गुरुवार, 1 सितंबर 2022

सूतांजली सितंबर 2022

 सूतांजली

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वर्ष : 06 * अंक : 02                                                                सितंबर  * 2022

दूसरे को नीचा दिखाने में नहीं.....

खुद को ऊंचा उठाने में समय लगाइये।

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चलें, मिलें फोर्ड के जनरल मैनेजर से...                                            मैंने पढ़ा  

लगभग एक शताब्दी हो चुके हैं इस घटना के। जाहिर है उस समय न तो हिन्दुस्तान आजाद हुआ था, न पाकिस्तान बना था और लाहौर हमारे देश का ही एक अंग था। वहाँ स्कूल जाने वाले एक १७ वर्षीय बच्चे ने एक दिन सड़क पर एक गाड़ी को जाते हुए देखा। वह उसे देखता ही रह गया; उसे यह भी पता नहीं था कि यह क्या है? इसके पहले उसने न तो इसे देखा था और न ही ऐसी किसी चीज के बारे में  सुना था। जब दूसरे दिन भी उसे वहीं वह दिखाई दी, तब उससे रहा नहीं गया और पूरी ताकत तो उसके पीछे दौड़ पड़ा। आखिरकार उसने उस गाड़ी को पकड़ ही लिया। उसने देखा उस गाड़ी पर लिखा था फोर्ड और उसमें ५-६ गोरे बैठे थे। उसने उत्सुकता पूर्वक उनसे पूछा कि यह क्या है? अपने प्रश्नों के उत्तर से उसे पता चला कि इसे मोटर गाड़ी कहते हैं, इसे श्रीमान फोर्ड ने बनाया है, और वे एक दिन में ऐसी कई गाड़ियाँ बनाते हैं। उसे यह भी पता चला कि श्रीमान फोर्ड अमेरिका में रहते हैं। उस बच्चे का मुंह आश्चर्य से खुला रहा गया। उसे कुछ समझ नहीं आया कि इतनी भारी-भरकम चीज क्यों बनाई गई, श्रीमान फोर्ड एक दिन में ऐसी कई मोटर गाड़ी  कैसे बना लेते हैं और तो और ये अमेरिका क्या है और कहाँ है?  

          इसी उधेड़-बुन में वह स्कूल पहुँच गया। उसने अपने अध्यापक से पूछा कि यह अमेरिका क्या होता है और कहाँ है? अध्यापक ने उसे समझाने का बहुत प्रयत्न किया, लेकिन उसे समझ नहीं आया। उसके भूगोल के अध्यापक ने उसे बताया कि ग्लोब की उल्टी-दिशा में अमेरिका है और जैसे हिन्दुस्तान है वैसे ही अमेरिका है लेकिन अमेरिका और हिन्दुस्तान में बहुत फर्क है। यह सुनकर बच्चे की उलझन और भी ज्यादा बढ़ गई। अगर, अमेरिका ग्लोब की उल्टी दिशा में है तो वहाँ लोग क्या सिर के बल खड़े रहते हैं, क्या वे गिरते नहीं, वे कैसी खड़े होते होंगे? और इससे भी ज्यादा वह परेशान हुआ इस बात से कि अमेरिका हिन्दुस्तान जैसा है लेकिन दोनों में बहुत फर्क है। एक जैसा भी है और बहुत फर्क भी है, ये दोनों बातें एक साथ कैसे हो सकती है? खैर उसने उसी समय निश्चय किया कि उसे अमेरिका जा कर उस मोटर गाड़ी  को बनाने वाले श्रीमान फोर्ड से मिलना है।

          दिन-भर वह इसी उधेड़-बुन में रहता। उसके पिता मासिक ३० रुपए पाते थे। उसे पता था कि घर वाले कभी भी न तो सहमत होंगे और न ही उसे अमेरिका भेज सकेंगे। आखिरकार उसने चुपचाप भाग कर ही अपने सपने को साकार करने का निश्चय किया। एक दिन मौका देख कर उसने अपने पिता के कोट में हाथ डाला। उसे २९ रुपए मिले। उसके लिए यह एक बहुत बड़ी रकम थी। बिना किसी को बताये, चुपचाप लाहौर स्टेशन से ट्रेन पकड़ वह बंबई पहुँच गया।

          बंबई तक का सफर तो आसान था। अब उसे अमेरिका जाना था। उसने सुना था पूछ-पूछ कर विलायत जाया जा सकता है। बस, उसने लोगों से पूछना शुरू किया अमेरिका कहाँ है और कैसे जाएँ’? लोग बच्चे की बात सुनकर हँसते, उस पर ध्यान नहीं देते। बल्कि कई तो पूछते कि यह अमेरिका क्या होता है?

          उस बच्चे के लिए तो लाहौर ही सब कुछ था। उसके बाहर एक दिल्ली नाम की जगह भी थी और उसके बाद केवल बस मद्रास ही मद्रास। हाँ, एक और जगह थी जहां पानी के जहाज से जाते हैं, और वह जगह है विलायत। अब वह कैसे बताता कि अमेरिका कहाँ है। लेकिन सोचने पर एक बात समझ आई कि अमेरिका जाना तो पानी के जहाज से ही पड़ेगा। अतः  अब उसने अपना प्रश्न बदल लिया। अब वह पूछ रहा था, समुद्र में जाने के लिए पानी का जहाज कहाँ मिलेगा’? अब लोग समझने लगे और उसे रास्ता बताने लगे। जीवन में हमारे साथ भी यही होता है। हमें अपना प्रश्न सही ढंग से करना नहीं आता, अतः उत्तर भी सही ढंग से नहीं मिलते। जब तक हम अपने प्रश्न ध्यान से नहीं करते हमें उसके उत्तर भी ज्ञान से नहीं मिलते। कुछ ही समय में वह बंबई के बन्दरगाह पर पहुँच गया।

          लेकिन अब एक नयी समस्या! जहाज पर कैसे चढ़े और किस जहाज पर चढ़े। उसने फिर पूछना शुरू किया। लेकिन, न कोई बताने वाला और न ही उसकी बात को सुनने वाला। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। वह सबसे पूछता रहा। तभी उसने देखा कुछ लोग विशेष पोशाक पहने जहाज की तरफ जा रहे हैं। उसे लगा ये जरूर जहाज के कर्मचारी होंगे। उसने उन्हें भी पूछा, लेकिन उन्होंने बच्चे की बात पर ध्यान ही नहीं दिया। तब तक एक अफसर-सा आता दिखा। उसने उसे पकड़ा। दैवयोग से वह उसी जहाज का कप्तान था और उसने उसकी पूरी बात सुनी। उसने संक्षेप में पूरी बात बताई। उस बच्चे के जज़्बात से वह अभिभूत हो गया। कैप्टन के कहने पर वह जहाज पर उसके बताये काम, जहाज के इंजिन में कोयला डालना, के लिए तैयार हो गया।

          उस बच्चे का जहाज से अमेरिका सफर प्रारम्भ हुआ। काम न रहने पर वह जहाज के डेक आदि जगह पर घूमता और कैप्टेन के निजी कार्य करता। इन सब के बाद भी उसके पास काफी समय बचता। अतः उसने उसे और भी कुछ काम देने की याचना की। कैप्टन ने उसे जहाज के रेस्तरां में बैरे का काम करने का प्रस्ताव दिया जिसे बच्चे ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। अब वह अलग-अलग देश, संस्कृति, भाषा के अनेक लोगों से मिलने लगा, उनके केबिन में भी जाने लगा। यह क्रम लगभग तीन महीने तक चला।

          जहाज अमेरिका के बन्दरगाह पर लग गया। सब लोग झटपट उतरने की तैयारी करने लगे, यह बच्चा सब की नजर बचा जहाज से उतर गया और वहाँ की भीड़ में मिल कर २-३ मील तक भाग खड़ा हुआ। उसे अचानक कुछ पगड़ी धारी पंजाबी दिखे। वे पंजाबी में ही बातें कर रहे थे। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा और तुरंत उनसे मिला। वे इसकी पूरी बात सुन उसे अपने घर ले आए। उस मुहल्ले में अनेक पंजाबी थे, उसे तो ऐसा लगा कि वह अमेरिका नहीं पंजाब में  ही है। बच्चे को पता चला कि वे सब पंजाब से ही हैं और कई पीढ़ियों से हैं, खेती करते हैं। वहाँ के सब लोगों ने उसकी बहुत आवभगत की, उसे अच्छे से रखा और उसे प्रस्ताव दिया कि अब वह उन्हीं के साथ वहीं रह जाये। लेकिन बच्चा तैयार नहीं हुआ। वह तो वहाँ श्रीमान फोर्ड से मिलने आया था। जिस प्रकार यम ने नचिकेता को अनेक प्रलोभन दिये थे ठीक वैसे ही बिरादरी वालों ने बच्चे को अनेक प्रलोभन दिये – तुम्हें घर देंगे, खेत देंगे, खेती सीखा देंगे, स्कूल-कॉलेज में आगे पढ़ा देंगे, और तो और एक सुंदर अच्छी सी लड़की से तुम्हारी शादी भी करा देंगे – तुम यहीं रह जाओ। लेकिन इन सब प्रलोभनों को दरकिनार कर बच्चा अपने निश्चय पर अडिग रहा। एक निर्णय लेना और फिर उस पर अडिग रहना साधारण जज्बा नहीं है, जो उस बच्चे में था। आखिरकार उन्होंने भारी दिल से उसे विदा किया।

          अब वह फोर्ड के कारखाने के दरवाजे पर खड़ा था। वहाँ घुसने में उसे कोई विशेष कठिनाई नहीं हुई। लेकिन फिर, एक के बाद एक कई दरवाजे मिलते गए और उसकी मुसीबत बढ़ती गई। आखिरकार वह एक अफसर के सम्मुख खड़ा था। उसने उसकी पूरी बात सुनी और बोला कि वह उसके हिम्मत की कद्र करता है और उसकी ख़्वाहिश पूरी की जाएगी। उसने उसे कंपनी के अतिथिगृह में भेज दिया। थका हुआ बच्चा गहरी नींद में सो गया। कर्मचारी उसकी खिदमत में खड़े थे। दूसरे दिन उसे कारखाने के उस भाग में ले गए जहां मोटर गाड़ी  के कलपुर्जे बनते थे। एक-एक चीज उसे ठीक से दिखाई और समझाई गई। उसे भी बड़ा अच्छा लग रहा था। लेकिन इसी प्रकार एक के बाद दूसरे, दूसरे के बाद तीसरे कारखाने में जाते-जाते कई दिन बीत गए। फिर दिन सप्ताह में बदलने लगे। वह अब बेचैन हो उठा। बार-बार पूछने लगा उसकी मुलाक़ात श्रीमान फोर्ड से कब होगी। आखिरकार वह एक ऐसी जगह पहुंचा, जहां उसने पूरी चमचमाती, चलने को तैयार मोटर गाड़ी  देखी। वह बहुत खुश हुआ, लेकिन फिर उसने वही सवाल किया श्रीमान फोर्ड कहाँ हैं’?

          बच्चा अब फिर एक और नये उच्चाधिकारी के सामने बैठा था। उसे बताया गया कि फोर्ड से उसकी मुलाक़ात  कल होनी तय है। नियत समय पर वह तैयार था। जब वह फोर्ड के कमरे में पहुंचा तो उसे विश्वास नहीं हुआ कि वह इस धरा पर है या स्वर्ग में। उस सुसज्जित, विशालकाय, कमरे में फोर्ड ने खुद खड़े होकर उस लड़के का स्वागत किया। फोर्ड ने बहुत ही विनम्र भाषा में उससे भारत की भाषा-संस्कृति, रीति-रिवाज, रहन-सहन, खान-पान, प्रदेश, लोग, नदी-नाले-पहाड़ और तो और गांधी के बाबत भी प्रश्न किये। उनकी यह बात, जिसमें फोर्ड ने भारत में अपनी दिलचस्पी दिखाई लगभग ४-५ घंटे चली। बच्चे ने भी अपनी जानकारी के अनुसार सब प्रश्नों के उत्तर दिये। अब वह बच्चा अपने उद्देश्य पर आया, मैं कई दिनों से आपके कारखानों में घूम रहा हूँ। अनेक लोगों को देखा, उनसे मिला। वे सब साधारण वेश-भूषा में थे, अनेक के कपड़ों पर तो तेल वगैरह के दाग भी थे। मैंने आपको वहाँ कहीं नहीं देखा। आप तो इस कमरे में बेशकीमती स्वच्छ चमचमाते सूट में बैठे हैं। तब आप मोटर गाड़ी  कब बनाते हैं?” श्रीमान फोर्ड हंस पड़े, “मैंने एक जनरल मैनेजर नियुक्त कर रखा है। पूरा काम वही करता है”। बच्चे के सिर पर तो जैसे घड़ों पानी फिर गया, लगभग चीखते हुए कहा, “मुझे तो बताया गया कि आप ही गाड़ी बनाते हैं। इसीलिए मैं आप से मिलना चाहता था, लेकिन अगर यह काम आप नहीं आपका मैनेजर करता है तब मैं आप से नहीं आपके मैनेजर से मिलना चाहता हूँ। कृपया मुझे आप उनके पास भिजवायें या उन्हें यहाँ बुलवायें”। बच्चे को अपना ध्येय स्पष्ट था कि उसे मोटर गाड़ी  बनाने वाले से मिलना है। अपने ध्येय की स्पष्टता ही हमें सफल बनती है। फोर्ड का नाम तो वह इसीलिए ले रहा था क्योंकि उसे उस मोटर गाड़ी  के निर्माता के रूप में फोर्ड का ही नाम बताया गया था। अपने लक्ष्य को समझने में उसने जरा भी भूल नहीं की और उसी की लगन लगाए रखा।

          श्रीमान फोर्ड ने एक ठहाका लगाया, “वह मैनेजर तो यहीं है, आप के सामने, हर कहीं है, हर जगह है, हर समय है, सर्व शक्तिमान, परम ब्रह्म ईश्वर। वही इस ब्रह्मांड का शिल्पकार, निर्माता और रचनाकार है। यह वही है जो मेरे कारखाने को चलाता और गाड़ियाँ बनाता है। उसके हाथ अपना पूरा काम सौंप में निश्चिन्त हूँ। बच्चा मंत्र मुग्ध सा फोर्ड की बातें सुनता रहा। उसकी बातें उसके कानों में गूंजने लगीं। उसका जीवन बदल गया। उसे एक नयी रह मिल गई।

( सुरेन्द्र नाथ जौहर – जीवनी, लेखन और विचार से अनुदित)

(अगर आपका जीवन नहीं बदला, अगर आपके कानों में फोर्ड की बात नहीं गूंज रही है इसका मतलब यह है कि आप समझ नहीं पाये हैं, आपको इसे दुबारा पढ़ना है।

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ईश्वर                                                                      लघु बातें   - जो सिखाती हैं जीना

एक दिन मैंने ईश्वर से पूछा कि तुमने सब कुछ खोल कर रख दिया है। पहाड़- समुद्र, वन-उपवन, धरती-आकाश, सूरज-चाँद, सितारे-नक्षत्र, नदी-नाले, समुद्र-ताल, विभिन्न धातुओं का विशाल भंडार, अनगिनत वनस्पतियाँ, अनेक भांति और प्रकार के पशु-पक्षी, अनेकों प्रकार के मानव और भी न जाने क्या-क्या। लेकिन फिर तुमने अपने आप को क्यों छिपा कर रखा है? तुम क्यों नहीं दिखते?

          ईश्वर ने जवाब दिया, मैंने यह सब मानव के हित के लिए, उसके विकास के लिए ही रचा है। सृष्टि के विकास के लिए ही यह सब किया था। परंतु मनुष्य ने तो इस सब को बाजार में बदल दिया। बाजार ही क्यों सुपर बाजार बना दिया। मेरी बनाई गई और मनुष्य को बिना विशेष श्रम के उपलब्ध हर रचना को खरीदने-बेचने लगा! वनस्पति, पशु-पक्षी, खनिज और-तो-और ज्ञान भी बाजार तक पहुँच गया। प्रचुर मात्र में होने के बावजूद मनुष्य ने ऐसी व्यवस्था बना ली कि अनेकों के पास इनका अभाव है। मैं तो डर गया, अगर मैं भी प्रगट हो जाऊँ तो मैं भी बाजार में बिकने लगूँगा। इसीलिए मैंने अपने को छिपाकर रखा हुआ है। लेकिन क्या भरोसा! मुझे भी ढूंढ कर निकाल लें, मैंने मनुष्य को ऐसी संभावनाएं तो दे ही रखी हैं कि वह मुझे ढूंढ ले। यदि मेरा आदर-सम्मान हो और मेरा सही इस्तेमाल हो तो मैं प्रकट हो जाऊँ।

(वंदना खन्ना)

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सोमवार, 1 अगस्त 2022

सूतांजली अगस्त 2022

 सूतांजली

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वर्ष : 06 * अंक : 01                                                                अगस्त   * 2022

आजादी के अमृत महोत्सव  एवं श्रीअरविंद की 150वीं जयंती पर शुभ कामनाएँ - बधाई

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धन्यवाद

इस माह हम पाँच वर्ष पूर्ण कर छठे वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। यह आपके स्नेह और सुझावों के कारण ही संभव  हो सका है। आप से एक ही अनुरोध है, मेल,  ब्लॉग या  व्हाट्सएप्प पर संपर्क बनाए रखें और अपने सुझावों से हमारा मार्गदर्शन करते रहें।

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स्वाधीनता पाना आसान है लेकिन

उसे बनाये रखना उतना आसान नहीं है।

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मौलिक विचारों की आवश्यकता                                           मैंने पढ़ा

(श्रीअरविंद को हम एक महान योगी के रूप में  जानते हैं। कुछ लोग जानते हैं कि योगी बनने के पूर्व वे एक जुझारू क्रांतिकारी भी थे जिन्होंने अपनी लेखनी से भारत के युवा वर्ग को झकझोर उन्हें जाग्रत और उनका पथ-प्रदर्शन किया। अंग्रेज़ सरकार उनसे परेशान थी और निरंतर उन्हें जेल में ठूँसने के लिए प्रयत्नशील थी। इसके बावजूद श्रीअरविंद निरंतर लिखते रहे। उन्होंने अपनी सशक्त लेखनी, अपने संवादों, अपने भाषणों से कायरता को वीरता में, निराशा को आशा में और निष्क्रियता को सक्रियता में परिणित कर दिया। वैसे ही लेखों की एक बानगी।)

हमारी सबसे ज्यादा एवम् पीड़ादायक बेबसी यह है कि हाल  में युरोप द्वारा हमारे पर  नई शर्तें और नया ज्ञान  थोपा जा रहा है । हमने इसे आत्मसात करने, हमने इसे नकारने, हमने इसे चुनने की कोशिश की परन्तु हम इसमें से किसी भी बात को सफलतापूर्वक नहीं कर पाये। इसे सफलतापूर्वक आत्मसात करने के लिए दक्षता की आवश्यकता है; लेकिन हम यूरोपियन परिस्थिति और ज्ञान में कौशल हासिल नहीं कर पाये, और हम उनके द्वारा जब्त, अधीन और गुलाम बना लिए गए। किसी भी बात को सफलतापूर्वक अस्वीकार करना इस बात पर निर्भर करता है कि हम कितनी समझदारी से यह समझ पाएँ कि हमें क्या अपनाना है। हमारी अस्वीकृति भी कुशलता पूर्वक होनी चाहिये,  हमें कोई बात समझ कर अस्वीकार करनी चाहिए बजाय इसके कि  हम समझने में असमर्थ रहें।

          लेकिन हमारा हिन्दु धर्म और हमारी पुरातन संस्कृति, हमारी वह धरोहर जिसे हमने न्यूनतम बुद्धिमत्ता से सँजोया; हमने जिंदगी भर वह सब कुछ बिना सोचे-समझे-विचारे किया, हमने विश्वास किया, बिना सोचे कि हम इस पर क्यों विश्वास कर रहे हैं, हम दृड़तापूर्वक यह इसलिये करते हैं कि कहीं-किसी किताबों में ऐसा लिखा है,  या किसी  ब्राह्मण ने ऐसा  कहा है, क्योंकि शंकर  ऐसा सोचते  हैं, या फिर ऐसा इसलिए करते हैं कि किसी ने इस बात का यह मतलब निकाला है कि हमारे मूल ग्रंथ या हमारा धर्म ऐसा कहता हैहमारा कुछ भी नहीं है और न ही हमारी बुद्धि में ऐसा व्याप्त है। जो कुछ भी हमारे पास है वह हमने कहीं से प्राप्त किया है। हमने नये ज्ञान के बारे में बहुत थोड़ा सा जाना है, हमने सिर्फ यही समझा है, जिसे यूरोपियन ने हमें  उनके और उनकी नवीन सभ्यता के बारे में समझाया है। अंग्रेजी सभ्यता – अगर उसे हम सभ्यता कहें तो – पर हमारी निर्भरता 10 गुना बढ़ी है बजाय का निदान करने के।

          इससे भी ज्यादा, सफलतापूर्वक चुनाव में हमारी बुद्धि का स्वावलंबी होना आवश्यक है। यदि हमारे पास सिर्फ नये विचार या नई व्यव्स्था उसी तरह से आते हैं जिस तरह से वे प्रस्तुत किये जा रहे हैं तब हम बजाय चुनने के उसकी नकल करें तो यह एक  मूर्खतापूर्ण और  अनुपयुक्त कदम  होगा। यदि हमें यह ज्ञान हमारे पूर्व ज्ञान के आधार पर है जो कि कई बार शुन्य था, हम उसको बिना समझे, मूर्खतापूर्वक अस्वीकर कर देंगें। चुनाव का तात्पर्य यह है कि हमें वस्तुओं को स तरह नहीं देखना चाहिये, जिस तरह से विदेशी देखते हैं या फिर हमारे रूढ़िवादी पंडित जैसे देखते हैं, बल्कि में इनको उसी तरह से देखना चाहिये जिस तरह से वे हैं। लेकिन हमने उनको अंधाधुंध या बेतरतीब तरीके से आत्मसात कर लिया है या फिर अस्वीकार कर दिया है, हमें यह पता ही नहीं कि कैसे आत्मसात या अस्वीकृत करना चाहिए।  फलस्वरुप, हम युरोपियन प्रभाव से पीड़ित हो जाते हैं और इस प्रकार हम कई मुद्दों पर हार जाते हैं या मूर्खतापूर्वक उसका विरोध करते हैं, अपने परिवेश के गुलाम बन जाते हैं और फिर हम न तो नष्ट होते हैं और न ही अस्तित्व बचा पाते हैं।   हम वास्तव में कुछ सरलता और सूक्ष्मता को सँभाल पाते हैं,  हम कुछ चमक के साथ खूबसूरत नकल कर लेते हैं, हम उसको प्रशंसा के साथ शानदार ढंग से उस विषय की बारीकता के साथ ग्रहण कर सकते हैं, लेकिन हम प्रायः सोचने में असफल हो जाते हैं और हम अपने जीवन और हृदय को नियंत्रित करने में असफल हो जाते हैं जबकि हम जीवन और हृदय पर नियंत्रण करके ही आशा रख सकते हैं और एक राष्ट्र के रूप बच सकते हैं।

          हम अपने खोये हुए ज्ञान की स्वतन्त्रता और लोच को किस तरह से पुनः प्राप्त कर सकते हैं? हम, भले ही कुछ समय के लिए, से जिस तरह से खोया है उसके विपरीत जाकर, या फिर सब विषयों में अपने विचारों को मुक्त कर, दासत्व से अधिकार की सोच अपनाकर ऐसा कर सकते हैं।  वह यह नहीं है कि सुधारक या शब्दों का अंग्रेजीकरण करने वाले हम से क्या चाहते हैं। इनका कहना है कि हमें सत्ताधारी पर ध्यान नहीं देना है और अन्धविश्वास और रीति रिवाजों के विरुद्ध विद्रोह कर के ऐसा कर सकते हैं और  अपने मस्तिष्क को इन बन्धनों से मुक्त कर सकते हैं। “इनका कहना है” से तात्पर्य है कि हमें त्यागना है मैक्स मुलर के अधिकार के लिए सायना के अधिकार को भी, शंकर के एकतावाद या अद्वैतवाद या फिर दार्शनिक हैकल के द्वैतवाद को भी, या फिर जो शास्त्रों के अनुसार है या फिर जो युरोप के अलिखित शास्त्रों के अनुसार है, या फिर ब्राह्मण के खिलाफ या फिर युरोप के वैज्ञानिकों और विचारकों या विद्वानों के हठधर्मी सुझावों को भी। दासता के ऐसे मूर्खतापूर्ण  कार्य को किसी भी प्रकार का आत्मसम्मान नहीं मिलता है। हमें वह कड़ी तोड़नी है, चाहे वो कितनी भी सम्मानित क्यों न हो, परन्तु यह सब स्वतंत्र रुप से होनी चाहिये, लेकिन यह होना चाहिए सत्य के लिए, यूरोप के नाम पर नहीं।  यह एक अच्छा सौदा नहीं होगा यदि हम अपने पुराने अलंकरण चाहे वो हमारे लिए कितने भी पुराने क्यों न हो गये हों, को युरोपियन शिक्षा के लिए आदान प्रदान करें या फिर हमारे हिंदुओं के लोकप्रिय अन्धविश्वास या मत को विज्ञान के भौतिकतावाद के अंधविश्वास से परिवर्तित करें।

          हमारी  पहली अवश्यकता है, अगर हमें अपना अस्तित्व बनाए रखना है तब, हमें विश्व में हमारे  नियत कार्य को पूरा करना है और वह यह है कि भारत के युवा सभी विषयों पर स्वतंत्रतापूर्वक अपने विचार व्यक्त करना सीखें ताकि हर विषय पर लाभदायक तरीके से उसकी जड़ तक जायें, न की सतह तक ही सीमित रह जायें, पक्षपात से रहित हों, कुतर्क और दुर्भावना से प्रेरित न हों, और तेज धार की एक तलवार की तरह सभी प्रकार के  दकियानूसी अंधकारवादी विचारधारा को काट दें, भीम की गदा की तरह प्रहार करना चाहिए। हम नहीं चाहते हैं कि हमारा मस्तिष्क युरोप के शिशुओं की तरह हो जाये, उनकी तरह कपड़े में लपेटे हुए नहीं रहें,  हमारे युवा ईश्वरीय प्रदत्त स्वतंत्र और अवरोध रहित गतिवान रहें, भारत की केवल सूक्ष्म ही नहीं बल्कि स्वाभाविक रूप से प्राप्त व्यापक और संप्रभुता को पुनः प्राप्त करें और अपने मूल्य को खुद समझें।  यदि हम अपनी पुरानी बेड़ीयों को पूरी तरह से हटा नहीं सकते हैं तो फिर बाल कृष्ण की तरह छकड़े को घसीटते हुए आगे बढ़ें और दो पेड़ों को, जो दो धारायें और अड़चनें आ रही हैं,  मध्यकाल का अंधापन, दुर्भावनायें, हठधर्मिता और आधुनिकता की स्वाभिमानता को, उखाड़ फेंके।  पुरानी नींव टूट चुकी है और  हम इस भयंकर उथल-पुथल और बदलाव की नदी में इधर-से-उधर बह रहे हैं। भूतकाल की बर्फ की चट्टानों के साथ चिपके रहने का कोअर्थ नहीं है, ये तुरंत पिघल जाएंगे और  वे उन सब शरण लेने वालों को भयंकर खतरनाक पानी में गोते लगाने के लिए छोड़ देंगे। हमें इस कमजोर दलदल में फँसने की जरुरत नहीं है, न तो समुंदर में और न ही इस सूखी धरती पर जिसका सम्बन्ध उधार ली हुई युरोप की सभ्यता से है। वहाँ पर हमारा निश्चित ही दुः भरा एवम् बुरा अंत होगा। अब हमें तैरना सीखना है ताकि हम जीवन के उस जहाज तक पहुँच जायें जहाँ पर सत्य कभी भी परिवर्तित नहीं होता है। इस प्रकार हम वापस उस अतिप्राचीन सुदृड़ चट्टान तक पहुंचे।

          हमें अपना चुनाव अंधाधुंद तरीके से बिना सोच विचार के  हीं करना है और न ही कोई खिचड़ी पकानी है और बाद में यह घोषणा करें कि यह पूर्व और पश्चिम का समावेश है। हमको शुरुसे ही, चाहे जो कुछ भी स्त्रोत हो, उस पर विश्वास करके स्वीकार नहीं करना चाहिए, बल्कि खुद सब पर प्रश्न कर अपनी राय खुद बना कर स्वीकार करना चाहिए। हमें इस बात से डरना नहीं है कि हम भारतीय नहीं कहलायेंगे या फिर इस खतरे में पड़ जायेंगे कि हम हिन्दू नहीं रहेंगे। यदि वास्तव में  अपने बारे में इस तरह सोचते हैं तो ऐसा कभी नहीं होगा कि भारत कभी भारत नहीं होगा या फिर हिन्दू हिन्दू नहीं रहेंगे। यह तभी सम्भव है जब हम स्वयं यह मान लें कि हम युरोप की नकल हैं तथा हमारा सारा कार्य  मूर्खतापूर्वक होता है। हमें कभी भी पक्षपात नहीं करना है, और हमें कोई निर्णय लेने के पहले इसकी जानकारी होनी चाहिए। मूलरुप से हमें यह सोचना होगा कि किसी भी बात को बिना कोई प्रश्न किये स्वीकार नहीं करना है।  इस तरह हमें अपनी पुरानी और नई, उन सभी राय से जिसका हमने परिक्षण नहीं किया है, हमारे हमेशा के पारंपरिक संस्कार और पहले से ही सोचे हुए निर्णय से छुटकारा पाना है।

श्रीअरविंद, CWSA Vol 12 पृष्ठ 39-41

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माई जी की भारत-माता

हिन्दी साहित्यकार श्री धर्मवीर भारती का नाम अपने अवश्य सुना होगा। उन्होंने अनेक छोटे-छोटे यात्रा-वृतांत भी लिखे हैं। ये बहुत ही मर्मस्पर्शी हैं। हमें आईना दिखती हैं कि हम क्या थे और क्या हो गये।

          भारतीजी  जब इन्डोनेशिया पहुंचे वहाँ सैनिक कार्यवाही से सत्ता पलट का वातावरण था। शहर तनाव ग्रस्त था, कर्फ़्यू लगा था, भय का वातावरण था। उनकी मेजबान थीं माई जी। वे किसी से नहीं मिलती थीं। भारतीजी से भी नहीं मिलीं। लेकिन दूसरे दिन सुबह माईजी के बाशिंदे ने खबर दी की माईजी उनसे मिलने के लिए आना चाहती हैं। भारतीजी को बड़ा आश्चर्य हुआ, माईजी के घर वालों को तो होना ही था। खैर वे आईं और उनके साथ बड़ी लंबी वार्तालाप हुई। तब भारती जी को पता चला के वे उनसे मिलने क्यों आईं? क्योंकि भारत की आजादी के बाद भारतीजी उनके पहले मेहमान थे जो रात 9 बजे सो गए, शुद्ध शाकाहारी थे, शराब नहीं पीते थे और भारतीय भाषा में बात करते थे। इससे भारतीजी का कुतूहल शांत नहीं हुआ। माईजी ने बताया कि उनका बड़ा बेटा, सुभाष (सुभाष चंद्र बोस को वे अपना बड़ा बेटा मानती थीं) जब वहाँ आया तब माई जी ने अपने सब गहने और पैसे उनके पास भेजे लेकिन सुभाष ने सब लौटा दिये और बोले, नहीं मां, मुझे सिपाहियों की ज़रूरत है। अपना बेटा देगी? बोल?’ हंसकर बेटे को भेज मां, रोकर नहीं।मैं कैसे मना करती। मैंने भेज दिया। वो रोने को मना किया था। मैं उसके सामने नहीं रोयी, घर जाकर बहुत रोयी। लेकिन ...

लेकिन पर आकार माईजी अटक गई। भारतीजी इंतजार करते रहे लेकिन जब वे कुछ नहीं बोलीं तब...

लेकीन क्या' मैंने पूछा।

लेकिन क्या बेटा, सब लेकिन ही लेकिन है। मैं कितनी खुश थी कि मेरे दोनों बेटों का सपना पूरा हुआ। गोरे चले गये मैंने कहा, मैं अपने गांव एक बार जाऊंगी, हैदराबाद सक्खर के पास मेरा गांव है। तो सब लोग बोले- वहां तो मारकाट मची है। वह तो अब पाकिस्तान में है।  मेरा तो जी धक से हो गया ऐसी कैसी आज़ादी आयी कि देस परदेस हो गया। मैं मैके के गांव भी नहीं जा सकती? मुझे अच्छी तरह मालूम है कि वह है भारत है फिर ये लोग मुझे औरत समझकर बहका रहे हैं। पाकिस्तान में कैसे हुआ मेरा गांव? मैं समझ गयी, मेरा बेटा है नहीं, ये लोग डरते हैं कि मायके जाकर मैं अपने मायके वालों को सब ज़मीन-जायदाद दे आऊंगी।

 

बात यहाँ समाप्त नहीं हुई, असली सदमा तो तब लगा जब ...

गांधी ने कहा था, सुदेशी कपड़ा पहनो।  कई साल बाद बांबे शहर से कई मेहमान आये। यहां से मेरी दुकान से कितना कितना जापानी माल, कपड़ा सब ले गये, वहां बेचकर साढ़े तीन हज़ार रुपया मुझे भेजा, सब बिलेक में बेचा। उस दिन मैं फिर रोयी हे भगवान भारत माता तो आज़ादी हो गयीं, तब यह कैसे हो रहा है? फिर यहां इस देश में सोने की बहुत कमी हो गयी, तो कई लोग आये भारत से सोना छिपा कर लाये। चौगुने पचगुने दाम पर बेचा। मैं तो देखती रह गयी। गुलाम थे, तो गोरे भारत का सोना ले जा रहे थे लूटकर, पर ये तो गोरे नहीं हैं। ये भारत का सोना क्यों ला रहे हैं? अरे क्या भारत माता इनकी माता नहीं हैं, कोई मां का सोना गहना बिलेक में बेचता है क्या? मुझे बहुत गुस्सा आया। उस दिन मैं बड़े बेटे से खूब लड़ी।

 

ये लड़के आये एक बंबई से है, एक ही कठियावाड़ से, एक जयपुर से सब आज़ादी में के बाद के हैं छोकड़े। खूब सड़ाब पीते हैं, गोरों की तरह गिटपिट बोलते हैं, गोरों की भाषा में। फिर एक बार कोई दिल्ली शहर से आया। इसी कमरे में टिका। खद्दर पहने था। लेकिन बातचीत, खानपान सब गोरों का। उस दिन मैंने छोटे बेटे से जाकर कहा पूजाघर में, बेटा, अब तुम सचमुच मर गये। पर तुम्हें सोचना तो चाहिए था कि विधवा मां को अकेला छोड़कर तुम किसके लिए मरने चले गये थे।  इन लोगों के लिए? फिर मैं चुप हो गयी। क्या फायदा बेटे का दिल दुखाने से? मैंने बहुत दिलासा दिया उसे, घबराओ मत बेटा, सब ठीक हो जाएगा। पर कहां ठीक हो रहा है। तुम तो सच्चे साई हो,  सच-सच बताना क्या ठीक हो रहा है?

मैं चुप बैठा रहा, क्या बोलता?

क्या आपके पास कोई उत्तर है। हम तुरंत कह देते हैं –

सब करते हैं’, हम तो व्यापारी हैं, जिस काम में दो पैसा मिलता है हम वही करते हैं, नहीं करें तो क्या खुद खाएं क्या परिवार को खिलाएँ

तो क्या हम पैसे के लिए अपनी माँ को ..... भारत माँ को बेच देंगे?

जमशेदजी टाटा का भी एक वाकिया है। यह भी पढ़ लीजिये-

वर्ष की समाप्ति के बाद उनके सामने खाता-बही रखा गया। उन्होंने एक नजर डाली और उन्हें लगा कि टैक्स का हिसाब गलत है। उन्होंने अपने चार्टर्ड अकाउंटेंट को बुलाया, और अपने टैक्स का हिसाब पूछा। अकाउंटेंट ने पूरी जानकारी दी। जमशेदजी ने पूछा, क्या यह कानूनी रूप से सही है। अकाउंटेंट ने पूरे आत्मविश्वास से कहा कि यह पूरी तरह से कानून सम्मत है और इस प्रकार से टैक्स के बहुत बड़े रुपये बच जायेंगे। जमशेदजी को बात समझ आ रही थी और यह सलाह उनके गले के नीचे नहीं उतर रही थी। कुछ विचार करने के बाद उन्होंने और एक प्रश्न  किया, क्या यह नैतिकता के दृष्टिकोण से सही है?’ अकाउंटेंट हकबका गया, उसे कोई जवाब नहीं सुझा। जमशेदजी ने तुरंत कहा, नहीं हमें टैक्स की चोरी नहीं करनी है, पूरा टैक्स दीजिये जमशेदजी उठ खड़े हुए, वार्ता समाप्त हो गई।

प्रजा गलत हो तो राजा ठीक करता है, राजा गलत हो तो प्रजा ठीक करती है, और अगर दोनों गलत हों तो कौन ठीक करे......

देश हो, व्यापार हो, संगठन हो, समाज हो, परिवार हो ये बनते हैं उनमें रहने वाले नागरिकों से, सदस्यों से, व्यक्तियों से।

हमारा देश वैसा ही होगा जैसे हम हैं।

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शुक्रवार, 1 जुलाई 2022

सूतांजली, जुलाई 2022

 सूतांजली

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वर्ष : ०५ * अंक : ०१२                                                              जुलाई  * २०२२

जीवन में सबसे बड़ा आनंद वह कार्य करने में है जिसे

लोग कहते हैं

आप नहीं कर सकेंगे।

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विडम्बना

संसार का हर संगठन जानता है कि जिस आवश्यकता की पूर्ति के लिए उसका जन्म हुआ है उस आवश्यकता का बना रहना, बल्कि और बढ़ते रहना ही उसके जिंदा रहने की शर्त है। बीमारियाँ खत्म हो गई तो दवा निर्माता कहाँ जाएंगे? विश्व में शांति और सौहार्द होगा तो हथियार निर्माण का विशाल कारोबार कहाँ जाएगा? दवा निर्माताओं को स्वास्थ्य में रुचि नहीं होती, हथियार बनाने वालों को केवल युद्ध चाहिए और राजनीतिक पार्टियों को समस्याएँ।  इसलिए धर्मों को जन्मे हजारों वर्ष बीत जाने के बाद भी मनुष्य की आत्मा उतनी ही प्यासी है, उसकी चेतना का स्तर कहीं भी ऊपर उठता दिखाई नहीं देता, शांति और विश्व बंधुत्व की जगह धार्मिक, जातीय, सामाजिक संकीर्णता के परस्पर विरोधी दायरे बनते जा रहे हैं। अपनी सामूहिक पहचान को बनाए रखने का आग्रह अहमन्यता तक पहुँचता दिखाई देता है। या तो हर स्थान पर संगठित धर्म की असफलता है या एक संगठन होने के नाते कोई धर्म नहीं चाहता कि वे समस्याएँ  समाप्त हो जिन पर उनकी उपादेयता टिकी है। शायद इसीलिए धर्मों और धर्मगुरुओं को लक्ष्य करके 20वीं सदी के गंभीर विचारक जे. कृष्णमूर्ति ने कहा था, जिस क्षण आप किसी का अनुसरण करते हैं, आप सत्य का अनुसरण बंद कर देते हैं (The moment you follow someone, you cease to follow truth.) धर्म हो, धर्मगुरु हो या धर्म ग्रंथ वह केवल एक इशारा भर करते है। संस्कृत के अनुसार गुरु की अंगुली तो शिष्य को संकेत देती है, मार्ग इस दिशा में है। अब अगर शिष्य अंगुली पकड़ कर बैठ जाए तो अपनी मंजिल पर कैसे पहुंचेगा? धर्मगुरु अगर सही है तो भी वह हमारे और सत्य के मध्य केवल एक सेतु भर है। उस पर चलना तो हमें ही होगा।

          पैगंबर, मसीहा, संत, मोहम्मद सिर्फ सहायता कर सकते हैं, अपने सत्य की खोज तो हमें खुद ही करनी होगी। डॉ.राधाकृष्णन ने कहा था, धर्म ही, प्रत्येक व्यक्ति के अंदर जलनेवाली ज्वाला को प्रज्ज्वलित करने में सहायता करती है। धर्म केवल सहायता करती है, उसे जलाना और जलाए रखना हमारा ही काम है।

यहाँ एक बोध कथा का उल्लेख सामयिक होगा –

संत ने एक रात सपना देखा। सपने में वह स्वर्ग जा पहुँचा। सारा स्वर्ग सजा-धजा था - रास्तों पर फूल, इमारतों पर रोशनी की लड़ियां, चारों ओर नृत्य और संगीत उसने पूछा, 'भाई, क्या बात है? कोई उत्सव है क्या?' जवाब मिला, 'आज परमात्मा का जन्मदिन है। सड़क पर एक लंबा जुलूस गुजरने लगा। जुलूस के आगे घोड़े पर बैठा एक आदमी चल रहा था। संत ने सवाल किया, भाई ये महाशय कौन हैं? जवाब आया, ' ये ही तो हजरत मोहम्मद हैं।' पीछे लोगों का हुजूम उमड़ रहा था। फरीद ने पूछा, 'फिर ये लोग कौन हैं? जवाब मिला, ये लोग मोहम्मद के अनुयायी हैं। इन्हें मुसलमान कहते हैं।'

          पीछे-पीछे क्रूस हाथों में लिए लाखों ईसाइयों के साथ ईसा मसीह आए। इसके बाद अपने स्वर्ण रथ पर बैठे कृष्ण आए, धनुर्धारी राम आए। पीछे नाचते-गाते भक्तों का मेला लगा हुआ था.... इसी तरह पैगंबर आते रहे, जय-जयकार करते जुलूस गुजरते रहे। और सभी जुलूसों के गुजर जाने के बाद अंत में एक अधेड़ सा आदमी आता हुआ दिखाई दिया। उसके साथ कोई नहीं था। वह निपट अकेला चला जा रहा था। उसे देख कर संत विचार में पड़ गया। न कोई अनुगामी, न कोई साथी, यह अकेला कहाँ जा रहा है। संत ने पूछा, 'श्रीमान, आप हैं कौन? मोहम्मद, ईसा, राम, बुद्ध..... सभी को मैं पहचानता हूं। बिना किसी अनुगामी के इस तरह आप कौन हैं?!"

          उस व्यक्ति ने एक उदास-सी मुस्कान के साथ कहा, 'प्रिय मित्र, मैं ही परमात्मा हूँ। आज मेरा जन्मदिन है। लेकिन कुछ लोग, ईसाई बन गए, कुछ मुसलमान, कुछ यहूदी, कुछ हिंदू, कुछ ... मेरे साथ चलने के लिए कोई नहीं बचा'

          ...अगर आपने परमात्मा को लेकर पहले से ही कोई धारणा बना ली है, तो आप उसे नहीं जान सकते। आपकी धारणा ही आपके और ईश्वर के बीच सबसे बड़ी दीवार बनी है। सभी बाह्य धारणाओं को छोड़ देने पर ही अंतर्यात्रा आरंभ हो सकती है। यही सोच मनुष्य के आध्यात्मिक संसार और व्यावहारिक संसार की दूरियाँ मिटाने का भी प्रयास है। अध्यात्म धर्मस्थलों और धर्मग्रंथों में बंद करके रख देने की चीज नहीं है। अध्यात्म वही है, जो बाहर से जीवन और भीतर से आत्मा को बदल सके, अधिक समृद्ध, अधिक विस्तृत कर सके। आध्यात्मिक राह पर पैर जमाकर चलने के लिए जरूरी है कि हमारा व्यक्तिगत जीवन भी प्रेम, शांति और आनंद से परिपूर्ण हो। जैसे आध्यात्मिक क्षेत्र में हिंदुत्व, बौद्ध, जैन,  ताओ, ईसाइयत आदि से सहयोग लिया, उसी तरह बाह्य जीवन में पूर्णता लाने के लिए मनोविज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान, पर्यावरण विज्ञान और समाज शास्त्र आदि से सहायता लेने में भी कोई संकोच नहीं किया जाना चाहिए।

          इस तरह एक अंतर-बाह्य परिपूर्ण, स्वतंत्रचेता और ऊर्जावान मनुष्यों के गतिमान संसार का स्वप्न देखिए। समझिए, कहीं हम सभी उसी भीड़ का ही एक हिस्सा हैं जो परमात्मा को भूल उसके धर्म-संगठनों का अनुगमन कर रहा है?  वेदव्यास ने लिखा है, प्राणियों की अभिवृद्धि के लिए धर्म का प्रवचन किया गया है, अतः जो प्राणियों की अभिवृद्धि का कारण हो, वही धर्म है।

          परमात्मा का अनुगमन कीजिये। कम से कम एक बंदा तो उसके साथ हो।

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ईश्वर को एक अर्जी                                                                     

हे परम पिता, परम अदरणीय एवं आराध्य ईश्वर,

आपके चरणों में मेरा सविनय प्रणाम।

          मैं एक अति नाजुक और आवश्यक विषय पर आपको यह पत्र लिखने का दु:स्साहस करने की आजादी ले रहा हूँ।

          आपने हमें, पूर्णत: रिक्त, बिना आपकी जानकारी और जीवन के उन सिद्धांतों से जिनपर हमें चलना है, अवगत कराये, इस जगत में भेज दिया। आपने हमें इस बात की भी जानकारी नहीं दी कि हमने अपने पूर्व जन्म में कितनी साधना की, हमारी प्रगति हुई या अवनति, हमने कितने कक्षाओं को उत्तीर्ण किया और अब हमें कहाँ से प्रारम्भ करना है।

          अपने हमें बारम्बार नर्सरी कक्षा में ही डाल दिया। आपके नियम हम कभी समझ नहीं पाये।

          जब हम यहाँ एक भोले-भाले और अज्ञानी के रूप में आये तब हमें हजारों प्रकार के वातावरणीय दबावों में डाल दिया; यथा – माता-पिता, दादा-दादी, भाई-बहन, अनेक संबंधी और उनके बच्चे, हमारे अनगिनत पड़ोसी, असंख्य मेहमान और कभी समाप्त न होने वाले पारिवारिक मित्र, सहपाठी, सड़कें, गाँव, कस्बे, शहर के लोग और उनके बच्चे, बाजार, विज्ञापन, रेडियो, टेलीविज़न, विडियो, अखबार उनके विचार और दृष्टिकोण, राजनीतिक पार्टियां और उनके अपने स्वार्थ, संगठन और ट्रस्ट, पंथ और मठ, गुरु और आश्रम, विचारक और अनेकानेक पथ, हर ढंग और रंग के और उनका अलग-अलग गहरा और हलकापन, बिना किसी नियंत्रण के, हमें पूरी तरह भ्रमित करने के लिए। हम इन्हीं सब के आकस्मिक और उलझन से प्राकृतिक रूप में पैदा हुए, हमारे हाथ में कुछ भी नहीं है। तब हमारी गलतियों और त्रुटियों के लिए आप हमें कैसे दोषी ठहरा सकते हैं?

          जब हम युवा थे, उस समय आपने हमें वैवाहिक जीवन के धधकते चूल्हे पर चढ़ा कर हमें बच्चे पैदा करने के कार्य में लगा कर उसे ढोने में लगा दिया। हे मेरे ईश्वर! आप यह जानते थे कि हमें कैसे नये वातावरण और परिस्थितियों में से गुजरना होगा।

          और अब, जब हम अपने विगत जीवन के अनुभवों के आधार पर हम अपनी भूलों और गलतियों, दोषों और मूर्खताओं को समझने लगे हैं, हम कुछ हद तक परिपक्व हो गये, हमें इतना ज्ञान प्राप्त हुआ कि हम कुछ बेहतर और पवित्र जिंदगी समझ पायें, हम दूसरों को ज्ञान देने में सक्षम बने, तब मेरे ईश्वर आपने हमें बूढ़ा और अक्षम बना दिया, और हमारी प्रत्येक मानसिक शक्ति और कार्य करने की  क्षमता को बिगाड़ दिया। यही नहीं अपने तब यमराज को हमारे पास बिना जमानत का वॉरेंट और बिना किसी शर्त का सम्मन के साथ भेज दिया जिसकी न कोई सुनवाई हो सकती है और न ही हम अपनी परिस्थिति बयां कर सकते हैं। आपने न हमें, न हमारे वकील को जिरह करने की अनुमति दी और एक तरफा फैसला सुना दिया।

          मेरे ईश्वर, आपने इस बात को समझने से इंकार कर दिया कि जब हमें इस जीवन का थोड़ा अनुभव और ज्ञान प्राप्त हुआ, हमें अपनी भूलों, मूर्खताओं, और अज्ञान का अहसास हुआ तब हमने यह शपथ ली कि बहुत हुआ अब नहीं और यह निश्चय किया कि अब आगे हम एक अच्छी, पवित्र और सच्चाई की जिन्दगी जिएंगे। तब उस अवसर का लाभ उठाते हुए हमें नए सिरे से नई ऊर्जा के साथ हमारी तीक्ष्ण  मानसिक शक्ति और नए मानस, शरीर तथा आत्मा से आपके अनुरूप कार्य करने और दूसरों को भी परामर्श देने में लगाते। 

          मेरे ईश्वर, आपके वर्तमान कार्य प्रणाली में कहीं-कुछ बुनियादी भूल है। मेरे ईश्वर शायद, आपको एक नई प्रणाली ईजाद करनी चाहिए जिसमें सकारात्मक और नकारात्मक नंबर दिये जाएँ और अगर नकारात्मक १०० नंबर मिल जाएँ तब हमें नर्क में भेजें जहां से हम फिर से शून्य से जीवन प्रारम्भ करें।

          मेरे ईश्वर, अब तक तो आपके पास कई प्रतिभाशाली लोग पहुँच गए होंगे। मैं आपसे निवेदन और प्रार्थना करता हूँ कि आप अब कोई एक ऐसा नवीन तरीका ईजाद कर सकते हैं या बनवा सकते हैं ताकि हम ८४ लाख योनियों में प्रविष्ट होने के कष्ट से बच सकें।

          अगर आपने हमारी प्रार्थना और निवेदन को स्वीकार नहीं किया तब हमें इस बात के लिए बाध्य होना पड़ेगा कि हम इस मुद्दे को भड़काएँ, विद्रोह करें और अपने एक नया साम्राज्य बनाने के लिए आँधी उठाएँ। 

अपनी पूरी श्रद्धा के साथ,

हम हैं

इस धरती के बच्चे

(श्री अरविंद आश्रम-दिल्ली शाखा द्वारा प्रकाशित सुरेन्द्र नाथ जौहर – जीवनी, लेखन और विचार पर आधारित)

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जिंदगी ....., जरूरी यह है कि वह कुछ बेहतर दे           मैंने पढ़ा

एक दिन कहानीकार हाथार्न और कवि लॉन्गफेलो एक साथ भोजन ले रहे थे। हाथार्न ने कहा, 'मैं बड़े दिनों से उस दंतकथा पर कहानी लिखने की सोच रहा हूं, जिसमें एक लड़की अपने प्रेमी से अलग हो जाती है और सारी जिंदगी उसे खोजती फिरती है। सारी जिंदगी, माने बूढ़ी होने तक... और अंत में उसका प्रेमी उसे एक अस्पताल में मिलता है, मृत्यु शैया पर पड़ा हुआ। वह उसके पास पहुंचती है, उसे देखती है, छूती है और वह उसकी बाहों में दम तोड़ देता है। जानते हो लॉन्गफेलो, ये कहानी मुझे बार-बार प्रेरित करती है, लेकिन इसे लिखने में मैं अब तक असमर्थ रहा हूं।"

          लॉन्गफेलो ने एक क्षण सोचते रहने के बाद सवाल किया, 'तुम कहो तो इस पर मैं कविता लिखूं ? हाथार्न ने सहमति दे दी। तब लांगफेलो ने 'इवेजेलिना' नामक मर्मस्पर्शी काव्य की रचना की। दो महान साहित्यकारों के बीच घटी इस घटना से कई चीजें सीखी जा सकती हैं-

एक)                अगर आपके पास ऐसा अवसर है, जिसको आप पूरी तरह से निभाने की मनः स्थिति में नहीं हैं, तो उसे व्यर्थ मत पकड़े रखिए। उदार बनकर उसे किसी और को सौंप दीजिए। इससे वह अवसर ही नहीं, आपका व्यक्तित्व भी एक सुखद राह पा जाएगा।

दो)                   जब आप जीवन को कहानी की तरह लिखने की कोशिश करते-करते थक जाएं, तो कुछ नया करें। यह सोचना शुरू करें कि उसे कविता में कैसे तब्दील किया जाए!

तीन)               अगर आपके पास कोई सपना है, तो उसे दूसरे के सपने में मिलाकर देखें, यह प्रयोग स्वार्थी होती जिंदगी को एक नया और खुशनुमा रसायन बना देगा। एक गीत.....

* * * * * *

   लॉन्गफेलो  कार्ल वोनेगुट    

कार्ल वोनेगुट अपने उपन्यास 'केट्स क्रेडिल' में एक दंतकथा सुनाते हैं, 'ईश्वर ने धरती बनाई, पर जब उसने धरती को देखा, तो उसे सब ओर सूनापन ही दिखाई दिया। तब उसने सोचा, क्यों न इस सूनेपन को ख़त्म करने के लिए मैं मिट्टी से जीवित प्राणियों की रचना करूं? और फिर उसने मिट्टी से उन सब प्राणियों को बनाया जो आज धरती पर विचरते हैं। मनुष्य उन्हीं में से एक था। लेकिन मिट्टी से बना यह अत्त्युत्तम कृति बाकी सब प्राणियों में सबसे सक्षम था। और तो और उसके पास भाषा भी थी। लिहाजा बनते ही उसने आंख झपकाते हुए ईश्वर से पूछा, 'इस सब का क्या अर्थ है ?"

ईश्वर ने कहा, 'बेशक हर वस्तु का अर्थ होता है, लेकिन यह मैं तुम पर छोड़ता हूं कि तुम इस बारे में क्या तय करते हो...'

इतना कहकर ईश्वर ग़ायब हो गया...' यह दृष्टांत जहां ख़त्म होता है, वहां से एक नई कहानी शुरू होती है। अपनी तलाश की कहानी... अब हमारे सामने कोई ईश्वर नहीं, जो जीवन का अर्थ बताए। यह प्रश्न अब हमारा ही दायित्व है। नई भोर आमंत्रण दे रही है कि हम इस सवाल को थामकर आगे बढ़ें और उसकी रोशनी में जीवन को देखें। उसे देखना उदासी में गुम हुए मन के वश का नहीं। पर इस रोशनी को देखने के लिए अदम्य विश्वास की आंख चाहिए।

अनुपमा ऋतु के लेख का अंश

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चरित्र बल                                          लघु कहानी - जो सिखाती है जीना

नोबल पुरस्कार विजेता सी.वी.रमण भौतिकशास्त्र के प्रख्यात वैज्ञानिक थे। अपने विभाग के लिये उन्हें एक योज्ञ वैज्ञानिक की जरूरत थी। कई लोग साक्षात्कार के लिये आये। जब साक्षात्कार समाप्त हो गया, तब उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति, जिसे उन्होंने अयोग्य सिद्ध कर दिया था, कार्यालय के आसपास घूम रहा है। उन्होंने क्रोधित होकर उस व्यक्ति से पूछा कि जब तुम्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया है, तुम यहाँ क्यों घूम रहे हो’?

उस व्यक्ति ने विनय भाव से कहा – आप नाराज़ न हों। मुझे यहाँ आने-जाने के लिये जो राशि दी गयी है, वह शायद गलती से कुछ अधिक दे दी गयी है। इसलिये मैं उस अतिरिक्त राशि को लौटाने के लिये कार्यालय के लिपिक की तलाश कर रहा हूँ।

सी.वी.रमण उस व्यक्ति की बात सुनकर विस्मित रह गये। फिर थोड़ा रुक कर बोले, “अब तुम कहीं मत जाना, मैंने तुम्हारा चयन कर लिया है। तुम चरित्रवान व्यक्ति हो। भौतिकशास्त्र के ज्ञान की कमजोरी तो मैं किसी को पढ़ाकर दूर कर दूँगा, परंतु ऐसा चरित्र मैं कैसे निर्मित करूंगा”?

(गीतप्रेस गोरखपुर की कल्याण से)

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कारावास की कहानी-श्री अरविंद की जुबानी                                   समापन किस्त 

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। इसके रोचक अंश हम जनवरी २०२१ से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसकी उन्नीसवीं तथा अंतिम किश्त है।)

(19)

गोसाई की बात का विश्वास करने से यह भी विश्वास करना होगा कि उन्हीं के कहने से हमारा निर्जन कारावास खत्म हुआ एवं हमें इकट्ठे रहने का हुकुम मिला। उन्होंने बताया कि पुलिस ने उन्हें सब के बीच में रख षड्यन्त्र की गुप्त बातें निकलवाने के लिए यह व्यवस्था की है। गोसाईं नहीं जानते थे कि पहले ही सब ने उनके नूतन व्यवसाय की गन्ध पा ली है, इसलिए कौन षड्यन्त्र में लिप्त हैं, शाखा समिति कहाँ है, कौन पैसे देते या सहायता करते हैं, अब कौन गुप्त समिति का काम चलायेंगे आदि ऐसे अनेक प्रश्न पूछने लगे। इन सब प्रश्नों के उन्हें कैसे उत्तर मिले इसका दृष्टान्त मैंने ऊपर दिया है। लेकिन गोसाईं की अधिकांश बातें ही झूठी थीं। डॉ. डैली ने हमें बताया था कि उन्हीं ने इमर्सन साहब से कह सुनकर यह परिवर्तन कराया था। सम्भवत: डैली की बात ही सच है; हो सकता है कि इस नूतन व्यवस्था से अवगत होने के बाद ही सच है; हो सकता है कि इस नूतन व्यवस्था से अवगत होने के बाद पुलिस ने ऐसे लाभ की कल्पना की हो। जो भी हो, इस परिवर्तन से मुझे छोड़ अन्य सब को परम आनन्द मिला, मैं उस समय लोगों से मिलने-जुलने को अनिच्छुक था, तब मेरी साधना खूब जोरों से चल रही थी। समता, निष्कामता और शान्ति का कुछ-कुछ आस्वाद पाया था; किन्तु तब तक यह भाव दृढ; नहीं हुआ था। लोगों के साथ मिलने से, दूसरों के चिन्तन स्त्रोत का आघात मेरे अपक्व नवीन चिन्तन पर पड़ते ही इस नये भाव का ह्यस हो सकता है, वह जा सकता है। और सचमुच यही हुआ। उस समय नहीं जानता था कि मेरी साधना की पूर्णता के लिए विपरीत भाव के उद्रेक का जागना आवश्यक है, इसीलिए अन्तर्यामी ने हठात् मुझे मेरी प्रिय निर्जनता से वञ्चित कर उद्दाम रजोगुण के स्रोत में बहा दिया। दूसरे सभी आनन्द में अधीर हो उठे। उस रात जिस कमरे में हेमचन्द्र दास, शचीन्द्र सेन इत्यादि गायक थे वह कमरा सबसे बड़ा था, अधिकतर आसामी वहीं एकत्रित हुए थे और रात के दो-तीन बजे तक कोई भी सो न सका। सारी रात हँसी के ठहाके, गाने का अविराम स्रोत, इतने दिन की रुद्ध कथा-वार्ता वर्षा ऋतु की वन्या की तरह बहती रहने से नीरव कारागार कोलाहल से ध्वनित हो उठा। हम सो गये लेकिन जितनी बार नींद टूटी उतनी ही बार सुनी समान वेग से चलती हुई वही हँसी, वही गाने, वही गप्पें अन्तिम प्रहर में वह स्रोत क्षीण हो गया, गायक भी सो गये। हमारा वार्ड नीरवता में डूब गया ......                                             (समाप्त)

 

(श्री अरविन्द का लेख इस स्थान पर आकर समाप्त हो जाता है जहाँ अभियुक्तों को एक बड़े हॉल में स्थानान्तरित कर दिया गया था। 'कारा-काहिनी' (कारावास की कहानी) का अन्तिम हिस्सा मार्च 1910 में 'सुप्रभात' में छपा था, तब तक श्रीअरविन्द ने कलकत्ता छोड़कर चन्दरनगर में शरण ले ली थी। ब्रिटिश सरकार के फिर से पीछे पड़ने पर पॉण्डिचेरी आने से पहले वे चालीस दिनों तक गुप्त रूप से रहे, और 'कारा- कहानी' अधूरी रह गयी। अब श्रीअरविन्द को एक भिन्न प्रकार की क्रान्ति में जुटना था—यह थी आध्यात्मिक क्रान्ति- जिसमें न केवल भारत के लक्ष्य की बल्कि पृथ्वी के भविष्य की बाज़ी लगी थी।

"जब मैं अज्ञान' में सोया पड़ा था,

तो मैं एक ऐसे ध्यान कक्ष में पहुँचा

जो साधु-संतों से भरा था।

                                    मुझे उनकी संगति उबाऊ लगी और

                                    स्थान एक बंदीगृह प्रतीत हुआ;

                                    जब मैं जगा तो

                                                                        भगवान् मुझे एक बंदीगृह में ले गये

                                                                        और उसे ध्यान मंदिर

                                                                        और अपने मिलन-स्थल में बदल दिया।

(श्रीअरविंद)

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यू ट्यूब पर सुनें : à

 https://youtu.be/h5azbO

सूतांजली जून द्वितीय 2026

  जो होना है वो होकर रहेगा , जो नहीं होना है वो नहीं होगा। ------------------ 000 ---------------------- सब तय है , फिर... ? हमार...