों नहीं मिला”?
“मैं क्या करता उस खन्ना ने मुझे गलत आंकड़े दिये”?
“तुम सीए (CA) क्यों नहीं बन पाये? बापू ने अगला सवाल जड़ा।
“बापू!”, मैंने खीजते हुए कहा, “यह तो आपको भी पता है कि उस वर्ष इंस्टीट्यूट ने अचानक ही पूरे पेपर का डर्रा ही बदल दिया था। केवल मैं ही नहीं उस वर्ष तो गिने चुने ही लोग परीक्षा पास कर सके थे”।
“हाँ! हाँ! मुझे पता है। तुमने कभी कोई गलती नहीं की। सब गलतियाँ दूसरों की ही थी। तुम तो पाक साफ थे और बहुत काबिल भी। अगर दूसरों ने तुम्हारे रास्ते में रोड़े नहीं अटकाए होते तो तुम्हारी ज़िंदगी ही कुछ और होती। तुम में असाधारण काबिलियत थी, दुनिया ही नहीं पहचान सकी, तुम्हारा कोई दोष नहीं था”। बापू के व्यंग को मैं समझ नहीं सका। 
बापू ने बात कहा, “अगर मैं नहीं होता तो देश की जनता का क्या होता?  वे सब कारगुजारियों और ना-कारगुजारियों का दोष मंढ़ने के लिए के लिए एक व्यक्ति कहाँ से लाती? उन्हे मुझ में वे सब अवगुण दिखे और सब कुछ के लिए मुझे रेखांकित कर निश्चिंत हो गए। आजादी के पहले और आजादी के बाद भी सब बुराइयों का जिम्मेदार उन्हे एक ही व्यक्ति, मुझ में दिख गया। पटेल के बदले नेहरू को प्रधान मंत्री बना कर देश का सत्यानाश मैंने किया! नेहरू ने क्या किया या नहीं किया उसके लिए मैं जिम्मेदार लेकिन यह किसी को पता नहीं कि 1963 में  नेहरू ने स्वीकार किया कि मेरी सलाह न मानकर उसने बड़ी भूल की, भारत के लिए मेरा सुझाया मार्ग ही सही था लेकिन अब नेहरू को वापस लौटने का मार्ग नहीं सूझ रहा था और कोई बताने वाला भी नहीं था। किसी को यह याद नहीं कि मैंने कहा कि नेहरू को मैंने मेरा उत्तराधिकारी बनाया जरूर है लेकिन मेरे और नेहरू का भारत अलग अलग है। मैंने बताया कि मैं अंग्रेजों को स्वीकार करता हूँ अंग्रेज़ियत को नहीं लेकिन नेहरू को अंग्रेज़ियत स्वीकार है अंग्रेज़ नहीं। प्रधान मंत्री बनने पर नेहरू ने क्या किया यह सबों को पता हो या न हो, लेकिन पटेल अगर प्रधान मंत्री बनते तो क्या होता यह देश का बच्चा बच्चा जानता है। भारत में हिंदुओं को मैंने मरवाया और मुसलमानों को मैंने ही बचाया! उधर पाकिस्तान का मानना है कि भारत में मैंने हिंदुओं को बचाया और मुसलमानों को मरवाया। दलितों और अछूतों  का उद्धार करने में रोड़े भी मैंने ही अटकाए!  मेरे ही कारण आरक्षण लागू हुआ और मेरे ही कारण भाषा की समस्या खड़ी हुई। मेरे ही कारण फिरोज को गांधी का नाम मिला जिसके कारण नेहरू परिवार ने परिवारवाद की नींव डाली! देश में अशिक्षा, भुखमरी और बेरोजगारी के लिए भी मैं ही ज़िम्मेवार हूँ! चंपारण में मैंने ही किसानों को बरगलाया और किसानों के बदले जमींदारों का पक्ष लिया! देश का बंटवारा भी मेरे ही कारण हुआ! मैं नहीं  होता तो आजादी कई वर्षों पहले मिल गई होती और वह ज्यादा खूबसूरत होती। और तो और खुले आम व्यभिचार को बढ़ावा भी मैंने ही दिया!   हड़ताल, घेराव,  अनशन भी मैंने ही सिखाया जिसके कारण देश का अनगणित नुकसान हुआ! मैंने खड्डा इतना गहरा खोदा कि आजादी के सत्तर साल बाद भी भारत की जनता, नेता, मंत्री, प्रशासक, व्यवसायी, उद्धोगपति, बुद्धिजीवी, युवा, बूढ़े, जवान, स्त्री-पुरुष, हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई, पारसी  सब मिलकर भी आज तक नहीं भर पाये।  देश की सब समस्याओं की जड़ एक ही है – गांधी, अगर मैं नहीं होता तो देश में इतनी समस्या ........

अब बापू की आवाज मेरे कानों तक नहीं पहुँच रही थी। मैं अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया घूमने लगा। हमारे बच्चे वहाँ रहते हैं। हम जब भी वहाँ गए हमने देखा घर की सफाई, कपड़ा धुलाई, रसोई पकाना, बाजार करना दोनों पति-पत्नी मिल करते हैं। हमने भी उनका साथ दिया। जब वे भारत आए तो सोचा उन्हे तो काम की आदत है और यहाँ भी वे सब यंत्र मौजूद हैं अत: कोई विशेष व्यवस्था नहीं की। जब बेटे-बहू को पता चला तो नि:श्वास छोड़ते हुए यही तो कहा था, “मजबूरी का नाम महात्मा  गांधी”!

तभी किसी ने मेरी रिजाई खिसकाई और एक आवाज कानों में पड़ी, “नींद में क्या बड़बड़ा रहे हैं? आज घूमने नहीं जाना है?”
मैंने वापस रिजाई खींची और बड़बड़ाया, “नहीं जाना। कितना बढ़िया सपना आ रहा था तोड़ दिया।”
मेरे कानों ने अब सुना, “हे भगवन! लगता है अब इनको सपने में भी वही गांधी दिखने लगा है!”

मैं एक झटके से उठा और सुबह की सैर को निकल पड़ा। लेकिन दिमाग था कि पीछा नहीं छोड़ रहा था। दूसरों की आलोचना करना और उनपर दोष मढ़  देना आसान है और अपनी तदबीरों की नाकामयाबी के लिए कोई-न-कोई बहाना ढूँढने के लिए तो दूसरों के सिर कसूर थोपने के लालच को रोकना अक्सर दुश्वार ही हो जाता है। हम कहते हैं कसूर हमारे खयाल का या काम में किसी किस्म की गलती का थोड़े ही था, वह तो दूसरों ने जो रोड़े अटकाए, उनका था। हम हर किसी के लिए दूसरे को दोष दे देते हैं, सिर्फ अपने आप को छोड़ कर। राजनीतिक आजादी के बाद हम देश को सामाजिक और आर्थिक आजादी दिलाने में नाकामयाब रहे। और अपनी असफलताओं के लिए दूसरों को दोषी बनाते रहे। वही  दशम न्याय का सिद्धान्त अपने को छोड़ कर बाकी सबों को गिनना

शनिवार, 1 दिसंबर 2018

सूतांजली दिसम्बर 2018

सूतांजली               ०२/०५                                              दिसम्बर २०१८
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मेरे लिए आदर प्रकट करने का यह तरीका गलत है

गांधीजी के जीवन के अनेक प्रसंग हैं। लेकिन कई प्रसंग ऐसे हैं जिन्हे पढ़ कर हमें रुकना पड़ता है, उस पर विचार करना पड़ता है। ये हमें प्रभावित करती हैं, हम अछूते नहीं रह पाते। एक लंबी सांस लेकर इतना तो कहते ही हैं कि This is why Gandhi is Gandhi (इसी कारण गांधी गांधी थे)। उनके साथ रहने वाले भी अछूते नहीं रह पाते थे और पारस के सम्पर्क से स्वर्ण बन जाते थे, खुद अनुकूल और प्रतिकूल दोनों के तर्क देते थे।  ऐसा ही एक प्रसंग नवजीवन प्रकाशन की पुस्तक से।
  
श्रीगणेश वसुदेव मालवंकर, जो बाद में स्वतंत्र भारत के लोकसभा के अध्यक्ष बने, सत्याग्रह के प्रारम्भिक दिनों में गांधीजी के असहयोग प्रस्ताव से पूर्णतया सहमत नहीं थे। इसलिए जब कलकत्ता अधिवेशन से लौटकर श्री वल्लभभाई पटेल ने यह प्रश्न अहमदाबाद म्युनिसिपैलिटी में उपस्थित किया तो वह उलझन में पड़ गए। दो शिक्षकों को नोटिस दिया था। अगर म्युनिसिपैलिटी असहयोग नहीं करती तो वे इस्तीफा दे देंगे। इस पर वल्लभ भाई पटेल ने प्रस्ताव पेश किया कि उन दोनों के इस्तीफे मंजूर कर लिए जाएँ। मालवंकरजी ने इसमें एक संशोधन सुझाया कि इस बारे में मतदाताओं को विश्वास में लेना चाहिए और इसलिए इस प्रस्ताव पर एक महीने बाद विचार करना चाहिए।  

गणेश वसुदेव मालवंकर
सर्वसम्मति से यह संशोधन पास हो गया। अब प्रश्न यह था कि मतदाता मालवंकरजी का साथ नहीं देते तो क्या उन्हे अपने पद से त्यागपत्र दे देना चाहिए? उन्होने ऐसा ही करने का निश्चय किया। वे असहयोग करने के विरोध में थे। उन्होने मतदाताओं के लिए असहयोग के अनुकूल और प्रतिकूल दोनों तरह के एक-एक वक्तव्य तैयार किया और हरेक के पास वह वक्तव्य, उत्तर के लिए  मतपत्र और पते सहित लिफाफा भेजने का निश्चय किया।

गांधीजी उस समय अहमदाबाद में थे। उनको दिखाने के लिए यह वक्तव्य लेकर उनके पास गए। गांधीजी ने उसे ध्यान पूर्वक पढ़ा। बोले, मालवंकर, तुमने यह बहुत लंबा वक्तव्य लिखा है
मालवंकर ने उत्तर दिया, बापू, सब समझ जाएँ, इसलिए यह जरूरी था और थोड़े से शब्दों में बड़ी बात कह डालने वाली लेखन कला मुझमें नहीं है

बहुत देर तक वे उस प्रश्न को लेकर विचार विनिमय करते रहे। खुले दिल से बीच-बीच में हंसी मज़ाक करते हुए बातें हुईं, लेकिन गांधीजी मालवंकरजी को अपनी बात नहीं समझा सके। मालवंकरजी ने कहा, बापू, मेरे मन में आपके लिए आदर है। विचारों में भी हमारा मतभेद है, फिर भी ऐसा लगता है कि शायद मेरे ही विचारों में भूल हो। इसलिए मैं आपसे सहमत होने का विचार कर रहा हूँ

गांधीजी हंस पड़े। बोले, मेरे लिए आदर है, इसलिए सहमत होना चाहते हो। मेरे लिए आदर प्रकट करने का यह तरीका बहुत गलत है। तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम जो कुछ ठीक समझते हो उसे खुले मन से व्यक्त करो। मेरी गलती नजर आए तो आलोचना करो, जिससे मैं अपनी भूल समझ सकूँ। मेरा आदर व्यक्त करने का तो यही सही तरीका है

यह कहते हुए वे बहुत गंभीर हो गए, लेकिन शायद मालवंकरजी को यह कठिन मालूम हो रहा था। गांधीजी ने कहा, कठिन तो नहीं मालूम होना चाहिए। तुम निर्भय होकर अपना यही वक्तव्य छपवा दो। यह ठीक ही है। मेरे जो विचार दिये हैं, वे भी ठीक हैं
यह सुनकर मालवंकरजी को थोड़ा संतोष हुआ। वे विदा लेकर जाने के लिए उठे, लेकिन दरवाजे तक पहुंचे भी नहीं थे कि गांधीजी ने बुलाकर कहा, मालवंकर जरा अपना वक्तव्य दिखाना। मुझे तो लगता है कि मेरे विचारों के विरोध में और तुम्हारे विचारों के अनुकूल कुछ और बातें लिखी जा सकती हैं
यह कहते हुए उन्होने स्वयं अपने हाथ से उस वक्तव्य में अपने ही विरुद्ध दो-तीन बातें और जोड़ दीं।


गांधी की कहानी

30 जनवरी 1948, शुक्रवार के जिस दिन महात्माजी की मृत्यु हुई, उस दिन वे वही थे, जो सदा से रहे थे – अर्थात एक साधारण नागरिक, जिसके पास न धन था, न सम्पत्ति थी, न सरकारी उपाधि, न सरकारी पद, न विशेष प्रशिक्षण योग्यता, न वैज्ञानिक सिद्धि और न कलात्मक प्रतिभा। फिर भी, ऐसे लोगों ने, जिनके पीछे सरकारें और सेनाएँ थीं, इस अठहत्तर वर्ष के लंगोटधारी छोटे-से आदमी को श्रद्धांजलियाँ भेंट कीं। भारत के अधिकारियों को विदेशों से संवेदना के 3441 संदेश प्राप्त हुए, जो सब बिना मांगे आए थे, क्योंकि गांधीजी एक नीति-निष्ठ व्यक्ति थे।                                                                                                    लुईफिशर



गांधी ने कह दिया .....


गांधी ने हिंसक रास्ते से आजादी खोजने वालों  से कह दिया था कि खून से निकलने वाला समाज भी खूनी ही होगा, और वैसा भारत मुझे कबूल नहीं। उन्होने सुभाष बोस से कह दिया कि हिटलर और मुसोलिनी की मदद से मिली आजादी अंग्रेजों की गुलामी से बेहतर नहीं हो सकती; उन्होने जवाहरलाल से कह दिया – भले ही मैंने तुम्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया है लेकिन हमारे तुम्हारे बीच भारत की भावी तस्वीर को लेकर जो खाई है, उसे इतिहास में दर्ज कर, हमें एक-दूसरे से अलग रास्ते पर चल पड़ना चाहिए; उन्होने हिंदुत्व के पैरोकारों से कह दिया कि जहां तक छुआ-छात का सवाल है, अगर वेदों में लिखा है तो मैं उस वेद को मनाने से इंकार करता हूँ; उन्होने मुहम्मद जिन्ना से कह दिया – राष्ट्र धर्मों से नहीं, संस्कृतियों से बनते हैं और इसलिए मैं मानता हूँ कि हिंदुस्तान में रहने वाले सारे ही धर्म यहाँ एक-सी आजादी व सम्मान से रह सकते हैं और इसलिए मैं दो राष्ट्र के आपके सिद्धान्त का मरते दम तक विरोध करूंगा; उन्होने अम्बेडकर से कह दिया – मैं सामाजिक न्याय की  हर लड़ाई की अगली कतार में खड़ा मिलूंगा लेकिन यह काम भारतीय समाज को तोड़ कर और उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करके नहीं कर सकेंगे; और अंग्रेजों से कह दिया – भगवान के लिए इस देश को एनार्की में छोड़ कर आप यहाँ से चले जाइए। भारत को रक्त का सागर भले पार करना पड़े, वह अपना भविष्य खोज खुद लेगा।                                                                                                                                                                                                                                                                     कुमार प्रशांत

सोमवार, 5 नवंबर 2018

सूतांजली नवंबर 2018



सूतांजली                            ०२/०४                                           नवंबर  २०१८
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साध्य ही नहीं साधन भी पवित्र होना चाहिए

चम्पारण के अपने अनुभवों को लिपि बद्ध करते हुए अनुग्रह नारायण सिंह (गांधी मार्ग मई-जून २०१७) गांधी की विचित्र सोच पर लिखते हैं:
पटना से निकल कर हम लोग बेतिया में फिर इकट्ठे हुए। कमिटी के सामने कौन-कौन गवाह पेश किए जाएँ, कौन-कौन बयान रखे जाएँ इन सब पर विचार होने लगा। महात्माजी कमिटी के एक सदस्य घोषित किए गए और सदस्य के नाते उनके पास पुरानी सारी गोपनीय किताबें, सरकारी रिपोर्टें भेज दी गईं। हम लोगों ने उन रिपोर्टों को पढ़ा और दूसरों को भी बताया। महात्माजी को जब मालूम पड़ा तो वे बहुत बिगड़े। बोले, जब सरकार की ओर से ये कागजात हमारे विश्वास पर दिये गए हैं, तब इनके बारे में दूसरों को कुछ बताना विश्वासघात हुआ। हमलोगों को यह बात समझ में तो नहीं आई पर दोष स्वीकार कर लेने में ही भलाई थी।

तहक़ीक़ात का दिन सुनिश्चित होने पर सरकार की ओर से जिला मजिस्ट्रेट की गवाही की बात हुई। कॉक साहब जिला मजिस्ट्रेट थे। वे एक सीधे ईमानदार आदमी थे। उनकी रिपोर्ट चंपारण के किसानों के अनुकूल थी। उनके स्टेनोग्राफर ने रिपोर्ट की एक कॉपी चुपचाप हमलोगों के पास भेजी। हम लोगों ने वह पढ़ी और फिर महात्माजी को दे दी। महात्माजी ने पूछा कि यह क्या है? जब हमलोगों ने सारी बात बताई तब उन्होने उस कागज को देखने से इंकार कर दिया। उनका कहना था कि यह रिपोर्ट हमें चोरी से मिली है। हमें इसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। यदि स्टेनोग्राफर अपनी नौकरी से इस्तीफा देने को तैयार हो और खुले रूप से रिपोर्ट लेकर हमारे पास आए तो मैं सोच सकता हूँ कि इस रिपोर्ट को पढ़ूँ या न पढ़ूँ। हम लोग आश्चर्य चकित हो गए। मेरे मन में तो यह ख्याल आ ही नहीं सकता था कि इतना जरूरी कागज मेरे पास आए और मैं उसे लेने या पढ़ने से इंकार कर दूँ। पर बापू कुछ अलग ही सोचते थे। उनकी बात हमने समझी और रिपोर्ट वापस कर दी गई।

नेताओं के व्यक्तिगत जीवन और सार्वजनिक विचार में तब भेद किया जाता था। किसी का व्यक्तिगत चरित्र कैसा भी क्यों न हो, यदि वह राजनीति में हिस्सा लेता है तो वह बड़ा नेता है। उनके पास जो भी जरूरी कागजात आएँ, चाहे वे किसी भी तरीके से क्यों न आए हों, उसका इस्तेमाल करने में कोई आपत्ति, सदाचार की दृष्टि से भी, नहीं मालूम देती थी। महात्माजी ने इस पूरे प्रश्न पर नया ही प्रकाश डाला। भविष्य में व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन के भेद को मिटाने कि उन्होने बड़ी कोशिश की और कुछ हद तक वे सफल भी हुए। 

सुभाष चंद्र बोस से गांधी का प्रमुख मतभेद यही था। सुभाष मानते थे कि साध्य अगर पवित्र है तो साधन की परवाह नहीं करनी चाहिए। लेकिन गांधी का दृड़ विश्वास था कि साध्य कितना ही पवित्र हो अगर साधन पवित्र नहीं है तो साध्य पवित्र नहीं रह सकता। गांधी ने हिंसक रास्ते से आजादी खोजने वालों  से कह दिया था कि खून से निकलने वाला समाज भी खूनी ही होगा। और वैसा भारत मुझे कबूल नहीं। उन्होने सुभाष बोस से कह दिया की  हिटलर और मुसोलिनी की मदद से मिली आजादी अंग्रेजों की गुलामी से बेहतर नहीं हो सकती।
गांधी बनाम गांधीवादी

व्यवहार चतुर लोगों ने कहा, सीधी अंगुली से घी नहीं निकलता। व्यापारी बोलते हैं, यह दुनिया भले आदमियों की नहीं है। कूटनीतिज्ञ कहते हैं, कांटे से ही कांटा निकल सकता है। संसारी तत्वज्ञ कहते हैं, यह जगत साधुओं की नहीं है। यानि प्रत्येक व्यक्ति की शिकायत दूसरे प्रत्येक व्यक्ति के खिलाफ है। गांधीजी ने सबकी बात सुनी और कहा, ये सब दुनिया के बारे में शिकायत करने वाले हैं। उनका मतलब यह है कि अगर दुनिया में त्रुटियाँ नहीं होती तो हमें पसंद आती  उन लोगों के मन में यह भावना छिपी हुई है कि मैं उन बुरे लोगों में नहीं हूँ। मैं तो सीधा सदा हूँ लेकिन इस टेढ़ी दुनिया में मुझे भी देढ़ा बनना पड़ता है। मैं तो भला हूँ लेकिन इस बुरी दुनिया में मुझे भी बुरा बनना पड़ता है दुनिया की इस निंदा में यह असंतोष है कि वह सतप्रवृत्त एवं सदगुण संपन्न नहीं है; परंतु उसे वैसा होना चाहिए, यह गर्भित इच्छा भी है

दुनिया का हर आदमी यही कहता है कि यह संसार इसी तरह दु:साध्य एवं दुराध्य है। हरेक की  शिकायत दूसरे सब लोगों के खिलाफ है। इसका मतलब यह हुआ कि मनुष्य व्यक्तिश: (individually) सतप्रवृत्त एवं सदाकांक्षी है, लेकिन समूहश: (in group) असत प्रवृत्त एवं असदाकांक्षी है। लेकिन यह भी सही नहीं है । केवल दृष्टि में परिवर्तन करने का है। दुनिया बुरी है इसलिए मूझे भी  बुरा बनना पड़ता है’, इसके बजाय अगर प्रत्येक व्यक्ति यह संकल्प करे कि, दुनिया चाहे जैसी चले, लेकिन मैं तो नेकी और प्रेम से चलूँगा, तो दुनिया का कायाकल्प होगा। इसीको बापू हृदय परिवर्तन का तत्व कहते थे।

गांधीवादी कहता है, मैं तराश-खराश कर दूसरों के स्वभाव को पूरा मुलायम बना दूँगा। बापू कहते थे, मैं पहले अपने स्वभाव के दोषों को दूर करूंगा 
अक्तूबर में  “कौन जानता गांधी को”
2 अक्तूबर 2018, गांधी की 150वीं जयंती के प्रारम्भ होने के पूर्व हमने गांधी प्रश्नोत्तरी का खेल “कौन जानता गांधी को” का शुभारंभ 30 सितम्बर को किया। अध्यापकों, प्रधानाध्यापकों, संचालकों, न्यासियों (trustees) तथा शहर के अन्य गणमान्य लोगों को इस खेल की झलक दिखाई गई।

कौन जानता गांधी को एक गांधी प्रश्नोत्तरी का खेल है जिसे शहर के विद्यालयों में खिलाने की व्यवस्था की गई है। विद्यार्थियों की उम्र को ध्यान में रखते हुए इस खेल को तीन भागों में बांटा गया है – जूनियर या प्राइमरी (कक्षा 1-5), मीडियम या सेकेंड्री (कक्षा 6-8) तथा सीनियर या उच्चतर माध्यमिक (कक्षा 9-12)। 

उद्घाटनके पश्चात इस खेल का आयोजन शहर के दो विद्यालयों में यथा सेठ सूरजमल जालान बालिका विद्यालय तथा मारवाड़ी बालिका विद्यालय में क्रमश: 6 एवं 11 अक्तूबर को सफलता पूर्वक किया गया। छात्राओं के अतिरिक्त अध्यापिकाओं ने पूरे खेल को बड़े ध्यान से देखा, सराहा  और कहा कि बच्चों के लिए ही नहीं बल्कि उनके लिए भी खेल ज्ञानवर्द्धक तो है ही, इसकी प्रस्तुति भी बहुत मनोरंजक होने के कारण पूरे समय तक सबों को बांध कर रखती है। विजेताओं को गांधी साहित्य तथा प्रतिभागियों को एक वर्ष की “गांधी मार्ग” की सदस्यता हमारी तरफ से प्रदान की गई। 13 अक्तूबर से शहर के विद्यालयों में दुर्गा पूजा की छुट्टियाँ प्रारम्भ हो गईं। 

इस कार्यक्रम का आयोजन आगामी 2 अक्तूबर 2019 तक करने का निश्चय किया गया है।
संपादक

सेठ सूरजमाल बालिका विद्यालय
मारवाड़ी बालिका विद्यालय






सूतांजली, अगस्त द्वितीय 2026, आकर्षक घर की कुंजी

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