गुरुवार, 1 जून 2023

सूतांजली जून 2023

 


अपने आप कुछ नहीं होता,

कर्म करना पड़ता है।

अपने आप हम सिर्फ वृद्ध होते हैं या

मृत्यु को प्राप्त होते हैं।

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परिश्रम के देवता                                                        मैंने पढ़ा

          हमारे यहाँ देवी-देवताओं की कमी नहीं। जितने चाहो उतने मिलते हैं, किस्म-किस्म के, हर रूप-आकृति और अनेकों कर्म के भी। पहले इनकी संख्या  33 कोटि (करोड़) थी, लेकिन अब शिक्षा और विज्ञान ने इनकी संख्या 33 कोटि (वर्ग, किस्म) तक सीमित कर दी है। लेकिन, अगर मैं आप से पूछूं श्रम के देवता कौन हैं? तो आप एक बार तो बगलें झाँकने लगेंगे। कोई एक नाम आपके दिमाग में नहीं आयेगा।  यह एक अलग बात है कि श्रम का महत्व हम सब समझते हैं लेकिन वहीं, यह बात भी छिपी नहीं है कि हम शारीरिक श्रम को हेय दृष्टि से देखते हैं। वंदना जी की लिखी यह कहानी श्रम के बारे में ही है।

          एक बार की बात है, स्वर्ग में देवता निष्क्रिय से दिख रहे थे। उनके जीवन में कहाँ दुःख और कहाँ कष्ट? वह तो धरती वासियों की प्रार्थना, आर्तनाद, पुकार आदि ही उनके लोक में हलचल पैदा करते हैं, क्योंकि अगर कोई सच्ची निष्ठा के साथ देवता को पुकारता है तो वे धरती पर उतरने के लिए तैयार हो जाते हैं; इसी कारण निरन्तर देवताओं का आवागमन होता ही रहता है। लेकिन कुछ दिनों से स्वर्ग में न तो आर्तनाद आ रहे थे, न प्रार्थनाओं की टेर सुनायी दे रही थी। देवता भी आश्चर्य में पड़ गये और सोचने लगे कि आखिर मामला क्या है ? अन्त में सब ने मिल कर निश्चय किया कि इस बार अ-निमन्त्रित ही धरती पर जाकर वहाँ के लोगों की हालत देखेंगे।

          अगले ही दिन देवता सूक्ष्म रूप धारण कर धरती पर उतरे। वहाँ पहुँच कर सभी आश्चर्य में पड़ गये, क्षण-भर के बाद नारद बोले- 'ओह! यह हमारी सुपरिचित दीन-हीन, लावण्य रहित पृथ्वी नहीं है।" उनकी आँखों के सामने झूम रही थी हरी-भरी वसुन्धरा। उसका अपूर्व सौन्दर्य देख वरुण देव तो आनन्द से उन्मत्त हो उठे। वे तो यहां अधिकतर किसानों की हृदय-भेदी करुण प्रार्थना सुन कर सूखी धरती के हृदय की प्यास बुझाने आया करते थे। आज तो सारी धरती, उसके प्राणी, पेड़-पौधे, चर-अचर - सभी रूपान्तरित से दिख रहे थे। नदियाँ मस्ती से बह रही थीं, किसान खेतों में, नगरवासी नगरों में, बालक विद्यालयों में, पशु वनों में, पक्षी नीड़ों में, अर्थात् सभी अपने-अपने उचित स्थान पर आनन्दपूर्वक, उत्साह के साथ काम में लगे हुए थे।

          धरती का यह परिवर्तन देख सभी देवता आश्चर्य में डूबे हुए थे। अचानक उन्होंने एक सुदर्शन पुरुष को इधर-उधर विचरते देखा। उस युवक ने भी देवताओं को देख दूर से ही सादर प्रणाम किया। देवताओं ने सोचा – अरे! हमारे जैसा यह कौन है? पहले तो हमने इसे कभी यहाँ नहीं देखा। हमारे जैसा दिखने पर भी हमसे अपरिचित !!

          नारद ने घोषणा कर दी - “हम सब उस पुरुष के पास जाकर स्वयं उसका परिचय प्राप्त करें।" अगले ही क्षण देवता वहाँ उपस्थित थे। देवताओं ने पूछा-" हे सुदर्शन युवक कौन हो तुम, देवजाति के लगते हो, लेकिन सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि स्वर्ग में तुम्हारे दर्शन कभी नहीं हुए।"

          उस पुरुष ने कहा- "देवगण ! मैं आप लोगों की कोटि का स्वर्ग में रहने वाला देवता नहीं हूँ, धरती माता की कोख में मेरा वास है। जब-जब धरती वासी मुझे पुकारते हैं मैं उपस्थित हो जाता हूँ। हरे-भरे लहराते खेतों में, फलों से लदे वृक्षों में, भव्य प्रसादों में, कुटीरों में, ग्रन्थों में, काव्यों में, सृजन के प्रत्येक कार्य में मेरा ही वास है, लेकिन मेरा सौन्दर्य सबसे अधिक निखरता है पसीने की बूँदों में, मैं हूँ परिश्रम।"

          परिश्रम-देवता को नमस्कार कर देवताओं ने कहा- "तुम ही सचमुच पृथ्वीवासियों के देवाधिराज हो। तुम्हारे बिना लोग अकर्मण्य, निष्प्राण होते हैं, तुम साथ रहो तो वे सर्वसमर्थ बन जाते हैं। तुम्हीं सचमुच पृथ्वीवासियों के सच्चे लावण्य, पारसमणि हो।"

          "हे देवगण! तब तो मुझे वर दीजिये कि धरतीवासी अपने सच्चे सौन्दर्य को भुला न दें, यह कभी न भूलें कि वे इस परिश्रम-रूपी पारस के अधिकारी हैं जिसके स्पर्श से सीसा हीरे में, लोहा सोने में बदल जाता है।” उद्यम देवता ने सिर झुका कर निवेदन किया।

          और सभी देवताओं के वरद हस्त तथास्तु में उठ गये।

(पृथ्वी को स्वर्ग बनाने का एकमात्र उपाय परिश्रम ही है)

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दैवी सम्पदा                                                                  चिंतन

          कई ऐसे गुण हैं जिन्हें अपने जीवन में धारण करने से मानव देव बन जाता है, इन्हें दैवीय सम्पदा (गुण) कहते हैं। ऐसा कोई मानव नहीं जिनमें केवल गुण हों और हर प्रकार के दुर्गुण से मुक्त हो। वैसे ही ऐसा कोई देव नहीं जिसमें कोई दुर्गुण न हो, ऐसा कोई असुर नहीं जिसमें कोई दैवीय गुण न हो। देश-काल के प्रभाव से इनका अनुपात निरंतर बदलता रहता है। साधारणतया इन गुण-दोष की मात्रा ही इस बात का निर्धारण करती है कि कौन है देव और कौन असुर।

          इन संपदाओं को जानना जितना आसान है, उतना कठिन है अपने जीवन में उतारना। एक है जीवन मूल्य(वैल्यूज) और दूसरा सद्गुण (विर्च्युज) जैसे अहिंसा, सत्य आदि। ये जीवन मूल्य हैं जिनका हम सम्मान तो करते हैं लेकिन अपने जीवन में नहीं उतारते। अतः ये दैवीय सम्पदा हमारे गुण में परिवर्तित  नहीं होते। जब हम इन जीवन मूल्यों को, दैवीय सम्पदा को अपने जीवन में उतारते हैं तब ये सद्गुण हमारे जीवन में दिखने लगते हैं। इस प्रकार दैवीय संपप्ति को बटोरने वाले को ही देव कहा जाता है।

          जैसे गुण-दोष हैं वैसे ही कर्म भी श्रेय और प्रेय होते हैं। श्रेष्ठ कार्य श्रेय और प्रिय कार्य प्रेय कहलाता है। हर मानव जानता है कि श्रेय क्या है और यह मानता भी है कि यह श्रेय है। लेकिन अनेक प्रकार की शक्तियाँ हैं जो उन्हें श्रेय के बदले प्रेय कार्य में प्रवृत्त करती हैं। यही है, हर मानव के दो विपरीत रूप (dual personality), कहना कुछ, करना कुछ, कथनी और करनी में भेद।  

          विडम्बना यही नहीं है, बल्कि इससे ज्यादा गंभीर है। हर गुण को जानना एक बात है और उन्हें समझना दूसरी। इन्हें गहराई में जाकर समझने की आवश्यकता है। गीता के सोलहवें अध्याय में श्री कृष्ण ने दैवीय सम्पदा की चर्चा की है और उन संपदाओं को गिनाया है। वे इस प्रकार हैं :

निर्भीकता                  निर्मलता                            ज्ञान और योग में निष्ठा           दान

इंद्रिय दमन                यज्ञ                                    स्वाध्याय                            तप

सरलता                    अहिंसा                               सत्य                                  अ-क्रोध

त्याग                       शांति                                 निंदा का त्याग                      दया

लोभ का त्याग            कोमलता                             लज्जा                                 अ-चपलता

तेज                         क्षमा                                  धैर्य                                    पवित्रता द्रोह का अभाव                   अभिमान का न होना

          इनमें से कोई भी सम्पदा ऐसी नहीं है जिसे हम नहीं जानते हैं। ये सब हमने बार-बार  सुना है और इनका अर्थ जानते हैं। इन सम्पदाओं में  एक है स्वाध्याय यानी खुद का अध्ययन, चिंतन। क्या इन दैवी संपदाओं पर हमने अपना अध्ययन किया है? क्या हम इन संपदाओं का सटीक अर्थ जानते हैं? हम इनके शाब्दिक अर्थ जानते हैं। और उसी के आधार पर हम कहते हैं की हाँ-हाँ जानते हैं, बहुत सुना है, फिर से उपदेश मत शुरू करो। अगर आप इसी समुदाय में हैं तो जरा ठहरिए और कुछ एक सम्पदा पर चर्चा, स्वाध्याय कीजिये

निर्भीकता – रावण-कंस, आतंकवादी-डकैत-गुंडे तो बड़े निर्भीक हैं, क्या यह उनका दैवीय गुण है? नहीं, अधर्म के मार्ग पर निडर होकर बढ़ना दैवीय सम्पदा नहीं है। जब हम  धर्म के मार्ग पर, ज्ञान के मार्ग पर, भक्ति के मार्ग पर निडर होकर चलते हैं तब वह हुई निर्भीकता। उस समय हमें डर नहीं लगना चाहिये। कौन क्या कहेगा? क्या होगा? कोई तो नहीं चलता? धर्म मार्ग पर चलने से कैसे होगा? अरे वाह! व्यावहारिक जगत में तो हम स्वीकार करते हैं प्यार किया तो डरना क्या’, भगवान से प्यार किया तो क्यों डर रहे हो? साँच को आंच क्या! आसक्ति होती है तब डर लगता है। धर्म के मार्ग पर, भक्ति के मार्ग पर, सत्य के मार्ग पर  अभय से, निर्भीकता से बढ़ना ही दैवीय सम्पदा है।   

दान – ईश्वर ने हमें जो कुछ भी दिया है उसे केवल खुद के भोग के लिए नहीं दिया है, उसका उदारता पूर्ण वितरण होना चाहिए। अगर सब खुद जमा करते रहेंगे तो कुछ लोगों के पास अनावश्यक जमा हो जायेगा और कई अभाव में रह जायेंगे। प्रकृति, हमारी समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति करती है, लेकिन हमारे लालच की नहीं। जो प्राप्त है उसका उदारता पूर्वक वितरण करना, चाहे धन हो, ज्ञान हो, वस्त्र हो, अन्न हो, भूमि हो, जिसके पास जो है, उसी का दान करना। इस बात का स्मरण रखिए जो भी देते हैं वह उसी रूप में आपके पास लौट कर आता है – कहीं भी, कभी भी, किसी से भी। दान देते समय सुपात्र-कुपात्र का ध्यान रखना भी आवश्यक है। लापरवाही से और कुपात्र को दान देना दान नहीं है। दान किसे दे रहे हैं – जोड़ने वाले को या तोड़ने वाले को? निर्माण के लिए या विध्वंस के लिए? साधु को या ठग को? इसका ध्यान रखें।

स्वाध्यायस्वाध्याय का अर्थ ईश्वर का जप या मंत्र या शास्त्र के पाठ तक सीमित नहीं है, स्वयं का अध्ययन, चिंतन, मनन भी आवश्यक है। श्रेष्ठ ग्रन्थों का अध्ययन करने से हमें जीवन के प्रति ज्ञान प्राप्त होता है और स्व-ध्ययन करने से वह ज्ञान हमारे जीवन में उतरता है और अपनी कमियों का परिचय होता है। गुरु केवल इशारा करता है, उस मार्ग पर चलना तो हमें ही पड़ता है। सनातन यानी शाश्वत। शाश्वत तो तभी हो सकता है जब देश-काल के अनुसार उसमें परिवर्तन-उत्थान होता रहे। अगर जो है केवल उसे ही पढ़ते रहे तो उत्थान कैसे होगा? पठन-पाठन, चिंतन-मनन इसी का अंग है। अतः स्वाध्याय, खुद का अध्ययन आवश्यक है।

तप, सरलता, अहिंसा  ये तीनों कर्मणा-वाचा-मनसा (कर्म, वाणी और चिंतन) तीनों स्तर पर होना चाहिए।

तप का अर्थ जंगल-पहाड़ों में जाकर आँख बंद कर बैठना नहीं है। हम जैसा बनना चाहते हैं, अपने महान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कठोर परिश्रम करना ही तप है।

कहा कुछ, किया कुछ और विचार कुछ, तब सरलता नहीं आ सकती, सरलता के लिए इन तीनों में कोई भेद नहीं होना चाहिये।

अहिंसा का अर्थ समझना और अपनाना कठिन कार्य है। लोग इसके शाब्दिक अर्थ को पकड़ कर बैठ जाते हैं। उससे आगे बढ़िए और इस पर चिंतन-मनन कीजिये।

सत्य – प्रमाण से जो ज्ञान प्राप्त हुआ वही बोलना। कहीं से, कुछ भी सुन-पढ़ कर नहीं बोलना। बोलने के पहले यह जांच करना कि क्या यह सत्य है? जब तक खुद आश्वस्त न हो नहीं बोलना। अगर कोई वचन (शब्द) दिया है तो उसका पालन करना। वचन का अर्थ प्रॉमिस नहीं है। जो कहा, वो किया है।

अ-क्रोध – क्रोध बिलकुल आये ही नहीं यह तो बड़ा ही कठिन है। लेकिन उस पर हमारा शासन होना चाहिए, संयम से वश में कर उसे शांत करने की शक्ति होनी चाहिए, उठे हुए हाथ को रोकने की शक्ति होनी चाहिये, जिव्हा पर आए शब्द बाहर नहीं निकलने चाहिये, क्रोध प्रकट न हो  

त्यागत्याग का अर्थ सन्यास भी है। अपने ममत्व-राग-द्वेष का त्याग, अहंकार का त्याग ही सबसे बड़ा त्याग है।

निंदा का त्याग – हम इसमें बहुत माहिर हैं। पीठ पीछे बुराई करना ही निंदा है। चुगली से बचना।

दया लोग दया दिखाते हैं दुष्टों के प्रति, अधमों के प्रति, अवाञ्छ्नीयों के प्रति, असफल और असफलताओं के प्रति – वास्तव में इससे दुष्टता और असफलता को एक प्रकार का बढ़ावा मिलता है।  इसके विपरीत अगर हम  सम्पूर्ण सच्चाई के साथ, समझने वाले और मूल्य आँकने वाले हृदय की स्वाभाविक कृतज्ञता के साथ दयावान हों तो जगत में चीजें बड़ी तेजी से बदलने लगे, उन्हें ईश्वरीय शक्ति की उपस्थिती का आभास होने लगेगा।

लज्जा -  न करने योग्य कार्य करने में, धर्म विरोधी कार्य करने में लज्जा आनी चाहिए। इतना ही नहीं करने योग्य कार्य न करने से भी लज्जा की अनुभूति होनी चाहिए।

क्षमा -  इसका भी प्रायः गलत अर्थ लगाया जाता है। अपने प्रति किए गए अपराध को इस प्रकार भूल जाना जैसे वह हुआ ही नहीं हो, क्षमा है। उसी प्रकार राष्ट्र, समाज के प्रति किए गए अपराध क्षम्य नहीं हैं। क्षमा योग्य कृत्य ही क्षम्य हैं, अन्यथा दंडनीय ही हैं।

          अपने स्वाध्याय से इस सभी तथा अन्य संपदाओं पर गंभीरता से निरंतर मनन कीजिये। इनके अर्थ बदल जाएंगे, क्या करना है और क्या नहीं, इसकी समझ आने लगेगी। आपकी ये संपदाएँ आभूषण के रूप में, अलंकार के रूप में लोगों को दिखने लगेंगे। आप जितनी गहराई में जाएंगे इसके तल को नहीं पाएंगे, उसकी गहराई निरंतर बढ़ती जाएगी।

          यह भी सत्य है कि अगर हम किसी भी एक सम्पदा को पकड़ लें और यह निश्चय कर लें कि हर अवस्था में, मैं इसका त्याग नहीं करूंगा, इस पथ पर दृड़ता पूर्वक चलूँगा, तब एक-एक कर बाकी सम्पदा भी स्वतः प्राप्त होने लगती है।

किसी एक सम्पदा को ही अपनाइये और उसे दृड़ता पूर्वक पकड़ कर रखिए, और देखिये कैसे

जीवन बदल गया, लोग बदल गये, दुनिया बदल गई,

सुख, शांति, आनंद का साम्राज्य हो गया।

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सोमवार, 1 मई 2023

सूतांजली मई 2023

 

परमात्मा को चाहा नहीं जा सकता ।

जब कोई चाह नहीं होती,

तब जो शेष रह जाता है,

वह परमात्मा है।

                                                                           ओशो

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धर्मसंस्थापनार्थाय                                                      मेरे विचार

                   

गीता के चौथे अध्याय के दो श्लोक अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन श्लोकों में श्रीकृष्ण यह घोषणा करते हैं कि वे कब और क्यों पृथ्वी पर प्रकट होते हैं :

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।७||
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।८||

हे भरतवंशी अर्जुन! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ। साधुजनों (भक्तों) की रक्षा करने के लिए, पापकर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की भली भाँति स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ।

          इस श्लोक में “धर्मसंस्थापनार्थाय” शब्द और इसमें भी धर्म शब्द अनेक महत्व का है। क्या अर्थ है धर्म का? जब श्री कृष्ण धर्म की रक्षा की, स्थापना की बात कर रहे हैं, वे किस धर्म की बात कर रहे हैं? हिन्दू धर्म की? सनातन धर्म की? क्या हमारे श्री कृष्ण और हमारी गीता इतनी संकीर्ण है जिसमें धर्म का अर्थ सनातन धर्मतक ही सीमित है? सबसे पहली बात तो यह कि हम भली भाँति जानते हैं कि धर्म का अर्थ पंथ या मत नहीं है। धर्म वह नहीं है जिसका प्रायः अँग्रेजी में रिलीजन अनुवाद कर दिया जाता है। धर्म इनसे सबसे अलग है, इन सबसे कहीं बेहद ऊंचाई पर है। तब क्या है धर्म?

          वैसे तो महात्माओं, विद्वानों, टीकाकारों, साधुओं ने अपने-अपने ढंग से इसका अर्थ समझाया है, इसकी व्याख्या की है, लेकिन अगर हम इसे एक साधारण मानव के लिए सीधे-सादे शब्दों में कहना या समझना चाहें तो कह सकते हैं – “धर्म वह है जो हमें आंतरिक सुख, शांति और आनंद प्रदान करता है। वे सब सद्गुण जो हम दूसरों में देखना चाहते हैं उनका निचोड़ धर्म है।” एक इंटरव्यू के दौरान जमशेदजी टाटा को कहा गया कि भविष्य में भारत एक वृहद आर्थिक रूप से शक्तिशाली देश के रूप में उभरेगा। जमशेदजी ने बीच में टोकते हुए कहा कि भारत को आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनाने में उनका कोई प्रयोजन नहीं है वे तो यह चाहते  हैं कि भारत एक सुखी देश के रूप में उभरे। सब कुछ रहे लेकिन सुख-शांति न रहे तब सब कुछ निष्प्रयोजन ही है। धर्म वह है जिससे हर प्रकार के लौकिक सुविधा के साथ-साथ आंतरिक सुख और शांति की प्राप्ति होती है।

          हमें सम्पूर्ण बाह्य जगत में एक लय, एक तारतम्य दिखाई पड़ता है और इसीलिए हम सब काम कर पाते हैं। हम वैज्ञानिक प्रगति की बात करते हैं, लेकिन उसकी उन्नति केवल इसलिए हो रही है क्योंकि प्रकृति के सब नियम सुचरू रूप से चल रहे हैं। अगर एक व्यक्ति, परिवार, समाज में सब कुछ सुचारु रूप से चल रहा है तब इसका अर्थ यही है कि सब अपना-अपना कार्य कर रहे हैं। जिसके कारण यह लय, यह तारतम्य बना रहता है। सम्पूर्ण सृष्टि में, समाज में, सुख शांति बनी रहती है, वही धर्म का अभ्युदय है।  इसके विपरीत, यानी इस तारतम्य का बिगड़ना, जोड़ने के बजाय टूटना, निर्माण के बजाय विध्वंस का होना, मतलब अधर्म हो गया।

          वह क्या है जो सब को जोड़ कर रखती है? यह देखने लायक बात है कि इस लय को तोड़ने वाला आदमी ही होता है। पशु-पक्षी, पेड़-पौधे-वनस्पति, प्रकृति तो बराबर अपने नियम के अनुसार चल रहे हैं। बल्कि यह तो मनुष्य ही है जो उनके तारतम्य को छिन्न-भिन्न करता है और इसके कारण आने वाली आपदा को भी उसे ही भोगना पड़ता है। लेकिन इतना कह-सुन लेने के बाद बात वहीं-की-वहीं रह गई। धर्म की बहुत बड़ी-बड़ी व्याख्याएँ हैं, लेकिन सरल शब्दों में जिसे आम आदमी समझ सके और उसके अनुसार धर्म मार्ग पर चल सके, ऐसी भी कोई व्याख्या है? परिभाषा है? हाँ है, क्यों नहीं है वे सभी सद्गुण जिन्हें आदमी दूसरों में देखना चाहता है, अगर उन सभी सद्गुणों को मिला दिया जाए तो वही धर्म है। दिक्कत यह है कि ये सद्गुण हम दूसरों में देखना चाहते हैं, खुद अपनाना नहीं चाहते। कैसे सद्गुण? जैसे :

सत्यनिष्ठ                   धार्मिक                     निष्ठावान                  ईमानदार                 

विनम्र                      उदार                       प्रेमी                         मिलनसार      

क्षमाशील                  अहिंसक                    ज्ञानी                       कृतज्ञ

निष्कपट                   आनंदित                   कर्तव्यनिष्ठ                 सेवा भाव       

शांतचित्त                  दयावान                   अ-परिग्रही                धैर्यशील         

सौम्य            

 

          ये सब और ऐसी सब चीजों की एक तालिका बनाई जाए तो जो तैयार होगी वह होगी जीवन मूल्य और गुण (वैल्यूज अँड वर्च्युज ऑफ लाइफ) की पूरी तालिका और यही है धर्म, जहाँ सब के लिए सत्य है, प्रेम है, दया है, शांति है, सुख है। अगर मानव इसके अनुरूप चले तो उन्नति है, नहीं तो अवनति है। ऐसे मानव हैं तब धर्म की स्थापना है।

          ऐसा नहीं है की ईश्वर का प्राकट्य समय-समय पर ही होता है। जब भी पृथ्वी पर, समाज में, परिवार में और अपने अंदर इन सद्गुणों का प्रभाव बढ़ रहा हो और दुर्गुणों का अभाव हो रहा हो तब  समझ लेना चाहिए कि ईश्वर का अवतार हो रहा है। जब-जब अवतार हो रहा हो उसकी आराधना कीजिये, गुणगान कीजिये, स्तुति कीजिये। उस क्षण का भरपूर आनंद लीजिये और उसका बार-बार आह्वान कीजिये। ईश्वरीय अवतार का अनुभव कीजिये। धर्म की स्थापना कीजिये।

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पेड़ की आत्मा                                                           मैंने पढ़ा

 

          कविवर रवीन्द्र द्वारा स्थापित शांतिनिकेतन का परिसर। महान भारतीय कलाकार नंदलाल बोस उद्यान में बैठे अपने छात्रों और उनकी चित्रकला की देखरेख कर रहे थे। उनमें से एक, एक बड़े पेड़ के सामने बैठा था और उसे रंगने की कोशिश कर रहा था। नंदलाल उनके पास जाते हैं और पूछते हैं, "कनाई, क्या तुमने पेड़ देखा है"। इस प्रश्न से परेशान और नाराज, कनाई कहते हैं, "सर, मैं अंधा नहीं हूं"।

          नंदलाल कहते हैं, "बेशक भौतिक रूप से तुम अंधे नहीं हो, लेकिन क्या तुम भीतर जागे हुए हो? क्या तुमने पेड़ की आत्मा को देखा है"। कुछ मिनटों के मौन के बाद, अपने गुरु के अर्थ, शब्द छात्र के दिमाग में छा गए और कनाई कहता है "नहीं सर"। नंदलाल ने धीरे से कनाई के कंधों पर हाथ रखा और कहा:

"पेड़ को रंगने से पहले, न केवल अपने शरीर की आँखों से, बल्कि अपने हृदय की आँखों से, न केवल पेड़ के बाहरी रूप को बल्कि पेड़ को जीवित करने वाली जीवित आत्मा को भी देखो। इसे एक जीव  के रूप में, एक आत्मा के रूप में देखो  जैसे मैं और तुम। इसे सूर्योदय से पहले देखो, इसे देखो जब सूरज उगता है और पेड़ पर अपनी सुनहरी किरणें डालता है, दोपहर में इसे सूर्य की तेज रोशनी में देखो, इसे शाम के गोधूलि में देखो, रात के अँधेरे में चाँद की कोमल रोशनी में देखो, बारिश, हवा और तूफान में देखो। देखो, देखो और देखो और एक दिन पेड़ की आत्मा तुम्हारे पास आएगी और कहेगी "मैं यहाँ हूँ" और फिर चित्र बनाओ, तुम्हारी कला जीवंत और भावपूर्ण होगी"।

यह भारतीय कला की विशेषता है। ग्रीक कला में, यदि आप वेनस देखते हैं, तो सब कुछ सही है, नाक एकदम सही है, आँखें समान दूरी पर हैं। लेकिन भारतीय छवियों में, गणेश को देखें - बड़ा पेट, लंबे दांत, झूलता सूंड, क्या भारतीय इससे अधिक सुंदर रूपों के बारे में नहीं सोच सकते? क्यों? क्यों नहीं? क्योंकि अगर रूप अपने आप में सुंदर है, तो आपकी दृष्टि वहीं रुक जाती है। भगवान का रूप कुछ और इंगित करने वाला द्वार है; रूप के पीछे किसी चीज का प्रतीक है यह। इस रूप का उद्देश्य आपका ध्यान आकर्षित करना नहीं है, आपके ध्यान को वहीं रोकना नहीं है। आत्मा महत्वपूर्ण है, उपस्थिति महत्वपूर्ण है।

       रूप या प्रतीक में सुंदरता भी हो सकती है, लेकिन उसका उद्देश्य उसके पीछे छिपे अर्थ को उजागर करना है। दृष्टि उस छिपे अर्थ पर पड़नी चाहिए। आंखों को उस अर्थ को समझने का अभ्यास होना चाहिए।

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साक्षी भाव                                                लघु कहानी - जो सिखाती है जीना

 

एक बूढ़ा किसान था, जो वर्षों से खेती कर रहा था। एक दिन उसका घोड़ा भाग गया। यह खबर सुनकर पड़ोसी किसान के पास पहुंचे और सहानुभूति पूर्वक बोलने लगे, “यह बहुत बुरा हुआ”। किसान ने कहा, “शायद ऐसा हुआ हो”। अगले दिन उसका घोड़ा वापस आ गया, उसके साथ और  तीन जंगली घोड़े थे। पड़ोसी फिर आए और कहने लगे यह तो बहुत आश्चर्यजनक है। किसान ने फिर कहा, शायद हो सकता है, ऐसा ही हुआ हो। उसी दिन किसान के बेटे ने उनमें से एक घोड़े पर सवारी करने की कोशिश की, लेकिन घोड़े ने उसे गिरा दिया और उसकी एक टांग टूट गई। पड़ोसी फिर जमा हो गए और कहने लगे की यह तो बहुत बुरा हुआ। बूढ़े किसान ने फिर वही बात दोहरा दी, शायद ऐसा ही हो सकता है। उसी दिन सेना के अधिकारी गाँव में किसान के बेटे को जबरन सेना में भर्ती करने आ धमके। लेकिन किसान के बेटे की टूटी टांग देख कर वापस चले गए। पड़ोसी फिर आए और बोले कि आखिर सब अच्छा ही हुआ। किसान ने फिर वही बात दोहरा दी, शायद ऐसा ही हो सकता है

कहने का तात्पर्य यह कि हमें अपने साथ होने वाली अच्छी या बुरी घटनाओं को बहुत उत्साह या बहुत दु:ख से देखने के बजाय एक तटस्थ नजरिये से देखना चाहिए। हम इसे साक्षी भाव भी कह सकते हैं। अगर हमारे पास साक्षी भाव है तो हमारी मानसिकता और मन दोनों को कोई उद्वेलित नहीं कर सकता। हम शांत-चित्त रह सकते हैं।

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आपलोगों में से अनेकों की सकारात्मक प्रतिक्रियाएँ व्हाट्सएप्प पर प्राप्त हो रही हैं –

टिप्पणी, ईमोजी और औडियो के रूप में; कइयों के फोन भी मिले हैं।

आप सबों को हृदय से आभार, आप से एक अनुरोध भी है।

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शनिवार, 1 अप्रैल 2023

सूतांजली अप्रैल 2023

 सूतांजली

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वर्ष : 06 * अंक : 09                                                               अप्रैल * 2023

अनुभव, एक बेहतरीन विद्यालय है;

लेकिन फीस बहुत लगती है।

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प्रेरणा के विविध रंग-रूप                                               मेरे विचार

          एक महान ऋषि ने अपने घर में एकत्रित लोगों के समूह को अध्यात्म पर एक प्रेरक प्रवचन दिया। बात समाप्त होने के बाद, समूह से एक युवक ने ऋषि के पास जाकर कहा, "ऋषिवर, मैं आपकी बातों से बहुत प्रेरित हूं। मुझे बताइये कि मैं आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने के लिए क्या कर सकता हूं।" ऋषि ने अपनी बड़ी मर्मज्ञ आँखों से युवक की ओर देखा और शरारती मुस्कान के साथ उत्तर दिया: "जाओ नव-युवक! झूठ बोलो, स्वार्थी और सांसारिक बनो।" 

          नव-युवक और उसके आसपास बैठे ऋषि के शिष्य ऋषि के इस उत्तर से हैरान और आश्चर्यचकित रह गए। युवक कुछ समझ नहीं पाया कि वह क्या कहे लेकिन उसकी बेचैनी और घबराहट उसके चेहरे पर स्पष्ट थी। ऋषि हँसे और आगे कहा, "चिंन्तित मत होओ। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन में प्रगति के लिए तुम्हें आध्यात्मिक जीवन के बजाय सांसारिक जीवन पर अधिक ध्यान देना होगा। महत्वाकांक्षी बनोतुम जो भी हो, उससे संतुष्ट न हो। धन एवं शक्ति की आकांक्षा करो। समाज में नाम और प्रसिद्धि, सफलता, पद और प्रतिष्ठा के लिए प्रयत्न करो। जीवन का भरपूर आनंद लो। लेकिन अपने धन और शक्ति को ईमानदार और वैध साधनों से अर्जित करो और उनका उपयोग न केवल अपने लिए बल्कि उस समुदाय के लाभ के लिए भी करो, जिसके तुम खुद भी एक हिस्सा हो। अपने दोस्तों और निकट प्रियजनों के प्रति दयालु और परोपकारी  नो। संकट में लोगों की मदद करो। लेकिन अपने दुश्मनों के लिए रुद्र बनो। लोगों या परिस्थिति के दबाव में मत झुकना। उन ताकतों या लोगों से लड़ो और उन्हें जीतो जो तुम्हारा विरोध करते हों।  अन्याय के आगे कभी झुकना नहीं। लोगों और परिस्थितियों से निपटने में आदर्शवादी से अधिक व्यावहारिक और लचीले बनो। अपने परिवार और समाज के प्रति अपनी सभी जिम्मेदारियों को पूरी लगन और ईमानदारी से निभा। अपने कर्तव्यों की पूर्ति के परिणामस्वरूप मिलने वाले फलों का आनंद लो। अपने सभी कर्म, फल और भोग भगवान को अर्पित करोयही तुम्हारी साधना है।"

          अगले दिन ऋषि अपने घर में थे, अपने शिष्यों की कठिनाइयों और प्रश्नों को सुन रहे थे और उनका उत्तर दे रहे थे। एक महिला-शिष्य ने अपने व्यवसाय में अपने पति, जो एक निर्माण ठेकेदार थे, (contractor) की कठिनाइयों का वर्णन किया। उसने कहा, "आपने मेरे पति को अपना व्यवसाय ईमानदारी से करने के लिए कहा है। मेरे पति का एक बहुत ही सफल और समृद्ध व्यवसाय था। लेकिन जिस दिन से उन्होंने अपना व्यवसाय ईमानदारी से करने का फैसला किया है, उनकी किस्मत को ग्रहण लग गया है। वर्तमान व्यवसाय और परिवेश इतना भ्रष्ट है कि एक ईमानदार व्यवसायी के लिए जीवित रहना मुश्किल है, विशेष रूप से जिस व्यवसाय में मेरे पति हैंसंबंधित अधिकारियों को रिश्वत दिए बिना अनुबंध (contract) प्राप्त करना लगभग असंभव है। मेरे पति अपने व्यवसाय को जारी रखने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं।"

          ऋषि ने उत्तर दिया: "उसे सिद्धांतों के लिए पीड़ित होने दें। उसे सुरक्षा, आराम और आनंद को त्यागने दें और उच्च मूल्यों के लिए चिंता करने, गरीबी और विफलता को गले लगाने दें। उसे उच्च प्रगति के लिए धन, शक्ति और सफलता को त्यागने दें।"

          महिला-शिष्य ने हैरानी से ऋषि की ओर देखा। ऋषि ने फिर से समझौता न करने वाले स्वर में कहा: "चाहे कुछ भी हो, आपके पति को अपने नैतिक सिद्धांतों पर टिके रहना है। उन्हें किसी भी परिस्थिति में रिश्वत नहीं देनी चाहिए। उन्हें अपने व्यवहार में सच्चा और ईमानदार होना चाहिए। और इस वजह से, आपका पति दिवालिया हो जाता है, और वह, आप और आपके परिवार को भूखा रहना पड़ता है, फिर भी उसे अपने मूल्यों पर अडिग रहना चाहिए।"

          महिला लगभग रो पड़ीं, "आप जो उपदेश दे रहे हैं वह एक क्रूर और अव्यवहारिक आदर्शवाद है।"

          ऋषि ने स्त्री की आँखों में व्याकुलता और चिन्ता देखकर सांत्वनापूर्वक कहा: "सुनो, यदि आपके पति अपने मूल्यों से चिपके रहते हैं और कठिनाई की इस घड़ी में भगवान में विश्वास रखते हैं, तो मैं आपको आश्वस्त कर सकता हूं कि कुछ समय बाद उनके ग्राहक और व्यापारिक समुदाय उनके सैद्धांतिक रुख के लिए उनकी सराहना और सम्मान करेंगे और वे फिर से अपने व्यवसाय को समृद्ध कर लेंगे। लेकिन यह एक प्रमुख परिणाम नहीं बल्कि एक गौण परिणाम है। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि आपके पति अपनी यात्रा में एक निर्णायक प्रगति करेंगे। आपको अपने पति को इस संकट की घड़ी में नैतिक और आध्यात्मिक समर्थन प्रदान करना होगा जो कि उनकी प्रगति के लिए आवश्यक है। भारत में, पत्नी को सहधर्मिणी कहा जाता है, जो धर्म के मार्ग में सह-यात्री है। इसलिए आपको अपने पति को धर्म के मार्ग में आगे बढ़ने में मदद करनी है।"

          अगले दिन ऋषि अपने करीबी शिष्यों के साथ बातचीत कर रहे थे। उनका एक शिष्य दूर देश के एक अन्य शिष्य का पत्र पढ़ता है। शिष्य, एक व्यवसायी, अपने गुरु को लिखते हैं कि जिस दिन से उन्होंने साधना का जीवन ग्रहण किया, वह अपना व्यवसाय ईमानदारी और सच्चाई से कर रहे हैं और पूछते हैं कि अपनी आध्यात्मिक आकांक्षा और साधना के साथ अपने व्यवसाय को संरक्षित  करने के लिए वह और क्या कर सकते हैं। ऋषि हंसते हुए टिप्पणी करते हैं, "उन्हें अपनी नैतिकता को दूर करना होगा," और अपने शिष्य को निर्देश देते हैं, "उसे लिखो कि उसे अपने दिमाग और समाज के नैतिक मानकों के अनुसार अपना व्यवसाय नहीं करना चाहिए। उसे अपने दिमाग को शांत करना होगा और अपनी आत्मा से मार्गदर्शन ढूंढ़ना होगा और आत्मा की आज्ञा के अनुसार अपना काम करना होगा।"

          शिष्यों में से एक ने ऋषि से पूछा, "ऋषिवर, पिछले दिनों में आपने लोगों के साथ जिस तरह से व्यवहार किया, उससे मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा है। जब एक युवक ने आपको आध्यात्मिक जीवन में दीक्षा देने के लिए कहा, तो आपने उन्हें आध्यात्मिक जीवन के बजाय सांसारिक जीवन पर अधिक ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा, कल एक स्त्री के पति को, आपने उन्हें नैतिक सिद्धांतों पर  दृढ़ता से चिपके रहने की सलाह दी, लेकिन आज आप शिष्य से कह रहे हैं कि वह अपना व्यवसाय नैतिक सिद्धांतों के अनुसार नहीं बल्कि अपनी आत्मा के आंतरिक मार्गदर्शन के अनुसार करें। आपके दृष्टिकोण में इतने बड़े अंतर का क्या कारण है?"

ऋषि ने इसका समुचित उत्तर दिया। लेकिन उनके उत्तर को जानने के पहले हमें यह समझना चाहिए कि अध्यात्म के गूढ़ अर्थों को सामान्यजन तक पहुँचाने तथा उन्हें प्रेरित करने के लिए अनेक प्रेरक प्रसंग, कहानियाँ, श्लोक, दोहे, चौपाइयाँ लिखी गईं जिनमें बहुधा विरोधाभास प्रतीत होता है, लेकिन वास्तव में वे विकास के अलग-अलग चरणों पर स्थित लोगों के लिए है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को उसकी प्रकृति, स्वभाव, दृष्टिकोण, स्थिति और स्पष्ट समझ के अनुसार ही इ ज्ञान को प्रदान करने का विधान है। देश, काल और पात्र का ध्यान रखना आवश्यक है।   

          हाँ, तो शिष्य की शंका का निवारण करते हुए ऋषि ने उत्तर दिया, "ये तीनों विकास के विभिन्न चरणों में हैं; इसलिए, जाहिर है, उनके साथ एक जैसा व्यवहार नहीं किया जा सकता है," और आगे समझाया: "वह युवक जो कुछ दिन पहले हमारे पास आया था, विकास के पहले चरण में एक बाल-आत्मा है। वह अपनी भौतिक या शारीरिक चेतना की जड़ता में रहने वाले तमस का एक समूह है, जो सकी प्रवृत्ति और भौतिक जरूरतों से प्रेरित है। वह न केवल आध्यात्मिक जीवन के लिए बल्कि उच्च नैतिक विकास के लिए भी अभी तक तैयार नहीं है। मानव विकास के इस प्रारंभिक चरण में, प्रकृति नैतिकता या शिष्टता पर जोर नहीं देती बल्कि भावनात्मक और व्यावहारिक दिमाग के मनोवैज्ञानिक विकास पर जोर देती है। जो मैंने उसे बताया है वह एक ऐसा अनुशासन है जो विकास की इस प्राकृतिक प्रक्रिया को गति देगा। सही रूप में प्राचीन भारत के धर्म-शास्त्रों का मूल उद्देश्य एक ऐसा अनुशासन प्रदान करना है जो सामान्य भौतिक मनुष्य के मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विकास को गति देता है जो मानव विकास के  प्रारंभिक चरण में है।"

          "पति का मामला मानव विकास के अगले चरण से संबंधित है। वह एक ‘राजसिक’ महत्वपूर्ण व्यक्ति है जो अपने सुविकसित व्यावहारिक दिमाग, जीवन शक्ति और इच्छाशक्ति में रहता है। उसके लिए विकास में अगला कदम राजसिक महत्वपूर्ण व्यक्ति से प्रगति कर एक सात्विक व्यक्ति बनना है जो अपने बौद्धिक, नैतिक और कलात्मक मन द्वारा शासित है। इसलिए मैंने उसे नैतिक विकास के मार्ग पर स्थापित किया। वह अपने व्यवसाय में जो कठिनाई अनुभव कर रहा है, वह वास्तव में प्रगति की इस उच्च रेखा में निर्णायक रूप से आगे बढ़ने का एक अवसर है।"

          "और हमारा शिष्य जिसका पत्र आज पढ़ा, वह तीसरे चरण का है। वह एक अच्छी तरह से विकसित मानसिक और नैतिक प्राणी और आध्यात्मिक अभीप्सा के साथ एक जागृत आत्मा वाला एक सात्विक व्यक्ति है। वह ऐसा व्यक्ति है जो अपने आध्यात्मिकता को महसूस करने के लिए तैयार है। उसे अपनी मानसिक और नैतिक प्रकृति से परे अपने आध्यात्मिक आत्मा तक उठने का प्रयास करना होगा। उसके लिए अपने मन या समाज की मानसिक और नैतिक धारणाओं से दृढ़ता से जुड़ा रहना उसकी आध्यात्मिक प्रगति में बाधा उत्पन्न करेगी। वास्तव में उसके लिए मानसिक और नैतिक परामर्श का सीधे अनुसरण करने के बजाय अपनी आत्मा के आंतरिक आध्यात्मिक मार्गदर्शन की खोज करने की कोशिश में ठोकर खाना, लड़खड़ाना और इधर-उधर भटकना बेहतर है।"

          ऋषि ने आगे कहा,मनुष्य एक जटिल जीव है जिसे एक निश्चित तार्किक प्रक्रिया या सूत्र में नहीं बांधा सकते।  सामान्य तौर पर कमजोर आत्मा को एक तामसिक या राजसिक प्रकृति की आत्मा के साथ सीधे आंतरिक मार्गदर्शन का उपदेश देना उचित नहीं है। यह शरीर की इच्छाओं और प्रवृत्तियों को प्राण की आंतरिक प्रेरणा के रूप में समझने की भूल कर सकता है। लेकिन यह एक जागृत आत्मा पर लागू नहीं होतीदरअसल यह आत्मा के आंतरिक जागरण के स्तर पर निर्भर करता है।"

          हमें यह समझना चाहिए कि प्रेरणा कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे मैकडॉनल्ड्स के बर्गर, पिज्जाहट के पिज्जा या सेरिडोन और क्रोसीन की गोली की तरह सामान्यीकृत या मानकीकृत किया जा सकता हैसबों को एक ही लाठी से नहीं हाँका जा सकता। भारत के कुछ महान आध्यात्मिक गुरुओं के जीवन के वास्तविक प्रसंग इसी विकासवादी प्रेरणा के मार्ग और प्रक्रिया को दर्शाती हैं ये एक सी-ही प्रतीत होने वाली परिस्थिति में अलग-अलग पात्रों का अलग-अलग ढंग से मार्ग दर्शन करती हैंयही इसकी अद्भुत विशेषता है।

(एम.एस.श्रीनिवासन के लेखन पर आधारित)

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सहारे के भरोसे न रहें                                      कहानी जो सिखाती है जीना

          एक बादशाह सर्दियों की शाम को जब अपने महल में दाखिल हो रहा था, तो एक बूढ़े  दरवान को देखा, जो महल के दरवाजे पर बहुत महीन कपड़े पहने खड़ा था। बादशाह ने उसके करीब अपनी सवारी को रुकवाया और पूछने लगा, 'तुम्हें सर्दी तो नहीं लग रही?’

बूढ़े दरबान ने उत्तर दिया, 'बहुत लग रही है हुजूर; मगर क्या करूँ, मेरे पास गर्म कपड़े नहीं हैं, इसलिए बर्दाश्त करना पड़ता है।'  बादशाह ने कहा, 'मैं अभी महल के अंदर जाकर अपना ही कोई गर्म कपड़ा तुम्हारे लिए भेजता हूँ।' बूढ़े ने खुश हो कर बादशाह को सलाम किया और आजिजी का इजहार किया।

बादशाह महल में जाते ही किसी कारण से बूढ़े दरबान से किया हुआ वादा भूल गया। सुबह दरवाजे पर बूढ़े दरवान की अकड़ी हुई लाश मिली और करीब ही मिट्टी पर उसकी अंगुलियों से लिखी ये तहरीर भी- 'बादशाह सलामत ! मैं कई सालों से सर्दियों में इन्हीं कपड़ों में जी रहा था; मगर कल रात आपके गर्म लिबास के वादे ने मेरी जान निकाल दी।'

जिस तरह 'सहारे' इंसान को खोखला कर देते हैं, उसी तरह 'उम्मीदें' हमें कमजोर कर देती हैं। दुनियावी सहारे और उम्मीदों पर बहुत ज्यादा आश्रित नहीं रहना चाहिए।

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